देवी प्रसाद मिश्र की कुछ नई कविताएँ |
अभिव्यक्ति
डर रहा क्यों बोलने से
श्वान कब पीछे हटा है भौंकने से
यत् न भारते
तत् न भारते
जो महाभारत में नहीं, वह कहीं नहीं
जो कविता में नहीं, वह कहीं नहीं
अमर्त्य
वायु प्राण होकर नाक में प्रविष्ट हुई
अग्नि बनी वाणी
सूर्य हुआ नेत्र
कान में समा गईं दिशाएँ
वनस्पतियाँ त्वचा बनीं
चंद्रमा मन हुआ फिर हुआ हृदय
जल रक्त बनकर घुमड़ता रहा
मृत्यु कहीं थी
पर कहाँ थी
(ऐतरेय उपनिषद् के एक श्लोक का स्वतंत्र निर्वचन)
चक्र
जो अनुभव था वह वक्तव्य था
जो वक्तव्य था वह असहमति थी
जो असहमति थी वह विद्रोह था
जो विद्रोह था वह भाषा थी
जो भाषा थी वह शिल्प था
जो शिल्प था वह व्यक्तित्व था
जो व्यक्तित्व था वह कवि था
जो कवि था वह युग था
जो युग था वह अनुभव था
जो अनुभव था वह वक्तव्य था
जो वक्तव्य था वह असहमति थी
जो असहमति थी वह विद्रोह था
जो विद्रोह था वह भाषा थी
जो भाषा थी वह शिल्प था
जो शिल्प था वह व्यक्तित्व था
जो व्यक्तित्व था वह कवि था
जो कवि था वह युग था
जो युग था वह अनुभव था……
उदय
जिस पैर से हमारे उत्पन्न होने की बात कही गई थी
वह पैर हमने मरोड़ दिया
वेद पाठ सुनने वाले कानों में पिघला सीसा डालने वाले हाथ
हमने अशक्त कर दिये
जो ज्ञान हमें बहिष्कृत करके अर्जित किया गया था
उसे हमने संदेहास्पद बना दिया
तुम्हारा यह सूर्यास्त
हमारा सूर्योदय है
अशेष
ऋक् जब रच उठे तो यह बात उठी कि कल्पना असंभव अब
महाभारत रच गया तो चतुर्दिक यह फैल गया कथा कहाँ बची
विरचित कर दी गई रामायण तो यह लग गया कि काव्यत्व अशेष हुआ
उपनिषद् के बाद चिंतन क्या हो पाए
जातक जब हो गये तो यह हाय हाय कि कहाँ बचे उपाख्यान
कितना ही कितनी बार कहे जाने के बाद
कहाँ कहा गया कभी इतना कि और कह पाना नि:शेष हो पाए
लाक्षागृह
पुरोचन, जला दो
विचार और असहमति और कल्पनाएँ
कुछ भी न बचे
हो जाए राख सब, पुरोचन
मैं रहूँ सिर्फ़ सुयोधन दुर्योधन
लाख पिघल गया
सब जल गया
बचने के उपाय लेकिन बचे रहे
प्रकल्प का विकल्प
दायित्व बोध
बँटे थे नदियों के इलाक़े कि
हम इतने भूभाग को सींचेंगी
हवा ने ज़िम्मेदारी ली कि
कोई बिना साँस का न रहे
आग ने लगभग माँ की तरह शपथ ली कि
हर रसोई में मैं रहूँगी
सेंकने पकाने को
सूर्य ने प्रकाश का ज़िम्मा लिया हुआ था
पेड़ों की प्रतिश्रुति थी कि
थकेहारों को छाया दी जाये
जल दौड़ा आता था कि लो पिओ
रात थी कि थके हुए समय पर सो जाएँ
निर्बाध
मनुष्य ही निकले ग़ैरज़िम्मेदार
विपश्यना
डालती हूँ धागा सुई के छेद में
साँस रोक एक तरफ़ से
दूसरी तरफ़ के छोर को पकड़ती हूँ
फिर साँस देखते हुए साँस छोड़ती हूँ
सीती हूँ फटे हुए वस्त्र
सिलती हूँ नये परिधान
घूमते हुए बुद्ध, मुझ सूचिका की,
विपश्यना में आना
अंतर्वस्तु
वट के नीचे छहाँते अंतेवासिन् ने
कामना की कि इतना ही विराट् सघन
और छायादार रचूँ
अंतर्वस्तु
का
अश्वत्थ
नाट्य शास्त्र
कुट्टिनी का मज़ाक़ उड़ाया गया
नपुंसक का चेट और वेश्या का
अनुचर का चारण का सेविका का
भाँड़ औ’ विदूषक का
निर्बल का, भरत मुनि, मज़ाक यदि उड़ाया जाए
कहो तब नाटक कैसे बड़ा हो पाए
जंतर मंतर
यही वो जगह है

II क़तआ’त II
अदा ए ख़ास हो तभी कहना
जो कहन हो उसे पहले सहना
तिलिस्मे दैर हमें क्या मालूम
बुत ए जाँ थी हमारे सीने में
दमे वापसी का मंज़र
लौटे हैं ख़ुद में हम
तसव्वुरे जाँ में हम थे
जहाँ में लापता हम
उम्र भर पढ़ते रहेंगे सफ़ ब सफ़
नामा ए उम्मीद हो दस्ते जुनूँ
2.
जब लगा कोई अब फ़रीद हुआ
उसके पहले ही ज़रख़रीद हुआ
मेरे हाथों में कुछ लिफ़ाफ़े हैं
मैं पते खोजता बरीद हुआ
थीं हवाएँ कि उड़ा ले जाएँ
मैं जहाँ था वहीं शदीद हुआ
ज़ुल्म के जो ख़िलाफ़ होता हो
मैं उस ख़याल का मुरीद हुआ
मैंने ख़ुद को कहाँ कहाँ फेंका
हवा को चीरता जरीद हुआ
मुट्ठियाँ बाँधकर सबसे आगे
मैं नहीं था मगर शहीद हुआ
एक दुनिया थी तल्ख़ियों से भरी
मैं हुआ ऐसा कि सरीद हुआ
ख़त मेरा जा गया मिला कि नहीं
मैं किसी फ़िक्र की रसीद हुआ
३.
मैं अगर लालसा हूँ छोड़ मुझे
मैं अगर रास्ता हूँ मोड़ मुझे
मैं यहाँ से चला वहाँ के लिए
इस यहाँ से वहाँ को जोड़ मुझे
मैं अगर रह गया पत्थर होकर
ज़ोर से चोट करके तोड़ मुझे
मैं जीतने के लिए हार रहा
दिख गयी अपने साथ होड़ मुझे
मेरी कविता में अगर कम हरकत
सामिईन तू है तो मरोड़ मुझे
इन दिनों देखता हूँ झूठ का सच
मिल गया सोचने का कोण मुझे
4.
क़त्लो ग़ारत में जो शरीक हुआ
मुंतख़ब वो हुआ रफ़ीक हुआ
ये जो ज़िद्दत का हलफ़नामा है
नया कहा जिसे अतीक़ हुआ
इसमें बस मायने की दिक़्क़त थी
काफ़िया चुस्त था रदीफ़ हुआ
जो भी हक़ था हुकूक़ था अपना
वो मुसाहिब का जश्ने भीख हुआ
वे मरे भूख से कि दंगे में
सद्र ने कह दिया कि ठीक हुआ
अब जिसे सब कहे हैं ज़िंदाबाद
वो तो कब का मरा था लीक हुआ
5.
मेरी इस नज़्म का उनवान नहीं
कुछेक लाइऩें दीवान नहीं
मैं बरतता रहा ऐसी दुनिया
जिसमें रहता रहा मकान नहीं
मैं चला और चल के और चला
वो कोई ख़ब्त है थकान नहीं
है अगर दिल मिरे बाएँ बाज़ू
उसका खिसकाना यों आसान नहीं
जिसको कहने में डूबता हो दिल
एक तकलीफ़ है बयान नहीं
सड़क के कोने में मैं बैठा हुआ
हूँ तो बाज़ार में दुकान नहीं
6.
मुझको एक रोज़ वो तरकीब मिली
इस तरह कविता की सलीब मिली
तब लगा पहन के हम कुछ निकले
जब पुरानी फटी क़मीज़ मिली
क्यों बदलती नहीं दुनिया भाई
बोल को मुँहबोली सी खीझ मिली
जब लगा है क़फ़स उदास हैं हम
तब कहीं कहने की तमीज़ मिली
जिसको ढूँढा किये खटे साधो
आ गये दर पे तो दहलीज़ मिली
![]() कवि-कथाकार-विचारक-फ़िल्मकार देवी प्रसाद मिश्र का जन्म उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ ज़िले के रामपुर कसिहा नामक गाँव में. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बीए. इलाहाबाद, दिल्ली और बंबई में पत्रकारिता के संस्थानों में कुछ-कुछ समय काम किया. पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित होने की दीर्घकालीन उदासीनता के बाद अब वह बिखरे हुए काम को समेटना चाहते हैं. इस कड़ी में उनकी लंबी कविता जिधर कुछ नहीं और उनकी अन्य कथाएँ मनुष्य होने के संस्मरण राजकमल से प्रकाशित हुई है जबकि प्रार्थना के शिल्प में नहीं उनका पहला कविता संग्रह था. कविता के लिए भारत भूषण स्मृति सम्मान, शरद बिल्लौरे सम्मान, संस्कृति सम्मान. 2009 में उन्हें अपने वृत्त चित्र के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला जिसे उन्होंने बाद में सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करते हुए लौटा दिया. इलस्ट्रेटेड वीकली ने उन्हें 1993 में देश के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले 13 प्रमुख लोगों में शामिल किया . उनकी लघुफ़िल्म सतत कान्स के शॉर्ट फ़िल्म कॉरनर में शामिल और निष्क्रमण नाम की फ़िल्म को फ़्रांस की गोनेला कंपनी ने विश्वव्यापी वितरण के लिए लिया. ये दोनों ही फ़िल्में गुना ज़िले के ग़ैरपेशेवर आदिवासी बच्चों को चरित्र बना कर बनाई गईँ. यह सब इसलिए कि नाम की उनकी फ़िल्म कवयित्री ज्योत्सना पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री है जिन्होंने हिंदी कविता की मुख्य धारा को धता बताते हुए एक असहमत और आज़ाद जीवन जिया और ज़िंदगी को उसकी आत्यंतिकता में समझने की कोशिश में हँसी खेल में उसे ख़त्म कर दिया. नज़ीर अकबराबादी, महादेवी वर्मा और देवीशंकर अवस्थी पर आदमीनामा , पंथ होने दो अपरिचित, एक और विवेक की खोज शीर्षक से शैक्षिक वृत्त चित्र बनाए; पब्लिक सर्विस ब्रॉडकॉस्टिंग ट्रस्ट के लिए व्हिसिल्स ऐंड बुलेट्स और नॉयज़ेज़ ऐंड वॉयसेज़ जैसी डॉक्यूमेंट्री बनाईँ. इस समय अपनी पहली फीचर फिल्म बनाने की प्रक्रिया में. d.pm@hotmail.com |





सुन्दर कविताएँ। उम्दा गायन। प्रिय कवि और प्यारे अग्रज को हृदयतल से शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ ।
समालोचन के प्रति आभार प्रकट करता हूँ…
देवी जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ और ख़ूब ख़ूब बधाइयाँ!!! कमाल के कवि हैं और आज भी उनकी कविताएं कमाल की हैं।
क्या जंतर मंतर कविता बस इतनी ही है– “यही वह जगह है”? यदि इतनी ही है तो यह दुस्साहस है और कविता के तौर पर सफल नहीं है। दुस्साहस इस प्रस्तुति की अन्य कविताओं में भी है। दुस्साहस और प्रयोग का मैं पक्षधर हूँ क्योंकि यह विफल भी हो सकता है और नवाचार भी कर सकता है। देवी प्रसाद मिश्र की इस प्रस्तुति के अधिकांश कविताएं विफल ही हुई हैं। अभी भले ही लोग इनकी तारीफ करने हैं लेकिन लॉन्ग टर्म में इन कविताओं को वैसा ही माना जाएगा।
उदय
जिस पैर से हमारे उत्पन्न होने की बात कही गई थी
वह पैर हमने मरोड़ दिया
वेद पाठ सुनने वाले कानों में पिघला सीसा डालने वाले हाथ
हमने अशक्त कर दिये
जो ज्ञान हमें बहिष्कृत करके अर्जित किया गया था
उसे हमने संदेहास्पद बना दिया
तुम्हारा यह सूर्यास्त
हमारा सूर्योदय है
अमर्त्य और उदय बहुत अच्छी लगी। जन्म दिन पर देवी भाई को हार्दिक शुभकामनाएँ
कवि देवी भाई की कविताएं पढ़ने मिली, अच्छा लगा। देवी जी कविता में संक्षिप्तता, प्रतीकात्मकता और वैचारिकता ने हमेशा की तरह आज भी आकर्षित किया, और संवेदनाएं हर पंक्ति में लगी। उन्हें शुभकामनाएं, अभिनंदन 🌷
बहुत शानदार और हस्तक्षेप की कविताएं, हमारे समय के सजग और जरूरी बातों पर कविता की प्रतिबद्ध धार के कवि अग्रज देवी प्रसाद मिश्र जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें, हमेशा की तरह बेहतरीन चयन और सम्पादन, समालोचन का आभार
देवी प्रसाद मिश्र की कविताएं हमेशा से एक गहरी बेचैनी और विकलता से भरी हुई होती हैं जो पढ़ने के बाद शांत पानी में फेंके हुए पत्थर जैसी हलचल पैदा करती हैं। गज़लें तो और भी शानदार हैं।
देवी प्रसाद मिश्र अबतक के सबसे ज़्यादा समसामयिक और हस्तक्षेपकारी और चर्चित कवि हैं । उनकी चोट दिल के आखिरी हिस्से तक आवाज़ करती है । वे अपनी कविता में जोख़िम पर जोख़िम उठाते हैं और इस बात की कतई परवाह नहीं करते कि कविता समझ से बाहर भी हो सकती है ।
शानदार कविताएं । बहुत खूबसूरत आवाज़ । फ़िल्म भी बना रहे हैं । मैंने वो डॉक्यूमेंट्री देखी है जिसमें कवि राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं । इतनी सारी प्रतिभाए एक ही व्यक्ति में आश्चर्यचकित करती है ।
उन्हें जन्मदिन पर बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं । उनकी दीर्घायु की कामना के साथ ….. ।
अरुण देव ने अपने इंद्रो में ठीक कहा है कि देवी की कविताओं में दो धाराएँ साफ़ दिख रही हैं । इस समय का फ़ासिस्ट सरकारी तंत्र इन दो धाराओं में एकता नहीं, विभाजन के तत्व ढूँढ़ता है और हमारी सांस्कृतिक एकता को नष्ट करता है। देवी इस विभाजन को अवैध बताने के लिए प्रस्तुति की ऐसी संरचना बनाते हैं जो इस दरार को बेमानी कर दे। वे कहन की दो धाराओं को दो आँखों की तरह देखते हैं। वे साफ हैं कि यदि हमें भारत और हिंदुस्तान की मुकम्मल तस्वीर देखनी है तो दोनों आँखों की जरूरत होगी। इनमें से एक भी आँख की रौशनी कम हुई नहीं कि भारतीयता की तस्वीर अपूर्ण और घुंधली दिखेगी ।
तो कविताओं की प्रस्तुति में गहरा विजन और सांस्कृतिक सूझ है। देवी की कविताएँ हमेशा की तरह बड़ी अंतर्वस्तु के कार्य भार से लैस दिखी । जाते जाते वह बहुत खूबी के साथ अपने गान में यह भी बता गये कि बस थोड़ा-सा और बदलना बाक़ी है।
देवी भाई की कविताएँ पढ़ना केवल कविताएँ पढ़ना नहीं है, बल्कि अपने समय की उस बेचैनी के सामने खड़े होना है जिसे हम रोज़मर्रा की भाषा में अक्सर पहचान नहीं पाते। इन कविताओं में भाषा सजती नहीं, भीतर तक उतरती है; विचार घोषणा नहीं करता, धीरे-धीरे अपना असर छोड़ता है।
सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ कविता अपने समय से मुठभेड़ करते हुए भी नारे में नहीं बदलती। उसमें एक गहरी मानवीय बेचैनी, विडंबना और आत्मसंघर्ष है- जैसे कवि बाहर की दुनिया को देखते-देखते अचानक अपने भीतर की किसी दरार तक पहुँच जाता हो।
देवी भाई की कविता की असली ताकत शायद यही है कि वह पाठक को सहमत करने की कोशिश नहीं करती; वह उसे असहज करती है, रोकती है, फिर सोचने के लिए अकेला छोड़ देती है। और जिस कविता को पढ़ने के बाद कुछ देर तक मन अपने ही भीतर आवाज़ें सुनता रहे, शायद वही कविता सचमुच हमारे समय में जीवित है।
जिस पैर से हमारे उत्पन्न होने की बात कही गई थी
वह पैर हमने मरोड़ दिया
वेद पाठ सुनने वाले कानों में पिघला सीसा डालने वाले हाथ
हमने अशक्त कर दिये
जो ज्ञान हमें बहिष्कृत करके अर्जित किया गया था
उसे हमने संदेहास्पद बना दिया
तुम्हारा यह सूर्यास्त
हमारा सूर्योदय है।
देवी प्रसाद मिश्र अद्भुत कवि हैं। यह वाक्य शायद बार बार कहा आया हो, नयी कविताओं के साया होने पर फिर से कहने की गुंजाइश बनी रहती है। वर्ण व्यवस्था के सूर्योदय/ निर्माण से लेकर उसके सुर्यास्त तक के समय की प्रतिरोधी काव्य विरासत को आप इन कविताओं में देख पाते हैं. बीच में महाभारत है बहुत सारे व्यास हैं। रेख़्ता है और समकालीनता है। देवी बहुत सारे माध्यमों में एक साथ काम करते रहते हैं।जन संस्कृति मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन उनके कविता गायन का खुद के द्वारा आर्केस्ट्राइजेशन का गवाह रहा है। यहां भी वह काम अपनी खूबसूरत ऊंचाई के साथ मौजूद है।और जंतर मंतर शीर्षक से एक वाक्य की ,चार शब्दों की, आज का प्रतिरोध को केंद्रीय महत्व देने वाली उम्दा , प्रयोगशील कविता के क्या कहने ! देवी जी बधाई और समालोचन को भी।