नमस्ते,
इस पूरे साल कविताएँ न तो कहीं प्रकाशित हुईं और न ही लगभग लिखी गईं. लगातार चीज़ें परेशान करती रहीं ऐसी स्थिति में बहुत कुछ से विशेषकर ‘उत्तर-भारतीय सदाबहार कवियों और कविता’ से भागने-बचने की कोशिश में रहा. यह साल मेरे लिए बहुत अधिक क्षतिग्रस्त निर्णयों, असफल योजनाओं, बीमारी और लगातार बीमारियों, मानसिक असफलताओं, धैर्य और महानगरीय ऊब से भरा साल रहा है. इन दिनों लगातार नींद न आने से बनी बीमारियाँ, दवाइयाँ, तंगी और लगातार अजीब सी एंग्जाइटी दौड़ती रहती है.
इस साल के नवम्बर-नवम्बर तक कुछ न लिखने के बाद मेरे भीतर अंततः एक अधैर्य आ रहा था, बहुत कुछ कह देने की छटपटाहट थी. ये कविताएँ उसी अधैर्य की कविताएँ हैं. सब मैं किसी सहानुभूति की आकांक्षावश नहीं कह रहा बल्कि ये सब इन कविताओं के सन्दर्भ-तत्त्व और बीज-पानी हैं जिनका आपसे उल्लेख मैं अपनी संतुष्टि के लिए कर रहा हूँ.
सत्यव्रत रजक
प्रिय सत्यव्रत,
जब सब जगहों से कहना असंभव हो जाता है तब हम कविता में कहते हैं. कविता स्थगित कथनों की अंतिम अभिव्यक्ति है. कविताएँ टूटन, विलंब और कहे न जा सकने के दबाव से जन्मती रही हैं. अगर कहे को फिर से उसी तरह से कहें तो फिर क्या कविता? कविता ने अपने लम्बे इतिहास में खुद को इस तरह से ढाल लिया है कि उसमें कुछ भी अलग से कहना खून सुखाने जैसा कार्य है. जो अभी अस्पष्ट है, अधूरा और असहज लगता है, वही कविता का वास्तविक निवास है.
व्यक्तिगत निर्णयों के क्षतिग्रस्त होने में व्यक्तिगत अब कुछ भी नहीं है. चयन दरअसल पहले से तय की गई सीमाओं के भीतर एक अनुमति भर है. यहाँ तक की हवा भी ऐसी बना दी गई है कि वह आत्म को जीर्ण कर दे. और योजनाएं इसलिए असफल नहीं हैं कि उनमें तुम्हारी तरफ से कोई कसर रह गई होगी, किसी भी सहज, सरल, संवेदित योजना को विफल करने के लिए हर दिशा में सताएँ घात लगाए बैठी हैं, दिखाई न देने वाली, पर सर्वत्र सक्रिय. वे व्यवस्था के नाम पर काम करती हैं. नियमों की भाषा बोलती हैं. और धीरे-धीरे जीवन की संभावना को थका देती हैं. सुंदर के उमगने की कोई जगह न बची है. यह तुम्हारी असफलता नहीं. एक सभ्यता का पतन है. एक सामूहिक पराभव. सामुदायिक कल्पना का बिखरना है, जिसमें मनुष्य को मनुष्य बने रहने की गुंजाइश थी.
ऊब, अनिद्रा और अवसाद लिखने वालों के लिए समाज के स्नेहोपहार हैं. कविताएँ अच्छी हैं और प्रकाशित की जा रही हैं.
स्नेह.
अरुण देव

सत्यव्रत रजक की नई कविताएँ |
हमें जीने की लत नहीं थी
एक दिन इस ज़हालत भरी दुनिया से
हम भागना चाहे और नहीं भाग पाए
सारी ऋतुओं में मौसम की भसड़ मची थी
और हमारे भागने से दुनिया बहुत आगे थी
मुसीबतें यहाँ पूछकर भी आईं
और हमने उन्हें आने दिया
हमारे निर्णय मृत्यु के इतने नये तरीकों तक जाते थे
कि उम्मीद के अनाज में जब तक कली पक पाती
तब तक मरने में कलावादी हो चुके थे हम
एक परियोजना से उठते और दूसरे में डूब जाते थे
घड़ी कहती रही यह अंधेरे का समय है
लेकिन आत्मा जानती थी कि हम किस धूप से पसीजे थे
हमें खूब रोना आया
पर इस दुर्भाग्य में क्या था
कि माँ की जगह हम आधार कार्ड खोजने लगे
बादाम और बाज़ार की दुनिया हर क्षण नोचा करती थी
चार लोग भी भीड़ थे
उससे बढ़कर वे चुनौती थे
ठस पहाड़ थे
पहाड़ पर चढ़ते-चढ़ते जब थकने लगे हम
जहाँ समतल मिला वहीं सो गए
जाते भी कहाँ
मरने कहाँ जाते
नदी हममें ही थी
हम आत्महत्या करके
नदी में नहीं डूब सकते थे
हमें जीने की लत नहीं थी
हम तो नींद की आदत खोज रहे थे
लेकिन वह क्या था
जो घोर रात में कहता था
तुम्हारे पास ज़िंदगी ही ज़िंदगी है
और अगले ही दिन थका देता था.
नींद के लिए
मनुष्य हैं
और अपनी गरिमा के लिए नींद की गोली खाते हैं
नींद की गोलियाँ नींद के लिए नहीं हैं
अगली सुबह जागने के लिए हैं
हमें आधी रात गुड़ और पापड़ साथ खाने की इच्छा जगी
हम आधी रात ख़ुद को सहमत नहीं कर पाए
जब सहमतियाँ सन्धियों में बदलने लगी थी
किसी एक का विग्रह भी कलेजे का फूल सुखा देता था
वर्जनाओं को राख देने की कोशिश तो की
आत्मा, आज्ञा और ईश्वर को जलाने की कोशिश तो की
किंतु हर ठोकर पर खाई गई चोट खारी साबित हुई
हर कील पर समय बासी कमीज़ की तरह झूल रहा था
ठण्ड़ी देह से एक गरम साँस लेते थे
आधी आँख से सोते थे
आधी आँख जागती थी पहली आँख के सोने तक.
तिल के फूल
देह तिल के फूलों का खेत होना चाहती थी
जिसपर बैठकर
नीलकंठ के जोड़े बीट करते
महोख* की आवाज़ पर बैल लोटता धूल में
शाम होते दूर हाँक देते ढोर
और फसल चरने से बच जाती.
(* महोख पक्षी या Greater Coucal जो अपनी विचित्र आवाज़ के लिए जाना जाता है)
हींग
प्यार हींग था
हमने बिखेर दिया उसे
देह रसोई थी
एक दिन उसमें हींग नहीं मिली
और उसका विकल्प भी नहीं
हम उसके इतने आदी हो गए थे
कि छटपटाकर भागे भी तो
चप्पल पहनना भूल गए.
बाद भी
(बीमारी और अन्य बीमारियों से उकताकर)
बहुत दिनों से जोड़ रहे थे फूल
हर फूल रोज पुराना हो रहा था
बहुत अधिक कोशिश और कम कामना के बाद भी
बहुत अधिक प्रेम और कम जीवन के बाद भी
हमने पाया
सामने की खिड़की से टकराकर भी बगीचे में नहीं गिर सकते.
सारी नावें जिस नदी में चलती थी
जब पूरा शहर सिगरेट हो चुका था
हमें सिगरेटों से भी बू आने लगी थी
जगह-जगह पर जब कविता राष्ट्रगान पर बावन सेकण्ड खड़ी हुई थी
हम मातृभूमि में पैर बचा-बचा कर रख पाते थे
हो चुकी थी जहाँ पंक्ति-पंक्ति तक तांत्रिक
हम अपना ताबीज स्वयं ही भरना सीख चुके थे
जैसा कि उन्होंने कहा बहुत अच्छा पैसा लेकर बहुत अच्छी कविता लिख देंगे. हमने उस चलती नाव से पैर वापस किए. पूँजी ने हमसे बहुत कुछ कहा उस दिन और उपसंहार ये था कि कवियों वाले कपड़े पहनने चाहिए. हम उधार के साहसी नहीं थे तो उस नाव से भी पैर वापस कर लिए.
हमारा मोटा-मोटा हिसाब था कि हमें कविता का जीवन चाहिए था कविता की ऋतुएँ और कविता की ही मृत्यु चाहिए थी. हम बहुत अधिक जाली और लगभग सदाबहारों से पीड़ित थे. हमने सब नावों में झाँका. राजधानी की तो नदी प्रदूषित थी.
सारी नावें जिस नदी में चलती थी वह उत्तर भारतीय कवियों के मैले से गाढ़ी हो चली थी.
अब हम दूर(?) से देखते हैं यह नदी किस समुद्र में जा रही है.

संक्रमण के साथ-साथ
एक दीवार को दस तरीकों से देखकर हम थक जाते थे
एक रंग को और किस रंग से देखते
रोज एक कोमल बिल्ली हमारे भीतर ऊँघती थी और पूछती थी
बहुत अधिक योजनाओं और बहुत सतही अभिलाषाओं में गिरकर जो भी मिला
पर इस मृत्युपरक दूब में बार-बार पानी देकर क्या मिला
सूखे गुलमोहर को धूप की घानी दिखाकर नहीं मिला कुछ
इस अनमन्यस्यकता पर शुभकामनाएँ पाकर क्या मिला
हमारे पास जो उत्तर थे
वे इतने हावी हो चले थे कि जीये जाने से असंतुष्ट थे और मर जाने से असहमत
मेघों ने मेघों में टूटना मना किया जब
विवेक भी विवेकों से उकता चुका था
पीठ पर पानी के कोड़े फूटते थे
देह तब देहों में टूटने लगती
जब चलते-चलते गिर जाते पसंदीदा कवि की पंक्ति खींचती थी हमें
उदास मछली के आँसू हमारे ख़ून में गिरते थे
फिर भी हम जीने का साहस खोज लाते थे
जबकि निराशा के विलोम के भरोसे हम कभी नहीं रहे
असल में जो हमें डराता था
उससे हम ऊब चुके थे
कई-कई बार
कंडाल चुके थे
जिनमें फूले उनमें सूख चुके थे
जब पूरा शहर सो जाता था
अंधेरे में एक गुड़हल की तरह खिल जाती थी पूरी देह
हम देह को चूमते थे
जीवन को हृदय से लगाते थे
हमारे घुटनों पर खरगोश दौड़ने लगते थे
जीने से खुश हो बैठते
लेकिन सवेरा होते ही
ऐसा उबाल आता था
कि ज़िन्दगी को कभी माफ़ नहीं कर पाते थे
हमारे सपनों में ईश्वर टट्टू की शक्ल में सोने की रेल खींचता रहता था. दूध के मालपुए खाता था और चाँदी की लीद करता था. हम बैठे बैठे सोचते थे कि पूँजी का रंग चमकदार क्यों हैं और यह क्या झुनझुना है जिसे पूरा देश बजाना चाहता है.
कच्चे नोट्स
हज़ार ख़ामियों के साथ एक कमी यह भी थी
कि हर कविता की हर पंक्ति के ‘हम’ में केवल ‘मैं’ शामिल था
कविता जो गुजर चुके की बात कह रही थी
गुजर रही थी
जो सब टूट चुका
सोफा उनका बना रहा हूँ
कमरे में जो भी कच्चा था
भट्टी से भागा था
आग से डरकर नहीं
भागा था वह जलकर
सोफा उनका बना रहा हूँ.
गीले नोट्स
जीवन में इतनी अधिक सूक्तियाँ थी
किसी के लिए एक पंक्ति तक नहीं मिली
जो भी कागज थे गीले हो चले थे
लगाकर उनमें आग
धुआँ ख़ुद ताप रहा था
जहाँ कहीं बची थी बारूद
आग भभक पड़ती थी कभी-कभी
बाहर की आतिशबाजी पानी-पानी खेलकर
उसको भी बुझा देती थी.
पानी की तितली
(ऐन फ्रैंक को याद करते हुए)
तुम पानी की तितली होती
इस तरह मुरझाकर तो न झरता यह कुमुद का फूल
एक आदर्श वाक्य की क़सम
तुम्हारे बिना सारी ऋतुएँ भूखी हो आई हैं
उनमें आत्मा में गरम हवा इस्पात के कारखाने की तरह चल रही है
तुम्हारे बिना एक नदी सो गई है
समूचे रक्त में
बिछाकर अपना ही शरीर
फूलों की गंध बहुत मालूम सी हो चुकी है
आसमान की छाँव बहुत तीखी हो चुकी है
क्षितिज एक घायल कूबड़ सा उभर आया
जिससे टकराकर सूरज सौ भागों में टूट रहा है
रातों का सारा नीलापन गहरी नींद घुड़कने लगा
चाँद पर परेबों ने बैठने से मना कर दिया
किसी मौसम विज्ञानी की मृत्यु का शोक जता रही हैं दिशाएँ
सब कुछ टूटे काँच की तरह चुभ रहा है नाखून में
तुम्हारी समस्त यादें
एक लकड़हारे के कंधे पर निशान बनकर लौट आई हैं
नष्ट हुई आत्मा ने भी याद किया
और जीवितों के लिए बची हुई उम्र थीं तुम
जीवन के काव्य ने भी तुम्हें पुकारा
मृत्यु का देवता भी गढ़ता रहा मिथक
और तो और समय भी अब और बूढ़ा हो चला है
घुटनों पर टेकने लगता है बदन
कभी-कभी तो उसकी एड़ियों में बुखार उतर आता है
बग़ीचे में गुमा दी था तुमने खेल-खेल में जिसे
समय अब भी ढूँढ रहा है वह घड़ी
देखो वह घड़ी अब भी पड़ी है वहीं
चमक रही है दूर से ही दिख रही है वहाँ मैदान हो चला है
लेकिन समय उसे बग़ीचे में ही ढूँढ रहा है
तुम आओ वह घड़ी उठाकर दो
शायद बग़ीचा मिल जाए उसे.
| सत्यव्रत रजक 04 मार्च 2006, मध्यप्रदेश कुछ पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित satyavratrajak@gmail.com |




यह तो कमाल हो गया आज, अरुण देव जी, क्या कविता है, आत्मा और लहू से सींची भाषा। इससे आगे सिर्फ़ कविता पड़नी है, कुछ कहना नही, और सोचना है, रजक देखने में कैसा लगता होगा। मुबारक
बहुत ही अनाकर्षक
तेजी ग्रोवर मै’म ने बेहद सारगर्भित टीप लिखी है
कविताओं में गहराई है
गुम घङी वाली कविता काफी अच्छी है
“हमें खूब रोना आया
पर इस दुर्भाग्य में क्या था
कि माँ की जगह हम आधार कार्ड खोजने लगे”
प्रिय सत्यव्रत
सबसे पहला हासिल तो तुम्हारी कविताओं का यह है कि अरुण देव से इतनी क़माल की बातें लिखवा लीं।
उसके बाद तुम्हारे शब्दों को पढ़ा। अच्छा यह हुआ कि तुम्हारी कविताओं को पढ़ते हुए उन शब्दों की याद भी नहीं आयी।
उत्तर भारतीयों आदि के प्रति तुम्हारे आक्रोश ने मुझे W B YEATS की एक ऐसी उक्ति की याद दिला दी जिसे आत्मसात करना कुछ कवियों के लिए बेहद ज़रूरी है।
कुछ ऐसा भाव उसमें था
*दुनिया से झगड़ा करने से शब्दाडंबर पैदा होता है, ख़ुद से झगड़ा करने से कविता*
मृत्यु को शिल्पित करने कई युक्तियों को साधना पड़ता है। हर सच्चा कवि अपने अपने ढंग से पहचानता है कि दुनिया में इतनी मर्मान्तक पीड़ा और हिंसा के सम्मुख खड़ा वह अपना कवि होना कवि किस मार्ग से साधता है। उसके पास चॉइस नहीं होती। न वह प्रतिरोध को चुन सकता है, न सितारों के मध्य के अवकाशों को। उसे वही लिखना है जो उसे लिखने को मिला होता है।
यहाँ तक पहुंचने में कइयों की नाव में छेद हो जाता है और उन्हें पता तक नहीं चलता।
मुझे तुम्हारी कविताओं में ऐसा बहुत कुछ दिखा जिसमें मुझे लगा तुम अपने मार्ग से आगे जाओगे, सिर्फ़ उसी अपने मार्ग से जिसने तुम्हें चुना है।
वह नाच भी मुझे इन कविताओं में दिखा जो तनी हुई रस्सी पर कवि को करना होता है। नीचे रसातल मुंह बाए खड़ा रहता है कि चूक तो जाए कवि।
वह चूक गया तो रसातल उसे अपने तर्क में समोने से पहले उसे एक मौक़ा और देता है।
रसातल भी नाना प्रकार के होते हैं।
बहरहाल, इन कविताओं को पढ़वाने के लिए Arun Dev और समालोचन का आभार।
तुम्हें कई लोग प्यार से देखते रहेंगे। उन्हें अपने युवा कवि होने की स्मृति भी हो आएगी। और इस क्षण भी वे स्वयं को परख सकते हैं कि उन्हें किस मार्ग ने चुना है।
पत्र के रूप में लिखी यह प्रस्तावना अत्यंत महत्वपूर्ण है । संभवतः इसी दृष्टि और हस्तक्षेप की वजह से किसी संपादक को इतिहास याद रखता है । आपने युवा कवि सत्यव्रत की कविता को पहचाना और प्रस्तुत किया इसके लिए साधुवाद । खूब प्रेम के साथ पढूंगा उनकी कविताएं ।
अरसे बाद शानदार कविताएं पढ़ीं l आशा है सत्यव्रत की कविताएं पढ़ते रहेंगे उन्हें बहुत शुभकामनाएं और अरुण जी का धन्यवाद
कविता के साथ प्रारंभिक संवाद ने मन मोह लिया .. अरुण जी आप महत्वपूर्ण प्रकल्प पर काम कर रहे हैं.. कविता के नैराश्य को उजालों से मिलवा रहे हैं
Arun Dev : मेरे लिए यह तय कर पाना आसान नहीं है कि युवा कवि सत्यव्रत रजक की कविताओं को पहले महसूस करूँ या उस संवाद पर ध्यान दूँ, जो एक अत्यंत संभावनाशील युवा कवि और एक स्थापित कवि-संपादक के बीच घटित हो रहा है। यह दृश्य सुखद होने के साथ-साथ एक तरह का सबक भी है कि सत्यव्रत अपने ‘कवि’ होने को लेकर कितने सजग और सचेत हैं। इन कविताओं में जो बेचैनी दिखाई देती है, संभव है वह इसी सजगता की उपज हो। युवा कवि सत्यव्रत रजक को इन कविताओं के लिए हार्दिक बधाई। हम सभी उन्हें उम्मीद से देख रहे हैं।
अपनी चाल में चलती हुई कविताएं हैं ये, और असली कविता इसी तरह सामने आती है। जबकि हिंदी में ज्यादातर युवा कवि मिलती जुलती कविताएं लिखते दिखते हैं, तब इन कविताओं का आ पहुंचना कविता पाठक के हित और हक की बात है।
ऐसी उद्गार पूर्ण आत्माभिव्यक्ति करती हुई कविताएं हैं कि एक पल को लग रहा है कविताओं को हम नहीं कविताएं हमें पढ़ रहीं हैं, सत्यव्रत को प्रेम वो और रचे और स्वस्थ रहें
कविताएं और कवि का पूर्व कथन तो महत्वपूर्ण हैं ही, अग्रज कवि का हाथ थामना, चिंताओं में साझीदार होना और उसे आवश्यकता भर दिशभास कराना और भी मन भरने वाला दृश्य है। अग्रज कवि, ‘पूर्वज कवि’ की याद दिलाते हुए भी, देर तक हाथ थामे रहते हैं युवा कवियों के।
सत्यव्रत! आपकी कविताएंँ पढ़कर स्तब्ध हूंँ। जीवट जीवन से निकली हुई हर श्वास कुछ अलग बयांँ करती है। हम सभी कमोबेश एक स्थिति से गुजर रहे हैं, उस अनसुने को दर्ज़ कर पाना एक एक शब्द को हथौड़े की तरह इस्तेमाल करना सब के वश की बात भी नहीं। रचते रहें इन्हीं बेचैनियों में एक रास्ता खुलता है…
सुंदर कविताएं हैं। सत्यव्रत ने हमेशा इंप्रेस किया है। इन कविताओं में भी खूब सुंदर इमेजेस है। बाकी तेजी मैम ने जो कहा उससे सहमति है। अपने सबसे ईमानदार क्षणों में हम बेचैन ही दिखेंगे और यह बेचैनी अलग अलग तरीकों से दिखाई देगी। यह बात सत्यव्रत को अलग करती है।
अरुण सर की लिखी भूमिका इस नाते महत्वपूर्ण है कि ऐसे संवाद अब कम होते हैं, ऐसी उदारताएं अब कम दिखती हैं और ऐसा प्रोत्साहन तो इस समय के चरित्र में भी नहीं है।
सत्यव्रत को खूब पढ़ा जाए। शुभकामनाएं
कविता की हर पंक्ति के ‘हम’ में ‘मैं’ नहीं ‘हम’ ही शामिल है, सत्यव्रत। आपकी कविता का यही सत्य वज्रपात की तरह गिरा है मुझपर इनसे गुज़रते हुए। यह अवसाद साझा अवसाद है, दोस्त। यह महानगरीय ऊब साझी है। लेकिन आज ही कहीं पढ़ा कि न लिखने के दर्द को सहने से बेहतर है लिखने के दर्द को सह लेना। आप लिखते रहें। आप उस नदी में नहीं है जिसमें सारी नावें चलती हैं। जैसा आपने ख़ुद कहा, आपके भीतर ही एक नदी है। आपका रास्ता उसी नदी से है।
आज जब सहमतियां सन्धियों में बदलने लगी हैं और हर कील पर समय बासी कमीज की तरह झूल रहा है, सत्यव्रत रजक की कविताओं में भोर की ताजा हवा के झोंके का आभास मिलता है। ये कविताएँ हमारे रचना समय का विलोम रचती हैं, जहाँ हम मरने में कलावादी हो चुके हैं और जगह – जगह पर कविता राष्ट्रगान पर बावन सेकेंड खड़ी हो गई है। विडम्बना तो यह है कि आज हम माँ की जगह आधार कार्ड खोजने लगे हैं और जीवन का मूलाधार खो गया है। धीमी मृत्यु के अनेक तरीके खोज लिए गए हैं। प्रेमास्पद ने खेल – खेल में बगीचे में जो घड़ी गुमा दी थी, समय आज भी उसे खोज रहा है। वह घड़ी वहीं पड़ी है। क्योंकि आज वहाँ बाग के स्थान पर मैदान हो गया है, इसलिए वह घड़ी दूर से ही चमक रही है। किन्तु मन उसे अभी भी बगीचे में ही खोज रहा है। स्मृति और कल्पना पर आधारित प्रेम का यह बिम्ब जीवन की उजली संभावना है, जो कविता में बदल जाती है। मंडला में अशोक वाजपेयी जी के सैयद हैदर रज़ा फाउंडेशन के कार्यक्रम में सत्यव्रत रजक ने इससे अधिक तेजस्वी कविताओं का पाठ किया था, जिसे सुनकर मुझे बेटे प्रांजल, अरुण श्री और सुशोभित सक्तावत की कविताओं की याद आ गई। एकाध जगह च्युत संस्कृति दोष लक्षित हुआ। किन्तु मानकीकरण और समरूपीकरण के इस दौर में सत्यव्रत की कविताएँ दूर से चमकती हैं और औसत लेखन का एक विपर्यय रचती हैं। वैसे इस किशोर काल में जो रोमैंटिक भाव – बोध कविताओं में परावर्तित होता है, ये कविताएँ उससे भी पराड.मुख हैं। यह आज की कविताओं के रागात्मक क्षरण या संवेदनात्मक मृत्यु मुखी होने का सूचक है। आज सूक्तियों की भरमार है लेकिन अपने लिए एक पंक्ति या मंत्र की तलाश दुष्कर है। उत्तर भारतीय कवियों की विगर्हणा में सत्यव्रत का ‘मैं’ अलक्षित नहीं है। उसे वयं बनाने की जरूरत है। कवि को हार्दिक बधाई। ‘समालोचन’ समकालीन सृजनात्मक परिदृश्य में अद्वितीय मंच के रूप में स्थापित हो गया है। यह बात मैं पूरी जिम्मेदारी से कह रहा हूँ।