| अनृक् संतोष पासी के लिए ______________________ रेने मार्ग्रित के चित्र ‘The lovers’ पर केन्द्रित गद्य कविताएँ |

विरह
वे एक दूसरे से सटे हुए दो मुख नहीं, बल्कि सफ़ेदी में लिपटी हुई दो आकृतियाँ हैं. दुकूल के पीछे देह नहीं, देहाभास है—साँस, होंठ, मौन. वे दो हैं, पर दोनों ने एक दूसरे को नहीं देखा. उनका स्पर्श देह का है या छाया का? क्या इस प्रेम में पहचान के लिए कोई चिह्न नहीं : न आँख, न भौंह, न वह रेखा जो जीवन ने खींची हो? हाँ, आकार में अँधेरा है और भीगा सन्नाटा. आवाज़ नहीं है; मानो बोलने पर शब्द उलट कर कफ़न के अन्दर ही खो जायेंगे.
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जिन्हें देखना प्रेम हो सकता था, उन्होंने अँधा होना चुन लिया. सफ़ेद दुकूल के दो टुकड़े अब उनकी स्थायी पुतलियाँ हैं. एक-दूसरे के अजनबीपन को बचाने के लिए, वे रोज़ मृत्यु का वस्त्र ओढ़ते हैं और मिलते हैं. वे जानते हैं कि जानना ही अन्त है. जहाँ नज़र गयी, वहाँ कोई तीसरा जन्मता है : अनजान. हाँ, उनका मिलन कथा नहीं रचता. यह ठहरी हुई साँस है, बिना पीछे-आगे के. उँगलियाँ यदि उठकर दुकूल दूर करना चाहें, तो हवा में ही मुड़ जाती हैं, मानो पत्थर के भीतर कोई मछली तड़पी हो और फिर सो गयी हो.
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कभी-कभी कोमलता की एक बूँद रिसती है और वहीं वे परस्पर घुलते हैं. यह अगोचर घुलना है. जैसे कोहरे में कोहरा समा जाए और कोई होंठ न पहचाने कि दूसरे का होंठ कहाँ से शुरू हुआ. मात्र स्पन्दन है जो दुकूल के रेशों को हिलाए बिना सरसराते स्वर से सना है.
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क्या इस चित्रानुपन्यास की यही इति है, या यहीं आरम्भ? तत्क्षण में भूत है न भविष्य. अखण्ड मटमैली सफ़ेदी में प्रेम ने आँखें मूँदकर होंठों को सौंप दिया है और होंठ किसी ऐसे नाम को चूम रहे हैं जिसका मुख अभी अनाकार है. यही विरह है, प्रेम का. प्रेमियों के लिए.
वासांसि
दो शरीर, एक साँस. आग़ोश में बसी दूरी. वासांसि पर टिके होंठ. एक-दूसरे को छूना, अपने चेहरे भूलना. परदे के बाहर. प्रेमी की आँख से, भीतर.
लिपटे हैं जो, क्या दूसरे चेहरे को जानते हैं?
अटल जलावरण-सा है : उनके चेहरे नहीं, छायाभास है. दो. पोत-ध्वनि में घुलते, पुकारते नाम. होंठों से मिल रहे होंठ. ढँकी आँखें कि दूसरा आया नहीं. अभी. आने वाला है. यही चाल है. विधाता समीपतम तक को असीम दूरी में बदल देता है. दोनों एक दूसरे को छूते हैं, इसलिए कभी एक दूसरे को पा नहीं सकते.
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दर्शक अपनी आँखों से चित्र को देखता है. दो सिर, एक घूँघट. चुम्बनाभास. क्यों न घूँघट खोल दें?
दर्शक यह नहीं देखता कि वह स्वयं भी उसी घूँघट के दूसरी ओर है. चित्र उसे देख रहा है. वहाँ प्रिय का चेहरा है. दिवंगत.
जानना घटने में है : दोनों उसी वासांसि के दोनों ओर बिखरे हैं.
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क्या बिम्ब है? चित्र के ठीक बीच में दो दुकूल मिलते हैं. मिलन में एक अदृश्य दरार है. दरार से आता स्वर हँसी है या शोक? यह भला कौन तय कर सकता है? यही अनिर्णय है : चित्र का चेहरा
विलोम के बाहर
जो नहीं है
चित्रधर्मी है.
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देखो, दिगम्बर. निःशर्त.
देखने की शर्त है, वासांसि. निःशर्त देखना दिगम्बर है.
उतार लो
वासांसि.
अनृक् हो जाओ.
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दीया बुझता नहीं, केवल रोशनी उतर जाती है; मानो आँख ने अपने देखने की आवाज़ पहचान ली हो.

घूँघट
घूँघट के पीछे क्या है?
वे दो, चुम्बनरत. ऐसा अनुमान है. दो चेहरे. दो कपड़े. दो अनुपस्थितियाँ. एक-दूसरे की ओर झुकी हुईं. मानो दो प्रश्नचिह्न आपस में ऐसे लिपटे हुए कि उनसे कोई उत्तर न बने, बल्कि एक और प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाए : तीसरा और चक्रिल.
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क्या देखना छलना है?
युगल के चेहरों पर कपड़ा यूँ लिपटा है जैसे एक नहीं, दो हो. दोनों का अलग. सफ़ेद. मलमल जैसा. विस्मृति का बुना हुआ वस्त्र. शायद वह दोनों की त्वचा है, कपड़ा नहीं. प्रेम त्वचा नहीं, त्वचा के पार है. परे क्या है? कोई नाम नहीं.
तो नाम क्यों देना? चेहरा क्यों देखना?
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एक दार्शनिक का कक्ष. धूसर दीवारें. जीवन का रंग न मृत्यु का. सच का रंग. भला कौन पसन्द करेगा! कोने में एक आड़ा पड़ा खम्भा. मानो किसी पुराने आख्यान की याद या किसी टूटे हुए मिथक की हड्डी.
दायीं ओर की दीवार. जैसे मिट्टी का रंग. लौटने का रंग. लेकिन युगल के लिए भला लौटना कहाँ! वे आये हैं, सह-वास में.
गोया मृत्यु से सम्भोग के लिए.
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घूँघट उवाच : एक
वह क्या है जो उसने मेरे बारे में गढ़ा है? क्या मैं वही हूँ जो वह देखता है? मेरा चेहरा वासांसि ने यूँ छुपा लिया है जैसे वही वजूद हो. वह मुझे देख नहीं सकता. नहीं, देख रहा है. केवल मुझे. अन्तःचक्षु से. चेहरा मुखौटा है, प्रेम नहीं.
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घूँघट उवाच : दो
प्रिय की साँस पूरी तरह से महसूस हो रही है. वासांसि का निरोध कम है. घूँघट के पार सुवासित ऊष्मा है, पोत-लोम से होते हुए प्रिय तक पहुँचती.
यही तो है. यही तो.
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भाषा वह दुकूल-वास है जिसमें चेहरों का अभाव है
यहाँ.
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घूँघट भी एक भाषा है, अन्दर से एक आकाश. अनजिया अनुभव. कभी प्रमाणित भी होगा, जिये जाने से.
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पृष्ठभूमि चुप है कि अग्रभूमि बोल सके.
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दोनों ढके हुए हैं. जैसे बीज मिट्टी से ढका है. जैसे अर्थ शब्द से ढका है.
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वह चेहरों का अभाव नहीं है, उनका होना है : वासांसि : यह यहाँ-होना, यह एक-दूसरे-की-ओर-होना यही सबसे पहले है. मूल है.
पुनर्भव
संसार ने अपना दृश्य बदला. एक बार और. दुकूल ने त्वचा का पीछा किया, त्वचा ने स्मृतियों का.
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एक-दूसरे के समीप दो आकृतियाँ हैं. दोनों के बीच दूरी है, किसी तीसरे जीव की तरह साँस लेती. यह दूरी दुकूल से नहीं, बल्कि गोचर की झीनी झिल्ली से है. मुखों पर लिपटा सफ़ेद आवरण, दरअसल, धागों से नहीं, परित्यक्त पोत से बुना गया है. यह एक रूपक-कथा का विशेष कंकाल है, अगर श्वेत-श्याम रेखांकन में रूपकृत कर दें तो. यह कथा प्रेमी युगल की नहीं है. यह उस तीसरे की कथा है जो उनके बीच था. क्या वह तीसरा एक मुख था जो जन्म लेना चाहता था? क्या वह उन दोनों के बीच की अँधेरी जगह में भ्रूण की तरह पल रहा था? क्या वह एक ऐसा मुख बनना चाहता था जो स्वयं संसार हो?
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समय को आकार चाहिए.
वह पिंजर पर अपना लेखन करता है : झुर्रियाँ, हड्डियाँ, त्वचा, आँखें. अनाकार भाषा से बाहर है. मानो युगल का आकाराभास, एक महान् वाक्य के दो शब्दों की तरह, जो अभी तक एक-दूसरे से अभिन्न नहीं हैं.
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अगर चेहरा अनुपस्थित है तो चुम्बन किनके बीच घटित हो रहा है? जवाब नहीं. जवाब होता, तो दृश्य नष्ट हो जाता. चित्र का वजूद जवाब नहीं पर टिका है.
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दरअसल, तीसरा मुखाकार व्याप्त है. हर मनुष्य के चेहरे के पीछे छिपा हुआ एक दूसरा चेहरा है, जिसे कभी कोई देख नहीं सकता. वही अगोचर चेहरा प्रेमी युगल के बीच जन्मा है. वे दोनों उसकी प्रसूति के उपकरण हैं. युगल का अभिन्न न होना प्रेम है या चित्र-दृश्य की गर्भावस्था? वे एक-दूसरे को चूम रहे हैं या उससे नाभिनालबद्ध हैं जो पहचान और अनजान के बीच धड़कता है?
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सफ़ेद आवरण की भूमिका क्या है? कोकून तितली को छिपाता नहीं, बल्कि उसी का विस्तार होता है; वैसे ही वह दुकूल मुखों को ढँक नहीं रहा, बल्कि उनके अवस्थान्तर का गवाह है; एक स्वप्न की तरह जो अपने स्वप्नद्रष्टा को भी लगातार रचता रहता है. क्या यही वजह है कि प्रेमी युगल कभी चुम्बन नहीं ले सका? वह हमेशा घटित होने की प्रक्रिया में है. मानो एक अनन्त संक्रमण; एक ऐसा पुल जो अपने दोनों सिरों को जोड़ने के क्षण में ही उन्हें पुनः दूर कर देता है. युगल के मुखों पर लिपटा वस्त्रावरण उस विलम्ब का उजला संस्करण है.
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क्या सचमुच एकमेक होना उस असम्भव दूरी में है जो दो वजूद को निरन्तर एक-दूसरे की ओर धकेलती है, पर उन्हें कभी पूर्णतः अभिन्न नहीं होने देती? असली मिलन की इसी असम्भवता की वजह से चित्रांकित दृश्य मात्र चित्र नहीं, बल्कि स्वयं असलियत का ऐसा गोपनीय आत्मचित्र बन जाता है, जिसमें गोचर ने अपना चेहरा ढँक रखा है. वह अपनी ही ओर झुकते हुए यह जानने की कोशिश कर रहा है कि असल में वह कौन है : अस्ति में नहीं, पुनर्भव में.
एकात्म, अनात्म दो
दो प्रेमी एक-दूसरे में घुले हैं, उस ज़मीन पर जहाँ शरीर जुड़ जाते हैं. आत्माएँ अभी भी यात्राएँ कर रही हैं. अकेली. मूक वियोग में बहतीं.
अँधेरे में पनपता काम. प्रबल प्रेमेच्छा. वंचित दृष्टि, ऐन्द्रिय स्पर्श. गुंथे हुए. एकात्म, अनात्म दो.
क्या सफ़ेद दुकूल निषिद्धावरण है?
दर्शक दुकूल को चीर देना चाहता है. वह जहाँ खड़ा है वह कभी न पूरी होने वाली कामना की ज़मीन है.
सन्नाटे में आँख
दो आकृतियों के सिरों पर सफ़ेद कफ़न अनन्तिम सपने का अन्तिम पर्दा है. क्या यह कभी उठेगा? चारों ओर निर्जन आकाश. सूनी भूमि. तड़पता आग़ोश. होंठ जिसे छू रहे हैं वह अकेलेपन की सबसे गहरी परत है. अन्यावरण, अभेद का भेद. या मृत्यु और अनन्त के बीच का सेतु : अज्ञेय वासांसि. विरह का विषाद, सन्नाटे में आँख.
अशरीरी
दोनों के बीच वासांसि की पतली परत इतनी निर्मोही है कि वह पथाकार नहीं, बल्कि ऐसी पथविहीन हो गयी है कि दोनों उस पर सशरीर चल कर एक दूसरे तक नहीं पहुँच सकते. आग़ोश में आने की तड़प का सबूत सिलवटें हैं. यह सम नहीं, कँपकँपी है : दो शरीरों के अपने अशरीरी होने से पहले की.
अपनी ताल
चादर लिपटने से ऐन पहले उन्होंने एक-दूसरे को देखा होगा. शायद मुँदी पलकों के पीछे वही दृश्य जल रहा है. चादर ने चेहरों को छिपाया है, नज़र को नहीं. उनके शरीर आपस में इतने घुलते हुए हैं, फिर भी दोनों की साँस की अपनी ताल है. इसी ताल से खड़ी होती इमारत में एक न खुलने वाली खिड़की है जो प्रेम की हो सकती है.
जलवायु
दुकूल में जलवायु है. दो साँसों की भाप से सीलन, निःशब्द से घनी आर्द्रता. पसीने की नमी में गहराती होंठों की छाया. मानो स्पर्श ने अपनी स्याही ख़ुद बना ली हो. दो शरीर मिलकर एक ऐसा तीसरा शरीराभास क्यों रच रहे हैं, जो बस अभी का है? क्या यही अभी प्रेम का एकमात्र बसाव है जो एक सफ़ेद झिल्ली से बना है? क्या यह प्रश्न है कि वह किसी को दिखायी नहीं देता, फिर भी धड़कता हुआ है?
यहाँ.
चित्र-गोचर
दो आकृतियाँ हैं या बीच से विभाजित हो गया सफ़ेदपन, जो ऐसा हो सकता है जैसे दो हिस्सों में खुल गया एक शंख. हो सकता है वह बीज हो जो अपने अन्दर के अँधेरे को जगह देने के लिए खुल गया हो. दोनों ओर फैलती सतहों पर प्रकाश धीरे-धीरे चरता है. उजाले का मन्द चरागाह. काला रंग पीछे हटकर उन्हें जगह देता है. दीवार अपनी ख़ामोशी से उनके चारों ओर चौखटा बनाती है. शायद चित्र में सक्रिय रिक्ति है, वासांसि उसी से बुनी है, वही दोनों आकृतियों को खींचती है. वही उन्हें रोकती है. वही उनके बीच महीन तनाव बाँधती है. यह दो चुम्बकों के बीच अदृश्य बर्फ़ की एक सिल्ली रख देने जैसा है, जबकि पूरा चित्र-गोचर उसी सिल्ली के झरने से एक क्षण पहले का दृश्य है, जिससे कि चुम्बन पूरा हो सके.
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पीयूष दईया (जन्म : 1972) कवि-लेखक, और संपादक हैं. उनके तीन कविता-संग्रह, अनुवाद की दो पुस्तकें, चार चित्रकारों के साथ पुस्तकाकार संवाद और एक कहानी ‘कार्तिक की कहानी’ प्रकाशित हैं. इसके साथ-साथ उन्होंने साहित्य, संस्कृति, विचार, रंगमंच, कला और लोक-विद्या पर एकाग्र पच्चीस से अधिक पुस्तकों और पाँच पत्रिकाओं का संपादन किया है. उनकी एक काव्य-कथा “अन्य” और चित्रकार अखिलेश के एक चित्र पर एकाग्र पुस्तक “जयपुर येलो” शीघ्र प्रकाश्य हैं. इन दिनों वह ‘रज़ा फ़ाउंडेशन’ की एक परियोजना ‘रज़ा पुस्तक माला’ से संबद्ध हैं तथा शास्त्रीय संगीत व नृत्य पर एकाग्र पत्रिका ‘स्वरमुद्रा’ का संपादन कर रहे हैं. E Mail : todaiya@gmail.com |




अतियथार्थवादी चित्र पर अत्यंत महत्वपूर्ण रचनाएं।
यह शृंखला समकालीन हिन्दी में चित्र और कविता के संवाद का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। यहाँ चित्र कविता का बहाना नहीं बनता, वह एक जीवित स्रोत बना रहता है, जिससे लगातार नए अर्थ फूटते रहते हैं। पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि मार्ग्रित ने एक चित्र बनाया था, लेकिन पीयूष दईया ने उस चित्र के भीतर छिपे कई संभावित चित्रों को भाषा में रूपायित कर दिया है।
रेने मार्ग्रित के प्रसिद्ध चित्र में जो दृश्य पहली नज़र में रहस्य, प्रेम और अनुपस्थिति का सम्मिश्रण लगता है, पीयूष दईया उसे केवल प्रेमियों के चुम्बन के रूप में नहीं देखते। वे उसे भाषा, दर्शन, स्मृति, मृत्यु, पुनर्जन्म, दृष्टि और अस्तित्व के प्रश्नों तक विस्तारित कर देते हैं। विशेष रूप से प्रभावित करती है इसकी शब्द-संपदा। भाषा यहाँ विचार की वाहिका मात्र नहीं, स्वयं एक अनुभव बन जाती है। कई जगह तो लगता है कि कवि चित्र से कम और भाषा से अधिक संवाद कर रहा है।
मुझे यह बड़ा रोचक लगा कि कवि बार-बार ‘तीसरे’ की खोज करता है। प्रेमी दो हैं पर कविता का आकर्षण उनके बीच उपस्थित उस अदृश्य तीसरे में है… वह दूरी, वह अभाव, वह अनजान चेहरा जो शायद प्रेम का वास्तविक केन्द्र है।
फिर भी, एक पाठकीय संकोच के साथ कहूँ तो कहीं-कहीं वैचारिकता इतनी सघन हो जाती है कि चित्र पीछे छूटने लगता है। कुछ सूत्रात्मक वाक्यों की सांकेतिकता इतनी घनी है कि भावात्मक स्पर्श की जगह, बौद्धिकता प्रमुख हो जाती है।
बेहतरीन.
दो शरीर, एक साँस. आग़ोश में बसी दूरी. वासांसि पर टिके होंठ. एक-दूसरे को छूना, अपने चेहरे भूलना. परदे के बाहर. प्रेमी की आँख से, भीतर.
लिपटे हैं जो, क्या दूसरे चेहरे को जानते हैं?
अटल जलावरण-सा है : उनके चेहरे नहीं, छायाभास है. दो. पोत-ध्वनि में घुलते, पुकारते नाम. होंठों से मिल रहे होंठ. ढँकी आँखें कि दूसरा आया नहीं. अभी. आने वाला है. यही चाल है. विधाता समीपतम तक को असीम दूरी में बदल देता है. दोनों एक दूसरे को छूते हैं, इसलिए कभी एक दूसरे को पा नहीं सकते.
कमाल की उत्प्रेक्षाएं।
*विधाता समीपतम तक को असीम दूरी में बदल देता है. दोनों एक दूसरे को छूते हैं, इसलिए कभी एक दूसरे को पा नहीं सकते.*…शब्द और अर्थ का शास्त्रीय विरह है यह। अर्धनारीश्वर!! जैसा वागीश शुक्ल ने कहीं कहा भी है।
इन कविताओं को पढ़कर निपटाया नहीं जा सकता। इन कविताओं में जो दृष्टि व्याप्त है वह इतनी सूक्ष्म है कि इसे आंशिक रूप से भी जज़्ब करने की गर्ज़ से बार बार यहीं लौटना पड़ेगा।
मुझे उम्मीद है कि पाठक ऐसा करना चाहेंगे। जल्दबाज़ी में आगे बढ़ने से भीतर के पाठक का ह्रास ही होता है।
पीयूष को यहाँ देखकर बहुत सुख मिला। निरा अमृत, निरा नूर!
वाह! बहुत सुंदर व्यंजनाएं।
पीयूष जी कलाकृति को निहारते दृश्य संग बहुत से उस अदृश्य से भी साक्षात् होते हैं, जो देखने की ही पूर्णता होती है, पर हमसे प्रायः देखने वह छूट जाता है। देखना बाह्य ही कहां होता है! अनुभव की, भाव की और तत्काल उपजे अंतर्मन प्रवाह की किसी कौंध में भी होता है। कहन की अपनी मौलिक कला दृष्टि में पीयूष जी ने दृश्य के पार जो है, उसका अन्वेषण करते शब्द सुगंध हमें सौंपी है। आभार, पीयूष जी का और आपका, इन्हें साझा करने के लिए। स्वस्ति।
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