| विट्ठलनाथ, कृष्णदास और श्रीनाथ मन्दिर का सत्ता संघर्ष भगवानदास मोरवाल |
1515 साल अर्थात विक्रम संवत् 1572 का पौष महीना, और इसी महीने के कृष्ण पक्ष का नौवाँ दिन. इसी दिन काशी के चरणाट नाम की जगह पर महाप्रभु वल्लभाचार्य के घर में उनके दूसरे पुत्र, और गोपीनाथ के छोटे भाई विट्ठलनाथ का जन्म हुआ. विट्ठलनाथ का विवाह इनके पिता वल्लभाचार्य जी की मृत्यु के बाद 1532 ईसवी में रुक्मिणी नाम की युवती से हुआ. विवाह के सत्ताईस वर्ष उपरान्त छह पुत्र और चार पुत्रियों को जन्म देने के बाद रुक्मिणी का देहावसान हो गया. इसके बाद रानी दुर्गावती के आग्रह पर इन्होंने पद्मावती से दूसरा विवाह किया. पद्मावती से घनश्याम नाम के पुत्र का जन्म हुआ. इस तरह विट्ठलनाथ के सात पुत्र हो गये.

इस बीच महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा गोवर्धन के गोपालपुरा में शुरू किया गया श्रीनाथजी का मन्दिर बनकर तैयार हो गया था. महाप्रभु ने इस मन्दिर की सेवा-पूजा का दायित्व बंगाली वैष्णवों को सौंपते हुए, अपने एक शिष्य कृष्णदास को इसका अधिकारी बना दिया. कृष्णदास महाप्रभु वल्लभाचार्य के देहान्त के बाद भी मन्दिर के अधिकारी बने रहे. महाप्रभु के देहावसान के बाद कृष्णदास मन्दिर-व्यवस्था में कुछ नयी व्यवस्था करना चाहते थे. क्योंकि बंगाली वैष्णव कृष्ण के साथ देवी की उपासना भी करते थे. इसलिए वे चाहते थे कि बंगाली वैष्णवों से यह सेवा वापस ले ली जाए. यह बात वल्लभाचार्य जी के बड़े पुत्र गोपीनाथ की मृत्यु के बाद की है.
इसकी शिकायत लेकर एक बार कृष्णदास प्रयाग के निकट गाँव अड़ैल में निवास कर रहे विट्ठलनाथ जी के पास गये, और विनम्रतापूर्वक बोले,
“आचार्यजी, आपसे एक जरूरी बात करनी है!”
“कहिए?”
विट्ठलनाथ जी ने भी विनम्रता के साथ कहा.
“बात ई है कि स्रीनाथजी के साथ जे बंगाली देबी की उपासना करै हैं. मेरौ सुझाब है कि इन बंगालियों के हाथ ते क्यों न स्रीनाथजी की सेबा ले ली जाए.”
कृष्णदास अपने आने का प्रयोजन स्पष्ट करते बोला.
“अगर बे स्रीनाथजी के साथ देबी की उपासना कर रहे हैं, तो याते स्रीनाथजी पे कहा फरक पड़रौ है?”
विट्ठलनाथ जी ने उल्टा कृष्णदास से प्रश्न किया.
“ऐसो है आचार्यजी, जब तलक इन्ते सेबा को अधिकार ना लियो जाएगो…मन्दिर की सुब्यबस्था और वाकै बैभव को बिस्तार होनौ मुस्किल है. बाकी आपकी मर्जी.”
“अब आप कह रहे हैं तो गलत तो ना कहरे होंगे. अगर आपकू ऐसो लगरो है तो कर लेओ.” विट्ठलनाथ जी ने न चाहते हुए कृष्णदास को श्रीनाथ मन्दिर की सेवा-पूजा के दायित्व से बंगाली वैष्णवों को हटाने की स्वीकृति दे दी.
स्वीकृति मिलने पर कृष्णदास ने गोवर्धन आते ही युक्तिपूर्वक सभी बंगालियों को श्रीनाथ मन्दिर की सेवा से मुक्त कर दिया, और उनकी जगह उसने अपने आदमियों को इसका दायित्व सौंप दिया.
न जाने क्यों विट्ठलनाथ जी को शुरू से कृष्णदास की मंशा पर सन्देह था, इसलिए कुछ दिनों के बाद वे प्रयाग से गोवर्धन चले आये. आने के बाद उन्होंने कृष्णदास के साथ परामर्श किया कि मन्दिर की नयी व्यवस्था कैसे की जाये? इस पर कृष्णदास ने जिन सेवायतों की सूची विट्ठलनाथ जी को सौंपी, उसे देख उनका सन्देह सही प्रतीत होने लगा.
“कृष्णदास जी, जब बंगाली बैष्णबों को जा बात कौ पतौ चलेगो कि मन्दिर की ब्यबस्था आपने उनते छीन ली है, तो बे बहौत नाराज होंगे. या मारे मेरौ एक सुझाब है!”
विट्ठलनाथ जी द्वारा सुझाव का नाम लेते ही, कृष्णदास के पास सिवाय सुनने के और कोई रास्ता नहीं बचा.
“ऐसो है कि क्यों न ई जिम्मेदारी महाप्रभुजी के सेबक रामदास और साँचौरा-औदिच्य बिरह्मिनों को दे दी जाये? याते साँप भी मर जाएगो और लठिया भी टूटने ते बच जाएगी…और फिर बे भी तो बिरह्मिन ही हैं.”
विट्ठलनाथ जी ने कूटनीति का उपयोग करते हुए सुझाव दिया.
कृष्णदास को मन मारकर विट्ठलनाथ जी के प्रस्ताव को स्वीकार करना पड़ा. वह इसका इसलिए विरोध नहीं कर सका, क्योंकि श्रीनाथ मन्दिर पर असली अधिकार तो विट्ठलनाथ जी का ही है. इस तरह कृष्णदास की सारी योजना विफल हो गयी.
लेकिन बंगालियों से श्रीनाथजी के सेवा सम्बन्धी सारे अधिकार छिन जाने के बाद कृष्णदास का नियन्त्रण इतना बढ़ गया, कि उसने दूसरे अधिकारियों के साथ मिलकर विट्ठलनाथ जी के ही मन्दिर प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगवा दिया. इधर बंगाली भी अपने अधिकारों को फिर से प्राप्त करने के लिये निरन्तर प्रयास करते रहे. किन्तु कृष्णदास ने उन्हें सफल नहीं होने दिया.
जिस समय नन्ददास इस प्रसंग को सुना रहा था, रसखान उसे दम साधे सुनता रहा. उसकी उत्सुकता तो इसमें है कि अब आगे क्या होगा?
“रसखान जी, पतौ है जब तू विट्ठलनाथ जी के कनै ठकुरानी घाट पे दीकच्छा कू आयो हो, ई वातै कछु महीना पहले की बात है. उन बंगालियों ने मन्दिर की मिलकियत कू लेके फिर तै सवाल उठा दियो, और अपनी फरियाद लेके पहोंच गये बादसाह अकबर के दरबार में.”
“फिर का हुओ?”
“भिया हुओ कहा, बिट्ठलनाथ जी ने बीरबल जी के नाम एक चिट्ठी लिखवायी और वाहे लेके पहोंचगो उनके कनै. तब जाके बीरबल जी ने बादसाह अकबर ते कह-सुनके बंगालियों को ई झगरा हमेसा कू निपटवायौ. याही दौरान बादसाह अकबर ने ई जमीन, जापे ई गोकुल बसो हुओ है, आचार्यजी कू सदमदा कू दान कर दी. याकै बाद आचार्यजी अपनै सगरे कुटुम और सिस्य-सेबकन के साथ गोकुल में आके बस गये…और जो ई नबनीतप्रियजी को मन्दिर है न, ऊ बनवायौ.”
रसखान के यह तो समझ में आ गया कि बीरबल की मदद से मन्दिर का झगड़ा हमेशा के लिये निपट गया, लेकिन वह अब एक नयी दुविधा में फँस गया कि विट्ठलनाथ जी को बीरबल, या कहें बीरबल को विट्ठलनाथ जी कैसे जानते हैं ?
रसखान से जब पूछे बिना नहीं रहा गया, तब उसने नन्ददास से पूछ ही लिया,
“भोजजी, अपने आचार्य बिट्ठलनाथ जी बीरबल कू कैसे जाने हैं?”
“ऐसो है कि गायनाचार्य तानसेन जी ही नहीं, बादसाह अकबर के मुसाहिब टोडरमल जी और बीरबल जी अपने आचार्यजी के कृपापात्र हैं.”
“याकौ मतलब ई हुओ कि टोडरमल जी और बीरबल जी भी पुष्टि सम्प्रदाय के अनुयायी हैं?”
“बिल्कुल.”
रसखान मन-ही-मन अपने उस गुरु के प्रति भक्ति-भाव से भर गया, जिनके तानसेन, बीरबल और टोडरमल जैसे गुणीजन कृपापात्र हैं. वह धन्य हो उठा कि वह विट्ठलनाथ जी जैसे गुरु के सानिध्य में है. उसका माथा गर्व से ऊँचा होता चला गया.
“रसखान जी, गायनाचार्य तानसेन जी का अपनै आचार्यजी ते मिलने को किस्सा तो और भी मजेदार है. हुओ ई कि जब आचार्य विट्ठलनाथ जी अड़ैल में रहबै हे, तो उन्हीं दिनों यवनों ने प्रयाग में उपद्रब मचानो सुरु कर दियो. याते परेसान होके इन्ने बिचार करौ कि क्यों न अब ब्रज में जाके रहो जाए. इनकी या परेसानी की खबर जब गढ़ा की रानी दुर्गाबती ए चली, तो उनके आग्रह पे आचार्यजी गढ़ा चले आये. जब वे गढ़ा आरे हे तो रस्ते में राजा रामचन्द्र बाघेला की रजधानी में कछु दिन ठहगे. राजा रामचन्द्र बाघेला गायन कला के बड़े भारी रसिक और प्रेमी भये. और गायनाचार्य तानसेन जी, बादसाह अकबर के दरबार में आने ते पहले उसी राजा के आश्रय में हे. तो वईं आचार्यजी की तानसेन जी ते भेंट भयी ही.”
जिस तरह नन्ददास के माध्यम से एक के बाद एक अतीत की परतें अनावृत हो रही थीं, उन्हें जान और सुन रसखान का रोम-रोम विट्ठलनाथ जी के प्रति आस्था और श्रद्धा से भीग गया.
“बैसे आचार्यजी को एक घर मथुरा में भी है. रानी दुर्गाबती इनको इतनौ सम्मान करे ही, कि इनके सात बेटान के नाम पे सपरिबार रहने कू एक बहोत बड़ो भवन बनवा दियो. जामें सातों भाई वामें रहबे लगे. पतौ है रसखान बाद में वा घर कौ नाम सतघरा पड़गो.”
लेकिन नन्ददास यानी अष्टछाप के सबसे छोटे सखा भोज ने महाप्रभु वल्लभाचार्य के मृत्युपरान्त, उनके द्वारा दीक्षित और चौथे शिष्य कृष्णदास अर्थात ऋषभ सखा, और विट्ठलनाथ जी के बीच हुए विवाद को सुनाया, तो कुछ पलों के लिये रसखान विचलित होता चला गया.
नन्ददास ने रसखान को जो घटना सुनाई, दरअसल उसके अनुसार हुआ यह कि बंगाली वैष्णवों से श्रीनाथ मन्दिर की सारी सेवा लेने के बाद बीरबल की मदद से अकबर की सरपरस्ती में सारा विवाद समाप्त तो हो गया, किन्तु उसके उपरान्त मन्दिर के अधिकारी और ऋषभ सखा कृष्णदास का मन्दिर पर एक तरह से वर्चस्व हो गया. अपनी शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने उनका दुरुपयोग भी करना शुरू कर दिया. इसके बाद वल्लभाचार्य जी की एक शिष्या, और श्रीनाथजी की सेविका गंगाबाई नाम की वैष्णव स्त्री का मन्दिर में आना-जाना कुछ अधिक ही बढ़ गया था. आर्थिक रूप से वह एक सम्पन्न महिला थी, किन्तु उसकी सम्पत्ति का कोई वारिस नहीं था. मन्दिर की नयी व्यवस्था के कारण उसके संचालन के लिये आर्थिक संसाधनों की बहुत ज़रूरत थी. इसके लिये मन्दिर के अधिकारी कृष्णदास ने गंगाबाई से घनिष्टता बढ़ाते हुए, उसकी सम्पत्ति को मन्दिर में उपयोग करने लगा. गंगाबाई पर कृष्णदास की इतनी कृपा थी, कि गंगाबाई को टोकने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती.
कृष्णदास विट्ठलनाथ जी के बजाय इनके बड़े भाई के सुपुत्र पुरुषोत्तम को वल्लभाचार्य जी की गद्दी का वास्तविक अधिकारी मानते थे. उधर गोपीनाथ की विधवा पत्नी भी चाहती थी, कि मन्दिर का उत्तराधिकारी उनका बेटा पुरुषोत्तम ही बने. लेकिन विट्ठलनाथ जी की योग्यता के आगे यह योजना सिरे नहीं चढ़ पायी. इतना ही नहीं. इसी के चलते कृष्णदास ने गंगाबाई के आने-जाने पर कोई नियन्त्रण नहीं किया.
धीरे-धीरे गंगाबाई का मन्दिर में आना-जाना इतना बढ़ गया, कि वह श्रीनाथजी के भोग के समय भी विग्रह में उपस्थित रहने लगी. इसके कारण गंगाबाई और कृष्णदास को लेकर तरह-तरह सन्देह पैदा होने लगे. यहाँ तक, दोनों के अनुचित सम्बन्धों की चर्चाएँ-कुचर्चाएँ भी शुरू हो गयीं, और मन्दिर के सेवकों और कर्मचारियों का एक बड़ा समूह गंगाबाई के विरुद्ध हो गया.
विट्ठलनाथ जी इस बात से भली-भांति परिचित थे, लेकिन कृष्णदास के अधिकारी होने के कारण वे उनसे कुछ नहीं पाते थे. वे बस उचित समय का इन्तज़ार करने लगे.
एक दिन यह समूह विट्ठलनाथ जी के पास पहुँच गया. विट्ठलनाथ जी समूह को देखते ही समझ गये कि लगता है वह घड़ी आ चुकी है, जिसका उन्हें बड़ी बेसब्री से इन्तज़ार था.
“आचार्यजी, आपते एक बात कहनी है!” समूह के एक सेवक ने विट्ठलनाथ जी से कहा.
“हाँ कहो!”
“आपको तो पतौई है कि श्रीनाथजी मन्दिर में आजकल गंगाबाई कौ कितनो दखल हे गयो है.”
“बाकी तो सब ठीक है प्रभु, पर ठाकुरजी के भोग के समय वाकौ विग्रह में होनो सम्प्रदाय की सेवा-बिधि के बिरुद्ध है.” दू
सरा सेवक पक्का आधार बनाते हुए बोला.
“पर भिया, जे बात तुम कृष्णदास जी ते जाकै कहो! मन्दिर के अधिकारी तो बेई हैं.”
विट्ठलनाथ जी ने कृष्णदास द्वारा बनाये गये मन्दिर नियमों का पालन करते हुए सुझाव दिया.
“जे बात उन्ने पतौ ना होएगी कि भोग के समय विग्रह में एक इस्त्री को होनो हमारे सम्प्रदाय के सेबा-बिधि के बिरुद्ध है.”
एक सेवक ने थोड़ा उत्तेजित होते हुए कहा.
इसी बीच एक मन्दिर-कर्मचारी विट्ठलनाथ जी के समीप आया, और लगभग फुसफुसाते हुए बोला, “एक बात कहूँ आचार्यजी, सुनी है अपने अधिकारीजी और गंगाबाई के बीच कछु नैन-मटक्का चलरे है.”
विट्ठलनाथ जी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, सिवाय यह कहने के,
“अब आप सब जने जाओ! मैं कोई रस्ता निकासने कौ प्रयास करूँगो.”
“हमारौ काम तो आचार्यजी आप तलक ई बात पहोंचानो हो.” इसके बाद यह समूह चला आया.
कई दिनों तक विट्ठलनाथ जी उपाय खोजते रहे कि कैसे गंगाबाई का मन्दिर में आना-जाना रोका जाए? लगातार चले चिन्तन-मनन के बाद विट्ठलनाथ जी को एक युक्ति सूझी, और उन्होंने गोवर्धन स्थित श्रीनाथ मन्दिर के अधिकारी कृष्णदास के पास यह सन्देश भिजवा दिया कि उन्हें मैंने तत्काल बुलाया है.
कृष्णदास तुरन्त विट्ठलनाथ जी के पास पहुँच गया.
“कृष्णदास जी, सुनने में आया है कि श्रीनाथजी ने एक दिन राजभोग ना स्बीकारौ है!” विट्ठलनाथ जी मुस्कराते हुए बोले.
“ऐसे कैसे हो सके आचार्य जी ?”
“ऐसो ही हुओ है. सुनी है कि राजभोग पे गंगाबाई की कुदृष्टि पड़ गयी ही, या मारे श्रीनाथजी ने राजभोग ना स्बीकारौ है.”
विट्ठलनाथ जी की इस बात को सुन मन्दिर अधिकारी कृष्णदास कुछ नहीं बोला, और मन-ही-मन याद करने लगा कि यह किस दिन की घटना है. यह बात उसे किसी ने क्यों नहीं बतायी ?
इससे पहले कि वह कुछ याद कर पाता, विट्ठलनाथ जी व्यंग्यपूर्ण शब्दों में बोले,
“कृष्णदास जी, श्रीनाथजी कू ई जो कष्ट पहोंचो है, याकै जिम्मेदार आपई हो. ना आप गंगाबाई को विग्रह में आने की इजाजत देते और ना श्रीनाथजी कू ई कष्ट पहोंचतो.”
मन्दिर अधिकारी कृष्णदास अपने इस अपमान का घूँट पी, विट्ठलनाथ जी के पास से चला आया. कुछ नहीं बोला वह.
दो दिन बाद इस समाचार ने पूरे श्रीनाथ मन्दिर के अहाते में जैसे हड़कम्प मचा दिया. किसी को जैसे अपने कानों पर जैसे यक़ीन नहीं हुआ. कई श्रीनाथजी के भोग शुरू होने से लेकर समाप्त होने तक विग्रह में ही मौजूद रहे, और कई विग्रह के बाहर यह देखने के लिये खड़े हो गये कि विग्रह ना सही, वह मन्दिर के आसपास कहीं नज़र आ जाए. लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं दी.
जब इस समाचार की तह में जाकर कुछ लोगों ने पड़ताल की कि यह सब अचानक कैसे हुआ, तब पता चला कि विट्ठलनाथ जी ने अपने विशेष अधिकार का उपयोग करते हुए, गंगाबाई का मन्दिर में आना-जाना बन्द करवा दिया है.
सबसे अधिक आश्चर्य तो यह जानकार हुआ, कि बंगाली वैष्णवों के हटने के बाद जिस मन्दिर अधिकारी कृष्णदास का प्रभाव बहुत बढ़ गया था, और जिसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता नहीं हिलता था, उसकी इच्छा के विरुद्ध विट्ठलनाथ जी ने इतना कठोर निर्णय कैसे ले लिया.
विट्ठलनाथ जी के इस क़दम पर मन्दिर अधिकारी कृष्णदास बहुत नाराज़ हुआ. महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा अपने शिष्य को मन्दिर का अधिकारी बनाने के कारण कृष्णदास किसी तरह के हस्तक्षेप को स्वीकार करने को तैयार नहीं रहता था.
इस अपमान से कृष्णदास अपने गुरु के पुत्र और गद्दी के उत्तराधिकारी विट्ठलनाथ जी से इतना रुष्ट हुआ, कि उसने श्रीनाथ मन्दिर में विट्ठलनाथ जी के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगवा दिया. अपने लिये मन्दिर की ड्यौढ़ी बन्द हो जाने पर विट्ठलनाथ जी को दुःख तो बहुत हुआ, मगर उन्होंने अपने पिताश्री द्वारा नियुक्त किये गये अधिकारी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया. बल्कि वे गोवर्धन से परसौली गाँव स्थित चन्द्र सरोवर चले आये और यहीं रहने लगे. किसी की कृष्णदास के इस क़दम के विरुद्ध आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं हुई. एक बार भी उन्होंने गोवर्धन जाने की कोशिश नहीं की. श्रीनाथजी के दर्शन से वंचित किये जाने पर विट्ठलनाथ जी इतने व्यथित हुए, कि चन्द्र सरोवर आने के बाद उन्होंने श्रीनाथजी के वियोग में अन्न त्याग दिया. अब वे केवल दुग्धाहार लेने लगे.
इस तरह विट्ठलनाथ जी अपने श्रीनाथजी के दर्शन से छह महीने तक वंचित रहे.
इधर मन्दिर अधिकारी कृष्णदास ने अपना आदेश वापस नहीं लिया, तो उन्हीं का बड़ा बेटा गिरधर मथुरा के हाकिम के पास गया, और अपने पिता के इस कुकृत्य के बारे में उसे सारी बात बतायी. हाकिम ने उसी समय कृष्णदास को क़ैद करने का हुक्म दे दिया. साथ में गिरधर से यह भी कहा कि वे इसी समय विट्ठलनाथ जी के पास जाएँ, और सम्मान के साथ उन्हें वापस गोवर्धन श्रीनाथजी मन्दिर ले जाएँ.
हाकिम का आदेश लेकर अधिकारी कृष्णदास का पुत्र गिरधर सीधा परसौली स्थित चन्द्र सरोवर पहुँच गया. जाते ही वह विट्ठलनाथ जी के क़दमों में गिरते हुए बोला,
“प्रभु, अपने पिताश्री के कृत्य पर मैं आपते छिमा माँगरौ हूँ. मेरी आपते हाथ जोरके बिनती है कि आप मेरे संग अभई गोबर्धन चलो !”
“गिरधर जी, मैं आपके पिता की आज्ञा के बिना कैसे चलो जाऊँ?”
“पर प्रभु, पिता जी तो अपने कर्मन की कारन मथुरा के कारागार में बन्द है.”
“क्याSSS…कृष्णदास जी कारागार में है?” इस ख़बर को सुन विट्ठलनाथ जी व्यथित होते हुए बोले.
“हाँ प्रभु, मैंने ही मथुरा के हाकिम के कनै जाके अपने पिताश्री की सिकायत करी है. मैंने ही उन्हें कारगार में बन्द करबायौ है.”
“गिरधर, बेटे तैने जे काम अच्छो ना करौ ! सुन, अब तो मैं गोबर्धन बिलकुल भी ना जाऊँगो…जब तलक हमारे अधिकारीजी कारागार ते मुक्त होके ना आएँगे, तब तलक मैं अन्न-जल कछु भी ग्रहन ना करूँगो ! बैसे भी तुम्हारे पिताजी हमारे पिताश्री महाप्रभु जी के सेबक रहे हैं…या मारे उनको पूरो सम्मान कियो जानौ चहिए !” विट्ठलनाथ जी ने बड़ी विनम्रता के साथ उत्तर दिया.
विट्ठलनाथ जी की इस प्रतिज्ञा को सुन कृष्णदास का पुत्र गिरधर उलटे पाँव मथुरा रवाना हो गया. मथुरा जाकर हाकिम से गिरधर ने अपने पिता को क़ैद से मुक्त करने का अनुरोध किया, तो कृष्णदास को हाथो-हाथ रिहा कर दिया गया.
रास्ते में जब कृष्णदास को उनके बेटे गिरधर ने विट्ठलनाथ जी की इस सहृदयता के बारे में बताया, तो वे बड़े लज्जित हुए और मारे शर्म के अपने कृत्य पर पानी-पानी हो गये. परसौली जाकर कृष्णदास ने विट्ठलनाथ जी से अपने इस व्यवहार पर क्षमा माँगी, और स्वयं उन्हें गोवर्धन साथ लेकर आये. विट्ठलनाथ जी को उन्होंने श्रीनाथजी की गद्दी पर पूरे सम्मान के साथ बिठाया, और दोनों हाथ जोड़ते हुए याचना के साथ बोला-
जाके मन में उग्र भरम है, श्री बिट्ठल श्री गिरिधर दो l
ताकौ संग विषम विष हू तें, भूलैं चतुर करौ जिन कोय ll
इस तरह विट्ठलनाथ जी ने कृष्णदास को क्षमा कर दिया, और उन्हें गोवर्धन स्थित श्रीनाथ मन्दिर का पुनः प्रभारी बना दिया. कृष्णदास जी ने मन्दिर का प्रभार सँभालने के बाद लिखा कि-
परम कृपाल श्री वल्लभनन्दन, करत कृपा निज हस्त दे माथे l
जे जन शरण आय अनुसरहि गहे सौंपत श्री गोवर्धननाथे ll
परम उदार चतुर चिन्तामणि राखत भवधारा बह्यो जाते l
भजि ‘कृष्णदास’ काज सबि सरहिं, जो जाने श्रीविट्ठलनाथे ll
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भगवानदास मोरवाल दिल्ली, राजस्थान व उत्तर प्रदेश की सीमाओं में बँटे और हरियाणा के काला पानी कहे जानेवाले मेवात के जिला नूह के क़स्बे नगीना में 23 जनवरी, 1960 को जन्म.
सिला हुआ आदमी (1986), सूर्यास्त से पहले (1990), अस्सी मॉडल उर्फ़ सूबेदार (1993), सीढ़ियाँ, माँ और उसका देवता (2008), लक्ष्मण-रेखा (2010),दस प्रतिनिधि कहानियाँ (2014), धूप से जले सूरजमुखी (2021), महराब और अन्य कहानियाँ (2021), कहानी अब तक (दो खंड), चुनी हुई कहानियाँ (2024) (कहानी-संग्रह). पकी जेठ का गुलमोहर (पहला भाग, 2016), यहाँ कौन है तेरा (दूसरा भाग, 2023) स्मृति-कथा. सम्मान/पुरस्कार : हिन्दी अकादमी विशिष्ट योगदान सम्मान (2023) हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार; अज्ञेय शब्द सृजन सम्मान (2024); कर्तृत्व समग्र सम्मान (2024) भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता; हिन्दी साहित्यकार गौरव सम्मान (2024) हरियाणा प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन; मुंशी प्रेमचन्द सारस्वत सम्मान (2020-21), दिल्ली विधानसभा; सन्तराम बीए राष्ट्रीय सम्मान (2020); वनमाली कथा सम्मान, भोपाल (2019); स्पन्दन कृति सम्मान, भोपाल (2017); जनकवि मेहरसिंह सम्मान (2010) हरियाणा साहित्य अकादमी; अन्तर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान (2009) कथा (यूके) लन्दन; शब्द साधक ज्यूरी सम्मान (2009); कथाक्रम सम्मान, लखनऊ (2006); साहित्यकार सम्मान (2004) हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार; साहित्यिक कृति सम्मान (1994) हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार; साहित्यिक कृति सम्मान (1999) हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार पूर्व राष्ट्रपति श्री आर. वेंकटरमण द्वारा मद्रास का राजाजी सम्मान (1995) सहित कई सम्मान पुरस्कारों से सम्मानित. सम्पर्क: WZ-745G, दादा देव रोड, नजदीक बाटा चौक, गली नं. 2 मो.: 9971817173; ई-मेल: bdmorwal@gmail.com
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कृतियाँ: काला पहाड़ (1999), बाबल तेरा देस में (2004), रेत (2008), नरक मसीहा (2014), हलाला (2015), सुर बंजारन (2017), वंचना (2019), शकुंतिका (2020), खानज्तादा (2021), मोक्षवन (2023), काँस (2024), दण्ड प्रहार (2025) (उपन्यास).


पढ़ लिया। बाक़ी सब ठीक है। भगवान दास मोरवाल ने इसमें बड़ा बौद्धिक घोटाला किया है। कृष्णदास तैलंग ब्राह्मण नहीं थे। सारे स्रोत उन्हें गुजराती और शूद्र पृष्ठभूमि का साबित करते हैं। श्रीनाथ मंदिर को लेकर सारी लड़ाई इसी बात को लेकर थी कि वो एक ब्राह्मण के हाथ में ना होकर एक शूद्र कुनबी के हाथ में है। उनकी हत्या भी इसीलिए हुई थी। मोरवाल अपनी त्रुटि सुधारें ग़लत कथा ना कहें।
भूल -सुधार!🙏
कल कवि-मित्र Arun Dev ने अपनी वेब पत्रिका ‘समालोचन’ पर रसखान से संबंधित एक अंश लगाया था l उसमें एक जगह गुसाईं विट्ठलनाथ जी का एक संवाद आता है कि-
“कृष्णदास जी, जे सारे तो आपके सजातीय तैलंग बिरह्मिन हैं l जब बंगाली बैष्णबों को जा बात कौ पतौ चलेगो, कि मन्दिर की ब्यबस्था आपने अपने सजातीयों को सौंप दी है, तो बे बहौत नाराज होंगे l या मारे मेरौ एक सुझाब है !”
इस संवाद में असावधानीवश कृष्णदास जी को तैलंग ब्राह्मण बताया गया है जबकि तैलंग ब्राह्मण वास्तव में विट्ठलनाथ जी थे l कृष्णदास जी कुनबी पटेल थे, जिन्हें बावन वैष्णव वार्ता में ‘शूद्र’ कहा गया है l
अपनी इस असावधानी के लिए लेखक खेद प्रकट करता है l