The Fate of Ophelia लाना डेल के मादक क्षितिज पर टेलर स्विफ्ट का मोहक इंद्रधनुष _________________________ त्रिभुवन |
वह 2025 के अक्तूबर की एक बेहद सर्द रात थी. रात का एक बजा होगा. मैं और मेरा शरारती लैब्राडोर बीटल एक साथ कॉलोनी के बाहर सड़क पर वॉक कर रहे थे. हवा में वह नीली ठंड थी, जो कानों में नहीं, सीधे हड्डियों में बजती है. गरम कोट की गहरी जेब से अचानक जाने कैसे स्पॉटिफाई के म्यूज़िक सेक्शन में अचानक एक गीत बजने लगा, द फेट ऑफ़ ओफीलिया. पहले ही कुछ स्वरों के बाद लगा, आवाज़ टेलर स्विफ्ट की है; लेकिन यह धुंध कहाँ से आई? यह लाना डेल रे जैसी उदास, डूबी हुई, सिनेमाई श्यामल चाँदनी किसने आबोहवा में बिखेर दी?
उस रात बात समझ में नहीं आई. शीतलहर थी, सड़कें लगभग खाली थीं, बीटल अपनी चाल से चल रहा था और गीत अपनी अजीब चमक में बज रहा था. टेलर भी, लाना भी; पॉप भी, त्रासदी भी; ओफीलिया भी, डिस्को-बॉल भी.
फिर पिछले सप्ताह, ठीक वैसी ही रात के एक बजे, लेकिन मौसम उलट चुका था. शीतलहर की जगह लू बदन झुलसा रही थी. वही गीत इस बार कुर्ते की गहरी जेब में फिर बजता सुनाई दिया. मैंने स्क्रीन देखा, टेलर स्विफ्ट. अरे भाई, यह क्या घपला है? लाना है कि टेलर? टेलर है कि लाना? मैंने और बीटल ने वह गीत फिर सुना. इस बार गरम रात में उस पुरानी ठंडी रात की स्मृति भी साथ बज रही थी. तब समझ आया कि यह साधारण समानता नहीं; यह पॉप-संगीत की वह जगह है, जहाँ प्रभाव, स्मृति और आवाज़ एक-दूसरे में घुलते हैं; लेकिन यह प्रभावोत्पादकता का क्या ही नशीला सा नज़ारा है. मानो एक ख़बसूरत कोंपल को किसी ने एक महकते फूल में बदल दिया हो.
द फेट ऑफ़ ओफीलिया में टेलर स्विफ्ट लाना डेल रे नहीं बनतीं. वे लाना की धुंध को अपनी रोशनी में अनुवाद करती हैं. यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है. किसी कलाकार की नकल करना एक बात है; उसकी संवेदना को अपनी भाषा में बदल देना दूसरी बात. टेलर यहाँ दूसरी चीज़ करती हैं. वह वाक़ई एक कोंपल को ख़ुशबू से सने फूल में बदलती हैं.
गीत के शुरुआती हिस्सों में उनकी आवाज़ निचले पायदान पर उतरती है. उसमें हल्की साँस दर साँस वाली बनावट है, रिवर्ब की धुंध है, कुछ स्वर ऐसे खिंचते हैं, जैसे किसी पुराने हॉलीवुड कमरे में पर्दे आधे खुले हों और बाहर समुद्र की आवाज़ आ रही हो. यही वह जगह है, जहाँ लाना डेल रे की स्मृति झिलमिलाती है समरटाइम सैडनेस, बॉर्न टू डाइ, यंग एंड ब्यूटीफुल वाली वह उदासी, जिसमें ग्लैमर भी है और मृत्यु और उदासी की गहरी छाया भी.
लेकिन गीत वहाँ टिकता नहीं. जैसे ही वह खुलने लगता है, पता चलता है कि यह लाना का घर नहीं, टेलर का मंच है. इस मंच पर मैक्स मार्टिन और शेलबैक की चमकदार पॉप-मशीनरी भी लगी हुई है. धुंध है; लेकिन उसके नीचे डांस-पॉप का इंजन चल रहा है. उदासी है; लेकिन उसकी कमर में सिंथ-पॉप की चमकदार बेल्ट बंधी है. त्रासदी है; लेकिन फंक का हल्का, चंचल और देहगत झटका भी है.
लाना डेल रे की गायकी समय को बहुत धीमे-धीमे झराती है और टेलर स्विफ्ट की गायकी समय को व्यवस्थित करती है. लाना शब्दों को नशीले धुएँ की तरह बाहर बहुत धीमे-धीमे उड़ाती हैं. वे बीट के पीछे बैठती हैं, जैसे गाना आगे चला गया हो और वे पुराने प्रेम की कुर्सी पर थोड़ी देर और ठहर गई हों. उनकी आवाज़ में थकान, सिनेमा, पुरानी अमरीकी मिथकीय-गंध और नष्ट होते रोमांस की मखमली उदासी रहती है.
टेलर इसके उलट शब्दों को कथानक में बदलती हैं. वे बीट को पकड़ती हैं, कहानी को साफ़ करती हैं, भाव को हुक में बदलती हैं और निजी स्मृति को सामूहिक कोरस बना देती हैं. लाना रात को और गहरी रात बनाती हैं. टेलर रात से सुबह निकालती हैं. उदयपुर के सहेली मार्ग पर देर रात लाना को सुनने का जो लावण्य है और जयपुर की एमआई रोड पर टेलर को सुनने की जैसी तस्कीन है, उस समय इन सड़कों का साउंडट्रैक क्या कमाल होता है. सड़क ही जैसे कोई लहराती नदी हो जाती है.
यही इस गीत का सबसे बड़ा रहस्य है. द फेट ऑफ़ ओफीलिया में जो लाना-सा लगता है, वह मुख्यतः स्वर की बनावट और वातावरण है. डूबती और गहरे में उतरती आवाज़, उदास स्त्री-चरित्र, पानी और डूबने की इमेजरी, प्रेम और विनाश का सिनेमाई रिश्ता. लेकिन जो टेलर-सा है, वह अधिक निर्णायक है. कहानी को नियंत्रित रखना, कोरस को यादगार बनाना, भावुकता को पॉप-व्याकरण में कस देना और त्रासदी को पराजय नहीं, सम्मोहक प्रस्तुति में बदल देना.
ओफीलिया शेक्सपीयर के यहाँ पानी में डूबती है. टेलर की ओफीलिया पॉप-संगीत में तैरती है. यह गीत डूबने की कथा को बचने की धुन में बदल देता है. यही टेलर की असली शक्ति है. वे त्रासदी से सिर्फ़ आँसू नहीं बनातीं; वे उससे मंच, रोशनी और आवाज़ भी बना लेती हैं.

टेलर और लाना की समानता का पुराना उदाहरण वाइल्डेस्ट ड्रीम्स है. अगर द फेट ऑफ़ ओफीलिया आज की लाना-छाया है तो वाइल्डेस्ट ड्रीम्स उसका पुराना पूर्वाभ्यास था. उसमें साँस दर साँस और दो साँसों के बीच का स्वर, सिनेमाई रोमांस, स्मृति की धुँध और सिंथ से बनी उदासी थी. वह गीत ऐसा था, जैसे किसी ने लाना डेल रे के पुराने अमरीकी स्वप्न को टेलर की डायरी में रख दिया हो. फ़र्क़ फिर भी साफ़ था. लाना ख़राब प्रेमी की मिथक-भरी दुनिया में उतरती हैं; टेलर उसी दृश्य को स्मृति की सत्ता में बदल देती हैं. मुझे याद रखना, मुझे अपनी सबसे सुंदर ग़लती की तरह याद रखना.
स्नो ऑन द बीच में तो तुलना और भी दिलचस्प हो जाती है; क्योंकि वहाँ लाना सचमुच मौजूद हैं. यह दो आवाज़ों का ऐसा मिलन है, जिसमें कोई एक दूसरी पर आक्रमण नहीं करती. लाना वहाँ टेलर की दुनिया में अपना रंग हल्का कर देती हैं. वे धुंध बनती हैं, बादल बनती हैं, किनारे की हवा बनती, सुहानी बारिश के बाद साफ़ क्षितिज पर इंद्रधनुष का आकार लेती हैं. यह गीत बताता है कि लाना टेलर की तरह सामान्यतः नहीं गातीं; लेकिन चाहें तो टेलर की आवाज़ की सतह में इतनी बारीकी से घुल सकती हैं कि श्रोता देर से पहचानता है कि यह चमक अकेली नहीं थी.
मरून में समानता सीधे स्वर से अधिक वातावरण में आती है. धीमे इलेक्ट्रॉनिक रंग, दबे हुए गिटार, रात, रंगों की स्मृति और घरेलू दु:ख का धुँधलका, ये सब लाना के बाद वाले, अधिक परिपक्व, कम नाटकीय; लेकिन अधिक गहरे संसार की याद दिलाते हैं. फ्रेश आउट द स्लैमर में टेलर और भी रोचक ढंग से लाना के पास जाती हैं. कंट्री-वेस्टर्न झिलमिलाहट, ट्रेमोलो गिटार, स्प्रिंग रिवर्ब और धूल भरा हाईवे-नॉयर; यहाँ गीत जैसे जेल से नहीं, किसी विशाल और धूल के वैभव से समृद्ध सिनेमाई रेगिस्तान से बाहर आता है.
फिर आइ कैन फिक्स हिम और गिल्टी ऐज़ सिन? जैसे गीत हैं, जहाँ समानता संगीत से कम, मनोविज्ञान में है. ख़तरनाक़ पुरुष, उसे सुधार लेने की स्त्री-कल्पना, नैतिक रूप से संदिग्ध आकर्षण, प्रेम और विनाश की पतली रेखा यानी यह लाना डेल रे के पुराने मिथक का इलाक़ा है. लेकिन टेलर इसमें आत्म-व्यंग्य, स्वीकारोक्ति और कथा की तेज़ धार जोड़ती हैं. लाना उस अँधेरे को मादक, मोहक और सुगंधित बनाती हैं; टेलर उसे केस-स्टडी में रूपांतिरत कर देती हैं.
अब सवाल यह है कि क्या लाना डेल रे कभी टेलर की तरह गाती हैं? सामान्यतः नहीं. लाना वातावरण की गायिका हैं; टेलर संरचना की गायिका हैं. लाना की धुन कमरे की रूह में घुलने लगती है और ऐसे लगता है जैसे मौसम-ए-गु़ल उस कमरे में आने के लिए आँगन में मचलते हुए उसी कमरे का दरवाज़ा खटखटाने लग जाए; टेलर की धुन कमरे की रूह को सुव्यवस्थित करती है. इतना कि वहाँ रेत पर भी माधुर्य का यह दरिया सलीके से लहराता रह सकता है. लाना का संगीत अक्सर स्मृति की राख में अपनी सुंदर उंगलियाँ फिराता है; टेलर उसी राख से कोरस में मधुर बेताबियाँ भरती हैं.
द फेट ऑफ़ ओफीलिया में लाना की धुंध के अलावा और भी कई परछाइयाँ सुनाई देती हैं. इसका डांस-पॉप इंजन रॉबिन जैसी स्कैंडिनेवियाई इलेक्ट्रो-पॉप सफ़ाई लिए हुए है. भावुकता है, पर वह क्लब-फ्लोर से डरती नहीं. ड्रम की चाल और कुछ मेलोडिक मोड़ों में स्टीवी निक्स और फ्लीटवुड मैक की पुरानी स्मृति चमकती है, जैसे ड्रीम्स की कोई दूर की धड़कन यहाँ फिर से सुनाई दे रही हो. कहीं-कहीं गोरीलाज़ जैसी हल्की कार्टूनिश बाउंस भी आती है. ओफीलिया की त्रासदी और सिंथ-फंक की चाल का यह मेल गीत को एक अजीब लिटरेरी-पॉप ऊर्जा से लबालब कर देता है.
डफी और अडेल की दो हजार के दशक वाली रेट्रो-फंक चमक भी इसमें महसूस होती है. वह पॉप जो आत्मा की बात करता है; लेकिन शरीर को स्थिर नहीं रहने देता. यूरिथमिक्स की अस्सी के दशक वाली न्यू-वेव चमक भी कहीं पीछे खड़ी है; ठंडे सिंथ, नियंत्रित नाटक और स्त्री-स्वर की नाटकीय मुद्रा.
टेलर के दूसरे गीतों में भी यह प्रभावों का खेल चलता है. आइ कैन डू इट विद अ ब्रोकन हार्ट टूटन को मैनिक डांस-पॉप में बदल देता है. यह रोबिन, पेट शॉप बॉयज़ और विंस क्लार्क की परंपरा की याद दिलाता है. वह संगीत, जिसमें दिल रो रहा होता है और मशीन नाच रही होती है. स्टाइल में डाफ्ट पंक जैसी फंकी इलेक्ट्रॉनिक चमक है रात, इच्छा और गिटार का बेहद चिकना पॉप-संयोजन. एक्चुअली रोमांटिक जैसे गीतों में हेले विलियम्स, पैरामोर और बॉयजीनियस जैसी इंडी और पॉप-पंक ऊर्जा का असर दिखता है.
लेकिन बात एक गीत तक सीमित नहीं है. टेलर स्विफ्ट और लाना डेल रे को साथ सुनना जैसे दो अलग-अलग ऋतुओं के विह्वल संहार को एक ही खिड़की से देखना है. एक तरफ़ लाना हैं, जिनके गीतों में समुद्र किनारे पड़ी कोई पुरानी कार, अधजली सिगरेट, धुँधला आईना, टूटे प्रेम की नीली गंध और अमरीकी मिथक की थकी हुई परछाईं रहती है. दूसरी तरफ़ टेलर हैं, जिनके गीतों में वही प्रेम डायरी, अदालत, मंच, नाटक, पुल, कोरस और जन-स्मृति में बदल जाता है. लाना आत्मा के अँधेरे कमरे में कंठ की वेदना से मोमबत्ती जलाती हैं; टेलर उसी कमरे की खिड़कियाँ खोल देती हैं कि हवा आए, रोशनी आए, और दर्द अपना नाम लेकर इन नयनों से उन नयनों में सामने बैठकर बात करे.
लाना का संसार अल्टरनेटिव पॉप, बारोक पॉप और ड्रीम पॉप की बहुत महीन बुनावट से बनता है. उनके यहाँ गाना केवल गाना नहीं होता; वह जैसे कोई पुराना पोस्टकार्ड हो, जिस पर बारिश के निशान रह गए हों. वीडियो गेम्स’ सुनिए तो लगता है, प्रेम किसी चमकदार महानगर में नहीं, किसी धुँधले कमरे में बैठा है और लड़की अपने ही समर्पण से सम्मोहित और घायल होकर तृष्णा की जागृति में लीन है. यह गीत इतना धीमा है कि तेज़ दुनिया से बदला लेता हुआ लगता है. इसके सामने टेलर का डेलिकेट’ रख दीजिए. वहाँ भी नाज़ुकी है, इच्छा है, असुरक्षा है; लेकिन टेलर उस असुरक्षा को शब्दों की व्यवस्था देती हैं. लाना कहती हैं, मैं इस नष्ट होती सुंदरता में हूँ. टेलर कहती हैं, मैं जानती हूँ कि यह नष्ट हो सकता है, इसलिए इसे अभी मूर्त राग बना देती हूँ.
बॉर्न टू डाइ’ और ब्लैंक स्पेस’ को साथ रखिए. दोनों में प्रेम खेल भी है और खतरा भी. लाना के यहाँ खतरा सचमुच धुँधले राजमार्ग पर दौड़ती कार है. वहाँ प्रेमी किसी पोस्टर का, किसी अपराध-कथा का, किसी रात्रिकालीन अमरीकी मिथक का आदमी है. टेलर के यहाँ ख़तरा अधिक सुखकर गंध की तरह आता हुआ एक बुद्धिमान् है. ब्लैंक स्पेस’ में वह प्रेमिका अपने ऊपर लगाए गए पॉप-संस्कृति के आरोपों को आईना बनाकर वापस दर्शक की तरफ़ सुख-गंध बनाकर घुमा देती है. लाना मूर्च्छित लिपटती सी ख़तरनाक़ प्रेम में डूबती हैं. टेलर ख़तरनाक़ प्रेम की चंचल पटकथा लिखती हैं और उस पर अपने भ्रू-कुटिल हस्ताक्षर भी करती हैं.

भारतीय जेन-ज़ी के लिए यह फ़र्क़ बहुत ज़रूरी है. क्योंकि वह एक साथ दो दुनियाओं में रहता है. एक दुनिया रील, स्टोरी, प्लेलिस्ट, ब्रेकअप-कोट, मेट्रो, देर रात चैट और अचानक गायब हो जाने वाले प्रेम की है. दूसरी दुनिया परिवार, परीक्षा, नौकरी, सामाजिक निगाह और लोग क्या कहेंगे’ की है. लाना इस जेन-ज़ी की सुखद ऐंद्रिक रात हैं. वह देर रात ईयरफ़ोन में बजती हैं, जब सब सो चुके होते हैं और मोबाइल की नीली रोशनी चेहरे पर पड़ रही होती है. टेलर उसी जेन-ज़ी की काठिन्य वक्षस्थल वाली सुबह हैं. जब वह उसी रात को शब्दों में बदलकर दुनिया को बताना चाहता है कि यह सिर्फ़ मूड नहीं, उसका ऐसा इतिहास है, जो वर्तमान के साथ तैरता है.
लाना की समरटाइम सैडनेस’ और टेलर की क्रूएल समर‘ को साथ सुनना न केवल बहुत दिलचस्प है, एक कल्पित सुख की खोज भी है. दोनों में गर्मी है, दोनों में प्रेम है, दोनों में पागलपन है, दोनों के वक्ष में सम्मोहक तिमिर का भार है. लेकिन लाना की प्रेमिल उष्णता सूर्यास्त के बाद की है; एक ऐसी गरमाहट, जिसमें पसीने से अधिक स्मृति बहती है. टेलर का गुनगुनापन नीयन लाइटों वाला है. बेक़रारी, चिल्लाहट, तेज़ बीट, छतों पर भागता हुआ दिल और निरवलंब भावनाओं का उद्वेग. समरटाइम सैडनेस’ में गर्मी किसी पुराने प्रेम की राख को गरम रखती है. क्रूएल समर’ में गर्मी दिल को दौड़ाती है, झुलसाती है; लेकिन उसे कोरस में विस्फोटित भी करती है. लाना का दु:ख अँधेरे में नीवी बंधनों को ढीला करते हुए चमकता है; टेलर का दु:ख भीड़ के बीच लू की तरह झुलसाता गाता है.
यंग एंड ब्यूटीफुल’ और लवर’ को साथ रखकर देखिए. लाना स्वर में सिहरन भर-भर कर पूछती हैं, जब मैं जवान और सुंदर नहीं रहूँगी, तब भी क्या तुम मुझे प्रेम करोगे? यह प्रश्न केवल प्रेमी से नहीं, दुष्ट और चपल समय से है, जिसकी रातों में जाने कितनी आहें भर देने की हृदयहीनताएँ हैं. यह सौंदर्य, क्षय और स्मृति का प्रश्न है. टेलर लवर’ में प्रेम को घर, रोशनी, नृत्य और साझी उम्र की तरह देखती हैं. वहाँ भय कम है, भरोसा अधिक है. लाना प्रेम से पूछती हैं; क्या तुम मेरी गिरती हुई सुंदरता के साथ रहोगे? टेलर प्रेम से निर्जन बातें करते हुए कहती हैं; आओ, इस घर में कैलेंडर बदलते रहें.
लाना के यहाँ बारोक पॉप का अर्थ है धनुषाकार दरवाज़े, भारी परदे, स्ट्रिंग्स, धीमा ड्रम, पुराने हॉलीवुड की उदासी और आवाज़ में शहद की तरह घुलता हुआ अँधेरा. हनीमून’ इसका सुंदर उदाहरण है. वह गीत जैसे किसी पुराने महल की लंबी दीर्घा में चल रहा हो. हर स्वर में एक अकेली स्त्री की वह गरिमा है, जो टूटती भी है तो नाटकीय ढंग से नहीं, सुगंधित चुप्पी में. टेलर के यहाँ बारोक या चेंबर-पॉप का भाव एपिफनी’, शैम्पेन प्रॉब्लम्स’ या माय टियर्स रिकोशे’ में आता है. वहाँ पियानो, धीमा आकाश, भुतहा स्मृति और शब्दों का बहुत कठोर अनुशासन है. लाना किसी गिरजे की रंगीन काँच वाली ऐसी खिड़की हैं, जिसमें महकते फूलों का वास है; टेलर उसी गिरजे में रखी ऐसी डायरी हैं, जिसमें किसी ने पूरे विधि-विधान से अपना शोक पूनों के चाँद की तरह लिखा है.
अल्ट्रावायलेंस’ और टेलर की माय टियर्स रिकोशे’ दो अलग दिशाओं से आती स्त्री-वेदना हैं. लाना का अल्ट्रावायलेंस’ धुँधले रॉक, स्लो-मोशन गिटार और अद्भुत आकर्षण का गीत है. वह प्रेम के भीतर हिंसा की नशीली, असुविधाजनक और विवादास्पद छाया को छूता है. टेलर की माय टियर्स रिकोशे’ में हिंसा भावनात्मक है; विश्वासघात, स्वामित्व, स्मृति और सार्वजनिक मृत्यु जैसी अनुभूति. लाना ज़हर को कलि-कुसुमों से बनाए इत्र की शीशी में रखती हैं. टेलर ज़हर को अदालत में सबूत की तरह पेश करती हैं.
लाना की वेस्ट कोस्ट‘ और टेलर की स्टाइल’ को साथ सुनिए. दोनों में सड़क है, गति है, इच्छा है, गिटार है, चमक है. लेकिन वेस्ट कोस्ट’ में गति अचानक धीमी पड़ती है, जैसे कार समंदर के किनारे मोड़ ले और समय कुछ क्षणों के लिए पिघल जाए. स्टाइल’ में सब कुछ अधिक चमकदार, रेखांकित और पॉप-आर्किटेक्चरल है. वहाँ इच्छा काले चश्मे, सफ़ेद टी-शर्ट, रात की ड्राइव और लगभग सिनेमाई परफ़ेक्शन में बदल जाती है. लाना सड़क पर खो जाती हैं. टेलर सड़क को फ़्रेम करती हैं.
ड्रीम पॉप के इलाक़े में दोनों का मिलना और भी अद्भुत है. लाना की वेनिस बिच’ लंबी, फैलती हुई, धुँधली और साइकेडेलिक नदी जैसी है. वह गीत जल्दी समाप्त होने से इनकार करता है, जैसे कोई शाम अपने ही रंगों से तृप्त न हो पा रही हो. टेलर की मिररबॉल’ उतनी लंबी नहीं, पर उतनी ही नाज़ुक है. वहाँ लड़की स्वयं को डिस्को-बॉल कहती है; टूटे हुए शीशों से दूसरों पर रोशनी फेंकती हुई. लाना का ड्रीम पॉप बाहरी परिदृश्य को स्वप्न बनाता है, टेलर का आत्मा को स्वप्न-उपकरण.
सिनेमन गर्ल’ और द आर्चर’ में भी यह निकटता सुनाई देती है. दोनों गीत घायल आत्म-संदेह के गीत हैं. लाना की सिनेमन गर्ल’ में दर्द धीमी मिठास में घुला है, जैसे बरसों की सूखी मुलतानी मिट्टी पर अचानक कोई बादल बरस गया हो और उससे गंध उठ गई हो. टेलर की द आर्चर’ में बेचैनी अधिक साफ़, अधिक आत्म-विश्लेषी है. लाना पूछती नहीं, धीरे-धीरे बहती हैं, टेलर खुद से प्रश्न करती हैं और प्रश्न को ही गीत का मेरुदंड बना देती हैं.
फिर ‘नॉर्मन फकिंग रॉकवेल’ का लाना-संसार है; व्यंग्य, प्रेम, थकान, महानता और गिरावट का विचित्र मिश्रण. उस एल्बम में लाना केवल नष्ट प्रेम की गायिका नहीं रहतीं; वे अमरीकी स्वप्न की आलोचक भी बनती हैं. उनके यहाँ प्रेमी कभी-कभी राष्ट्र का रूपक बन जाता है सुंदर, प्रतिभाशाली, आत्ममुग्ध, अस्थिर और अंततः निराशाजनक. टेलर की द लास्ट ग्रेट अमेरिकन डायनेस्टी’ में भी अमरीकी मिथक है; लेकिन वह अधिक कथा-केंद्रित है. टेलर एक स्त्री, एक घर, एक समाज और अपने को एक ही कथा-रेखा में जोड़ देती हैं. लाना मिथक को धुँधला करती हैं; टेलर मिथक की फ़ाइल बनाती हैं और फिर उसे कविता में बदल देती हैं.
इक्कीसवीं सदी की स्त्री-स्मृति, डिजिटल अकेलेपन, इच्छा, प्रदर्शन, बाज़ार, शरीर, आत्म-संदेह और मिथक-निर्माण की गहरी नील-झील है. जैसे कभी ग़ालिब ने निजी दु:ख को सभ्यता की भाषा बना दिया था, अमृता प्रीतम ने प्रेम और इतिहास को एक ही रूह में सुन लिया था, वैसे ही अपने पॉप-संसार में टेलर और लाना आज की युवतियों, युवकों और अकेले मनुष्यों की बिखरी हुई आत्मा को लयमान आवाज़ देती हैं.
लाना का संगीत पुराने लोगों को इसलिए चकित कर सकता है कि उसमें प्रणय रात्रि-सा ठहराव है. आज की इतनी तेज़ दुनिया में कोई गायिका इतनी धीमी कैसे हो सकती है? कोई गीत इतना उदास होकर भी इतना सुंदर कैसे हो सकता है? कोई आवाज़ इतनी कम गति में इतना गहरा नशा कैसे पैदा कर सकती है? लाना को सुनना जैसे रात की उस रेलगाड़ी में बैठना है, जो प्लेटफ़ॉर्म छोड़ चुकी है, पर खिड़की के बाहर अब भी शहर की कुछ रोशनियाँ पीछे भाग रही हैं.
टेलर पुराने लोगों को दूसरी वजह से चकित करेंगी. वे देखेंगे कि यह लड़की केवल स्टार नहीं, अपनी पीढ़ी की कथाकार है. वह प्रेम को घटना नहीं रहने देती; वह उसे दस्तावेज़, मुक़दमा, संस्मरण, लोक-कथा, आत्मालोचना और बाज़ार-भेदी पॉप-उत्सव में बदल देती है. उसके गीतों में लड़की पीड़िता भी है, अभियोजक भी, कवयित्री भी, व्यापारी भी, अभिनेत्री भी और अपनी कथा की मुख्य नायक भी.
लाना की ए ऐंड डब्ल्यू’ और टेलर की एंटी-हीरो’ को साथ पढ़ना आज की आत्म-छवि की दो अलग किताबें खोलना है. ए ऐंड डब्ल्यू’ में लाना अपने शरीर, छवि, इच्छा और सार्वजनिक निर्णयों की अँधेरी खोह में उतरती हैं. गीत टूटता है, बदलता है, जैसे आत्मा एक ही साँस में कई कमरों से गुज़र रही हो. एंटी-हीरो’ में टेलर आत्म-घृणा और आत्म-व्यंग्य को चमकदार पॉप में बदल देती हैं. लाना अपनी दरारों में उतरती हैं; टेलर अपनी दरारों पर रोशनी डालकर कहती हैं; देखो, यह भी मैं ही हूँ.
कार्डिगन’, ऑगस्ट’ और बेट्टी’ वाली टेलर की लोक-कथा-त्रयी के सामने लाना की केमट्रेल्स ओवर द कंट्री क्लब’ या व्हाइट ड्रेस’ रखिए. दोनों स्मृति लिख रही हैं, लेकिन टेलर स्मृति को पात्रों, ऋतुओं और कथानक में बाँधती हैं. लाना स्मृति को धूप, सफ़ेद कपड़े, लॉन, आकाश और भूले हुए आत्म-सम्मान में बिखरा देती हैं. टेलर के यहाँ कहानी का धागा साफ़ दिखाई देता है. लाना के यहाँ धागा हवा में उड़ता है, और श्रोता उसे पकड़ने के बजाय उसकी उड़ान में शामिल हो जाता है.
रॉक के मोर्चे पर लाना की ‘ब्रुकलिन बेबी’, ‘शेड्स ऑफ कूल’ और ‘वेस्ट कोस्ट’ एक गहरी, सुस्त, गिटार-भीगी दुनिया बनाते हैं. यह रॉक किसी स्टेडियम का पसीना नहीं, देर रात स्टूडियो की नीली रोशनी है. टेलर का रॉक स्टेट ऑफ़ ग्रेस’, हॉली ग्राउंड’ या बेटर दैन रिवेंज’ में अलग रूप लेता है; ज़्यादा गतिमान, ज़्यादा साफ़, ज़्यादा युवा और मंचीय. लाना का रॉक धुआँ छोड़ता है. टेलर का रॉक स्पार्क छोड़ता है.
और फिर दोनों की सबसे बड़ी समानता यह है कि वे दोनों स्त्री-स्वर को सुंदर गाना’ भर नहीं रहने देतीं. वे स्त्री को दृश्य बनाती हैं, आवाज़ बनाती हैं, कथा बनाती हैं, मिथक बनाती हैं. लाना अपनी छवि को पुराने हॉलीवुड, अमरीकी झंडे, मोटल, समुद्र, अपराध, कविता और मृत्यु की छाया से बनाती हैं. टेलर अपनी छवि को डायरी, पुल, कोरस, स्टेडियम, प्रेम-पत्र, प्रतिशोध, स्मृति और आत्म-पुनर्लेखन से बनाती हैं. दोनों अपनी-अपनी तरह से कहती हैं कि पॉप-संगीत सतही नहीं; वह आधुनिक मनुष्य का सार्वजनिक स्वप्न है.
भारतीय जेन-ज़ी के लिए इसमें एक बड़ा आकर्षण है. वह अपने कमरे में बैठे-बैठे लॉस एंजिलिस, नैशविल, न्यूयॉर्क, उदयपुर, जयपुर, गंगानगर, दिल्ली, बेंगलुरु, रोहतक, शिमला, चंडीगढ़, भोपाल, अहमदाबाद और इंदौर को एक ही प्लेलिस्ट में जोड़ सकता है. उसके लिए ‘ऑगस्ट‘ किसी अमरीकी समर का गीत नहीं रह जाता; वह कोचिंग के हॉस्टल की खिड़की, कॉलेज की पहली दोस्ती, अधूरी चैट और बरसात के बाद की भारतीय सड़क का गीत भी हो सकता है. वीडियो गेम्स’ किसी पश्चिमी प्रेमिका की आवाज़ नहीं रह जाती; वह हर उस युवा की आवाज़ बन जाती है जो अपने प्रेम में थोड़ा अधिक दे देता है और बदले में कम पाता है. क्रूएल समर’ जयपुर की गर्म रात में भी उतना ही सच है जितना किसी न्यूयॉर्क की पार्टी में. समरटाइम सैडनेस’ उदयपुर की झीलों के किनारे भी उतनी ही उदास लग सकती है जितनी कैलिफ़ोर्निया के किसी तट पर.
यही वैश्विक पॉप की नई शक्ति है. वह भाषा बदल देता है, भूगोल बदल देता है, लेकिन भाव नहीं बदलता. टेलर और लाना दोनों ने यह साबित किया है कि आज का महान पॉप केवल धुन नहीं, विश्व-साहित्य की नई शाखा भी हो सकता है. फर्क इतना है कि यह शाखा किताबों की अलमारी पर नहीं, ईयरफ़ोन में उगती है; इसके पन्ने काग़ज़ पर नहीं, प्लेलिस्ट में खुलते हैं; इसके पाठक लाइब्रेरी में नहीं, देर रात अपनी स्क्रीन के सामने बैठे मिलते हैं.
लाना भावनाओं को कुहासे, शराब, समुद्र, कार, चर्च, मोटल और पुरानी फ़िल्म की रोशनी में रखती हैं. टेलर भावनाओं को समय, तारीख, संवाद, पुल, कोरस, प्रतीक और सार्वजनिक स्मृति में. लाना का दु:ख फैलता है, टेलर का आकार लेता है. लाना की धुन बहती है, टेलर की निर्माण करती है. लाना प्रेम को स्वप्न की तरह नष्ट होते देखती हैं, टेलर नष्टप्राय को कोरस में बदल देती हैं.
और शायद यही कारण है कि द फेट ऑफ़ ओफीलिया’ जैसा गीत इतना सम्मोहक लगता है. उसमें टेलर केवल लाना की ओर नहीं देख रहीं; वे उस पूरे संसार की ओर देख रही हैं जहाँ स्त्री-स्वर पानी, धुंध, रोशनी, मंच, मशीन, गिटार, सिंथ और स्मृति के बीच अपना नया शरीर बना रहा है. लाना ने इस शरीर को नीली छाया दी. टेलर ने उसे चमकदार गति दी. लाना ने उसे स्वप्न दिया. टेलर ने उसे संरचना दी. लाना ने उसे रात दी. टेलर ने उसे मंच दिया.और जब रात, मंच, धुंध और कोरस एक साथ मिलते हैं, तभी ऐसा पॉप जन्म लेता है, जिसे केवल सुना नहीं जाता; जिसमें कुछ देर रहा भी जाता है.
इसलिए द फेट ऑफ़ ओफीलिया को सुनते हुए अगर लाना डेल रे याद आती हैं तो लगता है कि हम अपने सुनने पर शकोशुब्ह नहीं करें. वह परछाईं वहाँ है. लेकिन यह भी देखिए कि टेलर उस परछाईं को कहाँ ले जाती हैं. लाना की दुनिया में ओफीलिया शायद पानी में उतरती और गीत पानी की सतह पर बहुत देर तक काँपता रहता. टेलर की दुनिया में ओफीलिया पानी से उठती है, बालों से बूँदें झटकती है और एक तहज़ीब के बर्ज़ख़ पर कोरस में बदल जाती है.
यही इस गीत की असली विजय है. यह लाना की उदासी को उधार लेता है, मगर उसकी नियति नहीं लेता. यह ओफीलिया की मृत्यु को याद रखता है; लेकिन उसे पॉप की पुनर्जन्म-कथा में बदल देता है. लाना का गीत अक्सर रात को और गहरा करता है. टेलर का गीत रात से मंच बनाता है. द फेट ऑफ़ ओफीलिया में टेलर स्विफ्ट लाना डेल रे नहीं बनतीं; वे लाना की धुंध से गुज़रती हैं और अपना सूरज उगा देने से पहले ही पश्चिमी क्षितिज पर एक नायाब इंद्रधनुष टांग देती हैं.
संदर्भ
ओफीलिया की ‘नियति ‘की नियति?

ओफीलिया की नियति’ का मतलब है प्रेम, भ्रम, उपेक्षा, मानसिक टूटन और अंततः डूब जाने वाली त्रासद स्त्री-नियति. दरअसल, यह यह शेक्सपीयर के नाटक हैमलेट की पात्र ओफीलिया से आया है. ओफीलिया एक कुलीन घराने की युवती है, जो हैमलेट से प्रेम करती है. लेकिन राजनीति, पितृसत्ता, प्रेम में अस्वीकार, पिता की मृत्यु और मानसिक आघात उसे धीरे-धीरे इतनी बुरी तरह तोड़ देते हैं कि वह अंततः पानी में डूबकर मर जाती है. उसकी मृत्यु को लेकर यह प्रश्न उठता रहता है कि वह दुर्घटना थी या आत्म-विनाश. इसलिए गीत में the fate of Ophelia’ का अर्थ केवल ओफीलिया का भाग्य’ नहीं है. इसका गहरा अर्थ है: एक ऐसी स्त्री का दुखांत, जो प्रेम और भ्रम में डूबकर अपनी सुध-बुध, अपना संतुलन और अंततः अपना जीवन खो देती है.
मैंने सुनी तुम्हारी वह पुकार,
जो भीड़ पर से आई थी
ऊँची ध्वनि में तैरकर
तुम मुझे चाहते थे तन्हाई में
जमाना जानता है
आग से तुम्हरा नाता है
तुम एक तीली जलाते हो
और ठहरकर देखते हो
दुनिया कैसे भभक उठती है.
इतने समय तक
मैं अपने टॉवर में रही इतनी तन्हा
तुम तो कहीं
अपनी पहचानना सीख रहे थे शक्तियों को
और अब मेरे भीतर
कितना कुछ देख लेने की क्षमताएँ हैं
वह सब
जो पहले नहीं दिखता था
एक देर रात
तुम आए
तुमने मेरी क़ब्र की मिट्टी हटाई
मुझे बाहर निकाला
और मेरे हृदय को बचा लिया
ओफीलिया की नियति से.
सच कहना
पूरा सच
धरती पर
समुद्र पर
आकाश के नीचे
मैं तुम्हारे हाथों के स्पर्श को मानती हूँ
तुम्हारे संसार को
तुम्हारी उस गंध को
जो तुम्हारे साथ चलती है
तुम पहले कहाँ थे
अब यह ज़रूरी नहीं
अब तुम मेरे हो
यह वही रात है
जिसमें नींद नहीं आएगी
शायद इसी रात का सपना
तुमने देखा था
ओफीलिया की नियति.
ओफीलिया
जो थी एक कुलीन पिता की लाड़ली
रहती थी कल्पनाओं में
लेकिन प्रेम
उसके लिए सुहानी सेज नहीं
एक मनहूस शयन कक्ष साबित हुआ
जिसमें भरे थे बिच्छू
ज़हर ने धीरे-धीरे
उसकी समझ छीन ली
अगर तुम मेरे लिए न आए होते
तो मैं शायद
अधर में पड़ी रहती
न पूरी तरह यहाँ
न पूरी तरह वहाँ
तुम मेरे चारों ओर आए
वरमाला की तरह
मुकुट की तरह
पुष्प वल्लरी की तरह
और मुझे
उस लौ की ओर ले गए
इतने समय तक
मैं अपने टॉवर में
तन्हा ही सुलगती रही
अब यह ज़रूरी नहीं
क्योंकि अब
तुम मेरे हो
यह वही रात है
जिसमें नींद नहीं आएगी
शायद इसी रात का सपना
तुमने देखा था
ओफीलिया की नियति
यह सब
मेरी स्मृति में बंद है
और उसकी चाबी
सिर्फ़ तुम्हारे पास है
अब मैं डूबती नहीं
अब मैं छल में नहीं हूँ
यह सब इसलिए
कि तुम मेरे लिए आए
मेरी स्मृति में बंद है
यह सब
और चाबी
सिर्फ़ तुम्हारे पास है.
सच कहना
पूरा सच
धरती पर
समुद्र पर
आकाश के नीचे
मैं तुम्हारे हाथों को मानती हूँ
तुम्हारे लोगों को
तुम्हारी उस हवा को
जो तुम्हारे साथ चलती है
तुम पहले कहाँ थे
अब यह ज़रूरी नहीं
अब तुम मेरे हो
यह वही रात है
जिसमें नींद नहीं आएगी
शायद इसी रात का सपना
तुमने देखा था
ओफीलिया की नियति
तुमने मेरे हृदय को बचा लिया
ओफीलिया की नियति से.
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भारत–पाक सीमा के एक गाँव में जन्मे त्रिभुवन जयपुर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वे हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर रह चुके हैं. उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं, कुछ इस तरह आना,’ शूद्र: एक लंबी कविता,’ और राष्ट्रवाद के नवपरिप्रेक्ष्य .’ त्रिभुवन अपने सूक्ष्म राजनीतिक विश्लेषण, संयमित भाषा और गहन पठनशीलता के लिए जाने जाते हैं. जयपुर में रहते हैं. thetribhuvan@gmail.com |





द फेट ऑफ़ ओफीलिया में टेलर स्विफ्ट लाना डेल रे नहीं बनतीं. वे लाना की धुंध को अपनी रोशनी में अनुवाद करती हैं. यह फ़र्क़ बहुत बड़ा है. किसी कलाकार की नकल करना एक बात है; उसकी संवेदना को अपनी भाषा में बदल देना दूसरी बात. टेलर यहाँ दूसरी चीज़ करती हैं. वह वाक़ई एक कोंपल को ख़ुशबू से सने फूल में बदलती हैं.
लाना स्वर में सिहरन भर-भर कर पूछती हैं, जब मैं जवान और सुंदर नहीं रहूँगी, तब भी क्या तुम मुझे प्रेम करोगे? यह प्रश्न केवल प्रेमी से नहीं, दुष्ट और चपल समय से है, जिसकी रातों में जाने कितनी आहें भर देने की हृदयहीनताएँ हैं. यह सौंदर्य, क्षय और स्मृति का प्रश्न है. टेलर लवर’ में प्रेम को घर, रोशनी, नृत्य और साझी उम्र की तरह देखती हैं. वहाँ भय कम है, भरोसा अधिक है. लाना प्रेम से पूछती हैं; क्या तुम मेरी गिरती हुई सुंदरता के साथ रहोगे? टेलर प्रेम से निर्जन बातें करते हुए कहती हैं; आओ, इस घर में कैलेंडर बदलते रहें…..कमाल का लेख।
त्रिभुवन जी की जीतनी प्रशंसा की जानी चाहिए मेरे पास उतनी प्रशंसा नहीं।
त्रिभुवन जी का यह लेख एक लंबी, मदिर और आत्मविभोर गद्य-रागिनी है, जहाँ आलोचना कई बार कविता में विलीन हो जाती है। हिंदी आलोचना में लोकप्रिय पॉप-संस्कृति को इतनी गंभीर सौंदर्य-दृष्टि से पढ़ना दुर्लभ है।यह लेख सांस्कृतिक-संगीत आलोचना, आत्मानुभवात्मक निबंध और काव्यात्मक गद्य का मिश्रित रूप है।
लेख का गद्य अत्यंत सम्मोहक है। किन्तु इसी बिंदु पर लेख की सीमा भी प्रकट होती है। त्रिभुवन कई बार विश्लेषक कम, मुग्ध श्रोता अधिक हो जाते हैं और पाठक को भी मुग्ध कर देते हैं, मगर अवचेतन एक विपरीत प्रभाव छोड़ते हैं। यह ही इस लेख को अलग अनुभव बनाता है, शायद।
त्रिभुवन जी के शहर में आज की सुबह चाय से पहले इस
लासानी लेख को पढ़ा। लाना डेल और टेलर पर पढ़कर बहुत से पाठक समृद्ध होंगे। उसकी चर्चा वे ही करेंगे। हम तो यही कहेंगे, हिंदी में ऐसी सजावट, लगावट और गहन सारगर्भिता के साथ लिखने वालों में त्रिभुवन जी शीर्ष पर हैं। हिंदी छोड़िए, किसी भारतीय भाषा में ऐसा रस-भावसिक्त लेख मिलना दुर्लभ है। उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि हिंदी को कितना सिंगारित करके लिखा जा सकता है। संपादक और लेखक की तारीफ के लिए शब्द ही कम पड़ जाते हैं।
त्रिभुवन जी की समीक्षा पूरी पढ़ी । एक एक शब्द मानों गीतों के साथ बहता दीख रहा है ।आज के जेन जी की दुविधाग्रस्त जिंदगी के साथ तालमेल बिठाते त्रिभुवन जी ने पाप संगीत के सौंदर्यशास्त्र की अद्भुत व्याख्या की है ।
अरूण देव जी और त्रिभुवन जी को सुंदर आलेख प्रेषित करने के लिए बहुत बहुत आभार ।
ऐसे लेख अविस्मरणीय होते हैं। इन दिनों त्रिभुवन भाई कमाल कर रहे हैं। समालोचन पत्रिका तो बड़ा काम कर रही है जहां हर दिन अच्छी पठनीय सामग्री मिली जाती है। आप दोनों को सलाम
त्रिभुवन जी की समीक्षा पढ़ी, समीक्षा क्या ऐसा लगा एक धारदार नदी, पर संभल कर बह रही हो। कहानी पढ़ी जाती है एक साँस में, ये किसने कहा? समीक्षा भी पढ़ी जाती है, बगैर थमे। तुलना करते हुए जैसे उन्होंने उदयपुर और जयपुर से होते हुए गिरजे में रखी डायरी तक ले गए, जहाँ तुलनात्मक साहित्य के सारे विधि विधान एकाएक एक विराट कैनवास में बदल जाता है और एक मायावी सम्मोहन से बँधें हम समीक्षा का आस्वादन लेते जान पड़ते हैं।
त्रिभुवन जी, अरुण देव जी, आप दोनों का हार्दिक आभार और धन्यवाद !
अद्भुत और सिर्फ अद्भुत। शब्द नहीं मिल रहे इसकी व्याख्या के लिए।
शायद आगे कभी इस पर कुछ लिख सकूँ !
बहुत सुंदर l बहुत ज्ञानवर्धन हुआ l
कितना डूब कर लिखा है त्रिभुवन जी ने।ऐसे दुर्लभ लेख किसी भी भाषा की अनमोल विरासत की तरह होते हैं।आपने ठीक लिखा वे किसी के लिए भी ईर्ष्या का विषय हो सकते हैं।हमें फख्र है हिंदी में ‘समालोचन’ और त्रिभुवन दोनों हैं।
अद्भुत। हिंन्दी में ऐसी सामग्री अनन्य है। समालोचन साहित्य, कला संगीत के समन्वय का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करके, अपने को सिद्ध किया है।
त्रिभुवन ने बहुत डूब कर लिखा है। प्रशंसनीय है।
यह नहीं पता चला कि मूल लेख हिन्दी में लिखा हुआ है, अथवा हिन्दी में अनूदित है।
सबसे पहले तो आपका शुक्रिया। बजरंग जी, यह लेख पूरी तरह हिन्दी में ही सोचा गया और हिन्दी ही में लिखा गया है। यह अंगरेज़ी से अनूदित नहीं है।
दुर्लभ एवं विरल लेख!सौंदर्यात्मक,तुलनात्मक अध्ययन ऐसा कम पढ़ने को मिलता है ।
त्रिभुवन जी के इस अनोखे लेख के जरिये , वैश्विक संगीत के अदेखे क्षेत्रों और आयामों से परिचय की गुंजाइश बन रही है। यह बंद खिड़कियों के खुलने का दृश्य है।