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समालोचन

Home » उत्तर भारत में पंथ निर्माण और निर्गुण भक्ति आन्दोलन : अजय कुमार यादव

उत्तर भारत में पंथ निर्माण और निर्गुण भक्ति आन्दोलन : अजय कुमार यादव

by arun dev
July 10, 2026
in शोध
Reading Time: 9 mins read
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उत्तर भारत में पंथ निर्माण और निर्गुण भक्ति आन्दोलन : अजय कुमार यादव
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 उत्तर भारत में पंथ निर्माण और निर्गुण भक्ति आन्दोलन
अजय कुमार यादव

 

हिंदी में भक्तिकालीन कविता के परिवर्तनकारी स्वरूप के अदम्य आकर्षण के कारण इसके इतिहास लेखन की चर्चा थोड़ी उपेक्षित ही रही. ऐसा कह कर भक्तिकाल की कविता के महत्व को कम नहीं किया जा सकता है लेकिन यह इतिहास लेखन की एक सामान्य प्रवृत्ति की ओर संकेत है. भाषा, साहित्य और राष्ट्र संबंधी चिंतन में पिछले कुछ समय से जो परिवर्तन हुए उसने कला, संस्कृति और उसके स्वरूप के पुराने सिद्धान्तों पर कुछ मूलभूत प्रश्न खड़े कर दिए हैं. ऐतिहासिक परिवर्तनों की व्याख्या नए आधारों की तलाश कर रही है. प्रस्तुत आलेख में इन परिवर्तनों के साथ निर्गुण भक्ति साहित्य इतिहास लेखन पर पुनर्विचार के विभिन्न आयामों में से एक आयाम “उत्तर भारत में पंथ निर्माण और निर्गुण भक्ति आन्दोलन” को समझने का प्रयास किया गया है.

उत्तर भारत के भक्तिकालीन परिदृश्य में निर्गुण भक्ति एक व्यापक, प्रभावपूर्ण और दीर्घगामी आध्यात्मिक-सांस्कृतिक प्रवृत्ति के रूप में उभरती है. यह सिर्फ एक धार्मिक-आध्यात्मिक धारा नहीं थी, बल्कि मध्यकालीन उत्तर भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत विभाजनों, कर्मकाण्डों, पुराण-प्रतिपादित सत्ता संरचनाओं और धार्मिक मध्यस्थों के विरुद्ध एक सघन सांस्कृतिक प्रतिरोध का स्वर भी थी. अनेक अध्येताओं का यह मत है कि भक्ति आंदोलन की प्रारंभिक ऊर्जा, उसका आध्यात्मिक प्रतिकार-विचार और सामाजिक समतामूलक आग्रह मूलतः निर्गुण भक्ति के स्वरूपों से ही प्रसूत हुए. ‘अरूप ईश्वर’, ‘आत्म-निष्ठ मुक्ति’ और ‘जाति-विहीन आध्यात्मिकता’ की अवधारणाओं ने भक्तिकाल को एक नए विचार-संसार से जोड़ा, जिसने पहली बार लोकभाषा में, लोकरूचि के भीतर, धार्मिक अनुभवों को व्यक्त किया.

प्रस्तुत सन्दर्भ में एक जटिल प्रश्न अनिवार्य रूप से सामने आता है-जिन वैचारिक और सामाजिक तत्वों के आधार पर निर्गुण धारा ने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की, वही धारा कालांतर में क्यों और कैसे हाशिए पर पहुँच गई? क्यों वह ऊर्जा, जिसने भक्तिकाल की शुरुआत में सामाजिक-आध्यात्मिक क्रांति की संभावना पैदा की थी, आगे चलकर पंथों, मठों, गद्दियों और संप्रदायों की भीतरी राजनीति में सिमटती चली गई? निर्गुण साहित्य इतिहास लेखन की प्रक्रिया में-विशेषकर कबीर पंथ, नानक पंथ, दादू पंथ, रैदासी पंथ, दरिया पंथ आदि-के बीच चलने वाली प्रतिद्वंद्विताओं, संसाधन-संघर्षों और वैचारिक पुनर्व्याख्याओं का विश्लेषण अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है. परिणामतः संपूर्ण भक्ति आन्दोलन को समझने की कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ियाँ बिखरी हुई रह जाती हैं.

उत्तर भारत में पंथ-निर्माण की प्रवृत्ति किस विशेष बिंदु पर आरम्भ हुई,इसे निश्चित रूप से चिह्नित करना कठिन है,पर इतना स्पष्ट है कि इसने भक्ति की मूल वैचारिक शक्ति-समतामूलकता और निर्बाध आध्यात्मिक स्वतंत्रता को धीरे-धीरे सीमित कर दिया. कबीर, रैदास, दादू, नानक, नामदेव आदि के काव्य में भले मतांतरों पर आलोचना और विवाद मिलते हों, पर कुल मिलाकर उनमें एक प्रकार की वैचारिक-आध्यात्मिक तरलता दिखाई देती है. इस तरलता का अर्थ है कि निर्गुण और सगुण दोनों ही प्रवृत्तियों के तत्व उनके काव्य में परस्पर संवादरत,विनिमेय और सह-अस्तित्वशील हैं. अलग-अलग संतों की रचनाओं का समवर्ती पाठ सहज संभव था; लोक-संगीत, कीर्तन और सत्संग में भी एक ही अवसर पर अनेक संतों के पद गाए जा सकते थे. टायलर वाकर विलियम्स लिखते हैं कि

“भक्ति आन्दोलन में क्लासिकी दौर में जो प्रमुख भक्त कवि थे, वे प्राय: किसी खास सम्प्रदाय के सन्दर्भ में नहीं लिख रहे थे हालांकि निश्चित रूप से उस दौर के कुछ कवियों के काव्य में पारस्परिक द्वन्द्व या कुछ मतों सिद्धांतों की आलोचना मिलती है परन्तु विचार के स्तर पर उस दौर के सभी कवियों के बीच एक तरह की ‘फ्लुइडिटी’ (तरलता) भी दिखाई देती है. रूप के स्तर पर उनकी कविता की समानता देखकर यह समझना मुश्किल नहीं है कि इनकी रचनाओं का इस्तेमाल साथ-साथ कैसे किया जा सकता है.”1

स्पष्ट है कि इन कवियों के मध्य एक-सूत्रात्मक दर्शन-वैचारिक प्रतिपादन भी मौजूद था.

भक्ति आंदोलन के आरंभिक काल (लगभग 1400–1650 ई.) को इस अर्थ में एक “गैर-संस्थागत” अवस्था कहा जा सकता है, जहाँ भक्ति एक अनुशासित पंथ से अधिक एक खुली सांस्कृतिक लहर के रूप में उपस्थित थी. यह वह समय है जब निर्गुण और सगुण का विभाजन स्थायी सीमा-रेखा नहीं,बल्कि एक सतत संवाद है. सत्रहवीं शताब्दी के मध्य के बाद से परिदृश्य बदलने लगता है. निर्गुण-सगुण प्रवृत्तियों के बीच जो वैचारिक और साहित्यिक तरलता थी, वह क्रमशः समाप्त होने लगती है. विभिन्न क्षेत्रों में भक्ति-संप्रदाय स्वयं को अलग-अलग पहचान के रूप में स्थापित करने लगते हैं-उनके अपने मठ, अखाड़े, दीक्षा-परंपराएँ,पद-संग्रह, गुरु-परंपराएँ और अनुयायी वर्ग बनने लगते हैं. इससे न सिर्फ निर्गुण–सगुण का स्पष्ट विभाजन उभरता है, बल्कि दोनों धाराओं के भीतर भी संगठनात्मक प्रतिद्वंद्विता तीखे रूप में सामने आती है.

संप्रदायों के बीच प्रतिद्वंद्विता इसलिए भी अधिक तीव्र होती गई, क्योंकि उनके उपदेशों की मूल अंतर्वस्तु एक-दूसरे से बहुत अलग नहीं थी. सभी लगभग समान सामाजिक वर्गों-किसानों, दस्तकारों,कारीगरों, निम्न और मध्य जातियों-में अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाना चाहते थे. लगी. इस प्रतिद्वन्दिता के सन्दर्भ में वसुधा डालमिया ने लिखा है कि -”अनेक संप्रदायों के झुंड में प्रतिद्वन्दिता अक्सर इसीलिए बहुत प्रबल होती थी क्योंकि उन संप्रदायों के उपदेश एक दूसरे से भिन्न नहीं होते थे और उनके श्रोता समान समाजों से आते थे.”2 इस प्रतिस्पर्धा में बढ़त पाने और अपने प्रभुत्व को वैध ठहराने के लिए वे विविध रणनीतियाँ अपनाते हैं. व्यवहार के धरातल पर अधिक लोगों को अपनी तरफ खींचने के लिए तथा अपनी ‘हेजेमनी’ स्थापित करने के लिए ये सम्प्रदाय कई परम्पराओं को साथ लेकर चलने की कोशिश करते थे.

पंथ-निर्माण की इस प्रक्रिया का एक ठोस संस्थागत-आर्थिक पक्ष भी था. उत्तर भारत के धार्मिक संसाधनों-मठों, मंदिरों, तीर्थ-स्थलों, दान-संस्थाओं, धर्मशालाओं और सामुदायिक संपत्तियों-पर नियंत्रण स्थापित करना भी संप्रदायों के लिए आवश्यक हो गया. इससे भक्ति की मूल जनोन्मुख ऊर्जा, जो पहले अपेक्षाकृत खुली, साझा और संवादशील थी,एक संसाधन-प्रतिस्पर्धी संरचना के भीतर कैद होने लगी. रामानंदी संप्रदाय पर लिखते हुए रिचर्ड बर्गहार्ट ने मध्यकालीन उत्तर भारत में भक्ति संप्रदायों के बीच इस प्रतिद्वंद्विता की भौतिकवादी व्याख्या की है,

“अपनी अलग-अलग हिस्सों में बँटी हुई संरचना के साथ रामानंदी संप्रदाय और शेष हिंदू साधू संप्रदाय के रूप में दिखाई देते हैं जो ऐसे हिस्सों में बंटे हुए वंशों से बनते हैं, जो यांत्रिक प्रजनन से नहीं बल्कि आध्यात्मिक दीक्षा से अपने आप को बनाए रखे हुए थे और जो प्राकृतिक संपत्ति के लिए नहीं बल्कि भिक्षा के लिए क्षेत्र का शोषण करते थे. लंबे समय तक अपने सम्प्रदाय को बनाए रखने के लिए विभिन्न हिन्दू संप्रदाय तीन जरूरी साधनों पर कब्जा करते थे :शिष्य अनुयायी, तीर्थस्थान तथा तीर्थ-यात्राओं के रास्ते और राजनीतिक आश्रय. इन संसाधनों की उपलब्धता कम थी. हालांकि कुछ संप्रदाय दक्षिण एशिया के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थापित हुए परन्तु लगभग सभी आखिर में गंगा के मैदानों में फैल गए जहाँ सम्प्रदायों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि इन सीमित संसाधनों के लिए प्रतिद्वंद्विता बहुत तीव्र हो गई.”3

इस प्रकार भक्तिकाल के प्रौढ़ स्तर पर पहुँचने के बाद इन पंथों में व्यवहार के स्तर पर कई सीमाएँ और जड़तायें समाहित हो गयी जो पूर्व में उनके संतों के उद्गार में त्याज्य था.

संप्रदाय-निर्माण में ग्रंथ-संग्रह की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण थी. किसी संत की वाणी से चुने हुए पदों, श्लोकों और वचनों को संकलित करने की प्रक्रिया सिर्फ संरक्षण नहीं, बल्कि चयन और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी थी. कौन-से पद शामिल होंगे, किन प्रसंगों पर बल दिया जाएगा, किन बातों को गौण या अनुपस्थित रखा जाएगा-ये सारे निर्णय संप्रदाय के वैचारिक आग्रह और सामाजिक हितों से प्रभावित होते हैं. इस प्रकार पद-संग्रह और “ग्रंथ” धीरे-धीरे केवल स्मृति-संरक्षण का साधन न रहकर, संप्रदाय की पहचान, अनुशासन और संगठनात्मक संरचना को वैधता देने वाले उपकरण बन जाते हैं. इस संदर्भ में टायलर वॉकर विलियम्स यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि संप्रदाय-निर्माण की प्रक्रिया में ग्रंथ-संग्रह (textual canonization) और अपने प्रवर्तक गुरुओं की वाणियों के आधार पर नए आधिकारिक ग्रंथों का निर्माण अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ग्रंथ-संग्रह की यह प्रक्रिया न केवल धार्मिक सिद्धांतों को स्थायित्व प्रदान करती है, बल्कि संप्रदाय की सामाजिक पहचान, वैचारिक अनुशासन और संगठनात्मक संरचना को भी वैधता देती है.टायलर लिखते हैं कि

“इस व्यवहार के पीछे कोई उदारता नहीं बल्कि एक विशेष नीति थी इस नीति के अनुसार संप्रदाय अधिक से अधिक भक्त कवियों का और उनके साथ उनकी लोकप्रियता तथा सामाजिक आधार पर भी कब्जा करने की कोशिश करते थे.”4

यह विरोधाभास इस तथ्य से और स्पष्ट हो जाता है कि पंथों द्वारा समयानुसार संकलित किए गए ग्रंथ-कोश केवल गुरु-वचनों के संरक्षण के साधन नहीं रहे, बल्कि उनमें उन समुदायों की तत्कालीन सामाजिक आकांक्षाएँ, वर्गीय हित, लोक-इच्छाएँ और धार्मिक महत्वाकांक्षाएँ भी क्रमशः समाहित होती चली गईं. इस प्रकार नए ग्रंथों का निर्माण एक ऐसी प्रक्रिया बन गया जिसमें मूल शिक्षाओं के साथ-साथ समुदाय-विशेष की उभरती पहचान और संसाधन-राजनीति की आवश्यकताएँ भी जुड़ती रहीं.बाद में चलकर ‘पंथ निर्माण की प्रक्रिया’ में सगुण भक्त कवियों से ज्यादा निर्गुण भक्त कवियों का प्रयोग हुआ.

पंथ-निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह भी है कि समय के साथ अनेक ऐसी सीमाएँ और मान्यताएँ इन पंथों में सक्रिय हो गईं, जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष विरोध स्वयं मूल गुरु-वाणियों में मिलता है. यहीं से एक बड़ा विरोधाभास जन्म लेता है. जिन संतों ने अवतारवाद, गुरु-पूजा और मूर्ति-पूजा का खंडन किया था, वे ही बाद के अनुयायियों के लिए अवतार, गुरु-देव और स्मरणीय देवता बन जाते हैं. सत्य की सीधी खोज के स्थान पर गुरु की मूर्ति, गुरु का आसन और गुरु की गाथा अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है. इस प्रकार गुरु-पूजा, सत्य-पूजा का स्थान ले लेती है.आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इसे मूलतः पंथ-निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया से उत्पन्न संकटों का परिणाम मानते हैं. कबीर पन्थ में सोने, उठने, दातून करने, तूंबा धोने आदि के मन्त्र जपे जाने लगे. आचार्य द्विवेदी के शब्दों में,

“जिस धर्मवीर ने पीर, पैगम्बर, औलिया आदि के भजन-पूजन का निषेध किया था, उसी की पूजा चल पड़ी, जिस महापुरुष ने संस्कृत को कूपजल कहकर भाषा के बहते नीर को बहुमान दिया था उसी की स्तुति में आगे चलकर संस्कृत भाषा में अनेक अग्नि-तुल्य वाणियाँ कहीं, उसकी उन्हीं वाणियों से नाना बाह्याचारों की क्रियाएँ सम्पन्न की जाने लगीं.”5

भारतीय समाज से रुढियों का बहिष्कार जिस क्रांतिधर्मी रूप से निर्गुण वाणी में हुआ था कालान्तर में वहीं त्याज्य आचार उन संतों के अनुयायी अपनाने लगे और संकट ये कि उन संतों के नाम पर ही यह किया जा रहा था.

यह भी इस सन्दर्भ में विचारणीय है कि, “एक ओर छोटे-बड़े सम्प्रदायों, पन्थों, मठों और गद्दियों की स्थापना होने लगी, दूसरी ओर सन्त खुद को अवतार घोषित करने लगे. गरीबदास ने अपने को कबीर का गुरुमुख शिष्य बतलाया तो चरणदास ने शुकदेव मुनि का. दरियासाहब (मारवाड़ वाले) दादू साहब के अवतार माने गए तो दरियासाहब (बिहार वाले) दूसरे कबीर कहे जाने लगे. प्राणनाथ के पुराने धर्मग्रन्थों के हवाले देकर बतलाया कि वे कल्कि अवतार है. इसी के साथ सन्तों की बानी में सहजता के बजाय कृत्रिम कलात्मकता की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई देती है. रीतिकाल के प्रभाव में चित्रकाव्य तक लिखे गए. सन्त साहित्य के नाम पर केवल निस्सार पहेली-बुझौवल और पिष्टपेषण शेष रह गया.”6 इस तरह अवतारवाद की स्थापना, विशेषकर सगुण मान्यताएँ ही इन निर्गुण संतों के अनुयायियों के मध्य स्थापित हो गयीं. मध्यकालीन मठों और गद्दियों में चलने वाली यह “अवतारीकरण” प्रक्रिया निर्गुण की मूल क्रांतिकारी चेतना को भीतर से निष्प्रभावी करती है. संतवाणी की सहजता,बोलचाल की भाषा, लोकमुहावरे और प्रत्यक्ष जीवनानुभव-ये सब धीरे-धीरे जो अपने आरंभिक चरण में प्रतिरोध और समता की जनभाषा था. उसकी क्रांतिकारी ऊष्मा धीरे-धीरे जड़ता, संकीर्णता और संगठनात्मक स्वार्थ के बोझ तले दबने लगती है.

संत साहित्य की इस अधोगति पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आचार्य द्विवेदी ने लिखा है,

“अठारहवीं, शताब्दी के सन्तकवियों में गतानुगतिका की मात्रा बढ़ती गई और सम्प्रदाय स्थापना की स्पर्धा उत्तरोत्तर चढ़ाव पर ही रही. जो सन्तकाव्य जगत् के समस्त आडम्बरों को ध्वस्त करके सहज भगवद्प्रेम का पथ प्रशस्त करने का व्रत लेकर चला था, वह अन्त तक साम्प्रदायिक प्रतिद्वन्द्विता, निरर्थक प्रहेलिका-क्रीड़ा और व्यर्थ के शब्दजाल का शिकार हो गया. अठारहवीं शताब्दी के अन्त तक उसकी क्रांतिकारी भावना समाप्त हो गई और वह भी अन्य निहित स्वार्थ वाले मठों के समान अपने ही बनाए बन्धनों में क्रमशः जकड़ता गया. जिन लोगों ने माया को ललकारने का साहस किया था उनके अनुयायी माया के घरौंदों में बन्द हो गए. आखिरी खेवे के सन्तों में भक्तिभावना और धर्मबुद्धि कितनी मात्रा में थी, यह बता सकना कठिन है. पर सहज मार्ग पर पड़ी रहने वाली गन्दगी को दूर करके सहज सत्य तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए जिस श्रेणी के साहसिक मनोभाव की आवश्यकता होती है वह क्रमशः क्षीण होता गया और इसीलिए वे ऐसे साहित्य की सृष्टि न कर सके जो मनुष्य को नया आलोक देता है और कठिनाइयों और विपत्तियों से जूझने की प्रेरणा देता है. यह साहित्य केवल शाब्दिक मायाजाल प्रस्तुत करता है और मनुष्य की स्वतन्त्र चिन्तन शक्ति को अवरुद्ध करता है.”7

निर्गुण संतों की वाणी को उस रूप में बाद में अपनाने के लिए उनके अपने पंथ सहज नहीं रह गये जिस रूप में वे उन संतों के विचारों में अनुस्यूत थे. कर्मकांड और आचार की संकीर्णताओं की सहज व्याप्ति इन पंथों में होती गई.

निर्गुण सन्तों की पंथ निर्माण में कोई रुचि नहीं थी, पर उनके परवर्ती अनुयायियों ने ऐसा नहीं समझा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने लिखा है कि “यद्यपि कबीर आदि निर्गुण संतों ने सिद्धान्त रूप से अवतारवाद का खण्डन किया है फिर भी इनमें सन्देह नहीं है कि इनके अनुयायियों ने इन्हें अवतार बना डाला और सत्य की पूजा करने के बदले वे उन्हें अवतार बनाकर उनकी स्मृति की पूजा करने लगे जिस बात का इन संत महात्माओं ने विरोध किया उनके नाम पर चलने वाले सम्प्रदायों ने इस बात को उन्हीं के व्यक्तित्व के साथ जोड़कर प्रकारान्तर से स्वीकार कर लिया.”8 अवतारवाद सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा क्योंकि इसी के साथ अन्य संकीर्णताओं का समवेश हो गया. निर्गुण भक्ति का अपना अलग स्वरूप तिरोहित हुआ और वह सगुण का ही पर्याय बनने लगा.

उदाहरण के लिए अठारहवीं शती के प्रारम्भिक दौर में कबीरपंथ जैसी कोई परम्परा नहीं थी. ‘दास्ताने मजाहिब’ जो कि 17वीं शती के मध्य की रचना है उसमें कबीर और उनके अनुयायियों का विवरण है लेकिन उसमें भी कबीरपंथ जैसे किसी ‘टर्म’ का प्रयोग नहीं किया गया है. 18वीं शती के उत्तरार्ध और 19वीं शती में प्रारम्भिक दौर में व्यवस्थित ‘कबीर पंथों’ का उदय हुआ. यहाँ ‘पंथों’ शब्द का प्रयोग इसलिए किया जा रहा है क्योंकि सबसे पहले कबीर पंथ का उदय कब और कैसे हुआ इसके बारे में कोई निश्चित प्रमाण नहीं है. एक अनुमान के मुताबिक उत्तर-भारत में एक ही साथ कई ‘कबीर पंथ’ अस्तित्व में आए होंगे. उन सभी में कबीर के असली अनुयायी घोषित करने की होड़ लगी होगी और इसी प्रक्रिया में कबीर को संत से ‘अवतार’ घोषित कर दिया गया. कबीर को अवतार घोषित करने वाली पहली पुस्तक ‘अनुराग सागर’ है जो छत्तीसगढ़ी पंथ के अंतर्गत लिखी गयी है, यह‘कबीर और धर्मदास” के बीच संवाद शैली में लिखी गयी है. अनुराग सागर” (जिसे अमृत सागर या सतसागर भी कहा जाता है) का सटीक रचनाकाल स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, क्योंकि यह ग्रंथ कबीर-पंथ की मौखिक और पांडुलिपि परंपरा से विकसित हुआ है. सबसे पुरानी पांडुलिपि 17वीं सदी के उत्तरार्ध की पाई गई है.

इसी प्रकार 17वीं शताब्दी के अन्त तक दादू के अनुयायी राजस्थान में अलग-अलग जगहों पर बिखरे हुए थे. डैनियल गोल्ड के अनुसार 17वीं शती के मध्य तक दादू एक सूफी सन्त के रूप में और नारायणा (जयपुर) में जो दादू की मस्जिद स्थित है वह दरगाह के रूप में प्रसिद्ध थी. 17वीं शती के अन्त में अचानक से एक ‘जैतराम’ नामक व्यक्ति दादूपंथियों के बीच एक चमत्कारी व्यक्तित्व के रूप में अपने आपको स्थापित कर लेते हैं और नारायणा की गद्दी पर लगभग एक दशक तक प्रमुख बने रहे.9 दादूपंथियों ने तो ब्याज पर पैसे देना एक व्यवसाय के तौर पर अपना लिया था. इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है.10

वस्तुतः पंथ निर्माण की प्रक्रिया 17वीं शताब्दी के बाद से तीव्र गति से चल पड़ी. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने लिखा है कि

“निर्गुण पंथ के अन्तर्गत सम्प्रदायों का एक जमघट सा लग गया. इन्हीं में से कुछ का नाम कबीरपंथ, दादूपंथ, नानकपंथ. कबीरशिष्य जग्गूदास द्वारा प्रवर्तित जग्गापंथ, जगजीवनदास का सतनामी पंथ, मारवाड़ी दरिया की दरियापंथ, हाथरस का शाही पंथ तथा शिवदयाल का राधास्वामी पंथ.’ अंतिम दो निर्गुण पंथ की बहुत आधुनिक शाखाएँ हैं. उपर्युक्त विविध पंथ, पृथक धार्मिक सम्प्रदायों के रूप में, निर्गुण पंथ के सिद्धांतों के उतने ही विरुद्ध है जितने वे साधारण धर्म जिनकी निर्गुणियों ने भरपूर निन्दा की.”11

जाहिर है परवर्ती निर्गुणियाँ संत की पंथों और मठों के प्रति इस विरोध-भाव का गहरा सम्बन्ध नए पंथों के संकीर्ण साम्प्रदायिक रूप से था. “पंथ निर्माण की प्रक्रिया के मूल में मिथों और जनश्रुतियों के माध्यम से संतों के चमत्कारिक एवं अवतारी चरित्र का निरूपण भी है.”12  संतों का स्वर प्रतिगामिता के विरोध स्वर का स्वर था लेकिन कालान्तर में यही संत चमत्कारवादिता के कर्मकाण्ड में बंधे हुए दिखते हैं. पंथों के स्वरूप उनके मूल स्थापनाओं से भिन्न तथा संकीर्ण स्पष्ट रूप से आज व्यवहृत है.

इन सभी बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करने पर इससे एक और प्रश्न सामने आता है जिसे कई विद्वानों ने रेखांकित किया है कि इस पंथ निर्माण की प्रक्रिया के कारण ही भक्ति आन्दोलन का पतन हो गया. भक्ति आंदोलन-विशेषतः निर्गुण धारा के अवसान और असफलता की बहुस्तरीय व्याख्याएँ सामने आती हैं, जो साहित्येतिहास लेखन को एक नए दृष्टिकोण की ओर ले जाती हैं.

यहाँ एक मौलिक प्रश्न अनिवार्य रूप से उपस्थित होता है- क्या किसी आंदोलन का पतन केवल बाहरी दबावों (जैसे सामंतवाद, धार्मिक शक्ति-संरचना, या राजनीतिक परिवर्तनों) से होता है?या फिर वह अपने भीतर उत्पन्न विकृतियों, संगठनात्मक कठोरता, और वैचारिक विघटन से भी प्रभावित होता है? और अंततः, क्या भक्ति आंदोलन को एकरेखीय रूप से “असफल” कहा जा सकता है?

मैनेजर पांडेय ‘कबीर मंसूर’ नामक पुस्तक की चर्चा करते हुए लिखते हैं कि “कबीर पंथ में कबीर के विचारों के दुर्गति के इतिहास से साबित होता है कि कोई क्रान्तिकारी विचारधारा विरोधियों की आलोचनाओं से नहीं मरती, वह इतिहास प्रक्रिया से बेखबर अनुयायियों की अंधश्रद्धा, कट्टरवादिता और महत्वाकांक्षा से मरती है.”13

इस पूरी प्रक्रिया को सिर्फ “अनुयायी की गलती” कहकर छोड़ देना भी पर्याप्त नहीं है. यह कहना कि निर्गुण आंदोलन की असफलता का कारण केवल उसके अनुयायी थे एकअर्थी निष्कर्ष हो सकता. यह एक कारण अवश्य है, परंतु ‘एकमात्र’ नहीं. हालाँकि बाद में मैनेजर पांडेय इस संदर्भ में ‘विरोध, विकृति और समाहार’ की ऐतिहासिक प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं. इस क्रम में उन्होंने डी.पी. मुखर्जी के हवाले से अपना मत व्यक्त करते हुए लिखा है कि

“भक्ति आंदोलन की सभी धाराओं, विशेषकर निर्गुणधारा की परवर्ती परिणति से यह सिद्ध होता है कि सामाजिक संरचनाएँ और सांस्कृतिक परम्पराएँ प्राय: साहित्यिक प्रवृत्तियों एवं परंपराओं से अधिक शक्तिशाली होती है. जिस वैदिक पौराणिक परम्परा और उससे पोषित सामाजिक व्यवस्था के विरोध में निर्गुण धारा आगे बढ़ी थी, वह परंपरा अधिक स्थाई साबित हुई.”14

गजानन माधव मुक्तिबोध इसे असफल आन्दोलन कहते हैं. निर्गुण भक्ति आन्दोलन की प्रगतिशील भूमिका की चर्चा करते हुए गजानन माधव मुक्तिबोध सगुण भक्ति शाखा की पुराण-प्रतिपादित शास्त्रवादी भूमिका की ओर संकेत करते हैं. निर्गुण भक्ति आन्दोलन की असफलता के मूल में वे रामभक्ति-शाखा की प्रतिक्रियावादी मूल्यों को दोषी ठहराते हैं. उन्होंने लिखा है कि

“तुलसीदास ने भी निम्नजातीय भक्ति की किन्तु उसको अपना सामाजिक दायरा बतला दिया. निर्गुण मतवाद के जनोन्मुख रूप और उसकी क्रान्तिकारी जातिवाद विरोधी भूमिका के विरुद्ध तुलसीदास जी ने पुराण मतवादी स्वरूप प्रस्तुत किया.”15

मुक्तिबोध सवाल उठाते हैं कि

“क्या यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि रामभक्तिशाखा के अन्तर्गत एक भी प्रभावशाली और महत्त्वपूर्ण कवि निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया.”

और

“रामभक्तिशाखा के अन्तर्गत एक भी मुसलमान और शूद्र कवि प्रभावशाली और महत्त्वपूर्ण रूप से अपनी काव्यात्मक प्रतिभा विशद नहीं कर सका?”16

जातिगत आधार पर किसी पूरी की पूरी जाति को प्रतिक्रियावादी तत्त्वों का पोषक सिद्ध करना एक दूसरी तरह की अतिवादिता का शिकार होना होगा. ऐसी असमानताओं के पीछे जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक कारण निहित थे, न कि केवल जातिभेद पर आधारित कोई एक-रेखीय तर्क. नाभादास का उदाहरण यही बताता है कि सामाजिक संरचनाएँ साहित्यिक प्रवाहों को सरल श्रेणियों में विभाजित नहीं होने देतीं- नाभादास स्वयं शूद्र (परंपरा अनुसार) होते हुए भी वैष्णव-रामभक्ति के केंद्रीय कवि बने. इसलिए मैनेजर पाण्डेय, मुक्तिबोध से भिन्न मत रखते हैं. उनके अनुसार,

“आधुनिक भारतीय भाषाओं और साहित्य के विकास में भक्ति आंदोलन का योगदान देखते हुए यह कहना उचित नहीं कि वह पूरी तरह विफल हो गया; हाँ सामाजिक लक्ष्य अवश्य अपूर्ण रह गए.”17

निर्गुण आंदोलन की असफलता पर के. दामोदरन आर्थिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं. उनके अनुसार

“यदि यह आन्दोलन सदा के लिए सामाजिक असमानताओं और जाति-प्रथा से उत्पन्न अन्यायों को खत्म नहीं कर सका तो संभवतया इसका कारण यह था कि कारीगर, व्यापारी और दस्तकार जो कि इस आंदोलन का मुख्यतया आर्थिक आधार थे, अब भी कमजोर और असंगठित थे. और इससे पहले उदीयमान पूंजीपति वर्ग एक वर्ग के रूप में अपना पूर्ण विकास प्राप्त करे, ब्रिटिश पूंजीपतियों ने देश जीतकर अपने कब्जे में कर लिया और ब्रिटिश साम्राज्य का एक अंग बना लिया.”18

यद्यपि दामोदरन की यह मान्यता आज सर्वस्वीकृत नहीं है, परंतु निर्गुण आंदोलन की सामाजिक-आर्थिक जड़ों को समझने में यह बहुत उपयोगी सिद्ध होती है. पूँजीवाद के पूर्वगामी तत्त्व अभी इतने विकसित नहीं हुए थे कि वे सामन्तवाद के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई चला सकें. निर्गुण भक्ति का आधार वही कारीगर, दस्तकार, व्यापारी और निम्न-मध्यवर्गीय समूह थे जिनकी आर्थिक-राजनीतिक संगठित शक्ति बहुत सीमित थी. इन वर्गों के पास इतना स्थायी संसाधन-आधार नहीं था कि वे एक वैकल्पिक सामाजिक व्यवस्था के रूप में स्वयं को संस्थागत कर सकें. इससे पहले कि कोई स्वदेशी पूँजीपति वर्ग अपनी वर्ग-चेतना के साथ उभरता, औपनिवेशिक पूँजीवाद ने पूरी आर्थिक संरचना को ही बदल देना शुरू कर दिया. परिणामस्वरूप निर्गुण भक्ति की वर्गीय-जनाधार वाली संभावनाएँ पूरी तरह विकसित न हो सकीं.

इस परिप्रेक्ष्य में इतिहासकार हरबंश मुखिया ने भी विचार किया है. दादू साहित्य का विश्लेषण करते हुए प्रो. मुखिया ने लिखा है कि ‘परवर्ती भक्ति आंदोलन का  चिन्तन विरोध का नहीं, अधिक से अधिक उदासीनता का, समाज के टकरावों से बचने के चिंतन का है.’19 मार्क्स के उद्धरण द्वारा वे यह भी बताते हैं कि परिवर्तन तभी संभव होता है जब कोई उदीयमान वर्ग संपूर्ण संरचना को उखाड़ फेंकने की परिस्थिति में हो और ऐसी परिस्थिति मध्यकालीन उत्तर भारत में उपलब्ध नहीं थी. जब कोई उदीयमान वर्ग संपूर्ण व्यवस्था को बदलने की स्थिति में नहीं होता, तो उसकी आध्यात्मिक–सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ भी धीरे-धीरे समझौते और आत्मसातीकरण की दिशा में बदलती हैं.

भक्ति-साहित्य का दरबारीकरण एक और आयाम है जिससे इस आत्मसातीकरण को समझा जा सकता है. लोकभाषा काव्य जब तक लोक-जीवन, गाँव–कस्बों, सत्संग–चौपाल और जन-संघर्षों से जुड़ा रहा, तब तक उसमें सामाजिक ऊर्जा और प्रतिरोध का स्वर मजबूत रहा. जैसे-जैसे यही काव्य दरबारों, राजसभाओं और उच्चवर्गीय संरक्षण के क्षेत्र में प्रवेश करता है, वैसे-वैसे उसकी भाषा, विषय और दृष्टि बदलने लगती है. भक्ति धीरे-धीरे राजाश्रित सौंदर्यशास्त्र का हिस्सा बनती है, न कि जन-संघर्षों की अभिव्यक्ति.

उत्तर भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण दिशा यह भी है कि वह लोक में संतुलनवादी दृष्टि स्थापित करने के क्रम में आस्था जैसे लोक-लुभावना शब्दों का सहारा लेता है. पंथ भी इसी क्रम में लोक लुभावना रूपों में बदलते हुए दिखाई पड़ते हैं. इन सबके बीच निर्गुण भक्ति और सगुण भक्ति के पारस्परिक संबंधों को समझना भी जरूरी है. सगुण धारा के भीतर मंदिर-संस्कृति, सामूहिक कीर्तन, भावनात्मक भक्ति और लोक-भागीदारी ने निश्चित रूप से एक प्रकार के धार्मिक लोकतंत्र को जन्म दिया. आम भक्त, जो पहले मंदिर की बाहरी परिधि तक सीमित था, अब भजन, कीर्तन, कथा और पर्वों के माध्यम से “अंदर” आ जाता है. परंतु इस लोकतंत्रीकरण के बावजूद जातिगत भेद, अस्पृश्यता और सामाजिक बहिष्कार की संरचनाएँ मूलतः यथावत रहती हैं. इस प्रकार निर्गुण और सगुण दोनों धाराओं के बीच अंतर्संबंध, अंतर्विरोध और पारस्परिक रूपांतरण को केवल घटनाओं की शृंखला नहीं, बल्कि एक गहरी दार्शनिक–सामाजिक प्रक्रिया के रूप में समझना आवश्यक है. यह प्रक्रिया ही भक्तिकालीन आध्यात्मिकता के स्वरूप को निर्धारित करती है और उत्तर भारतीय समाज की आधुनिकता-बोध पर भी गहरा प्रभाव डालती है. हाँ, यह जरूर है कि निर्गुण धारा ने समतामूलकता, अरूप ईश्वर और जाति-विरोध को जिस पैमाने पर प्रतिपादित किया, सगुण धारा वैसा नहीं कर पाई. बल्कि कई बार वह वर्णाश्रम को नए रूप में वैधता देती दिखाई देती है. सगुण भक्ति धारा अपनी शास्त्रवादी मान्यताओं में ही हेर फेर के साथ नई उर्जा के साथ अपनी जगह बनाता हुआ दिखता है. यह कहा जा सकता है कि भक्ति काल का अंतिम क्षरण, मूलतः निर्गुण भक्ति के क्षरण का ही ऐतिहासिक समांतर है. इसलिए निर्गुण परंपरा के भीतर उत्पन्न वैचारिक विचलनों, सामाजिक प्रभावों और संस्थागत सीमाओं को समझे बिना भक्ति काल के अवसान की ठोस व्याख्या संभव नहीं.

पंथों के निर्माण का एक सकारात्मक पक्ष भी है जिसके योगदान को इस विमर्श में नकारा नहीं जा सकता वह यह है कि आज भी समाज में इन संतों की वाणी गूंज रही है तो उसका श्रेय इन पंथों को अवश्य ही देना चाहिए. कहना न होगा कि समस्त उत्तर भारत के मानस निर्माण में इस वाणियों का महत्वपूर्ण योगदान है. यदि ये पंथ न बनते तो सत्ता वर्चस्वादिता के क्रम में ऐसे संतों का स्वर धूल-धूसरित हो जाता तथा इन संतों के स्वरों को पुनर्प्राप्त करना एक दुष्कर कार्य हो जाता. ऐसे में इन पंथों ने ही भक्तिकालीन संतों के स्वरों को भले ही विकृत रूप में किंतु सहेजने और प्रसारित करने का कार्य किया.

निष्कर्षतः निर्गुण भक्ति-आंदोलन की यात्रा इस दृष्टि से,भारतीय समाज में चल रहे दीर्घकालिक सामाजिक संक्रमण का एक दर्पण है, जहाँ क्रांतिकारी विचार धीरे-धीरे संस्थागत रूप लेते हुए उन्हीं संरचनाओं का हिस्सा बन जाते हैं, जिनके विरुद्ध वे कभी खड़े हुए थे. यही इस पूरे विमर्श का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष है और भविष्य में शोध के लिए एक और केन्द्रीय प्रश्न भी है.

 

संदर्भ-

  1. टायलर वाकर विलियम्स (2007):44.
  2. वसुधा डालमिया (2006):1
  3. रिचर्ड वर्गहार्ट (1978),https://doi.org/10.2307/481036.12 नवम्बर 2025 को देखा गया.
  4. टायलर,वाकर विलियम्स (2007):
  5. हजारीप्रसाद द्विवेदी (2003):159.
  6. परशुराम चतुर्वेदी (1961):324.
  7. हजारीप्रसाद द्विवेदी (2003):291.
  8. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल (1995):261.
  9. डेनियल गोल्ड (1994):249-260.
  10. मुंशी देवी प्रसाद (1891):294.
  11. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल (1995):261.
  12. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी (2003):159.
  13. मैनेजर पाण्डेय(2003):5
  14. मैनेजर पाण्डेय (2003):50.
  15. गजानन माधव मुक्तिबोध (2009):11
  16. गजानन माधव मुक्तिबोध (2009):11
  17. मैनेजर पाण्डेय (2003):49.
  18. के. दामोदरन (2011):337.
  19. हरबंश मुखिया (2020):64.

 

संदर्भ ग्रंथ-

के. दामोदरन (2011),भारतीय चिन्तन परम्परा,पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस,नई दिल्ली.
गजानन माधव मुक्तिबोध (2009),मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन का एक पहलू,गोपेश्वर सिंह (संपादक),भक्ति आन्दोलन के सामाजिक आधार,भारतीय प्रकाशन संस्थान,नई दिल्ली.
टायलर वाकर विलियम्स (2007), भक्ति काव्य में निगुण–सगुण विभाजन का ऐतिहासिक अध्ययन(लघु शोध-प्रबन्ध),जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय,नई दिल्ली.
डेनियल गोल्ड (1994),द दादूपंथ :ए रिलिजियस आर्डर इन इट्स राजस्थान कॉन्टेक्स्ट,के शोमर (संपादक),द आईडिया ऑफ़ राजस्थान भाग -2,साउथ एशिया पब्लिकेशन एंड मनोहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर,दिल्ली.
परशुराम चतुर्वेदी(1961),संतकाव्य,किताब महल, इलाहाबाद.
पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल(1995),हिन्दी काव्य की निर्गुण धारा,तक्षशिला प्रकाशन,नई दिल्ली.
मुंशी देवी प्रसाद (1891),मरदुमशुमारी. एस.एन. पब्लिकेशन्स,राज मारवाड़ जोधपुर.
मैनेजर पाण्डेय (2003),भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य,वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली.
रिचर्ड बर्गहार्ट (1978),द फाउन्डिंग ऑफ़ द रामानंदी सेक्ट, इथनोहिस्ट्री,वाल्यूम 25,अंक 2 (स्प्रिंग 1978),ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस,अमेरिका.
वसुधा डालमिया (2006), द ‘अदर’ इन द वर्ल्ड ऑफ़ द फेथफुल,मोनिका होर्स्टमान(संपादक),भक्ति इन द करेंट रिसर्च,मनोहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर,दिल्ली.
हजारीप्रसाद द्विवेदी (2003),हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली.
हरबंश मुखिया (2020), मध्यकालीन भारत: नए आयाम, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.

अजय कुमार यादव
सत्यवती महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं. जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की है. भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला में एसोसिएट फेलो हैं. साहित्य इतिहास लेखन,भक्ति काव्य और अस्मिता मूलक विमर्शों के अध्ययन में विशेष रूचि है.

ई मेल -ajjujnu@gmail.com

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Comments 8

  1. विजय बहादुर सिंह says:
    1 month ago

    प्रियवर, आज का निर्गुण पंथियों वाला आलेख महत्वपूर्ण है. पर काफी पहले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने-” घर जोड़ने की माया”शीर्षक लेख लिखा था.यह कबीर पंथियों पर था.

    Reply
  2. Chandra Bhushan says:
    1 month ago

    समझ तो भीतरी विमर्श के आधार पर ही बनाई जा सकती है, उत्प्रेरक के रूप में बाहरी कारकों को चिह्नित करते चलने से चीजों को समझना आसान हो जाएगा। मेरी समस्या भक्तिकाल के उदय को लेकर ही है। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी इस समस्या पर विचार के मामले में अद्वितीय हैं और वे इसको बौद्ध धर्म के पराभव की प्रक्रिया से जोड़कर देखते हैं। बेशक, उनके यहां बड़े गैप हैं, जिनपर मगजमारी की जानी चाहिए, मैं खुद भी कर रहा हूं। निर्गुण-सगुण का विभाजन बहुत सरल है और इससे चीजें सुलझतीं नहीं। नानकपंथ एक निर्गुण पंथ है और अपनी बिरादरी में सबसे ज्यादा सफल भी इसी को माना जा सकता है, लेकिन गुरुद्वारा से लेकर नगर कीर्तन तक संस्थाओं और नए कर्मकांडों के निर्माण में सबसे ज्यादा सजग भी यही रहा है। अजय जी का विषय, निर्गुण धारा में पंथ निर्माण और भक्ति आंदोलन की विफलता के साथ इसका अंतर्संबंध, बहुत अच्छा है और इस लेख में विषय के साथ उनका ट्रीटमेंट भी सराहनीय है, लेकिन अंत आते आते वे कुछ लाग लपेट सी करते दिखाई दिए हैं। भक्ति आंदोलन जब शुरू हुआ था तो बुद्ध और गोरख की निरंतरता में वैदिक जन्मना नियतिवादी वर्चस्व क्रम को हेय बताते हुए उसको छोड़कर चलता हुआ लग रहा था। ढाई सौ साल के अंदर स्थितियां ऐसी बन गई कि वेदों से लेकर वर्तमान तक चिकनी पिच रोड दिखाई देने लगी, जिसमें पहले के बहिष्कृत समुदाय भी पीछे पीछे घंटा शंख बजाते दिखाई पड़ रहे हैं। यह विफलता से कम नहीं, जरा ज्यादा ही गंभीर बात है, क्योंकि इससे सामाजिक समता का दार्शनिक आधार ही लुप्त हो गया है। इस आधार के बिना समता का प्रश्न लोगों को आरक्षण की मांग जैसा लगता है, नजरिया बदलने की जरूरत जैसा नहीं। इसलिए भक्ति आंदोलन अंग्रेजों के कब्जे से नाकाम हुआ, इस थीसिस को परिशिष्ट तक ही सीमित रखा जाए। उन पतली गलियों पर अधिक काम किया जाए, जो भक्त और संत गुरुजनों से छूट गई थीं और जिनसे होकर चेलाजन पहला मौका मिलते ही कथित मुख्यधारा की ओर निकल भागे। रही बात पंथों द्वारा वाणियों को बचाए रखने की, तो सिक्खी के अलावा यह काम जितना भी हुआ है, उसमें मिलावट प्रायः मूल से बढ़ गई है, जो आज के लिए खुद में कुछ कम बड़ा सिरदर्द नहीं है।

    Reply
  3. Shubham Pandey says:
    1 month ago

    आपकी समालोचना पढ़कर विषय के अनेक ऐसे पक्ष समझ में आए, जिन पर पहले मेरा ध्यान नहीं गया था। आपने निर्गुण भक्ति आंदोलन का बहुत संतुलित और विचारपूर्ण विश्लेषण किया है। एक विद्यार्थी के रूप में यह लेख मेरे लिए अत्यंत उपयोगी रहा। आपकी लेखनी से विषय को समझना सरल और रोचक हो जाता है। आपके ऐसे ही ज्ञानवर्धक लेखों की प्रतीक्षा रहेगी। सादर प्रणाम।

    Reply
  4. राजेश कुमार says:
    1 month ago

    बेहतरीन लेख! निर्गुण भक्ति आन्दोलन और उत्तर भारत में पंथों के उदय की जटिल प्रक्रिया को आपने बहुत ही स्पष्ट और तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है। साहित्य के ऐसे कठिन विषयों को इतनी सुगमता से समझाने के लिए आपका आभार। यह लेख शोधार्थियों और साहित्य के छात्रों के लिए एक उत्कृष्ट संदर्भ है।”

    Reply
  5. Mohd Raza Husain says:
    1 month ago

    एम एन श्रीनिवास ने Sanskritisation का कांसेप्ट दिया था। इस मज़मून को सामाजियात के इस नज़रिए की रोशनी में जांचा जा सकता है। मज़ीद ये की एक तहरीक जहां क़दीम निज़ाम की कुछ ख़ुसूसियात को ज़ेर बार करती है, वहीं इस निज़ाम से बहुत कुछ फायदा भी हासिल करती है। मिसाल के तौर पर कर्मकांड या दूसरे रीति रिवाज।
    ज़बान के हवाले से एक बात यहां कहना चाहता हूं। हिंदी में पूर्ण विराम “।” का इस्तेमाल जुमले के खात्मे पर होता है। लेकिन इस मज़मून और बाक़ी दूसरे मज़ामीन में भी अंग्रेज़ी फुल स्टॉप “.” का इस्तेमाल हुआ है, जो पढ़ने के अम्ल के दौरान मुसलसल आंखों में चुभता है। हो सके तो इस का ध्यान रखा जाए।

    Reply
  6. पवन करण says:
    1 month ago

    पंथ-निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह भी है कि समय के साथ अनेक ऐसी सीमाएँ और मान्यताएँ इन पंथों में सक्रिय हो गईं, जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष विरोध स्वयं मूल गुरु-वाणियों में मिलता है. यहीं से एक बड़ा विरोधाभास जन्म लेता है. जिन संतों ने अवतारवाद, गुरु-पूजा और मूर्ति-पूजा का खंडन किया था, वे ही बाद के अनुयायियों के लिए अवतार, गुरु-देव और स्मरणीय देवता बन जाते हैं. सत्य की सीधी खोज के स्थान पर गुरु की मूर्ति, गुरु का आसन और गुरु की गाथा अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है. इस प्रकार गुरु-पूजा, सत्य-पूजा का स्थान ले लेती है ।

    भारतीय समाज से रुढियों का बहिष्कार जिस क्रांतिधर्मी रूप से निर्गुण वाणी में हुआ था कालान्तर में वहीं त्याज्य आचार उन संतों के अनुयायी अपनाने लगे और संकट ये कि उन संतों के नाम पर ही यह किया जा रहा था….सही है।

    एक शानदार लेख। ….शुक्रिया।

    Reply
  7. ज्योतिष गुप्ता says:
    1 month ago

    अजय जी, इस उत्कृष्ट एवं शोधपरक लेख के लिए हार्दिक धन्यवाद। निर्गुण भक्ति आंदोलन, पंथ-निर्माण की प्रक्रिया तथा उसके सामाजिक और वैचारिक प्रभावों का आपका संतुलित एवं गहन विश्लेषण अत्यंत प्रभावशाली है। विशेष रूप से निर्गुण परंपरा की मूल चेतना और उसके संस्थागत रूपांतरण पर प्रस्तुत विमर्श नए चिंतन को प्रेरित करता है। इस महत्वपूर्ण लेख के लिए पुनः हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ..

    Reply
  8. Shreyansh says:
    3 weeks ago

    महत्त्वपूर्ण लेख..इस तरह के लेख भक्ति काल को समझने का नया नजरिया प्रदान करते हैं।साधुवाद.🪻

    Reply

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