द गर्ल फ्रॉम इपनेमा
|
लंबी, सांवली, युवा और सुहानी,
इपनेमा की वह लड़की चलती चली जा रही है.
वह चलती है, जैसे सांबा की लय हो
धीमे-धीमे झूमती, लहराती हुई सी.
कैसे कहूँ उससे कि मैं उससे प्रेम करता हूँ?
हाँ, अपना दिल मैं खुशी-खुशी दे दूँ.
पर हर दिन जब वह सागर की ओर बढ़ती है,
वह सामने देखती रहती है- मेरी ओर नहीं.
1963 में इपनेमा की वह लड़की समुद्र को इसी तरह देखा करती थी. और 1982 में भी वह ठीक उसी तरह समुद्र की ओर देख रही है. वह उम्रदराज़ नहीं हुई. अपनी ही छवि में मुहरबंद, वह समय के महासागर में तैरती चली जा रही है. अगर वह सचमुच उम्र के साथ बड़ी हो रही होती, तो अब तक शायद चालीस के आसपास पहुँच गई होती- या शायद नहीं. पर इतना तो तय है कि उसका वह सुतवाँ, लचीला शरीर अब न होता, न ही वह उतनी सांवली दिखती. संभव है, उसकी पुरानी सुंदरता की कुछ आभा अब भी बनी रहती, लेकिन उसके तीन बच्चे होते, और इतनी धूप उसकी त्वचा को क्षति पहुँचा चुकी होती.
मेरे अपने संगीत रेकॉर्ड (ग्रामोफ़ोन पर बजाया जाने वाला रेकार्ड) में, ज़ाहिर है, वह ज़रा भी बड़ी नहीं हुई. स्टैन गेट्ज़ के टेनर सैक्सोफ़ोन की मख़मली ध्वनि में लिपटी हुई, वह अब भी उतनी ही शीतल है. धीरे-धीरे लहराती इपनेमा की वही लड़की. मैं रिकॉर्ड को टर्नटेबल पर रखता हूँ, सुई को खांचे में टिकाता हूँ- और वह सामने उपस्थित हो जाती है.
कैसे कहूँ उससे कि मैं उससे प्रेम करता हूँ?
हाँ, अपना दिल मैं ख़ुशी ख़ुशी दे दूँ.
यह धुन हर बार मेरे हाई स्कूल के गलियारे की स्मृति में लौट जाती है- अँधेरा, सीलनभरा गलियारा. उसके कंक्रीट के फ़र्श पर चलते हुए, आपके कदमों की आहट ऊँची छत से टकराकर गूँज उठती. उत्तर दिशा में कुछ खिड़कियाँ थीं, पर वे पहाड़ से सटी हुई थीं, इसलिए गलियारा हमेशा धुँधला और अँधेरा रहता. और वहाँ लगभग हमेशा सन्नाटा पसरा रहता था-कम-से-कम मेरी स्मृति में तो रहता ही था.
मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि ‘द गर्ल फ्रॉम इपनेमा’ मुझे अपने हाई स्कूल के उस गलियारे की याद क्यों दिलाती है. दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है. कभी-कभी मैं सोचता हूँ- 1963 की उस इपनेमा वाली लड़की ने मेरी चेतना के कुएँ में किस तरह के कंकड़ फेंके थे?
और जब मैं अपने हाई स्कूल के उस गलियारे के बारे में सोचता हूँ, तो मेरे मन में मिक्स सलाद की छवि उभर आती है- लेट्यूस, टमाटर, खीरा, हरी शिमला मिर्च, ऐस्पैरागस, प्याज़ के छल्ले और गुलाबी थाउज़ैंड आइलैंड ड्रेसिंग. ऐसा नहीं कि उस गलियारे के अंत में कोई सलाद की दुकान थी. नहीं, वहाँ तो बस एक दरवाज़ा था, और उस दरवाज़े के पार एक फीका-सा, पच्चीस मीटर लंबा स्विमिंग पूल.
तो फिर मेरे पुराने हाई स्कूल का वह गलियारा मुझे मिक्स सलाद की याद क्यों दिलाता है? इन दोनों का भी आपस में कोई लेना-देना नहीं है. वे बस यूँ ही साथ आ जुड़े- जैसे कोई बदक़िस्मत महिला अनजाने में ऐसी बेंच पर जा बैठे जिसकी अभी रंगाई हुई हो.
मिक्स सलाद मुझे उन दिनों की एक लड़की की याद दिलाते हैं, जिसे मैं थोड़ा-बहुत जानता था. और यह संबंध तो तार्किक है, क्योंकि वह लड़की लगभग सिर्फ सलाद ही खाया करती थी.
‘वह (चबर-चबर) अंग्रेज़ी का असाइनमेंट (चबर-चबर) कैसा चल रहा है? पूरा किया?’
‘अभी नहीं (चबर-चबर). अभी तो (चबर-चबर) थोड़ा पढ़ना बाकी है.‘
मुझे भी सलाद काफ़ी पसंद था, इसलिए जब भी मैं उसके साथ होता, हमारी बातचीत सलाद खाते-खाते ही चलती रहती. वह अपने विचारों में काफ़ी दृढ़ लड़की थी. उसका एक विश्वास यह था कि यदि संतुलित आहार लिया जाए, ढेर सारी सब्ज़ियाँ खाई जाएँ, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा. जब तक लोग सब्ज़ियाँ खाते रहेंगे, दुनिया सुंदर और शांतिपूर्ण बनी रहेगी- प्रेम और तंदुरुस्ती से लबालब भरी हुई. कुछ-कुछ द स्ट्रॉबेरी स्टेटमेंट (एक प्रसिद्ध फ़िल्म) जैसा.
‘बहुत, बहुत पहले’, एक दार्शनिक ने लिखा था, ‘एक समय ऐसा था जब पदार्थ और स्मृति के बीच एक अथाह अलौकिक खाई हुआ करती थी.‘
1963/1982 की इपनेमा वाली लड़की अब भी एक अलौकिक तट की तपती रेत पर चुपचाप चलती जा रही है. वह तट बहुत लंबा है, जिस पर कोमल, सफ़ेद लहरें आकर थपकियाँ देती हैं. वहाँ न हवा है, न क्षितिज पर कुछ दिखाई देता है.
बस समुद्र की गंध है. और सूरज का ताप है.
समुद्रतट की छतरी के नीचे पसरा हुआ मैं कूलर से बीयर का एक कैन निकालता हूँ और उसका टैब खींचकर खोल देता हूँ. वह अब भी पास से गुज़र रही है—एक चटख, प्राथमिक रंगों वाली बिकनी उसके लंबे, सांवले शरीर से चिपकी हुई है.
मैं कोशिश करता हूँ- ‘हाय, कैसी हो?’
‘ओह, हैलो,’ वह कहती है.
‘बीयर लोगी?’
वह थोड़ी झिझकती है. पर आख़िरकार वह चलते-चलते थक चुकी है, और उसे प्यास भी लगी है. ‘हाँ, चलेगा,’ वह कहती है.
और फिर हम दोनों मेरी बीच-अम्ब्रेला के नीचे साथ-साथ बीयर पीने लगते हैं.
‘वैसे,’ मैं हिम्मत करके कहता हूँ, ‘मुझे यक़ीन है, हम 1963 में मिले थे. यही समय. यही जगह.’
वह अपना सिर थोड़ा-सा तिरछा करती है. ‘वह तो बहुत पहले की बात होगी,’ वह कहती है.
‘हाँ,’ मैं कहता हूँ. ‘बहुत पहले की.’
वह एक ही घूँट में बीयर के कैन को आधा ख़ाली कर देती है, फिर उसके ऊपर बने छोटे-से छेद को देखने लगती है. वह बस एक साधारण-सा बीयर का कैन है, जिसमें एक साधारण-सा छेद है- लेकिन जिस तरह वह उस खुली जगह को निहारती है, वह मानो कोई विशेष अर्थ ग्रहण कर लेता है, जैसे पूरा संसार उसी में समा जाने वाला हो.
‘शायद हम मिले थे—1963 में, है न? ह्म्म… 1963. हो सकता है, हम मिले हों.‘
‘तुम तो ज़रा भी नहीं बदली.‘
‘बिलकुल नहीं. मैं तो एक अलौकिक लड़की हूँ.‘
मैं सिर हिलाता हूँ. ‘तब तुम्हें मेरे होने का पता भी नहीं था. तुम समुद्र को देखती रहती थीं, कभी मेरी ओर नहीं.‘
‘हो सकता है’, वह कहती है. फिर मुसकुराती है- एक अद्भुत मुस्कान, पर उसमें हल्की-सी उदासी घुली हुई है. ‘शायद मैं सचमुच समुद्र को ही देखती रही. शायद मुझे और कुछ दिखाई ही नहीं दिया.‘
मैं अपने लिए एक और बीयर खोलता हूँ और एक कैन उसकी तरफ़ भी बढ़ा देता हूँ. वह बस सिर हिला देती है. ‘मैं इतनी बीयर नहीं पी सकती’, वह कहती है. ‘मुझे चलते रहना है-चलते ही रहना है. फिर भी, शुक्रिया.‘
‘क्या चलते-चलते तुम्हारे पैरों के तलवे गर्म नहीं हो जाते?’ मैं पूछता हूँ.
‘बिलकुल नहीं’, वह कहती है. ‘वे पूरी तरह अलौकिक हैं. देखना चाहोगे?’
‘ठीक है.‘
वह अपनी लंबी, पतली टाँग मेरी ओर बढ़ाती है और अपने पैर का तलवा दिखाती है. वह सही कहती है— वह सचमुच अद्भुत रूप से अलौकिक तलवा है. मैं उसे अपनी उँगली से छूता हूँ. न गर्म, न ठंडा.
जब मेरी उँगली उसके तलवे को छूती है, तो हल्की-सी लहरों की आवाज़ सुनाई देती है. एक अलौकिक ध्वनि.
मैं कुछ क्षण के लिए आँखें बंद करता हूँ, फिर उन्हें खोलता हूँ और एक पूरी ठंडी बियर की कैन गटक जाता हूँ. सूरज बिल्कुल वैसा ही है. समय जैसे रुक गया हो, मानो किसी आईने में समा गया हो.
‘जब भी मैं तुम्हारे बारे में सोचता हूँ, मुझे अपने हाई स्कूल का कॉरिडोर याद आता है,’ मैं उसे बताने का निश्चय करता हूँ. ‘मैं सोचता हूँ क्यों.’
‘मानव सार जटिलता में निहित है,’ वह जवाब देती है. ‘वैज्ञानिक अध्ययन के विषय वस्तु में नहीं, बल्कि उस विषय में है जो मानव शरीर के भीतर निहित है.’
‘सही में?’
“खैर, तुम्हें जीना ही होगा. जियो! जियो! जियो! बस यही सबसे ज़रूरी है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जीते रहो. बस, यही मैं कह सकती हूँ. सच में, बस यही. मैं तो सिर्फ एक लड़की हूँ, जिसके तलवे अलौकिक हैं.’
1963/1982 की इपनेमा की लड़की अपने जांघों से रेत झाड़ती है और खड़ी हो जाती है. ‘बियर के लिए धन्यवाद.’
‘कुछ नहीं कहो.‘
कभी-कभी. अक्सर नहीं. मैं उसे सब-वे में देख लेता हूँ. मैं उसे पहचानता हूँ और वह मुझे पहचानती है. वह हमेशा मुझे एक छोटी-सी ‘बियर के लिए धन्यवाद’ भरी मुस्कान देती है. उस दिन के बाद से हमने बात नहीं की, लेकिन मैं महसूस कर सकता हूँ कि हमारे दिलों को जोड़ने वाला कोई न कोई संबंध है. मुझे ठीक से नहीं पता कि वह संबंध क्या है. शायद यह संबंध किसी दूरस्थ दुनिया के किसी अजीब स्थान में है.
मैं उस संबंध की कल्पना करने की कोशिश करता हूँ. एक ऐसा संबंध जो मेरे चेतन में फैला हुआ है, चुप्पी में, एक अंधेरे गलियारे में जिसके भीतर कोई नहीं आता.
मैं उस संबंध की कल्पना करने की कोशिश करता हूँ– एक ऐसा संबंध जो मेरी चेतना में फैल गया है, चुप्पी में, एक अंधेरे गलियारे के पार, जहाँ कोई नहीं आता. जब मैं इसे ऐसे सोचता हूँ, तो धीरे-धीरे हर तरह की घटनाएँ, हर तरह की चीज़ें मुझे थोड़ी-थोड़ी पुरानी यादों में डुबोने लगती हैं. मुझे यकीन है, वहीं कहीं वह संबंध है जो मुझे स्वयं से जोड़ता है. किसी दिन, मुझे यकीन है, मैं किसी अजीब जगह पर, किसी दूरस्थ दुनिया में, अपने आप से मिलूँगा. और अगर कहने का मेरा अपना अधिकार होगा, तो मैं चाहता हूँ कि वह जगह गर्म और आरामदायक हो. और अगर वहाँ कुछ ठंडी बियर भी हों, तो और क्या चाहिए? उस जगह मैं स्वयं हूँ और स्वयं मैं हूँ. विषय ही वस्तु है. और वस्तु ही विषय है. सभी अंतर मिट गए. संपूर्ण रूप से एकाकार. दुनिया में कहीं ऐसा कोई अजीब स्थान जरूर होगा.
1963/1982 की इपनेमा की लड़की गर्म रेतीले तट पर चलती रहती है. और वह तब तक चलती रहेगी जब तक ग्रामोफ़ोन पर आखिरी रिकॉर्ड घिस न जाए.
| प्रभात रंजन (जन्म 3 नवम्बर, 1970, सीतामढ़ी, बिहार) ________तीन कहानी संग्रह और एक उपन्यास ‘कोठागोई तथा ‘हिंदी मीडियम टाइट’ पुस्तक प्रकाशित. अंग्रेज़ी से हिन्दी में 25 से अधिक पुस्तकों का अनुवाद. ‘सहारा समय कथा सम्मान’, ‘प्रेमचंद कथा सम्मान’, ‘कृष्ण बलदेव फेलोशिप’, ‘द्वारका प्रसाद अग्रवाल उदीयमान लेखक पुरस्कार’ से सम्मानित. जानकीपुल नामक प्रसिद्ध वेबसाइट के संपादक हैं. prabhatranja@gmail.com |




Mesmerising story! Awesome translation!
दर्शन के तल को स्पर्श करने वाली, रोचक और मर्मसपर्शी कहानी। प्रभात जी को बेहतरीन अनुवाद के लिए बहुत बहुत बधाई।
मेरे प्रिय कहानीकार की शानदार कहानी का बहुत बढ़िया अनुवाद। प्रभात रंजन जी और अरुण देव जी का हार्दिक आभार।