| सोमेश शुक्ल की कविताएँ |
1.
दुनिया एक असंभव में व्यस्त है
चीज़ें यहाँ ‘किसी उतने’ भी काम की नहीं
और ‘इतना’ जितना भी कुछ बेतुका नहीं
कि जैसे अपने ही को ले लूँ
मैं अकेला होने के अपने काम आता हूँ.
2.
धन्यवाद करने उठता हूँ
मैं उठ इसलिये पाता हूँ क्योंकि धन्यवाद कर सकता हूँ
कहा गया है कि इसके लिए शुक्र मनाओ
कि शुक्रगुजार हो
सुबह शुरू होती है
कहानी खत्म हो जाती है
सूरज मेरे सिर पर पूरे दिन घूमता है,
मल पर मक्खी भिनभिनाती है
जो पूरे समय परेशान करता है
वह सही रास्ते पर रखता है
और कुछ कहना, सुनना न भी हो तो भी एक भाषा
मुझे इतना उलझाए रखती है
कि हर शब्द बेबसी की एक पुकार बनता है
मन में अपने लिए एक असीमित धन्यवाद है
भले ही खुद को नुकसान पहुँचाऊँ,
या खुद से अपना का बचाव करूँ
लेने, देने के लिये बस एक धन्यवाद है.
3.
सोचकर,
कि सब कुछ से भी
सबकुछ नहीं किया जा सकता
मुझे लगा अगर मुझसे कुछ हुआ तो मैं
कोई न कोई होकर रह जाऊँगा
चुपचाप बैठे, चुपचाप बोलते,
चुपचाप चलते-फिरते
एक ही धुन बनी रहती है
अगर गाऊँगा सिर्फ आवाज़ भी
तो वह शब्द होगा
और अगर मैं शब्दों के बनावट से इतर
कभी हिल भी गया
तो एक नर्तक हो जाऊँगा.
4.
एकालाप
मैं अपनी भूली हुई आदतों से परेशान हूँ
न जाने कहाँ, मैं क्या करते रहने में
यहाँ होने का समय व्यर्थ कर रहा हूँ
मेरा आकाश एक अपमानजनक रंग से भर गया है
न लिखे एक शब्द को चर्मरोग हो गया है
सबसे अलग चीज सबसे अधिक बदसूरत दिख रही है
वस्तुएँ अब सिर्फ समय मांग रही हैं
एक बूढ़े कवि ने अपनी हर पुस्तक में हस्तमैथुन किया है, और उन्हें बंद कर दिया है
सुंदर अकाल्पनिक हो गया है
कल्पना करता हुआ यथार्थ में उतना ही धँस गया है
यह एक न हुआ पिछला साल है
आज दिल्ली में आगरा का दिन है
एक रास्ते ने भटक-भटक कर अपना सिर पकड़ लिया है
एक सीधी रेखा सीधे–सीधे परेशान है
एक पते पर कुछ नहीं है
छूने से मैं महसूस करने तक मैला हो गया हूँ
मेरी समझ एक आकार है जिसकी कोई चीज नहीं है
मेरे साथ साथ एक आदमी रहता है,
जिसका चेहरा खो गया है
और वह अपने पहचानने वालों को भी भूल गया है
जैसे जल में जल ने जल को जल से धो दिया है
हर एक वस्तु खुद-से टकरा गई है और खुद के भीतर गिरकर बिखर गई है
एक अब सिर्फ एक नहीं है
बल्कि बहुत है या कम है
कुल गिनती है उसमें गिनने वाला एक हमेशा ही कम है
और एक और मैं भी हूँ
एक चीज को दूसरी से ढंकता हुआ,
दूसरी को तीसरी से
मैं अपने आप को सबकुछ से
छुपाने की बजाय,
सबकुछ को अपने आप से छुपा रहा हूँ.
सुर और लय से छिटक कहीं
मैं अपनी आवाज़ से
खाली अपनी आवाज़ को गुनगुना रहा हूँ.

5.
रास्ते में आई हर चीज़ आपका रास्ता रोक देना चाहती है
दिखता हुआ हर आकार अपने आप में खुद की मृत्यु का आकार है
पारदर्शिता है प्रथम रंग है
हर प्रथम ही अमर है
बादल पानी है
पानी बादल है
लेकिन इसमें है वो क्या है?
पत्ता टूटकर जमीन पर गिरा
लेकिन टूटना कहाँ जाकर गिरा?
6.
कोई चीज़ हो,
कोई असहज क्रिया ही हो,
अकस्मात घट जाने वाला क्रम,
या सदियों पुराना किसी का भरोसा
हर चीज़ एक आदत में बदल जाना चाहती है
व्यक्ति की
या व्यक्त की
सिद्ध बातों के भीतर
इरादतन गैर–जरूरी काम चलता है
एक सीमा के बाद हमें कुछ पता न होने की
न छूट सकने वाली
अपनी आदत में हम
और कितना जीयेंगे?
7.
मेरे आस पास कुछ भी करो
लेकिन बस कुछ मत करो
कोई आवाज़ तो हरगिज नहीं
संगीत ‘सुने जाने’ में साफ झूठ बोलता है
वस्तुएँ दुनिया के बारे में लगातार अनर्गल बनी रहती हैं
रंग सतहों का औपनिवेशिक शोषण करते हैं
न जाने कब से सबकुछ हो रहा है
किसके पास इतना जीवन है कि किसी भी चीज़ को
पूरा सह पाए
अरे!
रुको!
दीवार को हाथ मत लगाओ, वे पीछे हट जाती हैं
‘छूना’ दूसरे के लिये एक धक्का है
एक काम करो
अनुपस्थित भी न रहो यहाँ
मैं कमरा और बड़ा नहीं चाहता.




सोमेश शुक्ल की नई कविताओं की प्रतीक्षा रहती है। पहली कविता पढ़कर ठहर गई हूँ। सोमेश के अलावा केवल सोमेश ही यह कह सकते हैं कि ‘ मैं अकेला होने के अपने काम आता हूँ.’
शेष कविताएँ तसल्ली से शाम को पढ़ूँगी। हिन्दी का यह अप्रतिम कवि जतन करके सहजे जाने के योग्य है।
सोमेश शुक्ल नाम के कवि की कविताएँ बनती कैसे हैं, पैदा कैसे होती हैं? यह भी कह सकते हैं कि कवि सोमेश शुक्ल या सोमेश शुक्ल का कवि क्या करता है?
वह दो चीजें करता है। एक, वह चीजों को, दुनिया को ‘देखता’ है। दूसरा, वह चीजों को, दुनिया को ‘देखते’ हुए, यह ‘देखना’ करते हुए, इस ‘देखने’ की प्रक्रिया में ही उन पर मनन करता है। और इस ‘देखने’ और ‘देखते हुए’ मनन करने की प्रक्रिया में जिन अन्तर्दृष्टियों तक वह पहुँचता है, उन्हें वह लिखता है। यह इस तरह है कि सोमेश शुक्ल नाम के कवि की कविताएँ बनती हैं, पैदा होती हैं।
परन्तु सोमेश शुक्ल द्वारा यह ‘देखना’ आम, साधारण, सामान्य देखना नहीं है। इस ‘देखने’ के दौरान सोमेश शुक्ल नाम के कवि को या सोमेश शुक्ल के कवि को चीजें, दुनिया बहुत अलग, बहुत भिन्न नज़र आती हैं। इसीलिए जब वह उन्हें ‘देखते हुए’ उन पर मनन करता है तो जिन अन्तर्दृष्टियों तक वह पहुँचता है, जिन्हें वह प्राप्त करता है, वे भी बहुत अलग, बहुत भिन्न किस्म की होती हैं, यानी जिन्हें आम, साधारण, सामान्य नज़र प्राप्त नहीं कर सकती। यह इस कारण है कि सोमेश शुक्ल के कवि की कविताएँ विशिष्ट बनती हैं, विशिष्ट हो जाती हैं, यानी इस ‘तरह’ की, इस ‘प्रकार’ की कविताएँ जो न केवल हिन्दी में बल्कि कविता मात्र में पहले कभी नहीं लिखी गयीं।
मैंने जो ऊपर लिखा है उसके आधार पर यह कह सकते हैं, बल्कि कहा ही जाना चाहिए —- क्योंकि यह स्पष्ट है —- कि सोमेश शुक्ल नाम का कवि मूल यानी वास्तविक अर्थों में चीजों का, दुनिया का ‘दर्शन’ करता है और इस तरह वह ‘दार्शनिक’ है, जिसे अँग्रेज़ी में “seer” कहते हैं।
सोमेश की यह कविताएँ समकालीन हिंदी कविता के उस मुहावरे को पुष्ट करती हैं जहाँ ‘कथ्य’ से अधिक ‘अवस्था’ का महत्व है। आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कवि की काव्य-भाषा में एक प्रकार की दार्शनिक तटस्थता है, जो पाठक को संवेगात्मक सुरक्षा देने के बजाय उसे एक ठंडे और लगभग क्रूर आत्म-साक्षात्कार के सामने खड़ा कर देती है।
इन कविताओं में ‘अकेलापन’ कोई रूमानी भाव नहीं, बल्कि एक ‘अनिवार्य विफ़लता’ की तरह उपस्थित है, जहाँ संवाद की हर कोशिश अंततः एक ‘एकालाप’ में तब्दील हो जाती है।
यह विश्लेषण का विषय है कि कवि ने किस प्रकार आधुनिक मनुष्य की पहचान के संकट को ‘बिना चेहरे वाले आदमी’ के बिंब से जोड़ा है, जो अपनी ही आदतों से त्रस्त है। कवि की शिल्पगत संरचना में एक तरह का ‘बिखराव’ है, जो दरअसल संसार के तार्किक होने के दावे को चुनौती देता है। जहाँ ‘एक’ अब सिर्फ ‘एक’ नहीं रहा, बल्कि अपनी सांख्यिकीय गरिमा खो चुका है।
सहभागिता के स्तर पर ये कविताएँ पाठक से सक्रिय बौद्धिक श्रम की माँग करती हैं; यहाँ सौंदर्य का अर्थ पारंपरिक ‘सुंदरता’ न होकर ‘यथार्थ में धँसना’ है।
निष्कर्षतः, सोमेश का यह काव्य-संसार उस ‘असंभव’ की पड़ताल करता है जिसमें हम सब व्यस्त हैं और अपनी भाषाई सूक्ष्मता से यह प्रमाणित करता है कि आज की कविता केवल बाहर के संघर्षों का नहीं, बल्कि भीतर की उस सड़न और अलगाव का भी दस्तावेज़ है जिसे हम अक्सर ‘सामान्य जीवन’ कहकर टाल देते हैं।
सोमेश को इन कविताओं के लिए शुभकामनाएँ। अरुण देव जी का आभार इन्हें हमारे समक्ष ले आने के लिए।
सबलोग तादात्म्य नहीं बिठा सकते। यह उदास विराग एक स्वर भर है, कवि उसकी भी अनुपस्थिति के साथ है।
ऐबस्ट्रैक्ट ऑफ़ ऐब्सट्रैक्ट!
हम जैसे लोग जीवन और जगत के आदिम, प्राचीन और आधुनिक शोर के बीच सिसिफस की तरह जीते हैं और हमारे विराग भी राग की स्वरलिपियों से प्रकट होते हैं।हमारे लिए यह स्वर अनुपस्थित हरी घास है जिस पर बैठने का क्षण इस जीवन में शायद ही मिले।
– यह सोचना है इन कविताओं को आलोचना नहीं।😊
बहुत ही सुन्दर कविताएं। गहरे अवसाद और निर्वेद का भाव है इनमें। कथन-भंगिमा भी अनूठी है।