| एक रहस्यमयी चमत्कार होर्खे लुई बोर्खेस हिंदी अनुवाद : मनीष शर्मा |
ईश्वर ने उसे सौ वर्षों के लिए मृत छोड़ दिया और फिर उसे जीवित कर पूछा: “तुम यहाँ कितनी देर रहे?”
उसने उत्तर दिया: “एक दिन, या एक दिन का कुछ हिस्सा.”
— क़ुरान, II 261
14 मार्च 1939 की रात, प्राग के ज़ेल्टरनरगासे स्थित एक अपार्टमेंट में लेखक जारोमिर ह्लादिक ने एक ऐसे शतरंज के खेल का स्वप्न देखा, जो न जाने कब से चल रहा था और अब उबाऊ हो चुका था. जारोमिर ह्लादिक वही लेखक था, जिसने अधूरी त्रासदी “द एनिमीज़”, “विंडिकेशन ऑफ़ इटर्निटी” तथा याकॉब बोहेमे के अप्रत्यक्ष यहूदी स्रोतों पर एक अध्ययन की रचना की थी.
उस स्वप्न में शतरंज के खेल के प्रतिद्वंद्वी दो व्यक्ति नहीं, बल्कि दो महान और प्रसिद्ध परिवार थे. उनका यह संघर्ष कई शताब्दियों पूर्व आरंभ हुआ था. अब कोई उस भूले हुए इनाम के बारे में भी नहीं बता सकता था जो उसे जीतने पर मिलेगा, पर यह अपवाह जरुर थी कि वह बहुत अधिक था, शायद अनंत. शतरंज की बिसात और उसके मोहरे किसी गुप्त मीनार में सजे हुए थे. जारोमिर, अपने स्वप्न में, उन दो परिवारों में से एक का बड़ा पुत्र था. अगली चाल का समय आ चुका था— एक ऐसा क्षण जिसे टाला नहीं जा सकता था, सभी घड़ियाँ एक साथ बज उठीं. स्वप्न देखने वाला वर्षा से भीगे मरुस्थल की रेत पर दौड़ रहा था. उसे न तो शतरंज के मोहरे याद आ रहे थे, न ही उसके नियम.
इसी क्षण वह जाग गया. बारिश का शोर और भयावह घड़ियों की गूंज थम गई. उनकी जगह एक सुसंगत लय ने ले ली, जिसे ज़ेल्टरनरगासे से उठते फौजी आदेशों की आवाज़ें बीच-बीच में भंग कर रही थीं. सुबह हो चुकी थी और “थर्ड राइख”[1] की बख़्तरबंद टुकड़ियाँ प्राग में प्रवेश कर रही थीं.
19 मार्च को अधिकारियों के सामने जारोमिर ह्लादिक के विरुद्ध एक अभियोग प्रस्तुत किया गया, और उसी दिन सांझ होते-होते उसे गिरफ़्तार भी कर लिया गया. उसे मोल्दाउ नदी के दूसरी ओर एक साफ़-सुथरे, निर्जन, सफेद बैरक में ले जाया गया. गेस्टापो[2] द्वारा लगाए गए किसी भी आरोप का वह विरोध न कर सका. उसकी माँ का उपनाम जारोस्लाव्स्की था, जो मूलतः यहूदी थी. बोहेमे पर किया गया ह्लादिक का अध्ययन यहूदी प्रभावों से भरा पड़ा था, और उसने ऑस्ट्रिया का जर्मनी में विलय के विरोध में हुए अंतिम जनमत-संग्रह पर हस्ताक्षर भी किए थे.
1928 में उसने हर्मन बार्सडॉर्फ़ प्रकाशन के लिए “सेफ़र येज़िराह”[3] का अनुवाद किया था. व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए प्रकाशक ने अपने एक कैटलॉग में अनुवादक की ख्याति को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया. वही कैटलॉग जूलियस रोथे की नज़र में आ गया था. रोथे उन अधिकारियों में से एक था जिनके हाथों में अब ह्लादिक का भाग्य था. अधिकतर मनुष्य प्रायः अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र से बाहर सहज ही विश्वास कर बैठते हैं. इसी कारण उस कैटलॉग में गॉथिक लिपि में लिखे दो-तीन विशेषण ही रोथे के यह मानने के लिए पर्याप्त थे कि ह्लादिक बहुत ही महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है, और दूसरों के लिए एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए उसे मृत्युदंड दिया जाना चाहिए. फाँसी की तिथि 29 मार्च, प्रातः 9 बजे निर्धारित हुई. यह विलंब— जिसका महत्त्व आगे स्पष्ट होगा— अधिकारियों की उस प्रवृत्ति का परिणाम था, जिसके अंतर्गत वे ऐसे कार्यों को धीमे-धीमे और निर्लिप्त ढंग से संपन्न करना चाहते हैं, जैसे प्रकृति में ग्रह-नक्षत्र या पेड़-पौधे काम करते हैं.
इस सज़ा पर ह्लादिक की पहली प्रतिक्रिया केवल भय की थी. उसे लगता था कि फाँसी, गिलोटिन या चाकू से उसे उतना भय नहीं था; लेकिन गोलीबारी दस्ते के सामने मरना उसके लिए असहनीय था. वह बार-बार अपने को समझाने को कोशिश करता है कि मृत्यु की प्रक्रिया अपने आप में ही मूलतः भयावह है, न कि उसकी परिस्थितियाँ. फिर भी वह उन्हीं परिस्थितियों की कल्पना में उलझा रहता. वह एक पागल इंसान की तरह मृत्यु के हर संभावित रूप को अंत तक सोचता. अनिद्रा से भरी भोर से लेकर बंदूकों की रहस्यमयी गूँज तक, वह इस प्रक्रिया को असंख्य बार पहले ही जी चुका था.
जूलियस रोथे द्वारा निर्धारित सज़ा के दिन से पूर्व ही वह अपने भीतर सैकड़ों बार मर चुका था. ये काल्पनिक मृत्यु ऐसे आँगनों में घटित होती थीं, जिनके आकार और कोण मानो ज्यामिति के नियमों को चुनौती देते थे, और ऐसे सैनिकों के हाथों होती थीं, जिनकी संख्या हर बार बदल जाती थी और कभी वे निकट से गोली चलाते थे, तो कभी दूर से. इन काल्पनिक दृश्यों का सामना वह वास्तविक भय के साथ करता था, और शायद वास्तविक साहस से भी. प्रत्येक दृश्य कुछ ही क्षणों का होता था. एक चक्र पूरा होते ही वह फिर उसी काँपती हुई पूर्वसंध्या पर लौट आता. तब उसे यह भी ध्यान आता कि वास्तविकता प्रायः हमारी कल्पनाओं से भिन्न होती है.
एक विचित्र तर्क के सहारे उसने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि यदि किसी विशेष परिस्थिति की घटनाओं की कल्पना पहले ही कर ली जाए, तो वे घटित नहीं होतीं. इस कमज़ोर जादू में विश्वास के चलते वह ऐसे भयावह विवरणों की रचना करने लगा, कि मानो उन्हें पहले ही जी लेने से वे निष्प्रभावी हो जायेंगे. पर अंततः उसे भय होने लगा कि कहीं यही विवरण भविष्यवाणी न सिद्ध हो जाएँ. अपनी दुःख भरी रातों में वह समय के फिसलते हुए क्षणों को किसी तरह थामे रखने का प्रयत्न करता. वह भली-भाँति जनता था कि समय तीव्र गति से 29 मार्च की भोर की ओर बढ़ रहा है. वह अपने को ज़ोर से बोलते हुए समझाता— “मैं अभी तो 22 तारीख की रात में ही हूँ. जब तक यह रात और आने वाली छह रातें हैं तब तक मैं अजेय और अमर हूँ.” उसे अपनी ये नींद से भरी रातें किसी गहरे, अंधकारपूर्ण कुएं के समान प्रतीत होतीं, जिनमें वह डूब सकता था. कभी-कभी वह अधीर होकर उस अंतिम गोली की प्रतीक्षा करने लगता, जो उसे— चाहे अच्छे के लिए या बुरे के लिए— अपनी इन कल्पनाओं की व्यर्थ यातना से मुक्त कर दे.
28 मार्च को, जब अंतिम सूर्यास्त ऊँची सलाखों वाली खिड़कियों पर काँप रहा था, उसका ध्यान इन सभी क्षुद्र विचारों से हटकर अपने नाटक “द एनिमीज़” पर केंद्रित हो गया. ह्लादिक की आयु चालीस वर्ष से अधिक हो चुकी थी. कुछ दोस्तियों और ढेर सारी आदतों के आलावा उसका सारा जीवन साहित्य के कठिन और जटिल साधना-पथ पर व्यतीत हुआ था. अन्य लेखकों की भाँति वह अपने समकालीनों का मूल्यांकन उनके प्रकाशित कार्यों के आधार पर करता था, किंतु अपने लिए यह अपेक्षा रखता था कि लोग उसे उसके इरादों और योजनाओं के आधार पर ही आँकें. उसकी प्रकाशित सभी कृतियाँ उसे एक विचित्र प्रकार के पश्चाताप से भर देती थीं. बोहेमे, इब्न एज्रा और फ्लड पर उसका अध्ययन मौलिक सृजनात्मकता से अधिक परिश्रम और अभ्यास का परिणाम था. “सेफ़र येज़िराह” का उसका अनुवाद लापरवाही, थकान और अनुमान से भरा था.
अपनी पुस्तक “विंडिकेशन ऑफ़ इटर्निटी” को वह अपेक्षाकृत कम खामियों वाला मानता था. उसके प्रथम भाग में पार्मेनिडीज़ के ‘अपरिवर्तनशील अस्तित्व’ से लेकर हिंटन के ‘परिवर्तित अतीत’ तक मनुष्य द्वारा कल्पित विभिन्न प्रकार की ‘अनंतताओं’ का इतिहास था. दूसरे भाग में उसने (फ्रांसिस ब्रेडले के साथ) यह प्रतिपादित किया था कि विश्व की समस्त घटनाएँ मिलकर समय की कोई सरल रैखिक श्रृंखला नहीं बनातीं. उसका तर्क था कि मानवीय अनुभव अनंत नहीं होते, और एक अनुभव का दोहराव ही यह संकेत दे देता है कि समय एक भ्रम है. किंतु विडंबना यह थी कि ये तर्क भी उतने ही दुर्बल थे जितना वह भ्रम, जिसका वे खंडन करना चाहते थे. स्वयं ह्लादिक भी इन तर्कों को एक प्रकार की उलझन और हल्की सी उपेक्षा के साथ दोहराता था.
उसने कुछ अभिव्यंजनावादी कविताएँ भी लिखी थीं. जिन्हें उसकी असहजता के बावजूद 1924 के एक संकलन में सम्मिलित कर लिया गया था और बाद के अधिकांश संकलनों में वे पुनः प्रकाशित होती रहीं. ह्लादिक अपने इस अनिश्चित और दुर्बल अतीत से खुद को मुक्त करना चाहता था. अपने नाटक “द एनिमीज़” के माध्यम से वह खुद को सिद्ध करना चाहता था. उसे नाटक का पद्य-रूप इसलिए प्रिय था कि उसमें दर्शक यह नहीं भूलते कि वे एक कल्पित जगत देख रहे हैं और उसके अनुसार यह तथ्य किसी कला की मूल शर्त है.
यह कृति (द एनिमीज़) समय, स्थान और घटना— तीनों की नाटकीय एकता को दृढ़ता से साधे रहती है. इसकी पूरी कहानी उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दिनों की एक संध्या में, ह्राद्चानी स्थित बैरन रोएमरस्टाड्ट की लाइब्रेरी में घटित होती है.
प्रथम अंक के आरंभिक दृश्य में एक अजनबी रोएमरस्टाड्ट से मिलने आता है. (घड़ी सात बजाती है; अस्त होते सूर्य की तीव्र आभा खिड़कियों पर झिलमिला रही है, और वातावरण में एक परिचित करुण हंगेरियन धुन तैर रही है.) इसके पश्चात एक-एक कर अन्य लोग भी वहाँ पहुँचते हैं. रोएमरस्टाड्ट उन्हें पहचान नहीं पाता, किंतु उसे एक विचित्र अनुभूति होती है— मानो वह उन्हें कहीं पहले देख चुका हो, शायद किसी स्वप्न में. सभी आगंतुक उससे अत्यंत विनम्रता से मिलते हैं, पर धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगता है— पहले दर्शकों के लिए, और फिर स्वयं बैरन को— कि वे उसके गुप्त शत्रु हैं, जो उसके विनाश के उद्देश्य से आए हैं. रोएमरस्टाड्ट उनकी जटिल चालों से बच निकलता है, कभी उन्हें चकमा देकर तो कभी किनारा करके. वार्तालाप के बीच उसकी मंगेतर जूलिया डे वाइडेनाउ का उल्लेख आता है, और एक अन्य व्यक्ति जारोस्लाव कुबिन का भी, जो कभी जूलिया का प्रेमी रह चुका था. अब कुबिन पागल हो चुका है और स्वयं को रोएमरस्टाड्ट समझता है. …और इस प्रकार संकट लगातार बढ़ते जाते हैं.
द्वितीय अंक के अंत में परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि रोएमरस्टाड्ट को विवश होकर एक षड्यंत्रकारी की हत्या करनी पड़ती है. तृतीय और अंतिम अंक आरंभ होता है, और यहीं से विसंगतियाँ अधिक दिखने लगती हैं. वे पात्र, जो पहले मंच से हट चुके प्रतीत होते थे, पुनः प्रकट होने लगते हैं. जिस व्यक्ति की हत्या हो चुकी थी, वह भी एक क्षण के लिए लौट आता है. कोई यह इंगित करता है कि समय आगे बढ़ा ही नहीं— घड़ी फिर से सात बजाती है, पश्चिम में अस्त होता सूर्य पुनः खिड़कियों पर उसी प्रकार चमक उठता है, और वही भावुक हंगेरियन संगीत फिर से वातावरण में गूँजने लगता है. नाटक का प्रथम पात्र पुनः प्रवेश करता है और वही शब्द दोहराता है जो उसने आरंभ में कहे थे. रोएमरस्टाड्ट भी बिना किसी आश्चर्य के उसका उत्तर देता है. तब दर्शकों पर यह उद्घाटन होता है कि रोएमरस्टाड्ट वास्तव में वही दुखी जारोस्लाव कुबिन है. नाटक कभी घटित हुआ ही नहीं, यह तो एक चक्राकार पागलपन है, जिसे कुबिन बार-बार जीता और दोहराता रहता है.
ह्लादिक ने कभी इस बारे में स्पष्ट रूप से यह नहीं सोचा था कि यह त्रासद-हास्य नाटक (ट्रेजिक कॉमेडी ऑफ़ एरर) मूर्खतापूर्ण है या एक उत्कृष्ट कृति है, इसे जानबूझकर रचा गया है या यह सहज ही आकार ले गया है. किंतु वह भीतर से अनुभव करता था कि इस कृति का कथानक उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त है— यह उसकी कमियों को आच्छादित करने और उसकी विशेषताओं को उजागर करने में समर्थ है. उसे यह भी प्रतीत होता था कि इस कहानी में उसके जीवन के मूल अर्थ को— प्रतीकात्मक रूप से— परिवर्तित करने की संभावना निहित है. इसी के माध्यम से वह अपने जीवन को सार्थक बना सकता है.
वह प्रथम अंक पूर्ण कर चुका था और तृतीय अंक के एक-दो दृश्य भी लिख चुका था. चूँकि नाटक पद्य में लिखा गया था इसलिए वह उसे बार-बार मन ही मन दोहरा सकता था और बिना किसी पांडुलिपि के सहारे छंदों को सँवार सकता था. इस समय वह उन दो अंकों के विषय में विचार कर रहा था जो अभी शेष थे— और साथ ही अपनी आने वाली मृत्यु के बारे में भी.
इसी मनोदशा में अंधकार में डूबा हुआ वह ईश्वर से मुखातिब हुआ— “यदि सचमुच मेरा अस्तित्व है, और यदि मैं आपकी कोई भूल या दोहराव मात्र नहीं हूँ, तो मेरा होना ‘द एनिमीज़’ के लेखक के रूप में ही है. इस नाटक को पूरा करने के लिए मुझे एक वर्ष और चाहिए— शायद इसी से मेरा अस्तित्व भी सार्थक हो और आपका भी. हे ईश्वर, जिनके पास अनगिनत सदियाँ हैं और समस्त सृष्टि का समय है, मुझे केवल एक वर्ष प्रदान कीजिए.”
यह उसकी अंतिम और सबसे कठिन रात थी. परंतु दस ही मिनट बीते होंगे कि नींद उस पर इस तरह छा गई, जैसे किसी गहरे, अंधकारमय समुद्र ने उसे अपने आग़ोश में समेटकर डुबो लिया हो.
भोर के समय उसने स्वप्न देखा कि वह क्लेमेंटाइन लाइब्रेरी के एक गलियारे में छिपा हुआ है. काले चश्मे पहने एक लाइब्रेरियन उससे पूछता है— “तुम क्या खोज रहे हो?”
ह्लादिक ने उत्तर दिया— “ईश्वर.”
लाइब्रेरियन बोला— “ईश्वर इन चार लाख पुस्तकों में से किसी एक पुस्तक के किसी एक पृष्ठ के किसी एक अक्षर में स्थित है. मेरे पिता और उनके पिता भी उसी अक्षर की खोज में लगे रहे; और मैं खुद भी उसे खोजते-खोजते अंधा हो गया.”
उसने अपना चश्मा उतारा, और ह्लादिक ने देखा कि उसकी आँखें निर्जीव थीं. तभी एक पाठक भीतर आया और एक एटलस लौटाते हुए बोला—
“यह बेकार है.”
वह पुस्तक उसने ह्लादिक को थमा दी. ह्लादिक ने उसे यों ही खोल लिया. धुँधली आकृति में उसे भारत का एक मानचित्र दिखाई दिया. अचानक किसी गहन विश्वास से प्रेरित होकर उसने उस मानचित्र पर अंकित एक अत्यंत सूक्ष्म अक्षर को स्पर्श किया. उसी क्षण एक आकाशवाणी का स्वर गूँजा— “तुम्हारे कार्य के लिए समय प्रदान किया गया है.” और ह्लादिक जाग उठा.
उसे स्मरण हुआ कि मनुष्य के स्वप्न ईश्वर से जुड़े होते हैं, और एक यहूदी धर्मगुरु मैमोनिडीज़ ने कहा है कि जब स्वप्न अत्यंत स्पष्ट और विशद रूप में प्रकट हो, और उसमें कोई अदृश्य सत्ता वाणी करती प्रतीत हो, तब वह ईश्वरीय होता है.
वह अपने कपड़े पहन ही रहा था कि दो सैनिक उसकी कोठरी में आए और उसे अपने साथ चलने का आदेश दिया. दरवाज़े के पीछे खड़े-खड़े उसने अपने मन में गलियारों, सीढ़ियों और आपस में जुड़े भवनों का एक जटिल जाल रच लिया; किंतु वास्तविकता ने उसे निराश ही किया. वे लोग एक साधारण सी लोहे की सीढ़ी से उतरकर एक भीतरी आँगन में पहुँच गए. वहाँ कुछ सैनिक, जिनकी वर्दियों के बटन खुले हुए थे, एक मोटरसाइकिल की जाँच करते हुए आपस में वाद-विवाद कर रहे थे.
सार्जेंट ने अपनी घड़ी देखी—आठ बजकर चवालीस मिनट हो चुके थे. उन्हें नौ बजे तक प्रतीक्षा करनी थी. ह्लादिक, जो अब दया का पात्र भी नहीं रह गया था, लकड़ियों के ढेर पर बैठ गया. उसने देखा कि सैनिकों की ऑंखें उसकी आँखों से कतरा रही हैं. प्रतीक्षा को थोड़ा सहज बनाने के लिए सार्जेंट ने उसे एक सिगरेट दी. ह्लादिक धूम्रपान नहीं करता था, फिर भी उसने विनम्रता या संकोचवश उसे स्वीकार कर लिया. जब उसने सिगरेट जलाई, तो उसे अपने हाथ काँपते हुए महसूस हुए. आकाश बादलों से घिरता जा रहा था. सैनिक धीमे स्वर में बातचीत कर रहे थे— मानो वह पहले ही मर चुका हो. वह व्यर्थ ही उस स्त्री को याद करने की कोशिश कर रहा था, जिसका प्रतीक जूलिया डे वाइडेनाउ थी…
फायरिंग स्क्वाड अपनी-अपनी स्थिति में आ खड़ा हुआ. ह्लादिक बैरक की दीवार से टिककर खड़ा हो गया और गोलियों की प्रतीक्षा करने लगा. किसी ने आशंका व्यक्त की कि दीवार पर रक्त के छींटे पड़ेंगे, अतः दोषी को कुछ कदम आगे आने का आदेश दिया गया. अचानक ह्लादिक को एक विचित्र ढंग से फोटोग्राफ़र की प्रारंभिक तैयारियाँ स्मरण हो आईं. उसी क्षण वर्षा की एक भारी बूँद उसकी कनपटी को स्पर्श करती हुई धीरे-धीरे उसके गाल पर बहने लगी.
सार्जेंट ने अंतिम आदेश दिया और उसी क्षण समस्त भौतिक संसार ठहर गया.
बंदूकें ह्लादिक की ओर तनी थीं, पर उन्हें थामे सैनिक पूर्णतः स्थिर थे. सार्जेंट का हाथ अधूरे संकेत में ही जड़ हो गया था. आँगन के पत्थर पर एक मधुमक्खी की छाया स्थिर पड़ गई. वायु जैसे थम गई थी— मानो सब कुछ किसी चित्र में स्थिर हो उठा हो.
ह्लादिक चीखना चाहता था, कोई शब्द बोलना चाहता था, या हाथ हिलाना चाहता था; किंतु उसे समझ आ गया कि वह पूर्णतः जड़ हो चुका है. इस स्थिर जगत से कोई ध्वनि उसके पास नहीं पहुँच रही थी.
उसने सोचा— मैं नरक में हूँ; मैं मर चुका हूँ.
फिर उसके मन में आया— मैं पागल हो गया हूँ.
और फिर— समय रुक गया है.
परंतु तुरंत ही एक और विचार उभरा— यदि समय सचमुच ठहर गया है, तो मेरे विचार भी क्यों नहीं थम गए? इस संदेह को जांचने के लिए उसने बिना होंठ हिलाए वर्जिल की रहस्यमयी कविता ‘चौथी एकलॉग’ को मन ही मन दोहराना शुरू किया. उसे यह भी लगा कि दूर खड़े सैनिक भी इसी बेचैनी से घिरे हुए हैं. वह उनसे किसी प्रकार बातचीत करना चाहता था. उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इतनी देर तक स्थिर रहने पर भी उसे न थकान का अनुभव हो रहा था, न ही चक्कर का.
एक अनिश्चित, लंबा अंतराल बीत जाने पर वह सो गया. जागने पर उसने पाया कि संसार अब भी उसी प्रकार स्थिर और जड़ है— पानी की बूँद अब भी उसके गाल पर ठहरी हुई थी, मधुमक्खी की परछाई आँगन में ज्यों की त्यों थी, और सिगरेट का धुआँ, जिसे उसने छोड़ा था, अब तक हवा में बिखरा नहीं था.
एक ‘दिन’ और बीतने के पश्चात ह्लादिक पर यह रहस्य उद्घाटित हुआ. उसने ईश्वर से एक वर्ष माँगा था, ताकि वह अपना काम पूरा कर सके— और ईश्वर ने उसे वह समय प्रदान कर दिया था. उसके लिए एक रहस्यमयी चमत्कार घटित हुआ था. बाहरी जगत में निर्धारित समय पर ही जर्मन गोलियाँ उसे भेद देंगी, किंतु उसके अंतर्मन में आदेश और गोली चलने के मध्य एक पूरा वर्ष व्यतीत होगा. पहले वह उलझन में पड़ा, फिर स्तब्ध रह गया; तत्पश्चात उसने इसे स्वीकार किया, और अंततः उसके भीतर गहरी कृतज्ञता का भाव भर उठा.
उसके पास कोई कागज़ नहीं था; उसकी स्मृति ही उसका एकमात्र सहारा थी. प्रत्येक नए छंद को जोड़ते और सँवारते समय उसे पूर्णतः स्मरण रखना पड़ता था— और इस प्रक्रिया में उस पर एक प्रकार का सौभाग्यपूर्ण अनुशासन उतर आया. ऐसा अनुशासन, जिसकी कल्पना भी वे अनाड़ी नहीं कर सकते, जो अपने धुँधले और क्षणिक विचारों को शीघ्र ही खो बैठते हैं.
वह इस कृति को न भविष्य के लिए लिख रहा था, न ही ईश्वर के लिए— जिनकी साहित्यिक रुचि के विषय में वह बहुत कम ही जानता था. वह निस्तब्ध और अचल रहकर समय के भीतर एक अदृश्य कृति बुन रहा था. उसने तृतीय अंक को दो बार पुनः लिखा. उसने कुछ अत्यधिक स्पष्ट प्रतीकों जैसे कि बार-बार बजती घड़ियाँ या संगीत को हटा दिया.
अब उसे रोकने वाली कोई बाहरी परिस्थिति नहीं थी. जहाँ आवश्यक लगा, उसने शब्दों को हटाया, काटा, या जोड़ा; और कहीं-कहीं पूर्ववत रहने दिया. धीरे-धीरे वह आँगन और बैरक भी उसे प्रिय लगने लगे. एक चेहरा, जो बार-बार उसकी दृष्टि के सामने पड़ रहा था, उसने उसे रोएमरस्टाड्ट के चरित्र को परिवर्तित करने की प्रेरणा दी. उसे यह भी अनुभूति हुई कि जो कठोर कर्कशताएँ फ्लोबेयर को परेशान करती थीं, वे वास्तव में केवल दृष्टिगत भ्रांतियाँ हैं—लिखित शब्द की दुर्बलताएँ, न कि बोले या सुनाई देने वाले शब्दों की.
अंततः उसने अपना नाटक पूरा कर लिया. अब केवल एक शब्द शेष था— एक विशेषण. जैसे ही उसे वह मिल गया, उसी क्षण ठहरी हुई पानी की वह बूँद उसके गाल से नीचे फिसल गई. उसने एक तीखी चीख भरी और अपना मुँह एक ओर फेर लिया. उसी क्षण चार गोलियों की एक साथ गूँज हुई और वह गिर पड़ा.
जारोमिर ह्लादिक की मृत्यु 29 मार्च को, प्रातः 9 बजकर 2 मिनट पर हुई.
(एंड्रू हर्ले द्वारा अंग्रेजी में अनूदित कहानी पर आधारित)
संदर्भ
[1] “थर्ड राइख” शब्द का अर्थ है तीसरा राज्य या “तीसरा साम्राज्य. इसका उपयोग नाज़ियों ने अपने शासन को पुराने रोमन साम्राज्य और जर्मन साम्राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करने के लिए किया था.
[2] नाज़ी जर्मनी की गुप्त पुलिस को गेस्टापो कहा जाता था.
[3] सेफ़र येज़िराह यहूदी रहस्यवाद से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पुस्तक है. इसमें प्रकृति की शुरुआत कैसे हुई इस बारे में यहूदी मत को रखा गया है.
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साहित्य और दर्शन के प्रति अपने लगाव के कारण वे विश्व साहित्य और दर्शन की महत्त्वपूर्ण रचनाओं का हिंदी में अनुवाद करते रहे हैं. एक अनुवादक के रूप में वे अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के ‘अनुवाद पहल’ कार्यक्रम से भी जुड़े रहे हैं. ईमेल manish.philosophy.kuk@gmail.com |

मनीष शर्मा दर्शनशास्त्र के अध्येता, शिक्षक और स्वतंत्र अनुवादक हैं. वर्तमान में वे दर्शन विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में अध्यापन कर रहे हैं. उनका पीएचडी शोध कार्य एरिक फ़्रॉम के मानवतावादी दर्शन पर केंद्रित रहा है. उनकी रुचि भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन, साहित्य, आत्मबोध, प्रौद्योगिकी तथा समकालीन मानवीय स्थिति से जुड़े प्रश्नों में है. इन दिनों वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मानव स्वायत्तता और संवेदनाओं के अंतर्संबंधों पर कार्य कर रहे हैं.


क्या कहानी है! बोरखेस गला पकड़ लेते हैं। अनुवाद भी बहुत अच्छा। प्रवाह तो है ही, कहानी की स्पिरिट से भी पूरा न्याय करता है।
कथा संसार में बोर्खेस अद्वितीय हैं। उनकी अनेक कहानियों की तरह यह कहानी भी इसी विशेषण का समर्थन है। साक्ष्य है। यह दर्शा सकती है कि कहानी कला में कैसे गुण होना चाहिए। संक्षिप्त और सारगर्भित होना एक साथ प्रकट है। और कलाजन्य तार्किकता भी। जहाँ कल्पना और स्वप्न विश्वसनीय यथार्थ हैं और नहीं भी हैं। चेखव और बोर्खेस जैसे सृष्टिकर्ताओं को जाने-समझे बिना कहानी में नयी चुनौतियाँ लेना मुश्किल है। अनुवाद प्रवाही है। मनीष शर्मा जी यदि बोर्खेस सरीखे संश्लिष्ट लेखक की चयनित कहानियों को पुस्तकाकार ला सकें तो स्वागतेय होगा। एक अनायास, अयाचित ख़याल आया है- काश ब्रुनो शुल्ज़ की कुछ कहानियाँ भी हिंदी में अनूदित हों। ध्यातव्य : समालोचन।
यह कहानी मुझे बेहद पसन्द है। बारबार सामने आती है, सो आज भी आई और फिर से दम साधे यूँ पढ़ी गयी मानो पहली बार पढ़ी जा रही हो।
मनीष शर्मा ने वाक़ई बहुत सुंदर अनुवाद किया है। उनके बारे में जानकर अच्छा लगा। उनकी अभिरुचियों की जानकारी से उम्मीद जगती है कि उनसे और भी कुछ सीखने-पढ़ने को मिलता रहेगा।
, “EVEN IN MY DEATH I’LL CONTINUE TO WRITE”.
ऐसा कभी फ़्रेंच लेखक Marguerite Duras ने दावा किया था।
वे अभी तक लिख रही हैं। कभी कभी मुझे लगता है मैं उनकी नित नई कृतियों को पढ़ती जा रही हूँ, भले ही वे 1996 में चली गयी थीं!
पहली बार यह कहानी पढ़ने को मिली।इस तरह सामने आई कि सारे काम छोड़कर पढ़ने लगी तो सांस रोके पढ़ती चली गई। सुंदर, सारगर्भित और प्रवाह पूर्ण अनुवाद! धन्यवाद ❤️
ईश्वर इन चार लाख पुस्तकों में से किसी एक पुस्तक के किसी एक पृष्ठ के किसी एक अक्षर में स्थित है. मेरे पिता और उनके पिता भी उसी अक्षर की खोज में लगे रहे; और मैं खुद भी उसे खोजते-खोजते अंधा हो गया.”…..शानदार है। …..आभार…..शुक्रिया।
समय, सत्ता, ईश्वर जैसी तमाम सांस्कृतिक संरचनाओं को ध्वस्त करके मनुष्य, उसकी जिजीविषा और सृजनात्मकता को केंद्र में लाने वाली यह कहानी दर्शन को समझने की नई संवेदना देती है। मुक्ति अपने से बाहर किसी निरपेक्ष सत्ता के प्रति समर्पण में नहीं। मुक्ति अपने व्यक्तित्व की भीतरी बुनावट में सांस लेती चेतना को दसों इंद्रियों में प्रज्वलित कर देना है। सपने देखना मुक्ति नहीं। सपने को मूर्त करने के लिए समूचे ब्रह्मांड के ऊर्जा-स्रोत को अंदर थाम लेना है । वही ईश्वर हो जाना है और मौत सी खौफनाक सच्चाई को गत्चा देकर जीवन का महाकाव्य रचते जाना भी।
दर्शन अमूर्त होते हुए भी अमूर्त नहीं। प्रतीक बन कर वह जीवन की कठोर वास्तविकताओं को समझने की दृष्टि देता है। बोर्खेस तलस्पर्शी दृष्टि के साथ मनुष्य और जीवन के लिए जरूरी संकल्पदृढ़ता और जुझारूपन को जीवन-दर्शन बनाते हैं।
इतनी गहन कहानी का अनुवाद सरल काम नहीं पर मनीष शर्मा जी ने इसे बख़ूबी साधा है।
ठेठ बोर्खेज़ी कहानी। अनुवादक के लिए एक-दो सुझाव हैं, यदि उन्हें बुरा न लगे। एक तो अनुवाद में वास्तविक या काल्पनिक पुस्तकों के शीर्षक हिन्दी में ही होने चाहिए थे, अँग्रेज़ी में नहीं। मूल स्पेनी में तो वे स्पेनी में ही होंगे। अँग्रेज़ी अनुवाद में वे अँग्रेज़ी में होंगे। इसी तरह हिन्दी अनुवाद में वे हिन्दी में होने चाहिए। यदि पूरी कहानी हिन्दी में है तो पुस्तकों के शीर्षक अँग्रेज़ी में क्यों?
दूसरा, अनुवाद में पहले कहा गया है कि उसे फाँसी दी जायेगी। अगले पैरा में वह सोचता है कि उसे फाँसी, गिलोटिन, चाकू इत्यादि से मरने से डर नहीं लगता, लेकिन गोलियों से मारे जाने में डर लगता है। और फिर उसे गोलियों से ही मारा गया। इसलिए यह देखने की ज़रूरत है कि मूल में उसे फाँसी की सजा सुनायी गयी थी या गोलियों से मारने की।
मेरे ख़याल से इस कहानी को केवल “सृजन की विजय” या “कला की अमरता” के रूप में पढ़ना थोड़ा अधूरा होगा।
वास्तविक चमत्कार यह है कि ह्लादिक अपनी कृति को पूरा करने के बाद भी उसे किसी पाठक तक नहीं पहुँचा सकता। न वह प्रकाशित होगी, न मंचित होगी, न उसकी प्रशंसा होगी। फिर भी वह उसे पूरा करता है। बोर्खेस यहाँ साहित्य को सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और पाठकीय स्वीकृति से अलग करके देखते हैं। सृजन का अंतिम औचित्य शायद बाहर नहीं, रचनाकार की अपनी नैतिक जिम्मेदारी में है। यह क्रांतिकारी विचार है।
आप देखें कि ह्लादिक ईश्वर से जीवन नहीं, समय माँगता है। यह साधारण लेखक की दृष्टि नहीं है। बोर्खेस के लिए मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति अर्थपूर्ण समय है। मृत्यु तो पहले से निश्चित है; प्रश्न केवल इतना है कि मृत्यु से पहले मनुष्य अपने समय का क्या करता है। इसीलिए कहानी सत्ता और मृत्यु की कहानी कम, समय के स्वामित्व की कहानी अधिक है। नाज़ी उसकी देह पर अधिकार कर सकते हैं, उसे ख़त्म कर सकते हैं, लेकिन उसको मिले एक वर्ष का वे कुछ नहीं बिगाड़ पाते।
मनीष शर्मा का अनुवाद इसलिए उल्लेखनीय है कि उन्होंने बोर्खेस की दार्शनिकता को बोझिल नहीं होने दिया। बोर्खेस की सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वे कथा, दर्शन, धर्म, इतिहास और स्वप्न को एक ही वाक्य-प्रवाह में ले आते हैं। यहाँ पाठक विचार की जटिलता से टकराता है, भाषा से नहीं। यह अच्छे अनुवाद की सफलता है।
पुनश्च:
कहानी के भीतर ह्लादिक जिस नाटक “द एनिमीज़” को पूरा करता है, उसकी संरचना भी चक्राकार है। पात्र बार-बार लौटते हैं, समय फिर सात बजे पर आ जाता है। आश्चर्य यह है कि स्वयं ह्लादिक की नियति भी वैसी ही हो जाती है। वह अपने नाटक को उसी के भीतर जी रहा है।
बोर्खेस के यहाँ कला जीवन का प्रतिबिंब नहीं बनती; जीवन कला की संरचना का अनुसरण करने लगता है। शायद यही उनका “रहस्यमयी चमत्कार” है।
सादर