| सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : पुनर्पाठ शुक्रिया ओ क़लम-थमे हाथ की परछाईं सन्तोष अर्श |
नयी कविता का ‘न’ सर्वेश्वर के ‘स’ से प्रारंभ होता है. इसकी धूप में सर्वेश्वर की काव्य-चेतना जिस छाया के साथ उपस्थित हुयी उसमें उत्तर-छायावादी परिस्थितियों और प्रगतिवादी सीमाओं के अनन्तर स्फूर्त मौलिक काव्य-चेष्टाओं पर ध्यान देना आवश्यक है. उस प्रस्थान बिन्दु से हिन्दी कविता की नदी की अनेक धाराएँ प्रस्फुटित होती हैं. इनके मध्य सर्वेश्वर की कविता की राजनीतिक स्मृति विशेष इसलिए नहीं है कि वह स्वतंत्रता पश्चात् के भारतीय परिदृश्य पर आक्रामक है, बल्कि इसलिए कि वह देशज संवेदना की अवबोधक है. यह सही है कि वे किसी बड़े दर्शन, कला और रूप-आग्रह के साथ अपनी कविता लेकर नहीं आते, किन्तु सम्भावित कविता लेकर आते हैं. कविता के भीतर प्रगाढ़ लोक-संवेदना, जन-संस्कृति, व्यंग्य, गद्य का वर्नाक्यूलर ध्वन्यात्मक आस्वाद और एक विशाल, स्वतन्त्र लोकतांत्रिक मूल्यों वाले देश के राजनीतिक यथार्थ से रचनाकार के संघर्ष को भी वे अपने सजग काव्य-कौशल से प्रस्तुत करते हैं.
सर्वेश्वर की कविताई को 1949 से (काठ की घंटियाँ) 1983 (कोई मेरे साथ चले) तक समेटा जा सकता है. कोई चाहे तो इसमें कुछ फेरबदल कर अल्पाधिक कर सकता है. उनकी इस विस्तृत काव्य-यात्रा में स्वाभाविक वैचारिक और कलात्मक प्रगति दिखायी देती है. अपनी काव्य-यात्रा के विषय में सर्वेश्वर स्वयं कहते हैं:
“जब लिखना शुरू किया तब मुझ में छपास नहीं थी. सालों रचनाएँ पड़ी रहती थीं. रचनाएँ बिना माँगे मैं किसी पत्रिका में भेजता भी नहीं था. जब सम्पादक माँगते थे तभी देता था. हाँ, वह गोष्ठियों में ज़रूर पढ़ी जाती थीं और वहीं छापने वालों से उनका परिचय हो जाता था. बनारस में ‘प्रसाद परिषद’ का सदस्य था, इलाहाबाद में ‘परिमल’ का. ‘क्षत्रिय मित्र’, ‘आज’, ‘संगम’ सबके संपादक इन गोष्ठियों में आते थे और रचनाएँ माँग कर ले जाते थे. इसी तरह अज्ञेय भी कविताएँ सुनकर ‘प्रतीक’ में छापने के लिए स्वयं मेरे घर में आकर कविताएँ ले गए थे. पर अब न वैसे संपादक रहे न वैसा माहौल रहा. नए कवि के लिए आज सामने आने में कठिनाई ज़्यादा है. इसमें दो राय नहीं हो सकती.”1
व्यक्तिवादी नयी राहों के अन्वेषण में लिप्त, प्रयोगवाद की बहार में खोये ‘अज्ञेय’ ने उनकी कविताई पर दृष्टि डाली. यह दृष्टि ‘तीसरा सप्तक’ के प्रकाशन से पूर्व ही पड़ चुकी थी. अज्ञेय अपनी घोषणाओं के साथ रूपवादी कला-आग्रह से ग्रस्त थे, इसलिए सर्वेश्वर की काव्य-ध्वनियों की सम्भावना के साथ न्याय कर पाना उनके लिए किंचित दुःसाध्य था. सर्वेश्वर पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं:
“पहली और मुख्य है तंत्र कौशल की कमी. मैं ‘फार्मलिस्ट’ हूँ, इस अभियोग से इतना अभ्यस्त हो गया हूँ कि एक बार और उसका जोख़िम उठाने के लिए तैयार हूँ, लेकिन जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह वास्तव में केवल रूपाकार की नहीं है, वह अनुशासित अभिव्यक्ति की बात है – अनुशासन के साथ इतने गहरे और सहज संबंध कि वह अभिव्यक्ति का अंग बन जाए. एक सोने का पिंजरा होता है जिसमें हम पक्षी रखते हैं : एक पक्षी का अस्थिपिंजर होता है जो उसे पक्षी बनाए रखता है और पक्षी से इतर कुछ नहीं होने देता. ये अनुशासन के पर्याय हैं. रचनाकार का कौशल वह चीज है जिसके कारण पक्षी को अस्थिपिंजर के सहारे पक्षी बने रहना खलता नहीं, बल्कि मालूम ही नहीं होता. न पक्षी को देखने वाला उस पिंजर को देखता या उसकी बात सोचता है.”2
‘तीसरा सप्तक’ के वक्तव्य में सर्वेश्वर ने अज्ञेय के रूपवादी आग्रहों के उत्तर भी दिये और आरोपों को यथोचित स्वीकार भी किया-
“तन्त्र-कौशल की कमी– अनुशासित अभिव्यक्ति के अभाव के कारण; गद्य की लय; साधारण बोल–चाल की भाषा का व्यवहार- साधारणतय: मेरी कविता पर ये तीन आरोप हैं. आंशिक रूप से मैं तीनों की सत्यता स्वीकार करता हूँ.”3
यद्यपि ‘नयी कविता’ के विरोध में पिल पड़े तत्कालीन छायावादी-रुझानों से लस्त-पस्त और त्रस्त आलोचकों को भी सर्वेश्वर ने उत्तर दिया. किन्तु अज्ञेय की प्रताड़ना को उन्होंने अधिक गम्भीरता से ग्रहण किया :
“अज्ञेय जो कि उधर ‘प्रतीक’ में मेरी कविताएँ छाप रहे थे तो इधर मुझे लिखे पत्रों में मेरी बोलचाल की लय को ‘यति नियंत्रित गद्य’ कहकर तथा मेरे व्यंग्य को ‘कला के रूप में घटिया’ कहकर मेरी प्रताड़ना भी कर रहे थे. पर आज सारी कविता वहीं पहुँच गई है. वही गद्य हिन्दी कविता में सब लिख रहे हैं जिसे मैंने ही शुरू किया था. ख़ैर यह पता लगाना शोधकर्त्ताओं का काम है. रही छन्दों के स्वभाव की बात तो यूँ समझें कि मेरी कविता छन्द की बन्द गाड़ी में नहीं खुली गाड़ी में बैठी है. अतः छन्दों का स्वभाव चिड़चिड़ा नहीं खुला और मुक्त है.”4
अज्ञेय नयी कविता के प्रस्तावक और उसकी सांस्कृतिक अर्थवत्ता के प्रस्तोता की तरह सामने आये, किन्तु सर्वेश्वर की वर्गीय स्थितियों को नज़रंदाज़ कर रहे थे. वे उन्हें परफ़ेक्ट करना चाहते थे; किसी ‘पर्फेक्शनिस्ट’ की तरह. जबकि कुछ भी पूर्ण नहीं है, कला ही जीवन की अपूर्णता की पूर्ति का प्रयास है. यह (कला) अधिरचना का एक भाग है. सामाजिक आधार और वर्गीय जीवनानुभव, बिना किसी कृत्रिम आचरण के कला-साहित्य में अभिव्यक्ति पाते हैं.
फ़िल्मकार तारकोव्स्की का मानना है कि इम्परफ़ेक्शन भी कला का एक भाग है और अत्यधिक परफेक्शन की चाह भी कोई ग़लती ही है. इस प्रकार अज्ञेय सर्वेश्वर के कवि को अपने आग्रहों से ख़राब और कुण्ठित कर सकते थे, किन्तु ‘तीसरा सप्तक’ से उन्होंने उनके लिए कविता का नया द्वार खोल दिया. यह अच्छा हुआ कि सर्वेश्वर ने उनके मैत्रीपूर्ण काव्य-सुझावों को ध्यान में रखा, किन्तु ओढ़ा-बिछाया नहीं और अपने नैसर्गिक कवि पर अधिक भरोसा ज
ताया. उस समय सर्वेश्वर से अज्ञेय की चाह कुछ यों थी ज्यों पहले-पहल नगर पहुँच जाने वाला नगरीय परिवेश में दक्ष हो गया व्यक्ति गाँव से नगर नये आये निरीह प्रवासशील आदमी से रखता है. अतः अज्ञेय की सर्वेश्वर पर कला का आभिजात्य थोपने की चेष्टा औचित्यपूर्ण नहीं कही जा सकती. सर्वेश्वर के इस आत्म-वक्तव्य में ‘अज्ञेय’ की अभिजात कलावादी ज़्यादती का उत्तर ध्वनित है :
“साहित्य में मेरा प्रवेश बचपन से ही यातना के रास्ते से हुआ, महत्वाकांक्षा के रास्ते से नहीं. प्रतिष्ठित होने के बाद भी उस यातना को सही-सही पहचानने और उसके सभी आयामों को आत्मसात् करने का संघर्ष आज भी बना हुआ है. जैसे-जैसे पहचान बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे यातना का स्वरूप भी बढ़ता और बदलता जाता है. अंतर की यात्रा बाहर की यात्रा को विस्तार देती है और बाहर की यात्रा अंतर की यात्रा को गहरा करती है. यह विस्तार और गहराई परस्पर घात-प्रतिघात से मुझे मथते रहते हैं.”5
सर्वेश्वर की यातनाएँ वर्गीय हैं. यातना की पहचान अभिव्यक्ति से होती है. सत्य की भाँति कला की भी पहली शर्त यह होनी चाहिए की पीड़ा को बोलने दिया जाय. विचार-दर्शन अभिव्यक्ति के यातना-बोध की व्याख्या के लिए हैं. कला उस बोध को यथार्थ की छाया में प्रदर्शित करती है. निर्धनता, अभाव, शोक, भूख और पिछड़ेपन की भूमि बस्ती में सर्वेश्वर का जन्म हुआ. ‘कुआनो नदी’ कविता की इन पँक्तियों में बस्ती जनपद में सर्वेश्वर की यातनापूर्ण सामाजिक स्थितियों का पता है :
बहुत ग़रीब ज़िला है वह, बस्ती-
जहाँ मैंने इसे पहली बार देखा था.
मेरे नाना इसी नदी में कूद पड़े थे
और निकाल लिए गये थे
ज़िन्दगी से ऊबकर मर नहीं सके.6
बस्ती ज़िले के पिछड़ेपन के विषय में अवध के समृद्ध क्षेत्रों में एक गन्दी, अश्लील व्यंग्योक्ति अब तक प्रचलित रही है. उसमें ‘बस्ती’ के तुक पर कहा गया है ‘आटा महँगा, योनि सस्ती’. योनि के लिए यहाँ लोकप्रचलित शब्द ग्रहण किया जाय. इससे जो वमनकारी जुगुप्सा मन में उत्पन्न होती है उसे शास्त्रीय, पश्चिमी व्यक्तिवादी कला-आग्रहों से नहीं समझा जा सकता. तिस पर भी सर्वेश्वर ने ललित कलाओं की सामान्य विशेषताओं से राब्ता क़ायम किया और सभ्य मनुष्य की बेहतरी के लिए कलाओं की अपरिहार्यता को भी स्वीकार किया. वे बताते हैं :
“सूची बहुत लम्बी हो जाएगी उस पर आग्रह मत कीजिए! लेकिन मैंने कविताएँ स्वामीनाथन, हिम्मत शाह, कृष्ण खन्ना, मृणालिनी मुखर्जी जैसे चित्रकारों पर, कुमार गंधर्व, श्रीमती राजम् जैसे गायक वादकों पर और संयुक्ता पाणिग्रही, भारती शिवाजी, लीला सैमसन, कुमुदनी लखिया, स्वप्न सुंदरी जैसी नृत्यांगनाओं पर लिखी हैं. इन सभी से आत्मीय रिश्ता भी है. यह रिश्ता इनकी कला से ही बना है. एक कला माध्यम में जो रचा जाता है उसका रिश्ता दूसरे कला माध्यम से अपने आप होता है यद्यपि यह दीखता नहीं.”7
अपना संग्रह, ‘खूँटियों पर टंगे लोग’ उन्होंने चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन को समर्पित किया है. इसमें कतिपय कविताएँ उपरोक्त कलाकारों पर आधारित हैं. इससे ज्ञात होता है कि कलाओं की ओर उनका झुकाव हुआ, किन्तु उनके कवि की प्रकृति रूप के उस आग्रह से आक्रान्त और अतिक्रमित नहीं हुयी जिस ओर अज्ञेय उन्हें शुरुआत ही में खींचना चाहते थे. सर्वेश्वर अज्ञेय की चिन्ताओं को समझते थे. नयेपन की उनकी तलाश की बेचैनी और उस पर होने वाले आलोचकीय प्रहारों पर भी उनकी दृष्टि थी. इसीलिए सर्वेश्वर का संग्रह ‘बाँस का पुल’ अज्ञेय के लिए है :
निडर आगे बढ़ो-
तुम्हारी राह में एक छोटा-सा
बाँस का पुल है8
कविता के प्रवेश द्वार पर अज्ञेय द्वारा लगायी गयी टोक ने सर्वेश्वर की कविता को और अधिक व्यंजना प्रदान की. यह उनकी मध्य और अन्त की कविताई में चिह्नित किया जा सकता है. कला-अनुशासन से हीन और रूप की संरचनात्मक-सौंदर्यात्मक अवधारणाओं से वंचित कहे गये, आँचलिकता की आँच में पकी हुयी देशज मुहावरों वाली व्यंग्यात्मक भाषा के कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को ‘तीसरा सप्तक’ में पीछे की बेंच पर बिठाया गया था. उन्हें आलोचकों ने दुर्व्याख्यायित किया या नव-काव्याचार के चलते उपेक्षित किया गया, किन्तु यह सब भी उनके कवि को संकुचित-सीमित नहीं कर सका.
सर्वेश्वर की कविता में उनकी दृढ़ता और अपने ‘नया कवि’ होने के पुख़्ता आत्मविश्वास को लक्षित करना अति आवश्यक है. संकल्प, आशा और कवि निष्ठा के लिहाज से वे नयी कविता के ध्वजवाहक कवि ठहरते हैं, अज्ञेय जिसके रेफ़री हैं. इसकी झलक ‘तीसरा सप्तक’ के उनके वक्तव्य में भी है :
(१) …और मैं कविता न लिखता यदि: हिन्दी के आज के प्रतिष्ठित कवियों में एक भी ऐसा होता जिसकी कविताओं में कवि का एक व्यापक जीवन दर्शन मिलता…
(२) मैं विषय-वस्तु को रूप-विधान से अधिक महत्त्व देता हूँ और मानता हूँ कि सम्पूर्ण नयी कविता ने रूप विधान से अधिक विषय-वस्तु पर ज़ोर दिया है, चाहे उसके कवियों ने अपने वक्तव्यों में जो भी कहा!
(३) मेरे निकट विषय की तीव्रता और पूर्ण प्रभाव रूप-विधान से अधिक महत्त्वपूर्ण है.9
‘काठ की घण्टियाँ’ रूपक उन्होंने बैलों के गले में बाँधी जाने वाली घण्टियों से ग्रहण किया है. शुरुआत की कविताएँ उनकी, छायावादी अवसान की गीतात्मकता से प्रेरित हैं. लय, भाषा और रोमान वहाँ उपस्थित हैं. प्रेम और स्त्री-देह की चाह है. ग्राम-जीवन की छटा उसकी सामूहिक चेतना और संघर्ष के साथ है. अन्य ‘परिमलीय’ कवियों की शैली में लिखी गयी कविताएँ भी हैं, जैसी धर्मवीर भारती ने ‘ठण्डा लोहा’ प्रभृति संग्रहों में लिखी हैं: ‘इन फ़िरोज़ी होंटों पर बर्बाद मेरी ज़िन्दगी ….’
मैं तुम्हारे लिपस्टिक लगे होंठों की
विकृत अरुणिमा में भी
पंख खोल कर तैर सकता हूँ.10
और वहीं गँवई आस्वाद के गीत भी हैं :
यह डूबी-डूबी साँझ
उदासी का आलम;
मैं बहुत अनमनी
चले नहीं जाना बालम11
(सुहागिन का गीत)
बनारस के गीतवादी और इलाहाबाद के रोमानी परिवेश से सर्वेश्वर का अप्रभावित रह जाना मुश्किल था. अतः शुरुआती कविताई में इन दोनों युगीन छापों के अतिरिक्त मंचीय कविता का कलेवर ढला हुआ मिलता है. अवधी रीति का व्यंग्य भी जो यहाँ से उगा, वह अन्त तक बना रहा :
ब्याह की हँसुली गिरौ धरी है
थी बस एक चढ़ौआ.
चुपाई मारौ दुलहिन
मारा जाई कौआ.12
(चुपाई मारौ दुलहिन)
‘बाँस का पुल’ में केवल बाँस का पुल ही नहीं है; वसन्त की स्मृति है, हेमन्त की संध्या है, पूर्णिमा प्यार है, बिटिया से प्रेम और दिवंगत पिता है. ‘अगहनी मुरैठा’ बाँधे शिशिर का चरवाहा है. उपलब्धि के नाम पर एक झोला है जो खण्डित मूर्तियों से भरा है. यहीं एक कच्ची सड़क भी है, जो उनके गाँव को जाती थी. ‘बाँस के पुल’ में भी है ‘काठ की घण्टियाँ’ से शुरू हुआ नव वर्ष और सर्वेश्वर का गम्भीर आज़ाद देश जो अन्त तक बना रहता है:
चल भाई घोड़े
टिक टिक टिक !
बड़े भाग्य से
मिली हमें आज़ादी,
पीठ हो गयी अपनी
चाहे ढोएँ लादी.13
(प्रगति का गीत)
‘एक सूनी नाव’ में सर्वेश्वर की राजनीतिक स्मृति के भव्य स्मारक हैं. यहाँ से वे पूर्णतयः भारतीय राजनीति के द्रष्टा कवि बन जाते हैं. उनकी अनेक राजनीतिक उलझनों के बावज़ूद और स्वयं को राजनीतिक विचार-धाराओं से अलगाने के प्रयत्नों के मध्य वे कई बार कॉंग्रेस के भीतर से उठे समाजवादी आन्दोलन और अपनी काव्य-यात्रा के दूसरे छोर तक स्पष्टत: वर्गीय राजनीतिक दर्शन के निकट पहुँचते हैं. यद्यपि वे स्वयं पर गाँधी, नेहरू, लोहिया जय प्रकाश आदि व्यक्तित्त्वों के प्रभाव से इनकार करते रहे हैं. इस सन्दर्भ में उनके कथन पठनीय हैं:
(१) मेरे लेखन पर राममनोहर लोहिया की विचारधारा का प्रभाव नहीं है. मैं प्रभाववादी लेखक नहीं हूँ. राममनोहर लोहिया पर कविता लिखने मात्र से मैं लोहियावादी नहीं हूँ न इसी कारण मेरी रचनाओं में लोहियावाद ढूँढना चाहिए. कवि का दुख भगवान का दुख नाद नहीं होता.
(२) हर आदमी बराबर हो, गरीबी से दूर हो, अन्याय शोषण खत्म हो, हिंसा का रास्ता गलत है यह सब जब कवि कह रहा होता है तो वही कह रहा होता है कोई लोहिया, मार्क्स या गाँधी उसके पीछे नहीं बोल रहा होता क्योंकि यह बात अपनी संवेदना के बल पर अपने अनुभव से कह रहा होता है. लोहिया मुझे अच्छे लगते थे, मेरा उनसे अच्छा परिचय भी था इसी से मैं लोहियावादी मान लिया जाऊँ या अज्ञेय से मेरा अरसे तक निकट परिचय था इसी से अज्ञेयवादी यह गलत बात है.14
(३) नेहरू और गाँधी ने मेरी काव्य संवेदना को कभी छुआ नहीं. उन पर मेरी कोई कविता नहीं है. नेहरू की मृत्यु पर जरूर है ‘एक सूनी नाव’ और गाँधी के सत्ता द्वारा इस्तेमाल पर है ‘पंचधातु’. शायद कोई गाँधीवादी मेरा मित्र नहीं था. लोहियावादी थे, शुरू में क्रांतिकारी थे – अतः लोहिया की बातें अच्छी लगने लगीं, समझ में आती थीं. पर लोहिया की बातों पर मेरी कविता नहीं थी, मैं कविता उसी पर लिख सकता हूँ जो मेरी अनुभूति का हिस्सा हो. लोहिया की बातें मेरे अनुभव का अंश बनने पर ही मेरी कविता में यदि आई हैं तो आई होंगी. मैं लोहिया की बातों को कविता में ढालने वाला नहीं था. कोई कवि इस तरह ही ढलाई नही करता. अतः लोहिया का प्रभाव मेरी कविता में खोजना ऐसा ही होगा जैसे हुसैन की चित्रकला में लोहिया का प्रभाव खोजना.15
सत्य यह है कि सर्वेश्वर की कविताओं में राजनीतिक यथार्थ की ऐसी क्रमबद्ध और सुथरी सरणियाँ हैं कि उनसे गुज़र कर कोई सहज ही मान लेगा कि वे एक ऊँचे क़द के राजनीतिक कवि हैं. उनकी कविताओं की राजनीतिक मर्यादा ऐसी स्पष्ट ध्वनियों और अर्थों वाली है कि निसिदिन राजनीति-राजनीति चिल्लाने वाले कथित, घोषित कवियों-लेखकों के लिए वे अनुकरणीय बन जाते हैं. दूसरी तरफ़ सर्वेश्वर की कविताओं का देश इतना विशाल, विस्तृत और चिन्तनीय है कि इतना देश तो आज के कवियों को स्मरण ही नहीं रह पाएगा. बहुत नकारते हुए भी ‘परिमल’ के कवियों में वे सबसे अधिक ‘लोहियावादी’ प्रतीत होते हैं. इससे आगे बढ़कर साम्यवाद की आलोचना करके भी वे मार्क्सवादी कवियों से कुछ ज़्यादा मार्क्सवादी लगते हैं, क्योंकि कविताओं में वर्गीय यथार्थ की मौज़ूदगी घोषित मार्क्सवादी कवियों से अधिक सघन दिखाई देती है. और गाँधीवाद से तो अप्रभावित रह पाना किसी भी भारतीय लेखक के लिए चुनौती है. कविता में अभिव्यक्त राजनीतिक संकटों, उसकी चतुराई, धृष्टता, भ्रष्टता और ओछी चालों के पुलिन्दे खुलते हैं. ‘एक सूनी नाव’ से वे देश की समसामयिक परिस्थितियों से भी जुड़ते हैं. ‘गर्म हवाएँ’ और ‘खूँटियों पर टंगे लोग’ संकलनों की कविताएँ इसका आदर्श और उपयुक्त उदाहरण हैं. देश जिनमें बहुत है, लोकतंत्र की माँग बहुत है और बहुत है समतापूर्ण समाज की चाह :
उस देश का मैं क्या करूँ
जो धीरे-धीरे लड़खड़ाता हुआ
मेरे पास बैठ गया है
मेरे दोस्तो !
मैं उसे देश का क्या करूँ
जो धीरे-धीरे
धीरे-धीरे खाली होता जा रहा है
भरी बोतलों के पास खाली गिलास-सा
पड़ा हुआ है16
असमर्थ देश
असमर्थ प्यार
दोनों को ही मेरा नमस्कार17
तुम्हारी चप्पल ?
गरीबों की चाँद गंजी
करने के काम आ रही है
और घड़ी ?
देश के नब्ज़ की तरह बन्द है.18
एक नक़्शा संभाल कर रखा था मैंने देश का
उसे पर फैली हुई है पीली बदबूदार पेशाब.19
सारा देश एक ठण्डे भाड़-सा दीखता है
सूखी पत्तियाँ उड़ती डोलतीं हैं
बालू सूखे पोखरे में जल रही है.20
सर्वेश्वर की कविताओं में देश सामयिक चिन्ताओं से युक्त है. उनकी कविताई के तीन मुख्य दशकों में स्वतन्त्रता पश्चात् के परिवेश में इसकी प्राप्ति से पूर्व देखे गये स्वप्नों का बिखरना प्रमुख है. स्वप्नभंग की यह दशा एक कवि के लिए चिढ़ और बेज़ारी के सिवाय क्या उत्पन्न करेगी ? वे अपने देशकाल के कैलेण्डर की तारीख़ों पर चिह्न लगाते बढ़ते गये हैं. ये चिह्न यथार्थ की मारक कविताओं के रूप में हैं. जहाँ आपात्काल भी है और ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा भी. व्यंग्य इस अवस्था में कविता के भीतर घुन की भाँति घुसा हुआ है, किन्तु स्मृति की यह ऐसी लकीर खींचता जाता है कि देश के राजनीतिक इतिहास को उसकी विद्रूपता, विसंगति और असफलताओं को कवि के प्रज्ज्वलित सत्य की लपट में दिखा सके. उनकी सामयिकता आगामी राजनीतिक कुटिलताओं के लिए चश्मा बन जाती है. कविता की इसी प्रवृत्ति को प्रायः औसत भाषा में कालजयी कहा जाता रहा है, किन्तु सर्वेश्वर की काल पूरकता उन्हें आगे बढ़ते समय में ज़्यादा समकालिक करती जाती है :
मुकुट धारण किये
घूम रहा है विज्ञापनबाज़ शासक
और योद्धाओं की पोशाक
बाजे वालों ने पहन रखी है.
आग जलायी जाती है
पर डफ गर्म करने के लिए.
पता नहीं चलता
लोग घबराए आक्रांत चीख़ रहे हैं.21
विज्ञापनबाज़ यह शासक आज तक इस देश के लोकतंत्र के कन्धों पर बैताल की तरह लटका हुआ है. अब के देश में यह अत्यधिक बर्बर, क्रूर, झूठा, अश्लील और फूहड़ हो गया है. इस प्रकार कविता में सर्वेश्वर की राजनीति, राजनीति की भाँति न होकर इसकी निगरानी के रूप में है, यही वह संकल्प-सूत्र है जिसे 1936 में प्रेमचन्द ने साहित्य को सौंपा था. उनकी यह काव्य-प्रवृत्ति उन्हें आज की राजनीतिक परिस्थितियों के बीचो-बीच खड़ा कर देती है. राजनीति पर सर्वेश्वर के विचार कविता से बाहर भी कुछ ऐसी ही व्यंजना में हैं :
“सच कहा जाए तो हमारे देश में आम आदमी और राजनीति के मध्य कोई संवाद की स्थिति है ही नहीं. यहाँ विडंबना यह है कि आज एक आदमी बोलता है और सारा देश सुनता है. जबकि होना यह चाहिए कि सारा देश बोले और एक आदमी सुने.”22
यह राजनीति के प्रति काल पूरक बयान है. सर्वेश्वर की मृत्यु के चार दशकों के पश्चात भी इस देश में एक आदमी बोल रहा है और पूरा देश सुन रहा है. इसी रंग की आततायी राजनीति के लिए वे ब्रेख़्त के लहजे के साथ अपनी कविता में ‘भेड़िया’ लाये, जो मशाल नहीं जला सकता. तब ही तानाशाह को वे पहचानते हैं और उसकी कायरता को भी :
तानाशाह को सबसे बड़ा ख़तरा
दस्तानों से ही होता है23
दूसरा सत्य यह है कि सर्वेश्वर की कविताई में साहित्य और राजनीति के वे सम्बन्ध उपस्थित हैं जो स्वतन्त्रता पूर्व और पश्चात के भारतीय कालखण्ड की एक सुन्दर तस्वीर पेश करते हैं. जहाँ राजनीति और साहित्य दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के अनुरागी थे और एकदूजे को तमीज़ भी सिखाते थे. सन्देह नहीं कि उन्होंने रा. म. लोहिया, मुक्तिबोध और तेलगु के क्रान्तिकारी लेखक चेराबंडा राजु की मृत्यु पर अच्छी कविताएँ लिखी हैं :
तुम्हारी घनी भौंहों के बीच की
वह गहरी लकीर
अभी भी गड़ी है वहाँ बल्ली-सी24
(लोहिया के न रहने पर)
तुम्हारी मृत्यु में
प्रतिबिम्बित है हम सब की मृत्यु-
कवि कहीं अकेला मरता है !25
(कवि मुक्तिबोध के निधन पर)
तुम्हारी मृत्यु से
यह बारिश तेज़ाब में
बदल गयी है26
(क्रांतिकारी की मौत)
किन्तु नेहरू की मृत्यु के शोक में रची गयी कविता का प्रथम बिम्ब ही गोया देशकाल में नेहरू की अनुपस्थिति के बाद के स्तब्धकारी मौन और नेहरू के व्यक्तित्त्व के वैराट्य को धारण करते हुए आता है. यह बिम्ब ‘एक सूनी नाव’ को खेता है:
एक सूनी नाव
तट पर लौट आयी.27
(एक सूनी नाव)
जिस तट पर ‘सूनी नाव’ लौटकर आयी है, वह देश के जनसमुद्र का तट है. यह कविता मृत्युशैय्या पर सन्निपातग्रस्त कवि मुक्तिबोध की उस चिन्ता का भी स्मरण कराती है जो नेहरू की मृत्यु को लेकर थी. यह बिम्बों और प्रतीकों को साध लेने के अलावा व्यक्त के अव्यक्त होने के बाद उसे स्थायी रूप से व्यक्त कर देने की अमूर्तन-कला का सन्धान भी है.
इस कविताई की अन्तर्ध्वनियों में से अन्य एक विशेष है कवि की दृढ़ता, निश्चय, श्रद्धा और जीवट. सर्वेश्वर स्थिर और स्पष्ट आशा के कवि हैं. मानवीय सामर्थ्य पर उन्हें तनिक सन्देह नहीं. लिहाजा दुःख का अनर्गल अरण्य रोदन उनके निकट वर्जित है. उनका निजी दुःख ‘सफ़ेद निर्मल चादर’ की भाँति है जिसे बिछाकर वे सो रहते हैं. संघर्ष अवश्य है. और संघर्ष को भी वे मानवीय अस्तित्त्व का अपरिहार्य अंग और कर्तव्य समझकर उसे व्यावहारिक दर्शन का जामा पहनाते हैं. सर्वेश्वर की कविता में अस्तित्ववादी प्रकार की अवसादपरक निराशा, ऊब और संशय की मीठी दवा है. अस्तित्ववादी दर्शन में जीवन का साहस अन्तिम छोर (डेड प्वॉइंट) पर जा कर मिलता है. वहाँ तक जाने की आवश्यकता क्या है ? समझदारी भरा उत्तर है- ‘दर्शन के लिए.’ वहाँ जाने की वे आवश्यकता महसूस नहीं करते. उनकी अप्रसिद्ध कविताओं में भी यह संकल्प और मानवीय साहस स्पन्दित है, किन्तु जूझने और मार्ग बना लेने की काव्यात्मक दृढ़ता वाली बानगी उनकी प्रसिद्ध कविताओं की कम प्रसिद्ध पँक्तियों से है:
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है.28
(तुम्हारे साथ रहकर)
जो संकल्प हम में
उसी के सहारे हैं29
(लीक पर वे चलें)
सम्भावनाएँ निरन्तर हैं:
ज़िन्दगी की खोज, जो रचना है,
रचना- जो सार्थक करती है,
महत्वाकांक्षा नहीं
जो दूसरों को छोटा करने से ही पनपती है.30
अँधेरे में संघर्षरत लहरें ही
नहीं चमकतीं
निराशा से लड़ता आदमी भी
रोशनी देता है.31
(पहाड़ों को मेरे ऊपर गिरने दो)
दुःख को अपदस्थ कर वे उल्लास को कविता में लाकर रचते हैं. इस उल्लास में भारतीय ग्राम्य-जीवन की हरीतिमा विस्तृत है. खेतों और उनकी मेड़ों के साथ बैल, पेड़, नदी-नाले, वर्षा, मैदान, घास, फ़सल सभी उल्लास में शरीक़ हैं. वसन्त के अनेक गीत हैं और वसन्त महन्त की तरह आता है:
चँवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनन्त
आये महन्त वसन्त32
ग्राम्य-वर्णन प्रगतिवादी कविता के सौंदर्य की परम्परा का अनुगामी है. फिर आता है प्रार्थना का वह शिल्प जो जीवन में आस्था के महत्त्व और कवि की नम्रता का वर्णनातीत राग समर्पण है:
१- दुर्गम पथ तेरे हों
थके चरण मेरे हों
२- अपनी दुर्बलता का मुझको अभिमान रहे
अपनी सीमाओं का नित मुझको ध्यान रहे
३- यही प्रार्थना है प्रभु तुमसे
जब हारा हूँ तब न आइए.33
(प्रार्थना-2-3-4)
इन प्रार्थनाओं में बच्चन और शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जैसे पूर्व युगीन कवियों की नव-ध्वनियाँ हैं. यह समर्पण भाव अपनी अर्थवत्ता में मधुर और मानवीय अभिप्रेरणाओं के मूल तक ले जाने वाला है. यही सुसंगति उनकी जूता-शृंखला की कविताओं में भी दिखती है :
जूता पलटकर जवाब देता है-
मैं अब भी तैयार हूँ
यदि तुम चलो ! (जूता-1)
जब से मैंने नया जूता ख़रीदा है
मेरी चाल बदल गयी है
पर ज़माने की चाल वही है (जूता-2)
मैं उन पैरों के बारे में सोचता हूँ
जिनकी इसने रक्षा की है
और श्रद्धा से नत हो जाता हूँ.34 (जूता-4)
जूता उनकी कविताओं में किसी बड़े रूपक की तरह है. इस प्रकार कि लोकतन्त्र भी लाठी में जूतों की तरह लटका हुआ है. जूते ही बताते हैं कि कविताई के अन्तिम दौर में वे ‘बाएँ पैर’ पर ज़्यादा वज़न डालने लगे हैं. उनके अन्तिम दो संग्रहों में वर्गीय चेतना-संघर्ष की मात्रा में वृद्धि होती गयी है. कविता की संरचना में प्रकृति-तत्त्व बढ़ते जाते हैं और कहीं-कहीं यह तात्त्विकता का रूप ग्रहण कर लेती है:
मोर नाचता है
तो उसके साथ-साथ सारा
जंगल का वह हिस्सा भी नाचता है
जहाँ वह होता है.35
(नाचो और रचो)
सर्वेश्वर की कविताओं का नुकीलापन उनके शिल्प में पिन्हाँ है. यानी हम फूलों के किसी जंगली झुरमुट में हाथ डालें और वहाँ कुछ नोंक जैसा चुभ जाए. उनकी कविताओं के मुखड़े फ़िल्मी गीतों के लिए विवशता बन गये और उन्हें इस्तेमाल भी कर लिया गया. वह ‘पगला कहीं का’ में ‘मेरी भैंस को डण्डा क्यूँ मारा’ हो या ‘इश्किया’ का गुलज़ार रचित ‘इब्ने-बतूता बग़ल में जूता.’ व्यंग्यात्मकता उनकी कविताई के अधिकांश हिस्से में बुनाई का धागा है. व्यंग्य उत्पन्न करने के लिए वे अवधी बोली के ‘सेतमेत’ जैसे ग्रामीण शब्दों के अलावा मुहावरे भी उठाते हैं और कविता में टाँकते हैं:
१- खाय लिया खिचड़ी
सलाम भैया चूल्हा
२- नाम गुलबिया चुत्तर झाँवा
३- दुइ पैसे का रंग डाल के झाड़े रौ महँगुआ
अवधी भाषा की व्यंग्यात्मकता को भाषा-वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं. औपचारिक बोल-चाल में भी यह व्यंग्य प्रधान होती है. इसलिए जब व्यंग्य काम्य होगा तो इसमें बढ़ोत्तरी स्वाभाविक है. यद्यपि व्यंग्य कोई बड़ी कलात्मक वस्तु नहीं है. उसमें भाषिक चपलता (wittiness) और विनोद (Humour) ही प्रमुख होते हैं. सर्वेश्वर ने भी इस बारम्बारता को समझा था इसीलिए कविताई की प्रौढ़ता में व्यंग्य उतार पर है.
गीतात्मक छन्द और लयात्मक गद्य से बढ़ते हुए वे गद्य की पाठाधारित पदभंगकारी लय पर ठहरते हैं. यह सत्य है कि कविता की अधिक रूपवादी गहराई और अमूर्तन की क्रीड़ाओं के प्रति वे कभी गम्भीर नहीं हुए. बिम्ब और प्रतीक उन्हें छायावाद से उत्तराधिकार में मिले थे. गद्य की लय इतनी स्निग्ध, कोमल और संगीतमय है कि एकदम शुरुआती कविताई तो इसी से बनी हुयी है :
अहं से मेरे बड़ी हो तुम
क्योंकि मेरी शक्तियों की
हर पराजय-जीत की
अन्तिम कड़ी हो तुम36
(अहं से मेरे बड़ी हो तुम)
भावों के हल्केपन से विचारों के भार तक गद्य की यह लय टूटती नहीं है :
कोट के गुलाब को और जूड़े के फूल को
हर नन्हीं याद को, हर छोटी भूल को
नये साल की शुभकामनाएँ.37
(नये वर्ष पर)
सर्वेश्वर सहज आत्मीयता के प्रखर कवि हैं. वे अपनी कविताई में युगबोध धारण किये हुए हैं. अपनी काव्य-भाषा में नगरीय आभिजात्य को प्रवेश देने से पूर्व उन्होंने द्वंद्वपूर्ण विचार-चिन्तन किया है. यह उनका आत्मसंघर्ष है. इसमें उनकी देशज-सम्वेदना और नये कवि की शब्द-साधन की आबद्धता विजयी हुयी और वे भारतीय जन-मन-गण के साथ खेतों की मेड़ों, पगडण्डियों और कच्ची सड़कों पर चलते रहे. अपनी कला को निजी मुक्ति के ब-जाए उन्होंने सामूहिक मुक्ति का उपादान माना:
मुझे यह मुक्ति नहीं चाहिए.
अपने लिए आज़ाद हो जाने से बेहतर है
अपनों के लिए ग़ुलाम बने रहना.38
(कोट)
काव्य की इस उपादेयता को उनकी कविता की लोक-संपृक्ति के स्तर पर ही अनुभव किया जा सकता है. कविता और साहित्य को परिवर्तनकारी न मानते हुए भी वे क्रान्तिकारी कवि हैं. उनकी कविता में प्रस्तुत विषय-वस्तु मानवीय संघर्ष से संपृक्त ऐसी ध्वनियाँ हैं जो प्रत्येक क्षण सुनायी देती रहती हैं. आलम्बन के रूप में भी उन्होंने केवल अपनी काव्य-चेष्टाओं, कथ्य, भाषा को चुना. किसी प्रकार की शास्त्रीयता, पौराणिकता बड़े और गहरे विचार-दर्शन या कलारूपों की ओट उन्होंने नहीं ली. इससे काव्य-कर्म स्थिर और आसान अवश्य होता है, किन्तु इन तत्त्वों को पृथक करने के बाद कवि के नेरे कोई प्रभावी चीज़ शेष नहीं रहती. पॉलिशिंग उनकी कविता में कम है. सम्प्रेषण अधिक है. अन्तिम निष्कर्षों में वे अज्ञेय के फॉर्म और रूपाकार संबंधी आग्रहों का प्रतिकर्म और प्रतिविचार (एन्टीथीसिस) हैं. उनकी कविता में एक गतिमय शीघ्रता है. सर्वेश्वर के कवि से प्रेम किया जाना चाहिए, किन्तु धीरे-धीरे नहीं ! क्योंकि उनका कहना है :
धीरे-धीरे
अब मुझे कुछ भी नहीं है स्वीकार
चाहे वह घृणा हो चाहे प्यार. 39
(धीरे-धीरे)
सर्वेश्वर को भारतीय लोकतांत्रिक चेतना के सबसे बड़े काव्य-साक्षियों में देखा जाना चाहिए. उनकी कविताई का महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने नई कविता की भाषा को बोलचाल, लोकानुभवों और व्यंग्य की कीमियागरी से बने गद्य से समृद्ध किया; इसकी खुसूसियत इस बात में है कि इसने स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक स्वप्न, उसके विघटन और मनुष्य की नैतिक जिजीविषा की काव्य-स्मृति निर्मित की. जहाँ सत्ता के विरुद्ध खड़े होने का कोई उद्घोष नहीं है, बस मनुष्यता के पक्ष में खड़े रह पाने का साहस भर है. सर्वेश्वर की कविता में उतरना भारत की स्मृति को बचाए रखना है. लोकतंत्र के विश्वसनीय काव्य-इतिहास में सर्वेश्वर की कविताई सबसे उजली और सबसे बेचैन आवाज़ों में से एक है. सर्वेश्वर का कवि अपने समय से पराजित नहीं होता, उससे भिड़ता है. यही कारण है कि उनकी कविता अपने समय की नहीं, समय के विरुद्ध मनुष्य की कविता बन जाती है.
संदर्भ :
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड: 2, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 395
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 5, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 415
- सक्सेना सर्वेश्वर दयाल, वक्तव्य, तीसरा सप्तक, संपादक अज्ञेय, वाणी प्रकाशन, तेरहवाँ संस्करण, पृष्ठ- 214
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड: 2, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 415
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 2, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 396
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, कुआनो नदी, राजकमल प्रकाशन, 1984 संस्करण, पृष्ठ- 13
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 2, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 410
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 1, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 157
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, वक्तव्य, तीसरा सप्तक, संपादक अज्ञेय, वाणी प्रकाशन, तेरहवाँ संस्करण, पृष्ठ- 213, 214
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, एक प्यासी आत्मा का गीत, काठ की घंटियाँ, भारतीय ज्ञानपीठ, 1959 संस्करण, पृष्ठ- 287
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- बाँस का पुल, प्रगति का गीत, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 1, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 192
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 2, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 413
- वही, पृष्ठ- 408
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, धीरे-धीरे, गर्म हवाएँ, वाणी प्रकाशन, 2000 संस्करण, पृष्ठ- 10, 11
- यह खिड़की, वही, पृष्ठ- 16
- पंचधातु, वही, पृष्ठ- 27
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- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, ग़रीबी हटाओ, कुआनो नदी, राजकमल प्रकाशन, 1984 संस्करण, पृष्ठ-48
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, स्थिति यही है, गर्म हवाएँ, वाणी प्रकाशन, 2000 संस्करण, पृष्ठ- 18
- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 2, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 399
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, दस्ताने, खूँटियों पर टंगे लोग, राजकमल प्रकाशन, 2022 संस्करण, पृष्ठ- 31
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, लोहिया के न रहने पर, गर्म हवाएँ, वाणी प्रकाशन, 2000 संस्करण, पृष्ठ- 21
- कवि मुक्तिबोध के निधन पर, एक सूनी नाव, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 1, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 275
- क्रान्तिकारी की मौत, कोई मेरे साथ चले, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 2 संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 353
- एक सूनी नाव, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 1, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 273
- तुम्हारे साथ रहकर, वही, पृष्ठ- 239
- लीक पर वे चलें, वही, पृष्ठ- 263
- तुम्हारे हाथों में, जंगल का दर्द, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 2, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 141
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, पहाड़ों के मेरे ऊपर गिरने दो, खूँटियों पर टंगे लोग, राजकमल प्रकाशन, 2022 संस्करण, पृष्ठ- 80
- बाँस का पुल, आये महन्त वसन्त, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 1, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 203
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, प्रार्थना- 2, 3, 4, गर्म हवाएँ, वाणी प्रकाशन, 2000 संस्करण, पृष्ठ- 46, 47, 48
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, जूता-1,2,4, खूँटियों पर टंगे लोग, राजकमल प्रकाशन, 2022 संस्करण, पृष्ठ- 32, 33, 35
- नाचो और रचो, कोई मेरे साथ चले, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ग्रंथावली, खंड : 2, संपादक वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, 2004 संस्करण, पृष्ठ- 313
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- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, कोट, खूँटियों पर टंगे लोग, राजकमल प्रकाशन, 2022 संस्करण, पृष्ठ- 21
- सक्सेना, सर्वेश्वर दयाल, धीरे-धीरे, गर्म हवाएँ, वाणी प्रकाशन, 2000 संस्करण, पृष्ठ-11
संतोष अर्श कविताएँ, संपादन, आलोचना. रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ पर संतोष अर्श की संपादित क़िताब ‘विद्रोही होगा हमारा कवि’ अगोरा प्रकाशन से तथा ‘आलोचना की दूसरी किताब’अक्षर से प्रकाशित. poetarshbbk@gmail.com |

कविताएँ, संपादन, आलोचना


सर्वेश्वर दयाल सक्सेना पर किसी युवा कवि-आलोचक ने लिखा, यह मेरे लिए ‘संतोष’ का विषय है। लंबे समय से सर्वेश्वर जी पर कुछ लिखने-करने की योजना मेरे भी मन में है।
मेरे प्रिय कवियों में शामिल सर्वेश्वर दयाल सक्सेना पर लिखा गया संतोष अर्श का यह लेख समृद्ध करने वाला है। नयी आलोचना में संतोष अर्श को पढ़ना अच्छा लगता है। आपके ऐसे ही लेखों की प्रत्याशा में…..
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता प्रचलित चौखटे को तोड़कर जीवन की उस खुरदरी वास्तविकता के सामने खड़ी होती है, जिसे भावुकता की लिजलिजी भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उनकी कविता में जीवन की सड़ांध, उसकी अश्लीलताएँ और सूखे रक्त से सनी क्रूरताएँ किसी अलंकार की ओट में नहीं छिपतीं, बल्कि एक प्रत्यक्ष रिपोर्ट की तरह दर्ज होती हैं। उनका कवि उनके पत्रकार का ही विस्तार है। संतोष अर्श का सर्वेश्वर दयाल सक्सेना पर लिखा लेख केवल एक आलोचनात्मक आलेख नहीं, बल्कि यथार्थ के इस विलक्षण कवि के रचनात्मक मर्म को उद्घाटित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज़ है।
लेख की सबसे बड़ी शक्ति सर्वेश्वर के कवि-व्यक्तित्व के प्रति उसकी आत्मीय दृष्टि है। अज्ञेय और सर्वेश्वर के संबंध को ‘रूप’ और ‘कथ्य’, अनुशासन और सहजता के तनाव के रूप में प्रस्तुत करना प्रभावशाली है। सर्वेश्वर ने अज्ञेय की आपत्तियों से सीखा, लेकिन अपनी सहज काव्य-प्रकृति से समझौता नहीं किया। यह उनकी रचनात्मक स्वतंत्रता का प्रमाण है।
लेख का सबसे मजबूत पक्ष सर्वेश्वर की राजनीतिक चेतना का विवेचन है। उनकी राजनीति केवल सत्ता-विरोध नहीं, बल्कि देश, लोकतंत्र, भूख, गरीबी, आम आदमी और मनुष्य की गरिमा से जुड़ी है। इसलिए उनकी राजनीतिक कविता नारे के बजाय मानवीय संवेदना बन जाती है और आज भी प्रासंगिक दिखाई देती है।
फिर भी, सर्वेश्वर को लोहियावादी या मार्क्सवादी निकटता में देखने का आग्रह कुछ सीमित लगता है। उनकी सामाजिक चेतना को किसी एक विचारधारा में बाँधने के बजाय उनकी स्वतंत्र नैतिक और मानवीय दृष्टि के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
लेख में उनके प्रेम, स्त्री, निजी जीवन, प्रकृति और पारिवारिक संवेदनाओं वाले कवि को भी अपेक्षाकृत कम स्थान मिला है। राजनीतिक और निजी—इन दोनों रूपों को साथ रखकर देखने से सर्वेश्वर की काव्य-दृष्टि अधिक व्यापक रूप में सामने आती।
भाषा ऊर्जस्वित और प्रभावशाली है, हालांकि कुछ जगह आलोचनात्मक दूरी कम होती दिखाई देती है। फिर भी लेख का अंतिम प्रभाव सकारात्मक है। यह सर्वेश्वर पर अंतिम निर्णय नहीं देता, बल्कि उन्हें नए सिरे से पढ़ने की प्रेरणा देता है। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
सर्वेश्वर जैसे क्लासिकी मेयार के कवि पर लिखा गया यह लेख उनकी कविता को उनके जमाने के ऐतिहासिक और साहित्यिक कश म कश के बीच रख कर समझने की एक संजीदा और ईमानदार कोशिश है।
सर्वेश्वर की कविता के हम जैसे मुरीदों को भी इस लेख से उसे नए रंगों और रौशनियों में देखने का अवसर मिला है। बधाई, संतोष अर्श।