| सज्दा और समाधि सतरहवीं सदी के बनारस में एक सूफ़ी और साधू की दोस्ती पर आधारित कथा वसीम अहमद अलीमी अनुवाद : शहादत |
जौनपुर (1660 ई) से बनारस का रास्ता मुश्किलों भरा और थका देने वाला था, मौसम थोड़ा गर्म हो गया था, हवा में धूल और सूखे पत्तों की सरसराहट का शोर था, जो बैलगाड़ी के पहियों से आने वाली चिड़चिड़ाहट के साथ मिलकर ऐसी आवाज़ पैदा कर रहा था, जो यात्री को जागते रहने पर मजबूर कर रही थी.
जब मैं मंडवाडीह की सीमा में दाखिल हुआ तो सूरज ठीक सिर पर आ चुका था, लेकिन उसकी रोशनी तेज़ नहीं थी, बल्कि एक ज़र्द-मटियाले साये की तरह वृक्षों से छनकर ज़मीन पर गिर रही थी. दूर कहीं से ज़ोहर की अज़ान की आवाज़ आ रही थी. आवाज़ इतनी सुरीली और सधी हुई थी, जैसे कोई सच्चा आशिक रेगिस्तान की विशालता में अपनी खोई हुई प्रेमिका को पुकारता फिर रहा हो.
ख़ानक़ाह का फाटक खुला था. सहन में पुरानी लाल ईंटें धूप में तप रही थीं और उनके बीच में उगी हरी घास अपनी ताज़गी और चमक से आने वाले को जिंदादिली की खुशखबरी दे रही थी. मैंने देखा, सेहन के कोने में बने हुए हौज़ के पास मुर्शिद बैठे थे. उनका हाथ पानी में था, लेकिन वह वुज़ू नहीं कर रहे थे, बल्कि पानी को बहुत धीमे से, उंगिलयों के पोरों पर बहा रहे थे. लोटे से गिरती हुई धार इतनी पतली थी कि उसके गिरने की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती थी. मुझे यूं लगा, जैसे मुर्शिद ने वुज़ू की रफ़्तार धीमी कर दी हो. वह रुक गए, जैसे पानी के उस गिरने और मेरे पहुँचने के दरमियान जो फ़ासला था, उसे नाप रहे हों. वह जानते थे कि मैं जौनपुर के धुल उड़ाता हुआ उसी लम्हे उस चबूतरे पर क़दम रखूंगा. मैंने बड़ी अक़ीदत के साथ मुर्शिद की बारगाह में सलाम पेश किया. मुर्शिद ने बड़ी मुहब्बत के साथ सलाम का जवाब दिया, जिससे मेरी तबियत अंदर से खिल उठी और सफ़र की सारी थकान दूर हो गई.
“पानी अपनी रफ़्तार नहीं बदलता,” मुर्शिद ने मेरी तरफ़ देखे बग़ैर, उसी धीमेपन से कहा, जिससे पानी हौज में गिर रहा था.
“लेकिन जब कोई उसका इंतज़ार कर रहा हो, तो पानी की हर बूँद एक अज़ीम अमानत बन जाती है.”
मैंने कोई जवाब नहीं दिया. वहाँ बोलना अदब के ख़िलाफ़ था. मैंने वहीं ईंटों पर अपनी लाठी रखी, चादर उतारी और हौज़ के दूसरे किनारे पर बैठकर वुज़ू करने लगा. पानी आश्चर्यजनक रूप से ठंडा था, इतना ठंडा कि मेरी उंगलियों की पोरें सुन्न होने लगीं.
मुर्शिद पगड़ी और घेरदार आस्तीन वाला पैराहन पहने ज़िक्र करते हुए मस्जिद तशरीफ़ लाए. ज़ोहर की नमाज़ के दौरान मुर्शिद ने ‘अल्लाहु-अकबर’ कहा, तो मुझे लगा कि ख़ानक़ाह की दीवारें, वह बूढ़ा नीम का पेड़ और ख़ुद मेरे अंदर का शोर, सब एक गहरे, अंधेरे कुएं में गिर गए हैं. किरआत1 की आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे ‘सिफ़त’2 और ‘मौसूफ़’3 के दरमियान का फ़ासला अपने दिल की धड़कनों तक में महसूस हो रहा था. ख़ुदा शह-रग (गर्दन की मुख्य नस) से भी क़रीब हो चुका था.
सलाम फेरने के बाद मुर्शिद ने नमाज़ियों की तरफ़ रुख किया और हम लोगों ने उस नज़ारे की ख़ूबसूरती से ख़ुद को बेहद गौरान्वित महसूस किया.
मुर्शिद ने अपनी तस्बीह उठाई, कुछ देर मुसल्ले पर बैठे रहे, फिर मेरी तरफ़ मुड़े. उनकी आँखें आधी मुंदी हुई थीं, जैसे वह अंदर की किसी तस्वीर को धुंधलाने से बचाना चाह रहे हो.
“तुम यहाँ रुकने के लिए नहीं आए?” मुर्शिद ने कहा. उनका लहजा एक तयशुदा हक़ीक़त की तरह था.
“जी,” मैंने सिर झुका लिया, “मुझे घाट की तरफ़ जाना है. वह मेरा इंतज़ार कर रहा होगा.”
मुर्शिद ने तस्बीह के एक दाने को उंगलियों के बीच घुमाया, “हाँ, वो जोगी, जो अंधेरे में बैठकर उजाले को देखता है? जाओ, लेकिन याद रखना, शरीर के आसन और आत्मा के बीच उतनी ही दूरी होती है, जितनी वुज़ू के पानी और नीयत के बीच होती है. जब वह अपनी बंद आँखों से तुम्हें देखे तो अपनी खुली आँखों को शर्मिंदा मत होने देना.”
मैंने मुर्शिद के पैरों की धूल को चूमा और क़दम-बोसी करते हुए ख़ानक़ाह से बाहर निकल गया. अब सूरज ढलने लगा था और मंडवाडीहा की मिट्टी मिली सड़क मुझे बनारस के उन अंदरूनी रास्तों की तरफ़ ले जा रही थी, जहाँ धूप और अंधेरा एक-दूसरे के अंदर इस तरह गुत्थे हुए थे जैसे किसी पुराने मिट चुके नुस्ख़े के दीमकों द्वारा खाये जा चुके पीले हरूफ़ हों. मुझे मालूम था कि उस घाट के आख़िरी चबूतरे पर, बरगद की जड़ों के पास ‘छंदरूप’ अपने उसी आसन में बैठा होगा, जिसमें उसने बरसों पहले ख़ुद को साधना के मार्ग में अर्पित कर दिया था.
घाट की तरफ़ बढ़ते हुए मुझे जौनपुर के वे दिन याद आ रहे थे, जब ख़ानक़ाह के दालान में मुर्शिद के मुरीद अक्सर हैरत से एक-दूसरे को देखते और कहते थे, “वह कोई आम वैरागी नहीं है. जब वह संस्कृत के श्लोकों के बीच अचानक अरबी का कोई लफ़्ज़ बोलता है, तो लगता है जैसे कोई बहुत प्यारी ज़बान उसके तालू से उबल रही हो.” शेख के सबसे बेहतरीन मुरीद भी, जो ख़ुद महज़ अरबी के व्याकरण और वाक्यों की संरचना में ही उलझे रहते थे, छंदरूप की ज़बान से अरबी सुनकर गूंगे हो जाते. वे कहते थे कि छंदरूप ने ज़बान को किताबों से नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलने वाले ज्ञान से सीखा है.” जैसा कि साइब तबरेज़ी ने कहा था:
नफास दरजी ए मन नीस्त साइब अज गफलत
दिलम कुशादा ज़े गुफ्तार मी शवद चि कूनेम
(मेरी लंबी लंबी बातें लापरवाही की वजह से नहीं हैं, बात करने से मेरा दिल हल्का होता है, मैं क्या ही करुं?)
बिल्कुल यही हाल छंदरूप का था, भिन्न प्रकार के ज्ञान से उसका सीना इतना भर चुका था कि अगर वह बात नहीं करता तो ज्ञान के बोझ से उसका सीना फट जाता. जब मैं बरगद के नीचे पहुंचा, तो शाम की धुंद गंगा के पानी से उभर कर चबूतरे तक फैल चुकी थी. वह वहीं बैठा था. उसका शरीर एक ऐसे आसन पर जमा हुआ था कि दूर से देखने पर वह इंसान नहीं, बल्कि मिट्टी और जड़ों का ही एक उभार लगता था. ‘पदमासन’ की उस क़ैद में उसकी रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी थी, जैसे ज़मीन से निकलकर सीधे आसमान की तरफ़ जाने वाली कोई रोशन लक़ीर हो. उसके हाथ उसके घुटनों पर जमे हुए थे और उसका चेहरा, जिस पर वक्त ने बे-शुमार झुर्रियां जमा दी थीं, एकदम स्थिर था. मैंने क़दमों की चाप धीमी कर दी, लेकिन ख़ानक़ाह की ही दरो-दीवार की तरह ही, वहाँ की ख़ामोशी भी माहौल को रहस्यमयी बना रही थी.
“तुमने देर कर दी, दीवान!” छंदरूप ने अपनी बंद आँखें खोले बिना ही कहा. बिना देखे उसने मुझे मेरी आहट से पहचान लिया. उसकी आवाज़ बनारस के प्राचीन मंदिरों के अंदरुनी हिस्सें जैसी गहरी और गूंज भरी थी. “मैंने उभरते हुए सूरज के साथ जो साँस अंदर खींची थी, उसे रोककर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था, और अब सूरज गंगा में डूबने को है.”
मैं उसके सामने मिट्टी पर बैठ गया.
“मैं मंडवाडीहा में मुर्शिद के वुज़ू के धीमेपन के ख्यालों में खोया हुआ था.”
छंदरूप के होठों पर एक हल्की-सी मुस्कान उभरी. उसने अरबी का एक जुमला इतने स्पष्ट उच्चारण के साथ पढ़ा कि मुझे लगा कि मैं बनारस में नहीं, बल्कि बगदाद या दमिश्क के किसी मदरसे में बैठा हूँ:
“अल अन्फासो जवाहरुल मौजूदात”
(साँस ही सभी जीवों का सार है.)
फिर उसने संस्कृत में “सर्वं प्राण एजति” गुनगुनाया, जिसका अर्थ भी इसी अरबी पंक्ति में समा गया. यानी, दुनिया की हर चीज़ इसी एक साँस की वजह से चल रही है.
“दीवान!” छंदरूप ने कहा.
“तुम्हारे मुरीद हैरान होते हैं कि यह साधु अरबी कैसे बोलता है. उन्हें बताओ कि जब कोई इंसान ‘समाधि’ (ध्यान का वह आखिरी पड़ाव जहाँ इंसान दुनिया की सीमाओं को पार कर ईश्वर में मिल जाता है) के दरिया में उतर जाता है तो भाषाओं के फ़र्क वैसे ही गायब हो जाते हैं जैसे गंगा और जमुना एक हो जाती हैं. समाधि कोई ज़बान से बोला जाने वाला शब्द नहीं है, यह तो वह गूंज है जो वजूद के ख़ाली बर्तन में सुनाई देती है.”
उसने अपने बाएं पाँव को उठाकर जाँघ पर रखा और अपने शरीर को ‘सिद्धासन’ से बदलकर ‘हलक-ए-ज़िक्र’5 का एक नया रूप दे दिया.
“देखो,” उसने अपनी सांस नाभि के नीचे रोकते हुए कहा, “यह, जिसे हमारे यहाँ आसन कहते हैं, दरअसल आत्मा के वे ताले हैं, जिन्हें लगाकर अंदर के चोरों को रोका जाता है. जब सांस रुकती है तो ध्यान एक जगह हो तो ‘हूँ’ की गूंज के सिवा कुछ बाकी नहीं रहता.”
मैंने उसके चेहरे को ग़ौर से देखा. उन मुंदी हुई, गोस्त के लोथड़ों जैसी आँखों के नीचे एक बहुत बड़ा राज़ छुपा था, जो छंदरूप ने मुझे भी कभी नहीं बताया.
“छंदरूप,” मैंने धीरे से पूछा, “तुमने मुझे अपने अंधेपन का राज क्यों नहीं बताया?”
छंदरूप का पूरा शरीर एक पल के लिए कांप उठा, जैसे किसी ने शांत पानी में पत्थर फेंक दिया हो. उसने गहरी सांस ली, और ऐसा आसन बना लिया, जिसमें उसका सिर घुटनों के बीच चला गया, जैसे वह अपने अतीत की किसी गुफा में उतर रहा हो.
“यह जानकर क्या करेंगे, दीवान,” उसने बहुत धीमी, कांपती आवाज़ में कहा. वह कुछ देर ख़ामोश रहा. सन्नाटा और गहरा हो गया. फिर कुछ कहे बग़ैर मैंने देखा कि छंदरूप ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी कलाई को छुआ. उसके स्पर्श में एक अजीब-सी गर्माहट थी, जिसने मेरे अंदर के कई बंद किवाड़ खोल दिए.
बरगद की जड़ें अंधेरे में अजदहा की तरह फैली हुई महसूस हो रही थीं और गंगा का पानी तालाब के शांत पानी जैसा स्थिर हो गया था. छंदरूप का स्पर्श अब भी मेरी कलाई पर बरक़रार था, और मुझे यूं लग रहा था जैसे मेरी नब्ज़ की रफ़्तार उसकी साँसों के असर से धीमी हो चुकी हो.
“दीवान,” छंदरूप ने कहा, और अब मुझे उसकी आवाज़ पर भरोसा हो चुका था. “तुम, जिसे सूफीवाद कहते हो और हम जिसे ‘योग’ कहते हैं, इनके बीच की दूरी सिर्फ़ बाल बराबर है. तुम अपने अंदर की पवित्रता के लिए ‘तसव्वुफ़’ शब्द का प्रयोग करते हो, और हम ‘चित्त वृत्ति निरोध’ (अंदरुनी वैचारिक संघर्ष का खत्म होना) करते हैं. दोनों का मकसद एक ही है – उस आईने को साफ़ करना, जिसमें ‘ईश्वर’ का अक्स उतर सके.
उसने मेरी कलाई से अपनी पकड़ हटाई और अपने दोनों हाथ छाती के सामने ले आया. उसने एक गहरी और लंबी सांस खींची, जिसे हमारे यहाँ कुंभक कहते हैं. मैंने उसके चेहरे की तरफ़ देखा और धीमी आवाज़ में कहा, “छंदरूप! तुम आख़िर अपने अंधेपन का राज़ नहीं बताओगे ना? चलो रहने दो, लेकिन जिसे तुम ‘कुंभक’ कहते हो, यानी सांस को अंदर रोककर कायनात को अपने अंदर कैद कर लेना, हमारे यहाँ अहल-ए-दिल यानी दिल-वाले इसे ‘हब्स-ए-दम’5 कहते हैं. ये सांस का रुकना नहीं है, दरअसल, दिल की तख्ती पर ‘अल्लाह’ के नक्श को उभारने का वक्त होता है. जब सांस अंदर ठहरती है तो कायनात का सारा शोर बाहर रह जाता है और अंदर सिर्फ़ सार-तत्व रह जाता है. तुम्हारा ‘प्राणायाम’ और हमारा ‘पास-ए-इन्फ़ास’6 एक ही तो है, दोनों का काम उस हवा को गवाह बनाना है, जो हमारे वजूद को नूर-ए-इलाही यानी दिव्य प्रकाश से जोड़ती है.”
छंदरूप ने सिर हिलाया, उसके होठों पर एक गहरी मुस्कुराहट उभरी. “लेकिन, दीवान, रूह के लिए शरीर के आसन के बिना रहना कितना मुश्किल है! जब शरीर ‘पद्मासन’ में स्थिर हो जाता है तो रूह की तरंगें अपने आप खत्म हो जाती हैं.”
“आसन शरीर का पर्दा है, छंदरूप,” मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “हमारे यहाँ , शरीर की इस स्थिरता को ‘सजदा’ का रूप दिया गया है, जहाँ साधक अपना माथा ज़मीन पर रखता है और पूरी दुनिया को पीछे छोड़ देता है. लेकिन असली आसन तो रूह का है. जब रूह अपने केंद्र पर बैठ जाती है तो वह सूफीवाद में उस बिंदु पर पहुंच जाती है, जिसे हम ‘फनाय-ए-मुतलक’ कहते हैं और तुम जिसे ‘समाधि’ कहते हो, जहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’ के बीच का फर्क मिट जाता है और सिर्फ एक शून्य रह जाता है, हम इसे ‘ऐन-उल-जमअ’7 कहते हैं, जहाँ बंदा अपने होने को ‘हक’ के सागर में डुबो देता है, जहाँ सीमा है, न सरहद.”
छंदरूप ने एक लंबी सांस ली. “और इस्मे-ज़ात? आप इसे शब्दों में कैसे ढूंढते हैं?”
“इस्मे-ज़ात8 लफ़्ज़ नहीं है,” मैंने उसके अंधे चेहरे की चमक को देखते हुए कहा, “जब हम ‘ज़िक्र-ए-खफ़ी’ करते हैं तो ज़बान तालू से चिपक जाती है और दिल की धड़कन ‘अल्लाह हू’ की आवाज़ में खो जाती है. यह वही अनदेखी गूंज है, जो दुनिया बनने से पहले भी थी और बाद में भी रहेगी. हम दोनों अलग-अलग ज़बानों में इसी एक ख़ामोशी का तर्जुमा कर रहे हैं, छंदरूप!”
अचानक, माहौल में एक अजीब-सी सनसनाहट पैदा हुई. मंडवाडीह की ख़ानक़ाह की दीवारें और बनारस का वह ख़ुरदरा चबूतरा धुंद में गायब होने लगा. मेरे कानों में अज़ान की आवाज़ गूंजी, और जब आँखें खुलीं तो देखा कि मेरे सामने Yog and Tasawwuf: A Comparative Study नामक किताब पड़ी थी, जिसे मैं पिछली रात पढ़ते हुए सो गया था. कमाल है! मैं वाक़ई बनारस में हूँ, लेकिन यह 17वीं सदी का बनारस नहीं है, यह 21वीं सदी का हिंदुस्तान है. मैं यूनिवर्सिटी का एक स्कॉलर हूँ और ‘योग दिवस’ के मौके पर मुझे एक इंटर-सिविलाइज़ेशनल डायलॉग के लिए आमंत्रित किया गया है. रात में पढ़ाई के दौरान, जौनपुर के हज़रत दीवान जी और बनारस के योगी छंदरूप की दोस्ती की घटना मुझे बहुत ख़ास लगी थी. इन्हीं दोनों ईश्वर-भक्त संत/सूफ़ी की कहानी पर सोचते-सोचते मेरी आँख लग गई. पता नहीं क्यों ख़्वाब में हज़रत दीवान जी का किरदार मुझे प्रभावित कर गया और यह छोटी-सी घटना सपने के पर्दे पर ट्रेन की तरह दौड़ने लगी.
खैर! कुछ घंटों बाद नाश्ता करके मैं गेस्ट हाउस से निकला और घाट की तरफ़ बढ़ा, जहाँ दूसरे धर्मों के स्कॉलर ओपन डायलॉग के लिए मेरा इंतज़ार कर रहे थे. घाट का नज़ारा बहुत ही सुहाना और ख़ूबसूरत था, सुबह का सूरज गंगा के पानी पर अपनी रोशनी बिखेर रहा था, हल्की हवा में बहते पानी की हल्की लहरें और उस पर पड़ रही सूरज की किरणें, ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पानी पर सोने की परत चढ़ा दी हो. मेरे चारों ओर सैकड़ों लोग चटाइयों पर बैठे हुए ‘प्राणायाम’ कर रहे थे. उनकी सांस के खींचने और छोड़ने की आवाज़ से पूरा घाट गूंज रहा था.
मैं रेत पर बिछी चटाई पर बैठ गया. साथ लाए अखबार पर निगाह डाली. आज 21 जून था ‘इंटरनेशनल योगा डे’. अखबार में दिल्ली से लेकर इस्लामाबाद, लाहौर और न्यूयॉर्क तक की तस्वीरें थीं, जहाँ लाखों लोग हाथ फैलाए, एक ही ‘आसन’ में बैठे थे, उसी एक सांस की ताल को तलाश कर रहे थे, जिसका ज़िक्र सदियों पहले छंदरूप और हज़रत दीवान ने किया था.
मैंने आसमान की तरफ देखा. वक्त कितना बदल गया था, सरहदें खिंच गई थीं, लेकिन वह ‘सांसों का ताल’, वह ‘इस्म-ए-ज़ात’ की गूंज अभी भी सरहदों को लांघते हुए दुनिया को जोड़ रही थी. मैंने मुस्कुराकर अपनी आँखें मूंद लीं. अब मेरे सामने कोई फ़र्क नहीं था. अब वहाँ सिर्फ़ धीमा-सा बहता वुज़ू का पानी था, ‘हब्स-ए-दम’ की एक गहरी साँस थी और अंदर निहाँ -ख़ाने में चमकता हुआ ‘इस्म-ए-ज़ात’ का वह नूर, जो सदियों पहले दो बुज़ुर्गों ने एक-दूसरे के दिल में अमानत के तौर पर समा दिया था.
धुंद अब पूरी तरह से छंट चुकी थी और घाट पर इंटरनेशनल योगा डे का जोश अपनी पीक पर था. लाउडस्पीकर पर आसनों के इंस्ट्रक्शन दिए जा रहे थे और तस्वीरें खींची जा रही थीं. हम साथियों ने भी अपनी बातचीत शुरू कर दी. बीएचयू से आए हुए स्कॉलर ने कहा:
“साथियों! योग और सूफ़ीवाद भले ही दो अलग-अलग धर्मों के विचार हों, लेकिन दोनों का मकसद अपने अंदर के अहंकार को मिटाकर उस एक शक्ति का अनुभव करना है, जो पूरी दुनिया को चलाती है.”
मैंने उनकी बातों में इज़ाफ़ा करते हुए:
“जी हाँ! सूफ़ी लोग क़व्वाली और वज्द के ज़रिए इश्क ए हकीकी में खो जाते हैं. मोक्ष और फ़ना गंगा और यमुना की तरह हैं, जिनकी धाराएं आगे बढ़ती हैं और संगम पर मिल जाती हैं.”
हमारी बातचीत लगभग आध-पौन घंटे में अपने अंजाम को पहुंची. हमने एक-दूसरे का शुक्रिया अदा किया, घाट पर एक ग्रुप सेल्फी ली और सब अपनी-अपनी मंज़िल की तरफ़ रवाना हो गए. मैं उस आधुनिकता के शोर से दामन बचाता हुआ कच्ची मिट्टी के उस चबूतरे से उठा और घाट की पक्की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ने लगा.
अभी मैंने चंद ही सीढ़ियां तय की थीं कि मेरी नज़र घाट के एक कोने पर पड़ी, जहाँ आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने एक चमकता हुआ नया लोहे का बोर्ड लगा रखा था. उस बोर्ड पर इस प्राचीन जगह का इतिहास लिखा हुआ था. एक अजीब से जिज्ञासा के तहत मैं उस बोर्ड के पास चला गया और उस पर लिखी तहरीर पढ़ने लगा. वहाँ लिखा था:
“यह बनारस का वह ऐतिहासिक घाट है, जहाँ सत्रहवीं सदी के आखिर में जौनपुर के मशहूर सूफ़ी और बनारस के दृष्टिहीन योगी छंदरूप ने आत्मा और समाधि के गहरे रहस्यों पर ऐतिहासिक चर्चा की थी. यह घाट सदियों से दोनों की हमेशा रहने वाली दोस्ती और मनुष्य की अंदरूनी एकता का प्रतीक रहा है.”
यह पाठ पढ़ते हुए मेरे चेहरे पर एक अक़ीदत-भरी मुस्कान उभर आई. मैंने सोचा कि मैं कितना खुशकिस्मत हूँ कि अपनी अंदरुनी यात्रा में चेतना की धारा के ज़रिए, मैंने इन दो महान लोगों के बीच उस रहस्यमयी लेन-देन को बिल्कुल वैसे ही देखा और महसूस किया जैसा सदियों पहले हुआ था. किसी ने सही कहा है कि नबूवत (पैंगबर के आने का सिलसिला) का दरवाज़ा बंद हो गया है लेकिन ख़्वाबों का सिलसिला अभी भी जारी है. लेकिन एक सवाल था, जिसका जवाब अभी भी मिलना बाकी था, बनारस के इस महान साधु हज़रत छंदरूप के अंधे होने का वाकिया, क्योंकि इतिहास गवाह है कि वह पैदाइशी अंधे नहीं थे. इसी ख्याली दुनिया में टहलता हुआ मैं बाज़ार पहुंचा. क़रीब ही एक बेहद आधुनिक रंग व रौग़न से सजी चाय की दुकान नज़र आई. मैंने सोचा क्यों न बनारस की एक प्याली चाय से नई यादें बनाई जाएं. दुकान के अंदर बनारस के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों की तस्वीरें सजी हुई थीं. गंगा आरती, काशी विश्वनाथ मंदिर, रामनगर किला, सारनाथ, ढाई कंगूरे वाली मस्जिद, चेत सिंह महल और ख़ानक़ाह तैयबिया मोइनिया मंडवाडीह की फ्रेम की हुई तस्वीरें चाय की दुकान को एक ऐतिहासिक म्यूज़ियम का दर्जा दे रही थीं. मैंने दुकानदार से हज़रत छंदरूप के इतिहास के बारे में पूछा, उसने कहा:
“हाँ, नाम तो सुना है, पुराने समय में रहे एक बड़के पंड़ितजी, ओका अरबिया फ़ारसी ख़ूब आवत रहा, अच्छे-अच्छे मौलाना ओके आगे पानी पीवत रहे.”
“उनकी आँख कैसे ख़राब हुई इसके बारे में कुछ पता है आपको?” मैंने पूछा.
“उनकी अँखिया ख़राब रहन? मोका नहीं पता भैया!” उसने माफ़ी मांगी.
“हाँ, उनकी दोनों आँखें बेकार हो गई थीं,” मैंने आगे कहा.
“भैया! ये बतिया तोके ख़ानक़ाह में पता चल सकत है, जौनपुर के एक थो बड़के मौलाना, पंडितजी के जिगरी दोस्त रहन, हो सकत है ख़ानक़ाह में जरूर कोनो न कोनो सुराग मिलीहे तोका.”
“कौन-सी ख़ानक़ाह?”
“ख़ानक़ाह मंडवाडीह वाराणसी जक्शन से दक्षिण-पश्चिम में चार किलोमीटर दूर परत है यही पास में है, रिक्शा से जाये सकत हो.”
फिर क्या था, मैं हज़रत छंदरूप की आँखों का राज़ जानने के लिए मंडवाडीहा की तरफ़ निकल पड़ा.
मंडवाडीहा की तरफ़ जाते हुए बनारस की गलियों में शाम दस्तक दे रही थी. सड़क के दोनों किनारे पीपल और नीम के पेड़ ऐसे ख़ामोश खड़े थे, जैसे वे भी किसी पुराने राज़ के पहरेदार हों. रिक्शे वाला, जिसकी मूँछों पर पान की लाली जमी हुई थी, बीच-बीच में मेरी तरफ़ मुड़कर देखता और फिर ख़ामोशी से पैडल चलाता जाता. शायद वह मेरे चेहरे पर लिखी बैचेनी पढ़ चुका था.
“बाबू, मंडवाडिया का पहली बार जात है?” उसने अचानक पूछा.
“हाँ.”
“तो एक बात याद रखियो, ओन्हा जो कुछ सुनियो ओका तुरत सच मत मनिहो, बनारस में हर एक सच के पीछे एक ठो और सच होवत है.”
उसकी बात सुनकर मैं चौंक गया, लेकिन मेरा और बात करने का मन नहीं कर रहा था. उसके मुँह से चबाए हुए पान मसाले की फुहारें जी परगंदा कर रही थीं. इसलिए उसका ख़ामोश रहना ही बेहतर था. थोड़ी देर में हम ख़ानक़ाह के दरवाज़े पर पहुंच गए.
ख़ानक़ाह तैयबिया मोइनिया मंडवाडीहा शहर के शोर से अलग एक शांत टापू जैसी थी. बुलंद दरवाज़ा, जिस पर वक्त की धूल जमी थी, आहिस्ता से खुला और मैं अंदर दाख़िल हुआ. सहन में एक पुराना नीम का पेड़ खड़ा था और पुरानी शैली का एक पुराना वुज़ूख़ाना अपनी प्राचीन पवित्रता की कहानी कह रहा था, जो अब शायद इस्तेमाल में भी नहीं था, उसके चारों तरफ हरियाली उग आई थी. दूर किसी कमरे से कुरान पढ़ने की धीमी आवाज़ सुनाई दे रही थी.
मैंने एक बूढ़े नौकर से हज़रत छंदरूप का ज़िक्र किया.
उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई प्रतिबंधित नाम ले लिया हो.
“आपको यह नाम किसने बताया?”
“इतिहास ने,” मैंने जवाब दिया.
वह मुस्कुराया, मगर वह मुस्कुराहट ख़ुशी की नहीं थी, किसी पुरानी तकलीफ़ की थी.
“आइए.”
वह मुझे एक नीम-अंधेरे कमरे में ले गया, जो बहुत छोटा और पुराना था. ताक़ पर पुरानी किताबें थीं, जिनकी जिल्द नमी से फूल चुकी थी. कमरे के बीच में लकड़ी का एक संदूक रखा था. नौकर ने संदूक खोला और मेरे सामने एक बारीक़-सी पाण्डुलिपि रख दी.
“यह हज़रत दीवान जी के नाम छंदरूप जी का लिखा एक ऐतिहासिक ख़त है.”
मैंने कांपते हाथों से पन्ने पलटे, पाण्डुलिपि बहुत पुरानी और पढ़ने लायक नहीं थी, क्योंकि मैंने एम. ए. के एक सेमेस्टर में मैन्युस्क्रिप्ट की पढ़ाई की थी, इसलिए मुझे फ़ारसी मैन्युस्क्रिप्ट पढ़ने में ज़्यादा परेशानी नहीं हुई. उसमें लिखा था, जिसका अनुवाद इस तरह है:
“दीवान-ए-मिन, मेरे परम मित्र! भगवान तुम पर अपनी कृपा बनाए रखे!
तुमने ज़िंदगी भर मुझसे एक सवाल किया, और मैंने ज़िंदगी भर उस जवाब को ख़ामोशी के खंदक़ में फेंक दिया. मेरी आँखों के अँधेरे का कारण क्या था? अब जबकि उम्र का दरिया मुझे आखिरी घाट की तरफ़ लिए जा रहा है, सोचता हूँ तुम्हें वह राज़ बता दूं. तुम जानते हो, मेरा प्रतिदिन का काम था कि रोज़ाना पांच घरों से भिक्षा मांगकर खाता था. इसी मामूल के दौरान एक दिन बनारस की एक गली में, एक घर के दरावज़े पर दस्तक दी. दर खुला नहीं, मगर एक खिड़की खुली, और उस खिड़की से एक युवती का चेहरा झुका. वह नौजवान लड़की, जिसका हुस्न किसी अप्सरा से कम नहीं था, ऐसा रोशन रुख था कि जिसके ला-ज़वाल हुस्न ने एक लम्हे में मेरी बरसों की तपस्या को धूल में मिला दिया.
मैं आगे बढ़ आया, मगर वो सूरत मेरे दिल और आँख दोनों में उतर गई. उस रात बहुत ध्यान किया. लेकिन नज़रों के सामने से वो चेहरा नहीं हटा. मुझे महसूस हुआ कि ये आँखें, जो मुझे ईश्वर का प्रकाश दिखाने वाली थीं, अब मेरे रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट बन गई है. चुनांचे मैंने एक जलती हुई सलाई उठाई और अपनी दोनों आँखों की रोशनी ख़ुद बुझा दी. लोगों ने समझा, छंदरूप अंधा हो गया. मगर सच यह है, दीवान-ए-मन, कि मैं उसी दिन पहली बार देखने लगा था. ज़ाहिर कि ये दो आँखें बंद हुईं तो अंदर का एक चौखट खुल गया, और तब से मुझे हर चीज़ में सिर्फ़ ‘वो’ दिखाई देता है.
तुम्हारा अपना
छंदरूप
बनारस, 21 जून, 1670 ईस्वी
उस ख़त के नीचे हज़रत दीवान के दस्तख़त के साथ ये फ़ारसी शेर लिखा हुआ था:
मन खास्तम कि नामा नवेसम बसूए दोस्त
काग़ज़ ज़े गिरया तर शुद-ओ-कलकम ज़े आह सोख़्त
(मैंने चाहा कि दोस्त के नाम एक ख़त लिखूं लेकिन आँसुओं से काग़ज़ भीग गया और कलम की रोशनाई आह की वजह से ख़ुश्क़ हो गई.)
शब्दार्थ:-
1. किरआत– कुरान की तिलावत.
2. सिफ़त- किसी की प्रशंसा करना.
3. मौसूफ़- जिसकी प्रशंसा की जाए.
4. हल्का-ए-ज़िक्र– खुदा को याद करना.
5. हब्स-ए-दम- सांस रोकना.
6. पास-ए-इन्फ़ास– सांस रोकना.
7. ऐन-उल-जुमअ- ऐसी परिस्तिथि जिसमें बंदा और खुदा एक हो जाए.
8. इस्म-ए-ज़ात- खुदा का नाम.
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wasimahmadalimi@gmail.com |
शहादत युवा कथाकार और अनुवादक है. उनके अभी तक दो काहनी संग्रह ‘आधे सफ़र का हमसफ़र’ और ‘कर्फ़्यू की रात’ प्रकाशित हो चुके हैं. उर्दू शायर ज़हीर देहलवी की आत्मकथा ‘दास्तान-ए-1857’, मकरंद परांजपे की किताब ‘गांधी मृत्यु और पुनरुत्थान’ और उर्दू अफ़सानानिगार हिजाब इम्तियाज़ अली के कहानीं संग्रह ‘सनोबर के साये’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है. इन दिनों अपने पहले उपन्यास ‘मुहल्ले का आख़िरी हिंदू घर’ पर काम कर रहे हैं.786shahadatkhan@gmail.com |

वसीम अहमद अलीमी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया से गोल्ड मेडलिस्ट रिसर्चर हैं. वह उर्दू के प्रतिष्ठित अनुवादक एवं उभरते हुए अफसाना-निगार हैं और सुप्रीम कोर्ट व NCERT जैसी संस्थाओं के लिए अनुवाद-कार्य कर चुके हैं. उन्होंने ‘शब-ए-इंतज़ार गुजरी है’ किताब का अंग्रेजी से उर्दू में अनुवाद किया है. वर्तमान में वह केंद्रीय सचिवालय, बिहार सरकार में अनुवादक के पद पर कार्यरत हैं.
शहादत युवा कथाकार और अनुवादक है. उनके अभी तक दो काहनी संग्रह ‘आधे सफ़र का हमसफ़र’ और ‘कर्फ़्यू की रात’ प्रकाशित हो चुके हैं. उर्दू शायर ज़हीर देहलवी की आत्मकथा ‘दास्तान-ए-1857’, मकरंद परांजपे की किताब ‘गांधी मृत्यु और पुनरुत्थान’ और उर्दू अफ़सानानिगार हिजाब इम्तियाज़ अली के कहानीं संग्रह ‘सनोबर के साये’ का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है. इन दिनों अपने पहले उपन्यास ‘मुहल्ले का आख़िरी हिंदू घर’ पर काम कर रहे हैं.


बरगद की जड़ें अंधेरे में अजदहा की तरह फैली हुई महसूस हो रही थीं और गंगा का पानी तालाब के शांत पानी जैसा स्थिर हो गया था
………..वाह। बहुत बढ़िया कहानी है। छंदरूप को मार्मिकता और गहरी संवेदनशीलता से कथा कहकर में सामने लाने के लिए आभार।
शहादत का काम अच्छा है लेकिन कहानी में दम नहीं है। संस्कृतियों के रिश्ते 2 मिनट नूडल नहीं होते। मेहनत से समझने पड़ते हैं।
यादगार कहानी। इसे प्रस्तुत करने के लिए शहादत को बहुत-बहुत बधाई। इस कहानी की प्रस्तुति, भाषाई सौंदर्य, विषय की दुर्लभता और कलात्मकता दिनों तक मन के भीतर दस्तक देती रहेगी।
Dam nahi hai, ek Bina padha huwa tabsira lagta hai, kisi tassub ke shikar hein aap,
Mai kahta hun ek dafa aur padhein kahani ka dam kham sab maloom ho jaega
यह कहानी केवल एक कथा नहीं, बल्कि सूफ़ीवाद, योग, आध्यात्मिकता और मानवीय एकता के बीच एक अद्भुत सेतु का निर्माण करती है। लेखक ने जिस तरह 17वीं सदी के बनारस और जौनपुर को जीवंत किया है, वह पाठक को सीधे उस दौर में ले जाता है। पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो हम स्वयं मंडवाडीह की ख़ानक़ाह में बैठे हों, मुर्शिद के वुज़ू की बूंदों को गिरते देख रहे हों, या फिर गंगा किनारे बरगद के नीचे बैठे छंदरूप और हज़रत दीवान की गूढ़ बातचीत सुन रहे हों।
कहानी की सबसे बड़ी खूबी इसका वातावरण-चित्रण है। शब्दों के माध्यम से लेखक ने दृश्य, ध्वनि, गंध और भाव—चारों को इस तरह पिरोया है कि पाठक कहानी को केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उसे जीता है। विशेष रूप से सूफ़ी तसव्वुफ़ और योग दर्शन के बीच जो संवाद रचा गया है, वह अत्यंत परिपक्व, शोधपूर्ण और चिंतनशील है। लेखक ने यह दिखाने का सुंदर प्रयास किया है कि अलग-अलग परंपराओं की बाहरी अभिव्यक्तियाँ भले भिन्न हों, किंतु उनकी आध्यात्मिक मंज़िल एक ही है।
छंदरूप और हज़रत दीवान के संवाद कहानी की आत्मा हैं। उनमें ज्ञान है, अनुभूति है, रहस्य है और एक ऐसी आत्मीयता है जो आज के समय में बहुत दुर्लभ प्रतीत होती है। कहानी का स्वप्न और यथार्थ के बीच आना-जाना भी अत्यंत प्रभावशाली है, जो इसे केवल ऐतिहासिक आख्यान न बनाकर एक दार्शनिक यात्रा का रूप देता है।
भाषा की बात करें तो लेखक की उर्दू पर असाधारण पकड़ दिखाई देती है। अनेक स्थानों पर वाक्य इतने खूबसूरत और प्रभावशाली हैं कि पाठक उन्हें दोबारा पढ़ने को विवश हो जाता है। हालांकि, एक सामान्य हिंदी पाठक के लिए उर्दू के अपेक्षाकृत अधिक प्रयोग के कारण कुछ अंशों में प्रवाह थोड़ा कठिन हो सकता है। यदि कुछ शब्दों को अधिक सहज हिंदी में ढाला जाता, तो यह रचना और व्यापक पाठक-वर्ग तक उसी प्रभाव के साथ पहुँच सकती थी। लेकिन यह कोई कमी नहीं, बल्कि लेखक की भाषाई समृद्धि का परिणाम है।
कुल मिलाकर यह कहानी आध्यात्मिक संवाद, सांस्कृतिक समन्वय और मानवीय एकता का एक अत्यंत सुंदर दस्तावेज़ है। इसे पढ़कर महसूस होता है कि धर्म, भाषा और परंपराओं की सतही सीमाओं के पार एक ऐसा क्षेत्र भी है जहाँ केवल प्रेम, साधना और सत्य की खोज बची रह जाती है। लेखक इस उत्कृष्ट, चिंतनशील और भावनात्मक रचना के लिए हार्दिक बधाई के पात्र हैं। ऐसी कहानियाँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि लंबे समय तक पाठक के भीतर गूंजती रहती हैं।
वसीम अहमद आलिमी साहब की यह रचना पढ़कर मन सचमुच देर तक उसके प्रभाव से बाहर नहीं निकल पाता। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव, इतिहास, दर्शन और इंसानी एकता की एक खूबसूरत यात्रा है। लेखक ने 17वीं सदी के जौनपुर और बनारस के वातावरण को जिस जीवंतता और बारीकी से उकेरा है, वह पाठक को सीधे उस दौर में पहुँचा देता है।
हज़रत दीवान और योगी छंदरूप के बीच होने वाले संवाद इस कहानी की सबसे बड़ी ताक़त हैं। सूफ़ी तसव्वुफ़ और योग दर्शन के बीच जो सेतु वसीम अहमद आलिमी साहब ने बनाया है, वह उनके गहरे अध्ययन, चिंतन और आध्यात्मिक समझ का प्रमाण है। कहानी यह एहसास कराती है कि सत्य की खोज करने वालों की मंज़िल अलग-अलग रास्तों से होकर भी अंततः एक ही होती है।
अनुवादक शाहादत साहब ने भी इस महत्वपूर्ण रचना को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का सराहनीय प्रयास किया है। हालांकि, विनम्रता के साथ यह कहना चाहूँगा कि कई स्थानों पर उर्दू के अल्फ़ाज़ ज्यों-के-त्यों रहने के कारण वह सहज हिंदी वाला रस पूरी तरह नहीं आ पाता, और पढ़ते समय लगातार यह एहसास बना रहता है कि यह उर्दू से अनूदित रचना है। यदि हिंदी रूपांतरण को थोड़ा और स्वाभाविक बनाया जाता, तो यह उत्कृष्ट कहानी हिंदी पाठकों के दिलों तक और अधिक गहराई से पहुँचती।
इसके बावजूद, कहानी की साहित्यिक ऊँचाई, विचारों की गहराई और भावनात्मक प्रभाव इतने प्रबल हैं कि भाषा की यह छोटी-सी बात उसकी चमक को कम नहीं कर पाती। वसीम अहमद आलिमी साहब को ऐसी अद्भुत और विचारोत्तेजक रचना के लिए हार्दिक बधाई, तथा शाहादत साहब को इस मूल्यवान कृति को हिंदी जगत तक पहुँचाने के लिए साधुवाद। यह रचना पढ़ने के बाद समाप्त नहीं होती, बल्कि पाठक के भीतर लंबे समय तक एक गूँज की तरह बनी रहती है।
एतिहासिक पलों को इतनी सुंदरता से कहानी का रूप देना कमाल का काम है , वसीम साहब और शहादत को मुबारकबाद
अछि कहानी है पुरानी चीजों कि बात ही अलग होती है
यह कहानी पढ़ते हुए लगता है कि हम सचमुच बनारस की गलियों, घाटों और ख़ानक़ाहों में घूम रहे हैं। बनारस, ख़ानक़ाह, बैलगाड़ी, सज्दा और समाधि जैसे शब्द कहानी को एक अलग ही खूबसूरती देते हैं। इसमें शहर भी है, गाँव और देहात की सादगी भी है। पुरानी सभ्यता और आज का आधुनिक समाज एक साथ दिखाई देते हैं। लेखक ने अतीत और वर्तमान को बहुत सहज ढंग से जोड़ा है। कहानी यह बताती है कि रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसान की सच्ची तलाश एक ही होती है। यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है, जो इसे पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक याद रखती है।
Wasim Alimi ne Chhandroop aur Diwan ji ke kirdar ko gajab tarz me pesh Kia Hai, khanqah ka zikr, farsi sher ka istemal sab khoob hai.
Samalochan ko ek achhi kahani pesh krne par Yoga Day ki Mubarakbad!
MashaAllah,kahani bahut achi hai
इस कहानी में सुधी लेखक वसीम अहमद अलीमी ने अध्यात्म की दो धाराओं के मौलिक अंतर तथा उद्देश्य की एकता को अत्यंत सरल और सुगम शैली में सामान्य पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। मैंने इस कहानी का हिंदी अनुवाद पढ़ा है; अनूदित पाठ में प्रवाह और संप्रषण की स्पष्टता प्रशंसनीय है। इस कहानी के हिंदी अनुवादक शहादत तथा लेखक वसीम अहमद अलीमी को इतनी अच्छी रचना के लिए अनेक शुभकामनाएंँ।
वसीम अहमद अलीमी
की कहानी “ *सज्दा और समाधि”* एक सुंदर और विचारोत्तेजक रचना है। यह कहानी एक सूफ़ी संत और एक योगी की मित्रता के माध्यम से बताती है कि अलग-अलग धर्मों और परंपराओं के रास्ते भले अलग हों, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य ईश्वर की खोज और आत्मिक शांति प्राप्त करना है।
लेखक ने सूफ़ीवाद और योग के बीच की समानताओं को बहुत सहज और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। विशेष रूप से छंदरूप योगी का चरित्र पाठक को गहराई से प्रभावित करता है। यह कहानी प्रेम, सहिष्णुता, आध्यात्मिकता और मानवीय एकता का सुंदर संदेश देती है।
इस कहानी में सुधी लेखक वसीम अहमद अलीमी ने अध्यात्म की दो धाराओं के मौलिक अंतर तथा उद्देश्य की एकता को अत्यंत सरल और सुगम शैली में सामान्य पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। मैंने इस कहानी का हिंदी अनुवाद पढ़ा है; अनूदित पाठ में प्रवाह और संप्रेषण की स्पष्टता प्रशंसनीय है। इस कहानी के हिंदी अनुवादक शहादत तथा लेखक वसीम अहमद अलीमी को इतनी अच्छी रचना के लिए अनेक शुभकामनाएंँ।
योग का दो संस्कृति से प्राचीन जुड़ाव, सिर्फ ईश्वर दिखे हर वक्त आँखों में और कोई मूरत सूरत नज़र न आए आँखों में इतनी शिद्दत से उसे पाने की ललक कि अपनी आंखों को ही मिटा दिया, कमाल की कहानी . बधाई लेखक अनुवादक दाेनों को
पहला पैराग्राफ पढ़ा। जौनपुर (1660 ई) से बनारस का रास्ता मुश्किलों भरा और थका देने वाला था,( जौनपुर से बनारस का रास्ता की जगह जौनपुर से बनारस जाने वाला रास्ता होता तो बेहतर था) मौसम थोड़ा गर्म हो गया था,( मौसम से मुराद एक इलाके में, एक टाइम पीरियड में गर्मी या सर्दी वगैरा की हालत होती है। यानी मौसम सर्द हो सकता है, गर्म हो सकता है वगैरा। लेकिन अचानक गर्म कैसे हो गया, यहां लिखा जा सकता फिजा में गर्मी थोड़ी बढ़ गई थी) ।
इतना पढ़ने के बाद मज़ीद अपने ज़हन से मशक्कत की क़ुव्वत को ज़ाइल होता महसूस किया।
I escaped all the snakes but a butterfly killed me.
That butterfly really caught me off guard.
As for my comment, I was merely expressing what I felt.
इस कहानी में वसीम अहमद अलीमी ने इतिहास की झरोखों से गंगा-जमुनी तहज़ीब, हिंदू-मुस्लिम एकता और एक साधु की वास्तविक तपस्या को आज के दौर में प्रस्तुत करने की बेहतरीन कोशिश की है। इसमें भाषा और भाषाई एकता की भी सुंदर झलक दिखाई देती है। एक ही मंज़िल के दो मुसाफ़िरों के बीच त्याग के रास्ते प्रेम की कोंपलों को फूटते देखना सचमुच कितना मनोहर दृश्य प्रतीत होता है।