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Home » संविधान का अंतःकरण और हम : ध्रुव शुक्ल

संविधान का अंतःकरण और हम : ध्रुव शुक्ल

by arun dev
August 15, 2026
in आलेख
Reading Time: 5 mins read
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संविधान का अंतःकरण और हम : ध्रुव शुक्ल
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संविधान का अंतःकरण और हम


ध्रुव शुक्ल

लोकतंत्र में मतदान एक ऐसा निर्णय है जो किसी  विचलित चित्तदशा में नहीं लिया जा सकता. मतदान केन्द्र पर इकट्ठे लोगों के बीच जिस एकान्त कोने में हम भारत के लोग अपने मत का गुप्त दान करते हैं अगर मतदान करते समय राजनीतिक दलों द्वारा विचलित किया गया हमारा  चित्त देश और दुनिया के जीवन पर एकाग्र नहीं होगा और हम  केवल अपने संप्रदाय, जाति और कौम के तात्कालिक स्वार्थ में लिप्त होकर वोट दे रहे होंगे तो यह मतदान लोकहितकारी नहीं हो सकता. मतदान केवल अपनी किसी जात-बिरादरी के हित साधन के लिए नहीं, सबके लिए न्याय के पक्ष में किया जाना चाहिए.

जिस तरह भारत के लोगों का उसी तरह संविधान का भी अंतःकरण है. योगियों और दार्शनिकों ने मनुष्य के अंतःकरण की पहचान चार कारणों के रूप में की है-

मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त.

देश के संविधान की उद्देशिका भी उसके अंतःकरण को चार कारणों से पहचानती है-

समता,  न्याय, स्वतंत्रता और बंधुता.

देश के लोगों के अंतःकरण में अपने-अपने मन, बुद्धि और अहंकार के अनुसार  परिस्थितिवश उनकी चित्तदशा  विचलित होती रहती है. इसी आधार पर उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियां व्यक्तिगत और सार्वजनिक व्यवहार करती हैं. ऐसी हालत में भी हम भारत के लोगों को  संविधान के अंतःकरण में स्थापित बंधुता के मूल्य से अपने चित्त को विचलित नहीं होने देना चाहिए क्योंकि इसी से देश का मन एक-दूसरे से मिलता है. संविधान में समानता का भाव लोगों का मन ही है, न्याय ही उनकी बुद्धि है और स्वतंत्रता ही अहंकार है जिसे कदम-कदम पर पूरे संयम से बरतना पड़ता है. लोकतंत्र में बंधुता पर लोगों की एकाग्रता ही समता, न्याय और स्वतंत्रता को संभाले रख सकती है.

लोगों के द्वारा बंधुता के मूल्य पर एकाग्रचित्त हुए बिना समता, न्याय और स्वतंत्रता के मूल्य को केवल तात्कालिक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रबंधन के बाहरी आश्वासन से संभाला नहीं जा सकता क्योंकि इतनी बड़ी आबादी वाले देश के जीवन में समता का व्यवस्थापन करते हुए भी जीवन में अभावों के कई रूप दिखायी पड़ते हैं. कितना भी करो, लोगों का मन नहीं भरता और बराबरी की कोई एक कसौटी नहीं बन पाती. लोगों के कामनाओं से भरे अभावग्रस्त मन दिन-रात विचलित होते रहते हैं. स्वतंत्रता भी अहंकार से भरकर अराजक स्वच्छंदता में बदलने लगती है और एक-दूसरे के अहंकार आपस में टकराने लगते हैं. ऐसी हालत में न्याय बुद्धि को किसी समुचित निर्णय पर पहुंचने में बड़ी देर लग जाती है.

संविधान में हम भारत के लोगों से बंधुता के मूल्य पर दृढ़ बने रहने का प्रस्ताव किया गया है. समता, न्याय और स्वतंत्रता को लिखित प्रारूपों में व्याख्यायित जरूर किया गया है पर संविधान के रचनाकारों को यह चिन्ता बनी रही कि भले ही हम देश के लोगों को समता, न्याय और स्वतंत्रता के नाम पर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक न्याय देने का आश्वासन दे रहे हैं पर जब तक बंधुता के आंतरिक  मूल्य पर देश का चित्त एकाग्र नहीं होगा तब तक देश के लोगों के अंतःकरण में उस सन्मति को जगह कैसे मिलेगी जो धर्म, मज़हब, रिलीजन, जाति, वर्ण, कुल, कौम, संप्रदाय आदि से निरपेक्ष होकर एक बड़ी बहुविश्वासी इंसानी बिरादरी को बंधुता की प्रतीति में ले आती है. सहज और शान्त जीवन बंधुता के बिना संभव नहीं.

जब देश के जीवन में विभेदकारी मतान्धता राजनीतिक और सामाजिक कार्य-व्यवहार में परिलक्षित हो रही है और लोगों का मन स्वार्थपूर्ण अधिकारों की होड़ में विभाजित करके विचलित किया जा रहा है तब संविधान के अंतःकरण में बसी बंधुता के मूल्य पर एकाग्र होने के लिए किसी बड़े देशव्यापी चित्तवृत्ति निरोध अभियान की जरूरत होगी. क्या लोकहित में हमारे राजनीतिक दल और लोकमत परिष्कार का दावा करने वाले तथाकथित शतायु स्वयंसेवी और सामाजिक संगठन इस सत्याग्रह के लिए मानसिक रूप से कोई तैयारी कर पा रहे हैं?

संविधान की उद्देशिका में समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता के मूल्य उकेरे गये हैं.  ये मूल्य संविधान में भली प्रकार परिभाषित हैं और संविधान के रचनाकार पहले ही चेता गये हैं कि केवल संविधान लिख देने से लोकतंत्र का फल तब तक नहीं आयेगा जब तक लोगों द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि और ख़ुद लोग देश के जीवन में उनके प्रति अपनी व्यावहारिक योग्यता प्रमाणित नहीं करेंगे. प्रश्न संविधान को फिर से परिभाषित करने का नहीं है. वास्तविक प्रश्न तो यह है कि हम भारत के लोग अपने मन, अहंकार, बुद्धि और चित्त को समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता की  कसौटी पर कैसे प्रमाणित करें? विधि-विधान बदलने से किसी का जीवन नहीं बदलता, सब एक-दूसरे से दूर ही बने रहते हैं. देश के जीवन में साधन और साध्य के प्रति सद्भावपूर्ण कर्मकुशलता ही लोगों को परस्पर आश्रय का बोध करवाती है. यह बोध ही बंधुता का आधार है.

लोकतंत्र में चुने हुए राजनीतिक प्रतिनिधियों के बीच सत्ता का अनुबंध तब तक अर्थहीन है जब तक वे अपने संकुचित जातिगत स्वार्थ त्यागकर देशबंधु होने का प्रमाण नहीं देते. संविधान को केवल माथे से लगाकर टेबिल पर रख देने से काम नहीं चलेगा.  अम्बेडकर की दृष्टि में बंधुता का अर्थ है- सभी भारतीयों की मैत्रीपूर्ण भावना. यही बात हमारे सामाजिक जीवन को अखण्डता प्रदान कर सकती है और यह बहुत ही कठिन काम हमें कर दिखाना चाहिए. अम्बेडकर ने कहा था कि-

‘२६ जनवरी १९५० से हम कई अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं. राजनीति में हमें समानता प्राप्त होगी पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में नहीं होगी. हम ‘एक व्यक्ति एक वोट‘ को मान्यता देते रहेंगे पर हमारे सामाजिक और आर्थिक ढांचे के कारण ‘एक व्यक्ति एक मूल्य‘ के सिद्धांत को नकारते रहेंगे.’

अम्बेडकर की यह आशंका अब तक सही साबित होती आयी है. धर्म, जाति, संप्रदाय के भेदभावों से ग्रस्त समाज में आर्थिक न्याय भी तब तक काफी नहीं है जब तक उसके साथ सामाजिक न्याय जुड़ा हुआ न हो. संविधान की रचना करते हुए अम्बेडकर महसूस कर रहे थे कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाये, खराब निकलें तो निश्चित रूप से संविधान भी खराब सिद्ध होगा. दूसरी ओर, संविधान में चाहे कितनी भी कमियां क्यों न हों, यदि उसे अमल में लाने वाले ईमानदार हों तो संविधान अच्छा साबित होगा.

अम्बेडकर कहते हैं कि-

‘किसी संविधान पर अमल उसके स्वरूप पर निर्भर नहीं करता. वह तो केवल विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे राज्य के अंगों का प्रावधान ही कर सकता है. इन अंगों का नीतिपूर्वक संचालन भारत के लोगों और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने के उद्देश्य से बने राजनीतिक दल ही कर सकते हैं.’

अम्बेडकर गहरे सोच में डूबकर यह भी रेखांकित करते हैं कि–

 ‘अभी से यह कौन कह सकता है कि आने वाले समय में भारत के लोगों और राजनीतिक दलों का व्यवहार कैसा होगा?’

अम्बेडकर को जो शंका थी वह सही साबित हो रही है. वे देख पा रहे थे कि हमारी अतीतजीवी स्मृति में जाति और संप्रदायों के रूप में पुराने शत्रु तो बने ही रहेंगे. परस्पर विरोधी विचार रखने वाले राजनीतिक दल भी बना लिये जायेंगे. ऐसी हालत में क्या भारतवासी देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे या पंथ को देश से ऊपर रखेंगे? आज हम देख ही रहे हैं कि जात-पात और पंथ की सीमाओं में जकड़ी राजनीतिक ज़मीन पर अंध सत्तावाद की धूल उड़ रही है और जिसकी धुंध में देश अदृश्य हो रहा है.

हमें एक बार फिर देश के जीवन के करीब जाकर भारत की खोज करना चाहिए. जो लोग स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से परिचित हैं वे जानते हैं कि महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने के पहले हमारे तत्कालीन राजनीतिक संगठन ब्रिटिश हुकूमत से भारत के लोगों के कष्ट निवारण के लिए अर्जियां लगाकर संघर्ष किया करते थे. जब गांधी जी ने रेलगाड़ी के तीसरे दर्जे में बैठकर पूरा भारत घूमा और अच्छी तरह जान लिया कि भारत के लोग ग़ुलाम नहीं है, उन्हें तो ब्रिटिश राज्य ने उनकी खेती-किसानी और हुनरमंदगी के साधन छीनकर बेबस बनाकर रखा है. अगर लोगों के साधन फिर उन्हें लौटा दिए जायें तो वे अपने स्वराज्य में जीवनयापन करते हुए देश की समृद्धि में भागीदार भी बने रह सकते हैं.

गांधी जी ने भारत के लोगों को इस बेबसी से छुटकारा दिलाने की राह खोजी और फिरंगियों के ख़िलाफ़ स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने का बीड़ा उठाया. सद्भावपूर्ण सत्याग्रह और सविनय अवज्ञापूर्ण असहयोग के लिए पूरे देश का आत्मबल जगाया. चरखे पर सूत कातकर सबके साथ सबकी आज़ादी का वस्त्र बुना. जो लोग हिन्दू, मुसलमान और दलितों के प्रश्नों पर एकमत नहीं थे और अपने विशेषाधिकार चाहते थे, उनसे संवाद करते हुए  उनके सामाजिक तनावों का उदारता से सामना किया. उन्हें दूर करने के उपाय प्रस्तावित किए.

गांधी आज़ादी मिलने के पहले ही चेतावनी देते रहे कि अभी से हमारी तैयारी आज़ादी को सॅंभाले रखने की होना चाहिए. पर आजादी के बाद भी हम अनेक प्रयत्नों के बावजूद दरिद्रता, छुआछूत और मतान्ध कट्टरता को पूरी तरह दूर नहीं कर पाये हैं. अभी हाल के वर्षों में जो राजनीतिक नज़ारा पेश हुआ है, उसे देखकर लगता है कि बड़ी तेजी से दरिद्रता लौट रही है, भेदभाव बढ़ रहा है और मतान्ध कट्टरता सिर चढ़कर बोल रही है. भारतीय सनातन धर्मदृष्टि और समरस सामाजिक संरचना का बाज़ारू राजनीतिकीकरण किया जा रहा है. लोकतंत्र को जनमत की लूट का साधन बनाकर राजनीतिक सत्ता पाने की छलपूर्ण रणनीतियां बनायी जा रही हैं.

केवल चुनाव जीतकर सत्ता पा लेने के इस खेल को समझे बिना भारत का भला नहीं हो सकेगा. अगर कोई राजनीतिक दल लोकतंत्र को सत्ता पाने का बाज़ार समझकर एक बड़ी कंपनी की तरह चुनाव का व्यापार करने लगे और दूसरे राजनीतिक दलों के चुने हुए प्रतिनिधि अपने जनसमर्थन को शेयर की तरह उस बड़ी राजनीतिक कंपनी को बेचकर उसमें मर्ज होने लगें तो यह उसी तरह होगा जैसे बड़े पूंजीपति छोटी-छोटी पूजियों को अपने धंधे में समेटकर छोटे कारोबारियों को असहाय बनाये रखते हैं. लोकतंत्र को हमेशा एक प्रबल प्रतिपक्ष चाहिए जो सत्ता के विकल्प के रूप में हमेशा उपस्थित रहे.

इस समय भारत की राजनीति देश के लोगों के प्रति आर्थिक-सामाजिक न्याय को भूलकर व्यापक जीवन को विभेदकारी और असहाय बना रही है. ऐसे कठिन समय में हमें भारत के लोगों के हुनरमंद जीवन में भारत को फिर खोजना होगा और उसे निर्भय बनाकर फिर अपने पांवों पर खड़ा करना होगा. राजनीतिक अन्याय के ख़िलाफ़ ऐसे स्थायी प्रतिपक्ष को संगठित करना होगा जो लोगों में सद्भावपूर्ण विकसित जीवन की स्मृति जगाकर नया विकल्प बन सके.

ज्ञानवान पूर्वजों को अपने जीवन-दर्शन में  मानव जीवन एक वीणा जैसा लगता रहा है. मानव देह को ही वीणा की उपमा दी गयी है. बीती सदियों में यहां जो भी आया उसने इस वीणा के स्वरों से अपना सुर ज़रूर मिलाया. उसने अपने जीवन का आलाप नयी स्वर-मेल पद्धति से भी लिया. भारत के लोगों ने बुरे वक़्तों में भी स्वरों की सांस कभी टूटने नहीं दी. संगीतकार जानते हैं कि वीणा के तारों का ढीलापन और ज़रूरत से ज़्यादा खिंचाव- ये दो अतियां वीणा से कोई स्वर फूटने नहीं देतीं.

हम भारत के लोग कुछ सदियों से दो अतियों में जी रहे हैं- धर्म और मज़हब पर गौर करें तो एक तरफ़ चिन्तन का ढीलापन और दूसरी तरफ़ मतांध साप्रदायिक खिंचाव हमें अपने जीवन की वीणा के स्वर साधने ही नहीं देता. राजनीति पर गौर करें तो नागरिक कर्तव्य का ढीलापन और राज्य के अहंकार का खिंचाव देश के समूचे जीवन की वीणा को बेसुरी बनाये हुए है. बाज़ार पर गौर करें तो संयम का ढीलापन और वासनाओं के खिंचाव के बीच अपनी देह की वीणा कैसे साधी जा सकती है?

ज्ञानियों ने मनुष्य के कर्मविवेक के ढीलेपन और कामनाओं के खिंचाव के बीच निष्कामता को साधने की विधि बतायी. बुद्ध ने तो दुख विवेक के ढीलेपन और तृष्णा के खिंचाव के बीच सम्यक् मार्ग दिखाया, जिसे मध्यमार्ग भी कहते हैं. गांधी ने ग़ुलामी की समझ के ढीलेपन और हिंसक उपनिवेशक सत्ता के खिंचाव के बीच अहिंसक स्वराज्य की साहसिक दृष्टि प्रदान की. जितने भी महापुरुष हुए सब यही तो कहते रहे कि अतियों से पैदा होने वाले अतिवादों को त्यागकर जीवन को उस मध्यसप्तक में ले आना चाहिए जहां से सबकी देह की वीणा के स्वर फूटते हैं.

सनातन अस्तित्व की विधि का अपना विधान ही कुछ ऐसा है कि सबको अपनी देह की वीणा ख़ुद ही साधना पड़ती है. यह बात किसी से छिपी नहीं हैं कि हर आदमी अपने स्वभाव से ही जानता है कि उसकी देह की वीणा अतियों को छोड़कर मध्य में कैसे आती है. संसार में हर आदमी अपने जीवन की सुर-साधना के प्रति ख़ुद ही जिम्मेदार है. सबका जीवन अपनी-अपनी गायकी जैसा है और सबको अपना तानपूरा खु़द ही मिलाना पड़ता है. उसे अपने जीवन राग में देश-राग का सुमधुर विस्तार करना पड़ता है. उसकी यह जिम्मेदारी कोई धर्म-संहिता, कोई राजनीति और कोई बाजार नहीं ले सकता. लोकतंत्र में लोगों के दुख दूर करने की ठेकेदारियां किसी काम की साबित नहीं होती हैं.

हम भारत के लोग जब तक इस मज्झिम निकाय (मध्यमार्ग) को साधकर अपने जीवन को नहीं चलायेंगे तब तक तरह-तरह की राजनीतिक सत्ताएं हमारा स्वराज्य छीनती रहेंगी और हम दिनों दिन एक बेबस जीवन जीने को विवश किये जाते रहेंगे. ऐसे समय जब मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनात्मक रूप से लापरवाह होकर जैविक महामारी, साधनों की लूट और युद्ध से मुनाफ़ा कमाती वैश्विक शक्तियां हमें साधनहीन बना रही हैं, हमें अपने उस भूले हुए मार्ग पर लौट आना चाहिए जो सबके योगक्षेम से हमें जोड़ता है.

यह साफ़ दीख रहा है कि  देश और दुनिया में गैर जरूरी चीजों की प्राप्ति के लिए पंच तत्वों (क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर) के प्रति अवज्ञा का परिणाम विनाशकारी साबित हो रहा है. आधुनिक संरचनाएं भरभराकर गिर रही हैं. साधनों और संपत्ति का क्षय हो रहा है. जीवन के विकसित होने का जो अर्थ पूर्वजों ने खोजा वह तो यही है कि समृद्ध प्रकृति के बीच सबके प्राणों के आयाम में स्वास्थ्य, शिक्षा, समृद्धि, सुरक्षा और शांति के परिवेश को रचा जा सके.

अपने आपको भूलकर जीते रहने से किसी के होने और न होने का अहसास नहीं होता. इस सृष्टि में यह संभावना विद्यमान है कि सब अपनी देह के खारे सागर में डुबकी लगाकर अपने हिस्से का नमक उठा सकते हैं- नमक ही अमृत है और गुलामी ही जीवन के लिए कालकूट विष है. जो किसी के हिस्से का नमक छीनकर उसे ग़ुलाम बनाना चाहते हैं, उन्हें एक दिन अपनी हार स्वीकार करना पड़ती है.

इतिहास गवाह है कि जो लोग अपने आपसे कोई लड़ाई नहीं जीत पाते उनकी दूसरों पर विजय भी व्यर्थ है. सारा देवासुर संग्राम हर आदमी के भीतर ही चल रहा है और उसके परिणाम बाहर प्रकट हो रहे हैं. जब लोग संयम को त्यागकर अपार कामनाओं से भरे अपनी ही देह के आंदोलित जल में निर्लज्ज स्नान करने को आतुर होने लगते हैं तब वे अपने भीतर छिपे उन वास्तविक शत्रुओं को नहीं पहचान पाते जिनके कारण बाहर शत्रुता और थका देने वाली प्रतियोगिता पैदा होती है और संसार ऐसे युद्ध में फंसता चला जाता है जो किसी सूर्यास्त पर नहीं रुकता.

लुटेरे और परद्रोही बढ़ते जाते हैं और बेघर-व्याकुल जीवन की करुण पुकार टूटे हुए मोरपंख-सी कुछ देर आकाश में तैरती है और धरती पर गिरकर खो जाती है. एक कठिन प्रतियोगिता की रेलगाड़ी में बिठा दिये गये आदमी की बेख़ुदी उसे न जाने उसे कहां लिये जा रही है.– अपने से बेख़बर लोग जल, थल और काल की सुध लिये बिना अपने वक्ष पर विषय-बयारों में झूलती अनगिनत कामनाओं की माला पहनकर बेसुध नाच रहे हैं- कवि सूरदास कहते हैं कि- अपनी ही तृष्णा के नाद और ताल में खोया जीवन महामोह के नूपुर बांधकर थिरक रहा है. वह लोभ का तिलक लगाकर निन्दा-रस में डूब गया है. भ्रमित मन का पखावज कुसंगति की चाल पर अपनी कला दिखा रहा है. जीवन की सुरसंगत बेताल हुई जा रही है. स्वर सध नहीं रहे, सांस टूट रही है.

जो ख़ुद अपनी शरण में नहीं, वह स्वाधीन नहीं- स्वाधीनता ही अविकसित रह गयी तो भौतिक विकास का क्या अर्थ है? अपने आपको भूलते चले जाने का यह रोग सदियों पुराना है. दुनिया में इस रोग के इलाज के लिए धर्म और राजनीति के जितने भी स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित हुए सब विफल हो गये हैं. तभी तो मनुष्य के चंचल मन को लुभाता कामुक बाज़ार तृष्णा की दुंदुभी बजाता हुआ समूचे जीवन पर बेखटके टूट पड़ा है, कुसंगति की चाल ही इक्कीसवीं सदी की ताल बन गयी है.

भारतीय मनीषा अपने तप से इसी गहरी प्रतीति में डूबा साधती आयी है कि हरेक आदमी की विकसित स्वाधीन देह ही सत्य की वास्तविक प्रयोगशाला है. बाहर की सब प्रयोगशालाएं अविकसित और संदिग्ध हैं. विकसित आत्मबल ही एकमात्र प्रगति है. इसके बिना सिर्फ दुर्गति है. अस्तित्व में कोई प्रभु नहीं जो हमारे कर्मों और उनके फल को तय करता हो. पूरा जीवन ख़ुद अपने स्वभाव का प्रवर्तक है और अपने प्रति जिम्मेदार है.

देश के सब लोगों ने मिलकर संविधान में अपने आपको ‘हम भारत के लोग’  (पीपुल) कहकर संबोधित किया है और यह सपना बुना है कि लोगों के बीच से ही आये जिम्मेदार नागरिकों  (सिटीजन्स) की भूमिका ही समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता के मूल्यों को देश के लोगों के जीवन में उतारते हुए बहुरंगी राष्ट्र को सॅंवारती रहेगी. यही कारण है कि नागरिकों के कर्तव्य और अधिकार ही संविधान में लिखे गये हैं, ‘जनता’ (पब्लिक) के नहीं. जनता को भीड़ में बदला जा सकता है,  देश के लोगों के बीच से आगे आने वाले जिम्मेदार नागरिक ही लोकतंत्र के नीड़ का निर्माण करने में समर्थ होते हैं.

अपने आपको ‘हम भारत के लोग’ मानने से यह बोध होता है कि सब अपनी योग्यता, हुनरमंदगी और समझदारी से अपने-अपने काम में अपना मन लगाये हुए हैं और सबका मन मिलकर देश का मन बन गया है. सब अपने कर्तव्यों में इस तरह निमग्न हैं कि उन्हें अपने अधिकार किसी से मांगना नहीं पड़ते. वे तो उन्हें सहज ही मिले हुए हैं. यह बोध ही लोगों के बीच से नागरिकों की रचना करने में समर्थ होता है. लोकतंत्र में वे ही नायक गणमान्य होते हैं जो लोगों के बीच रची गयी नागरिकता के मार्ग से आते हैं. हम भारत के लोगों की प्रतिबद्धता भारत देश के बहु विश्वासी जीवन के प्रति होना चाहिए, किसी ऐसे राजनीतिक दल के प्रति नहीं जो हमें मतान्धता की सॅंकरी गलियों में भटकाकर देश के बहुरंगी जीवन को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा हो.

‘जनता’ तो लोगों और नागरिकों के बीच दौडती-भागती-सी लगती है. वह टूटी-बिखरी-सी और असहाय जान पड़ती है. जनता की बस्तियां भारत के लोगों और नागरिकों के जीवन से दूर बसी हुई लगती हैं जैसे उन्हें बसाये रखने की कोई राजनीतिक योजना बनायी गयी हो. जनता की इन्हीं बस्तियों पर अपने धनबल और बाहुबल की धाक जमाकर ज़्यादातर विचारहीन बड़बोले नेता आते हैं. वे जनता को देश की मालिक कहकर अपना राज्य स्थापित करने के लिए उससे समर्थन मांगते हैं और इसके बदले कुछ कामचलाऊ मुफ़्त राहतें देकर उसे अपने हाल पर छोड़ देते हैं. नेता टूटे-बिखरे जन समर्थन से अपने गठबंधन रचकर सत्ता पा जाते हैं और जनता के बीच का बिखराव उसे ही असहाय बनाये रखता है.

किसी देश के कर्मकुशल, रचनाशील और जिम्मेदार नागरिकों को राजनीतिक भीड़ में नहीं बदला जा सकता क्योंकि उन्हें अपनी दक्षता के अनुरूप अपने कर्तव्य कर्म से कोई फुर्सत ही नहीं मिलती. मिलकर काम करते हुए नागरिकों को आपस में किसी की जाति और मज़हब पूछने का ख़याल ही नहीं रहता. उनकी मेहनत और हुनरमंदगी ही उनकी वास्तविक पहचान बन जाती है. पर जनता को जातियों में बांटकर उसे वोटरों की  झुग्गी बस्तियों में क़ैद किया जा सकता है. उसे दरिद्रता में गुजर-बसर की आदत डालकर उसकी असहायता का राजनीतिक सौदा किया जा सकता है. जनता की फटी हुई कथरी में झूठे विशेषाधिकारों के थिगड़े लगाकर उसे लुभाया जा सकता है. उसे राष्ट्र की बहुरंगी पहचान से बेखबर बनाया जा सकता है.

संविधान के अंतःकरण में झांककर देखें तो महसूस होता है कि हम भारत के लोगों की पहचान देश के मालिक की नहीं, एक नागरिक होकर उसके न्यासी (ट्रस्टी) होने की है.  चुनने वाले लोग और चुने हुए प्रतिनिधि किसी मनमानी के लिये स्वतंत्र नहीं हैं. चुने जाने के बाद सरकार किसी दल और उसके व्यक्ति की नहीं होती, वह हम भारत के लोगों की होती है. अपनी कविता के ही सहारे फिर कहूँ तो  हमारे चुनें हुए नुमाइंदों और हम भारत के लोगों का पहचान पत्र ऐसा होना चाहिए–

मेरे पहचान-पत्र में
मुझे सिर्फ़ पृथ्वी का नागरिक लिखो

जब मेरी आंखों में झांककर देखो
तो उनमें बसी
करुणा की पहचान लिखो

जब मेरी अंगुलियों के छापे लो
तो उनकी रेखाओं में बसी
प्रेम के स्पर्श की गहराई लिखो

जब पूरे चेहरे का अक्स उतारकर
पहचान-पत्र पर चस्पा करो
तो मुझे सिर्फ़ आदमी लिखो

बना सको
तो ऐसा बनाओ मेरा पहचान-पत्र
सबसे प्रेम करने के लिए पहचाना जाऊं

 



ध्रुव शुक्ल
11 मार्च 1953
सागर, मध्य प्रदेश

चार कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह और दो उपन्यास आदि प्रकाशित
‘पूर्वग्रह’ के सह-संपादक और ‘साक्षात्कार’ के संपादक रह चुके हैं.

Tags: 20262026 आलेखध्रुव शुक्लसंविधान का अंतःकरण
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