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Home » स्मृति और दंश : विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी : कुँवर प्रांजल सिंह

स्मृति और दंश : विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी : कुँवर प्रांजल सिंह

by arun dev
August 20, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 3 mins read
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स्मृति और दंश : विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी : कुँवर प्रांजल सिंह
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स्मृति और दंश : विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी

विभाजन के जन
कुँवर प्रांजल सिंह

 

हाय रब्बा, यह दिल्ली में पाकिस्तान कब बन गया?

विभाजन की कथा कहाँ से शुरू की जाए? क्या यह कहा जाए कि उसने अभूतपूर्व हिंसा को जन्म दिया, या यह कि उसने मज़हबी अविश्वास और घृणा की ऐसी विरासत छोड़ी जो पीढ़ियों तक फैलती रही? या फिर यह कि उसने एक साझा भूगोल, साझा स्मृतियों और साझा संस्कृति को दो राष्ट्रों में इस तरह बाँट दिया कि उस दरार की गूँज आज भी सुनाई देती है? शायद इसे सआदत हसन मंटो के टोबा टेक सिंह की उस अंतहीन व्यथा से समझना अधिक उचित होगा जो बताती है कि विभाजन केवल ज़मीन का नहीं, मनुष्यता का भी हुआ था. लेकिन विभाजन के मलबे से उठते इन प्रश्नों के उत्तर अभी तलाशे ही जा रहे थे कि इतिहास ने एक और भयावह करवट ली, 1947 की त्रासदी की प्रतिध्वनि 1984 के रूप में फिर सामने आ खड़ी हुई. स्मृति और विस्मृति, न्याय और प्रतिशोध, इतिहास और वर्तमान के इन्हीं विरोधाभासों की गहन पड़ताल करते हुए बलवंत कौर की नई किताब स्मृति और दंश एक नया और गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है.

 

 

किताब का चतुर्भुज 

किताब का सबसे मार्मिक पक्ष वह है जहाँ लेखिका 1947 और 1984 के बीच संवाद स्थापित करती हैं. विभाजन के दौरान पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए लोग, जिन्होंने यह विश्वास किया था कि अब वे अपने देश में सुरक्षित होंगे, वही लोग 1984 में फिर से विस्थापित हुए. यह केवल भौतिक विस्थापन नहीं था, यह नागरिकता और विश्वास का विस्थापन भी था. किताब में वर्णित वह प्रसंग“हाय रब्बा, यह दिल्ली में पाकिस्तान कब बन गया?” सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की सबसे गहरी विडंबना है. यह वाक्य बताता है कि इतिहास रैखिक नहीं होता, वह बार-बार लौटता है और नई परिस्थितियों में स्वयं को दोहराता है. यहीं किताब स्मृति-अध्ययन की आधुनिक अवधारणाओं से जुड़ जाती है.

बलवंत कौर

पॉल रिक्यूर ने लिखा था कि स्मृति केवल अतीत का संग्रह नहीं, वर्तमान की सक्रिय शक्ति भी होती है. बलवंत कौर की किताब इसी सक्रिय स्मृति को पकड़ती है. 1947 की हिंसा, 1984 में केवल याद नहीं की जाती, वह पुनर्जीवित होती है. अतीत वर्तमान के भीतर प्रवेश कर जाता है. इसलिए लेखिका के लिए 1984 को समझना, 1947 को पुनः पढ़े बिना संभव नहीं है. किताब की भाषा इतनी चुस्त और दुरुस्त है कि जो इतिहास की शुष्क भाषा की तरह नहीं लगती, बल्कि स्मृति की भाषा है. इसमें आँकड़ों की अपेक्षा अनुभवों का भार अधिक है. यही कारण है कि किताब दस्तावेज़ और साहित्य के बीच एक सेतु का निर्माण करती है. कई स्थानों पर पाठक को लगता है कि वह इतिहास नहीं पढ़ रहा, बल्कि किसी जीवित व्यक्ति की स्मृतियाँ सुन रहा है.

किताब का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी नागरिकता की अवधारणा पर की गई गंभीर टिप्पणी है. स्वतंत्र भारत का लोकतंत्र अपने नागरिकों को समान सुरक्षा देने का वादा करता है. लेकिन किताब के अनुसार 1984 में पहली बार लोगों को उनके धर्म, पगड़ी, दाढ़ी और नाम के आधार पर पहचाना गया और मारा गया. यह लोकतांत्रिक राज्य की नैतिक विफलता थी. यहाँ नागरिक की पहचान संविधान से नहीं, भीड़ की निगाह से तय होने लगी. किताब का यह विश्लेषण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लेखिका हिंसा को केवल भीड़ की स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं मानतीं. वे दिखाती हैं कि हिंसा सुनियोजित थी. बिजली और पानी काटना, मतदाता सूचियों का उपयोग, घरों की पहचान, लोगों को बाहर निकालकर उन पर तेल डालना और उन्हें जलाना, ये सब स्वतःस्फूर्त घटनाएँ नहीं थीं. ये राज्य की निष्क्रियता और राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं थीं.

इस संदर्भ में किताब का तीसरा पक्ष सबसे साहसी हस्तक्षेप की तरह उभरता है जो पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर विश्लेषित किया गया है. विभाजन के समय जहाँ कई स्थानों पर सेना और प्रशासन ने लोगों को बचाया था, वहीं 1984 में अनेक स्थानों पर पुलिस स्वयं हिंसा का सहभागी या मौन दर्शक बन गई थी. गुरुद्वारों में शरण लेने वाले लोगों पर गोली चलाने का प्रसंग स्मृतियों में इस तरह रच बस गया है जहाँ राज्य के द्वारा हिंसा एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाती है. लेखिका यहाँ राज्य की आलोचना भावनात्मक भाषा में नहीं, बल्कि गवाहियों के माध्यम से करती हैं. यही इस किताब की सबसे ख़ास बात है. वह किसी वैचारिक घोषणापत्र की तरह नहीं बोलती, बल्कि पीड़ितों की आवाज़ स्वयं इतिहास की साक्षी बन जाती है. जहाँ पहचान को राजनीतिक हिंसा के केंद्र में रखा जाता है.

1984 में किसी व्यक्ति को इसलिए नहीं मारा गया कि उसने कोई अपराध किया था, उसे इसलिए मारा गया क्योंकि उसके सिर पर पगड़ी थी, दाढ़ी थी और उसका नाम एक विशेष धार्मिक पहचान का संकेत देता था. परिणामस्वरूप अनेक लोगों ने अपने बाल कटवा लिए, दाढ़ी मुंडवा ली और अपनी पहचान छिपा ली. यह प्रसंग केवल भय का तक सीमित नहीं था, यह आत्म-अस्तित्व के संकट का भी प्रसंग है. मनुष्य अपनी जान बचाने के लिए अपनी सांस्कृतिक पहचान त्याग देता है. यह दृश्य जॉर्जियो अगाम्बेन की उस अवधारणा की याद दिलाता है जहाँ राज्य की विफलता मनुष्य को केवल जीवित शरीर में बदल देती है, जिसके पास अधिकार तो हैं, पर उनकी रक्षा करने वाला कोई नहीं.

किताब का चौथा पक्ष मीडिया की भूमिका पर उसकी आलोचनात्मक दृष्टि है. लेखिका बताती हैं कि उस समय दूरदर्शन जैसे सरकारी माध्यमों पर प्रसारित नारे और भाषिक संकेत किस प्रकार सामूहिक आक्रोश को वैधता प्रदान कर रहे थे. यह विश्लेषण आज के समय में और भी प्रासंगिक हो उठता है, जब मीडिया केवल सूचना का माध्यम भर नहीं रह जाती, बल्कि वह राजनीतिक भावनाओं का निर्माता भी बन जाती है. सत्ता पक्ष के द्वारा की जा रही राजनीतिक लफ़बाज़ी को वर्तमान मीडिया तर्क और परंपरा से जोड़ने में लगा हुआ है. किताब का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह 1984 को केवल “दंगा” नहीं कहती, बल्कि उसे भारतीय लोकतंत्र की नैतिक परीक्षा के रूप में प्रस्तुत करती है. यह किताब हमें याद दिलाती है कि इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं होता, वह वर्तमान की चेतावनी भी होता है. यदि समाज अपनी हिंसक स्मृतियों का ईमानदारी से सामना नहीं करता, तो वे बार-बार नए रूपों में लौटती हैं.

 

 

परंपरागत लेखन से हटकर 

विभाजन का इतिहास लंबे समय तक दो राष्ट्रों के जन्म, सीमाओं के निर्माण और सांप्रदायिक हिंसा के रूप में लिखा जाता रहा है. इस इतिहास में लाखों लोगों की मृत्यु, करोड़ों लोगों का विस्थापन और असंख्य स्त्रियों की त्रासदी दर्ज है, लेकिन एक प्रश्न लगातार अनुपस्थित रहा, क्या विभाजन की हिंसा केवल जनता की हिंसा थी? क्या राज्य इस हिंसा का केवल मूक दर्शक था, अथवा स्वयं उसका सक्रिय भागीदार भी था? इस सवालों से रूबरू होते हुए किताब का सबसे सशक्त हस्तक्षेप इतिहास-लेखन की उस परंपरा के विरुद्ध है जिसने राज्य की हिंसा को लगभग अदृश्य बना दिया. लेखिका लिखती हैं कि “संरचनात्मक हिंसा ऐसी ही होती है, बहुत व्यवस्थित ढंग से पुलिस और प्रशासन के गठजोड़ से चुपचाप इसका अंजाम दिया जाता है लेकिन इतिहास में इसका उल्लेख प्रायः नहीं मिलता.” यह टिप्पणी केवल 1984 या विभाजन तक सीमित नहीं है, यह आधुनिक राज्य और उसके इतिहास-लेखन पर एक गंभीर टिप्पणी है. यहीं किताब इतिहास के पारंपरिक स्रोतों से आगे बढ़कर इतिहास की राजनीति की पड़ताल करती है.

ज्ञानेंद्र पांडेय का उद्धरण इस तर्क को वैचारिक आधार देता है कि इतिहास-लेखन राज्य की हिंसा को सामान्यतः युद्ध, पुलिस कार्रवाई अथवा आतंकवाद विरोधी अभियान जैसी श्रेणियों में रखकर उसकी नैतिक जवाबदेही समाप्त कर देता है. परिणामस्वरूप जनता की हिंसा इतिहास में अपराध बन जाती है, जबकि राज्य की हिंसा प्रशासनिक कार्रवाई में बदल जाती है. यह तर्क भारतीय इतिहास-लेखन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. औपनिवेशिक शासन से लेकर स्वतंत्र भारत तक इतिहास की आधिकारिक भाषा सत्ता की भाषा रही है. बलवंत कौर इसी भाषा को प्रश्नांकित करती हैं. वह बताती हैं कि राज्य स्वयं को कानून का प्रतिनिधि घोषित करता है, इसलिए उसकी हिंसा को वैधता प्राप्त हो जाती है जबकि जनता की हिंसा को अराजकता का नाम दिया जाता है. इस प्रकार इतिहास सत्ता का दस्तावेज़ बन जाता है.

यहीं यह किताब सबाल्टर्न इतिहास-लेखन की परंपरा से संवाद करती है. रंजीत गुहा और ज्ञानेंद्र पांडेय, वीणा दास ने जिस “अनसुने इतिहास” की बात की थी, बलवंत कौर उसी परंपरा को विभाजन और 1984 के संदर्भ में आगे बढ़ाती हैं. किताब का आग्रह है कि इतिहास केवल सरकारों के अभिलेखागार में नहीं मिलता, वह पीड़ितों की स्मृतियों, लोककथाओं और मौखिक इतिहास में भी जीवित रहता है. सामान्यतः विभाजन के इतिहास में शरणार्थियों को केवल पीड़ित समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है. बलवंत कौर इस दृष्टिकोण को अधिक जटिल बनाती हैं. संविधान सभा की बहसों और पुनर्वास नीतियों का विश्लेषण करते हुए वह दिखाती हैं कि राज्य शरणार्थियों को केवल मानवीय संकट के रूप में नहीं देख रहा था. उन्हें राष्ट्र-निर्माण की परियोजना का हिस्सा भी माना जा रहा था. यह विचार कि शरणार्थियों पर खर्च किया गया धन राष्ट्र में निवेश है, नवस्वतंत्र भारत की विकासवादी सोच को प्रतिबिंबित करता है. लेकिन सामाजिक जीवन में यही शरणार्थी संदेह, भय और असुरक्षा के प्रतीक बना दिए गए. किताब इस विरोधाभास को बड़ी सूक्ष्मता से पकड़ती है.

एक ओर वे दया और सहानुभूति के पात्र हैं, दूसरी ओर उन पर हिंसा, लूट और अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया जाता है. इस प्रकार शरणार्थी एक दोहरे सामाजिक चरित्र में उपस्थित होता है, वह पीड़ित भी है और संभावित अपराधी भी. यह विश्लेषण आज के वैश्विक शरणार्थी विमर्श से भी जुड़ता है. चाहे सीरिया के शरणार्थी हों, रोहिंग्या हों या अफ़ग़ान विस्थापित, आधुनिक राष्ट्र-राज्य उन्हें एक साथ मानवीय संकट और सुरक्षा-समस्या के रूप में देखता है. बलवंत कौर की किताब इस वैश्विक प्रवृत्ति की ऐतिहासिक जड़ों को भारतीय विभाजन के संदर्भ में सामने लाती है.

जिसके लिए लेखिका विभाजन और होलोकॉस्ट की तुलना करते हुए बताती है कि पिछले कुछ दशकों में विभाजन की तुलना अक्सर यूरोपीय होलोकॉस्ट से की जाती रही है. बलवंत कौर इस तुलना को स्वीकार करते हुए भी उसकी सीमाएँ स्पष्ट करती हैं. उनके अनुसार होलोकॉस्ट में अपराधी और पीड़ित की पहचान अपेक्षाकृत स्पष्ट थी, जबकि विभाजन की हिंसा में लगभग हर समुदाय किसी न किसी रूप में हिंसा और पीड़ा दोनों का सहभागी बना. यहाँ लेखिका किसी भी समुदाय को सामूहिक अपराधी घोषित करने से बचती हैं. यह दृष्टिकोण किताब की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति है. वह हिंसा का सांप्रदायिक सरलीकरण नहीं करतीं. उनके लिए विभाजन का सबसे बड़ा सत्य यह है कि मनुष्य परिस्थितियों के अनुसार हत्यारा भी बन सकता है और रक्षक भी. इसी बिंदु पर किताब का सबसे मानवीय पक्ष सामने आता है. लेखिका उन लोगों की चर्चा करती हैं जिन्होंने अपनी धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर दूसरे समुदाय के लोगों की जान बचाई. वे ऐसे लोगों को केवल “अच्छे मनुष्य” नहीं कहतीं, बल्कि उन्हें नैतिक साहस के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करती हैं.

यहाँ ईवा फोगेलमैन और आशिष नंदी जैसे विचारकों का उल्लेख महत्वपूर्ण हो जाता है, जिन्होंने बचावकर्ताओं की नैतिकता को समझने का प्रयास किया है. किताब यह प्रश्न उठाती है कि जब चारों ओर हिंसा का वातावरण हो, तब कुछ लोग अपने जीवन को जोखिम में डालकर दूसरे की रक्षा क्यों करते हैं? इसका कोई सरल उत्तर नहीं है. लेकिन लेखिका संकेत देती हैं कि साझा संस्कृति, पड़ोस, व्यक्तिगत संबंध, धार्मिक नैतिकता और मानवीय संवेदना ऐसे निर्णयों के पीछे काम करती हैं. यह दृष्टिकोण विभाजन के इतिहास को केवल हिंसा का इतिहास बनने से रोकता है.

यदि केवल हिंसा याद रखी जाएगी तो इतिहास प्रतिशोध का माध्यम बन जाएगा, लेकिन यदि बचाव, सह-अस्तित्व और नैतिक साहस की कहानियाँ भी याद रहेंगी, तो इतिहास संवाद का आधार बन सकता है. लेखिका की भाषा अकादमिक होते हुए भी संवेदनात्मक है. वे आँकड़ों से अधिक स्मृतियों पर भरोसा करती हैं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ शोध-संदर्भों और ऐतिहासिक स्रोतों से पुष्ट हैं. इसीलिए किताब इतिहास, समाजशास्त्र और स्मृति-अध्ययन के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बन जाती है. विशेष रूप से सबाल्टर्न स्टडीज़, संविधान सभा की बहसों और विभाजन अध्ययन के अंतरराष्ट्रीय साहित्य का उपयोग किताब को वैचारिक गंभीरता प्रदान करता है. किताब के मूल प्रतिपाद्य और उसके बौद्धिक हस्तक्षेपों का परीक्षण करने के बाद अब यह देखना आवश्यक है कि वह विभाजन-अध्ययन के स्थापित विमर्शों में क्या नया जोड़ती है और किन बिंदुओं पर प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ देती है.

 

 

किताब की सीमाओं के हवाले से 

उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर यह देखा जा चुका है कि किताब विभाजन को केवल 1947 की एक समाप्त हो चुकी ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं देखती बज़ाय उसकी स्मृतियों, हिंसा और विस्थापन को 1984 तक पीछा करते हुए पढ़ती है. यह दृष्टि निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यहाँ पहला सवाल यही उठता है कि क्या स्मृति को इतिहास का विकल्प बनाया जा सकता है? ज्ञानेंद्र पांडेय अपनी प्रसिद्ध किताब रिमेम्बरिंग पार्टिशन में बहुत पहले ही यह दिखा चुके हैं कि विभाजन की हिंसा केवल घटित नहीं होती अपितु उसे याद किया जाता है, भुलाया जाता है और राष्ट्र तथा समुदाय की पहचान के निर्माण में उसका इस्तेमाल किया जाता है. इस लिहाज़ से बलवंत कौर का स्मृति और हिंसा को जोड़ना इतिहास लेखन की पुरानी विधा है. जबकि किताब की मौलिकता तभी स्थापित होती है जब वह यह दिखाए कि 1947 की स्मृति 1984 में केवल लौटती नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक संदर्भ में नए अर्थ ग्रहण करती है. यदि आयशा जलाल की द सोल स्पोक्समैन से बलवंत कौर की किताब की ओर आए तो यह पायेगे कि जलाल ने विभाजन को भीड़ की हिंसा से पहले सत्ता, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सौदेबाजी के प्रश्न के रूप में पढ़ा.

जिन्ना और मुस्लिम लीग की राजनीति, कांग्रेस के साथ सत्ता-साझेदारी की संभावनाएँ, संघीय ढाँचे का प्रश्न और ब्रिटिश सत्ता की रणनीतियाँ, ये सभी विभाजन की निर्मिति को समझने के लिए आवश्यक हैं. इस दृष्टि से बलवंत कौर की किताब से पूछा जाना चाहिए कि उसकी स्मृति-केंद्रित दृष्टि में 84 की घटना के यह ‘हाई पॉलिटिक्स’ कहाँ है? क्योंकि विभाजन केवल उन लोगों की कहानी नहीं है जिन्होंने अपना घर खोया, यह उन राजनीतिक निर्णयों की कहानी भी है जिनके कारण लाखों लोगों को अपना घर खोना पड़ा. पीड़ित की स्मृति जितनी महत्वपूर्ण है, उस स्मृति को जन्म देने वाले राजनीतिक निर्णयों की पड़ताल भी उतनी ही जरूरी है.

किताब में राज्य की संरचनात्मक हिंसा पर किया गया विमर्श विशेष रूप से प्रभावशाली है. यह तर्क कि इतिहास राज्य की हिंसा को युद्ध, पुलिस कार्रवाई, कानून-व्यवस्था अथवा आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई जैसे शब्दों में वैध बना देता है, गंभीर और विचारोत्तेजक है. लेकिन सवाल यह है कि राज्य की हिंसा इतिहास से गायब कर दी जाती है, तो उसे पुनः इतिहास में दर्ज करने के लिए किन स्रोतों का इस्तेमाल किया जाएगा? पीड़ितों की स्मृतियाँ निस्संदेह महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके साथ पुलिस रिकॉर्ड, प्रशासनिक दस्तावेज़, न्यायिक आयोगों की रिपोर्ट, सरकारी पत्राचार और समकालीन पत्रकारिता जैसे स्रोतों को भी समान गंभीरता से रखकर पढ़ना आवश्यक था. जैसा कि शाहिद अमीन ने अपनी किताब इवेंट, मेटाफर, मेमोरी में स्मृतियों की पड़ताल करते हुए विभिन्न स्रोत-विधाओं का इस्तेमाल किया है, इससे घटना और उसकी स्मृति के बीच के अंतर्संबंधों को अधिक सूक्ष्मता से समझने में मदद मिलती है. इसके अभाव में राज्य की आलोचना एक सशक्त नैतिक निष्कर्ष तो प्रस्तुत करती है, लेकिन उसके पीछे काम करने वाली संस्थागत संरचनाओं और प्रक्रियाओं का विश्लेषण उतना गहरा और बहुआयामी नहीं हो पाता.

अंततः बलवंत कौर की यह कृति विभाजन-अध्ययन में एक महत्वपूर्ण वैचारिक योगदान है. यह किताब तीन बड़े मिथकों को तोड़ती है, पहला, कि विभाजन केवल जनता की हिंसा था, दूसरा, कि शरणार्थी केवल करुणा के पात्र थे, और तीसरा, कि विभाजन केवल नफ़रत की कहानी है. लेखिका दिखाती हैं कि राज्य की संरचनात्मक हिंसा, विस्थापन की राजनीति और मनुष्यता के छोटे-छोटे प्रतिरोध, ये तीनों मिलकर विभाजन की वास्तविक कहानी बनाते हैं. यह हमें सिखाती है कि किसी भी त्रासदी को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि किसने हत्या की, यह भी देखना होगा कि किसने चुप्पी साधी, किसने हिंसा को वैध बनाया, किसने पीड़ितों को भुला दिया और किसने अपने प्राणों की परवाह किए बिना दूसरे मनुष्य को बचाया. यही इस किताब का सबसे बड़ा बौद्धिक और नैतिक योगदान है.

यह विभाजन को केवल रक्तपात की स्मृति नहीं रहने देती, वह उसे लोकतंत्र, इतिहास और मनुष्यता की सतत परीक्षा में बदल देती है. ऐसी कृतियाँ केवल अतीत का पुनर्निर्माण नहीं करतीं बल्कि वर्तमान समाज से यह प्रश्न भी पूछती हैं कि क्या हमने इतिहास से वास्तव में कुछ सीखा है, या हम आज भी उसकी अनकही हिंसाओं को दोहराने की तैयारी में लगे हैं.

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं

 

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें

 

 

कुँवर प्रांजल सिंह
सहायक प्रोफ़ेसर (राजनीति विज्ञान विभाग )
दिल्ली विश्वविद्यालय
पार्थ चटर्जी की अनूदित पुस्तक ‘शासितों की राजनीति’ प्रकाशित.
pranjal695@gmail.com

Tags: 20262026 समीक्षाकुंवर प्रांजल सिंहनिरंतरता और तीसरी पीढ़ीबलवंत कौरस्मृति और दंश : विभाजन
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Comments 1

  1. विजय बहादुर सिंह says:
    3 weeks ago

    बलवंत कौर की पुस्तक – स्मृति और दंश पर कुँवर प्रांजल सिंह की समीक्षा महत्वपूर्ण लगी. इतिहास लेखन में स्मृति या लोकस्मृति की भूमिका कितनी है, इन दिनों इस पर काफी विमर्श किया जा रहा है.
    स्मृतियों वाले देश भारत में तो यह परम्परा और भी पुरानी है. वैसे भी भारतीय मन पर इतिहास से अधिक स्मृतियों का निर्णायक दबदबा है.
    बलवंत कौर ने चौरासी के दंगों की याद करके अच्छा किया है.पर यहाँ केवल एकतरफा हिंसा है तब इसे दंगा कहें या फिर कुछ और नाम दें जैसे कि 2002 के गुजरात में किए गए नरसंहार में. पता नहीं किताब में यह स्मृति भी है या नहीं?
    खैर!

    Reply

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