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Home » शिंजिनी की कविताएँ

शिंजिनी की कविताएँ

by arun dev
June 17, 2026
in कविता
Reading Time: 2 mins read
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शिंजिनी की कविताएँ
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शिंजिनी की कविताएँ

 

नर्तकी

उसकी आँखें
हाथों की मुद्राओं के साथ
इधर-उधर फिर रही हैं,
जैसे बहुत भरी हुई मुंबई लोकल में
चढ़ने को लालायित औरतों की नज़रें.

उसके पैर थिरक रहे हैं
आलते की डोरियाँ, चक्कर, त्रिकोण,
षट्कोण, वृत्त, उकेरते-मिटाते,
जैसे चौके में
छौंक लगाते, डब्बे भरते,
दही फेंटते, लहसुन कूटते,
अर्धचंद्र और चतुर्भुज उकेरते
भाभियों के पैर.

उसकी चाँदपट्टी, माँगटीका, हार
अपनी जगह से हिलते नहीं,
जैसे छोटी बहुरिया की शादी की निशानियाँ.

मेरी आँखें
सभागार की अँधेरी रोशनी
से धोखा खा रही हैं,
या यह सच हो रहा है?
उसकी अंगूठियाँ
उसकी मुद्राओं के साथ निकल
स्टेज पर छन्न की आवाज़ से गिर रही हैं.

तीनताल की सिमिट्री में ही
उसके बाल
सुरों के साथ खुल गए हैं.

नक़ली चोटी, मरे साँप-सी,
झटका खाकर सुस्त पड़ गई है.
उसकी आँखों की मटक के साथ
उसका काजल बह रहा है,
और झपताल में गिरे जा रहे हैं आभूषण और घुँघरू.

उसके कपड़ों के चमकीले ढेर
स्टेज पर जहाँ-तहाँ
मायावी पर्वतों से पड़े हैं.

वह अब भी नाच रही है
संगीत अटूटा है,
ताल-सुर सब
उसकी उँगलियों के सम्मोहन से बँधे हैं.

अब उसकी छातियों से खून
और उसकी योनि से दूध
बह रहा है.

उसके चेहरे का मेकअप
बहा नहीं,
बल्कि उसके भीतर के
आक्रोश से पककर, पहले सुर्ख
और अब काला हो चला है.

वह तीन रंगों में बच गई है
दूध का सफेद, खून का लाल,
और तपिश का काला.

काली का यह तांडव नहीं है
सुंदर, सम्मोहनकारी,
पर इसके डर पर ही
टिकी है हमारी सभ्यता और सृष्टि.

 

 

बैंगलोर

इसी शहर में मिले थे हम,
जब लगता था
कि रातें अनगिनत होंगी,
और हमारे हिचकिचाते, गुनगुने अनुराग में
बसा पाएँगे हम अपने नवजात ख़यालों के घर,
फुर्सत से ढूँढते शब्द मेरे, तुम्हारे, हमारे…
शब्द जो हमेशा नहीं होंगे
सटीक, सुंदर, कोमल,
बल्कि अक्सर होंगे
थोड़े भींगे, शिवाजी नगर फ्लावर मार्केट के गुलाबों की तरह,
या रूखे, हमारे पैरों के नीचे बिछते
गुलमोहर के पत्तों की तरह,
या निरीह, वसंत में गाड़ियों से कुचले
ट्रम्पेट ट्री के ब्लॉसम की तरह.

शब्द जो हमें
कभी पास लाएँगे और कभी ले जाएँगे
बहुत दूर, अपने ही अंदर.

इसी शहर में मिले थे हम
रेस कोर्स में भागते घोड़ों की
टापों की आवाज़ में
छुपाते अपनी बेसुरी धड़कनें,
मल्लेश्वरम में दोपहर की ऊँघती
सड़क पर मिलाते अपने बेमेल कदम,
और पुरानी किताबों की दुकानों की ख़ुशबू से
सजाते अपने तुच्छ दहेज़.

इसी शहर में छोड़ गए थे हम
उम्मीद—एक तूफ़ानी बरसात में
फिर मिलने की,
और पहचान लेने की
उन शब्दों को, जिनके मायने
ज़िन्दगी की डिक्शनरी ने खा लिए,
उन लोगों को, जो हमारे मिलने की ख़बर
को अफ़वाह मान दफ़नाते रहे,
उन चौराहों से उग रहे
लाल चर्च और पीले पत्थरों को,
जिनमें बस गई प्यार की जगह
सफलता की रूह.

 

 

 

गिरी औरतें

मेरे अंदर एक बूढ़ी औरत रहती है.
जब मैं पहन लेती हूँ ऊँची पतली हील्स
या खिटखिटाते, फिसलते बिना स्ट्रैप के चप्पल,
उसकी साँसें हो जाती हैं थोड़ी तेज
तब भी, जब कोई निहार रहा हो मुझे मोहित नज़रों से,
या तब भी, जब मैं निपट अकेली भटक रही हूँ
अदृश्य प्रेतात्माओं की तरह.

उसे लगता है कि अब मैं गिरने ही वाली हूँ.
बल्कि वह क्वांटम फ़िज़िक्स के किसी प्रयोग की तरह,
मुझसे क्षण भर आगे बढ़
मेरे फिसलते पैरों की मुद्राओं की स्टडी कर रही होती है.

अब तुम अपनी हील पर गिरी, अपनी रीढ़ को बचाते
अपने हाथों को मिट्टी और खून से सान चुकी हो
और तुम्हारी साड़ी—जो तुम्हारी है भी नहीं—फट चुकी है.
इस बार तुम अपनी पैर की अंगुलियों पर वज़न देते,
चार-पाँच छोटी हड्डियाँ कचकाते गिरी हो मुँह के बल
चेहरे पर खरोंच हैं, हथेलियों पर खून,
पर थैंक गॉड, साड़ी बच गई.

और इस बार तो तुम्हारे घुटने बिना किसी नोटिस के
अचानक जम गए हैं, और तुम्हारा बैलेंस बिगड़ गया है,
तुम पीठ के बल सीढ़ियों पर गिरी पड़ी हो
उठाने वाली बाहें साथ नहीं हैं,
या तुम उन्हें महसूस नहीं कर सकती,
क्योंकि सर के अंदर चोट लगी है.

“एक ज़रा सही सैंडल पहन,
थोड़ा ध्यान देकर चल नहीं सकती ये औरत?”
ऐसा वो बूढ़ी औरत सोचती रहती है,
अगले डिज़ास्टर का करती इंतज़ार.

पर क्या करूँ, मेरे ही अंदर एक छोटी लड़की रहती है,
जो समय के पीछे जाकर देखती रहती है
वह लड़की जो कभी पेड़ पर चढ़ती नहीं,
क्योंकि डाल टूट सकती है
जो सड़क पर धीरे चलती है,
क्योंकि दौड़ लगाते लड़कों से टकरा सकती है
जिसके घुटने कभी छिले नहीं,
क्योंकि खेलने का समय नहीं था.

उस लड़की ने मेरे पैरों की झिझक चुरा ली है,
मेरे घुटनों में रचे डर को वशीकृत कर लिया है,
और लगातार चिढ़ाती है मुँह उस बूढ़ी औरत को,
जो बेचारी सिर्फ़ मेरा भला ही तो चाहती है!

 

 

 

प्रेम कविता

कभी पढ़ना तुम मेरी
प्रेम कविता,
कभी देखना तुम मेरे पीठ के नीचे
विराम के जमे निशान.

कभी सुनना तुम मेरे
नहीं नाचे तलवों के ताल,
कभी गिनना तुम मेरी
नहीं कही शिकायतों के मोरपंख.

कभी ढूँढना तुम मेरे
खोए हुए दिन,
सर्दियों से ज़र्द,
गर्मियों से सुर्ख.

अफ़वाहें गर्म हैं
कि तुम शहर में वापस आओगे,
तब, जब मेरी याददाश्त
बुझे दियों के प्रेतों के साथ
टैंगो नाच रही होगी,
मेरी जकड़ी हुई पीठ की
सलवटें खोलती
और मेरी सलेटी शिकायतों पर
पोतती लाल रंग
मेरी कविता के ख़ून से.

 

युद्ध

आज सुबह से मन उचाट है.
वसंत के जाने और गर्मियों के आने के बीच,
बाहर लॉन में तपती पीठ और अंदर ठंड में भुलकती उंगलियों के बीच
रिश्ता नहीं बना पायी.

नाश्ते का प्रोटीन, दिन के खाने का रूटीन, शाम की लंबी वाक
सब अलग-अलग रूठे रहे. मैंने कोशिश की
पर उन सबमें रिश्ता नहीं बना पायी.

हिंदी के मुक्त छन्द, अंग्रेज़ी का शार्प प्रोज़,
तुम्हारी व्हॉट्सएप पर थकी मुस्कानें मंद
और मेरा रोज़ का सोशल मीडिया का डोज़
इन सबमें भी रिश्ता नहीं बना पायी.

रिश्ते हर जगह आड़े आ ही जाते हैं,
चाहे वो एक अन्तहीन विश्वयुद्ध के गंतव्यहीन समझौते के लिए हों
या मेरी सलेटी नोटबुक पर शब्दों के,
एक जंग जो चलती है दूर-दूर, रिश्ते जलाती रहती है
मेरे, तुम्हारे आस-पास.

 

शिंजिनी समकालीन भारतीय लेखिका और कवि हैं. घुमक्कड़ औरत (वाणी प्रकाशन, २०२६) उनका पहला काव्य-संग्रह है. बिज़ी वीमेन—बिल्डिंग कॉमर्स एंड कल्चर इन मिडल इंडिया (पेंगुइन रैंडम हाउस) उनकी चर्चित अंग्रेज़ी नॉन-फिक्शन पुस्तक है. उनकी कहानियाँ और कविताएँ साहित्य अकादेमी की प्रतिष्ठित पत्रिका इंडियन लिटरेचर तथा अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई में बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में तीन दशकों तक वरिष्ठ पदों पर कार्य करते हुए उन्होंने भारतीय फिनटेक सेवाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया| उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास (ऑस्टिन) से अंग्रेज़ी साहित्य तथा पब्लिक पॉलिसी में स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्राप्त की हैं. घुमक्कड़ औरत की कविताएँ केवल दुनिया के विविध भूगोलों की यात्राएँ नहीं करतीं, बल्कि वे रंगों, संवेदनाओं और अनुभवों की अनेक परतों को भी अपने भीतर समेटती हैं. इनमें एक लंबे, समृद्ध और सार्थक जीवन की भीतरी यात्रा का सजीव, आत्मीय और मार्मिक चित्रण मिलता है. शिंजिनी मुक्तेश्वर, उत्तराखंड और पुनास, समस्तीपुर में निवास करती हैं.
shinjini.kumar@gmail.com
Tags: 20262026 कविताशिंजिनी
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Comments 3

  1. Narendra pundreek says:
    4 weeks ago

    यह कविताएँ मैंने काफी पहले पढ़ी थी. यह मुझे समकालीन हिंदी कविता का वह नया पन्ने की तरह लगा था. जो अभी खोला नहीं गया था.

    Reply
  2. उर्मिला सिंह says:
    4 weeks ago

    कविताएं बहुत सुंदर लगी, बैंगलौर और प्रेम कविता बहुत अच्छी और मार्मिक लगी। 👌🌹🌹

    Reply
  3. YOGESH SHARMA says:
    3 weeks ago

    ‘बैंगलोर’ कविता का महत्त्व इसलिए हो सकता है कि हिंदी कविता में यह शहर एक नयी बात हो सकती है, प्रेम के सन्दर्भ में तो और भी. अन्य कविताओं को पढ़कर पहला विचार यह आया कि बे वजह चमत्कार पैदा करने की कोशिश की गई है. अंतिम दो कविताएँ तो बिलकुल फिलर लग रही हैं.

    Reply

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