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समालोचन

Home » शोक से शब्द तक : गगन गिल

शोक से शब्द तक : गगन गिल

by arun dev
September 5, 2026
in आत्म
Reading Time: 6 mins read
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शोक से शब्द तक : गगन गिल
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शोक से शब्द तक
गगन गिल

हम यहाँ राजगीर में बैठे हैं.

ढाई हज़ार साल पहले यहाँ एक शोकाकुल माँ पागल हो गई थी. किसा नाम था उसका. इतना शोक संतप्त थी वह कि महात्मा बुद्ध के पास गई, अपने बच्चे का शव लेकर- इसे जीवित कर दो!

कहानी हम सब जानते हैं. उन्होंने कहा, अच्छा, यह जीवित हो जाएगा, बस ऐसे किसी घर से एक राई का दाना ले आओ जहाँ पहले कोई मरा न हो.

किसा राजगीर की गलियों में घूमती रही. सुबह से रात तक एक राई के दाने की तलाश में. उसे ऐसा कोई घर नहीं मिला जहाँ पहले मृत्यु

न हुई हो. जब वह थक गई, तब उसे समझ में आया.

 

 

••

जब हमारे साथ शोक घटता है, वह समझ में नहीं आता.

जैसे-जैसे समय हमें उस क्षण से दूर करता है, धीरे-धीरे वह समझ में आता है. शुरू में जब शोक घटता है, हमें लगता है, राई का दाना मिलने में क्या मुश्किल है, मिल ही जाएगा.

शोक के बारे में हम योजना बना कर लिख नहीं सकते. जो लोग लिखते हैं, उन्हें इसकी निरर्थकता का एहसास पहली पंक्ति लिखते समय ही हो जाता होगा.

शोक जब सही मायने में दूर चला जाता है, मन जब शोक करते-करते थक जाता है, शोक जब ज्ञान की करवट लेने लगता है, तब वह थोड़ा-थोड़ा शब्द की पकड़ में आने लगता है.

 

 

••

ख़ालिस दुख, ख़ालिस पीड़ा शब्दहीन है, शब्दातीत है. वह शब्द में आ नहीं सकता. वह गीत में भी नहीं आ सकता. वह सिर्फ ध्वनि में आता है.

जैसे कुत्ता रोता है, बिल्ली रोती है, वैसे हम भी रोते हैं. शोक में जब हम विलाप करते हैं, तो कुत्ते बिल्ली की तरह ही रोते हैं. मैं इन परिस्थितियों में से गुज़री हूँ, मेरे कंठ में से निकली सब ध्वनियाँ मेरी स्मृति में चली गईं हैं, आज भी उन्हें सुन सकती हूँ. हमारे कंठ में कैसी-कैसी ध्वनियाँ छिपी हैं, हमें उस से पहले तक पता नहीं होता.

उस ध्वनि से शब्द तक जाना— एक लंबी, अंधी, गूँगी यात्रा है. उसके बाद कोई सामर्थ्यवान व्यक्ति ही शब्द पाता होगा.

अगर आप सोचें, कल मेरे साथ शोक घटा और दो साल बाद मैं उस पर लिख लूँगा, ऐसा होता नहीं.

 

 

••

किताब की, रचना की, कविता लिखने की, घटना से उबरने की एक रहस्यमयी प्रक्रिया चलती रहती है.

भाषा वही है, विमूढ़ता भी वही है लेकिन एक ही दुख के तालाब में से हम जब बाहर निकलते हैं, सब अलग-अलग शब्दों से भीगे हुए निकलते हैं. कोई उसे कुछ शब्दों से कहता है, कोई दूसरे शब्दों से. किसी को शब्द ही नहीं मिलते. वह इतना पथरा जाता है कि उसे तालाब में से उठा कर दुनिया में लाना पड़ता है.

शोक से शब्द तक के रास्ते में कई घुमाव हैं, कई घुमेर.

मन में कोई सीधा सादा रास्ता नहीं है कि हमें जीवन में जो मिलेगा वह दुख होगा या सुख. दुख और सुख के बीच अनेक स्थितियाँ हैं, सम्भावनाएँ हैं. दिमाग़ के भीतर बहता हुआ झरना औचक जम सकता है, नदी सूख सकती है, ऐसी बाढ़ आ सकती है कि गाद और मलबे में कुछ दिखाई ही न दे कि इससे पहले वहाँ कोई जीवन था.

मनुष्यों ने जबसे भाषा का आविष्कार किया है, उन्होंने चाहे जितना कहा हो, लिखा हो, अनुभव भाषा की पकड़ से प्रायः बचता रहता है.

जीने-मरने की इस प्रक्रिया में, इस जड़ स्थिति में ही, दूर कहीं किसी महाकाव्य के पात्र का संताप सुनाई देता है. अंतहीन समय में भटकते अमर अश्वत्थामा का विलाप.

हम समझ नहीं पाते, हम अश्वत्थामा हैं या वह हम! इस तरह हमारे महाकाव्य, हमारी सभ्यता हमारा दिलासा बनते हैं.

एक दिन हम पीड़ा पार कर जाते हैं. कभी नहीं भी कर पाते. जब पार नहीं कर पाते, आत्मघात करते हैं.

हर दिन हमारे आसपास ऐसी घटनाएं घटती हैं.

 

 

••

कौन सी चीज़ें हैं जो हमें जीवन से बाँधे रखती हैं? कौन से असहनीय क्षण हैं जब हम अपने लिए मृत्यु माँगते हैं?

पीड़ा इम्तहान लेती है. कपाल के नीचे एक असहनीय दबाव, जब आप मर जाना चाहते हैं कैसे भी, फाँसी लगाकर, कटार भोंक कर, हाराकीरी करके, छत से कूद कर.

जो मन इस जगत से बँधा है, वही उससे खूँटा तुड़ाने के लिए तड़पता है.

कई दिनों तक ये खेल चलता है. जीवन- मृत्यु के बीच. कोई आत्महत्या अचानक नहीं होती. उसके पीछे कई दिनों की कशमकश रहती है.

 

 

••

महाभारत में जीवन-मृत्यु का प्रश्न दो बार आया है. एक बार यक्ष युधिष्ठिर से पूछता है, दूसरी बार युधिष्ठिर भीष्म से.

युधिष्ठिर जब यक्ष को उत्तर देते हैं तो कहते हैं, हर दिन हम देखते हैं, हमारे प्रियजन मौत के मुँह में जा रहे हैं, फिर भी हम जीना चाहते हैं, यही सबसे बड़ा आश्चर्य है!

युधिष्ठिर जब पूछते हैं भीष्म से, भीष्म कहते हैं, एक आदमी एक कुएँ में पेड़ की जड़ पकड़े औंधा लटका हुआ है, नीचे एक साँप है, ऊपर मधुमक्खियों का छत्ता. और वह आदमी मृत्यु से बेख़बर शहद की बूँद चाट रहा है. जीवन ऐसा ही है.

युधिष्ठिर अपने प्रिय चार भाइयों के मरने के बावजूद अपनी जिजीविषा पहचान कर चकित होते हैं और यक्ष को उत्तर देते हैं, यही आश्चर्य है. यही युधिष्ठिर स्वर्ग के रास्ते पर भाइयों और पत्नी के मरने पर मुड़ कर देखते तक नहीं.

भीष्म इच्छा मृत्यु ले सकते हैं मगर शर शैया पर भी स्वर्ग की कामना करते हुए उत्तरायण के आने की प्रतीक्षा करते हैं.

जीवन ऐसा ही है, कामना से आच्छादित. वह युधिष्ठिर से कहते हैं और शायद अपने से भी.

••

टेस्ट ऑफ़ चेरी से एक दृश्य

एक ईरानी फ़िल्म है, ‘टेस्ट ऑफ़ चेरी’. निर्देशक अब्बास किरोस्तोमी की फ़िल्म.

उसमें एक आदमी आत्महत्या करना चाहता है और कोई ऐसा मददगार ढूँढ रहा है जो आख़िरी वक़्त उस पर तीन मुट्ठी मिट्टी डाल दे. बस दफ़न से पहले एक बार ढेला मार कर निश्चित कर ले कि वह ज़िंदा तो नहीं है. नतीजा चाहे जो हो, आत्महत्या के प्रयास में वह ज़िंदा मिले या मुर्दा, उसके हाथ में पकड़ा नोटों से भरा वह बैग उस मददगार का होगा.

शुरू में बात आसान लगती है, तीन मुट्ठी मिट्टी डालने के बदले नोटों से भरा एक बैग. कोई भी कर देगा. जैसे किसा को लगा था, राई का दाना मिलने में क्या मुश्किल है.

सारे दिन में वह आदमी दो तीन लोगों से मिलता है. आसान सी बात है मगर कोई तैयार नहीं होता. सब कुछ न कुछ बहाना बना कर खिसक जाते हैं.

आख़िर एक बूढ़ा लैब असिस्टेंट उस पर दफ़न की तीन मुट्ठी मिट्टी डालने के लिए तैयार हो जाता है. उसे अपने बीमार बेटे के इलाज के लिए पैसे चाहिए.

अब मुख्य पात्र दुचित्ती में है. वह कहता है, मिट्टी डालने से पहले तुम मुझे ढेला मार कर देख तो लोगे कि मैं मरा हूँ या नहीं. ज़िंदा रहते दफ़न होना कितना डरावना होगा, उसे सब समझ में आ रहा है. बूढ़ा कहता है, बख़ुदा एक नहीं तीन बार ढेला मार कर देखूँगा, अगर तुम नहीं उठे तो ही मिट्टी डालूँगा.

इसके बाद फ़िल्म में ज़िंदगी-मौत की रस्साकशी शुरू होती है. दोनों बातें करते हुए उस खाई की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ इस पात्र को उतर कर आत्महत्या करनी है.

रास्ते में बूढ़ा उसे बताता है कि मुद्दत पहले एक सुबह वह भी अपने घर से रस्सी लेकर फाँसी लगाने गया था. उसने एक चेरी के पेड़ से फाँसी लगा भी ली थी कि तभी उसके मुँह में चेरी का रस टपकने लगा. ख़ुदा क़सम, रस ऐसा सुस्वाद था कि फाँसी से लटका हुआ वह उतर आया, रस्सी लपेट कर घर लौट आया और चुपचाप जाकर अपनी पत्नी की बगल में सो गया. उसकी पत्नी को पता तक नहीं चला कि वह मरने गया था!

 

 

••

कितना विचित्र है.

दो अलग-अलग देश-काल की स्थितियाँ हैं, दोनों में रस की बात होती है. शहद और चेरी का रस, जीवन का रस, जिसे मृत्यु के विकट समय में भी इंद्रियाँ पीने लगती हैं, जीवन की ओर लौटने लगती हैं!

यह है सार्वभौमिक सत्य.

मन पीड़ा सहन नहीं कर पा रहा और मर जाना चाहता है. इन्द्रियाँ जीवन महसूस करती हैं और सूली से लौट आती हैं.

 

 

••

मनुष्य भाग्यशाली हैं कि उन्हें प्रकृति ने विस्मृति का वरदान दिया है. यदि स्मृति के बिना जीवन असंभव है तो विस्मृति के बिना जीवन भी.

बरसों बरस मैं अपनी बहन की छह साल की बच्ची के लिए कलपती रही जिसके लिए मुझे लगता था, वह मेरी ही बच्ची है, मेरी बहन के घर में पैदा हुई है.
मगर हैरानी तब हुई, जब मैं ‘कंजिका कुछ विलाप’ शृंखला लिख रही थी, और एक कविता के अंत में अपने आप यह लिखा गया- “भूलेंगे, भूलेंगे, इस शोक में ही भूलेंगे!”

इसे वहाँ कौन लिख गया था? पीड़ा से दूर जाता मेरा मन? सीने में सिर उठाती मेरी जिजीविषा?

 

 

••

हम भाग्यशाली हैं कि हम भूल जाते हैं.

कई बार लगता है, कहीं हम जान-बूझ कर तो उस क्षण के पास नहीं जाते जहाँ घोर दुख है? जैसे बार-बार उसकी भीषणता में से निकल कर ही कुंद हो सकते हों जबकि प्रकृति ठीक उसी क्षण हमें उससे दूर ले जाने लगती है. कुछ वैसे ही जैसे तारे को जिस क्षण हम देख पाते हैं, ठीक उसी क्षण वह हमसे दूर जा रहा होता है.

यह जगत इसी तरह से जीता आया है?

हम पीड़ा के क्षण से दूर न जा सकते हों तो जीवित नहीं बच सकते.

 

 

••

ईरान-अमरीका युद्ध के इन दिनों मैंने एक लेख पढ़ा. युद्ध पर दलाई लामा के विचार.

दलाई लामा कहते हैं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने युद्ध की ख़बर को एक टीवी गेम जैसा बना दिया है. क्या हमें ध्यान आता है कि ये जो समाचार हम देख रहे हैं, ये जो पटाखे चल रहे हैं स्क्रीन पर, इनके पीछे जीते-जागते लोग हैं, मांस के लोथड़े हैं, उजड़े हुए जीवन हैं?

विध्वंस के नीचे जीवन.

हमारी समूची परंपरा में कोई महापुरुष हमें चेताता चलता है, ध्यान से देखो, यह जो तुम दूसरे के साथ कर रहे हो, यही सब तुम्हारे साथ होने वाला है.

 

 

••

मैं नहीं समझती कि इसमें कोई शर्म की बात है अगर किसी की विस्मृति ने उसे शोक के क्षण से स्वस्थ कर दिया है.

कुछ लोग शोक से चिपके रहते हैं. उन्हें लगता है, शायद उनकी वफ़ादारी इसी में है. उन्हें बहुत ग्लानि होती है कि मैं मरने वाले को भूल गया हूँ. इससे तो मैं मर ही जाता.

ईमानदारी से कहूँ तो जब शोक का समय आया, मैंने बहुत संताप किया, कई-कई बरस संताप किया, पूजा-पाठ किया, गोलियाँ खाईं, मगर अब?

अब मुझे चेहरा भी याद नहीं, जब तक तस्वीर न देख लूँ.

क्या यह मैं भूली हूँ या प्रकृति ने जैसा मुझे बनाया था, उसने कर दिया?

जो मेरे जीवन के सबसे पीड़ादायक क्षण थे, उन्हें किसने मिटा दिया?

मनुष्य सब सह सकता है- यंत्रणा शिविर में बच जाने के बाद ही किसी ने कहा था, कैसी विडंबना है.

••

हिरोशिमा मॉन अमूर से एक दृश्य

मगर सह जाना, बच जाना एक बात है और उसे कह पाना, उसे समझा पाना बिल्कुल दूसरी.

अलै रैने की यादगार फ़िल्म ‘हिरोशिमा मॉन अमूर’ में एक दृश्य है. फ़्रेंच नायिका और उसका एक रात का जापानी प्रेमी हिरोशिमा पर परमाणु हमले की घटना पर बात कर रहे हैं. तभी वह जापानी आदमी कहता है, लगभग धिक्कार से, “यू नो नथिंग!” एक नहीं, दो-तीन बार. तुम कुछ नहीं जानतीं.

इधर विभाजन पर आई इम्तियाज़ अली की चर्चित फ़िल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ में भी बार-बार पूछे जाने पर एक वृद्ध पात्र लगभग भन्ना कर कहता है – “हम तुम्हें बँटवारे की बात बता तो सकते हैं, मगर तुम समझ नहीं सकते!”

यह है भाषा की विडंबना. जो चीज़ रची ही इसलिए गई थी कि अनुभव को शब्द दे सके, वह मनुष्य को भाषाहीन छोड़ जाती है.

जो भी दारुण वह देखता है, सदा के लिए उसके दिमाग़ में अंकित हो जाता है. उसी को साथ लेकर वह आगे बढ़ता है. विमूढ़ और पीड़ित.

हर दिन उसे तय करना होता है- आज उसमें जीने की तमन्ना है कि मरने की?

प्रकृति हर क्षण हमें सींचती रहती है. जब भूलने के लिए कहती है, तब भी इसलिए कि वह हमें जीवन की तरफ़ लौटा लाए. परमाणु बम के बाद उसी धरती में से एक नन्हा सा फूल सिर निकाल लेता है. चेर्नोबिल की दीवार पर जंगली घास उगने लगती है.

 

 

••

तब फिर जीवन में शोक का कोई योगदान है ?

शोक हमें जीवन का उत्सव मनाना सिखाता है.

शोक की रात के बाद हमारे जीवन में जिस तरह अगली सुबह आती है, वैसी चमकदार, उजली सुबह न हम उससे पहले कभी देखते हैं, न उसके बाद.

सांस लेने का चमत्कार, जीवित होने का जादू.

 

 

••

यहाँ राजगीर में हम बात कर रहे हैं और नालंदा के एक सिद्ध कवि की पंक्तियाँ हमें दिशा न दिखलाएँ, ऐसा हो नहीं सकता.

बोधिचर्यावतार में शांतिदेव कहते हैं-

क्या करना इस दुख का
जिसका कोई उपाय नहीं,
क्यों करना दुख
जिसका कोई उपाय नहीं.

गगन गिल

एक दिन लौटेगी लड़की (1989), अँधेरे में बुद्ध (1996), यह आकांक्षा समय नहीं (1998), थपक थपक दिल थपक (2003), मैं जब तक आयी बाहर (२०१८). कविता संग्रह  तथा  अवाक् (2008), देह की मुँडेर पर (2018) और इत्यादि (2018) आदि  गद्य-कृतियाँ प्रकाशित.

भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार (1984), संस्कृति पुरस्कार (1989), केदार सम्मान (2000), आयोवा इंटरनेशनल राइटिंग प्रोग्राम द्वारा आमंत्रित (1990), हारवर्ड यूनिवर्सिटी की नीमेन पत्रकार फैलो (1992-93), संस्कृति विभाग की सीनियर फैलो (1994-96), साहित्यकार सम्मान (हिंदी अकादमी – 2009), द्विजदेव सम्मान (2010). 2024 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार आदि से सम्मानित.

ई-मेल : gagangill791@hotmail.com

Tags: 20262026 आत्म. मृत्यु और शोकगगन गिलशोक से शब्द तक
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Comments 20

  1. रक्षा says:
    1 month ago

    निःशब्द.
    यह अजीब विडंबना है कि ‘शोक’ जताया नहीं जा सकता फिर भी ‘मृत्यु शोक’ पर सभ्य समाज शोक जताने जाते ही हैं।

    Reply
  2. Mrityunjay Kumar Singh says:
    1 month ago

    मैंने दो बार पढ़ डाला… ‘अनुभव का उत्कट ‘ और ‘ द्विचित्ति ‘दोनों से नहीं उबर पा रहा हूं।
    यह लेख शोक को केवल निजी दुःख नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर घटने वाली एक गहरी आध्यात्मिक और सर्जनात्मक यात्रा के रूप में देखता है। किसा की मुट्ठी भर राई से लेकर अश्वत्थामा के विलाप, युधिष्ठिर के प्रश्न और ‘टेस्ट ऑफ़ चेरी’ तक, जीवन और मृत्यु की जद्दोजहद एक ही धागे में बंधती जाती है। सबसे अधिक छूती है यह बात कि शुद्ध पीड़ा शब्दातीत होती है और शब्द तक पहुँचना एक लंबी, अंधी यात्रा है। शायद साहित्य इसी असंभव को संभव करने का प्रयास है – शोक को स्मृति में, स्मृति को शब्द में और शब्द को अंततः जीवन की ओर लौटती हुई जिजीविषा में बदल देना।
    साधु साधु

    Reply
  3. Vandana Gupta says:
    1 month ago

    मानीखेज लिखा है। वाक़ई दुख या शोक बाद में ज़्यादा महसूस होते हैं और शब्द भी तुरंत सहारा नहीं बनते। मेरे पिता की मृत्यु के दस साल बाद मैं वो कह पायी जो उस दौरान हुआ था।
    मनुष्य की जिजीविषा ही उसे हर दुख से निकालती है, निर्णय बदलवाती है।

    Reply
  4. joshi Brijratan says:
    1 month ago

    शोक से शब्द तक’ पढ़ते हुए लगता है, गगन गिल शोक को लिख नहीं रहीं, उसके भीतर से गुजर रही हैं। राजगीर की राई से शुरू होकर अश्वत्थामा के विलाप, भीष्म के शहद, चेरी के रस, हिरोशिमा की भाषाहीनता और विनाश के बीच उगते फूल तक पहुँचती यह यात्रा अंततः मनुष्य के भीतर बची हुई उस बहुत महीन जगह को छूती है जहाँ मृत्यु की इच्छा के बीच भी जीवन चुपचाप अपना दावा करता रहता है।

    इस गद्य की सबसे बड़ी मार्मिकता यह है कि यहाँ विस्मृति भी करुणा है और शब्द भी एक तरह की अर्जित मुक्ति। जो दुःख उस क्षण केवल चीख था, वही समय के बहुत बाद स्मृति में उतरकर शब्द बनता है। इसलिए शोक से शब्द तक पहुँचना रचना की यात्रा भर नहीं, जीवित बचे रहने की यात्रा है।

    इस लेख का सबसे सत्व है कि हम दुःख को पार नहीं करते, दुःख धीरे-धीरे हमें बदल देता है। कुछ मिटा देता है, कुछ बचा लेता है, और किसी अनजान क्षण में हमारे भीतर से एक शब्द उठता है। जैसे हिरोशिमा की राख से फूल। जैसे फाँसी के फंदे से चेरी का स्वाद। जैसे मृत्यु के सामने जीवन की अनाम, अदम्य इच्छा।

    शांतिदेव का प्रश्न अंत में ठहर सा जाता है कि क्या करना इस दुख का, जिसका कोई उपाय नहीं? शायद उत्तर यही है कि कभी-कभी जीते रहना ही दुःख का सबसे गहरा प्रतिवाद है।

    Reply
  5. Priti Jaiswal says:
    1 month ago

    अगस्त,2026 वागर्थ में जापानी कहानी ‘तांगे पर सवार’ पढ़ते हुए एक सत्य उद्घाटित होता है। लंबे समय से अस्वस्थ बिस्तर पर पड़ी नायिका बार – बार अपने पति से कहती है कि तुम मेरे लिए बहुत करते हो पर नहीं समझ सकते मेरा दुःख।
    यानि जिसका है दुःख, वही समझ सकता। अगला कोशिश कर सकता है समझने की, समझ नहीं सकता।
    और अब पढ़ रही दुःख पर गगन गिल का पारदर्शी शब्दों में प्रवाहित आलेख का सत्यान्वेषी मर्म –

    क्यों करना दुःख
    जिसका कोई उपाय नहीं।

    Reply
  6. निवेदिता झा says:
    1 month ago

    पढ़ते हुए सोच रही थी कि कोई इतना सुंदर और इतनी गहरी बात कैसे लिख सकता है। गगन गिल जी मुझे लगा जैसे जो कुछ लिखा है उसमें मेरा भी हिस्सा है। जैसे हर शब्द मेरे भीतर हों। जैसे दुख और शोक से बाहर एक बड़ी दुनिया है जो जिन्दगी के करीब है। अभी -अभी हमने पिता को खोया है। इसे पढ़ते हुए मुझे उस शोक से निकलने का साहस मिला। आप लिखती रहें। दुनिया आपकी शब्दों की तरह सुंदर, पाक और जीवन से भरी रहे आमीन!

    Reply
  7. Tarique Eqbal says:
    1 month ago

    पढ़ा और पढ़ते हुए बार बार ये एहसास होता रहा कि भूलना हमारे लिए कितना क़ीमती है। याद रखने कि कोशिश में हम उस तरह नहीं जीते, जैसे हम जीने की ख्वाहिश रखते है। किसी ने लिखा है, किसका शेर है, नहीं पाता लेकिन अभी याद आ गया।
    याद-ए-माज़ी ‘अज़ाब है या-रब
    छीन ले मुझ से हाफ़िज़ा मेरा

    Reply
  8. Akhilesh singh says:
    1 month ago

    अतिशय शोक में जड़ता घेर लेती है। बुद्ध ने किसा को एक कार्यक्रम दे दिया था। उस कार्यक्रम से गुज़रकर ही उसकी जड़ता टूटी। उपदेश से अधिक महत्वपूर्ण हैं कार्यक्रम देने वाले। जैसे बुद्ध, जैसे गांधी। जड़ता मनुष्य की पराजय है।
    _____
    बहुत अच्छा लिखा गगन जी नेम
    अरूण देव जी, शुक्रिया।

    Reply
  9. तारा सिंह व्यख्याता says:
    1 month ago

    मन शांत हो गया, आधा घंटा तक अवचेतन अवस्था मे चला
    गया,
    समय धीरे धीरे, विस्मृति की ओर ले जाता है, घाव समय जैसी भरने लगते हैं

    Reply
  10. Sushma Gupta says:
    1 month ago

    यह अद्भुत लिखा है गगन जी।
    अपने भाई की मृत्यु के बाद के किसी साल एक रात मैंने अवाक् पढ़ा था गगन जी का, तब उन्हें एक संदेश लिखा था कि निर्मल जी के लिए जो उन्होंने उस यात्रा में महसूस किया वो किस हद तक मेरे भीतर उतरता गया। लगा जैसे आज ही भाई का कोई वस्त्र लेकर ऐसे यात्रा पर चली जाऊँ जहाँ शायद उसके मोक्ष का कोई साधन बन सके। पीड़ा का घनत्व किसी ठौर न कम होता था। जवान बेटे की मृत्यु पर विलाप करते वृद्ध माता-पिता को देखने से बड़ा दुख क्या होता। पर आज, जब कई साल आगे निकल आई हूँ, तब समझ में आता है कि दुख न हमारे चाहने से कम होता है, न ही उस तरह महसूस हो सकता है, जैसा हम उसे करना चाहते हैं। वह किसी रोज पूरे आवेग के साथ आता है, इतना कि पूरे वजूद पर बुरी तरह से छा जाता है। तब कोई सांत्वना काम नहीं आती, बुद्धि अपने सबसे निचले तल पर होती है। पर किसी रोज आप इतनी छोटी-सी बात पर खिलखिला उठते हैं कि आप हैरान होते हैं कि क्या आप सचमुच शोक से बाहर आ गए। स्मृति दुख के साथ एक अलग आँख-मिचौली खेलती रहती है। आज गगन जी को पढ़कर मन को गहरा सुकून मिला। वह जिस तरह से इस भाव को शब्दों में उतार पाई हैं, यह गुण विलक्षण है। प्रणाम उनको।

    Reply
  11. Sonu Yashraj says:
    1 month ago

    सार्थक शब्दों ,अर्थों ,भावार्थों से समृद्ध इस लेख के लिए आदरणीय गगन गिल जी,समालोचन को साधुवाद।
    इसे पढ़ते बहुत कुछ याद आया।बीता जीवन ,चित्त को पकड़ता- छोड़ता रहस्य भी।और प्रियजन के छूटने का शब्दातीत दुःख और फिर एक अंतहीन समय के बाद अचानक शब्दों में समाता वह दुख अपना रूप बदल लेता है। शनैःशनैः वह उतना विचलित नहीं करता पर स्थायी भाव जमाये किस रूप में कुंडली मारकर बैठा है भीतर ,ये जानने के लिए सांस का आवलंबन लिया जा सकता है ।

    Reply
  12. Priyanka Dubey says:
    1 month ago

    मैंने कल देर रात यह अद्भुत गद्य पढ़ा और इसमें दर्ज बेइंतिहा तकलीफ़ को पढ़कर कुछ विचलित होने के बावजूद एक अजीब सी तस्सली और शांति साथ लिए सोई. दुख को सहना, सह पाना – जो हमें नहीं आता और जिसे सीखने के लिए ही ( भी हम) साहित्य के पास आते हैं, वह हमें गगन गिल जैसा कोई समर्थ कवि-गद्यकार ही सिखा सकता है. कितनी ही पंक्तियाँ थीं जिन्हें अंडरलाइन करने को जी चाहता था और फिर जिनका मेंटल नोट अपने ज़ेहन में बनाया मैंने. इतनी मुश्किल बातें जितनी साफ़ और सीधे दिल पे लगने वाली भाषा में गगन जी ने दर्ज की हैं , यह शायद सिर्फ़ वे ही कर सकती थीं. गगन जी और समालोचन का शुक्रिया

    Reply
  13. Ashutosh Bhardwaj says:
    1 month ago

    ‘ध्वनि से शब्द तक जाना— एक लंबी, अंधी, गूँगी यात्रा है.’ किस कसकती यात्रा से गुज़र कर इस पंक्ति ने जन्म लिया होगा…

    Reply
  14. आशुतोष दुबे says:
    1 month ago

    शोक की ऐसी समझ बहुत बाद में मिलती है। वह जो ध्वनियों में चला गया था, वह जो मौन में बदला, वह जो शब्द तक जाने की कोशिश में रहा: शोक में शहद की यह फैलती हुई बूँद: यह बढ़ने-ठिठकने की जद्दोजहद,यह विस्मृति का शुकराना, यह दूर से देख पाने की हिकमत जो जीवन अता करता है और करता ही है…इन सतरों में गगन जी ने एनोटॉमी ऑफ़ ग्रीफ़ जैसा कुछ रच दिया है ।

    आप दोनों का शुक्रिया । यह आलेख साथ रहेगा।

    Reply
  15. Sunil Kumar says:
    1 month ago

    पढ़ते हुए ऐसे लगा जैसे एक शांत नदी मैं तैर रहा हूँ बिना किसी प्रयास के ।
    बहुत से शोक जीवन में घटित हुए,किसी की भी स्मृति स्थाई नहीं रही ।
    कुछ कभी कभार विचार में आते हैं लेकिन न जाने कौन उन्हें छिटक देता है और बहती नदी के साथ तैरने को कहता है ।
    मुद्दतों बाद इतना सधा और सुंदर पढ़ने को मिला ।

    Reply
  16. संजीव कुमार says:
    1 month ago

    जिसे पढ़ते हुए अपने जीवन के कई क्षण बरबस याद आ जायें, ऐसे लेखन का क्या मुक़ाबला! और गद्य ऐसा जिसमें शब्दों की सीमा को पहचानना शब्दों की सबसे बड़ी शक्ति का स्रोत बन गया है। इसे पढ़वाने का आभार स्वीकार करें!

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  17. भावना झा says:
    1 month ago

    अद्भुत,गहन , ठहरकर पढ़ने भीतर उतरने वाला लेखन। कितना कुछ अनुभव हुआ ,महसूस हुआ पढ़ते हुए शोक को बरतने की दृष्टि मिली। बहुत शुभकामनाएं धन्यवाद समालोचन को गगन जी को मेरा प्रणाम।

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  18. Dr.Prakash Chandra Giri says:
    1 month ago

    *प्रकाश चन्द्र गिरि*

    गगन जी मेरी प्रिय लेखिका हैं।उनका लिखा हुआ सच्चा और पारदर्शी होता है जो अपने ताप से पाठक को राहत पहुंचाता है।जीवन और मृत्यु, सुख और दुख ये न सिर्फ भारतीय मनीषा के लिए बल्कि विश्व की अनेक भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य के लिए हज़ारों वर्षों से विचारणीय विषय रहे हैं।दो दिन का जीवन देखते-देखते बीत जाता है और अनेक मूलभूत प्रश्न अनुत्तरित ही रहते हैं जिन्हें दृष्टि-सम्पन्न विवेकी लोग इसी तरह गद्य और पद्य में रेशा-रेशा बितुनते हैं।ऐसा लेखन बड़ी तपस्या,अभ्यास और अनुभव के बाद ही सम्भव होता है जिसे पढ़ते ही शब्द से मौन में उतर जाना होता है।
    लेखिका और सम्पादक को धन्यवाद।

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  19. Poonam Arora says:
    1 month ago

    यह पढ़कर लगा कि जाने कितनी लम्बी यात्रा रही होगी गगन जी की, जिसने इस समय अपने लिए शब्द पाए। कितनी शांति से इस शोक ने ख़ुद के लिए अभिव्यक्ति पा ली। मैं गगन जी के इस लेख को वैसे ही देख पा रही हूं जैसे साधारण वस्तुओं में ईश्वर मुस्कुरा रहा हो और उस मुस्कुराहट में खो जाने के डर से उसकी रहस्मयी आँखों में लगातार देखती जा रही हूं। अंत में उनमें गुम ही हो गई हूं। इतनी भव्यता !

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  20. Ram says:
    4 weeks ago

    सचमुच जीवन में हर कोई किसी ने किसी दुख से टूट जाता है.

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