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समालोचन

Home » ताइवान ट्रैवलॉग:2026 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार:सरिता शर्मा

ताइवान ट्रैवलॉग:2026 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार:सरिता शर्मा

by arun dev
June 16, 2026
in आलेख
Reading Time: 5 mins read
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ताइवान ट्रैवलॉग:2026 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार:सरिता शर्मा
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ताइवान ट्रैवलॉग
ताइवान के इतिहास, संस्कृति और स्वाद का सफर


सरिता शर्मा

ताइवानी लेखिका यांग शुआंग-सी और उनकी पुस्तक की अंग्रेजी अनुवादक लिन किंग ने ‘ताइवान ट्रैवलॉग’ के लिए इस साल इंटरनेशनल बुकर प्राइज जीता है. यांग शुआंग-सी मूल रूप से मंदारिन चीनी भाषा में लिखे गए उपन्यास के लिए इस पुरस्कार की पहली ताइवानी विजेता हैं. उनकी कहानियां ताइवान की संस्कृति, इतिहास, महिलाओं के अनुभवों और स्थानीय जीवन को बहुत शानदार तरीके से प्रस्तुत करती हैं. यह किताब सबसे पहले 2020 में मंदारिन चीनी भाषा में प्रकाशित हुई थी और इसे ताइवान का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान, ‘गोल्डन ट्रिपॉड अवॉर्ड’ मिला था. इस उपन्यास ने 2024 में नेशनल बुक अवॉर्ड फॉर लिटरेचर इन ट्रांसलेशन’ और ‘एशिया सोसाइटी’ का पहला ‘बाइफ़ांग शेल बुक प्राइज़’ जीता है.

चयन समिति की अध्यक्ष ब्रिटिश उपन्यासकार नताशा ब्राउन ने बताया

“ताइवान ट्रैवलॉग’ ने एक अविश्वसनीय दोहरा कमाल कर दिखाया है: यह एक प्रेम कहानी और प्रभावशाली उत्तर-औपनिवेशिक उपन्यास—दोनों ही रूपों में सफल रहा है. निर्णायक मंडल के सदस्यों के तौर पर, हमने इस किताब की अनेक परतों पर गहन चर्चा का भरपूर आनंद लिया है. यह एक बेहद लुभावना और सूक्ष्म रूप से परिष्कृत उपन्यास है.”

 

पुस्तक लिखने के बारे में यांग शुआंग-सी कहती हैं

“ताइवान के समकालीन नज़रिए का इस्तेमाल करते हुए, मैं उन पेचीदा हालात की गुत्थी सुलझाना चाहती थी, जिनका सामना ताइवान के लोगों ने अतीत में किया था; और यह जानना चाहती थी कि हमें किस तरह के भविष्य के लिए प्रयास करना चाहिए.”

 

उन्होंने बुकर पुरस्कार स्वीकार करते हुए अपने भाषण में कहा

“कुछ लोगों का मानना है कि कला और साहित्य को राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए. लेकिन मेरा मानना है कि साहित्य को उस मिट्टी से अलग नहीं किया जा सकता है जिसमें वह उगा है.”

 

पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद बहुत खूबसूरती से किया गया है. पुस्तक की सफलता का श्रेय अनुवादक को भी जाता है. लिन किंग ने अनुवाद करने की प्रक्रिया के बारे में बताया

“मैंने किताब के अमेरिकी प्रकाशक ग्रेवुल्फ़ में अपनी संपादक, यूका इगाराशी के साथ बहुत करीब से काम किया. उन्हें मुझ पर पूरा भरोसा था कि मैं भाषाओं, संकेतों और फुटनोट्स के जटिल मिश्रण के साथ खुल कर प्रयोग कर सकती हूँ. हमने हर संभव प्रयोग करने का नज़रिया अपनाया, अनुवाद के अनगिनत ‘नियम’ तोड़े, और अंत में एक ऐसा प्रयोगात्मक और कई परतों वाला काम तैयार किया जिस पर हम गर्व कर सकते हैं.”

 

Author Yáng Shuāng-zǐ and the Translator Lin King

 

यह उपन्यास, जापानी औपनिवेशिक शासन के दौरान एक जापानी लेखिका आओयामा चिज़ुको द्वारा 1954 में लिखे गए आत्मकथात्मक जापानी उपन्यास के नए मंदारिन चीनी अनुवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो उनके यात्रा स्तंभों के संग्रह पर आधारित था.

कथावाचक जापानी उपन्यासकार चिज़ुको का पहला उपन्यास हाल ही में एक लोकप्रिय फ़िल्म के रूप में रूपांतरित हुआ है. उन्हें ताइवान पर शासन कर रही जापानी सरकार ने आमंत्रित किया है. यह एक व्याख्यान यात्रा है, लेकिन उन्हें सरकारी भोजों या साम्राज्यवादी एजेंडे में कोई दिलचस्पी नहीं है. वह कहती हैं

“यात्रा का मतलब है किसी दूसरे देश में रहना और वहां सामान्य जीवन के चारों मौसमों का अनुभव करना.”

 

पुस्तक की शुरुआत में ताइवान का वर्णन काव्यात्मक शैली में किया गया है

“खून जैसे लाल रंग का मांस पट्टियों में काटा हुआ, हुकों से लटक रहा था, मानो मांस की बनी कोई कलाकृति हो. मिट्टी जैसे भूरे और दलदल जैसे हरे रंग की जड़ी-बूटियां या तो गट्ठरों में बंधी थीं, या फिर बेंत की टोकरियों में बिखरी हुई थीं, या फिर उन्हें उबाल कर स्याही जैसे गहरे हरे रंग के घोल में बदल दिया गया था. कई ऐसी दुकानें थीं जहां लोग सूप के प्यालों में मिठाइयां डाल कर खा रहे थे; इन प्यालों में छोटे-छोटे टुकड़ों जैसी स्वादिष्ट चीज़ें थीं. कुछ टुकड़े सफ़ेद और मुलायम थे, तो कुछ पीले और हल्के पारदर्शी; और कुछ तो बिल्कुल गहरे काले मोतियों जैसे थे.”

 

एक ताइवानी महिला चिज़ुरु को आओयामा चिज़ुको की दुभाषिया के काम पर रखा जाता है. आकर्षक, विदुषी और हर काम को बारीकी से करने वाली चिज़ुरु चिज़ुको की ताइवान की यात्राओं का इंतज़ाम करती है. वह शांत लेकिन तेज और सम्मानजनक होते हुए भी मुखर है. वह जापानी और ताइवानी संस्कृतियों के बीच एक पुल है. वह चिज़ुको को ताइवान की बोलियों, स्वाद, सामाजिक जटिलताओं और ऐतिहासिक स्थलों से परिचित कराती है. चिज़ुरु भाषाओं के साथ पाक कला में प्रवीण और लोकप्रिय संस्कृति से भी अच्छी तरह परिचित है. चिज़ुको और चिज़ुरु साथ-साथ खाती हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाती हैं और संस्कृति, साहित्य और दैनिक जीवन के बारे में बात करती हैं.

चिज़ुको की दिलचस्पी पारंपरिक जापानी खाद्य पदार्थों में नहीं है. इसके बजाय वह ताइवान के अमीर लोगों के व्यंजनों से लेकर गरीब लोगों के जूट की पत्तियों से बने सूप तक का आनंद लेना चाहती हैं. चिज़ुरु खुद को चिज़ुको की इच्छाओं को पूरा करने के लिए समर्पित कर देती है और उनकी पसंद के सब व्यंजन बनाती है. वह भुने हुए बीज, मूंगफली, फवा बीन्स, लीची और शकरकंद के नुकीले, सख्त, बारीक बाहरी हिस्सों को छीलती रहती है ताकि चिज़ुको भीतर के स्वाद का आनंद ले सके. भोजन का सुगंधित वर्णन, पात्रों का मज़ाक और उनकी हंसी और साहचर्य के छोटे-छोटे क्षण महत्वपूर्ण हैं. बी-थाई-बाक, मु-इन-थंग, सशिमी और करी जैसे व्यंजनों की तैयारी, अपरिचित सामग्री और एक साथ खाने के कारण भोजन केवल व्यंजनों का विवरण नहीं रह जाता है, बल्कि इतिहास को उजागर करने और सत्ता के बारे में बात करने का एक तरीका है.

उपन्यास में प्रत्येक अध्याय का नाम चिज़ुको और चिज़ुरु द्वारा साझा किए गए भोजन के नाम पर रखा गया है. भोजन का विवरण भावनात्मक, राजनीतिक और ऐतिहासिक अर्थ से भरा हुआ है. प्रत्येक व्यंजन को व्यक्तिगत और राजनीतिक स्मृति से जोड़ा गया है.

जूट की पत्तियों का सूप चिज़ुरु की परवरिश की कड़वाहट और धैर्य का प्रतिनिधित्व करता है. जंगली जिनसेंग ताइवान के लोगों और संस्कृति के छिपे हुए मूल्य को दर्शाता है, जिसे अक्सर उपनिवेशवादियों द्वारा नकार कर दिया जाता है या गलत समझा जाता है. करी के विषय में चर्चा भावनात्मक पहलू को उजागर करती है. भोजन पात्रों की मनोदशा का भी प्रतीक है. चिरूजी के चले जाने के बाद चिज़ुको की ताइवान के ताजा, अनूठे व्यंजनों में रुचि खत्म हो जाती है और टोस्ट और ‘नेको-मनमा राइस’ जैसे साधारण जापानी घरेलू भोजन की ओर मुड़ जाती है.

मनोरम रेल यात्राओं, स्वादिष्ट भोजन और मज़ेदार बातचीत के बीच, चिज़ुको चिज़ुरु के प्रति आकर्षित होने लगती हैं. वह चिज़ुरु के लिए किमोनो खरीदती हैं. उन्हें यह समझ नहीं आता कि चिज़ुरु अपनी किस्मत को स्वीकार क्यों कर लेती है और अपने परिवार की मर्ज़ी के व्यक्ति से शादी करने के लिए क्यों तैयार हो जाती है. वह उसे अपने साथ जापान ले जाना चाहती है. चिज़ुरु उसकी देखभाल और स्नेह की सराहना करती है. लेकिन वह इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती है और चिज़ुको से दूरी बना लेती है.

चिज़ुरु से अलग होने के बाद चिज़ुको को समझ आने लगता है कि वह स्वयं को उस पर थोप रही थीं. उपन्यास में इन दोनों के बीच के अंतरंगता के रिश्ते को कभी भी स्पष्ट रूप से नाम नहीं दिया जाता है. इसके बजाय, साझा भोजन, इशारों और अधूरी बातचीत के माध्यम से एकतरफा समलैंगिक आकर्षण को बहुत संयम से प्रस्तुत किया गया है.

पुस्तक में दो अन्य पुरुषों और दो महिलाओं के बीच समलैंगिक संबंधों का भी उल्लेख किया गया है.

चिज़ुरु और चिज़ुको की दोस्ती उनकी सामाजिक हैसियत के बीच की खाई को पाट नहीं पाती है. चिज़ुरु बताती है कि उपनिवेशवाद ने पहले ही ताइवान की मूल संस्कृति को इतिहास के अवशेष में बदल दिया है.

“इस तरह की क्रूरताओं पर विलाप करते समय किसी को कितना पीछे जाना चाहिए?”

 

चिरूजी चिज़ुको को जूट के पौधों की कटाई देखने के लिए ले जाती है ताकि वह उसके लिए सूप बना सके. यह दृश्य चिज़ुको की कल्पना से बहुत अधिक जटिल प्रयास है

“जबकि अनुभवी जूट बीनने वाले एक नज़र में इस्तेमाल करने लायक, कोमल पत्तियों को अलग कर सकते हैं, नौसिखिए उन्हें छूने पर भी अंतर नहीं बता सकते हैं.”

 

मेजबान मिशिमा चिज़ुको को बताते हैं कि चिज़ुको में ‘बौद्धिक घमंड’ है

“जिस तरह से आप इस द्वीप के स्वादों के बारे में बात करती हैं, उससे मुझे ऐसा लगता है कि आप उनकी तारीफ़ इसलिए नहीं कर रही हैं क्योंकि वे स्वादिष्ट हैं, बल्कि इसलिए कर रही हैं क्योंकि वे अनोखे हैं—ठीक वैसे ही जैसे कोई किसी दुर्लभ जानवर की तारीफ़ करता है.”

 

चिज़ुको ताइवान में साल भर रह कर अपने अनुभवों को लिखती रहती हैं. उनके यात्रा वृत्तांत को मैत्रियोश्का गुड़िया की तरह कहानी के भीतर कहानी के माध्यम से उपन्यास में बदला गया है. पुस्तक को चिज़ुको द्वारा नागासाकी लौटने के वर्षों बाद लिखे गए जापानी उपन्यास के काल्पनिक अनुवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है. ताइवान के बारे में चिज़ुको के शुरुआती कॉलम 1938 और 1939 में लिखे गए थे. जब वह 1950 के दशक की शुरुआत में ‘ताइवान ट्रैवलॉग’ लिखने के लिए इस सामग्री को फिर से देखती हैं, तो उनके अपने देश जापान पर संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में विजयी मित्र देशों की ताकतों द्वारा कब्जा कर लिया गया है.

उपन्यास 1954 में जापानी भाषा में प्रकाशित हुआ था. जब हम चिज़ुरु से फिर से मिलते हैं, तो वह कोलंबिया में एक 70 वर्षीय महिला है जो मृत्यु से पहले उपन्यास को मंदारिन चीनी में अनुवाद कर देती है. उपन्यास को दो बार मंदारिन चीनी में अनुवाद किया गया था, पहले चिज़ुरु द्वारा और फिर दशकों बाद यांग शुआंग-सी द्वारा. पुस्तक में काल्पनिक और वास्तविक- दोनों अनुवादकों के कई उपसंहार और फुटनोट हैं.

 

ताइवान के इतिहास, भोजन और मौसमों से जुड़ी कवितायें याद रह जाती हैं. सोशोकु ने लीची की तारीफ में लिखा है,

“प्रतिदिन तीन सौ लीची मिलें
तो मैं खुशी से ताइवान में बस जाऊं.”

 

सोशोकु की एक कविता में फेरबदल की गई है,

“ताइवान में हर मौसम वसंत का है
नये नये फल रोज आते हैं.”

 

मिल कर भोजन करना आत्मीयता प्रकट करता है,

“सुकीयाकी आप उन्हीं लोगों के साथ खाते हैं, जिन्हें आप सुकी (पसंद) करते हैं.”

 

चेरी के बारे में प्रचलित कविता है,

“प्राचीन नारा का आठ चेरियों का गुच्छा
अब नौ द्वारों वाले महल के भीतर लटकता है.”

 

ताइवान के डबल ड्रैगन वाटरफॉल के बारे में एक कविता है

“तब इन झरनों को बहुत कम लोग जानते थे
ये हजारों वर्षों तक खाली पर्वतों के पीछे छिपे रहे.”

उपन्यास में ताइवान में बड़े पैमाने पर रेलगाड़ी से यात्रा की गई है. सड़कें जीवंत हैं, रेलवे स्टेशन इतिहास से भरे हुए हैं और बाजार में हलचल है. स्थानों का विवरण करने के बजाय वातावरण, भोजन और औपनिवेशिक युग की संस्कृति पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है. पुस्तक की संरचना बहुस्तरीय है और जापानी पात्र को कथावाचक बना कर अद्भुत प्रयोग किया गया है. उपन्यास में जापानी लेखिका की यात्रा तथा उसकी ताइवानी दुभाषिया के बीच के रिश्ते की जटिलता को देखते हुए ब्रिटिशकाल में अंग्रेजों और भारतीयों के रिश्तों पर लिखे गए ई. एम. फॉर्स्टर के उपन्यास ‘पैसेज टु इंडिया’ की याद आती है. मैत्री की भरपूर कोशिशों के बावजूद शासन करने वाले और उपनिवेशी लोगों के बीच दूरियां बनी रहती हैं. उपन्यास की सुंदरता इसकी लय और सूक्ष्म भावनात्मक बदलावों की स्वाभाविकता में है. हालांकि पुस्तक की पृष्ठभूमि औपनिवेशिक ताइवान की है, इसकी पैनी राजनीतिक दृष्टि इसे आज भी प्रासंगिक बनाती है.

 

सरिता शर्मा 

कविता संकलन ‘सूनेपन से संघर्ष, कहानी संकलन ‘वैक्यूम’, आत्मकथात्मक उपन्यास ‘जीने के लिए’, पिताजी की जीवनी ‘जीवन जो जिया’ प्रकाशित. रस्किन बांड की दो पुस्तकों ‘स्ट्रेंज पीपल, स्ट्रेंज प्लेसिज’ और ‘क्राइम स्टोरीज’, ‘लिटल प्रिंस’, ‘विश्व की श्रेष्ठ कविताएं’, ‘महान लेखकों के दुर्लभ विचार’, ‘विश्वविख्यात लेखकों की 11 कहानियां’ का हिंदी अनुवाद और रूमी : प्रेम की राह में प्रकाशित.

फिल्म ‘याद के बेनिशां ज़जीरों से’ का लेखन

ईमेल: sarita12aug@hotmail.com

Tags: 20262026 आलेख2026 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कारताइवान ट्रैवलॉगसरिता शर्मा
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Comments 2

  1. अपर्णा says:
    4 weeks ago

    सरिता उपन्यास से परिचय कराने के लिए आपका आभार। आप बहुत मनोयोग और दायित्व से अनुवाद और वैश्विक साहित्य से परिचय करा रही हैं। आपको शुभकामनाएं।

    Reply
    • Sarita Sharma says:
      3 weeks ago

      यह पुस्तक अब तक पढ़ी सब पुस्तकों से सर्वथा भिन्न है। उपन्यास, इतिहास, यात्रा और भोजन – सब एक साथ। प्रत्येक अध्याय में ताइवान के भोजन पर चर्चा। इसे पढ़कर लगा कि महान साहित्य कैसे लिखा जाता है। कथानक और शैली में नवीनता के माध्यम से ताइवान की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित किया गया है। पुरस्कृत पुस्तकें पाठकों और लेखकों को प्रेरित करती हैं। इन्हें जरूर पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि ये हमारे दिमाग की खिड़कियां खोल देती हैं और विश्व भर से विचारों और कथाओं की ताजा हवा को प्रवेश करने देती हैं।

      Reply

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