• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » कहानी : तेज़काटलिपोका का अंतिम युद्ध : निधि अग्रवाल

कहानी : तेज़काटलिपोका का अंतिम युद्ध : निधि अग्रवाल

by arun dev
January 6, 2026
in कथा
Reading Time: 5 mins read
A A
कहानी : तेज़काटलिपोका का अंतिम युद्ध : निधि अग्रवाल
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
कहानी

तेज़काटलिपोका का अंतिम युद्ध

निधि अग्रवाल

भाग्य पलटते देर नहीं लगती. नियति का एक टोहका और बन गए आप राजा से रंक.

कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ. यक़ीन जानिए रंक पैदा होना वैसा त्रासद नहीं जैसा वैभव पा उसे खो देना. कल तक मैं…  मान, ईर्ष्या और सराहना का पात्र था. अपने रूप पर मुग्ध, गर्व से दमकता था मैं! हर आँख मेरे लिए प्रशंसा से भर उठती, मेरी संगत में हर कोई स्वयं को अधिक सुंदर, अधिक वांछनीय, अधिक स्वीकार्य महसूस कर मुझे कृतज्ञता से निहारता.

आज दमघोंटू बेसमेंट से निकल मुझे महलनुमा घर में होना था लेकिन एक भूल, एक उछाल, एक टकराहट और रात के उचाट सन्नाटे में अब मैं दुकान के बाहर सड़क पर लावारिस पड़ा हूँ.

कल तक मेरी ख़ैरियत के लिए उठती आवाज़ें अचानक खो गई हैं.  किसी को मेरी परवाह नहीं, किसी को मुझसे लगाव नहीं. गहराती रात के साथ दिनभर का उल्लास, कोलाहल बुहार कर किनारे कर दिया गया है. सांझ, जली बत्तियों में से अधिकतर अब समाधिस्थ हैं. कुछ  अंधेरे का साम्राज्य ध्वस्त करने की ज़िद लिए अब भी चौकस हैं. दिनभर ठसम-ठस रहने वाली यह सड़क अब भायँ-भायँ करते सन्नाटे में डूब चली है, आकाश इस अवसादी चुप्पी पर स्तब्ध हुआ कुछ नीचे उतर आया है.

हमारी सर्द नज़रें मिलीं और कोहरा बरसने लगा. कोहरे का भार मुझे गर्त में धकेल रहा है. सड़क के उस पार लगा लैंपपोस्ट एक विशेष लय में जल- बुझ रहा है. मृतप्राय रोगी को बचाने के लिए विधाता जद्दोजहद कर रहा है क्या?

चौकीदार की लाठी और सीटी कुछ-कुछ देर में बज उठती है. जल्द ही वह सीधी जाती सड़क के पार लगे बड़े पीले गेट के पास अलाव जलाकर बैठ जाएगा. बदन को सहलाता मद्धिम ताप का नशा उसे उनींदा कर देगा. शरीर की गठरी ढीली पड़ेगी और खुलकर पसर जाएगी. काली गाय भी अपने बछड़े संग अलाव के मोह में वहीं संगत जमा लेगी. ठीक इसी समय, जबरन पहना दिए गए कपड़ों से मुक्ति के लिए संघर्षरत पगली भी अपनी पीली हंसी लिए वहाँ आ बैठेगी. किसी पेड़ की टहनी-सी पतली, रूखी उसकी पिंडलियों पर कुछ सूखे, कुछ ताज़ा खून की धारियां बनी होंगी.

आंव और मवाद उसकी उंगलियों पर चिपका होगा. दुर्गंध से बेजार चौकीदार उसे फटकारता उठ बैठेगा. वह अस्फूट भाषा  में गालियां देगी. चौकीदार लाठी दिखाएगा, वह किसी बिल्ली की भांति अपनी देह सिकोड़ पीले गेट के पार चली जाएगी.

असंख्य गोदामों-दुकानों वाली इस गजगजाती पुरानी गली ने रात के अंतिम पहर गहरी साँस भरना शुरू कर दिया है. हाथरिक्शा और टेंपो का जीवंत स्पंदन मेरे तन की न सही मन की पीड़ा को कुछ थाम ले रहा है. दो स्याह साए अपनी झुकी पीठ पर बंडल लादे बारी-बारी से मेरी ओर आ रहे हैं. उनके हाथ-पैरों की ऐंठी हुई माँसपेशियाँ ओस नहीं पसीने से भीगी हैं. सड़क की उखड़ी हुई बेतरतीब ईंटों में बिवाईयों से भरे उनके नंगे पाँव कई दफ़ा उलझ जा रहे हैं. सख़्त हो चली चमड़ी इन चोटों का कोई संज्ञान नहीं लेती. उनमें से एक की सांस उखड़ी सी है. भीतर भरा सब बलगम बाहर उड़ेल देने के प्रयास में वह रह-रहकर खांस उठता है. मेरे आस-पास दुराग्रही कुत्तों का जमावड़ा है. बार-बार दुत्कारे जाने पर भी वे वहीं बैठे हैं.

जगह बनाने के लिए मजदूर उन्हें पैर से धकिया रहे हैं. हल्की गुर्राहट संग नाराज़गी जताते वे अपनी जगह जमे हैं. पीक की बौछार करते मजदूर ने हट-हट किया है. कुछ लाल चकत्ते मेरे ऊपर भी आ गिरे हैं. जी घिना गया है. बोरियों में लिपटे कई बंडल एक के ऊपर एक मेरी दाईं ओर रख दिए गए हैं. सबसे ऊपर रखे बंडल का एक कोना मेरे सिर पर छाया कर रहा है. दूर से देखने पर हमारा सह-अस्तित्व मेसोअमेरिका के विकलांग देवता तेज़काटलिपोका का स्मरण करा सकता है. नहीं, देवता और दर्पण आत्मवलोकन को बाध्य करते हैं. उनका सामना इन दिनों कठिन हो गया है. इस द्वंद्व से बचने के लिए ही मेरे ठीक सामने कई बड़े बंडल रख दिए गए हैं. अपने खंडित अस्तित्व संग मैं समूचा ओझल हो गया हूँ.

वाहनों के जाने पर उपजी चुप्पी में  किसी अनचीन्ही आशंका से भरे कुत्ते सम्मिलित स्वर में रोने लगे हैं. पान के खोके के पास सोने वाला भिखारी इस रुदन पर अपनी लंबी जटाओं में से जुएँ बीनना छोड़ अचानक हँसने लगा है. पंखों वाला एक कॉकरोच सरसराता हुआ मेरे ऊपर दौड़ गया है. नीम अंधेरों में अपने ज़ख्मों की दर्दभरी तड़कनों से जूझता, अतीत राग में डूबा अब मैं उस अनाड़ी कर्मचारी के प्रति रोष से भर उठा हूँ जिसकी लापरवाही के चलते मेरा कुभाग जाग उठा था. यूँ मेरा जीवन सरल कब रहा! मैं पैरों तले रौंदे जाने वाली रेत था. कितनी ही सभ्यता, कितनी ही संस्कृतियों  की गाथा अपने भीतर समेटे, तपते दिन, ठंडी रातों में कभी हवाओं संग थिरकता, कभी आंधी संग भटकता प्रसन्नचित बंजारा जीवन जीता, कभी राह बन जाता… कभी राह की बाधा. फिर बड़े खिलाड़ी आए. मुझसे मेरी ज़मीन छीन मुझे भट्टियों में झोंक दिया गया. तपाया-गलाया गया. तपकर कुंदन नहीं कांच हो गया…. एक सुंदर निर्दोष सजीला कांच, जिसे विशिष्ट आदमकद  ट्रूमो दर्पण के लिए चुन लिया गया.

स्तुति गान करते, प्रशस्ति पत्र बाँटते शोषक उद्धारक लगने लगते हैं. मैं भी आत्ममुग्धता के उथले सागर में डूब चला था.  मुझ पर सुनहरी परतों का लेप किया गया. मेरे किनारों पर उकेरी गईं वन्य देव-देवियों, जीव-जंतुओं और बेल-बूटों की महीन नक्काशियों ने मुझमें अपूर्व सौंदर्य और विलास भर दिया. रत्न सरीखे चमकते नगों और रंगों ने भव्यता दी. जिस शाही घर मुझे जाना था वहाँ एक राजसी फ्रेम मेरे लिए प्रतीक्षित था.

विदाई के दिन चार लोग मुझे दुलारते हुए ऊपरी तल को लिए जाते थे.  अदेखे, अजाने, अमीर  स्वामी से मिलने की उलझी-सी उत्सुकता और बेचैनी से भरा मैं, उसका आभासी चित्र मन में उकेर रहा था. स्वामी? मन कसैला हो उठा. अपने दंभ पर ज्यों आत्मप्रहार किया था मैंने. यथार्थ के हाथ से मेरी डोर छूट गई थी. मैं स्वप्न लोक में विचर रहा था.

 

2)

‘ध्यान से… कोने बचाना… सीढ़ी देखना…’ जैसे निर्देशों के बीच तेज़ चीख के साथ आख़िरी सीढ़ी पर एक वृद्ध कर्मचारी अचानक उछल पड़ा था. मैं तंद्रा से जागा और भरपूर प्रयासों के बावजूद अन्य तीन के हाथों से भी फिसलता अपनी भारी-भरकम देह लिए ज़मीन पर जा लगा. इस धमक के बाद दोनों तल आशंकित चुप्पी से भर गए. अनेक चेहरे मेरे ऊपर छा गए. उनके दिल ही न टूटे थे मेरा बेदाग तन भी छोटी-बड़ी कई तरेड़ों से भर गया था. एक लंबी तरेड़ तो बीचों-बीच बन गई थी. अब मैं किसी शहर की नदियों का पता बताते पुर्ज़े जैसा दिख रहा था. इनमें क्या वह पुरोधा नदी भी शामिल है जिसके थम जाने से पहला दर्पण बना था?

धमक की तरंगें दूर तक गई थीं. ‘क्या हुआ? क्या हुआ?’ के साथ कई नए चेहरे दृश्य में शामिल हुए. तिलमिलाए मालिक ने आदतन गालियाँ बरसाई. अन्य तीनों ने अपने कंधे झाड़ते पूरा दोष उस उम्रदराज़ नाटे आदमी के सिर रख दिया जिसके तलवे में अब भी सीधी खड़ी कील धँसी थी.

किसी ग्राहक संग आए बच्चे ने मुझ में झाँका. ‘टूटे दर्पण में नहीं झाँकते’ कहते हुए माँ ने पीछे खींचा. अपमान के लिए मेरी मानसिक तैयारी न थी. मेरा सब गुरूर ढह गया. ग्राहक मालिक पर चिल्लाया. मालिक कारीगरों पर. ग्राहक ने पैसे वापस माँगे, मालिक ने माँगा समय. वृद्ध आदमी दया माँगने की हिम्मत न जुटा सका. वह कोने में खड़ा काँपता रहा.

“भाग साले… अब शक़्ल मत दिखाना.” मालिक गुर्राया.

तलवे से रिसते ख़ून की लकीर छोड़ता वह चला गया. धूल ने उसके घाव पर लेप लगा दिया होगा जैसे धुंध ने मेरे ऊपर लगा दिया है.

“अब क्या यह यहीं रास्ते में पड़ा रहेगा. बाहर पटको.” मालिक पुनः गुर्राया था.

यह पटकना मेरा ही होना था. चार नए लोगों ने किसी लाश की तरह मुझे उठा, दुकान के बाहर दीवार से सटा खड़ा कर दिया. जीवन से बेदख़ल हो कब्र में उतरते मुर्दे का दर्द उस वक्त मुझे गहरे से महसूस हुआ. इस दीवार पर पीक और पेशाब की मिली-जुली चित्रकारी उबकाई ला रही थी. अवहेलना, तिरस्कार, ग्लानि और दर्द  से मेरी आँखें भर आईं. मैं कराहता रहा, कहीं कोई दिलासा नहीं.

सिलवटों से भरी दिन की चादर फटकार के पलट दी गई. चित्रों के रंग गाढ़े हो गए. मेरे दाईं ओर जाती सड़क के दूसरी ओर स्थित शराब की दुकान के आख़िरी ग्राहक भी घर लौट गए. उसके बगल में ओझल- सी सिगरेट- पान की दुकान की रौनक भी जाने कब झर गई. घर भी नींद के आगोश में जा सिमटे.

 पोषम  पा भई पोषम पा दिन डाकू ने क्या किया? तारों ने बुदबुदाया.
100 रुपए का सच छुपाया, दस रुपए का भ्रम फैलाया. सड़क ने जवाब दिया.

इतना स्वांग समेटने सड़क की झोली छोटी थी. दो तारे टूटकर गोद में आ गिरे. सड़क चौड़ी हो गई. समूचा अंधकार उसके भीतर समा गया. अदम्य दर्द से सुन्न होती शिराओं संग, खेल में डूबता उतराता मैं चेतना खो नींद की टूटी-फूटी जेल में क़ैद हो गया.

सुबह की पहली किरण के साथ एक कंपकंपाता खुरदुरा स्पर्श मुझे महसूस हुआ. सामने वही लापरवाह वृद्ध है; किसी जीर्ण इमारत-सा उजड़ा, बदहाल! अपनी सर्द हथेली से मेरी धूल-धुंध पोंछता, मेरी हर तरेड़ हौले-हौले सहला रहा है. वह मुझमें झाँक रहा है, मैं उसकी आँखों में. बदहाली की अनगिन खरोंच उसकी झुर्रियों में दर्ज हैं. दुबलाई देह और मटमैली पीली आँखें कर्जों के बोझ से झुकी जा रही हैं. ज़रा-सी ख़्यालख़राबी पर चटक जाना कैसा दोषपूर्ण गुणधर्म है मेरा! अहा, मैंने ही इसका दुर्भाग्य गढ़ा है. वह अब भी सामने खड़ा है. मुझ पर टिकी उसकी नज़र अपनी छाया को नहीं उसके पीछे, बहुत पीछे चलायमान दुनिया को विरक्त भाव देख रही है. इस ठंडेपन पर मैं सिहर उठा हूँ. अपराधबोध से भरा चिल्ला उठा हूँ – मत देखो, मत देखो मुझमें. चटका दर्पण अपशकुन होता है.

उसने सुना नहीं पर वह आहिस्ता क़दमों से चलता दुकान की सीढ़ियों पर जा बैठा. बेध्यानी में वह अपना तलवा सहला रहा था. पहले साथी कर्मचारी आए. उसका कंधा दबाया और भीतर चले गए. पीछे मालिक आया और ग़ुर्राया. उसका माफ़ीनामा ठुकरा दिया गया. वह हकलाता, गिड़गिड़ाता हुआ बीस दिन की तनख़्वाह माँग रहा है, मालिक चिल्लाता हुआ हर्जाना. हर्जाना उसके सात साल नहीं सात जन्म लील जाएगा. वह सिर झुकाए दुकान से निकल गया…  बिना मेरी ओर देखे.

वह मेरी चिंताओं में शामिल हो चला है. इस उम्र में जीविका कमाने की उसकी मजबूरियों और विकल्पों पर विचार करते हर शनिवार आने वाले भिक्षुक का ध्यान चला आया है. उसका रुतबा भिक्षुक नहीं कर वसूली अधिकारी जैसा है. कोई उससे जिरह नहीं करता, दुत्कारता नहीं. काले कपड़े और लंबी उलझी जटाओं में वह चील के पंख फंसाए रहता है. घोंघे के खोल से बनी लटकन एक कान में. तांबे- पीतल के कंगनों के बीच एक फिरोजी नगों का बेमेल कंगन चमकता है. दाएं पैर में बंधे काले धागे में तांबे के कई जानवर गूँथे हैं जिनमें से भैंसे का सिर उसके टखने पर टिका रहता है. हाथ में लटकती छोटी- सी बाल्टी में भरे तेल के बीच से एक देव आकृति ऊपर उठी रहती है. उसके आते ही तयशुदा सिक्के बाल्टी में डाल दिए जाते हैं.

सर्द हवाओं के बीच एक छोटा बादल मेरे ठीक ऊपर फट पड़ा है. दुकान के ऊपर के रिहायशी भाग में से किसी ने बड़ी चादर निचोड़ डाली है. कुछ समय बाद हवा में लहराता काले- सफ़ेद बालों का एक बड़ा गुच्छा मेरे सिर पर आ ठहरा है. मैं एक ठंडी आह भर रह गया. बेघर की अवमानना का हर किसी को अधिकार है. मेरे सामने रखे कार्टन गोदाम में ले जाए जा रहे हैं. रात भर उन पर चिपके चमगादड़ अब भाग निकलेंगे या अब वहीं अपनी नई दुनिया बसा लेंगे? इन बोरियों पर छूट गए बाल, लार, वीर्य आदि जैविक नमूनों को खंगाल फोरेंसिक एक्सपर्ट उन सभी मजदूरों तक पहुंच सकेंगे लेकिन उनके संघर्षों  तक पहुंचने का कोई ब्लू प्रिंट, कोई फिंगर प्रिंटिंग कहीं नहीं है.

धुले आसमान की नर्म उजली धूप मेरे बदन से अठखेली करती चारों ओर रंगीनियाँ बिखरा रही है. चढ़ते दिन के साथ तीनों सड़कें दौड़ चली है लेकिन ऐसी तेज़ भी नहीं कि आते-जाते मेरे उजड़े रूप- रंग की उपेक्षा की जा सके. मेरे सामने से गुज़रने पर न ठिठकना अब भी असंभव है. क्या यह दिलासा मुझे संभाल सकेगा?

कुछ देर में सूरज सिर पर चढ़ आयेगा. एक गब्दूला बच्चा, लॉलीपॉप चूसता, पैर से पत्थर धकेलता चला आ रहा है. भय मेरे मन पर तारी हो गया. पत्थर को चोट देते जूते की धूल- धूसरित आत्मा का मटमैला रंग उसकी सतह पर भी उतर आया है… नहीं, नहीं जूते तो बस कठपुतली हैं पैर तो बच्चा चला रहा है और उसकी आत्मा का रंग उजला है. बेध्यानी में किए गुनाहों का इंसाफ कैसे होता होगा? पत्थर अब उछलकर मेरे सामने आ गिरा है. मैं स्थिरचित्त रहा. टूटे को और क्या ही तोड़ेगा. जब खोने को कुछ न हो तो कैसा निर्भार हो जाता है जीवन! मेरी कोमल दृष्टि अब उस पर टिकी है. रुई का फुदकता हुआ गोला हो जैसे. लाल चेक की पेंट, सफ़ेद क़मीज़, लाल कोट और टोपी. खुशियाँ बाँटने वाला सेंटा!  लॉलीपॉप चूसता वह बिल्कुल मेरे सामने आ खड़ा हुआ है वह अभी उस निर्दोष कच्ची वय में है कि उसका संपूर्ण अस्तित्व मेरे साबूत हिस्से में समा सकता है. वह कुछ पल मेरे चमकीले रंगों को कौतूहल संग देखता रहा. फिर मेरी हर तरेड़ को कभी अपने चेहरे, कभी हाथों पर ओढ़ने लगा.  हँसा, मुस्कुराया, जीभ निकाली, मुँह बिचकाया… उसके लिए यह  रोचक खेल हुआ. मानो यह तरेड़े दोष न हों, किसी गोपन खजाने तक पहुँचाने का कोडेड नक़्शा हों.

जल्दी इस खेल से भी उसका चंचल चित्त ऊब गया. उसने किसी नए कौतुक की आस में एक गहरी नज़र चारों ओर घुमाई. कुछ भी उसकी दृष्टि को बाँध न सका. उसकी आँखों में एक चमक कौंधी. मुस्कान रोकने के प्रयास में होंठ थिरकते हुए गोल हो गए. उसने कोट की भीतरी जेब से एक चमकीली पेंसिल निकाली. यह वैसी आम पेंसिल नहीं है जो मेरी निर्मिति में आस-पास बनी रही थीं. यह मुझ जैसी चमकदार और रंग-बिरंगी है. इसकी देह पारदर्शी है जिसके भीतर तराशी हुई कई छोटी-छोटी नोंक भरी हैं. इसकी देह पर भी महीन कलाकारी से कहीं रंग-बिरंगे जिराफ तो कहीं खरगोश बने हैं. पेंसिल पर पेन जैसी टोपी भी है. पेंसिल कोट की ऊपरी जेब में खोंस वह मुझ में उसकी छवि निहार रहा है और मैं उसके चेहरे पर खिली तिर्यक चंचल मुस्कान को. अहा, बाल गोपाल- सा दिव्य अम्लान रूप!

यकायक पीछे चली आई माँ ने उसके सिर पर चपत लगाई है, “तूने ही चुराई है न? कह रहा था मैंने नहीं ली. घर चल तू.” वह उसे घसीटती हुई ले जा रही है. मेरा मन भर आया. क्या बच्चा फितरती चोर है? नहीं, बस इस पेंसिल ने उसे लुभा लिया होगा. खींचातानी में पेंसिल गिर गई है. उसके भीतर भरे सब टुकड़े बिखर गए हैं. बच्चे ने अपने पैर जाम कर लिए. माँ को रुकना पड़ा. वह पीछे लौटा है और सारी नोंक समेट रहा है. माँ उसे लगातार खींच रही है. एक नोंक पीछे छूट गई है. वह पेंसिल भी मुझ-सी ही खंडित हो गई है. जो देखेगा शोक जताते कहेगा – कैसी सुंदर पेंसिल की यह गति! उफ्फ़, संसार का अधिकांश सौंदर्य अंततः अधोगति को प्राप्त हो जाता है! खुद चरमराकर मैं औरों का विखंडन, उनकी दरारों का दर्द स्पष्ट देख पा रहा हूँ… महसूस कर पा रहा हूँ. मेरे पास पड़ी छूट गई लॉलीपॉप पर चींटियों की जमात जुट गई है. किसी और की संपत्ति का सुख भोगते उन्हें कब कोई ग्लानि है!

बीतते दिन के साथ मैं कुछ संयत हो चला हूँ.  नियंता को खुद को सौंप दिया है. दोपहर होते-होते लुभावनी भीनी महक हवा का आँचल पकड़े

चली आई है. इंद्रियाँ कैसी चंचल होती हैं. मैं साधुत्व त्याग पुनः रोमांचित हो उठा हूँ. एक सजीला, लजीला युवा कोई गीत गुनगुनाता चला आता है. रह-रहकर शोख सुर्ख मुस्कान से चेहरा चमक जा रहा है. उसका पूरा ध्यान पीछे आती लड़की पर है. ज्यों नवजात प्रेम में दो आँखें सिर के पीछे भी उग आई हों. दोनों के बीच बढ़ती दूरी से भयभीत वह मेरे सामने आ रुका है. अपने कॉलर बिठाते वह ठिठका है. आड़ी तिरछी कुरूप रेखाओं को लक्षित कर गहरा अफ़सोस उसकी आँखों में तैर गया है. उसने सावधानीपूर्वक अपना चेहरा मेरे निर्दोष भाग में अवस्थित कर लिया. बाल सँवारते उसकी नज़रें ज़रा दूरी पर फलों का मोल-भाव करती लड़की पर टिकी हैं. उसके देखने में मेरा देखना भी शामिल हो चला है. लड़की हल्के गुलाबी रंग की साड़ी और सफ़ेद स्वेटर पहने है. उसके पहनावे में कशिश है. गहरा गुलाबी स्कार्फ उसने अपने सिर पर यूँ लपेटा है कि उसके चेहरे की हल्की झलक-सी ही दिख रही है. इस झलक के आधार पर भी यह तय है कि उसके पूछने पर ‘ फेयरेस्ट’ के चुनाव में किसी दर्पण को कोई दुविधा नहीं होगी. डरता भी हूं, नि:संकोच सत्य से कई दफ़ा निर्दोषों के प्राणों पर ही बन आई है.

धूप से बचने वह बड़े फ्रेम का काला चश्मा पहने है. वह ज़रूर बाईं ओर  जाती सड़क से जुड़ी नई बस्ती से इधर आई होगी. वहाँ कुलीन कोठियाँ हैं. दाईं ओर की सड़क गंज में खुलती है. उधर से आती हवा और लोगों में मसालों की धसक बनी रहती है. साथ लिए टोट बैग में फल रखवा वह मेरी और न आकर, विपरीत दिशा में लौट चली है. लड़के ने  निराश हाे गहरी साँस छोड़ी और आगे बढ़ गया. कुछ क़दम आगे बढ़, उसने मुड़कर देखा. दृश्य अब उजड़ चुका था.

मेरे पुराने साथी, मेरे सृजक आते-जाते मोहवश मेरे पास चले आते हैं. मुझे काँट-छाँट कुछ उपयोगी बनाया जा सकता है क्या? जैसी बहसें उनके बीच चलती हैं. मेरा बुझा दिल और बैठ जाता है. मालिक अनुभवी वास्तुविद् को लेकर आया है जिसके अनुसार टी पॉइंट पर दुकान का होना आपदाओं को आमंत्रित करता है. फिर उस वृद्ध को क्यों दंडित किया जा रहा है मैं पूछना चाहता हूँ. उनके पास अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न हैं. कौन मेरे प्रश्नों के उत्तर देगा!

कई उदास आँखें मेरे भीतर भरती जा रही हैं. सामूहिक पीड़ा की एक बड़ी तरंग से विचलित होते मैंने पलकें मूंद लीं. आँखें खुलने पर मैं जड़ हो उठा हूँ. सपना है या सच? यह कैसा संयोग है. ओ सजीले नौजवान, तुम किस दिशा चले गए. तुम्हें कुछ धीरज रखना था. पुकारूँ भी तो कैसे! नाम नहीं जानता.

गुलाबी साड़ी वाली लड़की मेरे सामने खड़ी है. आत्मछवि से सहमा, लज्जित, उसकी उपस्थिति से स्तब्ध मैं उससे मिलने का साहस जुटा रहा हूँ. उसने अपना चश्मा उतारा. उसकी आँखों का समूचा गीलापन मेरे भीतर उतर गया. लहूलुहान विश्वास की ज़मीन पर प्रेम का कोंपल पनपने की कोई संभावना यहाँ नहीं दिखती. आँखों के नीचे स्याह गड्ढे हैं. मेरी ही तरह वह भी स्वयं को उसी गहरे आश्चर्य से एकटक देख रही है. उसकी आंतरिक टूटन के समक्ष मेरी तरेड़ ओझल ही रही हैं. उसने स्कार्फ माथे से कुछ पीछे खींचा, वहाँ चोट का ताज़ा निशान है, होठों के दाएँ किनारे पर जमा हुआ ख़ून. मैं सहम गया. सांसारिक निर्ममता से आहत, आईनों  के भीतर छुपकर रहने वाली ‘ ब्लडी मैरी’ क्या बिन पुकार, बिन अंधकार ही बाहर आ खड़ी हुई है? मैंने लड़की के नाख़ून देखे. उसने किसी का मुँह नहीं नोंचा, उनमें ख़ून नहीं भरा है.

उसके भीतर गड्डमड्ड होती कटु स्मृतियाँ रेल के डिब्बों-सी धड़धड़ाती निकलती जा रही हैं. इस गति से कि समूचा दृश्य नहीं बस पीड़ा की एक अंतहीन रेखा मेरे समक्ष खिंच गई है. मैं भभककर रो पड़ने को था जब उसका चेहरा अचानक कठोर हो चला. आँखों की पुतलियाँ सिकुड़कर मुझ पर केंद्रित हो गईं. उसकी नाज़ुक उँगलियों में हरकत हुई. पर्स खोल लिपस्टिक निकाल होठों पर लगाई और स्कार्फ बैग में ठूँस आगे बढ़ गई. आत्मचेतना का ऐसा अकस्मात पल कभी मेरे जीवन में भी आएगा क्या? मैं उससे फिर मिलना चाहता हूँ.

सूरज ने अपना पूरा ताप धरती पर उड़ेल दिया है. रात भर ठिठुराए जिस्मों को यह ताप भा रहा है. पहने हुए ऊनी कपड़े अब लोगों ने तह लगाने शुरू कर दिए हैं. वे आते- जाते एक उचटती नज़र मुझ पर डाल दे रहे हैं. मैं गहरी नज़रों से उन्हें पढ़ रहा हूँ. भीड़ की किसी लहर ने चौकोर चेहरे वाले मझोले प्रौढ़ व्यक्ति को मेरे सामने ला खड़ा किया है. अपनी बड़ी हुई दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए उसने लंबी उबासी ली है. वह भी मेरी तरह उजड़ा-सा दिखता है लेकिन उसकी गठी हुई अलसाई देह में  फ़ुर्ती की लिखावट मौजूद है. पैंट की पिछली जेब से एक टूटी कंघी निकाल उसने बाल बनाए हैं. हाथ उठाने पर रोएँदार ऊनी जैकेट भी कुछ ऊपर उठ गई है. लकड़ी के मूठ-सा कुछ अचानक उजागर हो गया है. भय से मैंने उसकी आँखों में झाँका. उफ्फ, अधूरे जीवन का भी मोह होता है. वह भी शंका से भर उठा. मूठ को ऊपर धकेला. जैकेट की चेन खोल भीतर रखे सामान को व्यवस्थित किया. यह छोटी धारदार कुल्हाड़ी है. उसकी टकटकी से  प्रतिबिंब शैतान में बदल गया. अचानक जगुआर जैसी पैनी हो चली उसकी आँखें कह रही हैं कि वह निश्चित ही कोई पेड़ काटने नहीं जा रहा. एक क्रूर संकल्प के अतिरिक्त  कहीं कोई  उत्तेजना, ग्लानि या हिचकिचाहट उसके चेहरे पर नहीं दिखती. रंग बदलने में माहिर, कच्ची उम्र से शिकार करता बिड़ाल खूँख़ार हो चुका है. वह बेफ़िक्र क़दमों से भीड़ में ओझल हो गया.

 

3)

घर निकाले का मेरा तीसरा हफ़्ता है. कहाँ मुझे किसी षोडशी के अंतःमहल का साथी होना था, कई कोमल मनोभावों, प्रणय लीलाओं का साक्षी होना था, उसके अपूर्व सौंदर्य को अपने भीतर संजोना था और कहाँ अब मैं आस-पास के छज्जों पर बंधी रस्सियों पर आड़े तिरछे टंगे अंत:वस्त्रों , गोबर- कीचड़ सनी पूँछ हिलाते मवेशियों और नाक सिनकते, गला खँखारते राहगीरों की छवियों से भरा वितृष्णा और घृणा से अकबका उठा हूँ. बेचैनी की एक तेज़ उठती लहर मुझे फट पड़ने को प्रेरित करती है फिर भीगी आँखों से ईश्वर को पुकारता मैं पूछ उठता हूँ – आख़िर कब तक?

मेरे भीतर हिनहिनाते प्रश्नों का भरा- पूरा अस्तबल बन चला है. जाने वे कैसे दर्पण होते हैं जिनमें लोग प्रश्नों के उत्तर पा लेते हैं. मैं अपने मामूलीपन पर लज्जित था. निश्चित ही मैं वल्कन का बनाया जादुई दर्पण न था जो भूत, वर्तमान और भविष्य दिखा सकता. वीनस की तरह कुछ छिपा लेने का कौशल भी मुझ में न था. देवताओं का आह्वान करने, आत्माओं को क़ैद करने या बुरी शक्तियों को दूर भगा सकने का भी नहीं. अगर मेरे बस में होता तो मैं सबसे पहले भिखारी को क़ैद कर लेता. तब वह न दिन में लोगों की गालियाँ लेता न रात होते ही नाक से नशा. …या वहशी लाल आँखों संग वह सोए कुत्तों की ओर आता तो मैं  बचाव में कुत्तों को ही अपने भीतर खींच लेता कि वह उनमें से किसी एक को अपने बिस्तर में न ले जाने पाए. रात भर बंदी रहे कुत्ते बौखलाहट में ग्राहकों को काटते हैं, दुकानदारों पर चिल्लाते हैं, लात- पत्थर खा मिमियाते हुए किसी कोने में सिमट जाते हैं लेकिन एकजुट हो भिखारी की बोटियाँ क्यों नहीं नोंचते? हर सुबह मोल का दूध- ब्रेड कुत्तों को खिलाने वाले भिखारी का मूल चरित्र कौन सा है?वह दया का पात्र है या घृणा का? और असमंजस तो मुझे इन कुत्तों के शोषण पर द्रवित होते हुए भी होता है जिन्होंने एक नवजात शिशु का मांस एकजुट हो नोंच खाया था. किसी निर्जीव गेंद की तरह उसे खींचते-पटकते यह कुत्ते जरा न पसीजे थे. ये कुत्ते अपराधी हैं या वह माँ जिसने बच्ची को जन्म दे, यूँ फेंक दिया जैसे झालपुरी खा काग़ज़ फेंक दिया जाता है या फिर वह हवसी आदमी जिसने एक पगली की देह से भी परहेज नहीं किया. जंगल की तलाश में यहाँ चला आया बंदर भी कम कठकरेज नहीं. कुत्ते माँस के लोथड़े उछालते रहे और वह छत की मुंडेर पर बैठा आत्मरति में डूबा रहा. कुत्तों के इस कुकृत्य पर सड़क भी बस ज़रा देर ठिठकी थी फिर अपनी गति से दौड़ने लगी थी. पगली भी जरा देर मेरे पास ठिठकी थी, अपने उघड़े, पिचके पेट या स्तनों से चू रहे दूध के गीलेपन पर नहीं बल्कि योनि के भीतर उभर आए छालों से होते रक्तस्राव पर विस्मित होती, उसकी इस उजड्डता और निर्लज्जता को कोई लक्षित करे इससे पहले ही चाय वाले ने पुकार लिया था और वह उमगती हुई आगे बढ़ गई थी. गर्भाशय में पला शिशु पैदा होते ही लील गया लेकिन उसके मुहाने पलता ट्यूमर और भारी हो गया. बहते खून से चिपचिपाती जांघें उसकी चाल धीमी किए हैं लेकिन उमंग नहीं.

वह पहले की भांति कभी गीत गाती है कभी गालियों की बौछार करती है. उसकी भाषा ही नहीं उसके मन की भी कोई थाह मैं नहीं पाता. हाँ, यह जानता हूं कि गर्भवती सुअरी उसकी अवस्था देख सहम उठी थी. वह कई दिनों गुमसुम बनी सोचती रही कि कुत्तों से भरी दुनिया में बच्चे जन्मना कितना सही है? सुअरी के पास जन्म स्थगित कर देने का कोई विकल्प भी नहीं! इन दिनों उसे चुप सी लगी है. अपने अजन्मे बच्चों की चिंता में नहीं, पुलिस वैन में ठूँसकर ले जाई गई पगली की चिंता में. पगली चली गई , उसकी पोटली छूट गई. पोटली में भरे कच्चे-पक्के टमाटर इधर-उधर फैल गए. खुफिया जासूस… करोड़पति भिखारी उसे बचा न सका. निर्विकार भाव टमाटर बटोर, उन्हें घूरे के ढेर पर उगे टमाटर के पौधे के पास दफना दिया. वही पौधा जो पगली की अकूत संपत्ति था, जिसकी रक्षा वह मन- प्राण से करती थी.

सड़क राहत न पा सकी. सड़े टमाटरों की दुर्गंध ने उस पर कब्ज़ा कर लिया. मैं सड़क के नर्क से मुक्ति के लिए तड़प उठा हूं. ऐसी ही तड़प लिए, अंधेरों से जूझते कितने ही लोगों ने मुझ संग समय बिताया है. देवताओं से न सही स्वयं से बात करते, अपने कई अंतरिम रहस्य, अपनी खुशी, अपनी उपलब्धियाँ, अपने भय, अपने संशय, अपने द्वंद्व, अपने उत्पीड़न, मुझे सौंपे हैं. कभी संबल पाया है तो कभी मेरी, कभी अपनी नियति पर अफ़सोस जताया है. कितने ही लोगों ने अपना रूप सराहा है, कितनों को मेरी ही भाँति आत्मस्वीकार से जूझते पाया है. भूरी बड़ी चिड़िया और मैना का एक जोड़ा दिन निकलते ही मुझमें ठूँग मार अपनी चोंच लहूलुहान कर लेने को आमादा हैं जबकि मेरे नीचे बिलबिलाते कीड़े उनकी भूख मिटा सकते हैं. रात अपनी चमकीली आँखें मुझ में गड़ा देने वाली काली रहस्यमयी बिल्ली दिन में मेरे पास नहीं फटकती. उसकी आँखें चकोर पंछी की याद दिलाती हैं. क्या विषैले लोगों को देख उसकी आँखें लाल हो उठी हैं. बिल्ली अपनी मर्ज़ी की मालिक हैं. वे दूसरे लोकों के भेद भी जानती हैं. भेद जान लेने की कला कुछ न बदल पाने की बेबसी को और बढ़ाती होगी. उस बेबसी से मुक्ति के लिए ही वह फुसफुसाकर मुझसे पूछती है, “क्या तुम कोई पौराणिक जादुई दर्पण हो?

मुझे लगता है कि जादू दर्पण में नहीं दृष्टा में होता है. अपनी एकाग्रता और अंतःचेतना से इस अनंत सृष्टि के किसी भी छोर पर पहुँचा जा सकता है, उसे वश में किया जा सकता है. भौतिक, जिस्मानी छवियों से परे मन की सिलवटें भी देखी जा सकती हैं. अवचेतन में बनती अतीन्द्रिय छवियाँ भी चेतन इंद्रियों के अनुभवों से अछूती नहीं होती.

चेतन-अचेतन के मध्य संवाद का वाहक बना मैं निर्विकार भाव सब देखता- सुनता रहता हूँ. उन अवांछित स्याह हृदयविदारक छवियों को भी जो रूह कंपा देती हैं जैसे कि वह रात जब वृद्ध कर्मचारी मेरे सामने आकाश की ओर हाथ उठाए विलाप कर रहा था. अचानक उसने अपने गंदले कपड़े उतार फेंके. सर्वांग नग्न हो, दोनों मुट्ठी भींच वह चीख उठा. गली की नींद नहीं टूटी लेकिन गली के इकलौते पेड़ पर सोए पंछी अकबकाकर उड़ गए. कुत्ते उछलकर भिखारी की चादर में घुस गए. बिल्ली भयभीत हो मेरे और दीवार के मध्य फैले मकड़जाल में आ छुपी. वृद्ध के थरथराते प्रतिबिंब संग मैं भी काँप उठा.

उसकी एक-एक पसली उभर आई.  गले की नसें फूलकर फटने को हो गईं. भीतर धँसे गालों की अंदरूनी परत आपस में सट गई. जाले पड़ी आँखों से आँसू बहते रहे, मुँह से लार. दबे कुचले दुर्बल जिस्म की ऐसी लंबी तीखी हाहाकारी चीख जो बरसों से भीतर धधकते किसी ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी थी. यह इस दुनिया का दुर्भाग्य है कि वह ऐसी सर्द हो चली है कि इस लावे से कहीं कुछ नहीं जला. दूर तक छिटकते संताप के छर्रों से रात की तटस्थता में एक खरोंच तक नहीं आई. चीख मद्धिम होती गई. उसका तना शरीर ढीला पड़ता गया. निर्जीव घुटने अचानक मुड़े और वह कटे पेड़- सा वहीं ढह गया. यह दृश्य किसी रंगमंच पर घटित हो रहा होता तो तालियों से आकाश गूँज  जाता. उसके ऑटोग्राफ के लिए लंबी लाइन लग जाती लेकिन यहाँ इस अंधियारी सर्द रात में कोई दो हाथ भी उसके लिए न जुट सके. बीच नाटक ही पर्दा गिरा, स्क्रिप्ट फाड़ वह नेपथ्य में गुम हो गया. आक्रोशित बिल्ली ऊपरी छज्जे से नीचे कूदी और चूहे को मसल डाला. आती- जाती गाड़ियों ने चूहे के कभी होने के सब निशान मिटा दिए.

जैसे दिन का उजास रात के राज छुपा लेता है. धूल की मोटी परत मेरे गुण-अवगुण सब ढाँप लेती है फिर कोई जिज्ञासु आ, सांत्वना भरा हाथ फेर कुछ रंग उजागर कर देता है. आज दो दिन बाद धूप निकली है. समय की शिराओं में जमा ख़ून वेग से बह चला है. सड़क पर आवाजाही बढ़ी है. मैं रात में ठहरा दिन को परख रहा हूँ. दिन की उपेक्षा वृद्ध का दर्द ही बढ़ाती, अंत नहीं बदलती, अंगड़ाई लेते मैंने निष्कर्ष निकाला. खिंचाव से तरेड़े कुछ और गहरी हो गईं. कुछ रहस्यमयी महक लिए एक कद्दावर शख़्स मेरे सामने आ खड़ा हुआ है. परस्पर समानता ने हमें चौंका दिया है. भाग्य के भी डोपेलगैंगर होते हैं क्या? दाएँ-बाएँ होता वह अदम्य उमंग से भर खिलखिला उठा है.

उसके चेहरे पर किसी पुराने गहरे ज़ख़्म की तिरछी लकीर है… जो किसी कार्बन कॉपी की तरह प्रतिबिंब में मेरी लंबी तरेड़ पर पूर्णतः आरोपित हो गई है. अपने दोष एक दूजे के सिर मढ़ हम अवर्चनीय सुख से भर उठे हैं. हीनता से मुक्ति की आस में वह दुकान के भीतर गया है. उसके विषय में सोचते हुए मैं पाता हूँ कि कुरूपता भी नैसर्गिक हो सकती है. तिस पर बदसूरती की लंबी मोहर भी चेहरे पर. इस बेरहम दुनिया में उसके हिस्से तो किसी की दया, सहानुभूति भी न आती होगी. मालिक उत्साह में दौड़ता हुआ बाहर आया है. अविश्वास भरी मुस्कान कानों तक फैली है. जल्द मुझे बबल रैप कर दो पुठ्ठों के बीच बाँध दिया गया है. कहते हैं घूरे के भी दिन फिरते हैं. क्या सच ही मेरे भी दिन बदलने वाले हैं? तंग गली के गलीच से मुक्ति मिलने वाली है? ट्राली पर लदा मैं नए घर, नए संगी के विषय में सोच रहा हूँ. अवगुणों से, दुखों से बने आत्मीय संबंधों की उम्र लंबी होती है!

मेरा नया घर कम आलीशान नहीं. मैं कुछ राहत महसूस कर रहा हूं. अनेक कमरों को पार कर हम आगे बढ़ रहे हैं. हर कमरा भारी अवसाद की अनुगूँजों से भरा है. छवि बनाती हर सतह को सफ़ेद मलमल से ढाँप दिया गया है. क्या कोई मृत्यु यहाँ हुई है, मोहग्रस्त आत्मा के दर्पण में क़ैद हो जाने का भय है? हवा में असह्य भारीपन है. मुझे माता-पिता द्वारा त्याग दिए गए शिशुओं का स्मरण हो आया जिनका भाग्य अन्यों की दया पर निर्भर हो जाता है. संशय और भय से जूझते हुए भी उन्हें आश्रयदाता को अपनाना पड़ता है. विशुद्ध सुख प्राप्य न सही, वीभत्स दुखों से छुटकारा सही.

कुछ बड़ी कीलों और पारदर्शी ग्लू की मदद से मुझे शयनकक्ष की एक दीवार पर चिपकाया जा रहा है. मेरे इर्द-गिर्द मंडराता कद्दावर शख़्स रह- रहकर कर्कश अट्टहास कर रहा है. कारीगरों के साथ वह कमरे से बाहर निकल गया. लौटा है तो एक छुईमुई-सी स्त्री उसके साथ है. मक्का के कुम्हलाए दाने-सी उसकी बेरंग देह काँप रही है. वह संकोच भरे छोटे क़दम भर रही है जबकि आक्रामक रोमांच से भरा पुरुष बलपूर्वक उसे खींच रहा है. स्त्री को अपनी बलिष्ठ भुजाओं में भर उचकाते हुए उसने मेरे सामने कर दिया है. मेरी तरेड़ के निचले भाग ने उसके कोमल चेहरे पर विषादयुक्त गहरी कुरूप लकीर खींच दी है. इस छवि ने कमतरी का भेद मिटा पुरुष को अदम्य हिंसक सुख से भर दिया है.

भय से स्त्री की आँखें फैल गई हैं. तेज़ हो चली धड़कनें बाहर भी सुनाई दे रही हैं. अविश्वास से कंपकंपाते  हुए उसने कुछ विस्मय, कुछ हिकारत से मुझे ऊपर से नीचे देखा है. पुरुष के भीतर की सारी कड़वाहट उसके चेहरे पर सिमट आई है. एक फुफकार के साथ उसने स्त्री का जबड़ा पकड़ते हुए अपनी ओर घुमाया है. उसके अँगूठे और उँगुलियों की छाप चेहरे पर बन गई है. संभवतः अचानक हुए इस हमले में स्त्री दाँतों के बीच अपनी जीभ काट बैठी है. उसकी आँखें दर्द से डबडबा उठी हैं. नमकीन ख़ून उसके पेट में पहुँच मितली जगा रहा है. अहमी पुरुष का विकृत अट्टहास कमरे की दीवारों से टकरा रहा है. दीवारें अपने कानों पर हाथ रख चिल्ला रही हैं कि पुरुष अपने सब दोष स्त्री पर डालने का अभ्यस्त है. उसके पैने दाँतों के निशान स्त्री के नाज़ुक कंधों पर हैं.

धूर्त पर्सियस मुझे ढाल बना मेडुसा पर विजय चाहता है. स्त्री ने याचना भरी गीली, लाचार दृष्टि मुझ पर डाली है. वह मेडुसा की नज़र होती तो मैं सहर्ष पत्थर हो जाता लेकिन अनुनय करती वह कोमल दृष्टि कह रही है कि यह कोई  क्षणिक उन्माद नहीं. प्रतिबिंब में दिखती तरेड़ उसके चेहरे पर स्थायी चस्पा हो सकती है. मैं कुंठित सुख का भागी नहीं हो सकता. मैंने प्रतिरोध में चूरचूर हो जाना चुना.

_______________

 

(तेज़काटलिपोका: तेज़काटलिपोका मेसोअमेरिका सभ्यता का एक शक्तिशाली देवता है जो भाग्य, जादू और भविष्यवाणी से जुड़ा था. एक युद्ध में बायाँ पाँव गँवाने के कारण उसके पैर की जगह ऑब्सेडियन मिरर लगाया गया था. एक ऑब्सेडियन मिरर उसकी छाती पर था. माना  यह जाता है कि इन दर्पणों में वह भूत-भविष्य देख सकता था.
मेडुसा और ब्लडी मैरी: लोक कथाओं की ऐसी स्त्री पात्र हैं जिन्हें पहले शोषक माना जाता रहा लेकिन बदलते समय के साथ उन पर हुई हिंसा को समझते हुए उनके पक्ष को भी समझा जा रहा है.)

 

निधि अग्रवाल पेशे से चिकित्सक हैं. वे झाँसी में कार्यरत हैं. उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं, ‘अपेक्षाओं के बियाबान’ (कहानी-संग्रह); ‘अप्रवीणा’ (उपन्यास); ‘कोई फ्लेमिंगो कभी नीला नहीं होता’ (कविता-संग्रह); ‘टेरेस स्टोरीज़ : गिल्लू की नई कहानी’ (कथेतर).

उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ के ‘पं. बद्री प्रसाद शिंगलू पुरस्कार’, ‘कथा रंग सम्मान’, ‘जयपुर साहित्य सम्मान’, ‘तथा  ‘पेन एंड पेपर अवॉर्ड’ आदि से सम्मानित किया गया है.

ई-मेल : nidhiagarwal510@gmail.com

Tags: 20262026 कहानीतेज़काटलिपोका का अंतिम युद्धनिधि अग्रवाल
ShareTweetSend
Previous Post

कहानी : बख़्शिश : एजाजुल हक

Next Post

भारत का विचार : आलोक टंडन

Related Posts

मेरी माँ मेरी गैंगस्टर : पवन करण
समीक्षा

मेरी माँ मेरी गैंगस्टर : पवन करण

प्रगतिशील आंदोलन का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन–1936 : सज्जाद ज़हीर
अनुवाद

प्रगतिशील आंदोलन का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन–1936 : सज्जाद ज़हीर

गोदान की विफलता : मदन सोनी
आलोचना

गोदान की विफलता : मदन सोनी

Comments 8

  1. कमलानंद झा says:
    9 months ago

    निधि अग्रवाल की कहानी ‘तेज़काटलिपोका का अंतिम युद्ध’ अत्यंत बारीकी से जीवन – जगत के इस पार और उस पार की यात्रा तो करती है लेकिन इन यात्राओं का लक्ष्य जीवन के इस पार की विडंबनाओं और कुरूपताओं को लक्षित करना ही है। मिथक और यथार्थ के तानेबाने को निधि कथा रूप देने में कुशल हैं। पारंपरिक कथातत्व खोजने वालों को इस कहानी से निराशा हो सकती है किंतु दर्शन, रहस्य, चेतन – अवचेतन, सभ्यता, संस्कृति, लोककथा, मिथक आदि में रुचि लेने वाले पाठकों को यह कहानी बेहद पसंद आएगी। कहानीकार निधि अग्रवाल और संपादक अरुण देव जी को शुभकामनाएं।

    Reply
  2. सुषमा तिवारी says:
    9 months ago

    कहानी का नायक, उफ्फ! क्या रचा है आपने 👌👌🙌स्क्रीन पर जैसे एक लम्बी तरेड़ उभरी पड़ी है अभी भी पढ़ लेने के बाद भी। धन्यवाद इतना जादुई पढ़ाने के लिए और खूब सारी शुभकामनाएँ और बधाईयाँ 💐

    Reply
  3. महेश कुमार says:
    9 months ago

    यहाँ गली, सड़क पात्र की तरह हैं और क्या ही बढ़िया पुनर्पाठ है। विवरण आपकी कहानियों के बेहद सघन होते हैं।

    Reply
  4. अशोक अग्रवाल says:
    9 months ago

    एक मिथक को जादूई सम्मोहन से भरी खूबसूरत कहानी रूपांतरित करने के लिए निधि अग्रवाल को बहुत-बहुत बधाई।

    Reply
  5. Kajal Khatri says:
    9 months ago

    अद्भुत ❤️❤️

    Reply
  6. Vandana Bajapi says:
    9 months ago

    जादुई भाषा और अलहदा शिल्प में मिथक के साँचे के साँचे में ढली सुंदर कहानी के लिए निधि अग्रवाल को बधाई

    Reply
  7. पवन करण says:
    9 months ago

    मेरे भीतर हिनहिनाते प्रश्नों का भरा- पूरा अस्तबल बन चला है. जाने वे कैसे दर्पण होते हैं जिनमें लोग प्रश्नों के उत्तर पा लेते हैं. …. अच्छी कहानी मगर कथ्य पकड़ पाने के के लिए सघन एकाग्रता की आवश्यकता है।

    Reply
  8. डॉ उर्वशी says:
    7 months ago

    निधि अग्रवाल की कहानी “तेज़काटलिपोका का अंतिम युद्ध” आधुनिक जीवन की विडंबनाओं, मानवीय संवेदनहीनता और अस्तित्वगत विखंडन का अत्यंत प्रभावशाली रूपक प्रस्तुत करती है, जिसमें एक टूटे हुए दर्पण के आत्मकथ्य के माध्यम से सत्ता, सौंदर्य, श्रम, वर्ग-विभाजन और नैतिक द्वंद्व की बहुस्तरीय पड़ताल की गई है। कथाकार ने एज़्टेक मिथक के प्रतीक—तेज़काटलिपोका—को रूपांतरण और विनाश-सृजन के चक्र से जोड़ते हुए यह दिखाया है कि टूटना मात्र अंत नहीं, बल्कि एक नई दृष्टि का जन्म भी है; दर्पण के टूटने के बाद ही वह समाज के हाशिये पर पड़े जीवन, श्रमिक की पीड़ा, स्त्री की आंतरिक हिंसा, और मनुष्य के भीतर छिपे क्रूर यथार्थ को अधिक तीव्रता से देख पाता है। भाषा चित्रात्मक, संवेदनशील और कहीं-कहीं काव्यात्मक घनत्व लिए हुए है, जो कथा को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करती है, जबकि प्रतीकों और बिंबों की बहुलता इसे गहन अर्थवत्ता देती है। कुल मिलाकर यह कहानी हमारे समय के नैतिक पतन, सामाजिक असमानताओं और मानवीय आत्मालोचन की आवश्यकता पर तीखा प्रश्नचिन्ह लगाते हुए पाठक को भीतर तक झकझोर देती है।

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2026 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक