सत्यपाल सहगल की कुछ नई कविताएँ
१.
धूप एक कंघी
मैंने देखा
धूप एक कंघी है
और उसने
दिन के बाल सँवार दिए हैं
पिछले कल
वह एक टूटा दरवाज़ा थी
दरवाज़ा सलेटी था या नीला
कुछ याद नहीं
पिछले साल वह परबत का एक
उजड़ा गाँव था
गली में पिल्ला लेटा है
और उसकी माँ
उसकी धूप चाट रही है
मेरे घर में
एक जनरल की फ़ोटो थी
एक दिन उस पर सारा दिन
धूप पड़ती रही
शाम तक वह ख़राब हो गई
आओ इस बूटे से पूछते हैं
क्यों जी धूप से आपकी यारी कैसी चल रही है
देखो खिलखिला कर हँस पड़ा है
और सिर हिलाकर कहता है
अच्छी चल रही है
यह लीजिए
इस साइकिल सवार की
पीछे बँधी बोरी धूप में आ गई है
साफ़ दिख रहा है
बोरी में ईंधन भरा हुआ है
और इधर देखो
यह बेबे* धूप सेंकने आ गई है
पार्क में
आज वह यहाँ अकेली ही बैठी है.
*माँ-दादी या बुज़ुर्ग औरत
२.
अँधेरा और रौशनी
अँधेरों के साथ
रौशनियाँ ऐसे खड़ी रहती हैं
जैसे बच्चों के साथ माएँ
रानियों के साथ उनके रखवाले
स्टेशनों पर रेलगाड़ियाँ
मैंने अँधेरों की बात की
आप सोचते होंगे
मैं इशारे से कोई और बात कर रहा हूँ
यह सही नहीं है
मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ अँधेरों की बात कर रहा हूँ
हर अँधेरा
कोई न कोई रौशनी ढूंढ ही लेता है
और कुछ नहीं तो
एकाध जुगनू ही
चाँद ना सही तो तारे
यदि वह भी नहीं
अगर कुछ भी नहीं
तो बहुत बार रौशनी की याद भी
रौशनी होती है
यहाँ अँधेरा है
और यहाँ ही एक टूटी हुई दीवार है
मुझे दीवार दिख नहीं रही है
पर मुझे पता है
यहाँ एक टूटी दीवार है
मेरा यह तजुर्बा ही
मेरी रौशनी है
एक बार
मैं घुप अँधेरे में फँस गया था
किसी एक जंगल में
पहाड़ों पर
कुछ भी नहीं दिखता था
अँधेरा भी नहीं दिखता था
सिर्फ़ महसूस होता था
अँधेरे को देखने के लिए
थोड़ी रौशनी तो चाहिए ही
फिर दूर से एक आवाज़ आई
पता नहीं कहाँ से
शायद किसी गाँव से
किसी सड़क या शहर से
बिना रौशनी के मुझे सब कुछ दिखने लगा
मुझे पता चल गया मै कहाँ हूँ
मुझे वह रास्ता नज़र आ गया
जो उस आवाज़ की तरफ जाता था
पता नहीं लोग
अँधेरे के पीछे क्यों पड़े हैं
रौशनी बेचने के लिए
अँधेरे को गाली देना ज़रूरी है
ओ रौशनी बेचने वालो
रौशनी कभी नहीं बिकनी थी
यदि अँधेरा ना होता
मनुष्य को हमेशा
रौशनी की ज़रूरत नहीं है
पर रौशनी यह बात कभी नहीं कहेगी
रौशनी की दुकान बन्द हो जाएगी
सच्ची बात तो यह है
कि अँधेरा भी और रौशनी भी
दो बड़ी किताबें हैं
हर पन्ने पर
कुछ ना कुछ
नया लिखा मिलेगा
बंदे ने अँधेरा
बिल्कुल ही खत्म कर दिया
और अपने लिए
आफ़त मोल ले ली है
इस बारे में ज़रा सोचिएगा
आप पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं
३.
ये शहर क्या है
कब से पूछ रहा हूँ
और आप मुझे
बता नहीं रहे हैं
कि ये शहर क्या है
हो सकता है
आप को ही न पता हो
मुझे तो लगता
शहर में आना
मेरी क़िस्मत में लिखा था
मुझे पता ही नहीं चला
मैं कब यहाँ आ गया
मुझे पता ही नहीं चला
मैं कब एक अँधेरे से निकल कर
दूसरे अँधेरे में आ गया
ये क्या
पतंगें-सी उड़ाते जाओ
पेंचे लड़ाते जाओ
यही सब कुछ होता यहाँ
इस जंगल में
हर कोई शेर गैंडा हाथी या हिप्पो
बनना चाहता
कोई-कोई कुत्ते बन कर ही ख़ुश हैं
आते-जाते पर हमला करने का अपना ही मज़ा है
आपस में लड़ने
और कुत्तियों के पीछे घूमने का अपना ही मज़ा है
फिर कभी यह भी कह सकते
की हमारे जैसा कौन
हमारे पर तो बुल्ले शाह ने भी
नज़्में लिख डाली हैं
क्या गाँव चला जाऊँ
और भैंसें चराऊँ
रांझे की तरह
जोगी बन जाऊँ
रांझे की तरह
फिर आप मुझ पर गीत लिखना
रांझे की तरह
मैं भी मशहूर
और आप भी मशहूर
मेरा नाम हो जाएगा
आप नावां* कमा लेना
और क्या करूँ
ख़ुद से ही पूछ लेता हूँ
पूछ रहा हूँ
आप तो कुछ बताते ही नहीं हो
कब से पूछ रहा हूँ
आपको तो फ़ुरसत ही नहीं है
गाड़ी दौड़ाने से
*पैसा
४.
अँधेरा और बरखा
अँधेरा बरखा गा रहा है
पता नहीं गाता है या रोता है
या किसी को याद करता है
या पागल हो गया है
अपने साथ ही बातें
करता है
मैंने देखा
वह भागते-भागते आया था
गली की नुक्कड़ पर उसने साँस ली
और फिर भागता-भागता चला गया
जैसे बरखा के पीछे कुत्ते लगे हों
जैसे बरखा को कहीं पहुँचना है
और उसे देर हो गई हो
जैसे बरखा को कोई गाड़ी पकड़नी हो
बरखा गाती है
जैसे उसे गाना नहीं आता हो
कभी बरखा बहुत अच्छा गाती है
और सोचती है कि उसे गाना नहीं आता
अँधेरा साज़ बजाता है
कभी बीच में नहीं भी बजाता है
अँधेरे का कोई काम नहीं था
बस ऐसे ही यहाँ आकर बैठ गया है
अँधेरा साज़ बजाता है
उसे साज़ बजाने के लिए
किसी ने नहीं कहा था.

५.
धूप का बड़ा संदूक
बंतया
आज धूप ने
अपना सबसे बड़ा संदूक
खोल दिया था
कभी मायके से लायी थी
ये भारी बड़ा-सा ताला खुल गया
अंदर लट्टू ही लट्टू थे
मेरी आंखें चुंधिया गई
मैंने पीठ कर ली
लोग घरों से बाहर ऐसे आ गए
जैसे कोई तमाशा हो रहा हो
उन्होंने सीटियाँ मारी
बुड्ढों ने भी मारी
बुढ़ियों ने भी मारी
जो जितना लूट ले जा सकता था
लूट ले गया
कुछ लोग धूप की मोहब्बत में
गिरफ़्तार हो गए
और शायरी करने लगे
कुत्ते ने कुत्ती से पूछा
क्या सलाह है
कुत्ती हँस पड़ी
सारे कुत्तों में ख़बर फैल गई
और भों-भों होने लगी
धूप एक कुत्ती शय* है
जब वह अपना सबसे बड़ा संदूक खोलती है
माघ के महीने में
अरे लोगो आज सारे पर्दे फाड़ दो
और सारी शर्टें उतार दो
धूप इतनी मेहरबान कभी भी नहीं थी
और यह भी तो देखो
बदले में वह आपसे
कुछ भी नहीं माँग रही है.
*चतुर, चालाक
६.
धूप की कड़ाही
धूप की कड़ाही में उबाल
आ चुका है
ज़रा संभलना
थोड़ा पीछे हट जाओ
अपनी-अपनी छाँह आरक्षित कर लो
क्या पता
कल तक कितने बूटे बचें
तुम्हें याद है बंतया
कोई-कोई धूप कैसे जलती चिता-सी होती
और कोई और जैसे ततैए ही पीछे पड़ गए हों
ऊपर देख बंतेया ऊपर
आसमान की तरफ़
देखो लगता है
इस पंछी ने
हमारी बात समझ ली है
यह तो भाग चला घर को
दूर के घर को
दुश्मन मुल्कों को पार करता
वह पहुँचेगा
पता नहीं पहुँचेगा या नहीं
किसे पता
चलो पहुँच ही जाएगा
ख़ुदा सब पर ख़ैर रखें
आज सब्ज़ी के रेट भी बढ़ गए हैं
आप इस पर एक सैमीनार रखो
धूप और सब्ज़ी के रेटों के
रिश्तों के बारे में
अच्छा ना रखो
कोई और रख लेगा
यह टोपी
जो मैंने डेनमार्क से ली थी
सिर से उतार दी है
और जुराबें जो कनाडा से
ख़रीदी थीं
उतार रहा हूँ
बंतया नाव खोलो
इस शहर का सागर पार करें
और किसी दूसरे शहर चलें
कोई ख़ास बात नहीं है
बस निकल लें यहाँ से कहीं और
कोई और धूप देखें
कोई और हवा चखें
क्या कहते हो?
७.
अरे भाई
अरे भाई
बारूद की दुकान वाले
दुकान कब खोलनी
कितनी देर से खड़े हैं
तेरी राह देखते
रे भाई
बारूद वाले
आज तेरी सारी दुकान खरीद लेंगे
देखना फिर
सारा बारूद खरीद लेंगे
देखना फिर
यह सामने की इमारत ढह जाएगी
और शहर के सारे लैंप-पोस्ट भी
सारी झालरें गिर जाएँगी
और सारी मशहूरियाँ जल जाएँगी
सारे तोते उड़ जाएँगे
और सारे तालाब कम पड़ जाएँगे
जब यह फटेगा
और बहुत कुछ ढह जाएगा
काफी कुछ अंदर भी ढह जाएगा
बहुत कुछ ढह जाएगा
तेरी दुकान भी नहीं बचेगी
और यह रास्ता भी नहीं बचेगा
जहाँ से चल कर
मैं तुम्हारी दुकान तक आया.
कवि, आलोचक और अनुवादक, सत्यपाल सहगल का सम्बंध भारत पाक विभाजन के फलस्वरूप विस्थापित परिवार से है. सुनाम ( पंजाब) में जन्म और सिरसा ( हरियाणा) में कालेज तक की शिक्षा, एम. ए. और पीएच. डी (हिंदी) पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से. वही हिंदी विभाग में पिछले तीन दशक से अध्यापन, वर्तमान में प्रोफ़ेसर. विभागाध्यक्ष भी रहे. लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित. प्रसिद्ध पंजाबी कवि लाल सिंह दिल की प्रतिनिधि कविताओं का हिंदी में अनुवाद. कुछ आलोचनात्मक लेखन अंग्रेज़ी में भी.
satyapalsehgal@gmail.com




कविता हमेशा वो दिखाती आई है जो दिखते हुए भी नहीं दिखता ,, सशक्त सृजन सशक्त कविताएं आदरणीय सत्यपाल जी की ,, सशक्त चिंतन को जन्म देती ।
इन कविताओं को पढ़कर कह सकते हैं कि ऐन्द्रिकता का सबसे प्रखर रूप कविता में मुखर होता है, जैसे रोशनी का धूप में। कविता यही करती है। वह जीवन को उघाड़ती है ,समेटती है और धूप में फैला देती है। इन कविताओं में धूप रोशनी और अंधकार के बीच है। यहां चील पों है। ठहाके हैं। हो हल्ला है । पतंगे हैं।संदूक है, उसमें बेशुमार लट्टू हैं। ।लेकिन सबकुछ पार्श्व में। बीच मे बीतता हुआ जीवन है ,जिसपर धूप चमक रही है।
ये कविताएं- जैसे कि तमाम अच्छी कविताएं करती हैं – भाषा की संभावनाओं को और अधिक सम्भावनावान और उदार बना देती हैं। इन कविताओं के लिए सत्यपाल सहगल जी का और प्रिय भाई अरुण देव का बहुत बहुत आभार।
अगर कुछ भी नहीं
तो बहुत बार रौशनी की याद भी
रौशनी होती है
सत्यपाल सहगल की कविताओं में अनुभूति के कई स्तर एक साथ सक्रिय होते हैं। और मानो कवि की प्रजाति का एक आम आदमी रोशनी और अंधेरे की निजी अनुभूति से पूरी दुनिया को आलोकित करने का उपक्रम कर रहा हो।
इन कविताओं में एक पकी हुई कवि-आवाज़ है। अनूठी विश्वदृष्टि, प्रतिरोध की तपिश, और ऐसा शिल्प जो मामूलीपन में अपना वैशिष्ट्य साधना जानता है।
वाह.
इन कविताओं में स्पृहणीय ताजगी है और दृष्टि के नए कोण भी।
और सारी मशहूरियां जल जायेगीं…. बढ़िया कविताएं हैं। धूप की तरह खिलीं और रात की तरह रोशन।
कविता को सबसे पहले संवेदना यानी मनुष्य के अनुभूति- तंत्र को आज़ाद करना चाहिए। ये कविताएं ऐसा ही करती हैं ।इसीलिए इनसे गुजरते हुए लगता है कि कविता से गुजर रहे हैं, कविता के बहाने कुछ और से नहीं।
ये कविताएं हमारे अनुभव को , ख़ास तौर पर उत्तर भारतीय मनुष्य के अनुभव को, अंधेरे और रौशनी की बाइनरी से आज़ाद करती हैं। ये कविताएं रौशनी की तानाशाही को चकनाचूर कर देती हैं। तमसो मा ज्योतिर्गमय के सूत्रीकरण को अप्रासंगिक बना देती हैं। ये कविताएं अंधेरे के आँचल में थकान मिटाती मनुष्यता पर विपत्ति की बरसती रौशनी की मिसाइलों को चुपके से इधर उधर कर देती हैं । जैसे कहती हैं, बीच से हट जाओ, धूप आने दो।
अँधेरा बरखा गा रहा है, यह पंक्ति किसी महाकाव्यात्मक प्रेमाख्यान जैसी गूंजती है।
सत्यपाल सहगल की कविताओं में निसर्ग और सर्ग के बीच धड़कता हुआ जीवन है। जीवन में व्याप्त सुख-दुख, अंधेरे-उजाले को देखने की एक संवेदी दृष्टि इन कविताओं में अनुभूत की जा सकती है। सहगल बिम्ब रचते नहीं, बल्कि सोचते ही बिम्बों की भाषा में हैं। मनुष्य और प्रकृति के सामान्य कार्य-व्यवहार को भी उनकी दृष्टि बिम्बों के रूप में देखती है। उनकी निगाह में आते ही धूप कभी कंघी, कभी संदूक तो कभी कड़ाही बन जाती है।
सहगल संबोधनधर्मी कवि हैं। कभी वे आत्म से संबोधित होते हैं, तो कभी बारूद बेचने वाले को चेतावनी देते हैं,
” जब यह फटेगा
और बहुत कुछ ढह जाएगा
काफी कुछ अंदर भी ढह जाएगा
बहुत कुछ ढह जाएगा
तेरी दुकान भी नहीं बचेगी
और यह रास्ता भी नहीं बचेगा
जहाँ से चल कर
मैं तुम्हारी दुकान तक आया।”
इन कविताओं का अभीष्ट पाठक की संवेदना को उन निर्जन कोनों-अँतरों में ले जाना है, जहाँ सामान्य जन की दृष्टि की सीमा समाप्त हो जाती है। समय के बीहड़ सवालों को भी काव्यात्मक भाषा में कह सकने का शिल्प सहगल की कविताओं को अलग रंगत देता है। बाहर के अंधेरे और भीतर के उजाले की तलाश करती उनकी कविताएँ मनुष्य को थोड़ा और मनुष्य बनाने की कोशिश करती हैं।
कुमार अम्बुज
इतनी अच्छी कविताएँ लंबे समय के बाद मिलीं। जैसे कहीं थीं, मिल नहीं रहीं थीं और मिल गईं। और सातों सुंदर। जैसे सात रंग। कुछ कम ज़्यादा होकर किसी एक रंग के सात रंग- मनुजधनुष। जीवनधनुष। इन्हें दुबारा पढ़ना भी हर बार जैसे दूसरा अनुभव है। यानी तीसरा, चौथा भी। कितने दिनों बाद कविताओं ने गिरफ़्तार कर लिया है।
सत्यपाल जी को बधाई, धन्यवाद।
और अरुण को धूप के
भित्तिचित्र हैतु।
भाषा ताज़ा हो उठी है और भाषा अनुभूतियों के कितने अलग अलग स्तरों में रूपायित हो गयी है। कितने विलक्षण दृश्य खींचे हैं कवि ने। कितना नया दृष्टिकोण दिया है। सौंदर्य और विचार एक साथ प्रगाढ़। हार्दिक शुभकामनाएं और सलाम कवि को। शुक्रिया समालोचन
जीवन को ऐसे भी महसूस किया जा सकता है।सहगल जी की कविताओं ने मुझे अभी सलीकेमंद बनाया।कवि और समालोचन दोनों को बधाई ।
क्या कविताएं हैं! अद्भुत, कितनी सरस, मीठी। इनमें स्वर कितने धीमे हैं, कोई शोर नहीं, एक शांति है, उनींदापन है, आराम है। बहुत बधाई कवि ,अरुण सर को भी जो ख़ालिस सोना चुनकर लाते हैं। एक अरसे बाद पढ़ीं ऐसी कविताएं।
सादी बोली से बुनी, अर्थो में समुद्र सी गहराई लिए ये कविताएं एकदम नहीं शहद की तरह धीरे धीरे उतरती हैं. धूप की ऐसी अनोखी चित्रपूर्ण व्याख्या कमाल है। सहगल जी की ये सातों कविताएं दिल में उतर गईं.,
युद्ध के जनक अरे भाई बारूद वाले…
क्या बात है।
दूकान आजकल खूब चल रही है….न और सबकुछ ढह रहा है. 🙏🏿
बिना किसी जटिल अलंकार के गहरी संवेदना और विचार वाली दृश्यात्मक कविताएं।
आज सब्ज़ी के रेट भी बढ़ गए हैं
आप इस पर एक सैमीनार रखो
धूप और सब्ज़ी के रेटों के
रिश्तों के बारे में
अच्छा ना रखो
कोई और रख लेगा
आजकल के हालात को देखते हुए यह कविता संवाद को संपन्न करती नजर आ रही है। कवि गवाही दे रहा है हमारे आपके बारे में कि यह समय किस ओर ले जा रहा है। इन पंक्तियों को पढ़ना, अपने चुने गये रास्तों के बारे में पुनर्विचार करना होगा। अगर आप करना चाहते हो तो अन्यथा कवि तो कह गया कि आप पढ़ें लिखे हो जरा सोचो।
बहुत ही सघन , अनौपचारिक और गहन एंद्रिकता से भरपूर कविताएं हैं।एक लम्बे समय के बाद सत्यपाल सहगल जी को पढ़ा।
क्या ही सुन्दर कविताएं! इन कविताओं को पढ़ना व्यक्तिगत अनुभवों को नई दृष्टि देना है। आंतरिकता और ऐंद्रिकता का अद्भुत सम्मिलन।
बहुत खूब
अति सुन्दर