| सभ्य शब्द अविरल झूठ का वमन करें तो सत्य किस भाषा में बोले? जंतर-मंतर की ‘अश्लील’ भाषा त्रिभुवन |
एक आवश्यक निवेदन
इस लेख को पढ़ने से पहले मैं पाठकों से एक विनम्र क्षमा-याचना करना चाहता हूँ. इसमें कुछ ऐसे शब्द अनेक बार आए हैं, जिन्हें हमारे सभ्य, शालीन और सुसंस्कृत सामाजिक व्यवहार में न तो सहजता से बोला जाता है, न लिखा जाता है. उन्हें लिखना मेरे लिए भी सहज नहीं था. लेकिन जिस विषय की भाषिक, सामाजिक और राजनीतिक संरचना को यह लेख समझने की कोशिश करता है, उन शब्दों को अनुपस्थित रखकर उसकी ईमानदार पड़ताल संभव नहीं थी. शब्दों को छिपाकर उनके अर्थ, उनकी हिंसा और उनके सामाजिक इतिहास को नहीं समझा जा सकता.
एक निजी विडंबना भी मेरे साथ है. मैं विज्ञान के साथ-साथ संस्कृत और वैदिक साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ. वहाँ देह, यौन-अंगों और जैविक क्रियाओं के अनेक शब्द अपने मूल अर्थों में सहज, प्रत्यक्ष और प्रायः अश्लीलता से रहित दिखाई देते हैं. इसलिए जब उन्हीं देहगत अर्थों को लोक-व्यवहार में अपमान, स्त्री-द्वेष या फूहड़ता के औज़ार में बदलते देखता हूँ तो हतप्रभ होता हूँ.
अतः इन शब्दों का यहाँ प्रयोग उनका उत्सव मनाने के लिए नहीं, उनकी सत्ता, यात्रा और विकृति को समझने के लिए है.
त्रिभुवन
यह प्रसंग संभवतः प्रख्यात साहित्यकार शिवानी के किसी संस्मरण में है, जिसे मैंने छात्र जीवन में पढ़ा था.
वह शांतिनिकेतन में आम्रमंजरी की गंध से भरी एक दुपहरी थी. हरी छायाओं में सोने की महीन धूल तैर रही थी. एक झुकी डाल पर पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी अध्ययन में ऐसे डूबे बैठे थे, मानो संसार की शेष काया जीवन के छंद से बाहर हो. धोती किंचित सरक गई थी. देह का एक निषिद्ध-सा भूगोल अनायास उजागर था. दूर खड़ी लड़कियों में हँसी की छोटी-छोटी लहरें उठीं. वह हँसी, जिसमें कौतूहल था, शरारत थी और उस उम्र की स्वाभाविक चमक, जो पर्दे से अधिक पर्दे के खिसकने में दिलचस्पी लेती है. शिकायत गुरुदेव तक पहुँची. रवींद्रनाथ टहलते हुए आए, दृश्य देखा, यह भी देखा कि हजारी बाबू को उनकी भी उपस्थिति का बोध नहीं है तो वे उन्हीं कदमों से लौटते समय लड़कियों से बोले : अंगरेज़ी पढ़ी लिखी स्त्रियों और संस्कृत पढ़े-लिखे पुरुषों को इतना निरावरण रहने का अधिकार तो है. आम्रमंजरी में खिलखिलाहट घुली और वह और भी अधिक महक उठी.
देह के किसी अंग का दिख जाना अपराध नहीं; अपराध तब शुरू होता है जब दृष्टि मनुष्य को केवल देह मान ले. इस दृश्य में नग्नता से अधिक दृष्टि की नैतिकता अहम है. द्विवेदी का अनायास खुला शरीर अपने-आप यौन वस्तु नहीं; यौन अर्थ उस क्षण जन्मता है जब देखने वाली दृष्टि विद्वान्, शिक्षक और व्यक्ति को कुछ देर के लिए पीछे हटाकर उसकी देह के एक हिस्से को सामने ले आती है. लेकिन विद्यार्थियों के ज़ेहन में मौजूद सेक्सुअल ऑब्जेक्टिफिकेशन संबंधी समस्या यहीं शुरू हो जाती है. क्या दूसरे को देखना उसके व्यक्तित्व को निलंबित करके शरीर में घटा देना है? लड़कियों की हँसी में कौतूहल और कामुक शरारत हो सकती है, किंतु शोषण नहीं. रवींद्रनाथ ठाकुर का उत्तर अधिक दिलचस्प था. वे शरीर को लज्जा का उपालंब बनाने से इंकार कर देते हैं और इस घटना को विनोद में बदल देते हैं. आज ऐसी घटना कहीं हो तो वह वायरल हो जाती.
दरअसल, लड़कियों के ऐसा करने की वजह समाज की निगरानी व्यवस्था का मामला था. लेकिन उस समय बौद्धिक चेतना के शिखर पुरुष ठाकुर के विनोद ने उस निगरानी-व्यवस्था में छोटी-सी दरार पैदा कर दी और लड़कियाँ भी हँस पड़ीं. ठाकुर अश्लीलता का फैसला सुनाने के बजाय उसी शुचिता पर हँसते हैं, जो देह को देखकर अचानक सक्रिय हुई थी.
भारतीय समाज की जड़ता का यह अनूठा उदाहरण है कि इस घटना के आठ-नौ दशक बाद भी समाज की आँखों में पहरे लगाकर बैठी निगरानी कम होने के बजाय इतनी बढ़ जाती है. जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में अगर उन्हीं लड़कियों की चौथी या पाँचवीं पीढ़ी को कुछ शब्दों के कारण निगरानी का सामना करना पड़ता है तो प्रश्न उठता है कि हम भाषिक चेतना के स्तर पर आगे बढ़ रहे हैं या पीछे जा रहे हैं.
1.
कुछ लफ़्ज़ सड़क पर उतरते हैं. उन शब्दों ने गाली की देह पहन ली और जंतर-मंतर का दृश्य बन गए. दिल्ली की धूप उस दिन केवल ऊपर से झरता ताप नहीं थी; वह पुलिस-बैरिकेड की धातु में भरी हुई कठोर चमक थी, पोस्टरों की स्याही में पसीजता हुआ श्यामल रंग थी, मोबाइल फ़ोन के स्क्रीन पर उँगलियों के चिकने निशानों के बीच फँसी नीली अग्नि थी. वह उन चेहरों तक पर भी फैल चुकी थी, जिनके हिस्से में इतिहास की पुरानी थकान, झूठ, प्रतीक्षा और भविष्य की जराजीर्ण विफलता थी. पुराने आंदोलनों में वस्त्र प्रायः विचारधारा के सामने अदृश्य हो जाते थे; लेकिन यहाँ वक्तव्य थे, हँसी भी नारा थी, कैमरा भी सहभागी और स्क्रीन भी. तभी कुछ शब्द आए. कुछ नहीं हुआ; लेकिन आंदोलन समाप्त होने के बाद संस्कृति के खोल में राजनीति आँखें तरेरने लगी.
वे शब्द किसी शास्त्रीय नारे की तरह अनुशासित पंक्ति में नहीं आए थे. उनके आगे “हमारी माँगें पूरी करो” की मर्यादित प्रस्तावना भी झंडा लेकर नहीं चल रही थी. “इंक़लाब ज़िंदाबाद” का परिचित ऐतिहासिक प्रतिध्वनि-कक्ष भी न था. लेकिन अचानक आए शब्द इन शब्दों ने मानो हवा की तह में छिपा चाकू खोल दिया हो.
हाँ, हाँ. शब्द अश्लील ही थे. उन कानों के लिए भी, जिन्होंने उसे जीवन में जाने कितनी ही बार सुना और तत्काल नैतिक रूमाल नाक पर रख लिया. शब्द अश्लील थे; लेकिन फ़्यूज़ थे. मूल अर्थों को खो इन शब्दों को अख़बार संपादित कर देते हैं, टेलीविज़न बीप में बदल देता है, परिवार भ्रकुटियाँ तानता है और अदालत “आपत्तिजनक अभिव्यक्ति” कहती है. लेकिन अचानक आंदोलन जो कामयाब होकर घर लौट आया था, अचानक शब्द अपनी अश्लील नग्नता में समाचार बन गए.
जेन-ज़ी के इस आंदोलन ने स्वयं को “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे आत्म-व्यंग्यात्मक नाम, मीम, रील, संगीत और डिजिटल हास्य के माध्यम से संगठित किया था. पर उसके बाद आंदोलन के मुद्दों से अधिक उसकी भाषा पर मुक़दमा चलने लगा. पहले सत्ताप्रेरित टेलीविज़न, फिर सोशल मीडिया और फिर पुलिस दस्तावेज़ों में.
प्रधानमंत्री के लिए इस्तेमाल की गई एक तरुणी की भाषा के बाद 29 जुलाई को नोएडा पुलिस ने ज़ीरो एफ़आईआर दर्ज की. कुछ ही दिनों में वह युवती सार्वजनिक शिष्टता की अभियुक्त, राजनीतिक क्रोध की अश्लील प्रतिमा और उन तमाम लोगों के लिए एक आसान निशाना बन गई, जो आंदोलन की पूरी जटिलता को एक लड़की के शब्दों में बंद करना चाहते थे. यह सब उन लोगों को बुरा लग रहा था, जो कभी ऐसी ही एक घटना पर आह्लादित हुए थे. याद कीजिए, 27 मई 1988 की उस घटना को, जब आकाशवाणी के पटना केंद्र के लाइव में एक लड़की ने बोल दिया था, “गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है.” बाद में कई विश्वविद्यालयों में इससे जुड़े प्रश्न पूछे गए.
२.
लेकिन “गाली” शब्द पर क्रोध करने से पहले इस शब्द को एक बार मुँह में रखकर देखना चाहिए. “गाली”. हाँ-हाँ; कहिए. ‘ग’ गले की उस गुफा से निकलता है, जहाँ आवाज़ अभी पूरी तरह सामाजिक नहीं हुई होती. वहाँ वह पहले कंपन है, असंतोष है, भीतर फँसी हुई हवा की एक गहरी धक्का-मुक्की है. फिर ‘आ’ आता है और मुँह खुल जाता है. मानो भाषा को बाहर निकलने के लिए दरवाज़ा नहीं, पूरा द्वार चाहिए. ‘ल’ पर जिह्वा ऊपर उठती है, तालु के निकट क्षणांश के लिए ध्वनि को मोड़ती है और अंत में ‘ई’ उसे महीन, लंबी और चुभने योग्य नोक दे देती है. आख़िर गले के कुछ भीतर अँधेरे से उठती अनुगूंज जीभ की धार पर समाप्त होती है.
दरअसल, गाली केवल अर्थ नहीं, एक भाव-मुद्रा है. वह मुख का योग है. वह जबड़े का गोमुखासन है, नथुनों का सर्पासन है, साँस की नियमित लय में आया हिंस्र तप है. रक्त में बढ़ी गति है. जिह्वा का व्याकरण से भागकर शरीर की सैनिक रक्तवाहिनियों में पॅजीशन ले लेना है.
मनुष्य सौहार्दपूर्ण क्षणों और संबंधों को छोड़कर गाली सोचने के बाद शायद ही कभी दे पाता है. गाली दी जाती है तो वह उसके भीतर पहले तत्क्षण चेतना के रंध्रों को बेध चुकी होती है; लेकिन उसका बोध घटित होने के बाद होता है. जाने कब मुट्ठी तनी, कब कंधा उठा, कब चेहरा अचानक सभ्य मुखौटे से बाहर आया और जाने कब यह शब्द फूट निकला.
3.
गाली को केवल शब्दकोश में खोजना वैसा ही है जैसे बिजली के तार की तलहटी में बहते करंट वाली विद्युतधारा को किसी शब्दार्थ में तलाशना. शब्दकोश बताएगा कि यह अपमानकारी है, अशिष्ट है, यौन अथवा मल-संबंधी संकेत है; लेकिन वह यह नहीं बताएगा कि किस क्षण किस मनुष्य की छाती में उसका वोल्टेज बढ़ा, किस अपमान ने उसे चार्ज़ किया, किस भय ने उसकी धातु गर्म की और किस सामाजिक दूरी को पार करने के लिए उसका हवा में प्रक्षेपण किया गया.
शब्द दरअसल आबोहवा में घुलने और सड़कों पर उतरने से पहले शरीर में तड़ित वेग से राह बनाते हैं. गाली समय की कमी और तत्काल हिंसक प्रहार न हो पाने के अभाव से पैदा हुआ एक अहिंसक प्रहार हैं; लेकिन वाक्य हिंसक है. उसके पास प्रस्तावना का धैर्य नहीं. वह आरोपों की क्रमांकित सूची नहीं बनाती. गाली पाँच सौ शब्दों के अभियोग को पाँच अक्षरों में बंद करने की अद्भुत कला है. वह राजनीतिक भाषा का संपीड़ित फ़ोल्डर है. एक ऐसी ज़िप फ़ाइल है, जिसमें क्रोध, हिंसा, हास्य, स्मृति, अपमान, असहायता और तत्काल प्रत्युत्तर एक साथ सहेज दिए गए हों. उसे खोलने के लिए भाषाविज्ञान का पासवर्ड, समाजशास्त्र की उँगली, इतिहास का धैर्य चाहिए और कभी-कभी उस व्यक्ति के जीवन की पूरी कथा चाहिए, जिसने उसे कहा. लेकिन लोग ये फ़ाइल नहीं खोलते, बस शब्द सुनते हैं और कह देते हैं “अश्लील”.
गाली फ़्यूज़ लफ़्ज़ों का वह असहज प्रहार है, जो मंच के सीने पर चढ़ जाता है; क्योंकि राजनीति ने शिष्टतम आंदोलनों की बात ही नहीं सुनी. इसीलिए पुरानी पीढ़ी और जेन ज़ी के बीच विवाद शब्दों का नहीं, समय के स्वाद और अनुभव का है.
नई पीढ़ी के लिए भाषा भाषा नहीं, नोटिफिकेशन है. अचानक चमको, तुरंत पढ़े जाओ, अगले ही क्षण किसी दूसरी सूचना से विस्थापित हो जाओ. पहली पीढ़ी वाक्य लिखती थी; यह संकेत छोड़ती है. पहली संदर्भ को शब्दों में निर्मित करती थी; इसके लिए संदर्भ पहले से स्क्रीन पर है.
4.
राजनीति के अवसरचारी और धर्म के भीतर मौजूद वितंडावादी समय की इस नई भाषा को पढ़ नहीं पा रहे और वे अपनी विफलता के बजाय गाली प्रतीत होते शब्दों पर कजर ढरका रहे हैं. पुरानी पीढ़ी के धर्मभीरु इस यथार्थ को नहीं समझ पाते कि संवैधानिकता और लोकतांत्रिकता के दशाश्वमेध घाट पर सुसंस्कृत बने बैठे सत्ता और सियासत के भ्रष्ट अघोरी साधक शोख़ गुनाहों की गंधाती धार को गोमती घोषित करने में जाने कब से जुटे हैं; क्योंकि उन्हें सियासत की सरिता में उठती लहरों से डर लग रहा है. लेकिन जेन-ज़ी समझ चुकी है कि उनकी सजग-सचेतन आँखों में कोई धूल नहीं झोंक सकता. कुछ शब्दों का बहाना बनाकर उनकी न तो अवहेलना की जा सकती और न ही उनका उपहास उड़ाया जा सकता. सत्ता प्रतिष्ठान उनकी अदमनीय उत्कंठा देखकर उन्हें कैसे भी घृण्य कीट घोषित करें; लेकिन उन्होंने लफ़्ज़ से लफ़्ज़ जोड़ते हुए एक गहरी निराशा और सघन अंधकार के अंतस में फ़्यूज शब्दों से एक प्रभावशाली आंदोलन रचकर दिखा दिया.

5.
हम जिसे गाली कह रहे हैं, वह उनके लिए गाली है ही नहीं.
सपरिवार भोजन करते लोगों के बीच “शिट्’ और “टट्टी’ कह देने का क्या एक जैसा असर होता है? दूरदर्शन पर चुंबनरत नायक-नायिका के दृश्य के समय पिताजी या माताजी बाहर चले जाते थे या बच्चे; लेकिन आज की यह पीढ़ी उस माँ को किसी हमउम्र दोस्त की तरह ओटीटी की सबसे गंदी गालियों वाली सीरीज देखने को विवश कर देती है, जो शायद अपने बच्चों की शैशवावस्था में भी कभी पति के साथ निविड़ रात्रि तक में संसर्ग करने का नैतिक साहस नहीं जुटा पाई होगी. यह शिष्ट से अशिष्ट होने नहीं, यह दिखावे से सहजता में उपस्थित रहने का संक्रमण है, जो यह पीढ़ी लेकर आई है.
एक “फ़क़्” उसके लिए संभोग का क्रियापद नहीं; क्योंकि कभी वह विस्मयादिबोधक है, कभी क्रोध की ध्वनि, कभी मित्रता में नकली आक्रमण, कभी आत्मपरिहास, कभी नाकामी पर अपने ही माथे से टकराया शब्द. “शिट्” मल से उठकर परिस्थिति, दुर्घटना, आश्चर्य और असुविधा तक फैल चुका है. “भोसड़ीके” जैसे देसी शब्द भी अनेक युवा समूहों में शब्दकोशीय यौन अपमान से दूर जाकर मित्रता, चिढ़, आत्मीय आक्रामकता और सामूहिक हास्य के विचित्र रंग ग्रहण कर चुके हैं; हालाँकि उनका ऐतिहासिक स्त्री-विरोधी बोझ केवल मित्रतापूर्ण स्वर से समाप्त नहीं हो जाता.
यहीं फ्यूज़ वर्ड जन्म लेते हैं. वे शब्द जो दो भाषाओं के बीच नहीं रहते, अपितु कई सांस्कृतिक तारों को पिघलाकर बनी एक नई मिश्रधातु हो जाते हैं. हिन्दी की देह, अंगरेज़ी की गति, मीम की स्मृति, फिल्मी संवाद का अभिनय, रैप की ताल और इंटरनेट की विडंबना उनमें लयात्मक है. वे शब्द अनूदित नहीं होते; वे भाषाओं के बीच के पुराने सीमा-स्तंभ उखाड़ देते हैं. इस मामले में संभवत: एक ही शब्द है, जो गाली के रूप में बादशाह अक़बर के समय से आज तक समान तल्ख़ी, समान डिग्री और समान असर के साथ 1556 से निरंतर विद्यमान है और स्त्री के बजाय पुरुष को उसकी संपूर्ण विफलता, पराजय और साहसहीनता के लिए लांछित करता है. “गांडू’ ऐसा ही प्रतिध्वनित नहीं होता? राजस्थान में निकम्मे पुरुषों के लिए स्त्रियाँ तक “गंडमरा” और उत्तर भारत के कुछ सामाजिक परिवेशों में स्त्रियाँ “चूतिया” भी सहजता से बोलती हैं.
6.
जेन ज़ी का एक छोटा वाक्य अपने पीछे कई छिपे लिंक लेकर चलता है. किसी फ़िल्म का दृश्य, किसी रैपर की पंक्ति, किसी गेम का संकेत, किसी वायरल रील की आवाज़, किसी पुराने राजनीतिक बयान का मज़ाक और किसी मित्र-समूह का निजी संदर्भ; ये सब दो या तीन शब्दों में एक साथ उपस्थित हो सकते हैं. जो व्यक्ति इस अंतर्पाठ को नहीं जानता, वह केवल सतह सुनता है. उसे शब्द गाली लगता है; लेकिन धर्म के बजाय धर्मांधता की छलिया रैन में घृणा के झुलने झुलाती पुरानी संस्कारशीला पीढ़ी को भीतर के वे दसियों संदर्भ सुनाई नहीं देते, जो यह चंचल-चीर पीढ़ी “जेन” के जी पर सवार होकर जाने कब और कैसे “ज़ी” होती चली गई!
इसका एक इमोजी पूरा संपादकीय होता है. एक आँख घुमाता चेहरा सत्ता की प्रेस-कॉन्फ्रेंस पर टिप्पणी तो खोपड़ी का चिह्न मृत्यु नहीं, “हँसते-हँसते मर गया” का संकेत और “क्रिंज” केवल शर्म नहीं, सांस्कृतिक अस्वीकृति. “डेलुलू” भ्रम का चिकित्सकीय वर्णन नहीं, इच्छा और आत्म-व्यंग्य के बीच झूलता हुआ सामाजिक अभिनय है. “रिज़”, “स्ले”, “सैवेज”, “मिड”, “टॉक्सिक”, “सिम्प”, “रेड फ्लैग” जैसे कितने ही लफ़्ज़ छोटे आकार में संबंधों, आकर्षण, सामाजिक प्रतिष्ठा और नैतिक निर्णय की छोटी अदालतें लेकर चलते हैं.
गाली नया विराम-चिह्न है. कभी वह पूर्णविराम, अब बात ख़त्म. कभी विस्मयादिबोधक, यह असहनीय है! कभी प्रश्नवाचक, तुम सचमुच इतने मूर्ख हो? कभी तीन बिंदियाँ, मैं जो नहीं कह पा रहा, उसे तुम समझ लो….
गाली वाक्य के अर्थ को बदलती नहीं; केवल तापमान बताती है. जैसे संगीत में एक ही पंक्ति धीमे स्वर में करुणा और ऊँचे स्वर में विद्रोह हो सकती है, वैसे ही एक ही शब्द मित्रों के बीच हास्य, सड़क पर आक्रोश, सत्ता के मुँह में धमकी और प्रभुत्वशाली समूह के मुँह में घृणा बन सकता है. ध्वनि वही; लेकिन राजनीतिक गुरुत्व अलग.
इसलिए “किस शब्द का प्रयोग हुआ?” से पहले पूछना चाहिए; किसने कहा? किससे कहा? कहाँ कहा? किस इतिहास के भीतर कहा? पुलिस उसके पीछे थी या सामने? उसके पास संस्थागत शक्ति थी या काँपता मोबाइल? वह शब्द नीचे से ऊपर फेंका गया था या ऊपर से नीचे? यह जानना इसलिए ज़रूरी है; क्योंकि शब्दों पर भी गुरुत्वाकर्षण लागू होता है.
ऊपर से गिरती गाली पत्थर है. नीचे से ऊपर फेंकी गई गाली कभी नहीं, कराह या पुकार है. पीड़ा प्रमाण है कि घाव हुआ; लेकिन यह प्रमाण नहीं कि घायल व्यक्ति के मुँह से निकला प्रत्येक शब्द नैतिक था.
7.
जंतर-मंतर की भाषा में एक साहसिकता थी; क्योंकि उसमें अनुमति माँगने, शासकीय बल से डरने और प्रशासकीय कालुष्य का बोध नहीं था. वह नई थी; क्योंकि वह भाषण, नारा, मीम, संगीत, कपड़ा, अभिनय और कैमरे को एक ही राजनीतिक वाक्य में मिला रही थी. वह लोकतांत्रिक थी; क्योंकि कोई अकेला नेता उसकी पूरी भाषा का स्वामी नहीं था. लेकिन वह विरासत से पूर्णतः मुक्त नहीं थी. उसके उजले, जेंडर-न्यूट्रल, क्वियर-सचेत और समानता-प्रिय मुख में कई बार उन्हीं पुरानी पितृसत्तात्मक गालियों का सुख था, जिनमें स्त्री की देह को पुरुषों के बीच युद्धभूमि बनाया गया था.
यह जिह्वा नई थी, पर ज़हर पुराना था, जिसका निर्माण उन्होंने स्वयं नहीं किया था. पुरानी पीढ़ियों ने ही उस विष की थैली उनके मस्तिष्क में रख दी थी, जिसका उन्हें स्वयं बोध नहीं था कि यह विष है. यह बोध तो विष प्रयोक्ताओं ने करवाया कि आप तो विष को आचमन समझकर हथेलियों पर रखे थे.
पितृसत्ता ने स्त्री की आवाज़ को हमेशा धीमा, मधुर, नियंत्रित और क्षमाप्रार्थी बनाया. उसे ज़ोर से हँसने से रोका गया; चिल्लाने से वर्जित किया गया; क्रोध में कुरूप हो जाने का भय दिखाया गया. पुरुष का तेज़ स्वर नेतृत्व कहलाता रहा, स्त्री का तेज़ स्वर बदतमीज़ी. पुरुष की गाली उसके साहसी होने का प्रमाण थी; लेकिन स्त्री की गाली चरित्र-क्षरण. एक ही प्रकार के रहस्यमय स्वभाव पर पुरुष के लिए “अन्प्रेडिक्टेबल’ कहा जाता है और स्त्री के लिए “स्त्रीणां चित्तं पुरुषस्य भाग्यम्, देवो न जानाति कुतो मनुष्य:!’(142, भोजप्रबंध)
8.
स्त्री सार्वजनिक चौक में आवाज़ ऊँची करती है तो वह केवल सरकार से नहीं बोलती; वह कंठ के चारों ओर सदियों से बँधे शालीनता के रेशमी फ़दे को ही खींचती है. उसके बोलने में मुक्ति है. लड़के जब ऐसा करते हैं तो वे शोख़-चंचल गुनाहों भरे बदमाश या नॉटी बॉय होते हैं; लेकिन लड़कियाँ करें तो संस्कृति का पतन होता है और इस देश के कानून की क़िताबों में नीलाथोथा खाकर सोई हुई धाराएँ अचानक निद्रालस की मेहराबों से कूद रही होती हैं. भाषा को जीवित मानने का अर्थ ही है कि उसके शरीर पर पड़े घाव, उसके भीतर जमा हिंसा और उसके भीतर खुलती स्वतंत्रता की राहें सब एक साथ देखे जाएँ.
9.
गाली संक्षिप्त क्रोध है; लेकिन हर संक्षेप की तरह वह कुछ बचाती और कुछ नष्ट करती है. वह समय बचाती है, सूक्ष्मता नष्ट करती है. प्रहार बचाती है, भेद मिटा देती है. वह वक्ता को एक क्षण के लिए हल्का करती है. वह व्यवस्था को निर्वस्त्र करना चाहती है; लेकिन कभी-कभी अपनी ही विचारधारा के वस्त्र फाड़ बैठती है. वह क्रांतिकारी मुँह से निकल सकती है और सामंती स्मृति ढो सकती है. वह स्त्रीवादी स्वर में उच्चारित होकर स्त्री-विरोधी हो सकती है. माँ और बहन जैसे शब्दों के साथ बनी गालियाँ इसकी नज़ीर हैं. गाली मित्रता में प्रेम की खुरदरी बोली और सत्ता में अमानवीकरण का औजार भी हो सकती है.
जंतर-मंतर में अब बैरिकेड पहले से अधिक पुख़्ता हैं, धूल दूसरी भीड़ के जूतों में जा चुकी है, पोस्टर मोड़कर कमरों में रखे जा चुके हैं. फ़ोन की गैलरियों में वीडियो नीचे सरक गए हैं. पर वे कुछ शब्द अभी सड़क से नहीं हटे हैं. स्क्रीन पर घूम रहे हैं, एफ़आईआर में पड़े हैं, क्षमायाचना में सिर झुकाए खड़े हैं, समर्थकों के मीम्ज में हँस रहे हैं और उन लोगों की स्मृति में अश्लील धब्बे की तरह जमा हैं, जिन्होंने न केवल इस आंदोलन की कोई माँग नहीं सुनी, पिछले 12 साल से देश की महिला पत्रकारों को दी जा रही फ़ाहश गालियों और बलात्कार की दुस्साहसिक धमकियों को लगतार अनसुना किया और जंतर-मंतर पर आंदोलन करने वाली केवल एक युवती का मुँह देख लिया.
10.
गाली का एक वंशवृक्ष भी होता है. कई बार वह पवित्र धातु से सृजित होकर अपवित्र सफ़र पर भी निकल पड़ती है. आंदोलन, क्रोध या नाराज़गी के लिए प्रतिरोध स्वरूप कोई शब्द सहजता से ला रहा था और उसे सामने वाला गाली के रूप में ग्रहण कर रहा था तो प्रश्न यह है कि अश्लीलता देने वाले के पास थी या लेने वाले के? उस समय वह एक शब्द था तो उसके भीतर कितनी भाषाएँ और कितनी अर्थावलियाँ ध्वनित थीं?
मान लेते हैं कि यह शब्द गाली नहीं ‘धातु’ है. ‘धातु’ भाषाविद् या वैयाकरण के लिए ‘गम्’, ‘पठ्’, ‘कृ’, ‘धा’, ‘दृश्’ या ‘पिब्’ जैसी क्रियाओं का बोध करवाने वाला है. भौतिक और रासायनिक विज्ञान के लिए यह तन्य, ऊष्मावान, विद्युत संचालक तथा आघातवर्धनीय चीज है. लेकिन आयुर्वेदाचार्य के लिए यही शब्द रिप्रॉडक्टिव टिश्यू है. इसलिए जिस तरुण या तरुणी की जिह्वा पर एक शब्द बार-बार आ रहा है, वह उसके लिए अश्लील नहीं है. लेकिन धर्म और संस्कृति के जीर्णशीर्ण वस्त्र पहनकर बैठी पीढ़ी के लिए आज भी है.
वस्तुत: गाली का अर्थ देने वाले शब्दों का जन्मस्थान इसी नई पीढ़ी के मुँह को मान लेना भाषा, भाषा विज्ञान और भाषा के इतिहास-बोध के साथ गहरा अन्याय है. लोग इतना भोलेपन के शिकार हैं कि वे नदी को उस घाट का निवासी समझ रहे हैं, जहाँ उन्होंने उसे देखा. ये शब्द गंदे हैं, इसका बोध संस्कारशीलों को अभी क्यों हुआ? शब्द मुँह में तो जन्म लेते नहीं. वहाँ तो वे केवल दिखाई भर देते हैं. जीभ पर क्षणभर स्पंदित होते हुए दाँतों से टकराकर, तालु को छूकर और कंठ में घूमकर अपना वर्तमान उच्चारित करते हुए आते हैं. उनके वास्तविक जन्मस्थल पीछे छूट चुके होते हैं. जैसे किसी चरवाहे की पुकार में, किसी सैनिक के आदेश में, किसी खेत की मेड़ पर, किसी स्त्री के प्रसव-कक्ष में, किसी यज्ञ की विधि में, किसी बाज़ार की फ़ब्ती में, किसी प्रेमी की अधीरता में, किसी विजेता के अहंकार में, किसी जाति के अपमान में, किसी बच्चे की अनजानी नकल में.
11.
हर शब्द एक ख़ास अर्थ लेकर निकलता है; लेकिन रास्ते में लोग उससे उसका अपना अर्थ छीन लेते हैं और उसे दूसरा ही अर्थ पहना देते हैं. तीसरे से वह दाग़दार होता और चौथे में पुलिस की प्राथमिकी बन जाता है. भाषा का इतिहास वस्तुतः शब्द यात्रियों की ऐसी शरणार्थी बस्ती है, जिनके पुराने अर्थ-पासपोर्ट नष्ट हो चुके हैं. हमें शब्द का आज का चेहरा दिखता है, उसकी जन्मतिथि नहीं; उस खानाबदोश का वर्तमान अपराध मालूम होता है, उसकी प्राचीन गरिमामय नागरिकता नहीं दिखती.
हिन्दी स्वयं संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, देशज बोलियों, फ़ारसी, अरबी, तुर्की, पुर्तगाली और अंगरेज़ी सहित जाने कितनी भाषाओं के सदियों लंबे आवागमन से बनी है. किताब, बाज़ार, काग़ज़, दरवाज़ा, कमीज़, चकला, बेलन, बाल्टी, साबुन, रेल, टिकट, स्कूल—आज इनमें कितनों से हम विदेशी पासपोर्ट माँगते हैं? विडंबना है कि जैसे अतिवादी बहुसंख्यक अल्पसंख्यक की नागरिकता पर संदेह करते हैं, वैसे ही भाषाई शुद्धतावादी शब्दों की सीमाएँ खींचते रहते हैं. कुछ प्रगतिशील विमर्श भी कभी-कभी “देशज” और “विदेशी” की तैयार श्रेणियाँ बिना ऐतिहासिक जाँच के स्वीकार कर लेते हैं, जबकि शब्द सीमाओं के सबसे पुराने ‘यायावर’ हैं. वे सेनाओं, व्यापारियों, प्रेमियों, सूफ़ियों, सैनिकों और बाज़ारों के साथ आते हैं और अंततः इस देश की माटी और आबोहवा में घुलकर इतना घरेलू हो जाते हैं कि उनकी परदेसियत केवल व्युत्पत्ति-कोश में भाषाशास्त्री हरिद्वार के पंडों की तरह सदियों पुरानी बहियों में बचाए रखते हैं.
12.
जंतर-मंतर पर बोले गए कुछ निषिद्ध शब्द भी दिल्ली में पैदा नहीं हुए थे. वे संस्कृत के अनुशासित परिसर, प्राकृत की खुली पगडंडियों, अपभ्रंश की धूल, देहाती बोलियों के खेतों, फ़ारसी-अरबी की गलियों, सैनिक छावनियों की हिंसक निकटता, औपनिवेशिक स्कूलों की छड़ी, पुरुष छात्रावासों की रात्रि, सिनेमा के अँधेरे, ओटीटी के निर्विघ्न कमरों और इंटरनेट के अंतहीन बाज़ार से होते हुए वहाँ पहुँचे थे. उनकी उम्र प्रदर्शनकारियों की कई पीढ़ियों से बहुत अधिक थी. उनकी नैतिकता उनसे भी अधिक अस्थिर.
दो शब्द एक जैसे सुनाई देते हैं, इसलिए हम उन्हें पिता-पुत्र घोषित कर देते हैं. भाषा परिवार सरकारी अभिलेख की तरह व्यवस्थित नहीं होते. उनमें हमशक्ल होते हैं, अनाम संतानें होती हैं, गोद लिए हुए अर्थ होते हैं, झूठी वंशावलियाँ होती हैं और कभी-कभी दो बिल्कुल अलग घरों से निकले शब्द इतिहास की किसी तंग गली में आकर एक ही नाम से पुकारे जाने लगते हैं.
13.
भाषा में “अश्लील” कोई जन्मजात जाति नहीं. शब्द जन्म से पवित्र या अपवित्र नहीं होते; समाज उन्हें अर्थ देता है, फिर अर्थों पर मर्यादा, लज्जा, सत्ता और निषेध की परतें चढ़ाता है. जो ध्वनि किसी काल में कर्म-प्रेरणा, वनस्पति, शरीर, प्रजनन, स्वाद, प्रार्थना या जीवन की सहज जैविकता से जुड़ी थी, वही किसी दूसरे काल में वर्जना, यौन अपमान या गाली की संगति पा जाती है. कभी-कभी उलटा भी होता है.
भाषाशास्त्र का पहला अनुशासन यही है कि समान सुनाई पड़ने वाले शब्दों को बिना प्रमाण एक ही वंश का न मान लिया जाए; किंतु उसका दूसरा अधिक विचलित करने वाला पाठ यह है कि समाज शब्दों को उनके पुराने संसारों से बेदखल करता रहता है. यहीं भाषा पर किया गया अत्याचार हमारे विवेक पर भी प्रहार बनता है. हम अर्थ का इतिहास भूलकर केवल निषेध याद रखते हैं. अतः इसे अश्लीलता का मज़ा नहीं, अर्थों की पुरातत्त्व-खुदाई समझिए.
आप यह जानकर हत्प्रभ रह जाएंगे कि उपनिषद् काल से आदिशंकराचार्य के बहुत बाद तक “निधन”, “हिंकार”, “प्रस्ताव”, “प्रतिहार” और “उद्गीथ” जैसे शब्द परम अश्लील थे. “छांदोग्योपनिषद्” कहता है :
“उपमंत्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्ताव: स्त्रिया सह शेते स उद्गीथ: प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहार: कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्.” (2/13/1-2)
आदिशंकराचार्य इसका भाष्य करते हैं :
(दैहिक संसर्ग के लिए स्त्री के समक्ष) पुरुष जो संकेत करता है, वह “हिंकार” है. “प्रस्ताव” रिझाना है. स्त्री संसर्ग “उद्गीथ” है. अनेक पत्नियों में से प्रत्येक के साथ संसर्ग “प्रतिहार” है. आनंदातिरेके साथ मैथुन की परितृप्ति “निधन” है. किसी की बहुत पत्नियां हैं और वह किसी का भी त्याग न करे तो यह “व्रत” है.
आज कौन कल्पना कर सकता है कि ये शब्द किसी समय ऐसे अर्थ वाले भी रहे होंगे. श्रीसंप्रदाय के उपनिषद् भाष्यकार श्रीरंगरामानुज मुनि ने भी “आसन”,“प्राणायाम”,“धारणा”, “ध्यान”, “संसाधन” जैसे शब्दों हैरान कर देने वाले अर्थों के संकेत किए हैं.
गायत्री मंत्री में प्रयुक्त “प्रचोदयात्” को ही लें तो उसमें आई “चोदना” क्रिया कुछ बोध कराती है. भगवद्गीता में भी आता है: “ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना.” आधुनिक हिन्दी में इसका एक स्पष्ट, प्रबल और अश्लील यौन अर्थ है. अब वह क्रिया भर नहीं; गाली, धमकी, प्रभुत्व, उपहास, विस्मय और मित्रतापूर्ण आक्रामकता तक फैल चुकी क्रिया है. लेकिन इस संस्कृत क्रिया को इसी आधुनिक अर्थ में पढ़ देना एक भाषिक अनाचार है. वैदिक और मीमांसीय संदर्भों में इसका संबंध प्रेरित करने, उकसाने, आगे बढ़ाने, आदेश देने, अश्व को दौड़ाने और किसी कर्म में प्रवृत्त करने से है. संस्कृत धातु √चुद् गति और प्रवर्तन की ओर संकेत करती है.
आधुनिक उत्तर भारतीय बोलियों में इसी ध्वनि-समूह से बना एक क्रियापद यौन-संबंध के अत्यंत अशिष्ट अर्थ में प्रचलित हो गया. भाषा के इतिहास में ऐसा होता है कि एक प्राचीन, सामान्य धातु का कोई क्षेत्रीय या लोक-प्रयोग बाद में संकुचित होकर अश्लील अर्थ ग्रहण कर लेता है. लेकिन आधुनिक हिन्दी की गाली को उठाकर वैदिक मंत्रों पर आरोपित करना भाषावैज्ञानिक रूप से ग़लत और कालभ्रमपूर्ण है.
वैदिक संस्कृत से छिटका यह शब्द इस अर्थ से जाने कब भटका और भटकता ही चला गया. सच तो ये है कि मनुष्य के अपने भीतर की अश्लीलता ने एक सुंदर और प्रेरक शब्द का अपहरण कर लिया. किस मध्यवर्ती बोली में प्रेरणा ने धक्के का रूप लिया, धक्के ने प्रवेश का, प्रवेश ने यौन क्रिया का और यौन क्रिया ने अपमान तथा सत्ता का? भाषा हमेशा अपनी यात्रा के टिकट सुरक्षित नहीं रखती. इसलिए यह कहना आकर्षक है कि वैदिक “प्रेरणा” सीधे आधुनिक यौन क्रिया बन गई; पर आकर्षक व्युत्पत्तियाँ हमेशा सच्ची नहीं होतीं. हमारे पास ध्वनि का पुल है, कुछ अर्थगत संभावनाएँ हैं, मध्यवर्ती रूपों की धुँध है; पर धुँध को राजमार्ग घोषित करना विद्वत्ता नहीं.
शब्द कभी-कभी अपना अर्थ बदल देते हैं, पर अपने प्राचीन स्नायु का कोई बहुत महीन रेशा बचाए भी रखते हैं. जैसे आज आधुनिकता के बावजूद रूढ़वादिता और प्रतिगामिता सत्तासीन होकर अपने प्रभाव का डंका बजाती हुई भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर अज्ञान परंपरा का प्रभुत्व और वर्चस्व स्थापित किए जा रही है, वैसा अतीत में भी बहुत हुआ है. सायण और महीधर जैसे विद्वानों ने निघंटु और निरुक्त को परे रखकर वैदिक ऋचाओं के ऐसे अर्थ कर डाले कि जिस भूमि को भाषा का सौंदर्यबोध अक्षरों के अनाज से लहका रहा था, वहाँ मूर्खता की दरांतियां लपक उठीं और भाषा के माध्यम से कुछ निरीह शब्द कराहते हुए धूम-तिक्त और विषाक्त वायु में धूल और कचरे की तरह उड़ा दिए गए. कितने ही कोमल शब्दों से उनका मूल अर्थवैभव छीनकर उन्हें कठोर पहाड़ों और निर्जन घाटियों में निर्वस्त्र दौड़ा दिया गया.

14.
जेन-ज़ी प्रोटेस्ट के दौरान इंस्टा और दूसरी जगहों पर एक और विवादित शब्द जमकर गूंजा. यह वह शब्द है, जिसके उच्चारण से सभ्य सभा में अचानक कुर्सियाँ असहज हो जाती हैं. आख़िर ये जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करते तरुण और तरुणियाँ तो नहीं ही थीं, जिन्होंने संस्कृत के काव्य से आम के वृक्ष, आम के फल और आम्र मंजरी को अश्लील गाली बना दिया. यह तो सभ्यता के ठेकेदार बने बैठे लोगों को देखना चाहिए कि उनके पुरखों ने आम की नई कोंपल या आम के फल के रसीले हिस्से को उसके मूल अर्थ पर बुलडोज़र चलाते हुए उसे अश्लीलता के मलबे पर क्यों ला पटका? दुनिया के महान् कवि कालिदास के संसार में जो वसंत का सबसे कोमलांग है, कोकिल के कंठ में उतरती मादक हरिताभा है, पराग के हल्के धूलकणों का उन्मादी समूह है, कामदेव के पुष्पबाणों में रखा नवयौवन है, वह कब अर्थघर से विहीन कर जिह्वा भिक्षुक बनाकर छोड़ दिया गया? पूरे संस्कृत साहित्य में यह कोई गाली नहीं; कोई अश्लील शब्द नहीं, कोई अकुलीन नहीं; लेकिन वे कौन लोग थे, जिन्होंने ऋतु की धीरे-धीरे खुलती हुई देह, आम्रमंजरी में प्रकृति के काम-स्पंदन और अवयस्क कन्याओं को कामपिपासु दृष्टियों से देखा और एक शब्द को इस राह पर डाल दिया. संस्कारों और सांस्कृतिक वैभव के भ्रमित और दिखावटी लोक में रहने वाले कथित सभ्य लागों को एक बार “चूत” शब्द का इतिहास देखना चाहिए.
संस्कृत के एक सुंदर शब्द के अश्लील और असुंदर होते जाने के बीच का सांस्कृतिक इतिहास भारतीय पुरुषों की विकृत मानसिकता और स्त्री को कामपिपासा का केंद्र मानने की उस कहानी से जुड़ा है, जिसे ठीक से पढ़ा जाए तो संस्कृति के वैभव के भीतर की सड़ांध सामने आती है. आम की कोंपल, कोकिल की चोंच, रस की संभावना और देह अभी फल नहीं बनी जैसे संकेतों को समझने की कोशिश करें तो यह भारतीय संस्कृति के भीतर की अश्लीलता के माध्यम से सामने आता वह विकृत चित्त है, जिसने स्त्री के कन्या रूप के शुरू होते ही उसे कामपिपासु दृष्टि से देखना शुरू कर दिया. इसी ध्वनि का आधुनिक हिन्दी रूप स्त्री-जननांग की अशिष्ट संज्ञा बनकर हमारे सामने आता है. इससे यह मोहक कथा गढ़ी जा सकती है कि आम का वृक्ष रूपक की किसी अँधेरी सुरंग से गुजरकर स्त्री-देह में बदल दिया गया. हालांकि इस विषय में समुचित अध्ययन और अनुसंधान नहीं होने से उपलब्ध भाषिक सामग्री इस सीधे अर्थ-विकास को प्रमाणित करने का सम्यक् रास्ता नहीं दिखाती.
15.
“अश्लील शब्दों की व्युत्पत्ति” से आगे बढ़कर प्रश्न यह है कि “मानव सभ्यताओं में यौन रूपक सुदूर महाद्वीपों और सुदूर कालखंडों में विभिन्न भाषाओं में समानता लेकर क्यों और कैसे पैदा हो जाते हैं?” लेकिन यही लोकहृदय का सच भी है, जो पूरी मानव सभ्यता को एक अदृश्य विचार और चिंतन तत्त्व से जोड़ता है. हालांकि कई बार बहुत सारी शब्दावलियाँ और क्रियाएं डिकोड ही नहीं हो पातीं. जैसे कबीर के इस पद पर जितने भी विद्वानों की टीकाएँ पढ़ेंगे, वहाँ दूर-दूर तक यौनांग संबंधी शब्द नहीं दिखेंगे. लेकिन इस पद में एक जगह हैं.
एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावै गाई I
पहिलै पूत पाछे भई माई, चेला कै गुरु लागे पाई I
जल की मछरी तरवरि ब्याई, पकड़ि बिलाई मुरगै खाई I
बैलहि डारि गूनि घरि आई, कूता कूँ लै गई बिलाई I
तलि करि साषा उपरि करि मूल, बहुत भाँति जड़ लागे फूल I
कहैं कबीर या पद को बूझै, ताकू तीनों त्रिभुवन सूझै I
कबीर की उलटबाँसी वाला यह पद देह, कामना और चेतना का ऐसा उलटा मानचित्र है, जिसमें जैविक यथार्थ प्रतीक बनकर अपनी ही सीमाएँ तोड़ देता है.
“ठाढ़ा सिंह चरावै गाई” में उद्दीप्त पुरुष-शक्ति और उर्वर स्त्री-देह का संबंध हिंसा से नहीं, परस्पर निर्भरता से बनता है. “पहले पूत पाछे भई माई” पुरुष-बीज के उस अहंकार को उलटती है, जो गर्भ की प्राथमिकता भूल जाता है. “चेला के गुरु लागे पाई” कामावेग में विवेक और इंद्रियों के स्थान-परिवर्तन का चित्र है कि देह निर्णय करती है, बुद्धि बाद में उसकी व्याख्या गढ़ती है. “जल की मछरी तरवरि ब्याई” में मछली तरल यौन-ऊर्जा है और वृक्ष समूची देह; इच्छा किसी एक अंग में नहीं रहती, त्वचा, साँस, आँख और कल्पना तक फैलती है. लेकिन “पकड़ि बिलाई मुरगै खाई” सबसे रहस्यमय दैहिक रूपक है. बिलाई यानी स्त्री-योनि, मुर्गा यानी पुरुष-लिंग; किंतु “खाना” यानी भोग से अधिक उस भ्रम को उलटता है, जिसमें मनुष्य स्वयं को इच्छा का स्वामी समझता है. संभव है, कामना ही उसे भोग रही है. “कूता कूँ लै गई बिलाई” अतृप्त पुरुष-कामना पर स्त्री-इच्छा की सक्रियता का संकेत है. और “तलि करि साषा, ऊपरि करि मूल” बताती है कि देह में खिलने वाली कामना की जड़ वास्तव में स्मृति, कल्पना और चेतना में है. इस पद में “पकड़ि बिलाई मुरगै खाई” सबसे दैहिक पंक्ति है. “बिलाई” स्त्री-योनि और “मुर्गा” पुरुष-लिंग ठीक वैसे ही शब्द हैं, जैसे अंगरेज़ी की रूपकीय शब्दावली में pussy और cock. “खाना” यहाँ यौन-संयोग का लोक-रूपक है. मुझे यह रूपक कबीर संबंधी किसी पुस्तक या किसी विद्वान् से नहीं, एक बूढ़े कालबेलिया नाथ जोगी से मिला था, जिससे मैंने कबीर और गोरखनाथ को पढ़ा था.
16.
देह का अपना शब्दकोश हाेता है. कामना, स्त्री-कंठ और अश्लील भाषा का दारिद्रय भी प्रकट होता रहा है. क्योंकि लफ़्ज़ अपनी रूह से अलग होकर अपने इतिहास को पार करता हुआ त्वचा की ओर बढ़ जाता है. लेकिन त्वचा कोई शब्दकोश नहीं. उस पर अर्थ वर्णक्रम में नहीं रहते. स्पर्श पहले आता है, उसका नाम बाद में; रक्त पहले तेज होता है, इच्छा का वाक्य बहुत देर से बनता है; दो शरीरों के बीच निकटता पहले एक ताप, एक गंध, एक अस्थिर साँस, एक हल्की-सी हिचकिचाहट की तरह घटती है और भाषा तब तक कमरे के बाहर अपने जूते खोज रही होती है.
कामना में मनुष्य सबसे अधिक शरीर होता है और संभवतः सबसे कम वाक्य. यही उसकी सुंदरता और यही भाषा की पराजय. हमारे पास संभोग के लिए बहुत-से शब्द हैं; अंगों के नाम हैं, क्रियाओं की संज्ञाएं हैं, मुद्राओं के संकेत हैं, विजय की डींगें हैं, चोट, प्रवेश, घर्षण, प्रहार, फाड़ने, तोड़ने, लेने, देने और जीत जाने की पूरी खड़खड़ाती हुई शस्त्रशाला है. लेकिन किसी की उपस्थिति भर से त्वचा के भीतर उठती हुई उस ऊष्मा और लहू में आई निराकार गरमाहट के लिए क्या काेई शब्द है, जो मनुष्य को आत्मविस्मृत कर देती है? उस विराम का नाम क्या है, जिसमें दो वयस्क मनुष्य एक-दूसरे के निकट होकर भी अपने-अपने अस्तित्व की सीमाओं को सुनते हैं? उस क्षण को क्या कहें जब हाथ अभी छुआ नहीं है, लेकिन दोनों शरीर उस संभावित स्पर्श से परिचित हो चुके हैं? सच तो यह है कि दरअसल भाषा ऐसे बिंदुओं पर विपन्न हो जाती है. इसीलिए तो हम गालियों में अत्यंत संपन्न और कामनाओं की शब्दावली में आश्चर्यजनक रूप से दरिद्र और दयनीय हैं.
हमारे शब्दकोश में औजार अधिक और उँगलियों का धैर्य कम है. वहाँ दरवाजे तोड़ने की क्रियाएँ हैं; धीरे से दस्तक देने की ध्वनियाँ कम. वहाँ विजय है, समर्पण है, कब्जा है, लेकिन परस्पर विस्मय बहुत कम. अश्लील शब्दावली की एक बड़ी विडंबना यही है कि वह सेक्स को बार-बार पुकारती है, किंतु उसकी देहगत जटिलता तक नहीं पहुँच पाती, आधे रास्ते थक कर ढेर हो जाती है. वह शरीर को नाम देती है, पर शरीर का अनुभव नहीं; अंग पहचानती है, मनुष्यता और उसकी देह में उपस्थित बेचैन टहलती कामनाओं को भूल जाती है. प्रचलित अश्लील शब्द छोटे, कठोर, यांत्रिक और दोहरावपूर्ण ही नहीं, जुगुप्साजनक हैं. उनमें प्रहार, औजार और आक्रामकता की छवियाँ अधिक हैं; निकटता, कोमलता और भावात्मक जटिलता नगण्य.
सच कहा जाए तो आज संस्कारशील लोग जिन शब्दों को अश्लील कहते हैं, वे सच में अश्लील तो क्या, थोड़ी सी यौन ऊष्मा वाले भी नहीं. वे एक तरह से फ्यूज़ वर्ड् हैं. उनमें अर्थ है ही नहीं. खोखले हैं. यों समझ लें कि यह वह पीढ़ी है जो काग़ज़ की नाव बनाकर पानी में बिना तैरे उसके आकार, उसकी अनुभूतियों और उसके लहरीले गीलेपन का आनंद ले रही है; लेकिन काग़ज़ की नाव नाव नहीं. वह पानी में एक क्षण में भीगकर बह जाएगी. यही अश्लील गाली प्रतीत होते शब्दों का सच है. यह दरिद्रता दुर्घटनावश नहीं बनी. वह उस सभ्यता का भाषिक परिणाम है, जिसने सेक्स को संबंध कम और अधिकार अधिक माना; स्त्री को सहभागी कम और संपत्ति अधिक; पुरुषत्व को संवेदना कम और प्रवेश की क्षमता अधिक. इसलिए बहुत-सी गालियों में संभोग प्रेम का नहीं, विजय का रूपक है. वे यह नहीं कहतीं कि दो इच्छाएँ मिलीं; वे कहती हैं कि किसी ने किसी के साथ कुछ कर दिया. क्रिया का कर्ता स्पष्ट है. कर्म निष्क्रिय. व्याकरण स्वयं पुरुष हो गया. उसने प्रवेश को पौरुष माना, प्राप्ति को अधिकार और अधिकार को आनंद. उसने शरीर को दुर्ग बनाया, इच्छा को युद्ध और निकटता को हमला. यहाँ कामना का संगीत नहीं, सेना की पदचाप सुनाई देती है. जननांग हथियार हैं; संभोग पराजय है; जीवन सहचरी और मानव रूप में उपस्थित संवेदनाओं की पुंज स्त्री का शरीर जीती हुई भूमि. गाली का यौन व्याकरण फूहड़ या उत्तेजक हो सकता है, कामुक नहीं. यहाँ आनंद संसर्ग का नहीं, दैहिक अधिकारों के संघर्ष में किसी को फूहड़ता से तर-ब-तर करने का है.
17.
गालियों का एक स्त्री-व्याकरण है. राजस्थानी में एक कहावत है, “कोई उसे भाभी भी नहीं कहता.” पहली निगाह में यह मामूली-सी लोक-पंक्ति लगती है, लेकिन रिश्तों की भाषा को थोड़ा कुरेदिए तो उसके नीचे पितृसत्ता का पूरा घरेलू संविधान है. “साला” इसका अद्भुत उदाहरण है. वह मूलतः पत्नी का भाई है; लेकिन उत्तर भारतीय भाषिक संसार में रिश्ता भी है और गाली भी. नृवंशशास्त्रीय अध्ययन बताते हैं कि उत्तर भारतीय रिश्तेदारी की भाषा में स्त्री को विवाह में “लेने वाला” जीजा ऊँची प्रतीकात्मक स्थिति पाता है और स्त्री को “देने” वाले पक्ष का साला नीचे खिसक जाता है. इसलिए “साला” की गाली का सबसे गहरा अर्थ केवल यह नहीं कि “तुम्हारी बहन से मेरे यौन संबंध हैं”; उससे अधिक भयावह अर्थ यह है, तुम्हारे घर की स्त्री मेरे घर आई है, इसलिए रिश्ते की सत्ता में मैं ऊपर और तुम नीचे हो. स्त्री यहाँ व्यक्ति नहीं, पुरुषों के बीच प्रतिष्ठा के लेन-देन की मुद्रा है.
भाषा यहाँ स्वामित्व और विनिमय का इतिहास भी बता रही है. अनेक गालियों में पुरुष को अपमानित करने के लिए पुरुष के शरीर तक पहुँचना भी आवश्यक नहीं समझा गया. उसकी माँ, बहन, पत्नी या बेटी की यौनिकता पर काल्पनिक अधिकार जताना पर्याप्त है. लड़ तो रहे हैं दो पुरुष; लेकिन युद्धभूमि एक अनुपस्थित स्त्री की देह होती है. वह न झगड़े में है, न उसने किसी को अनुमति दी, फिर भी उसका शरीर भाषिक हथियार बना दिया जाता है.
“राँड़” इससे भी अधिक निर्मम शब्द है; क्योंकि यहाँ स्त्री की यौनिकता ही नहीं, उसका दुःख, उसके संताप और उसके आंसुओं तक को गाली बना दिया गया. जिस स्त्री का पति मर गया, उसकी सामाजिक अवस्था तो दारुण हुई ही, धीरे-धीरे उसके चारों तरफ एक ऐसी भाषिक अवमानना का घेरा बना दिया गया कि एक स्त्री पर उसकी यौन नैतिकता, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्त्रीत्व सहित चौतरफा हमला बन गया. इससे अधिक पितृसत्तात्मक विडंबना क्या होगी? पति की मृत्यु पुरुष की मृत्यु है; लेकिन उसका सामाजिक दंड स्त्री के नाम में जमा कर दिया गया. विधुर के लिए हमारे पास ऐसा कोई समान रूप से विस्फोटक सार्वजनिक अपशब्द नहीं. पुरुष पत्नी खोए तो दुःखी; स्त्री पति खोए तो संदिग्ध और कलंकिनी.
पंजाबी का “रन्न” भी इसी अँधेरे परिवार का दिलचस्प सदस्य है. पंजाबी शब्दकोश इसे “स्त्री, पत्नी, कमनीय स्त्री, सम्मोहक युवती” के अर्थ में दर्ज करता है; लेकिन साथ ही इसके प्रयोग को डेप्रिशिएटरी यानी तिरस्कारपूर्ण भी बताता है. विस्मयकारी बात यह है कि “स्त्री” होना ही शब्द के भीतर धीरे-धीरे अवमानना ग्रहण कर सकता है. क्रिकेट का प्रसंग इसी कारण सुंदर भाषिक कथा बनता है. पंजाबी में क्रिकेट के “रन” के लिए “दौड़ां” कॉमेंटरी में क्रिएट किया गया, जो दौड़ पड़ा. फिर भी “दौड़ां” जैसा देशज विकल्प बताता है कि भाषा विदेशी खेल को भी अपनी चाल दे सकती है और स्त्री को अपमानकारी शब्द से बचाने का प्रयास कर सकती है.
भारतीय भाषाएँ इस स्त्री-विरोधी व्याकरण को अलग-अलग रोशनी में दिखाती हैं. बंगाली का “मागी” स्त्री, पत्नी और वेश्या तीनों अर्थों में तिरस्कारपूर्ण है. तमिल का “तेवडियाल” और भी विचित्र यात्रा दिखाता है. ऐतिहासिक देवदासी-संज्ञा बाद में वेश्या तथा स्त्री-लक्षित अपशब्द के अर्थ तक पहुँच गई. कन्नड़ की पुरानी सामाजिक दुनिया में विधवा की मुंडित अवस्था तक गाली की सामग्री बनी; मुंडेमागा और बोलीमागा जैसे अपशब्दों का अर्थ लगभग “मुंडित विधवा का बेटा” बताया गया है. हम कैसी सभ्यता में रहे हैं कि गाली देने वाले को किसी पुरुष का अपराध नहीं मिला तो उसने उसकी माँ का वैधव्य खोज लिया.
हमारी गालियों का सबसे बड़ा शब्दकोश शायद जननांगों का नहीं, स्त्री पर पुरुष के स्वामित्व का है. विधवा, विवाहेतर यौनिकता, वेश्या, किसी की बहन होना, माँ होना आदि पुरुष को अपमानित करने का रास्ता है तो किसी की पत्नी होना अधिकार का संकेत. स्त्री को सदियों तक कहा गया कि उसकी “इज़्ज़त” उसकी देह में रहती है; फिर पुरुषों ने उसी इज़्ज़त को अपनी लड़ाइयों का हथियार बना लिया.
18.
आधुनिकता का सबसे पेचीदा अंतर्विरोध वहीं जन्म लेता है, जहाँ स्वर स्वतंत्र हो चुका हो, पर उसका व्याकरण अब भी इतिहास की पुरानी बेड़ियाँ पहने है. स्त्री यदि वही माँ-बहन-केंद्रित गाली बोलती है, जिसमें दूसरी स्त्री की देह पुरुष-सम्मान को चोट पहुँचाने की भूमि बनाई गई है तो उसके बोलने के अधिकार का विस्तार अवश्य हुआ है; किंतु अपमान की सत्ता-संरचना अनिवार्यतः नहीं बदली. वह निषिद्ध अस्त्रागार में प्रवेश कर चुकी है, पर हथियार अब भी पितृसत्ता की उसी पुरानी भट्ठी के लोहे से ढले हैं. कंठ स्वतंत्र है; व्याकरण अभी गुलाम. इसलिए स्त्रीवादी भाषिक मुक्ति का अर्थ केवल यह नहीं कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह बेहिचक गाली देना सीख जाएँ. यदि स्त्री के मुक्त कंठ में भी माँ, बहन, विधवा और वेश्या ही अपमान की मुद्रा बनी रहें तो कंठ स्वतंत्र हुआ है, मस्तिष्क का वह हिस्सा नहीं, जहाँ स्त्री एक समान गरिमा वाली नागरिक है. असली क्रांति शायद उस दिन होगी जब हम किसी भ्रष्ट आदमी को अपमानित करने के लिए किसी स्त्री की देह उधार लेना बंद कर देंगे और उसकी क्रूरता, कायरता, बेईमानी और नैतिक दिवालियेपन के लिए नए, अधिक सटीक और अधिक निर्मम शब्द गढ़ेंगे.
19.
गाली का सबसे वीभत्स जादू यही है कि स्त्री को अपमान की मुद्रा बनाती है. जैसे उसका शरीर सामाजिक अर्थव्यवस्था का सिक्का हो, जिसे एक पुरुष दूसरे की प्रतिष्ठा घटाने के लिए उछाल सकता है. इसलिए माँ-बहन-केंद्रित गालियाें वाले शब्द पितृसत्ता के छोटे, क्षुद्र, अपमानकारी और चलते-फिरते सिद्धांत हैं. प्रत्येक गाली एक सूक्ष्म ग्रंथ है, जिसमें लिखा है कि स्त्री की यौनिकता उसकी अपनी नहीं; परिवार की सामूहिक संपत्ति है और हर पुरुष-सम्मान का सार्वभौमिक स्मारक.
लेकिन वही शब्द जब एक स्त्री के मुँह से निकलता है तो क्या होता है? पूरा दृश्यलोक काँप उठता है. वह शब्द, जिसने सदियों तक उसे धमकाया, अब उसके अधरों के भीतर दंतपंक्ति के पीछे खड़ा कसमसा रहा है. शायद इसलिए कि उसके डीएनए ने सदियों से वह गाली सुनी है. वह उसे बोलती है, जोर से, सार्वजनिक रूप से, कैमरे के सामने. उसके स्वर में क्षमा नहीं. वह उस सभ्यता को धक्का देती है, जिसने स्त्री की आदर्श आवाज़ को धीमा, मधुर, विनीत और लगभग अशरीरी बनाया था. स्त्री को कहा गया था, शरीर के कुछ अंगों का नाम मत लो; क्योंकि कामना तुम्हारी हो सकती है, उससे संबंधित भाषा नहीं.
स्त्री की देह पर पुरुष-सत्ता का सबसे गहरा नियंत्रण वहाँ दिखाई देता है, जहाँ वह अपनी सबसे नैसर्गिक जैविक क्रिया मासिक धर्म का नाम स्त्रियों तक के बीच सहजता से नहीं ले सकती. घरों और संस्कृतियों ने उसके लिए सांकेतिक शब्द गढ़े, मानो यह दैहिक अनिवार्यता नहीं, कोई अपराध घट रहा हो. यह विडंबना कैसी निर्मम है कि जिस जैविक चक्र के बिना मनुष्य-जीवन की संभावना तक नहीं हो सकती, उसी को वही पुरुष “अपवित्र” कहकर स्त्री को मंदिर, रसोई और अनुष्ठानों से बाहर करता रहा है और आज भी बाज नहीं आया है.
20.
पुरुष की कठोर और अपमानकारी आवाज़ शौर्यपूर्ण या वीरोचित नेतृत्व कही गई; स्त्री की हिस्टीरिया. पुरुष की गाली आक्रामक व्यक्तित्व का चिह्न बनी; स्त्री की वही गाली संस्कार, परिवार और चरित्र का प्रमाणपत्र माँगने लगी. वास्तविक भाषिक मुक्ति तब होगी जब स्त्री पुरुषों की पुरानी गाली बोलने की समानता भर न पाए, अपितु अपमान की ऐसी नई भाषा रचे, जिसमें किसी दूसरी स्त्री की देह को रखे बिना भी सत्ता को घायल किया जा सके. यह कहना स्त्री के गाली देने के अधिकार को छीनना नहीं; उस अधिकार को अधिक सर्जनात्मक और क्रांतिकारी संभावना तक ले जाना है.
जेन-ज़ी की भाषा ने इस दिशा में बहुत काम किया है. इसलिए वह मुक्ति के मार्ग पर चल पड़ी है. मुक्ति का अधिक कठिन रूप यह है कि स्त्री उस भाषा को बदल दे, जिसमें बोलने का अधिकार मिला है. वह शब्दों की पुरानी सेना में केवल सैनिक न बने; उसका सैन्यीकरण ही भंग कर दे. वह अपमान का नया व्याकरण बनाए, जो सत्ता की नीति को घायल करे, किसी स्त्री के शरीर को नहीं; जो मंत्री के झूठ को निर्वस्त्र करे, उसकी माँ को नहीं; जो भ्रष्ट संस्था की अकर्मण्यता या निर्वीर्यता पर प्रहार करे; लेकिन किसी वास्तविक पुरुष की जैविक क्षमता को अपमान का मानदंड न बनाए.
नपुंसकता गाली क्यों है? बाँझपन अपमान क्यों है? समलैंगिकता उपहास क्यों है? स्त्रीत्व दुर्बलता क्यों है? किसी पुरुष को नीचा दिखाने के लिए उसे स्त्री-सदृश कहना स्वयं स्त्री के बारे में क्या कहता है? किसी को “हिजड़ा” कहकर अपमानित करना उस व्यक्ति से अधिक उस समाज को नग्न करता है, जिसने ट्रांस्जेंडर अस्तित्व को मनुष्यत्व की पूर्ण श्रेणी से बाहर रखा. गालियाँ अक्सर लक्ष्य को जितना नहीं, वक्ता के नैतिक ब्रह्मांड को उससे अधिक प्रकट करती हैं.
मुख्यधारा के लंबे इतिहास में स्त्री और क्वियर शरीर को प्रायः देखा गया, वर्णित किया गया, चाहा गया, नियंत्रित किया गया. वे किसी और की दृष्टि में चमकते थे. पुरुष गाता था; स्त्री गीत की वस्तु थी. पुरुष इच्छा व्यक्त करता था; स्त्री उसकी इच्छा की दिशा. स्त्री की कामना को या तो मौन रखा गया या प्रतीक्षा, समर्पण, प्रेम और लज्जा की कोमल परतों में ढक दिया गया. समकालीन नई पीढ़ी के स्त्री-रैप और क्वियर-पॉप ने इस दृश्य को झटका दिया है.
यह साफ़ बताता है कि अश्लील माने जाने वाले शब्दों के आकाश में शायद कोई नई नीहारिका बन रही है, जिसके आरंभिक संकेत वैप से प्रतीकित नई पॉप-संस्कृति में दिखाई देते हैं. अमेरिकन रैपर और इंटरनेट सेलिब्रिटी कार्डी बी और मेगन थी स्टैलियन के वैप की सांस्कृतिक महत्ता केवल उसकी निर्भीक यौन भाषा में नहीं, इस विलोम में है कि स्त्री अब पुरुष की कामना की वस्तु भर नहीं; अपने सुख, अपनी शारीरिक अपेक्षाओं और अपनी इच्छा की तीव्रता की स्वयं वक्ता और निर्णायक है. इसी कारण वैप को स्त्री-आनंद और उस पर लगाए गए “शालीनता” के अनुशासन के बीच संघर्ष के रूप में भी पढ़ा गया है. पुराना वाक्य था, स्त्री को चाहो. नया उद्घोष है, मैं चाहती हूँ. यह केवल सर्वनाम और क्रिया का फेर नहीं; सभ्यता के कैमरे का पूरा-पूरा घूम जाना है.
अमेरिकन गायिका और अभिनेत्री बिली आइलिश का ‘लंच’ (“हिट मी हार्ड एंड सॉफ़्ट” एल्बम) स्त्री की स्त्री के प्रति इच्छा को संकेतों की धुँध से निकालकर प्रत्यक्ष भूख और आकर्षण की भाषा देता है; आइलिश ने स्वयं इसे अपनी अदम्य कामुकता को समझने की यात्रा से जोड़ा है. चैपल रोअन का “कैज़ुअल” दूसरी जटिलता खोलता है, शारीरिक और भावनात्मक निकटता के बावजूद संबंध को “कैज़ुअल” कहे जाने से पैदा हुई असमानता और पीड़ा के कारण. डोजा कैट और निकी मिनाज जैसी कलाकार स्त्री-वक्ता को इच्छा करने, चुनने, माँगने और पुरुष-देह का मूल्यांकन करने का वह अधिकार देती हैं, जो लंबे समय तक लोकप्रिय संगीत में मुख्यतः पुरुष-दृष्टि के पास था. और लिल नैस एक्स का ‘मोंटेरो’ (कॉल मी बाय योर नेम) समलैंगिक पुरुष-कामना को धार्मिक अपराधबोध और सामाजिक निषेध के सामने लगभग उत्सव-धर्मी दुस्साहस के साथ रख देता है.
स्त्री और क्वियर कलाकार अब केवल कामना के विषय नहीं; उसकी भाषा के कर्ता भी हैं. इसमें निश्चय ही मुक्ति है. लेकिन यहीं अगला प्रश्न जन्म लेता है कि हर दिखने वाली चीज़ स्वतंत्रता नहीं होती; कभी-कभी बाज़ार भी मुक्ति की देह पर अपना मूल्य-टैग चुपके से टांक देता है.
वैप के बाद लोकप्रिय संगीत में जो सबसे दिलचस्प परिवर्तन दिखाई देता है, वह अश्लीलता की मात्रा बढ़ जाना भर नहीं; कामुकता का नई बोलियाँ खोज लेना है. अब एक गीत प्रत्यक्ष यौन शब्दों से चौंकाता है, दूसरा हास्य से, तीसरा केवल एक संकेत से, चौथा शरीर की अनुकूलता को व्यक्तित्व-परीक्षण बना देता है. एनएलई चोपा का ‘स्लट मी आउट’ 2 इस नए संसार का लगभग उन्मत्त पुरुष-पक्ष है और अतिशयोक्ति इतनी अधिक कि अश्लीलता स्वयं अपनी पैरोडी बनने लगती है. यहाँ सेक्स रहस्य या रोमांस नहीं, मीम में बदल सकने वाला सार्वजनिक अभिनय है. दूसरी ओर अमेरिकी पाॅप स्टार सबरीना कारपेंटर के ‘बेड केम’ में “बेडरूम केमिस्ट्री” कोई छिपी हुई परिणति नहीं, दो शरीरों के बीच पहले से महसूस की जा रही संभावना है.
प्रेम बाद में आए या न आए; आकर्षण को अस्तित्व के लिए प्रेमपत्र की अनुमति नहीं चाहिए. कारपेंटर का ‘जूनो’ इस परिवर्तन को और शरारती जगह ले जाता है. गर्भधारण जैसा विषय, जिसे परंपरागत संस्कृति भय, ममत्व, मातृत्व, जिम्मेदारी और नैतिक अनुशासन से ढँकती रही, यहाँ उर्वरता और तीव्र आकर्षण के खिलंदड़े रूपक में प्रवेश करता है. उसके कॉन्सर्टों में गीत के साथ बदलती मुद्राएँ बताती हैं कि आज पॉप-संगीत केवल सुना नहीं जाता; उसकी कामुकता का प्रत्येक छोटा संकेत वीडियो में कटता, साझा होता और सामूहिक मज़ाक में बदलता है. चार्ली एक्ससीएक्स और बिली आइलिश का ‘गेस’ इसी डिजिटल दृश्य-संस्कृति को अंतर्वस्त्र, अनुमान और झाँकने की चंचलता से खेलाता है. जो कभी निजी वस्त्र था, वह यहाँ संकेत है; संकेत खेल है और खेल कुछ ही घंटों में लाखों स्क्रीन पर चलने वाला सांस्कृतिक मुहावरा. नई इरोटिकता इस दौर में जेन-ज़ी की ही तरह शरीर खोलने से अधिक संकेत खोलने में आनंद लेती है. उसकी बहुत सी आदतें, इच्छाएं और जीवन व्यवहार हमारी समझ से बहुत परे जा रहे हैं.
टिनाशे का ‘नैस्टी’ इस पीढ़ी की यौन भाषा में आए एक अधिक सूक्ष्म परिवर्तन को पकड़ता है. सेक्सुअल कम्पैटिबिलिटी अर्थात् मेरे आकर्षण की तीव्रता का उत्तर कौन दे सकता है? यह प्रेम के पुराने प्रश्न कि “मुझसे कौन प्रेम करेगा?” से अलग “मेरी ऊर्जा के बराबर कौन है?” है. और जब यही वाक्य टिकटॉक की धुन, नृत्य और मीम में प्रवेश करता है तो निजी इच्छा सार्वजनिक कैचफ्रेज़ बन जाती है. कामुकता अब केवल बंद कमरे का रहस्य नहीं; वह सामाजिक पहचान का छोटा-सा पासवर्ड भी हो सकती है.
कुछ शब्दों पर हाहाकार कर रही सत्ता प्रतिष्ठान की पूजा में लीन सांस्कृतिक टुकड़ियों को अभी आभास और एहसास नहीं कि उनके सामने कैसे दिन आने वाले हैं. एरियाना ग्रांडे का चुलबुला, शरारती और कामुक गीत ‘34+35′ इन लोगाें को कुछ कहता है कि यह पीढ़ी कैसी है. स्कूल के दूसरी कक्षा के गणित जैसा निर्दोष दिखता शीर्षक अपने भीतर विगलित इच्छाओं के जाने कितने कूट संकेत छिपाए है. जेन-ज़ी कितनी कोडेड संकेत इस्तेमाल कर रही है कि ये इनके माँ-बाप वाली पीढ़ी को समझ नहीं आ सकता. इस गीत के अंकों का योग करके देखेंगे तो मुख-सुख वाली मुद्रा का मूल्य समझ आ जाएगा कि नई पीढ़ी की जिस भाषा पर हल्ला हो रहा है, वह कुछ दिनों में कहाँ जाने वाली है! लेकिन डरिए मत, यह सब अश्लील प्रतीत ज़रूर हो रहा है, है नहीं. इसमें मासूम गणित और स्पष्ट कामुकता को बहुत ही विनोदपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है.
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नई पॉप-भाषा अश्लीलता को हमेशा चिल्लाकर नहीं बोलती; कभी वह मुस्कराकर पहेली पूछती है और श्रोता को अर्थ पूरा करने देती है. लेकिन इस पूरे संगीत-संसार में कामना हमेशा चमकीली और मुक्त नहीं है. ‘वन ऑव द गर्ल्स’ इच्छा को प्रभुत्व, आत्मसमर्पण और पीड़ा की गहरी छाया में ले जाता है. उसका धीमा, लगभग सम्मोहित वातावरण बताता है कि समकालीन पॉप ने सेक्स को केवल आनंद के चमकदार विज्ञापन में नहीं बदला; उसने शक्ति, नियंत्रण और अपने को किसी दूसरे के हवाले कर देने की मनोवैज्ञानिक उत्तेजना को भी दृश्य बनाया है. अमेरिकी रैपर डोजा कैट का ‘अगोरा हिल्स’ कामुकता को स्वप्न की तरह बरतता है, जहाँ इच्छा मुखर होने के बजाय लिपटी हुई, प्रदर्शनप्रिय और निजी-सार्वजनिक सीमा पर झिलमिलाती है. इस नई पीढ़ी की कामुक भाषा की यही विचित्र व्यापकता है. एक गीत नारे की तरह नग्न है तो दूसरा अधखुले परदे की तरह. और यही वह अंदाज़ है, जिससे भविष्य के आंदोलनों को समझा जा सकता है.
और फिर इस नई पीढ़ी की प्रिय बोंगोज़ जैसी रचनाएँ बताती हैं कि निर्भीक यौन पॉप स्वयं एक स्थापित शैली बन चुका है. जो कभी सांस्कृतिक विस्फोट था, वह धीरे-धीरे एक पहचानने योग्य ऐस्थेटिक भी हो सकता है. तेज़ बीट, देह की डींग, रूपक, नृत्य और सोशल मीडिया के लिए पहले से तैयार छोटे दृश्य. यहीं एक नया प्रश्न पैदा होता है. जब विद्रोह की भाषा इतनी सफल हो जाए कि संगीत-उद्योग भी उसे पहचानने, पैक करने और बार-बार बेचने लगे तो उसमें कितना विद्रोह बचता है और कितना ज़ॉनर? शायद यही आज के पॉप का सबसे रोचक मोड़ है. अश्लीलता अब केवल सेंसर से लड़ने वाला निषिद्ध शब्द नहीं रही; वह संगीत की लय, हास्य, फैशन, गणित, अंतर्वस्त्र, नृत्य-मुद्रा, मीम और एल्गोरिद्म में बिखर गई है.
इन गीतों के बीच कामना ने जाने कितने ही नए छंद बना लिए हैं. कहीं केमिस्ट्री, कहीं अनुकूलता, कहीं उर्वरता की शरारत, कहीं देखने और देखे जाने का खेल, कहीं प्रभुत्व, कहीं आत्मसमर्पण और कहीं ऐसा हास्य, जिसमें पुरानी शर्म स्वयं हास्यास्पद लगने लगती है. नई पीढ़ी ने सेक्स के शब्दकोश में केवल कुछ निषिद्ध शब्द नहीं जोड़े; उसने उसके विराम-चिह्न, समास, कारक और विस्मयबोधक भी बदल दिए हैं. अब इच्छा कभी विस्मयादिबोधक है, कभी प्रश्नवाचक, कभी आँख मारता हुआ कोष्ठक और कभी केवल दो शरीरों के बीच वह अधूरा वाक्य, जिसे पूरा करने का अधिकार किसी पुराने नैतिक व्याकरण को नहीं दिया गया है.
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दरअसल, जेन-ज़ी का जो सांस्कृतिक गोमुख है, उसे समझना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है. अब जैसे नई पीढ़ी ने इरोटिकता को अश्लीलता से अलग कर दिया है, वहीं आंदोलन भी राजनीति से अलग हो सकते हैं. इरोटिकता शब्दों के अनुपस्थित होते ही समाप्त नहीं होती; कई बार वह वहीं आरंभ होती है. वह किसी वयस्क व्यक्ति की आँखों में ठहरी हुई रुचि हो सकती है, हाथ का पूछा हुआ स्पर्श, साँसों की बदलती लय, पास आने और रुक जाने का साझा निर्णय. वह शरीर की वह जागृति है, जिसमें दूसरा व्यक्ति वस्तु नहीं, अधिक जीवित दिखाई देता है. इरोटिकता त्वचा को केवल सतह नहीं रहने देती. त्वचा स्मृति बनती है. सीमा बनती है. द्वार बनती है. और सबसे बढ़कर उत्तर देने वाली चेतना बनती है. यही राजनीति की नई देह भी हो सकती है और उसकी आत्मा भी.
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हिंसक गाली त्वचा को निशाना बनाती है; इरोटिकता उसे सुनती और भीतर तक महसूस करती है. गाली शरीर पर काल्पनिक स्वामित्व जताती है; कामना अनुमति की प्रतीक्षा में अपने ही ताप को थामे रहती है. गाली दूसरे को छोटा करके स्वयं को बड़ा बनाती है; इरोटिकता में दूसरे की तीव्रता से स्वयं का अनुभव विस्तृत होता है. दोनों में गर्मी हो सकती है. लेकिन एक आग घर बनाती है. दूसरी जलाती है.
जंतर-मंतर की भाषा में भी यह दोनों ऊर्जाएँ साथ थीं. वहाँ देह का जीवित प्रतिरोध था. धूप में खड़े शरीर, पसीना, भूख, भय, हँसी, ऊँची आवाज़ें; वह घोषणा कि नागरिक केवल आवेदन संख्या, परीक्षा रोल नंबर या डेटा-बिंदु नहीं है. उसके भीतर रक्त है, इच्छा है, अपमान महसूस करने वाली त्वचा है. पर उसी उफान में कुछ शब्द ऐसे भी थे, जो दूसरे की देह पर भाषिक अधिकार जताते थे. इसलिए यह प्रश्न पर्याप्त नहीं कि शब्द अश्लील था या नहीं. पूछना यह है कि उसने संबंध बनाया या तोड़ा? उसने वक्ता की देह को वापस दिया या किसी और की देह छीन ली? उसने कामना को आवाज़ दी या विजय को? उसने दूसरे को अधिक उपस्थित किया या उसे केवल अंग में घटा दिया? और जब कोई शब्द मुँह से बाहर आया, उसने केवल अर्थ व्यक्त किया या वास्तव में किसी के साथ कुछ किया? अब शब्द त्वचा से उठकर कर्म की ओर बढ़ रहा था.
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अंगरेज़ भाषा दार्शनिक जेएल ऑस्टिन इस बहस को एक और गहरी देह देते हैं. ‘हाउ टू डू थिंग्स विद वर्डस’ में उनका मूल आग्रह था कि शब्द केवल कुछ कहते नहीं, वे कुछ करते भी हैं. वादा करना, धमकाना, अपमानित करना, ललकारना वाक्य नहीं, क्रियाएँ हैं. इस अर्थ में जंतर-मंतर की गाली भी हवा में फेंका गया निष्प्राण शब्द नहीं; वह एक स्पीच एक्ट है. सत्ता को धक्का, निषेध पर प्रहार और अपनी उपस्थित देह की घोषणा. और इसे आप रोक नहीं सकते.
अमरीकी दार्शनिक और नारीवादी चिंतक जूडिथ बटलर के लिए अपमानजनक संबोधन की चोट इसलिए गहरी है कि वह हमें पहले से मौजूद सामाजिक नामों के माध्यम से घायल करता है. अपशब्द वक्ता की निजी खोज नहीं होता; वह इतिहास से आया हथियार है. उसे बोलते समय वक्ता अपने से पहले हुए अपमानों को फिर से उपस्थित करता है. कई बार सदियों पुराने अपराध की शब्दावली वर्तमान का प्रतिष्ठा मानदंड भी बन जाती है.
इस भाषिक रूपांतरण का सबसे दिलचस्प उदाहरण ‘साहस’ है. मनुस्मृति में यह शब्द चोरी, बलपूर्वक हरण और हिंसक अपराधों के अर्थ-संसार से जुड़ा मिलता है. मनु बलात्कारी को ‘साहसी’ कहते हैं तो यह कलंकित अपराधी है, बहादुराना नहीं. लेकिन समय की लंबी पुरुषवादी सुरंग से गुजरते-गुजरते वही कलंकित शब्द अपने पुराने नकारात्मक अर्थ झाड़ता गया और अंततः वीरता, निर्भीकता और नैतिक दृढ़ता का पर्याय बनकर हमारे सामने खड़ा हो गया. भाषा ऐसे ही अपने अतीत को धोती, ढँकती और पुनर्जन्म देती है.
और ‘स्त्री’ की यात्रा मानो इसका उलटा इतिहास है. जो शब्द कभी पुरुष के समानांतर मनुष्य की दूसरी, समान सत्ता का सूचक था, पुरुष-सत्तात्मक समाज ने धीरे-धीरे उसमें दुर्बलता, भीरुता और पराधीनता के अर्थ भर दिए. यहाँ शब्द ऊपर नहीं उठा, नीचे धकेला गया. भाषा ने स्त्री को नाम दिया; लेकिन सत्ता ने उसके भीतर कमजोरी का मिथक बसा दिया. इस तरह शब्दकोश भी कभी-कभी सामाजिक वर्चस्व का सबसे शांत, किंतु सबसे दीर्घजीवी अभिलेख बन जाता है.
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यहीं “कॉकरोच” जैसे रूपक का राजनीतिक आकर्षण बनता है. किसी समूह को कीट कहना उसे अमानवीय बनाने की पुरानी तकनीक है. पहले मनुष्य को गंदगी, बीमारी या परजीवी कहा जाता है, फिर उसके साथ कम मनुष्य जैसा व्यवहार करना आसान हो जाता है. लेकिन जब संबोधित समूह स्वयं कह दे : हाँ, हम कॉकरोच हैं; तुम हमें कुचलना चाहते हो, फिर भी हम बच जाते हैं तो अपमान जीवट में बदल सकता है. यह एक तरह की ताक़तवर दखल है. लेकिन यह अधिकार समान रूप से सबका नहीं. किसी समुदाय का स्वयं को उस नाम से पुकारना और प्रभुत्वशाली बाहरी व्यक्ति का उसे वही नाम देना दो भिन्न भाषिक कर्म हैं. पहले में घाव पर अपना हस्ताक्षर है; दूसरे में चाकू की पुनरावृत्ति.
दार्शनिक मिशेल फूको का सत्ता-विमर्श किसी पुस्तकालय से नहीं, जंतर-मंतर जैसे आंदोलनों के नारों के भीतर से ही निकलता है. सत्ता केवल संसद, पुलिस मुख्यालय या मंत्रालय में नहीं बैठती. वह उन वर्गीकरणों में रहती है, जिन्हें हम सहज मानते हैं. सामान्य और विकृत, शुद्ध और अशुद्ध, सभ्य और असभ्य, पुरुष और नामर्द, सम्मानित स्त्री और चरित्रहीन स्त्री जैसे वर्गीकरणों को गाली पुनः सक्रिय कर सकती है. सत्ता-विरोधी वाक्य भी सत्ता की पुरानी श्रेणियाँ ढो सकता है. सत्ता के विरुद्ध बोली गई भाषा हमेशा सत्ता से बाहर नहीं होती. कभी-कभी वह उसी जेल की ईंटों से अपना मंच बनाती है, जिससे मुक्ति का विजयी अभियान चला चुकी होती है.
ब्रिटिश मानव विज्ञानी मैरी डगलस ने शुद्धता और प्रदूषण के सामाजिक विचारों की ओर ध्यान दिलाया था. गंदगी किसी वस्तु का स्थायी गुण नहीं; वह वस्तु का “ग़लत जगह” उपस्थित होना भी है. जूता अपने स्थान पर गंदा नहीं, भोजन की मेज पर गंदा हो जाता है. शरीर स्वयं अशुद्ध नहीं; समाज तय करता है कि कौन-सा स्राव, अंग, इच्छा अथवा शब्द कहाँ कहा जा सकता है. यही कारण है कि एक पुरुष-मंडली में स्वीकार्य गाली किसी युवती के सार्वजनिक उच्चारण पर “सभ्यता का पतन” बन जाती है. समस्या शब्द की ध्वनि भर नहीं; वक्ता की सामाजिक जगह का उल्लंघन है. उसने शब्द नहीं बिगाड़ा. उसने तय स्थान बदल दिया. जो पुरुषों के अड्डे में था, वह कैमरे के सामने आ गया. जो फुसफुसाहट में स्वीकार्य था, नारे में अस्वीकार्य हो गया. शुद्धता की व्यवस्था अक्सर यह नहीं पूछती कि क्या कहा गया. वह पूछती है, किसने कह दिया?
रूसी दार्शनिक मिखाइल बख्तिन के कार्निवल में भी संसार कुछ समय के लिए उलट जाता है. राजा पर हँसा जा सकता है, शरीर के निचले हिस्से सार्वजनिक हास्य में आ सकते हैं और पवित्रता को बाजार की हँसी छेद सकती है. कार्निवली भाषा ऊँच-नीच की आधिकारिक गंभीरता को भंग करती है. मीम उसी पुरानी कार्निवली ऊर्जा का डिजिटल अवतार है. सिंहासन पर बैठे व्यक्ति का चेहरा कुछ सेकंड में किसी फिल्मी दृश्य, नाचते पात्र या नाकाम विज्ञापन से जोड़ दिया जाता है. सत्ता का औपचारिक चित्र टूटता है. गाली कहती है, तुम दुष्ट हो. मीम कहता है, तुम इतने महान् भी नहीं कि केवल दुष्ट कहलाओ; तुम हास्यास्पद हो. यहीं व्यंग्य गाली से अधिक गहरी राजनीतिक चोट बन जाता है.
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दुष्टता हमेशा से अपने भीतर शक्ति का आभामंडल रख सकती है. खलनायक भी विराट् दिख सकता है. लेकिन हास्य वैराट्य को नष्ट कर देता है. वह मुकुट को खिलौना और सत्ता के पशुबल को अभिनय बना देता है. आलोचना का उत्तर तर्क, पुलिस, विज्ञापन या अनुकूल मीडिया से दिया जा सकता है. लेकिन सफल मज़ाक का खंडन करते ही सत्ता अक्सर उसी मज़ाक का अगला दृश्य बन जाती है. इस अर्थ में मीम गाली का अधिक विकसित रिश्तेदार है. उसमें गाली की आग है; लेकिन दिखती नहीं और महसूस भी तब होती है, जब बहुत देर हो चुकी होती है.
किसान आंदोलन हो या शाहीन बाग, महिला पहलवानों का आंदोलन हो या अग्निवीरों का, वे सब बुरी तरह कुचले गए; क्योंकि वे सत्ता को दुष्ट बता रहे थे, जो कि वह होती ही है. इसलिए कई बार वह उस सच को बोलना प्रभावशाली नहीं रहता, जो लोकसमाज में रचा-बसा है. जेन-ज़ी की राजनीति की शक्ति यहीं दिखाई देती है. उसने सत्ता को केवल दुष्ट नहीं, बार-बार हास्यास्पद साबित किया. छवि-निर्माण पर टिकी राजनीति के लिए यह विशेष रूप से असुविधाजनक प्रहार था. इसमें एक सच यह भी है कि जंतर-मंतर के आंदोलन को तो दिखाने से रोका जा सकता है; लेकिन डिजिटल युग का जंतर-मंतर तो एक जगह भर नहीं, वह आवृत्तियों और पुनरावृत्तियों की एक सतत और अविरल प्रक्रिया है. पहले गाली या नारे मुँह से कान तक जाते थे, अब एल्गोरिदम उसे अनंत बार इस तरह घटित करता है कि सरकार भी डर जाती है. भाषा की चोट डेटा बन जाती है. एक क्षण जलप्रपात की तरह गिरता एक स्थायी वर्तमान हो जाता है. इससे सत्ता की छवि टूटती है. लेकिन सत्ता के अपने भाषिक कर्म हैं. सभ्य और साफ़-सुथरे प्रतीत होते; लेकिन दमन के नए शिष्ट एलगोरिद्म के साथ. ऐसी शिष्टता जो हिंसा का सबसे कुशल मेकअप होती है.
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प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने राजनीतिक भाषा की उस क्षमता को पहचाना था, जिसमें क्रूर कर्मों को धुँधले, निष्क्रिय और तकनीकी शब्दों से ढक दिया जाता है. गाँव जलाया गया को “क्षेत्र सुरक्षित किया गया”, नागरिक मारे गए को “सहायक क्षति हुई”, लोगों को निकाला गया को “पुनर्वास प्रक्रिया अपनाई गई” आदि. यानी शासकीय और प्रशासनिक भाषा लोगों के बहते रक्त को रिपोर्ट में बदल देती है.
सरकारी और कॉरपोरेट शब्दावली ने इस कला को असाधारण दक्षता तक पहुँचाया है; क्योंकि लोकोपकारी पत्रकारिता में दक्ष हुए मीडियाकर्मियों को वैभव के चुंबकीय सम्मोहन ने बंधक बनाकर या तो सरकारों की शक्तियों के पापों को पुण्य के वस्त्र पहनाने वाले दर्जी बना दिया है या कॉर्पोरेट की उस धन पिपासा का गार्ड, जो कभी तृप्त नहीं हो सकती. इसीलिए कभी सांख्यकार कपिल मुनि ने सत्ता और मानवीय संबंधों के यथार्थ को एक सूक्त वाक्य में पिरोया था : “गुणयोगाद् बंध: शुकवत्”. (4/26, सांख्यदर्शनम्)
“प्रक्रियागत विलंब”, “तकनीकी कारण”, “प्रशासनिक अपरिहार्यता”, “कटऑफ में संशोधन”, “परीक्षा पुनर्निर्धारित”, “भर्ती प्रक्रिया स्थगित”, “असुविधा के लिए खेद है” जैसे वाक्यांशों में कोई अश्लील शब्द नहीं. कोई जननांग नहीं. कोई माँ-बहन नहीं. कोई चीख नहीं. लेकिन इनके पीछे किसी युवक की आयु सीमा निकल सकती है. किसी युवती का एक वर्ष तैयारी में मर सकता है. किसी परिवार का उधार बढ़ सकता है. कोई अभ्यर्थी किराया, कोचिंग, भोजन और उम्मीद के बीच टूट सकता है. कोई नियुक्ति वर्षों तक अदालत और फाइल में अटक सकती है. कोई रोगी “प्रक्रिया” पूरी होने से पहले मर सकता है. तो अश्लीलता कहाँ है? उस पोस्टर पर, जिसमें शरीर-संबंधी संकेत है? या उस व्यवस्था में, जो प्रश्नपत्र बेच देती है? उस लड़की के मुँह में, जिसने क्रोध में कठोर शब्द कहा? या उस परिपत्र में, जिसने बिना आवाज़ ऊँची किए हजारों लोगों का भविष्य टाल दिया? या कुलपतियों, आयोगों या बोर्डों की वे नियुक्तियाँ, जिन पर आयोग्य लोगों को बिठा दिया जाता है.
28.
हम दृश्य हिंसा से अधिक विचलित होते हैं; क्योंकि उसके दाँत दिखाई देते हैं. अदृश्य हिंसा सभ्य फॉन्ट में आती है. उसके पास क्रमांक, मुहर और प्रेषक का पद होता है. वह “कृपया सूचित हो” से शुरू होती है और किसी जीवन का एक हिस्सा खा जाती है. गाली कम-से-कम अपने दाँत दिखाती है. हालांकि इससे गाली नैतिक नहीं हो जाती. ईमानदार हिंसा भी हिंसा ही है. प्रश्न यह नहीं कि कौन-सी भाषा पूरी तरह निर्दोष है; प्रश्न यह है कि हम नैतिक आलोचना की पूरी शक्ति केवल उस शब्द पर क्यों खर्च करते हैं, जिसका अश्लील शरीर दिखाई देता है और उस प्रशासनिक वाक्य को निष्पक्ष क्यों मान लेते हैं, जिसकी विनम्रता के भीतर संरचनात्मक क्रूरता छिपी है?
सभ्यता ने क्रूर, हिंसक और जीवन विरोधी कामों के लिए उत्कृष्ट पर्यायवाची बना लिए हैं. “छँटनी” को “वर्कफोर्स ऑप्टिमाइजेशन” कहा जा सकता है. निगरानी को “सुरक्षा-संवर्धन.” निजता के दोहन को “पर्सनलाइज्ड अनुभव.” कम वेतन को “प्रतिस्पर्धी पैकेज.” स्थायी काम की समाप्ति को “लचीली श्रम व्यवस्था.” कॉर्पोरेट भाषा मनुष्य को व्यक्ति से “रिसोर्स” बनाती है, फिर संसाधन के “रीअलाइनमेंट” में उसकी नौकरी समाप्त कर देती है. वाक्य शांत रहता है. जीवन हिल जाता है. यह सत्ता का शिष्ट अश्लीलताशास्त्र है. अश्लीलता यहाँ शरीर के नाम में नहीं; मनुष्य को संख्या, संसाधन, केस, आवेदन और डेटा में घटाने में है. वह किसी देह का अपमान नहीं करती, देह को ही अदृश्य कर देती है. और संभवतः यही जंतर-मंतर की गाली का सबसे गहरा संदर्भ था. वह केवल किसी व्यक्ति के लिए अभद्र शब्द नहीं थी; वह उन शिष्ट वाक्यों से लंबे संघर्ष के बाद निकला विस्फोट भी थी, जिनमें युवाओं की हानि कभी पूर्ण वाक्य नहीं बन सकी. उनकी उम्र “विलंब” थी. उनकी चिंता “असुविधा.” उनका भविष्य “पुनर्निर्धारित.” उन्होंने शिष्ट भाषा में आवेदन किया. ज्ञापन दिया. प्रतीक्षा की. पुनः प्रतीक्षा की. फिर शब्द ने सभ्यता की कुर्सी उलट दी.
यह क्षण मुक्ति भी हो सकता है और जाल भी. क्योंकि सत्ता चाह सकती है कि आंदोलन अपनी पूरी ऊर्जा गाली में खर्च कर दे. अश्लील क्लिप आगे आए, माँग पीछे जाए. क्रोध भाषा में विसर्जित हो, संगठन में न बदले. आंदोलन अपने विरोधी को वह दृश्य दे दे जिसके सहारे वह हर वैध प्रश्न को “असभ्यता” में बदल सके. एक शब्द हजार मुद्दों पर कालिख बन सकता है. इसलिए गाली जो करती है, उसका अंतिम निर्धारण वक्ता अकेला नहीं करता. कभी वह सत्ता को चोट पहुँचाने निकलती है और रास्ते में आंदोलन को घायल कर देती है. कभी वह भय तोड़ती है. कभी संबंध बनाती है. कभी तनाव घटाती है. कभी पहचान-समूह को संगठित करती है. कभी भीड़ को अमानवीकरण की दिशा में धकेलती है. कभी वह क्रोध की भाप निकाल देती है, जिससे मशीन चलती रहती है. कभी उसी भाप से सीटी बजती है और दूर तक सुनाई देती है कि मशीन के भीतर दबाव असहनीय हो चुका है.
29.
शब्द कर्म है. पर कर्म का परिणाम अनिश्चित. वह मुँह से निकलकर वक्ता का नियंत्रण छोड़ देता है. उसे पुलिस अपनी धारा में रख सकती है, मीडिया अपनी पट्टी में, समर्थक अपने मीम में, विरोधी अपने अभियोग में और इतिहास किसी बिल्कुल अलग अर्थ में. जंतर-मंतर पर कहा गया शब्द अब प्रदर्शनकारी का अकेला नहीं था. वह प्राथमिकी की भाषा, टेलीविजन की नैतिकता, सोशल मीडिया की भीड़, स्त्री के सार्वजनिक क्रोध, पीढ़ियों के संघर्ष और लोकतंत्र की सहनशीलता यानी सबकी परीक्षा बन चुका था. और इसी परीक्षा में अगला प्रश्न जन्म ले रहा था: क्रोध अंततः कहाँ जाए? मुँह से निकलकर हवा में समाप्त हो? आंदोलन को प्रदूषित करे? या अपनी उग्र, अशिष्ट, देहवान ऊर्जा को किसी अधिक सटीक नारे, अधिक निर्मम व्यंग्य, अधिक बुद्धिमान गाली और अधिक टिकाऊ राजनीतिक संगठन में बदल दे? शब्द अपना कर्म कर चुका था. अब उसकी नियति शेष थी.
30.
शायद इस पूरी बहस का अंतिम दृश्य किसी शब्दकोश में नहीं, एक फोन की काली स्क्रीन में छिपा है. वह फोन जो दिन में सूचना है, रात में एकांत; परिवार की सामूहिक निगाहों के बीच जेब में रखा हुआ छोटा-सा निजी अंत:पुर, जहाँ वह युवक या युवती उन शब्दों को पहली बार खोज सकता है, जिन्हें घर के भोजन की मेज़ पर बोलना लगभग अपराध है. मासिक धर्म, हस्तमैथुन, समलैंगिकता, इच्छा, सहमति, ब्रेकअप, शरीर की बेचैनी, जो बातें घर में फुसफुसाहट से भी छोटी कर दी गई थीं, स्क्रीन उन्हें अक्षर देता है.
इंटरनेट का पहला लोकतांत्रिक चमत्कार शायद यही है कि वह निषिद्ध चीज़ को खोजने योग्य बना देता है; लेकिन उसका पहला छल भी यही है कि खोज लेने को समझ लेना आसान हो जाता है. जिस समाज ने यौन शिक्षा के कक्ष पर ताला लगाया, उसने अनजाने ही उसकी चाबी पोर्नोग्राफी, इन्फ्लुएंसर, रैप, मीम और एल्गोरिद्म को सौंप दी. युवा को शब्द मिले, पर हर शब्द के साथ विवेक नहीं; देह का नक्शा मिला, पर हमेशा स्पर्श की नैतिकता नहीं; इच्छा का ताप मिला, पर कभी-कभी दूसरे शरीर की स्वतंत्रता का तापमान पढ़ना नहीं आया. इसीलिए जेन-ज़ी की स्पष्टता को केवल पतन कहना उतना ही मूर्खतापूर्ण है, जितना उसे स्वतः मुक्ति मान लेना. कई बार नई पीढ़ी के मुँह में भविष्य भी बोलता है और पुराने पितृसत्तात्मकता की बंद और गंधाती आयुधशाला का बारूद भी.
और शायद यहीं हमें उन अश्लील शब्दों को पहली बार बिना नैतिक दस्ताने के छूना चाहिए. शब्द भी देह की तरह होते हैं. उनकी त्वचा पर इतिहास के स्पर्श हैं. लेकिन कुछ स्पर्श कोमल, कुछ हिंसक, कुछ इतने पुराने कि हम उन्हें अपनी प्रकृति समझ बैठते हैं. जंतर-मंतर पर किसी युवती के मुँह से निकले वही शब्द, जो वर्षों से पुरुष छात्रावासों, पुलिस थानों, शराब की मेज़ों और राजनीतिक गलियारों में घूमते रहे, अचानक समाज को इसलिए अधिक अश्लील क्यों दिखाई देते हैं कि अब उसका उच्चारण स्त्री-कंठ ने किया? यह प्रश्न गाली से अधिक हमारी सुनने की आदत को नग्न करता है. पुरुष का मुँह मानो सदियों से सार्वजनिक शौचालय था, वहाँ लिखी भाषा पर किसी ने परदा नहीं डाला; स्त्री का कंठ बैठक का फूलदान था, उसमें सुगंध अपेक्षित थी. उसने जैसे ही भीतर का कच्चा ताप बाहर फेंका, संस्कारों की प्रहरी-सेनाएँ जाग उठीं. और उन्होंने उस युवती के चेहरे पर स्याही फेंकी, जो अपनी श्लील, शालीन और सौम्य भाषा में वैचारिक ताप वाले भाषण देकर विख्यात हो गई थी. इससे पता चलता है कि दिक्कत अश्लील शब्दों से नहीं, उस प्रहार से थी, जिसने सत्ता की सबसे दु:खती रगों को भीतर ही भीतर लहूलुहान किया. इस पीढ़ी की सांस्कृतिक बेचैनी इसी कारण इतनी आकर्षक और इतनी संदिग्ध है. वह उस इतिहास के बाद आई है, जिसमें स्त्री को सुंदर होना था, इच्छुक नहीं; पुरुष को इच्छुक होना था, कोमल नहीं; क्वीयर मनुष्य को अस्तित्व रखना था, नाम नहीं. अब नाम बढ़ गए हैं, संबंधों की अवस्थाओं के नए शब्द हैं, सीमाओं, सहमतियों और भावनात्मक उपलब्धता के लिए नए मुहावरे हैं; भाषा ने उन अनुभवों के लिए खिड़कियाँ काटी हैं, जिन्हें पुराने घर की वास्तुकला पहचानती ही नहीं थी.

31.
यदि लड़की अपनी इच्छाओं को आवाज़ देती है; क्योंकि वह सचमुच उसकी हैं, वह मुक्ति है; यदि उसे “बोल्ड” दिखते रहने के लिए लगातार अपने शरीर को बाज़ार की रोशनी में रखना पड़ता है तो पुराना पहरेदार केवल कपड़े बदल चुका है. यही कारण है कि आधुनिकता को कम कपड़ों, अधिक गालियों या अधिक ग्राफिक गीतों से नहीं मापा जा सकता.
आधुनिक चेतना वहाँ शुरू होती है, जहाँ मनुष्य अपने सुख का स्वामी होते हुए दूसरे के सुख, भय, असहमति और गरिमा का भी नागरिक बन सके. जेन-ज़ी के सामने यही कठिन परीक्षा है: वह सेक्स को बोलने योग्य बना चुकी; अब क्या वह उसकी भाषा को बराबरी, सहमति, कोमलता और जिम्मेदारी से भर सकेगी? स्रोत में यही निर्णायक भेद उभरता है. खुलापन अपने आप मुक्ति नहीं; मुक्ति, बाज़ारीकरण और अनुकरण एक ही डिजिटल देह में साथ-साथ चल सकते हैं.
दरअसल, डिजिटल युग के नव क्रोनी कॉर्पोरेट पूँजीवाद ने युवा स्त्री से एक नया अनुबंध कर लिया है. वह उसे स्वतंत्र होने का निमंत्रण देता है; लेकिन स्वतंत्रता की भाषा उसने उसके लिए पहले से तैयार कर रखी है. वह कहता है: बोल्ड बनो, दृश्य बनो, अपनी देह पर अधिकार जताओ; और उसी क्षण बाज़ार उसकी देह के लिए वस्त्र, सौंदर्य, आकृति, मुद्रा और प्रदर्शन का एक पूरा व्याकरण तैयार कर चुका है. यहाँ स्त्री को पर्दे से बाहर निकाला जा रहा है, पर प्रकाश का स्विच उसके हाथ में नहीं है. पितृसत्ता कहती थी ढँको; और यह दुश्चरित्र बाज़ार कहता है दिखाओ. सब कुछ दिखाओ. दोनों की भाषा अलग है; लेकिन प्रश्न वही है कि निर्णय किसका है? सच कहा जाए तो यहाँ मुक्तिबोध की वह काव्योक्ति सटीक है, जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि क्रॉनी कैपिटलिज़्म के लिए जो अन्न है, स्त्री चेतना के लिए वही विष है.
और क्रोनी कॉर्पोरेट पूँजीवाद की दुर्मनस्कता यहीं पूरी होती है. वह स्वयं पीछे हट जाता है. उसे भान है कि अब कठमुल्ला संस्कृतियाँ स्त्री की दृश्य स्वतंत्रता पर हमला करने से नहीं चूकेंगी तो वही बाज़ार स्त्री-स्वातंत्र्य की रक्षा का नैतिक भार प्रगतिशील, वामपंथी और नारीवादी शक्तियों पर छोड़ देता है. वे सही ही स्त्री की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ी होती हैं; लेकिन वे अनजाने में उस बाज़ार-संरचना की भी रक्षा करने लगती हैं, जिसने स्वतंत्रता को दृश्यता और दृश्यता को उपभोग में बदल दिया है. और इस लुच्चई परिस्थिति को पैदा करने वाली बाज़ार की शक्तियाँ नई जुलबाज़ियों में जुट जाती हैं.
विडंबना यह है कि पिंजरा अब पारदर्शी है, रोशनी बहुत सुंदर है और स्त्री को बताया गया है कि यही निस्सीम नभ है, जिसमें वह अपनी कामनाओं की नई-नई उड़ाने भर सकती है.
32.
इस आंदोलन के बाद हमारे सामने वह सत्ता है, जिसकी भाषा आश्चर्यजनक रूप से साफ़ है. कितनी सुंदर, धुली हुई, इस्तरी की हुई भाषा! जेन-ज़ी से रूबरू होती हुई; लेकिन उसी मंच के पीछे सबसे ज़हीन और अश्लीलता से कोसों दूर युवा स्त्री के चेहरे पर स्याही फेंकती हुई. उसमें कहीं रक्त नहीं, कहीं पुलिस नहीं, कहीं लाठी-डंडा-आंसू गैस या गोली नहीं.
सभ्य शब्दों का सबसे बड़ा कौशल यही है कि वे कभी-कभी मनुष्य के दुःख को बिना आवाज़ किए निगल लेते हैं. उनके होंठों पर शिष्टता रहती है और पेट में किसी की बर्बाद उम्र. तब सामने खड़ा युवा एक ऐसा शब्द बोलता है, जिसे सभ्यता अश्लील कहती है. इसीलिए प्रश्न यह नहीं कि अश्लील भाषा पवित्र है. प्रश्न यह है कि यदि शिष्ट भाषा लगातार वास्तविकता को ढँकने लगे तो सत्य अपने साँस किस नासापुट से बाहर निकाले? कभी वह आँकड़ा बनेगा, कभी कविता, कभी व्यंग्य, कभी मीम, कभी नारा और कभी वह इतनी असभ्य ध्वनि में आएगा कि हम उसकी भाषा पर मुक़दमा चलाने लगेंगे और उस कारण को भूल जाएँगे जिसने उसके कंठ और जिह्वा को जलाया था.
33.
शब्दों के इस लंबे, उष्ण और कभी-कभी असुविधाजनक संसर्ग और विवेचन के बाद हमें गाली के बारे में कोई अंतिम फ़ैसला सुनाने की आवश्यकता नहीं. भाषा अदालत और शब्द कठघरे में खड़े अभियुक्त नहीं. गाली को देवता बना देना उतनी ही बौद्धिक अकर्मण्यता है, जितना उसे नाली में फेंक देना. वह मनुष्य की तरह ही संदिग्ध, कामनाग्रस्त, घायल और इतिहास से दूषित है. उसकी देह पर सदियों के स्पर्श हैं. कुछ प्रेम के, कुछ हिंसा के, कुछ सत्ता के नाख़ूनों के. उसमें हँसी भी रहती है, वासना भी; पराजय की कड़वाहट भी और विद्रोह की वह गर्म साँस भी, जो कभी-कभी सभ्यता के बंद दरवाज़ों के नीचे से धुएँ की तरह बाहर आती है.
लेकिन यही वह जगह है जहाँ भाषिक विवेकशीलता को भाषा के रोमांच से अलग खड़ा होना चाहिए. हर निषिद्ध शब्द मुक्तिकामी नहीं होता और हर अश्लीलता विद्रोह नहीं होती. जिस समाज ने स्त्री की देह को सदियों तक परिवार की इज़्ज़त, जाति की सीमा, धर्म की चौकी और पुरुष के स्वामित्व की ज़मीन की तरह इस्तेमाल किया हो, उस समाज की गालियों में भी वही भूगोल लौटता है. माँ, बहन, बेटी, योनि …ये अचानक क्रोध में पैदा हुए शब्द नहीं हैं; इनके पीछे एक पूरा पितृसत्तात्मक अभिलेखागार है. वे लोग जो सत्ता के असत्य, प्रशासनिक क्रूरता, सांप्रदायिक संकेतों, बेरोज़गारी के सांख्यिकीय शृंगार और संस्थागत अन्याय को अत्यंत शिष्ट हिन्दी या निर्विकार अंगरेज़ी में व्यक्त करते हैं, अचानक सड़क पर निकले युवक या युवती के मुँह से कोई निषिद्ध शब्द सुनकर भाषा की मर्यादा के पुरोहित बन जाते हैं. मानो नैतिकता का निवास केवल शब्दकोश में हो. मानो सभ्य वाक्य अपराध को निष्पाप कर देता हो. पर शब्द की शालीनता और कर्म की नैतिकता एक ही चीज़ नहीं हैं.
एक शासन अत्यंत संसदीय वाक्य में नागरिक की स्वतंत्रता कम कर सकता है. एक अधिकारी बिल्कुल निष्कलंक सरकारी भाषा में किसी अन्याय को “प्रक्रियात्मक आवश्यकता” बता सकता है. एक निगम नदी को विषाक्त करके प्रेस विज्ञप्ति में उसे “विकास” लिख सकता है. किसी युद्ध में बच्चों की मृत्यु को “कोलैटरल डैमेज” कहा जा सकता है. भाषा ने सदियों से हिंसा के चेहरे पर पाउडर लगाया है. तो प्रश्न केवल यह नहीं है कि सड़क पर खड़ा युवक या युवती कौन-सा शब्द बोल रहे हैं. बड़ा प्रश्न यह भी है कि वातानुकूलित कमरों में बैठे शक्तिशाली लोग किन सभ्य शब्दों से असभ्य वास्तविकताओं को ढँक रहे हैं. आज हमें ऐसी भाषा चाहिए जिसकी कामना पर किसी पुरोहित का पहरा न हो; लेकिन जिसकी कामना दूसरे शरीर पर स्वामित्व भी न माँगे. ऐसी भाषा, जिसमें स्त्री अपनी इच्छा को स्वयं नाम दे सके, खासकर पुरुष की कल्पना में बने अपने शरीर से बाहर निकलकर. ऐसी भाषा, जिसमें देह पाप नहीं हो, पर हथियार भी न हो; योनि अपमान नहीं, जीवन का जीवित भूगोल हो; स्त्री की कामना किसी पुरुष के पुरुषत्व का उपांग नहीं, अपने आप में सम्पूर्ण सत्ता हो. उसकी ज़िंदगी की कोख में एक नया इस्पात लेकर एक नई चेतना जन्म ले रही है, जिसकी प्रतिध्वनियां अब नए वैप में सुनाई दे रही हैं.
34.
दरअसल, मुक्त भाषा वह नहीं, जिसमें पुरुष को स्त्री की देह के बारे में कुछ भी कहने की छूट हो. मुक्त भाषा वह है, जिसमें स्त्री अपनी देह के अर्थ पर पुरुष के सदियों पुराने एकाधिकार को समाप्त कर सके. इसलिए हमें किसी नई शुचिता की आवश्यकता नहीं. शुचिता का इतिहास भी कम हिंसक नहीं रहा. उसने स्त्रियों को ढका, इच्छाओं को अपराध बनाया, प्रेम को जातियों में बाँटा और शरीर को धर्मों की सीमा-रेखा बना दिया. आवश्यकता शायद एक अधिक विवेकशील अशुचिता की है. ऐसी अशुचिता जो जीवन की मिट्टी स्वीकार करती हो, मगर मनुष्य की गरिमा को कीचड़ न बनाए.
हमें ऐसा क्रोध चाहिए जो अपनी आग बचाए, लेकिन यह भी जानता रहे कि उसकी लपट किस शरीर तक पहुँच रही है. ऐसी कामना चाहिए, जो साहसी हो लेकिन उपनिवेशवादी नहीं, जिसमें त्वचा त्वचा से मिले, सत्ता सत्ता पर न चढ़े. ऐसा हास्य चाहिए जो सिंहासन के पाए काट दे, लेकिन किसी दलित, स्त्री, क्वीयर, विकलांग या कमज़ोर मनुष्य के चेहरे को तमाशा न बनाए. और यदि गाली बचानी ही है तो ऐसी गाली बचाई जाए जो ऊपर की ओर वार करे; जो सत्ता के कपड़े फाड़े, सत्य के नहीं; जो पाखंड को निर्वस्त्र करे, स्त्री को नहीं.
35.
लोकतंत्र की भाषा को शायद अंततः यही सीखना है : अश्लीलता शब्दों में कम, मनुष्य को वस्तु बना देने की अभिलाषा में अधिक होती है. और इसीलिए किसी आंदोलन की नैतिक ऊँचाई इस बात से तय नहीं होगी कि उसके प्रदर्शनकारी कितने संस्कारी शब्द बोलते हैं. वह इससे तय होगी कि उनके शब्द किसके विरुद्ध उठते हैं और किसकी गरिमा बचाते हैं. सड़क की भाषा को संसद की भाषा जितना ही संदेह का लाभ मिलना चाहिए और संसद की भाषा की भी सड़क की भाषा जितनी ही कठोर नैतिक जाँच होनी चाहिए. क्योंकि संभव है कि किसी दिन इतिहास यह पाए कि सबसे अश्लील वाक्य वह नहीं था, जो किसी क्रुद्ध युवती ने जंतर-मंतर पर बैरिकेड के सामने चिल्लाकर बोला था. सबसे अश्लील वाक्य वह था, जो सत्ता ने पूरी शालीनता, सही व्याकरण और प्रेस-विज्ञप्ति के उत्तम काग़ज़ पर लिखा और लोकसमाज के संचित धन से मीडिया में पैसा देकर छपवाया और प्रचारित करवाया था और वह एकदम झूठ था.
आंदोलनों के पुराने-धुराने अजीब से रास्ते के मोड़ पर अब जब सत्ता और क्रॉनी-कैपिटलिज्म 34+35 का गणित बिठा रहे हैं, तब आबोहवा कालिदास के मूलशब्दों की आम्रमंजरी से नहीं, जेन-ज़ी की उस नई भाषा से ही महकेगी, जो अपने द्युतिमान मुख की ध्वनियों से यथास्थितिवादी के अतल तिमिर में रोशनी के बुलबुले उठा रही है.
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thetribhuvan@gmail.com |

भारत–पाक सीमा के एक गाँव में जन्मे त्रिभुवन जयपुर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वे हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर रह चुके हैं. उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं, कुछ इस तरह आना,’ शूद्र: एक लंबी कविता,’ और राष्ट्रवाद के नवपरिप्रेक्ष्य .’ त्रिभुवन अपने सूक्ष्म राजनीतिक विश्लेषण, संयमित भाषा और गहन पठनशीलता के लिए जाने जाते हैं. जयपुर में रहते हैं.


आज संस्कारशील लोग जिन शब्दों को अश्लील कहते हैं, वे सच में अश्लील तो क्या, थोड़ी सी यौन ऊष्मा वाले भी नहीं. वे एक तरह से फ्यूज़ वर्ड् हैं. उनमें अर्थ है ही नहीं. खोखले हैं.
शब्द अश्लील ही थे. उन कानों के लिए भी, जिन्होंने उसे जीवन में जाने कितनी ही बार सुना और तत्काल नैतिक रूमाल नाक पर रख लिया. शब्द अश्लील थे; लेकिन फ़्यूज़ थे. मूल अर्थों को खो इन शब्दों को अख़बार संपादित कर देते हैं, टेलीविज़न बीप में बदल देता है, परिवार भ्रकुटियाँ तानता है और अदालत “आपत्तिजनक अभिव्यक्ति” कहती है. लेकिन अचानक आंदोलन जो कामयाब होकर घर लौट आया था, अचानक शब्द अपनी अश्लील नग्नता में समाचार बन गए.
जंतर-मंतर की भाषा में एक साहसिकता थी; क्योंकि उसमें अनुमति माँगने, शासकीय बल से डरने और प्रशासकीय कालुष्य का बोध नहीं था. वह नई थी; क्योंकि वह भाषण, नारा, मीम, संगीत, कपड़ा, अभिनय और कैमरे को एक ही राजनीतिक वाक्य में मिला रही थी. वह लोकतांत्रिक थी; क्योंकि कोई अकेला नेता उसकी पूरी भाषा का स्वामी नहीं था. लेकिन वह विरासत से पूर्णतः मुक्त नहीं थी.
किसी आंदोलन की नैतिक ऊँचाई इस बात से तय नहीं होगी कि उसके प्रदर्शनकारी कितने संस्कारी शब्द बोलते हैं. वह इससे तय होगी कि उनके शब्द किसके विरुद्ध उठते हैं और किसकी गरिमा बचाते हैं. सड़क की भाषा को संसद की भाषा जितना ही संदेह का लाभ मिलना चाहिए और संसद की भाषा की भी सड़क की भाषा जितनी ही कठोर नैतिक जाँच होनी चाहिए.
यदि गाली बचानी ही है तो ऐसी गाली बचाई जाए जो ऊपर की ओर वार करे; जो सत्ता के कपड़े फाड़े, सत्य के नहीं; जो पाखंड को निर्वस्त्र करे, स्त्री को नहीं.
इस आंदोलन के बाद हमारे सामने वह सत्ता है, जिसकी भाषा आश्चर्यजनक रूप से साफ़ है. कितनी सुंदर, धुली हुई, इस्तरी की हुई भाषा! जेन-ज़ी से रूबरू होती हुई; लेकिन उसी मंच के पीछे सबसे ज़हीन और अश्लीलता से कोसों दूर युवा स्त्री के चेहरे पर स्याही फेंकती हुई. उसमें कहीं रक्त नहीं, कहीं पुलिस नहीं, कहीं लाठी-डंडा-आंसू गैस या गोली नहीं.
किसान आंदोलन हो या शाहीन बाग, महिला पहलवानों का आंदोलन हो या अग्निवीरों का, वे सब बुरी तरह कुचले गए; क्योंकि वे सत्ता को दुष्ट बता रहे थे, जो कि वह होती ही है. इसलिए कई बार वह उस सच को बोलना प्रभावशाली नहीं रहता, जो लोकसमाज में रचा-बसा है. जेन-ज़ी की राजनीति की शक्ति यहीं दिखाई देती है. उसने सत्ता को केवल दुष्ट नहीं, बार-बार हास्यास्पद साबित किया. छवि-निर्माण पर टिकी राजनीति के लिए यह विशेष रूप से असुविधाजनक प्रहार था. इसमें एक सच यह भी है कि जंतर-मंतर के आंदोलन को तो दिखाने से रोका जा सकता है; लेकिन डिजिटल युग का जंतर-मंतर तो एक जगह भर नहीं, वह आवृत्तियों और पुनरावृत्तियों की एक सतत और अविरल प्रक्रिया है. पहले गाली या नारे मुँह से कान तक जाते थे, अब एल्गोरिदम उसे अनंत बार इस तरह घटित करता है…। कितना कुछ बेहतरीन और उल्लेखनीय है इस लेख में।
शानदार और धरोहर लेख । इसके लिए त्रिभुवन जी का बहुत आभार।
हिन्दी में अपने ढंग का सर्वथा महत्वपूर्ण लेख। जिज्ञासा से शुरू हो कर, सोच,फ़िक्र, चिंतन, सुकून पर ख़त्म हुआ।
लेखक त्रिभुवन, अरूण देव, समालोचन का शुक्रिया।
इसे पढ़ कर निजी संग्रह की किताब, How To Swear, Stephen Wildish, Khushwant Singh के संपादन में। अल्पावधि के लिए निकली पत्रिका, New Delhi में प्रकाशित Swear Words in Shakespeare, उर्दू के एक लोक प्रचलित शेर, ” कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब, गालियाँ खा के भी बेमज़ा न हुआ”। या ग़ालिब के लिए तो ,तू, लफ़्ज़ भी , अभद्र , तहज़ीब के खिलाफ़ था। फरमाते हैं ” जो तुम हर बात में।कहते हो कि तू क्या है?,। तुम्हीं। कहो ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है”
बहरहाल मैंने भी अपने एक छात्र,कक्षा १२, को जब उसके IB परीक्षा में Extended Essay के लिए, गालिओं galiyon के समाजशास्त्र,पर शोध लेख करवाया तो सबसे ज़्यादा हिंदी विभाग, हिन्दी संस्कृत अध्यापकों ने आपत्ति की। जबकि वही सबसे अभद्र, फूहड़ भाषा का बर्ताव करते हैं।
लेख के पुनः आभार।
त्रिभुवन जी को पढ़ते हुए अक्सर लगता है कि किसी विषय पर कुछ निर्णायक कहने या लिखने से पहले उसमें इतनी गहराई तक उतरने की कूवत और धैर्य होना चाहिए। ऐसा लम्बा-फॉर्म लेखन, ऐसा immersive engagement, जीवन और अपने समय को समझने का ऐसा श्रमसाध्य और ईमानदार आग्रह ही है, जिसे हम संवाद-उत्सव और देहरी में बार-बार करने की सफल-असफल कोशिश करते रहते हैं।
इस लेख को पढ़ते हुए बार-बार लगा कि विषय के साथ न्याय शायद इसी को कहते हैं। किसी भी विचार की सार्थकता और उसकी दीर्घकालिक संभावना इसी तरह की गहरी संलग्नता से पुष्ट होती है। शायद ऐसी ही ईमानदार और धैर्यपूर्ण संलग्नता अंततः इस दुनिया को थोड़ा बेहतर समझने, सहेजने और बचाए रखने की संभावना पैदा करती है।
इस लेख को समय लेकर, इत्मीनान से पढ़िए। तभी आपके भीतर का पाठक इसके साथ पूरा न्याय कर पाएगा। पढ़ते हुए कुछ जगह आप असहज भी हो सकते हैं, लेकिन शायद ऐसे काम में असहजता से गुज़रना ही वरेण्य है।
बहुत खींचा गया , बहुत गाढ़ा , अच्छा लेख ……
गाली पर सुंदर विवेचना पूर्ण लेख!
मेरी किशोरावस्था मालवा (मंदसौर व प्रतापगढ़) में बीती। होलिका दहन के अवसर पर शिष्ट लोग प्रेम पूर्वक जो गालियां सरेआम दिया करते थे उनकी तुलना में जंतर-मंतर की गालियां तो शुभाषित प्रतीत होती हैं।
यदि यह पहले ही तय कर लिया गया कि कालिदास की विद्योत्मा के सामने उठाई गई दो उंगलियां द्वैत अद्वैत से संबंध रखती हैं, तो फिर सब जायज है।
यदि सत्ता के विरोध में यह कामयाब नुस्खा है तो फिर तो हर, गली,गांव,नगर को इसी तरीके से विभूषित किया जा सकता है.
बाकी आप बड़े लोग हैं, आप जो कहें, करें वह सब उचित भी है और सही भी.
त्रिभुवन जी और अरुण देव जी समालोचन के माध्यम से आप हिन्दी को कैसे समृद्ध कर रहे हैं यह आलेख इसकी बड़ी मिसाल है। इस विषय पर ऐसा ठहराव भरा चिंतन अन्यत्र नहीं पढ़ा। बहुत आभार और शुभकामनाएं।
गाली की भाषा वैज्ञानिक, सामाजिक, राजनीतिक, संकेत शास्त्रीय दृष्टि से अद्भुत विश्लेषणात्मक आलेख। त्रिभुवन जी को श्रमसाध्य एवं दृष्टिसंपन्न आलेख के लिए और समालोचन को हम तक पहुँचाने के लिए बहुत बधाई
हिंदी में तमाम एकनिष्ठ गलियों में गाली जैसी नैसर्गिक चीज़ पर न्यायास्पद बात होनी चाहिए। इस दिशा में ये एक भगीरथ प्रयास है।
‘निषेध’ जैसे सार्वदिशिक शब्द का प्रयोग कैसे अपने पक्ष में किया जा सकता है, यह हर समय के नागरिकों को समझना चाहिए।
जिस नस्ल को यह सिस्टम ‘जेन ज़ी’ (Gen Z) कहकर वर्गों में बांट रहा था, उसने साबित कर दिया कि इसकी प्रकीर्ति पारंपरिक नेताओं की गिरफ्त से बाहर है। वैश्विक स्तर पर हमने देखा है कि थाईलैंड के ‘मिल्क टी अलायंस’ (Milk Tea Alliance) से लेकर हांगकांग की छत्रीधारक आंदोलन तक, युवाओं ने हमेशा सत्ता की भाषा को तमाशा बनाया है। जंतरमंतर में भी यही हुआ; जब राज्य ने उन्हें ‘कॉकरोच’ और ‘आवारा’ कहा, तो उन्होंने इस अपमान को ही अपना आभूषण बना लिया। उनका वस्त्र, उनकी टूटी-फूटी लेकिन जीवंत अंग्रेजी, और उनके व्यंग्य का वह ‘निर्दय संक्षेप’ ऐसा था जिसने नैतिकता के इन भारी-भरकम समाधियों को हिला कर रख दिया जहां बैठकर प्रधानमंत्री कभी किसी की माँ और पत्नी को ‘जर्सी गाय’ या ‘पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड’ कहकर ठहाके लगाते थे। आज वही इस नस्ल की भाषा पर इसीलिए कठोर हैं क्योंकि यह भाषा अब उनके अपने विरोधाभासों का पोस्टमार्टम कर रही है।
सबसे ज्यादा हंगामा उन लड़कियों पर मचाया जा रहा है जिन्होंने पुरुष वर्चस्व के इस आखिरी किले को भी फतह कर लिया है जिसे ‘भाषा की कठोरता’ कहा जाता था। अब तक गाली का कॉपीराइट सिर्फ पुरुषों के पास था, जो मां और बहन की इज़्जत को भाषा की नोक पर रखकर अपनी मर्दानगी साबित करते थे। इस विरोध ने हवा की इस प्रदूषण को साफ करने की शुरुआत की है। ये लड़कियाँ अब इस ‘साइलेंसर’ को तोड़ रही हैं जो सदियों से उनके होंठों पर सजा था। अगर आने वाले दिनों में यह पीढ़ी माँ, बहन और बेटी के बजाय पिता, भाई और बेटे के हवाले से नई गालियाँ ईजाद कर ले, तो इस पर हैरानी के बजाय उन पुरुषों को अपना गिरेबान झाँकना चाहिए जिन्होंने सदियों तक भाषा को महिला की तिरस्कार का औजार बनाए रखा।
त्रिभुवन जी का यह आलेख लघु शोध प्रबंध की तरह भी देखा जा सकता है। उनकी भाषा, शैली और यथास्थान संदर्भों को विन्यस्त करने का कौशल इसे नई आभा देता है। विस्तार इसकी ताक़त है और मुश्किल भी लेकिन पठनीयता इसे सँभाल लेती है। ऐसे भाषिक, लोकधर्मी, सामाजिक विषयों पर लिखना एक लंबी अध्ययनशीलता, स्प्ष्ट विचार दृष्टि और सर्जनात्मक तार्किकता के मेल से ही संभव होते हैं इसलिए इनका एक दुर्लभ मूल्य है। और यह राजनीतिक पक्षों से किनारा नहीं करता बल्कि उन्हें समकालीन अर्थों में परीक्षित और परिभाषित करता है। समालोचन में यह सब घट रहा है, सुखद है। त्रिभुवन जी को बधाई और आगामी लेखन के लिए शुभकामनाएँ।
बहुत ही सारगर्भित और संयमित लिक्खा इन्होंने… 👌🌸🌸… वर्ना ये भाव प्रवणता में बह जाने वाला विषय है… इस तरफ़ का भी और उस तरफ़ का भी… ये इतना subjective issue है कि इसकी कोई थाह नहीं….🙃🙂😇😇 …
ख़ैर… पर एक बात तो है, हमने कुच्छ तो अच्छे कर्म किए ही हैं एक अभिभावक, एक माँ-पिता के तौर पर कि इस पीढ़ी aka Gen Z, जो एक बेफ़िक्र, बेलौस, मस्तमौला पीढ़ी है… इसने हज़ारों सालों/सदियों से चली आ रही स्त्री के मानसिक शोषण के लिए बनाई गई गालियों को irrelevant कर दिया…. पुरुष समाज का वो toxic entitlement नगण्य कर दिया कि “हम जब चाहें तुम्हें देवी की तरह पूज लें और जब चाहें वैश्या करार कर दें”… इन बच्चों के लिए, ख़ास तौर पर लड़कियों के लिए देवी कहलाना जितना हास्यापद और गौण शब्द/भाव है, उतना ही वैश्या और इस जैसे और कई घृणित शब्द भी… इनकी पीढ़ी में बोलनेवाले भी हंसते हैं, सुनने वाले भी…😄😄 …
जन्तर मन्तर पर जो हुआ, उसने यही बताया कि जो लड़के-लड़कियां साथ बैठ कर गालियां देते हैं समता में, वही समय आने पर एक दूसरे को protect भी करते हैं… अनजान लड़के मज़बूती से, प्यारी, अनजानी लड़कियों के लिए, उनके आगे आ कर लाठियां खा रहे और प्यारी, बेख़ौफ़ लड़कियां, पुलिस की बर्बरता से बचाने को, लड़कों पर ख़ुद की उझली जा रहीं… क्या ख़ूबसूरत मंज़र रहा वो… असली gender equality तो यही है… असल gender uniqueness तो यही है जो इन बच्चों ने सिखाया हम बड़ों को… इन्होंने नया इतिहास लिख दिया… इन्होंने सदियों की सड़ी-गली मानसिकता को, अपने meme, reels, फूल, पुलिस प्रशासन के गुरूर की धज्जियाँ उड़ाते “पुलिस अंकल” के संबोधनों और cut throat dark humor से नेस्तनाबूद कर दिया… बिना खड़ग,बिना ढाल…. और ग़ज़ब की बात ये रही कि इन्हीं गालियों के बीचोबीच level 1 के OG player (साबरमती के संत 🙌🙌) को ले आए वापस…पूरी तरह से सालों की असहिष्णुता, हिंसा और बर्बरता को धत्ता बताते….मैं तो हैरान हूं… कहाँ से लाए ये उछलते-कूदते, happy go lucky बच्चे ख़ुद में इतना depth, इतनी गहराई… 🫣🥰🫠🫠 …
हम बोहोत ही भाग्यशाली रहे कि हमने इस ख़ूबसूरत भविष्य वाले भारत की ये तस्वीर, ख़ुद जा कर देखी… महसूस की… जी कर आए…
धार्मिक जगहों पर स्त्री के शरीर के साथ की गई छेड़छाड़ को क्या करारा जवाब दिया, क्या औंधे मुह गिरा दिया इन बच्चों ने… देह से देह टकरा रही थी वहाँ पर मजाल कि एक ग़लत touch हुआ हो… 🫰🫰🫶🫶 …
बुराई के ख़िलाफ़ बग़ावत के इस आगाज़ का अनुभव MIND BLOWINGGGG था… Bhaisaabbbb…..😇😇😇 …. शायद ऐसा मंज़र फिर repeat हो, पर ऐसा पहला, अद्भुत, अनोखा, अद्वितीय, अनुभव फिर नहीं होगा….🌸🌸 …
हमें तो यूं लगा वहाँ जा कर की दुनिया के इस समंदर में हमने ‘अपने बूंद बराबर अस्तित्व’ को समंदर बना लिया… हमने अपने जीवन का एक अनोखा इतिहास रच दिया, इन बच्चों के साथ खड़े हो कर…. 🙃🙂😇😇🫠🫠🥰🥰🌸🌸❤️
हिंदी अकादमिक परिसर के बाहर से त्रिभुवन जी आते हैं, और खुली दृष्टि रखते हैं, तर्क या विचार को एकपक्षीय नहीं होने देते. जेन जी पर उनका यह दूसरा लेख है….मुझे नहीं लगता कि इतना बढ़िया विश्लेषण अन्यत्र कहीं देखने को मिला….हमें त्रिभुवन जी जैसे कई लेखक और पत्रकार चाहिए जिससे हिंदी का भविष्य उज्ज्वल हो, सितंबर शुरू होनेवाला है सरकारी विलाप शुरू होनेवाला ही है…. अरुण जी समालोचन के परिसर को उन्मुक्त और जनतांत्रिक बनाये हुए हैं, यह बड़ी बात है….
त्रिभुवन ने इस परिघटना के सभी पहलुओं को विश्लेषणात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। महिला सशक्तिकरण की प्रशिक्षण कार्यशालाओं में गालियों पर सत्र हुआ करते थे। इनमें पुरुष और महिलाओं द्वारा दी जाने वाली गालियों को वर्गीकृत करके बताया जाता था कि पितृसत्ता किस तरह महिलाओं को गालियों का ऑब्जेक्ट बनाती है। यह भी कि महिलाओं द्वारा प्रयुक्त गालियों के मनोविज्ञान पर चर्चा की जाती थी। यह इसलिए कह रहा हूं कि पता नहीं ये सत्र अब महिला सशक्तिकरण प्रशिक्षणों का हिस्सा हैं या नहीं। गालियां आक्रोश से भी जुड़ी रही हैं। बाबा नागार्जुन की हर गंगे और मंत्र कविता की शब्दावली और भंगिमा नितांत भिन्न है। अकविता में प्रयुक्त इस तरह की भाषा पर मैं ने अन्यत्र लिखा है जिसका सार दशकों से दमित यौन कुंठाओं की अभिव्यक्ति है। ऐसे विश्लेषण महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं जिसके लिए त्रिभुवन और समालोचन बधाई के स्वाभाविक हकदार हैं।
त्रिभुवन जी का यह लेख पढ़ते हुए लगा कि भाषा को केवल अभिव्यक्ति नहीं बल्कि अपने समय की मानसिकता को समझने का माध्यम भी बनाया जा सकता है। जिस विषय को हम सहज रूप से नैतिकता के खाँचों में रखकर देख लेते हैं उसके भीतर के सामाजिक अर्थों और अंतर्विरोधों को लेखक ने धैर्य से टटोला है। लेख की सबसे बड़ी खूबी यही लगी कि यह किसी आसान निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता बल्कि पढ़ने वाले को भी अपने पूर्वग्रहों के साथ दोबारा सोचने के लिए छोड़ देता है। भाषा, समाज और राजनीति के परस्पर संबंधों पर गंभीरता से सोचने वाला महत्वपूर्ण लेख।
बहुत बहुत बधाई! यह लेख अपने आप में एक थीसिस है, खासकर ‘जंतर-मंतर की अश्लील भाषा’ के बहाने स्त्री-पुरुष और नयी-पुरानी पीढ़ियों के विचार-व्यवहार के जैविक-रासायनिक-मनोवैज्ञानिक आयामों को समझने-समझाने की दृष्टि से. बाउम्मीद आपकी सहमति मैंने इसे अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर क्या है.इस लेख को पढ़ना ज़रूरी है ताकि हाल ही हुए ‘जेन-जी के जंतर-मंतर’ आन्दोलन के विचार और उसकी ‘भाषा’ को सही अर्थों में समझा जा सके. मैं यहाँ कुछ चयनित उद्धहरण देते हुए लेख को शेयर कर रहा हूँ.
‘गाली पाँच सौ शब्दों के अभियोग को पाँच अक्षरों में बंद करने की अद्भुत कला है.’
‘इसलिए “किस शब्द का प्रयोग हुआ?” से पहले पूछना चाहिए; किसने कहा? किससे कहा? कहाँ कहा? किस इतिहास के भीतर कहा? पुलिस उसके पीछे थी या सामने? उसके पास संस्थागत शक्ति थी या काँपता मोबाइल? वह शब्द नीचे से ऊपर फेंका गया था या ऊपर से नीचे? यह जानना इसलिए ज़रूरी है; क्योंकि शब्दों पर भी गुरुत्वाकर्षण लागू होता है.’
‘पुरुष की कठोर और अपमानकारी आवाज़ शौर्यपूर्ण या वीरोचित नेतृत्व कही गई; स्त्री की हिस्टीरिया. पुरुष की गाली आक्रामक व्यक्तित्व का चिह्न बनी; स्त्री की वही गाली संस्कार, परिवार और चरित्र का प्रमाणपत्र माँगने लगी. वास्तविक भाषिक मुक्ति तब होगी जब स्त्री पुरुषों की पुरानी गाली बोलने की समानता भर न पाए, अपितु अपमान की ऐसी नई भाषा रचे, जिसमें किसी दूसरी स्त्री की देह को रखे बिना भी सत्ता को घायल किया जा सके. यह कहना स्त्री के गाली देने के अधिकार को छीनना नहीं; उस अधिकार को अधिक सर्जनात्मक और क्रांतिकारी संभावना तक ले जाना है.’
‘यहीं “कॉकरोच” जैसे रूपक का राजनीतिक आकर्षण बनता है. किसी समूह को कीट कहना उसे अमानवीय बनाने की पुरानी तकनीक है. पहले मनुष्य को गंदगी, बीमारी या परजीवी कहा जाता है, फिर उसके साथ कम मनुष्य जैसा व्यवहार करना आसान हो जाता है. लेकिन जब संबोधित समूह स्वयं कह दे : हाँ, हम कॉकरोच हैं; तुम हमें कुचलना चाहते हो, फिर भी हम बच जाते हैं तो अपमान जीवट में बदल सकता है.’
‘क्रोध अंततः कहाँ जाए?’
समालोचन और Arun Dev जी, और Tribhuvan जी से मेरी यह अपेक्षा नहीं थी कि वे गाली की ऐसी सरस्वती वंदना कर सकते हैं! परिवार, बेडरूम,और गली नुक्कड़ की भाषा न तो एक समान रही है और रहेगी! हिन्दीजगत के DISCOURSE में, सभ्य समाज में हम वाणी को व्यक्ति और परिवेश का संस्कार कहते आये हैं! गाली सीधे तौर पर पितृसत्तात्मक उद्दंडता है और माँ, बेटी, बहन, पत्नी के प्रति घृणा की भाषा है! अगर साहित्य वाणी की अस्मिता का सृजन करता है, तो गाली के इस सौन्दर्यशास्त्र के आख्यान के लिए त्रिभुवन जी से अपनी असहमति दर्ज़ कराना चाहूंगा! आप संस्कृत के विद्वान हैं तो ‘ प्रचोदयात ‘ के अर्थ में” विवेक ‘ देख पाते, न कि चो…! पुनः मेरी पूर्ण असहमति है! काव्यभाषा के औजारों और कुतर्कों से रचित इस आख्यान को हिन्दी परंपरा अवश्य याद रखेगी!
इस विशद और गहन विश्लेषण को पढ़ना अपनी बौद्धिक समृद्धि को बढ़ाना भी है, बेशक। भाषा से होती हुई यह पड़ताल इतिहास, सामाजिक संगठन, संस्कृति, कलाओं, सर्जनात्मक चेष्टाओं , मानवीयता की जमीन पर खड़े जरूरी प्रतिरोधों को आंकती हुई एक ऐसा दस्तावेज बन जाती है जो हिंदी की साहित्यिक उपलब्धि तो है ही, वास्तविक लोकतांत्रिकता की तलाश के नवयुग के भारत-भूमि पर उदय का सावधान वीक्षण भी है। एक पाठक के रूप में आपके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का आनन्दावसर बार-बार आये!
गाली के दो पक्ष मुझे अत्यन्त महत्वपूर्ण लगते हैं । किसी अहंकारी बलवान के लिए यह वह अस्त्र है जिसे वह बड़ी बेरहमी से सब पर चलाता है । किसी निर्बल और असहाय व्यक्ति के लिए यह वह एक मात्र साधन है जिसका प्रयोग वह अपनी गहरी व्यथा को अभिव्यक्त करने के लिए करता है ।
इतना समृद्ध, सुंदर और तर्काश्रित निबंध मैंने पहली बार पढ़ा है जिसके संदर्भों की विपुलता ने भाषिक संसार की एक नई व्याख्या की है।इसका ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और अधुनातम आख्यान हमारे समय को जितनी अर्थवत्ता के साथ व्यक्त करता है, वह अद्वितीय है।बल्कि इसे निबंध के बजाए मैं प्रबंध कहना चाहूँगा।इस प्रबंध का अपना शब्दकोष है जिसमें पारंपरिक के साथ आज की तकनीकी भाषा के निहितार्थ अपनी समूची अर्थसत्ता का निर्वचन करते हैं। मुझे खुशी है कि मैं इस त्रिभुवन से परिचित हूँ और अब मुरीद हूँ।जिम्मेदारों को चाहिए कि इस सांस्कृतिक प्रबंध का कम से कम सभी भारतीय भाषाओं में अनूदित करने-कराने की जुगत करें।वैसे इसे पढ़ने और समझने के लिए भी एक तमीज की जरूरत है, जिसे हिन्दी संसार दिन ब दिन छोड़ता जा रहा है।क्या कहूँ?