| सपना भट्ट की कुछ कविताएँ |
1.
चैत में कविता
दुर्भाग्य भी झर जाता है जिस ऋतु में
जहाँ यातना में भी सुख होता है देह को असीम
चैत उसी गाढ़ी अतृप्त लालसा की ऋतु है
इसी बौराई ऋतु में
मृत्यु के कंधों से ढहता है पीड़ा का जीर्ण स्थापत्य
प्राण घट धरती से लग बह जाता है उपत्यकाओं में
इसी ऋतु में छल करता है चन्द्रमा
एकाएक टूटती है मूर्छा, चेतते हैं प्राण
दृष्टि शिल्प का अबूझ कौतुक है अचेतन पर
वर्षा नहीं गिरती, स्वेद झिरता है देह पर कल्पनाओं का
आँखें अंधी भी हो जाएँ
वही दिखता है स्वप्न के बाहर भीतर
सेज पर नहीं
आत्मा में झरते हैं कामना के प्रणय पुष्प
निस्तेज और म्लान मेरे मुख पर
क्षण भर को ठिठकता है प्रकाश
सहसा तीव्र हो उठती है जीते रहने की अकुंठ इच्छा
इतना प्रगाढ़ झरता है धरा के कंपित वक्ष पर मेघ
कि वय का भंगुर नित्य बह जाता है अंजुरियों से
किसी उनींदी साँझ
पृथ्वी पर घटता है विस्मय धीरे से
तब निमिष भर को चित्त से छंटता है कुहासा
तब उतरती है चैत में कविता.
2.
जीवट
बाहर धधकता ग्रीष्म है सर पर
भीतर ज्वर है देह तोड़ता हुआ
गात का आंतरिक भस्म करता हुआ
वहाँ, जहाँ धूप का
एक उजला तिकोना नाचता है
वहीं छाँव का एक साँवला पँख है
मेरी मंथर श्वास पर टिका हुआ
मुग्ध ईश्वर के पास
मेरी देह ढकने को दो फूल तो हैं कपास के
लाज ढकने को अंधेरा नहीं है
सूझता नहीं
मलिन शैया पर पुरखों की छाया है
या दयालु मृत्यु है सिरहाने!
कौन जाने
लावण्य झरेगा पहले कि कामना!
हल्दी सी देह को ढक लेगी आयु,
चंद्रिका सा रूप जीर्ण होगा तो अग्नि वरेगी उसे
शुभचिंतक लेंगे क्षेम पहले पहल
फिर खो रहेंगे
अपनी अपनी दुनियाओं चिंताओं लालसाओ में
आधी रात
बुरुंश फूलेगा मेरी खिड़की पर,
वर्षा होगी
मैं भीजती रहूँगी अपने ही निर्जन में
थकी और परास्त
स्मृतिकातरता के इस
धूसर सेपिया से अंतर्जगत में
अपना लाचार अहं लेकर कहाँ जाऊंगी?
छिप रहूँगी जितनी ओट देगी पृथ्वी
जीऊंगी
जितना जीवट देगी कविता
3.
आश्वस्ति
मुझे संशय से देखता है नगर
मेरी निष्ठा को तौलते हैं नागरिक
प्रीत की क्या कहूँ!
कविता में ढूंढ लेते हैं अपयश के भेद
पंक्तियों से चीन्ह लेते हैं पीड़ाओं के वृतांत
कविताएँ क्या थीं, प्रार्थनाएँ थीं
स्मृतियाँ सहेज कर पठाई थी जिनमें
अभागों को उन्हीं पुड़ियों में
दुःख का अफीम बाँध कर देता था बैरी विधाता
इच्छाएँ क्या थीं, मनौतियाँ थीं
कसार देवी के डोले से आधी बंधी आधी छूटती हुई
मुझे इन दिनों रात भर नींद नहीं आती
स्नायुपथों में डोलता उन्माद
करुणा में बदल कर सिसकने लगता है तीसरे प्रहर
मुझे स्मृतिलोप दो ईश्वर!
धमनियों में हँसती हुई धूप को
विस्मरण की प्रतीकात्मकता दो
यह आश्वस्ति दो
कि जैसे आते रहे शोक के बाद उत्सव
पुनर्नवा होकर आएगी
मृत्यु से पहले उसे देखने की ऋतु
कि जैसे दंभ और ईर्ष्या का
धूम्र छंट जाता है श्मशान में
नेपथ्य में छूट जाएगी
मिथ्या कीर्ति की राख सकल
धीमे से झर जाएगा इस क्रूर कठिन जीवन का समग्र
भले ही धुरीविहीन इन ब्रह्म वर्षों में
सहस्र बार नष्ट हुई हो मेरी लाग
मुझे दिलासा दो
कि एक दिवस अपने घाव गिनने बैठूंगी
और उसकी स्मृति नहीं घेरेगी
4.
पानी के सिवा
माँ गुड़ और रोटी बाँध कर देते हुए कहती
पीर सय्यदों की कब्र से पाँव बचा कर चलना
कहा करती कि परार साल
नदी में डूब कर मरा एक गड़रिया
मुझ पर रीझ गया था; तब से मैं ऐसी हूँ ‘क्याप’
पानी से बनी होगी मेरी पहली कोशिका
मन भी उन दिनों पानी ही था
स्थिर और सहिष्णु
पानी के सिवा सब सन्दिग्ध था जीवन में
हृदय की सदाबहार वीरानी
पानी के साहचर्य से वसंत में बदल जाती थी
उन दिनों
कोई प्रेमी होता तो
बस पानी से ईर्ष्या करता
पानी इकलौता दर्शक था
जिससे मेरी नग्न देह लजाती न थी
पानी के सिवा
मुझे कहाँ कुछ सूझता था!
गोधूलि में
मवेशियों की रम्भाहट से
ताल का पानी चौकता था
बहुत दूर,
धार पार से माँ पुकारती थी
“ओ लाटी रे!
रुमुक पड़ीगे घौर आ”
पानी के तल से
उसकी जुड़वा आवाज़ आती थी
5.
भरोसा
घाट पर विवस्त्र
चंपा कनेर का दोना लिए
किसे मांगती हो वैखरी की प्राचीन विधाओं में?
तुम्हारी ही
व्यथित प्रज्ञा के अतिरिक्त
और कौन सुनता है तुम्हारी प्रार्थनाओं के पुनर्पाठ!
अतिरेकी आस्तिकता की तरह
प्यार की निर्विकल्प आस्था का भी
कहीं कोई उपचार नहीं!
देखती तो हो,
कुम्भ में नित छूट रहे हैं
मित्र, भाई बांधव और प्रेमी
तब दक्षिण दिशा में
किसके नैवेद्य का आग्रह रखती हो छिपाकर
कि सहसा उजागर हो जाता है मृत्यु बोध;
जीते रहने की शाश्वत कामना क्षीण होती जाती है!
इच्छाएँ एक कल्प से
दूसरे कल्प की यात्रा करके
थकी हुई मक्खी की तरह
आत्मा के बहते हुए घाव पर बैठ जाती हैं
कथाओं उपकथाओं में
अपने प्रिय खाद्य के लिए बरजते हैं पुरखे
बीड़ी सुपारी और कच्ची शराब की गन्ध
देर तक साथ रहती है
जानती हो न,
सुख बीत जाता है
सुख वाली स्मृतियों की हिंसा नहीं बीतती
देह भी सदा नहीं रहती,
अंतिम जीवाश्म के नष्ट होने से पहले
माटी में मिल रहते हैं
रक्त अस्थि मज्जा और प्राण
एक अश्रु भी भूमि पर गिरता है
तो आश्वस्ति उमगती है
कि इस पृथ्वी पर
हमेशा भरोसा किया जा सकता है
ओक भर जल के लिए
हिय भर करुणा के लिए

6.
विसर्जन
सघन व्याकुलता है और दुर्दम्य याद
इन दोनों के बीच कैथार्सिस का जल है
अनुभूति के तल को बांधता हुआ
तुम जहाँ से गई थीं कुछ दिनों के वास्ते
वहाँ वचन टूटने और तोड़ने के खंडित संस्करण नहीं हैं
निरी भावुकता है विकृति की सीमा से लगी हुई
इस उफनते हुए स्मरण में
एक झूठा सच्चा चेतना जगत है
दैनंदिन के आत्म प्रतीकों
और पगलाए अंतर्बोधों से मिलता जुलता
तुम्हारी कविता में जो अनमनापन है
वह दरअसल तुम्हारी ही परास्त कामना का अभ्यंतर है
वहीं जाकर छिपती हो न कवि?
तुम्हारी रूआँसी कविताओं के बीहड़ से उठती ध्वनि
अन्तस के हर रंध्र से टकराती हुई
ग्रीष्म में झुलसे तुम्हारे चेहरे को नहीं
बल्कि लाल छींट वाली फ्रॉक पहने
एक लाटी को पुकारती है
चीड़ बांज और देवदार के आस्तरण पर
जिस अस्वभाविक नंगी कौंध का विस्तार है
तुम्हारे अभ्यारण में वह दैन्यता क्यों छटपटाती है?
क्यों मंदिरों घरों रास्तों
और भूले हुए नामों के ब्यौरों से अटी है तुम्हारी कविता!
व्यर्थ हुड़के, मसकबीन
और डौर थाली के संगीत का कंपन भरा है वहाँ
यह जो पानी के
असम्भव प्रतीकों से भीगी हुई है तुम्हारी कविता
क्या तुम्हारे मन में कोई प्यास है
या नित मरती हुई इस पृथ्वी की
हर नदी से रूठी हुई हो तुम!
स्मृति ध्वंस का अर्थकोष लिए
क्यों बचती फिरती हो अपनी ही परछाई से!
हिमाल तुम्हे पुकारता रहेगा एक ही लय में
उससे भेंट किए बगैर ही
तुम हो जाओगी विसर्जित किसी नदी में
जबकि जानती थी तुम
नदियां हमारी माएँ हैं
तुम विसर्जित कर सकती थी अपनी पीड़ाएँ
स्पीति सतलुज या भागीरथी में
बहा सकती थीं
यह विवश संसक्ति और पहाड़ीपन
अपने ही प्राणों के महानद में
7.
कविता का ताप
आश्चर्य की वर्तनी में छुओ मुझे
देह से देह विलग हो
तो भी कामना जुड़ी रहे
ज्यों कोई सलोना सयुंक्ताक्षर
हर नवेली कोशिका को
फिर फिर नष्ट होने का अवकाश दो
प्रत्याशा के पूर्वाभ्यास में अभी
अभी इस निशा की निर्विकल्प द्युति में
कांपने दो श्वास का मालकौंस अनवरत
अभी हीरे से विषाक्त
और तीखे हथियार में बदलने दो अपनी चुप्पी
अभी याद को यातना में ढलने दो
अभी मैं नहीं जानती
प्रतीक्षा के अतिरिक्त कोई शास्त्र
अभी मैं अनुपस्थित हूँ
अपनी ही एन्द्रिक एषणाओं के खंडित स्वप्नफल में
अभी व्याकुलता की तटस्थ लाज गलने दो
आज की रैन
पश्चाताप के लिए भी
एक कातर तर्क हो
छोड़ कर
जाने के लिए भी गढ़ो
पुनरुक्ति दोष सा एक लघु शिल्प आज की रैन
बस आज भर के लिए
कविता को इस ताप से मुक्त करो
मुझे अपने आदिम अंधेरे में उतरने दो.
| सपना भट्ट 1980 उत्तरकाशी, उत्तराखंड‘चुप्पियों में आलाप’ और ‘भाषा में नहीं’ शीर्षक से दो कविता-संग्रह प्रकाशित शीला सिद्धांतकर स्मृति पुरस्कार से सम्मानितcbhatt7@gmail.com |




गहन अन्तर्बोध की विलक्षण कविताएँ। भाषा की इतनी संशिल्ष्टता इधर की कविताओं में कम ही दिखाई देती है।
हर कविता दिल को छू लेने वाली कविताएं हैं बरसों बाद वर्तमान कवि की पंक्तियों ने सभी कल के कवियों की याद तरोताजा कर दी।
बस आज भर के लिए
कविता को इस ताप से मुक्त करो
मुझे अपने आदिम अंधेरे में उतरने दो
उपयुक्त पंक्तियों ने अंतरात्मा तक को छू लिया…..
छह साल पहले समलोचन पर ही सपना भट्ट की कुछ कविताएँ एक साथ पढ़ने का पहला अवसर मिला था। तब वे कमोबेश नवागंतुक थी। ऐसा वे स्वयं मानती थीं। बहरहाल, इसमें संदेह नहीं कि इन वर्षों में अपनी भिन्न भावभूमि, तरल और पारदर्शी भाषिक सौंदर्य और चकित करने वाले काव्यशिल्प के कारण उन्होंने समकालीन कविता में अपनी एक अलग ज़मीन बनाई है। ये कविताएँ विषय की विविधताओं के कारण भी विशिष्ट हैं। स्त्री-मन का अनकहा इनमें जैसे व्यक्त हुआ है वह विलक्षण हैं। इनमें अपनी बात कहने की जो अनायास आकुलता है, वह विरल है और अन्यत्र कहीं नहीं दिखता। अनेक पंक्तियां हैं जो अलग-अलग कारणों से पाठकों को देर तक अटकाए रखती हैं। उन्हें बार-बार पढ़ने की इच्छा होती है, लेकिन बार-बार पढ़ने के बाद मन का मौन और निःशब्दता और घनीभूत होती जाती है। बिंबों का एक भरापूरा लोक इन कविताओं में बसता है, और पाठकों को अवाक करता रहता है। ये प्रेम की नहीं बल्कि स्त्रीत्व की कविताएँ हैं। टीसती हैं देर तक। कवि को बधाई!
देह से देह विलग हो
तो भी कामना जुड़ी रहे
ज्यों कोई सलोना सयुंक्ताक्षर
💐💐
सपना भट्ट हिन्दी कविता में जो ज़लज़ला चुपके से लेकर आई है, उसकी तुलना किसी अन्य ज़लज़ले से नहीं की जा सकती।
क्या सपना के पाठक इस बाबत कभी सोचते हैं कि सपना हठयोग कर रही है, वर्षों से…और तब भी उसकी वाणी में विस्मयकारी ऐन्द्रिकता हर श्वास में, हर स्वर और व्यंजन में अक्षुण्ण बनी रहती है।
हठयोग और अलंकरण; हठयोग और घनघोर ऐन्द्रिकता; हठयोग और वह प्यास जिसे कवि हिये से लगाये बैठी है, जिसे वह बुझाना और मिटाना चाहती भी नहीं।
देह के मिटने से भी जो नहीं मिटता वही विशुद्ध सयुंक्ताक्षर है सपना का सपना: सपना की कविता
जितना नेह उमड़ता है इस सयुंक्ताक्षर के लिए, उतना ही विशाल हृदय दरकार है ऐसी कविता के लिए।
कभी कभी सपना की हर कविता में एकाधिक कविताओं की प्रतीति होती है। पीछे लौट कर *पिछली कविता* कभी कभी फिर फिर बाँचनी ज़रूरी हो उठती है।
सपना को जी भर कर दुआएँ। वह कमबख्त न होती तो यह ऐश्वर्य न होता! यह सुख न होता जो कवि के सुख से उपजता है। जिसे सपना दुख से अलगा तक नहीं पाती।
निसंदेह सपना भट्ट इस समय सर्वाधिक ध्यान खींचने वाली कवि हैं, क्योंकि वह कविता संरचना के क्रम में भाषा का ककहरा नए सिरे से गढ़ रही हैं।
नामवर जी के दशकों पुराने निबंध “नई कविता की भाषा” का खयाल आ रहा है — ज्यादा जन तक अपनी भाषा पहुंचाने की कोशिश में अनेक कवि एकदम ‘साधारण-सी’ भाषा में गिरे जा रहे हैं और दूसरी ओर ‘साधारणीकरण’ की सच्ची लगन वाले ईमानदार कवियों की भाषा क्रमशः असाधारणता में ……।
सपना की कविताओं में दृश्य तो होता है पर कोई कहानी नहीं होती, ऐसा इसलिए कि जहां पर जो शब्द उन्हें चाहिए होता है, वह उसके पर्याय के लगभग अंतिम शब्द का चयन करती हैं। इससे कविता के कहन का मंतव्य कुछ संकीर्ण हो रहता है और कविता की सुकोमलता का परिणामी तौर पर जरा क्षय भी। इसीलिए इनकी कविताओं के पाठ का आस्वाद एक अचंभे, कोई अनुत्तरित सवाल या एक कौंध के साथ ख़त्म हो सकता है, जबकि उनकी कविताओं के सरल उन्वाँ हमें बुलाते हैं अपने विशिष्ट काव्य संसार में।
“समालोचन” ही में अक्टूबर ’21 में सपना भट्ट की जो कविताएं आईं, उनमें से ये पंक्तियां कितनी सिंपल हैं :
सुन लाटे !
और तो कुछ भी मेरे वश में नहीं
मगर वादा रहा
मैं तुझ पर दुनिया की सबसे सुंदर
प्रेम कविताएँ लिखूँगी.
सपना भट्ट जी की अद्भुत कविताएं पहली बार पढ़ने का अवसर मिला। ये कविताएं स्वबोध रचती हुई प्रतीत हुई मुझे। अभिनंदन कवि सपना भट्ट।
सपना भट्ट की कविताएँ हिंदी कविता और आलोचना के राजपथ को छोड़कर,अपनी अनुभूति की सूनी पगडंडी को चुनने से संभव हुई है।यह सूनी पगडंडी स्मृति और आकांक्षा के एकांत से गुजरती है। आलोचना की मान्य और परिचित परिभाषाओं से परहेज़ करती हुई सपना जिन भाषिक उपादानों से अपनी कविता का संसार रचती हैं,वह जीवन के लिए तो अपरिचित नहीं,सार्थकता और प्रासंगिकता के पुरोहिती प्रतिमानों के लिए भले ही अजनबी हो।हर कवि का अपना आसमान और अपनी धरती होती है। सपना की कविताओं का आकाश अस्तित्व की व्यथा है और स्मृति उसकी धरती।व्यथा और स्मृति की निजता को उनकी कविताएँ एक सार्वभौमिक अंतरिक्ष में मुक्त करती हैं।उनकी कविताओं में ऋतुएँ पांचांग की गणनाओं से बाहर निकल कर नया रूप धरती हैं। यहाँ चैत की ऋतु में चंद्रमा छल करता है, मूर्च्छा टूटती है और चेतना में प्राण लौटते हैं। ईश्वर की बनाई हुई दुनिया की विडंबनाएँ
कविता से अपनी उदासी साझा करती हैं। हमारे पुराने आचार्यों ने कविता की इसी शक्ति को रस,ध्वनि और उक्ति वैचित्र्य कहा है।
कवयित्री को निरंतर सृजनशील बने रहने की शुभकामनाएँ ।
आप कि कविता मन और मस्तिष्क पर गहरी चोट करती है आप बधाई के हकदार है
पानी के सिवा….. कालजयी कविता
और “भरोसा ” की ये पंक्ति…………
सुख वाली स्मृतियों की हिंसा…..uffffff
ऋतुओं की तरह उन्मन ये कविताएं दाह भरे इस संसार में मलहम की तरह हैं।