| शैलेन्द्र चौहान की कविताएँ |
१.
पाठक की अनुपस्थिति में लेखक
मैं जो लिखता हूँ
फेसबुक की दीवार पर
दस-पाँच लोग
शायद ठहरते होंगे
जैसे राह चलते मुड़कर
कोई पोस्टर देख ले
और आगे बढ़ जाए
अख़बारों में छप जाऊँ तो
दस-बीस आँखें
मेरे शब्दों को छू लेती हैं
पर शब्द
अक्सर उँगलियों की तरह
फिसल जाते हैं
सुबह की चाय के साथ
छोटी पत्रिकाओं का संसार
तो और भी संकुचित है
सौ-दो सौ प्रतियाँ,
जैसे किसी बंद कमरे में
धीमे स्वर में पढ़ी जा रही हो
कोई कविता
कोई मित्र, कोई परिचित
ठहरकर पढ़ ले
बस उतना ही
पर्याप्त है
जैसे अँधेरे में चमका
कोई जुगनू
लेकिन यह भी सच है
अब रचनाएँ छपने की जगह
सिकुड़ती जा रही है
और लेखक
तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं
मानो शब्दों की भीड़ में
अर्थ अकेला पड़ गया हो
फिर भी
मैं लिखता हूँ
क्योंकि लिखना
पढ़े जाने से पहले
जिए जाने की प्रक्रिया है
शायद
किसी नम आँख तक
कभी पहुँच ही जाए
हल्का-सा प्रकाश.
२.
भूल जाने का बीज-गणित
बड़ी पत्रिकाओं के दरवाज़ों पर
एक अदृश्य अबेकस टंगा है
जहाँ शब्द नहीं
संबंधों के मनके सरकते हैं
संपादक की मेज़ पर
रचनाएँ सीधे नहीं उतरतीं
पहले पहुँचती है पहचान
फिर परिचय की हल्की-सी परत
और अंत में कहीं
कविता अपनी साँस रोके खड़ी रहती है
कभी-कभी
कोई सहृदय उँगली
उसे भीतर खींच लेती है
जैसे किसी भूले हुए नाम पर
अचानक करुणा उतर आई हो
कुछ लेखक
शब्दों से पहले सीख लेते हैं
व्यवहार का व्याकरण
जहाँ अलंकार नहीं
झुकाव के कोण गिने जाते हैं
वे जानते हैं
कहाँ ठहरना है
कहाँ मुस्कराना
और कहाँ
अपनी ही भाषा से थोड़ा-सा हट जाना है
मैं
इस गणित में हमेशा अनुत्तीर्ण रहा
रचना भेजकर
चुप हो जाता हूँ
जैसे कोई चिट्ठी
नदी में बहा दी हो
और फिर
उसके किनारे
वापस न लौटा हो
मुझे नहीं आता
शब्दों को आरती की तरह घुमाना
न ही किसी नाम के आगे
अपनी रीढ़ को झुकाना
चापलूसी
मेरे भीतर
टूटी कटोरी-सी बजती है
जिसे उठाते ही
स्वाभिमान की उँगलियाँ
हल्की-सी चुभ जाती हैं
इसलिए
मैं भूल जाता हूँ अपनी ही रचनाएँ
जैसे किसान
बीज डालकर
हर रोज़ मिट्टी नहीं कुरेदता
बस
थोड़ा पानी
थोड़ी धूप
और इंतज़ार
छोड़ देता है समय पर
कि शायद
किसी मौसम में
कुछ उग ही आए
चुपचाप.

३.
भटकना है उम्रभर
मैं भटक रहा हूँ
अपने ही भीतर के जंगल में
जहाँ पेड़
सवालों की तरह उगते हैं
और उत्तर
सूखी पत्तियों-से
पैरों तले बिखर जाते हैं
मैं भटक रहा हूँ
किसी अनाम दिशा में
जहाँ रास्ते
अपने ही पदचिह्नों से डरते हैं
कभी लगता है
मैं कोई खोया हुआ शब्द हूँ
किसी अधूरी कविता का
जिसे कवि ने
आँखों की नमी में लिखकर
भूल गया है
और कभी यह कि
मैं ही वह कवि हूँ
जो अपने ही अर्थ से
कट गया है
पर इस भटकन में भी
एक अजीब-सी रोशनी है
जैसे अँधेरे का भी
कोई निजी उजाला होता हो
मैंने समय से पूछा
“कहाँ है ठहराव?”
वह हँसा
और मेरी हथेली पर
कुछ रेत रखकर
चुपचाप आगे बढ़ गया
शायद
भटकना ही मेरा लक्ष्य है
और खोज
मेरा एकमात्र पता.
४.
सक्रियता !
मैं सक्रिय रहता हूँ
अपने आपको व्यस्त रखने के लिए नहीं
इस समाज में
अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए
हर दिन लिखता हूँ
किसी न किसी विसंगति के खिलाफ
एक छोटी-सी हरकत करता हूँ
एक आवाज़ उठाता हूँ
अलबत्ता
यह समाज
इतना विशद और बहिरंग है
कि मेरी हर कोशिश
उसकी सतह पर
कोई भी कंपन दर्ज़ नहीं करती
यहाँ अन्याय
घटना नहीं
व्यवस्था है
और मेरी सक्रियता
एक आदत भर
लोग देखते हैं
सुनते हैं
सिर हिलाते हैं
और फिर
अपने-अपने काम में लग जाते हैं
और मैं
दिन के अंत में
अपने ही भीतर
किसी सवाल की तरह बचा रहता हूँ
क्या सचमुच
मैं सक्रिय हूँ!
या हूँ सिर्फ
एक दोहराई जाती
दिनचर्या?
५.
बस लिखना
अब
लिखने के अलावा
और कोई काम नहीं
मैं
कलम को ही अपना श्रम बनाता हूँ
स्याही को अपनी रोटी
और शब्दों को
अपनी श्वांस
जब दुनिया
व्यस्त है
अपने-अपने लाभ में
मैं डूब जाता हूँ
उस घाट पर
जहाँ भाषा
अब भी मनुष्य होने की
आख़िरी शरण है
मेरे लिए लिखना
सिर्फ काम नहीं
एक प्रतिरोध है
एक साक्ष्य है,
एक धीमी आग
जो मेरे भीतर जलती रहती है
और बाहर
अँधेरे का नक्शा बदलती है
मैं लिखता हूँ
जैसे कोई किसान
सूखी धरती पर भी
बीज डालता है
इस भरोसे के साथ
कि शब्दों की बारिश
कभी न कभी
ज़रूर होगी
६.
अवांतर प्रसंग
कहानी चल रही थी
सीधी, सुव्यवस्थित
जैसे किसी साफ़ पृष्ठ पर
सधे हुए अक्षर
तभी
हाशिये से
एक हल्की-सी खरोंच उठी
कोई बात
जो कही नहीं जानी थी
धीरे से भीतर आई
और बैठ गई
कथानक के बीचोंबीच
वह प्रसंग
न तो आवश्यक था
न पूरी तरह अनुचित
बस
जैसे चलते-चलते
अचानक याद आ जाए
किसी पुराने दरवाज़े की चरचराहट
या किसी नाम का अधूरा उच्चारण
वाक्य ठिठक गए
अर्थ ने दिशा बदली
और कथा की धारा में
एक छोटा-सा भंवर बन उठा
जहाँ शब्द कम थे
पर जीवन अधिक
जहाँ अर्थ नहीं
अनुभूति बोलती थी
और अंत में
जब सब कुछ कहा जा चुका था
वही अवांतर प्रसंग
चुपचाप
पूरी कहानी का
अप्रकट केंद्र बन गया
जैसे जीवन में आए
वे क्षण
जो कभी नियोजित नहीं थे
पर जिनके बिना
कुछ भी पूरा नहीं होता
७.
अब विराम
बस एक ठहराव है
दौड़ते वाक्य की देह में
धीरे से उतरती हुई
एक अनसुनी सांस
न अंत की कोई घोषणा
न समापन का कोई शोर
विचार
उतारते हैं अपनी थकान
घुलती है उत्तेजना
संवेदनाएँ बिना स्पर्श
एक-दूसरे में
धीरे से मिलती हैं
शब्दों के भीतर
पैठती है
एक गहरी खामोशी
कहना जितना था
उससे अधिक कहा
फिर भी बहुत
अनकहा ही रह गया
जो अब
हवाओं के साथ फैल रहा है
यह ठहरना
भीतर की ओर
मुड़ती हुई
एक अदृश्य यात्रा है
जहाँ विचार
अपनी थकान उतारते हैं
और संवेदनाएँ
बिना आवाज़ के
एक-दूसरे को छू लेती हैं
यह विराम
एक दहलीज़ है
जिसके पार
कोई नया अंकुर
धीरे-धीरे पल्लवित हो रहा है.

८.
जरावस्था का शरीर विज्ञान
वृद्धावस्था
धीरे-धीरे-धीरे आती है
जैसे किसी पुराने घर में
दरारें बिना शोर के उभरती हैं
और आँगन में
खेलते बच्चों की आवाज़ें
अब सिर्फ स्मृति में बची रह जाती हैं
रक्त की नलिकाओं में
दबाव बढ़ता है
उच्च रक्तचाप
जैसे शब्दों के भीतर
अनकही चिंताएँ जम जाएँ
और आसपास बैठे लोग
सुनते तो हों
पर समझते न हों पूरी तरह
धमनियाँ सख़्त हों
और मन का लचीलापन
धीरे-धीरे पत्थर बनता जाए
जैसे संबंधों की गर्माहट
औपचारिकताओं में बदलती जाए
शर्करा
रक्त में घुलती नहीं अब
जैसे रिश्ते घुलते थे कभी
मधुमेह
इंसुलिन की थकी हुई उँगलियाँ
दरवाज़ा खटखटाती हैं
पर कोशिकाएँ
अजनबी शहरों की तरह
दरवाज़े बंद कर लेती हैं
और शहर के भीतर
कोई पहचानने वाला नहीं बचता
गले में
एक अदृश्य तितली बैठी है
थायरॉइड विकार
उसके पंखों की असंतुलित फड़फड़ाहट
कभी शरीर को
बहुत तेज़ दौड़ा देती है
तो कभी
इतना धीमा
कि साथ चल रहे लोग
आगे निकल जाते हैं
रात के सन्नाटे में
बार-बार उठना
प्रोस्टेट का बढ़ना
जैसे स्मृतियाँ
बिना बुलाए लौट आएँ
और नींद
एक अधूरा वाक्य बनकर
टूटती रहे
पास के कमरे में
किसी की नींद गहरी हो
पर यह जागना
सिर्फ अपना रह जाए
आँखों की रोशनी
धीरे-धीरे धुंध में बदलती है
मोतियाबिंद
दुनिया अब साफ़ नहीं दिखती
जैसे जीवन की स्पष्टताएँ
एक-एक कर
अस्पष्ट होती चली जाएँ
चेहरों की भीड़ में
अपने चेहरे कम पहचाने जाएँ
कमजोर प्रतिरक्षा
शरीर का किला अब
हर छोटे हमले से
काँप उठता है
जैसे मन
छोटी-छोटी बातों से
भरभरा जाए
और कोई कंधा
पास होते हुए भी
दूर लगता रहे
याददाश्त
धीरे-धीरे मिटाती है
नाम, चेहरे, रास्ते
जैसे कोई अदृश्य हाथ
जीवन की स्लेट पर
लिखा सब कुछ
पोंछता जा रहा हो
और पुकारने पर भी
कुछ नाम
वापस न लौटें
इन सबके बीच एक आदमी
निरंतर लड़ता है अकेला
भीड़ के बीच भी
अपना एकांत बचाए हुए
वह अपनी धमनियों से कहता है
“धीरे बहो, मैं अभी हूँ,”
वह अपनी कोशिकाओं से फुसफुसाता है
“मिठास अभी बाकी है,”
वह आँखों की धुंध में
पुराने दिनों की रोशनी खोजता है
और कभी-कभी
किसी पुराने दोस्त की आवाज़
दूर से आती हुई लगती है
भूलते हुए भी
कुछ याद रखने की जिद में
जीता है
वृद्धावस्था
दरअसल बीमारी नहीं
एक लंबी कविता है
जिसे शरीर लिखता है
और आत्मा
तमाम शोरगुल के बीच
अकेले बैठकर
पढ़ती रहती है.
९.
इम्युनिटी
उम्र दिखाने लगी है असर
सिर्फ चेहरे पर नहीं
मन की दीवारों पर भी उतर आया है एक महीन-सा धुंधलका
कम हो रही है प्रतिरोधी क्षमता
सिर्फ शरीर की नहीं
शायद विचारों की भी
जहाँ पहले हर अन्याय पर
एक तेज़ चिंगारी उठती थी
अब वहाँ राख में दबी
धीमी-धीमी तपिश बची है
लेकिन
यही वह समय भी है
जब प्रतिरोध
शोर से नहीं
सहनशीलता की गहराई से जन्म लेता है
जैसे कोई पुराना वृक्ष
तूफानों से लड़ने के लिए
जड़ों को और गहरा कर लेता है
उम्र का असर
कभी-कभी हार नहीं
बल्कि एक दूसरी तरह की तैयारी होता है
जहाँ प्रतिरोध
बयानों से नहीं
मौन की दृढ़ता से आकार लेता है
ढलान के उस पार
ढलान अभी खत्म नहीं हुई
पर कदमों ने
हार मानना भी नहीं सीखा
टूटन की आवाज़
अब भी आती है आसपास
पर हर दरार में
रोशनी की एक महीन लकीर भी है
चेहरों के इस मेले में
जहाँ प्रदर्शन की चकाचौंध है
कभी-कभी
कोई आँख सचमुच देखती भी है
बिना शोर
बिना आग्रह
मेरा अक्स
अब भी उसी कोने में है
पर उसने
अपनी साँसों से डरना छोड़ दिया है
वह उन्हें सुनता है
जैसे कोई पुरानी धुन
जो धीरे-धीरे लौटती है
दुनिया की कारगुज़ारियाँ
अब भी भीतर उतरती हैं
पर मन ने
हर चोट के साथ
एक जगह बचाकर रख ली है
जहाँ कुछ नहीं टूटता
हर घटना
अब केवल दरार नहीं
कभी-कभी
एक रास्ता भी बनाती है
जिससे होकर
हवा का एक झोंका आता है
समय के इस मोड़ पर
मैं देखता हूँ
धूल अब भी जमती है
पर उँगलियों से
उसे हटाया भी जा सकता है
शरीर थकता है
मन भी बैठ जाता है
पर कहीं भीतर
जड़ें अब भी नम हैं
और पेड़
पूरी तरह सूखा नहीं है
चुप्पियाँ अब भी हैं
पर उनमें
एक बीज छिपा है
जो शब्द बनना चाहता है
उस हल्की-सी कौंध ने
अब आकार ले लिया है
एक छोटे से दीप की तरह
जो कहता है
सब कुछ समाप्त नहीं होता
कुछ चीज़ें
धीरे-धीरे
फिर से शुरू होती हैं.
10.
ढलान
आसपास कुछ टूटता है
अनवरत
जैसे दीवारों से
ईंटें जगह छोड़ रही हों
बस चेहरों का मेला है
जहाँ पहचान से ज़्यादा
प्रदर्शन की धमक है
मेरा अक्स
किसी कोने में बैठा
अपनी ही साँसों से डरता है
दुनिया की कारगुजारियां
भीतर धंसकर
मन की नसों में
एक आशंका भरती हैं
हर घटना
जैसे होती है एक और टूटन
जो कांच की तरह दरकती है
आहिस्ता-आहिस्ता
लगातार
समय के इस मोड़ पर खड़ा
मैं देखता हूँ
कि निराशा
रोज़-रोज़ जमती धूल है
जो आँखों की रोशनी झीनी परत बुनती है
शरीर थकता है
मन भी कहीं बैठ जाता है
अपने ही भीतर
जैसे कोई बूढ़ा पेड़
आँधियों से नहीं
चुप्पियों से हार जाता है
फिर भी
कहीं बहुत भीतर
एक हल्की सी कौंध बची है
एक सहज उत्सुकता
जो जानना चाहती है
क्या सब कुछ सचमुच समाप्त हो गया है?
|
शैलेन्द्र चौहान कविता संग्रह: ‘नौ रुपये बीस पैसे के लिए’ (1983), ‘श्वेतपत्र’ (2002), ‘और कितने प्रकाश वर्ष’ (2003), ‘ईश्वर की चौखट पर’ (2004); संपर्क : 34/242, सेक्टर-3, प्रतापनगर, जयपुर -302033 |




बहुत सहज कविताएं .आत्मानुभूति का चित्रात्मक और चित्ताकर्षक वर्णन.उम्र के असर वाली कविताएं लाजवाब हैं.
शैलेन्द्र चौहान को बहुत दिन बाद पढ़ा। अधिकार से कह नहीं पाऊँगा कि मैंने कभी उनके कवि को पाठकीय गंभीरता से लिया हो. कारण शायद यह कि उनकी शुरुआती कविताओं में विचार-प्रबलता का जोर कुछ ज्यादा ही था. एक ही शहर (विदिशा) में जब वे छात्र और मैं नया अध्यापक था, डा. आनन्द गोरे के साथ मिलकर उन्होंने धरती नामक लघु पत्रिका का संपादन भी शुरू किया था. तब उनके पिता वहीं शायद विदिशा के गड़रा गाँव के विद्यालय में अध्यापक थे और मझोले कद के अपने कुरते पायजामे वाले लिबास में बेफिक्री और स्वाभिमान का संयुक्त आत्मभाव लिए जी रहे थे.
स्थानीय कविगोष्ठियों में उनकी कविताओंं को सुनने का अवसर जब तब मिला था. उन कविताओं जीवन संघर्षों और प्रबल जिजीविषा का आलम अब तक याद है.
शैलेन्द्र की इन कविताओं में मुझे अनुभवों की मार्मिकता और गहरी अंतर्वेदना का संयुक्त संगीत अपनी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ प्रकट हो सका है. खास कर ये पंक्तियाँ —वृद्धावस्था
दरअसल बीमारी नहीं
एक लंबी कविता है
जिसे शरीर लिखता है
और आत्मा
तमाम शोरगुल के बीच
अकेले बैठकर
पढ़ती रहती है।
आज की सुबह उम्दा हुई शैलेंद्र जी की कविताएं पढ़कर। यूं तो हम उन्हें बरसों से पढ़ते रहे हैं लेकिन इन कविताओं ने एक अलग ही शैलेंद्र जी को उपस्थित किया। सहज से लगते बिम्ब एवं अभिव्यक्ति, लेकिन असाधारण कथ्य एवं मानोभाव की बुनावट गहरी काव्यात्मक के साथ। बधाई आदरणीय।
बेहतरीन
सब के सब सीधी और सच्ची कविताएँ . वर्तमान साहित्यिक परिवेश पर संयिमत प्रहार, असहाय-बोध और भी बहुत कुछ. …..
शैलेन्द्र जी बहुत कम लिखते है. एक साथ उनकी कविताएं उनके भीतर की गहरी बेचैनी को दर्ज करती है. ये उन विषयों का लिखी कविताएं हैं जिस पर लिखने का खतरा कोई नही उठाता
जैसे गहरी बेचैनी में शब्द कवि को खोजते हुए आते हैं, भाषा मनुष्य होने की आखिरी शरण है और कविता जैसे किसी किसान के बो दिए गए शब्द हैं, शैलेन्द्र चौहान बहुत कम लिखने वाले और बहुत कम दिखने वाले कवि हैं,लिखने के बाद भी जैसे दिखने में कविता एक थरथराहट है, अभी दिख जैसे शेष हो गई हो,,,
शैलेन्द्र जी की ये कविताएँअपनी सहजता से पाठक को छूती है और उसे आश्वस्त करती है कि उनके शब्द 72 के नहीं हुए हैं,हाँ,72 जैसी परपक्वता उनमें है जो वक्त जरुरत हर उस के काम आ सकती है— उसके संघर्ष में-उसके चिंतन में-उसकी अस्मिता में और शब्द के प्रति उसकी आसक्ति में…
बहुत दिनों के बाद कुछ अच्छी..कुछ जागती हुई -जगाती हुई कविताएँ पढी़।
धन्यवाद शैलेन्द्र जी, आभार समालोचन और अरुण देव जी।
आभार आप सभी का
वाह! बहुत मुकम्मल कविता। शैलेन्द्र चौहान जी ने वृद्ध शरीर को किसी “बीमार देह” की तरह नहीं, बल्कि समय से भरे हुए घर की तरह देखा है, जहाँ दरारें भी बोलती हैं और चुप्पियाँ भी।
कविता का शिल्प अत्यंत बिम्बात्मक और संवेदनात्मक है– विशेषतः “इंसुलिन की थकी हुई उँगलियाँ”, “गले में बैठी अदृश्य तितली”, और “जीवन की स्लेट पर लिखा सब कुछ पोंछता अदृश्य हाथ” जैसे बिम्ब पाठक को भीतर तक छूते हैं।
कविता अंततः एक गहरी मानवीय जिजीविषा की कविता बन जाती है… जहाँ शरीर टूटता है, पर मन अब भी जीवन से कहता है… “मिठास अभी बाकी है।” यही उसकी सबसे बड़ी मार्मिकता और सौंदर्य है।
साधुवाद और बधाई कवि महोदय और आपको अरुण जी इस अप्रतिम पेशकश के लिए। सादर 🙏
शानदार!बधाई!!