|
रज़ा स्मरण |
एस. एच. रज़ा
आधुनिक भारतीय चित्रकाररामकुमार
पैरिस के विश्वविख्यात इलाके ‘पिंगाल’ के एक कोने में बहुत पुराने बने हुए मकान के एक छोटे से कमरे में जुलाई १९५५ की एक सुबह मेरी भेंट रज़ा से हुई. वही चेहरा, चेहरे का वही पीला झुलसाया हुआ रंग, उत्साह और ज़िन्दगी से भरी उनकी सहृदय आँखें, वही मुस्कराते हुए मटियाले रंग के होंठ— सब कुछ वही था जैसा १९५१ में पेरिस से विदा लेते समय उन्हें छोड़ आया था. चारपाई पर बिखरे छोटे-छोटे कागज़ों पर बने उनके स्केच, दीवार पर लटके हुए उनके ‘लैंडस्केप्स’, एक कोने में फर्श पर बिखरे रंग और तूलिकायें, एक मेज़ पर रखा स्टोव, कुछ प्याले, चाय और कॉफी का डिब्बा, चारपाई, ऊपर दीवार पर लगी बुकशेल्फ पर पड़ी किताबें, कापियाँ और चित्रों वाले पोस्टकार्ड और अस्तव्यस्त कमरे के बीचोबीच छह फीट के दुबले-पतले रज़ा ने हँसते-हँसते मुझे अपनी छाती से लगा लिया. तीन वर्ष बाद यकायक मुझे पेरिस में देखने की कभी उन्होंने कल्पना नहीं की थी.
एक चित्रकार होने के नाते रज़ा ने कितना संघर्ष किया है उसकी थोड़ी बहुत कहानी मुझे मालूम है. उन्होंने अपनी प्रसिद्ध, एक विशेष प्रकार के चित्रों की लोकप्रियता, आलोचकों की ओर से उनकी भरपूर प्रशंसा. किसी के भी प्रति उन्होंने अपना मोह नहीं रखा, सदा अपनी आत्मा की आवाज़ का साथ दिया. १९४८ में जब वे काश्मीर से लगभग १५० चित्र बना कर लौटे तो दिल्ली और बम्बई की प्रदर्शनियों में आम लोगों और कला-आलोचकों ने एक स्वर में उनकी योग्यता और प्रतिभा को स्वीकार किया, चित्र हाथों-हाथ बिके, समाचारपत्रों में उनकी प्रशंसा हुई, बम्बई आर्ट सोसाइटी की प्रदर्शनी में उन्हें स्वर्ण पदक (वर्ष का सबसे बड़ा पुरस्कार) मिला, भारत सरकार की ओर से वज़ीफ़ा मिला और अन्त में १९५० में फ्रांसीसी सरकार की ओर से दो वर्ष के लिये पेरिस में चित्रकला का अध्ययन करने की सहायता मिली. इतनी तेज़ी से इतनी कम उम्र में (तब शायद वे २५ या २७ वर्ष के रहे होंगे) अधिक सफलता कम चित्रकारों को मिली है.
पेरिस में १९५० के वसन्त में ‘गार द लेस’ पर मैंने उनका स्वागत किया था. वह उनके जीवन का नया अध्याय था. पेरिस आने के स्वप्न वे पिछले तीन चार सालों से देख रहे थे. वे पिकासो, मातीस, ब्राक, लेज़े, रूओ आदि के मौलिक चित्र देख कर उछले बिना नहीं रह सके. उन्हें एक नई दृष्टि मिली, नई प्रेरणा मिली. धीरे-धीरे उन्होंने अनुभव किया कि अपने जिस कृतित्व पर उन्हें इतनी ख्याति मिली, उसका कोई महत्व नहीं है, उनकी कृतियाँ इन महान कलाकारों के सामने कहीं नहीं टिकतीं. नये-नये प्रयोगों का मार्ग खुला, नये अनुसंधान शुरू हुए, रिल्के की कविता में उन्हें दिलचस्पी हुई, रोमां रोलां के ‘जां क्रिस्तोफ़’ को पुनः पढ़ कर उन्हें नई अनुभूति हुई. मानसिक संघर्ष का क्रम चला, अतीत को वे भूल गये, भारतीय परम्परा का मोह बढ़ा. अन्त में एक नया मार्ग खुला.
पेरिस आने से पूर्व अपने प्राकृतिक दृश्यों में उस दृश्य का निचोड़ वे पा लेते थे, रंगों में एक सनसनीदार आकर्षण होता था, एक प्रकार की ‘फैन्टसी’ होती थी; यथार्थता की छाया दिखाई देती थी लेकिन एक सबसे बड़ी कमजोरी थी बौद्धिक स्तर पर चित्र को ‘कम्पोज़’ करने का अभाव, रंगों में जीवन होता था लेकिन ‘एस्थेटिक’ स्तर पर उनका संतुलन नहीं हो पाता था जिससे उनके चित्रों के विभिन्न अंग ढीले ढाले से जान पड़ते थे. वहाँ भावना थी लेकिन बौद्धिक चेतना का अभाव था. इसी कमी को उन्होंने दूर किया. प्रत्येक रेखा नपी-तुली होने लगी, प्रत्येक रंग बहुत सोच समझ के बाद लगाया जाने लगा. एक चित्र बनाने में पहले उसके कितने ही स्केच बनाये जाते थे. प्रेरणा का स्रोत था राजपूत और मुग़ल शैली के चित्रों में बने मकान और प्राकृतिक रूप. उस प्रेरणा को इन्होंने आधुनिक प्रयोगों के साथ मिला कर बदला. प्रकाश और छाया के टेकनीक का पूर्ण रूप से बहिष्कार किया. इसका परिणाम यह हुआ कि एक नया वातावरण उनके चित्रों में आया. उनके मकान ऐसे जान पड़ने लगे जैसे हम स्वप्न में देखते थे, एक नई ‘फैन्टसी’ का जन्म हुआ जहाँ सूरज या चाँद मानों आकाश में स्थिर होकर लटका रह गया हो, जैसे उन मकानों का मानव से कोई सम्बन्ध नहीं, जैसे वे रंग कलाकार के अपने दिमाग की उपज हों.
पहले-पहल उन चित्रों को देखकर कुछ भारतीय आलोचकों ने नाक-भौं सिकोड़ी. वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि रज़ा ऐसे चित्र बनाने लगेंगे, पुराने चित्रों की छाया तक उनमें दिखाई नहीं देती थी. पेरिस की एक गैलरी में जब वे चित्र दिखाये गये तो उनकी काफ़ी प्रशंसा हुई, उनके चित्र बिकने भी लगे, पेरिस के कला-आलोचकों को उनमें बहुत सी मौलिकता दिखायी दी. धीरे-धीरे हिन्दुस्तान में भी उनके आलोचकों ने उनकी इस नयी धारा की प्रशंसा की.
फिर कुछ उड़ती हुई खबरें सुनीं कि तीन वर्षों तक इस नयी धारा को अपनी चरम सीमा पर ले जाकर फिर रज़ा ने उसे छोड़ दिया है, उनकी आर्थिक कठिनाइयों और मुसीबतों के समाचार मिले. वज़ीफ़ा ख़त्म हो चुका था और अब वे स्वतन्त्र रूप से पेरिस में रहते थे. उनके मित्रों को स्वाभाविकता उत्सुकता हुई कि अब वे क्या करेंगे. पेरिस में उनसे मिलकर और उनके नवीनतम चित्र देख कर मुझे उनके नये प्रयोगों का आभास मिला. उनका विचार था कि पिछली धारा के चित्रों में बौद्धिक स्तर पर संतुलन अवश्य था लेकिन उनमें जीवन का अभाव था, भावना नहीं थी, वे हृदय को स्पर्श नहीं कर पाते थे. अब ये नये प्रयास उन दोनों प्रवृत्तियों में संतुलन बनायेंगे. अब तक वे सदा जल-रंगों में ही काम करते थे लेकिन अब उन्होंने तैल रंगों को अपनाया. तूलिका के बदले पैलेट नाइफ का सहारा लिया, तेज चमकीले रंगों को छोड़कर काले, नीले, ब्राउन आदि रंगों से काम किया. अभी इस नयी प्रवृत्ति का जन्म हुए सात आठ महीनों से अधिक नहीं हुए हैं अतः निश्चित रूप से इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन जो चित्र भी मैंने देखे या जो प्रदर्शित हुए, वे अत्यन्त ऊँचे स्तर के जान पड़े, पेरिस के कला-आलोचकों ने उनकी सराहना की, और वे बिकने भी लगे. इन चित्रों में यूरोपीय प्रभाव अधिक उभर आया है.
पिछले चन्द महीनों में आर्थिक कठिनाई को सुलझाने के लिए उन्होंने एक प्रकाशन संस्था की पुस्तकों के लिये कवर बनाने शुरू किये. महीने में एक कवर बनाते थे और लगभग ३०० रुपये पा जाते थे जो उनकी दो वक़्त की रोटी के लिये पर्याप्त थे. उनके कवरों की भी इतनी लोकप्रियता हुई कि प्रकाशन संस्था का मालिक उन से अधिक कवर बनाने का अनुरोध करने लगा लेकिन रज़ा ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया क्योंकि एक कवर बनाकर अपना शेष समय वे अपने चित्रों को देना चाहते थे.
रज़ा आधुनिक भारतीय चित्रकला, जगत् में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं. उनकी प्रगति अनिवार्य है क्योंकि वे सदा नयी खोजो और प्रयोग में संलग्न रहते हैं. एक मनुष्य के नाते भी लोगों में उनका आदर है. जो भी एक बार उनसे मिला, उसी ने उनको सराहा. अपने कष्टों के बावजूद भी दूसरों की सहायता करने में वे कभी नहीं हिचके. युवक चित्रकारों को उन्होंने सदा उत्साहित किया और उन्हें प्रेरणा दी परन्तु अपने विचारों को प्रगट करने में सदा स्पष्ट रहे. मानव और कलाकार-ऊँचे स्तर पर एक ही व्यक्ति में दोनों का सम्मिश्रण हमें कम ही देखने को मिलता है.
(धर्मयुग के सितम्बर २३, १९५६ अंक से आभार सहित)

कला की मौजूदगी समाज में एक जीवित मौजूदगी है.
_________________________
रज़ा से प्रयाग शुक्ल की बातचीत
भोपाल में एक दोपहर रज़ा से जब यह मेरी बातचीत शुरू हुई तो मैंने पूछा कहाँ से शुरू करें? उत्तर में रज़ा ने कहा, ‘जहाँ से आपका मन हो, मैं तैयार हूँ.’ बिल्कुल शुरू से ही शुरू करें, मैंने कहा.
पहला सवाल जो मैंने उनसे पूछा वह यही था ‘क्या आपको उस पहले चित्र या चित्रों की याद है, जिसे आपने प्रदर्शित करने की बात सोची हो और प्रदर्शित किया हो.’
लेकिन रज़ा के जवाब पर आयें इस से पहले रज़ा के व्यक्तित्व के बारे में कुछ बताना मैं समझता हूँ ज़रूरी होगा. रज़ा सौम्य आकर्षक और आत्मीय व्यक्तित्व के धनी हैं. उनके लहज़े में नफ़ासत है. कला के बारे में वह गंभीरता से बात करना पसंद करते हैं.. रज़ा शब्दों के चयन के बारे में ख़ासे सतर्क हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह प्रवाह में नहीं बोलते. दरअसल वह न केवल प्रवाह में ही बोलते हैं बल्कि अपनी बात को एक ख़ास शक्ल दे कर ही ख़त्म करना चाहते हैं तत्सम शब्दों से उन्हें एक लगाव है. भारतीय होने का दिखावा उन्हें पसंद नहीं, लेकिन भारतीय ही बने रहने का न केवल उनका आग्रह है, बल्कि इस मुद्दे को ले कर वह बेहद संवेदनशील हैं. इस बातचीत में और उसके बाहर भी उन्होंने एकाधिक बार कहा कि “एक भारतीय को ‘मिटा’ देना असंभव है”. (इट्स इंपासिबल टु अनडू एन इंडियन).
रज़ा दो चीज़ों पर एक साथ बात करना बिल्कुल पसंद नहीं करते. बात करते-करते वह सही अभिव्यक्ति के लिए परेशान होते भी दीखते हैं लेकिन जब यह लगे कि बातचीत का घेरा कुछ बोझिल हो रहा है तो वह एक छटपटाहट के साथ उसे स्वयं तोड़ भी देते हैं. वह विश्वास के साथ बोलते हैं. संवेगों को वह बहुत कर के दबाते हैं. लेकिन उनके व्यक्तित्व में कुछ ऐसा भी है कि बातचीत में भाव प्रवण (और कभी कभी तो भावुक) ढंग से कई संवेग छन कर आ ही जाते हैं. इंटरव्यू जैसी चीज़ में तो वह बराबर किसी क़दर गंभीर रहे, वैसे वह बातचीत बहुत रस ले कर, हँस-हँस कर भी करते हैं. वह बेहद चुस्त और स्फूर्तिवान भी हैं. रज़ा ने मेरे पहले सवाल के जवाब में कहा :
सैयद हैदर रज़ा: चित्र प्रदर्शित करना तो मैंने प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप (वह उस के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं, हुसैन, सूजा, आरा आदि के साथ) के दिनों से ही शुरू कर दिया था लेकिन सच पूछें तो मैंने अपने पहले चित्र पेरिस में बनाये.. 1950-52 में — ठीक ठीक जानते हुए कि मैं क्या कर रहा हूँ, या क्या करना चाह रहा हूँ. हाँ, शुरू में मेरे चित्रों में लैंडस्केप ही रहा करते थे. देखिए जब मैं मध्य प्रदेश का प्राकृतिक वातावरण छोड़ कर बंबई आया और दूसरे शहर भी देखे तो एक विरोधाभास के रूप में सड़कों, गलियों, घरों आदि ने आँखों पर ख़ास तरह का आघात किया. वैसे लैंडस्केप में भी मैं कोई यथातथ्य चित्रण तो करता नहीं था. जगहों और आकारों और उन में बसे रंगों की कोई बात ही ढूँढ़ता था और प्रकृति भी उन के बीच से बिल्कुल चली तो गयी नहीं थी.
प्रयाग शुक्ल: हाँ, जहाँ तक आप के पुराने चित्रों की प्रतिकृतियों से मुझे याद पड़ता है, उन में भी एक सूर्य-चंद्राकार कहीं टँगा रहता था.
सैयद हैदर रज़ा: नहीं, केवल उसी अर्थ में नहीं. इस अर्थ में भी कि मेरे मन में प्रकृति बराबर एक खास तरह से बसी रही है. मसलन उस का कहीं न दिखाई पड़ना भी तो इन चित्रों में काम करता रहा होगा.
प्रयाग शुक्ल: पेरिस के जिन चित्रों की बात आपने कही उन का माध्यम तो भिन्न था. अब तो आप केवल एक्रिलिक रंगों में काम करते हैं?
सैयद हैदर रज़ा: हाँ, उन का माध्यम भिन्न था. मैं तब टेंपेरा में, जलरंगों में काम किया करता था. मेरे उस काम को बहुत सफलता भी मिली. लेकिन एक समय आया जब मुझे लगा कि मैं कुछ और तलाश कर रहा हूँ और उन चित्रों के ढाँचे में मैं उसे नहीं रख पा रहा. मैं चित्रों की गठन पर बराबर से जोर दिया करता था अब यह गठन नये रूपों में प्रकट हुई. मेरे चित्रों से रूपाकार चले गये. मुझे कहीं यह भी लग रहा था कि जगहों के अनुभव और रूप, निश्चित आकारों में तो अधूरे रूप में ही प्रकट होते हैं. मसलन मैंने राजस्थान पर आधारित चित्र उन दिनों भी बनाये लेकिन जब बाद में बनाये या आज भी बनाता हूँ तो उनमें राजस्थान प्रत्यक्ष रूप में तो नहीं है, लेकिन वह है ज़रूर. रंगों में ही कहीं उसका मोर, उसके रंग, उसके दृश्य सब हैं. जब हम किसी जगह को देखते हैं या उसके बारे में सोचते हैं तो हम तक वही नहीं पहुँचता जो सामने दिखायी पड़ रहा है. न जाने कितनी चीज़ों से मिलकर बनता है एक अनुभव. एक चित्र.
प्रयाग शुक्ल: क्या आप रोज़ काम करते हैं? चित्र बनाने से पहले क्या उसका संभावित रूप आप के मन में रहता है?
सैयद हैदर रज़ा: चलिए पूरी बात बताता हूँ. मैं अपने स्टूडियो में 1 बजे पहुँचता हूँ. (बड़ी सुविधा है न यह — रज़ा ने जोड़ा) अगर किसी चित्र पर काम कर रहा होता हूँ तो पहले उसे देखता हूँ. किसी नये चित्र पर काम करना चाहता हूँ तो भी अपने को एकाग्र करता हूँ. नहीं, मैं कोई ख़ाका नहीं खींचता. पेंसिल से तो कभी नहीं. अक्सर पीले में कुछ बना डालता हूँ. ज़रूरी नहीं कि वह अंत तक रहे. मैं काम ज़मीन पर बैठ कर ही करता हूँ. वैसे ईजल भी है, उस पर भी चित्र को रखकर देखता हूँ.
प्रयाग शुक्ल: चित्रों के अलावा रेखांकन करते हैं आप इन दिनों?
सैयद हैदर रज़ा: करता हूँ, लेकिन बताता नहीं उन्हें.
प्रयाग शुक्ल: आज बहुत करके सभी जगह कला आंदोलनों का— मुहर छाप आंदोलनों का अभाव है. जो थे वे अपनी आयु पूरी कर चुके हैं. कलाकारों के प्रचारित ग्रुप भी कम हो रहे हैं. क्या इससे कलाकार एक जगह अकेला और व्यक्तिनिष्ठ हुआ है, पहचान का एक नया संकट है?
सैयद हैदर रज़ा: देखिये, एक जगह तो मैं आंदोलनों — ग्रुपों को ज़रूरी मानता हूँ. वास्तविक रूप में आंदोलन ख़त्म हुए हैं, यह सही है लेकिन कोशिश तो चलती रहती है. पश्चिम में ही हाइपर रियलिज़्म जैसे कुछ नाम सामने आये हैं यह आप जानते ही हैं. यह अलग बात है कि इनके अंतर्गत बहुत अच्छा काम सामने न आया हो. पश्चिम में काफ़ी काम चौंकाने वाला हो रहा है, ‘बॉडी आर्ट’ जैसे तमाशे हैं कई. लेकिन कला आंदोलनों, ग्रुपों की एक ज़रूरत कलाकार को रहती है—इससे लोगों को शुरू में यह आसानी होती है कि वे किसी या किन्हीं कलाकारों के काम को सारी भीड़ में कुछ अलग पहचान सकें. वैसे यह तो है ही कि अंत में हर कलाकार की अपनी ही पहचान होनी होगी.
प्रयाग शुक्ल: कला के अंतरराष्ट्रीय मुहावरे के बारे में आप क्या सोचते हैं? अमेरिकी कला समीक्षक रोज़ेनबर्ग ने एक जगह कहा था कि अंतरराष्ट्रीय मुहावरे के नाम पर एक ग्लोबल आर्ट पनपाया जा रहा है?
सैयद हैदर रज़ा: हाँ, यह एक अहम सवाल है. पर एक स्तर पर यह मुझे लाज़िमी लगता है. आवाजाही, लेनदेन बहुत बढ़ा है. प्रचार-प्रसार के साधन भी. आवागमन के भी. तो आज हम कई चीज़ों से बच नहीं सकते. कल प्रभावों की भी बात हो रही थी न? जितना ही ज़्यादा देखने को मिलता है उतनी ही नयी स्थितियाँ भी पैदा होती हैं. लेकिन मैं समझता हूँ कि यह किसी कलाकार पर निर्भर करता है कि वह क्या ग्रहण करता है, क्या छोड़ देता है. अपनी ज़मीन पक्की होनी चाहिए. अंतरराष्ट्रीय मुहावरे की चर्चा बहुत होती है लेकिन अगर ऐसा कोई मुहावरा है भी तो उससे कलाकार की अपने काम में जिम्मेदारी कहीं कम नहीं होती.
प्रयाग शुक्ल: आप पेरिस में 28 वर्षों से रह रहे हैं. भारत की समकालीन कला गतिविधियों की जानकारी किसी न किसी रूप में आप को रहती होगी. आज की भारतीय कला के बारे में आप क्या सोचते हैं?
सैयद हैदर रज़ा: पेरिस में मैं 28 वर्षों से रहता ज़रूर हूँ (रज़ा ने वहीं 1956 में फ्रांसीसी कलाकार जानीन मोंजिला से विवाह किया. 1975 में वह उन के साथ भारत आयी भी थीं) लेकिन भारत तो बीच बीच में आता ही रहा हूँ. (रज़ा 1959, 1962, 1975 में इससे पहले भारत आये हैं) यहाँ से जो भी प्रदर्शनियाँ जाती हैं ज़रूर ही देखता हूँ. हालाँकि बहुत कम जाती हैं और अधिक जानी चाहिए. मेंतो (फ्रांस) में कुछ अरसा पहले जो प्रदर्शनी गयी थी, वह एक अच्छी प्रदर्शनी थी.
मैं समझता हूँ कि आज हमारे यहाँ बहुत अच्छा काम हो रहा है. और आज कई चित्रकार ऐसे हैं, जिनके लिए कह सकते हैं कि वह सचमुच चित्रकार हैं. देखिये, चित्र बनाना एक और बात है लेकिन एक चित्रकार अपने लिए महसूस कर सके कि वह चित्रकार है— और दूसरे भी ऐसा ही महसूस कर सकें तो यह बहुत बड़ी बात है. असल बात है.
आज हमारे यहाँ जो काम हो रहा है उसकी अहमियत कहीं भी ज़ाहिर होगी. मुझे तैयब मेहता, भूपेन खख्खर का काम बहुत अच्छा लगता है. रामकुमार, स्वामीनाथन, कृष्ण खन्ना का… (रज़ा ने एक-एक शहर, मसलन कलकत्ता, दिल्ली, हैदराबाद के हिसाब से भी कई चित्रकारों के नाम गिनाये. यह सूची लंबी थी) कई युवा कलाकार भी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. और देखिये मध्य प्रदेश में ही… नागदेव और चौधरी हैं. नागदेव का नया काम मैंने आज ही देखा. जब मैं पिछली बार यहाँ आया था तब भी उनका काम अच्छा लगा था. आज का काम देख कर तो ‘यही’ कहने की इच्छा होती है…(रज़ा ने शाबासी के अंदाज़ में ख़ास तरह से चुटकी बजायी).
आज भारतीय चित्रकार एक दृष्टि के साथ काम कर रहे हैं—ख़ास विजन के साथ. मैं इस दृष्टि में कई चीज़ों को शामिल करता हूँ: चित्र की चित्रता पर ज़ोर, जो कुछ कहा-बनाया जा रहा है उस के ‘आधार’ पर ज़ोर . . . मुझे भूपेन खख्खर का काम इसलिए भी अच्छा लगा क्यों कि मुझे लगता है कि हमारे यहाँ अमूर्तन का एक ख़ास तरह का दौर रहा, उस सब के बीच हमें उन के यहाँ एक और ही बात मिलती है.
प्रयाग शुक्ल: अब आपके काम में एक नया मोड़ है?
सैयद हैदर रज़ा: कुछ लोग तंत्र वगैरह की बात ख़ास तरह से करते हैं क्योंकि उसका एक चलन है आज. मैं वैसी कोई बात नहीं करता तो इसीलिए कि बिना उस तरह के तंत्र संदर्भ में जाये करना चाहता हूँ. कैसे कहूँ, यह नहीं कि मैं बोल नहीं सकता. लेकिन इस विषय पर मैं पाँच साल बाद बोलूँगा कि ऐसा काम मैं क्यों करता हूँ. एक और बात है, मौन की भी एक बात होती है चित्रों में… रंग भी न बोलें, वह बात ही रहे कुछ ऐसा सोचता हूँ. बड़ी मुश्किल है. मैं कह न रहा था कि मैं न बोलूँ, चित्र बोलें.
प्रयाग शुक्ल: विदेशी कलाकारों में आप किन्हें पसंद करते रहे हैं? कोकोश्का का नाम कल आप ने लिया था.
सैयद हैदर रज़ा: बहुत से नाम रहे हैं. फ्रांस जा कर बहुत सा काम देखा, देखता रहा. अमेरिकी कलाकार रोथको भी मुझे बहुत पसंद रहे. ब्रितानी मूर्तिशिल्पी हेनरी मूर को भी न भूलूँगा. नाम तो बहुत से होंगे. यह भी रहता है कि जो कलाकार शुरू में पसंद आते हैं, वे बाद में नहीं भी रह जाते.
प्रयाग शुक्ल: कलाकार पर अन्य कलाकारों के प्रभाव को आप किस तरह देखते हैं?
सैयद हैदर रज़ा: इस पर कल भी बात हो रही थी सब के साथ. मैं समझता हूँ कि यह बता पाना आसान नहीं है. प्रभाव तो रहेंगे, लेकिन किस तरह के प्रभाव? हम किसी के काम को पसंद कर सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि उस का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव भी हम पर हो. कभी कभी किसी कलाकार की कोई चीज़ बहुत प्रेरित कर सकती है लेकिन उसका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं हो सकता. जैसे एक चित्र सबसे पहले एक चित्र हो इसकी कोशिश सेज़ाँ जैसे कलाकार में कितनी थी, चित्र के एक चित्र के रूप में गठन की. अब अगर यह बात मुझे अच्छी लगती है तो इस का मतलब यह नहीं कि सेज़ाँ की कला का प्रभाव भी मुझ पर पड़ा और रंगों रूपों तक के जो प्रभाव पड़ते हैं, उन से भी कोई कलाकार उबर भी सकता है बल्कि उसे उबरना ही चाहिए. अपनी ज़मीन पक्की हो इसकी कोशिश सब समय होनी चाहिए.
प्रयाग शुक्ल: क्या आप के काम में किन्हीं निश्चित स्मृतियों की भूमिका रहती है?
सैयद हैदर रज़ा: ज़रूर रहती होगी. लेकिन मैं इस तरह काम नहीं करता कि कोई याद आयी और मैंने उसे अपने काम में आगे बढ़ाया. देखिये स्मृतियाँ तो बहुत ज़रूरी होती हैं. स्मृतियों को नया करने ही तो मैं हर बार यहाँ आता हूँ, उन्हें तो मैं जीता हूँ, सब तरह की स्मृतियों को.
प्रयाग शुक्ल: कला के अलावा आपके और कौन-से प्रमुख लगाव हैं?
सैयद हैदर रज़ा: प्राचीन कलाकृतियों और कला वस्तुओं का संग्रह. साहित्य और संगीत. पेरिस के मेरे घर में आप को बहुत सी किताबें भी मिलेंगी. कबीर पढ़ता रहता हूँ. पेरिस में कोई भारतीय संगीतकार आये तो कोशिश रहती है कि वे मेरे घर आयें तो कितना अच्छा रहे. रामनारायण जी की सारंगी सुनने का सौभाग्य घर पर प्राप्त हुआ.
प्रयाग शुक्ल: पेरिस में जो अन्य भारतीय कलाकार हैं, उनका काम तो आप को देखने को मिलता रहता होगा?
सैयद हैदर रज़ा: हाँ, विश्वनाथन हैं, धवन, शक्ति बर्मन… धवन बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. विश्वनाधन को हाल में एक प्रतिष्ठा मूलक फ्रांसीसी पुरस्कार प्राप्त हुआ.
प्रयाग शुक्ल: फ्रांसीसी प्रवास में, कला वातावरण के बारे में आप को कौन-सी चीज़ सब से अधिक अच्छी लगती रही है?
सैयद हैदर रज़ा: स्वयं कला वातावरण. सैकड़ों कलाकार हैं वहाँ. कई बड़े कला संग्रहालय. गैलरियाँ. कला की मौजूदगी समाज में एक जीवित मौजूदगी है. पुस्तकालयों में दुनिया के किसी भी क्षेत्र की कला के बारे में पुस्तकें उपलब्ध हैं. वहाँ का कला वातावरण, कलाकार के लिए अपने आप में एक बड़ा स्टिमुलेशन (उत्तेजन) है. ज़रूरी नहीं कि इस का लाभ सब कलाकार उठाते हों. कई तो चकाचौंध से ‘भ्रमित’ भी हो जाते हैं. संघर्ष भी कम नहीं हैं. लेकिन कलाकार के रूप में परिचय ही जिस समाज में एक उम्दा चीज़ मानी जाती हो, वहाँ कलाकार को एक तरह का ‘भरोसा’ तो रहता ही है, अपने माध्यम को लेकर.
वैसे मैं समझता हूँ कि अपने देश में कई असुविधाओं के बीच भी काम करने के कुछ दूसरे बड़े लाभ हैं. आप अपने काम के प्रेरक तत्वों के बीच ही रहते हैं— इनके साथ आपका संबंध अधिक निकट का और आत्मीय होगा ही. जिन चीज़ों के लिए दूर बैठ कर प्रयत्न करना पड़ता है, वे अपने देश में वैसे ही उपलब्ध रहते हैं. आप जो कुछ ग्रहण कर और छोड़ रहे होते हैं, उस के बारे में ठीक ठीक जान रहे होते हैं.
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मुझे अपने जीवन से कोई शिकायत है. यों भी मैं अपने देश से अपने संबंध को बराबर महसूस करता हूँ. यह संबंध अटूट है.
(दिनमान: 24-30 दिसंबर 1978 से आभार सहित)
|
मनोज मोहन मनोज मोहन वरिष्ठ पत्रकार व लेखक. वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति के सहायक संपादक.इन दिनों सीएसडीएस की आर्काइव परियोजना के अंतर्गत आज़ादी से दशक भर पहले से लेकर सातवें-आठवें दशक की हिंदी पत्रिकाओं के आलेखों, कविताओं और कहानियों के दस्तावेज़ीकरण जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं. manojmohan2828@gmail.com |





V nice
यह सामग्री एक दुर्लभ दस्तावेज़ है। रामकुमार का 1956 का लेख और प्रयाग शुक्ल का 1978 का साक्षात्कार, दोनों मिलकर भारतीय आधुनिक कला के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हमारे सामने खोलते हैं। इसके लिए मनोज मोहन और संपादक दोनों बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने पत्रिकाओं के पुराने अंकों से इस सामग्री को फिर से पाठकों तक पहुँचाया।
लेकिन एक समालोचक का काम केवल प्रशंसा करना नहीं, बल्कि कुछ असुविधाजनक प्रश्न पूछना भी है।
सबसे पहला प्रश्न संपादकीय भूमिका से जुड़ा है।
लेख के आरंभ में रज़ा को आज के जंतर-मंतर के आंदोलन से जोड़ते हुए पूछा गया है कि यदि वे आज जीवित होते तो क्या यह आंदोलन उन्हें प्रेरित नहीं करता? यह प्रश्न आकर्षक अवश्य है, परंतु इसमें एक प्रकार का वैचारिक आरोपण भी दिखाई देता है। किसी दिवंगत कलाकार की ओर से वर्तमान राजनीतिक आंदोलन के पक्ष में कल्पनात्मक सहमति निर्मित करना आलोचनात्मक ईमानदारी नहीं कहा जा सकता। रज़ा के अपने वक्तव्य बताते हैं कि वे कला को किसी तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रिया से अधिक गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभव का क्षेत्र मानते थे। इसलिए बेहतर होता कि रज़ा को उनके अपने शब्दों में पढ़ा जाता, न कि आज की राजनीति के संदर्भ में पुनर्स्थापित किया जाता।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि रामकुमार का लेख एक कलाकार द्वारा दूसरे कलाकार का मूल्यांकन है। इसलिए उसमें आत्मीयता है, लेकिन वही आत्मीयता कहीं-कहीं आलोचनात्मक दूरी को कम कर देती है। रज़ा की यात्रा का वर्णन अत्यंत प्रभावशाली है, किंतु उनकी सीमाओं, असफलताओं या विवादों पर लगभग मौन है। परिणामतः लेख एक संतुलित समीक्षा कम और श्रद्धांजलि अधिक प्रतीत होता है।
प्रयाग शुक्ल का साक्षात्कार इस सामग्री का सबसे मूल्यवान भाग है। यहाँ रज़ा स्वयं बोलते हैं। वे प्रभाव, स्मृति, भारतीयता, अमूर्तन, कला आंदोलनों और कलाकार की स्वतंत्रता पर जिस संयम और स्पष्टता से विचार रखते हैं, वह आज भी प्रासंगिक है। विशेष रूप से उनका यह आग्रह कि “अपनी ज़मीन पक्की होनी चाहिए” वैश्वीकरण के इस दौर में भी उतना ही अर्थपूर्ण है जितना चार दशक पहले था।
रज़ा की एक और बात विशेष ध्यान खींचती है—“कला की मौजूदगी समाज में एक जीवित मौजूदगी है।” यह वाक्य केवल फ्रांस के कला वातावरण का वर्णन नहीं है; यह भारतीय समाज के लिए भी एक चुनौती है। प्रश्न यह है कि क्या भारत ने कला को आज भी सामाजिक आवश्यकता माना है, या उसे केवल बाज़ार, संग्रहकर्ताओं और प्रतिष्ठा का विषय बना दिया है?
फिर भी, लेख की एक सीमा यह है कि इसमें रज़ा की चित्रभाषा के विकास पर पर्याप्त आलोचनात्मक विश्लेषण नहीं मिलता। उनके ‘बिंदु’, भारतीय दार्शनिक परंपरा, तांत्रिक संकेतों, रंग-संरचना और अमूर्तन की सौंदर्य-दृष्टि पर विस्तार से चर्चा हो सकती थी। पाठक रज़ा के व्यक्तित्व को तो समझता है, पर उनके चित्रों की आंतरिक संरचना को नहीं।
एक और कमी यह है कि लेख रज़ा को भारतीय आधुनिक कला के व्यापक संदर्भ में पर्याप्त रूप से नहीं रखता। प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप, हुसैन, सूज़ा, तैयब मेहता, रामकुमार और भूपेन खख्खर के साथ उनके वैचारिक संबंधों का तुलनात्मक विवेचन इसे और समृद्ध बना सकता था।
इस सामग्री का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह रज़ा को किसी मिथक की तरह नहीं, बल्कि निरंतर सीखते, असफल होते, बदलते और खोज करते कलाकार के रूप में प्रस्तुत करती है। वे सफलता मिलने के बाद भी अपने स्थापित मुहावरे को छोड़ने का साहस रखते हैं। यही किसी बड़े कलाकार की पहचान है।
अंततः, यह लेख पढ़कर एक प्रश्न बार-बार मन में आता है—क्या आज का हिंदी समाज कला पर वैसी गंभीर बातचीत करने की क्षमता और धैर्य रखता है, जैसी रामकुमार और प्रयाग शुक्ल ने अपने समय में दिखाई थी? यदि नहीं, तो शायद रज़ा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि कला केवल चित्र नहीं बनाती; वह समाज की संवेदनशीलता भी गढ़ती है।
यह सामग्री इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह हमें केवल रज़ा का परिचय नहीं देती, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि किसी सभ्यता का भविष्य केवल उसकी राजनीति से नहीं, उसकी कला से भी तय होता है।