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समालोचन

Home » मध्यकाल पर तीन उपन्यास : चंद्रभूषण

मध्यकाल पर तीन उपन्यास : चंद्रभूषण

साहित्य और इतिहास का संबंध अनुकरण या प्रतिबिंब का नहीं है. यह एक जटिल अंतःसंवाद है, जिसमें इतिहास साहित्य के हाथों पुनर्रचित होता है. घटना, जब संवेदना से अनुप्राणित होती है, तब वह मात्र अतीत की सूचना नहीं रह जाती, बल्कि एक जीवित अनुभव में रूपांतरित हो उठती है. इतिहास को समझने का एक मार्ग स्वयं इतिहास है, दूसरा उस पर रचे गए साहित्य से होकर जाता है. भारत में बौद्ध धर्म के विलोपन पर एक विस्तृत पुस्तक लिखने के बावजूद चंद्रभूषण को यह बोध बना रहा कि यह विमर्श अभी अधूरा है. सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच रचे गए साहित्य पर केंद्रित उनका इससे पहले यहीं प्रकाशित आलेख आपने पढ़ा ही है. अब मध्यकाल पर लिखे गए तीन महत्वपूर्ण उपन्यासों— ‘जय सोमनाथ’, ‘भर्तृहरि : काया के वन में’ और ‘नीला चाँद’, के सूक्ष्म पाठ के माध्यम से वे उस ऐतिहासिक समय की डूबती-उतराती छवियों को पकड़ने का प्रयास कर रहे हैं, साथ ही उन असंगतियों की ओर भी संकेत करते हैं जो ऐतिहासिक आख्यान और साहित्यिक कल्पना के संधि-स्थल पर उभरती हैं. इस आलेख की विशेषता यह है कि यहाँ इतिहास का पुनर्पाठ करते हुए साहित्य की स्वायत्त कला को विस्मृत नहीं किया गया है. गंभीर आलोचनात्मक विवेक और पाठ-संवेदना के संतुलन के साथ लिखा गया यह आलेख मध्यकालीन इतिहास और साहित्य, दोनों में रुचि रखने वालों के लिए एक समृद्ध और विचारोत्तेजक पाठ प्रस्तुत करता है. प्रस्तुत है.

by arun dev
January 24, 2026
in आलोचना
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मध्यकाल पर तीन उपन्यास : चंद्रभूषण
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मध्यकाल पर तीन उपन्यास
उपन्यासों की उलझी हुई राहें

चंद्रभूषण

भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ ईसा की दूसरी सहस्राब्दी शुरू होने के ठीक पहले, लगातार जारी विदेशी हमलों की भयानक वारदातों की शक्ल में सामने आता है. महमूद ग़ज़नवी के हमले 998 ई. से शुरू होते हैं और 1027 ई. तक चलते चले जाते हैं. किसी लंबी प्राकृतिक आपदा की तरह कश्मीर-पंजाब और गंगाघाटी से लेकर सिंध-गुजरात तक फैले तीसेक साल के इस एकतरफा घटनाक्रम से भारत में बहुत बड़ी उथल-पुथल पैदा हुई होगी. सोने-चांदी के बोझ से कराहते ऊंटों के पीछे दो-दो टके में बिकने के लिए ग़ज़नी ले जाए जा रहे हिंदुस्तानी गुलामों की कतारों का वर्णन ग़ज़नवी सल्तनत के इतिहासकारों ने ही कर रखा है. बहरहाल, इन हमलों को ज्यादा वजन देने से इतिहास की व्याख्या में जो विकृति पैदा होती है, उसकी समझ बनाकर चलना भी हमारे लिए उतना ही जरूरी है.

इकत्तरसो महादेव मंदिर

इसमें कोई शक नहीं कि पुरातात्विक प्रमाण ईसा की ग्यारहवीं सदी को इससे पहले गुजरी तीन-चार सदियों से बहुत अलग दिखाते हैं. लेकिन ऐसे सभी बदलावों का एक सिरा ग़ज़नवी के हमलों से जोड़ना ग़लतफ़हमी पैदा करता है. ज्यादा दिन नहीं हुए, मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में मैं वहाँ का चर्चित पुरातात्विक स्थल इकत्तरसो (आधिकारिक नाम एकोत्तरसो यानी एक सौ एक) महादेव मंदिर देखने गया था. सपाट इलाके में मीलों दूर से इसकी बनावट देखकर लगता है, यह कोई शिवमंदिर नहीं, एक नीची पहाड़ी पर बना चौंसठयोगिनी मंदिर है. भीतर जाने पर भी सारा ढांचा हूबहू वैसा ही दिखता है जो खजुराहो, भेड़ाघाट (जबलपुर) और हीरापुर (ओडिशा) के चौंसठयोगिनी मंदिरों का है.

खजुराहो का चौंसठयोगिनी मंदिर आयताकार होने के कारण बाकियों से अलग है लेकिन भीतर सारे एक से हैं. अहाते जैसे घेरे में दीवार के सहारे बनी, भीतर को खुलती 64 कोठरियों में योगिनियों के स्थान. (योगिनियाँ उड़ने वाली जीव मानी जाती थीं, सो इनके मंदिर ऊपर से खुले रखे जाते थे. बहुत सुंदर स्त्रियों से लेकर जानवरों तक के चेहरे वाले ये अर्धमिथकीय चरित्र हीरापुर में अब भी देखे जा सकते हैं.) बीच में बिना छत की खुली जगह और घेरे के केंद्र में भैरव मंदिर. लेकिन इकत्तरसो महादेव मंदिर में अभी न कोई योगिनी दिखती है न भैरव. इसके केंद्र में दो शिवलिंग हैं. कुछेक कोठरियों में भी छोटे-छोटे शिवलिंग स्थापित किए गए हैं जबकि बाकियों में किसी भी आकार का पत्थर कहीं से लाकर रख दिया गया है. बाहर एएसआई की तख्ती बता रही है कि फलां राजा ने चौदहवीं सदी में इस मंदिर का निर्माण कराया. यह निर्माण था, मरम्मत थी, या खाली जगह पर कब्जा था- भनक तक नहीं मिलती.

पूरे देश में चौंसठयोगिनी मंदिरगिनी-चुनी जगहों पर ही हैं. इनका पुरातात्विक अध्ययन बताता है कि ईसा की नवीं और दसवीं सदियों में ये बने, फिर ग्यारहवीं सदी से राजाओं ने इनकी देखरेख के लिए धन देना या इस काम के लिए गांव निर्धारित करना एक झटके में ही बंद कर दिया. पड़े-पड़े तबाह होने के लिए छोड़ दिए गए इन अनूठे वास्तु ढांचों की दुर्नियति में ग़ज़नवी या किसी और विदेशी हमलावर की कोई भूमिका दूर-दूर तक नहीं खोजी जा सकी है. अकेली बात इसके पीछे से झांकती है तो यही कि ऐसी कुछ ठोस वजहें होंगी- सिंचाई के साधन खड़े होना, लगातार लड़ाइयों से बेजार हो जाना, या नई आस्थाओं का उभरना- जिन्होंने योगिनी तंत्र को राजाओं के लिए व्यर्थ बना दिया.

पीछे की कुछ सदियों में चले आ रहे तंत्र-युग के सबसे बड़े पूज्य व्यक्तित्वों की कोई जातिगत पहचान नहीं थी. 84 महासिद्धों की सूची में कुछ नाम ऐसी जातियों से आए हुए लोगों के हैं, जिनकी स्थिति अभी दलितों में भी सबसे नीची जातियों जैसी है. महासिद्ध हाड़िपा मेहतर जाति से आते हैं. डोंबीपा, कंकालीपा, चमरीपा, कुक्कुरीपा, कुंभारीपा, धोकरीपा, कमरीपा, घंटापा, पनहपा वगैरह नाम भी उनकी पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताते ही हैं. चार महासिद्ध महिलाएँ हैं, जिनमें लक्ष्मींकरा राजकुमारी हैं लेकिन उनका डेरा हमेशा श्मशान में ही रहा. तीन महासिद्ध कायस्थ जाति से आते हैं जो फिर इस दायरे से बाहर ही हो गई. कुछ ब्राह्मण भी हैं जो बाकियों से अलगाए नहीं जा सकते.

आठवीं, नवीं और दसवीं सदी में लिखे गए बौद्ध और शैव शास्त्रों में जो साधना पद्धति दिखती है उसमें शुचिता के लिए कोई स्थान नहीं है. चौंकाने वाली या जुगुप्सा पैदा करने वाली किसी गतिविधि के जरिये मानवोपरि अनुभूतियों तक पहुंचना, सामान्य जीवन-अनुभवों से दूर होते जाना, उनका एक जरूरी तत्व दिखता है. इन ग्रंथों में कुछ की भाषा अपभ्रंश तो कुछ की पाणिनि को दरेरा देने वाली संस्कृत है. लेकिन ग्यारहवीं सदी में या उसके बाद लिखे गए ग्रंथों और मंदिरों की दीवारों पर दर्ज लिखावटों में धर्म-कर्म का केंद्र मंदिर ही दिखाई पड़ते हैं, जिनमें पूजा-पाठ का काम पुश्त दर पुश्त केवल ब्राह्मणों तक सीमित कर दिया गया है. उन्हें राज्य-मशीनरी की तरह काम करना है और इसके लिए राजाओं द्वारा गांव या बड़ी-बड़ी जमीनें उन्हें दी गई हैं. उपासना की भाषा का वापस पलटकर संस्कृत होना रामचंद्र शुक्ल के यहाँ भी आश्चर्य की तरह दर्ज है. इन बदलावों का भी ग़ज़नवी से कोई रिश्ता नहीं दिखता.

कुल मिलाकर, फिजिकल और लिंग्विस्टिक आर्कियोलॉजी की पकड़ में आने वाले ग्यारहवीं सदी ईसवी के बदलाव चकित जरूर करते हैं, लेकिन जिन घटनाओं से हम इस सदी को जानते हैं, उन्हें धुरी बनाकर इतने बड़े बदलावों की व्याख्या नहीं की जा सकती. दूसरी तरफ, ग़ज़नवी के हमलों को कुछ इस तरह देखने की प्रवृत्ति भी स्थायी हो गई है, जैसे वे देर तक चली आंधी या बाढ़ की तरह आकर गुजर गए हों और भारत के राजनीतिक-प्रशासनिक ढांचे पर उनका कोई स्थायी प्रभाव ही न पड़ा हो. पंजाब में मिले सिक्कों और कई दूसरे साक्ष्यों के अलावा ग़ज़नवी वंश के इतिहासकारों द्वारा लिखे गए अरबी के ग्रंथ भी साफ बताते हैं कि ईसा की बारहवीं सदी की आखिरी चौथाई में, मोहम्मद गोरी के हमले शुरू होने तक ग़ज़नवी शासक लाहौर में ही राजधानी बनाकर अपना साम्राज्य चला रहे थे.

इन पौने दो सौ वर्षों में भारत के लिए वे लगभग अजेय सैन्य शक्ति थे और दक्षिण एशियाई भूगोल में अपने इर्द-गिर्द बड़े दायरे की राजनीति पर कुछ न कुछ असर डालते रहना उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति भी थी. लेकिन पुरातात्विक प्रमाणों की बात करें तो सन 1090 ई. से लेकर 1146 ई. के बीच कन्नौज के गाहड़वाल नरेशों द्वारा जारी बनारस, गोरखपुर और इटावा में मिले ताम्रपत्रों में ‘तुरुष्क दंड’ की व्यवस्था वाले ताम्रपत्रों के अलावा शेष भारत में ग़ज़नवियों के लंबे वर्चस्व के प्रमाण खोजने की कोशिश भी नहीं हुई है. लाहौर से राज कर रहे जिस तुरुष्क (तुर्क) राजा का दंड गोरखपुर-बनारस तक वसूला जाता था, दिल्ली और अजमेर उसके प्रभाव से अछूते रह गए हों, क्या यह संभव है?

जाहिर है, इस दौर से जुड़ी कई पहेलियाँ अभी सुलझनी बाकी हैं. फिलहाल तंत्र की व्याप्ति वाले युग, मुख्यतः आठवीं से ग्यारहवीं-बारहवीं सदी ईसवी तक के भारत को समझने के लिए कई तरफ जो हाथ-पांव मैं मार रहा हूँ, उसका एक छोर इस कालखंड पर केंद्रित हिंदी के कुछ उपन्यासों में खोजी-परखी गई दुनिया से भी जुड़ रहा है.

 

उपन्यासों से मुराद

इतिहास आधारित उपन्यासों के लिए चर्चित मराठी के एक साहित्यकार से मैंने पूछा कि किसी नए प्रॉजेक्ट की तैयारी आप कैसे करते हैं? उन्होंने कहा-

‘विषयवस्तु का संबंध जिस माहौल से होता है, उसी को एक गांव मानकर वहीं अपने नाम से एक प्लॉट ले लेता हूँ और लिखाई पूरी होने तक घर बनाकर वहीं बस जाता हूँ. वहाँ रहने वालों के साथ रहता हूँ, उनकी बोली-बानी समझता हूँ और घटनाक्रम के बीच अपने पात्रों के व्यवहार को भी वहीं से देखने की कोशिश करता हूँ.’

अन्य प्रकार की साहित्यिक रचनाओं के लिए यह प्रक्रिया पता नहीं कितनी कारगर होती होगी लेकिन इतिहास में घुसकर उसे साहित्य की सामग्री बनाने के लिए लेखक को इतना श्रम तो करना पड़ता है.

ऐसी चीजें, हो सकता है हिंदी में ज्यादा हों, लेकिन ग्यारहवीं सदी को लेकर अपने पढ़े हुए कुल तीन उपन्यास ही इस काम के लिए मैंने चुने हैं. इनमें एक गुजराती से हिंदी में आया कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का ‘जय सोमनाथ’ है, दूसरा कहानीकार महेश कटारे का ‘भर्तृहरि : काया के वन में’ और तीसरा शिवप्रसाद सिंह का ‘नीला चाँद’. हजारीप्रसाद द्विवेदी के ‘चारु चंद्रलेख’ का समय दो सदी बाद, तेरहवीं सदी की शुरुआत का है, लेकिन संदर्भ के लिए जहाँ-तहाँ इसका भी उपयोग किया जाएगा. रचनाओं को चुनने या उनका क्रम बनाने का आधार लेखकों की वरिष्ठता या किताब की श्रेष्ठता को नहीं, उनमें आए समय को बनाया गया है, जिसमें कुछ धुंध भी होना स्वाभाविक है.

इन उपन्यासों के रचना समय पर जाएँ तो मुंशी जी के ‘जय सोमनाथ’ का प्रकाशन वर्ष 1940 है और 1948 में यह हिंदी में आ गया था. द्विवेदी जी का ‘चारु चंद्रलेख’ 1963 में आया था. ‘नीला चाँद’ में शिवप्रसाद सिंह की प्रस्तावना के साथ 19 दिसंबर 1987 की तारीख पड़ी हुई है. इसका प्रकाशन वर्ष 1988 होना चाहिए. ‘भर्तृहरि : काया के वन में’ का प्रकाशन वर्ष 2012 दिया हुआ है. इस तरह चारों उपन्यासों का रचनाकाल भले ही भारतीय राष्ट्र के उदय और विकास के विभिन्न चरणों से जुड़ा हो, लेकिन कुल मिलाकर यह पौन सदी में फैला हुआ है. ग़ज़नवी के हमलों को बीसवीं सदी में उभरे धार्मिक स्वरूप वाले भारतीय राष्ट्रवाद के ट्र्र्रिगर पॉइंट की तरह खड़ा किया गया. आजादी मिलते ही सोमनाथ मंदिर का निर्माण इसपर मोहर लगाने वाला साबित हुआ और सदी बीतने के साथ भारत को आधुनिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के सपनों पर पाला पड़ गया. ग्यारहवीं सदी से हमारा यह रिश्ता अभी बना हुआ है.

इन उपन्यासों की मुख्य कथाभूमि प्रभास पाटन (सौराष्ट्र, गुजरात का वेरावल जिला), अवंती (मालवा, मध्यप्रदेश में उज्जैन के पास) और बनारस है. इनके मुख्य चरित्र एक उपन्यास से दूसरे उपन्यास में टहलते दिखाई देते हैं लेकिन उनके चेहरे बदले हुए नजर आते हैं. मसलन, सोमदेव चालुक्य ‘जय सोमनाथ’ के कमोबेश राष्ट्रवादी नायक हैं लेकिन ‘नीला चाँद’ में वे मालवा से शत्रुता रखने वाले षड्यंत्रकारी सोच के एक राजा भर दिखाई पड़ते हैं. कुछ ऐसा ही राजा भर्तृहरि (भरथरी) के साथ भी होता है, जो अपने नाम वाले उपन्यास में एक खोजी हैं लेकिन शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास में आसानी से एक कूटनीतिक जाल में फंस जाने वाले साधक जैसी शक्ल में दिखाई पड़ते हैं. राष्ट्रवादी विमर्श मुंशी जी और द्विवेदी जी के यहाँ ज्यादा प्रखर है लेकिन द्विवेदी जी धार्मिक राष्ट्रवाद से अलग विमर्श बनाते हैं.

बहरहाल, विमर्शों को सीढ़ी बनाकर उपन्यास पढ़ना सबसे सरल और सबसे कम समृद्धिकारी ढंग से उसके संपर्क में जाना है. केएम मुंशी से हमारी कई शिकायतें हो सकती हैं लेकिन उनके इस उपन्यास पर फार्मूला बनाने और मानवीय स्थितियों का सरलीकरण करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता. इन किताबों पर चर्चा के क्रम में हमारी कोशिश यह देखने की रहेगी कि अब से हजार साल पहले के समाज को- उसके चरित्रों की बनावट, उस समय की भाषा-संस्कृति, आस्था-विश्वास, जाति-वर्ण, शासन-प्रशासन, राजनीति-विचारधारा को देखने का कोई अलग कोण ये दे पाते हैं या नहीं. इस जांच-परख में पुरातत्व के प्रकट तथ्यों से कोई विचलन दिखा तो उसपर भी बात हो जाएगी.

 

 

१.
‘जय सोमनाथ’

हिंदू राष्ट्रवाद की जमीन पर एक मनोवैज्ञानिक किस्सा

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का गुजराती उपन्यास ‘जय सोमनाथ’ लंबे समय से हिंदी में भी उपलब्ध है. इसकी गिनती कुछ ऐसी गिनी-चुनी साहित्यिक रचनाओं में होती है, जो न केवल बड़ी सामाजिक उथल-पुथल का कारण बनीं बल्कि लंबे समय तक दिखाई पड़ने वाले एक ठोस नतीजे में घनीभूत हो गईं. आजाद भारत में महात्मा गांधी के जिंदा रहते धार्मिक मुहावरे में एक ही ध्वंसावशेष का पुनर्निर्माण शुरू हुआ, और वह था सौराष्ट्र का सोमनाथ मंदिर. गांधीजी इसे एक संदिग्ध अतीत-यात्रा और वर्तमान में सामाजिक विद्वेष पैदा करने वाला कार्य ही मानते थे लेकिन सरदार पटेल ने उन्हें सामाजिक सद्भाव पर कोई बुरा प्रभाव न पड़ने का आश्वासन दिया, साथ ही यह वचन भी दिया कि जीर्णोद्धार का काम पूरी तरह जन सहयोग से किया जाएगा, सरकार का एक पैसा भी इसपर खर्च नहीं होगा.

केएम मुंशी

केएम मुंशी की भूमिका इस अभियान में ‘जय सोमनाथ’ और उससे पहले पाटण-त्रयी उपन्यास श्रृंखला लिखने की तो थी ही, बंटवारे के दौरान जूनागढ़ रियासत के भारत का हिस्सा बन जाने के बाद वहाँ के दौरे पर गए कांग्रेस के एक शीर्ष प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में उन्होंने कई सभाओं में सोमनाथ मंदिर को जड़ से बिल्कुल नया बना देने की बात भी कही थी.

इस ब्यौरे से किसी को लग सकता है कि ‘जय सोमनाथ’ मध्यकाल की पृष्ठभूमि पर हिंदुत्ववादी मिज़ाज का कोई राजनीतिक उपन्यास होगा. एक अर्थ में यह है भी, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों को दरकिनार करके चलने वाले उतने मोटे अर्थों में हरगिज नहीं, जो अभी भारत की मुख्यधारा वैचारिकी की पहचान बनते जा रहे हैं.

सोमनाथ मंदिर पर महमूद ग़ज़नवी का हमला और उसका सामना करने का एक वृहद साझा प्रयास इस उपन्यास की मूल कथावस्तु है, लेकिन गौर से देखने पर यह बात केवल पृष्ठभूमि तक सीमित लगती है. ज्यादा गहरी कहानी कुछ और है, जो पीछे बिल्कुल अलग पिच पर चलती है. सबसे बड़ी बात यह कि स्वतंत्रता आंदोलन के बहुतेरे प्रखर नेताओं की तरह केएम मुंशी भी बहुत पढ़े-लिखे और बड़े नजरिये वाले लेखक थे. इतिहास पर न केवल उनकी गहरी पकड़ थी, बल्कि एक बार उन्होंने इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस की अध्यक्षता भी की थी. किताब लिखते हुए अपनी तरफ से उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की है. बाद में उनके राजनीतिक नजरिये में एक बुनियादी बदलाव आया, जिसपर आगे बात होगी, लेकिन उनके लेखन को हमें खुली दृष्टि से ही देखना चाहिए.
दो पक्ष और कुछ दरारें

जय सोमनाथ’ के आमुख में ही केएम मुंशी ने दो ऐसी बातें कह दी हैं, जिन्हें कहने के लिए (साफ कहें तो सोमनाथ मंदिर पर महमूद ग़ज़नवी के हमले की सत्यता को लेकर संदेह जाहिर करने के लिए) संघ के बुद्धिजीवी आज भी इतिहासकार रोमिला थापर के खिलाफ हर संभव अवसर पर विषवमन करते रहते हैं. मुंशीजी साफ कहते हैं कि-

क. ‘भारतीय इतिहास में इस (सोमनाथ मंदिर पर महमूद ग़ज़नवी के) आक्रमण का कुछ भी उल्लेख नहीं है.’ और

ख. ‘हमारे उपलब्ध ऐतिहासिक आधार भीमदेव (कथानायक) के राज्यकाल को सदैव श्रृंखलित बताते हैं. विक्रमी संवत 1086 (सन 1028-29 ई.) के ताम्रपत्र के अनुसार भीमदेव कच्छ पर राज्य करते थे और वि. सं 1088 (1030-31 ई.) में इनके मंत्री विमल ने आबू (पर्वत) पर एक बड़ा मंदिर बनवाया था. यदि आक्रमण 1082-83 (1025-26 ई.) में हुआ माना जाए तो 1088 की यह सत्ता और समृद्धि वाली बात कुछ अजीब-सी लगती है.’

ग. ‘सोमनाथ के आक्रमण का पहला ब्यौरेवार वर्णन महमूद के दो सौ वर्ष बाद लगभग 1230 ई. में इब्न असीर की ‘कामिलुत्तवारीख’ में मिलता है.’

तो क्या यह वर्णन ही मुंशी जी को ‘जय सोमनाथ’ लिखने के लिए पर्याप्त लगा? नहीं, उनके पास इसके लिए एक और प्रकरण भी है, हालांकि वह उतना पक्का नहीं लगता.

घ. ‘मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता कहता है कि ‘नहरवाल (अनहिलवाड़) का राजा विरहमदेव (भीमदेव) अजमेर के नरेश तथा अन्य राजाओं की सेनाओं को एकत्रित करके सुल्तान का रास्ता रोकने की भारी तैयारी कर रहा था, इसलिए उसने सिंध के मार्ग से मुलतान जाने का विचार किया. मार्ग में असह्य गर्मी और पानी के नितांत अभाव के कारण सेना का अधिकांश भाग पागल होकर मर गया.’

तो भीमदेव की इतनी बड़ी विजय का उल्लेख किसी प्रशस्ति में, द्वयाश्रय में, कीर्तिकौमुदी में या किसी दूसरे इतिहास में क्यों नहीं है?’

मुंशी जी की यह रचना भीमदेव की कीर्तिकौमुदी तो नहीं है लेकिन उसके आसपास इसे माना जा सकता है. महमूद की लौटती हुई सेना को हैरान-परेशान करने, उसे रास्ता बदलकर अत्यंत असुविधाजनक रास्ते से वापसी के लिए मजबूर कर देने को हम सीधे मुकाबले में उसपर विजय प्राप्त करना भले न कह सकें लेकिन यह पराक्रम भी कुछ घटकर नहीं है.

बहरहाल, एक उपन्यास आप इतिहास समझने के लिए तो नहीं पढ़ते. ऐतिहासिक तथ्य साहित्यिक रचना के लिए सिर्फ ढांचे की भूमिका निभाते हैं. कोई कहानी पुरातत्व द्वारा स्थापित तथ्यों की ऐसी-तैसी किए बगैर उनके बीच से ही अपने लिए एक जिंदा स्पेस निकाल लेती हो तो उसके प्रामाणिक अस्तित्व के लिए इतना काफी है.

महमूद ग़ज़नवी का जिक्र मुंशी जी के इस उपन्यास में ज्यादातर अफवाहों और किंवदंतियों की शक्ल में आता है. जिन गिने-चुने दृश्यों में वह प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है वहाँ लेखक ने उसके रणकौशल और समझदारी की तारीफ़ की है. पूरी किताब में उसकी एक ही ज़िद दिखाई गई है. यह कि उसे हर हाल में सोमनाथ को नष्ट करना है, क्योंकि उसकी नजर में वह बुतपरस्ती का, कुफ़्र का केंद्र है. छोटी-मोटी लड़ाइयों में उसे नहीं उलझना है. वीर शत्रुपक्ष का ही क्यों न हो, खुलकर उसकी तारीफ़ उसे करनी है. गले पर खंजर रख देने वाले बैरी को भी आजाद छोड़ देना है.

दूसरी तरफ, भारतीय पक्ष में कुछ राजा बहुत संकीर्ण दिमाग के दिखाए गए हैं. ग़द्दारी का एक स्वतःस्फूर्त आध्यात्मिक तर्क भी उभरता दिखाया गया है और ‘भारत देश’ या ‘हिंदू धर्म’ जैसी बड़ी धारणाओं को हजार साल पुराने उस कथा समय पर बरबस थोपने की कोशिश भी नहीं की गई है. बावजूद इसके, गुजरातियों के एकजुट सैन्य प्रतिरोध को रेखांकित करना इस उपन्यास का एक बड़ा उद्देश्य है, जो यहाँ अपनी मंजिल तक पहुंचता है. ठेठ रेतीले रेगिस्तान की रातों, सुबहों और दुपहरियों के इतने सुंदर दृश्य यहाँ दिखते हैं, उधर उठने वाली आंधियों का ऐसा जानलेवा सम्मोहन कि जिसे कहानी में कोई दिलचस्पी न हो, वह सिर्फ इनके लिए भी इसको पढ़ सकता है.

खैर, बाकी ब्यौरों, युद्ध की तैयारियों और लड़ाई के दृश्यों में मैं नहीं जाता.

1937 में, यानी कोई नब्बे साल पहले पूरी करके 1940 में छपा ली गई और न जाने कब से प्रशंसित होती आ रही इस किताब पर अभी यह सब लिखने का कोई औचित्य भी नहीं है. तो सीधे उस कहानी पर ही आते हैं, जिसका जिक्र ऊपर आया है और एक प्रकट मुहावरे में पढ़ी जाने वाली युद्ध रचना में जिसपर कम ध्यान जाना सहज-स्वाभाविक है.

यह कहानी है बचपन से जवानी में कदम रख रही देवदासी चौला की, जो उपन्यास में आने वाला पहला इंसानी चरित्र है. जिसकी अजीब सी बेचैनियों का वर्णन करते हुए किताब शुरू होती है और जिसकी अप्रत्याशित मृत्यु के साथ ही यह समाप्त हो जाती है.

देवदासियाँ बड़े मंदिरों के आसपास एक छोटी बस्ती देवदासियों की हुआ करती थी. जिंदा रहने के लिए पूरी तरह मंदिर पर ही निर्भर इन स्त्रियों के आधिकारिक पति मंदिर के आराध्य देव ही हुआ करते थे लेकिन अघोषित रूप से उनके एक या एकाधिक पति भी होते थे. उनके बच्चे होते थे जो किसी पुरुष के नहीं, शायद देवता के ही बच्चे माने जाते रहे हों. इनमें भी लड़कियों का जीवन पथ पूर्वनिर्धारित होता रहा होगा लेकिन लड़कों का क्या होता होगा, इसपर बहुत कम बातें मिलती हैं. एक देवदासी पर केंद्रित उपन्यास होने के बावजूद ‘जय सोमनाथ’ में भी इसपर कोई बात नहीं है.

ये देवदासियाँ आती कहाँ से थीं? सिर्फ देवदासी माताओं से ये जन्मती थीं या समाज से लगातार इनकी नई कुमुक भी आती रहती थी, इस बारे में हिंदी कथाकार शिवप्रसाद सिंह ने अपने उपन्यास ‘नीला चाँद’ (पृ. 453) में एक श्लोक ‘पद्मपुराण’ से उद्धृत कर रखा है. संभवतः नवें अध्याय का 52वां श्लोक (या फिर 52वें अध्याय का नवां). इसमें बताया गया है कि धैर्य और कठिन श्रम से अनेक कन्याओं को खरीदकर मंदिर के देवता को समर्पित करने वाला व्यक्ति महाधनाढ्य होता है, राजा बनता है और मरने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति करता है-

‘क्रीता देवाय दातव्या धीरेणाक्लिष्टकर्मणा
कल्पकालभवेत्स्वर्गो नृपो वासो महाधनी.’
(पद्मपुराण, 52/9)

पश्चिमी और मध्य भारत के पुराने राजवंशों के बारे में ज्यादातर जानकारियाँ ग्यारहवीं से चौदहवीं सदी ईसवी के बीच हुए दो जैन आचार्यों हेमचंद्र (1088-1172 ई.) और मेरुतुंग (जन्म-मृत्यु का समय अस्पष्ट है लेकिन उनके ग्रंथों में दर्ज रचनाकाल 1306 से 1363 ई. तक का है) के ग्रंथों ‘शब्दानुशासन’ और ‘प्रबंधचिंतामणि’ से प्राप्त होती है. ऊपर किशोर वय वाली जिस देवदासी चौला का जिक्र आया है, वह एक ऐतिहासिक चरित्र है और उसका जिक्र मेरुतुंग की प्रबंधचिंतामणि के ‘कुमारपाल प्रबंध’ में इस प्रकार आता है-

‘श्रीमदणहिलपुरपत्तने बृहति भीमदेवे साम्राज्यं पालयति श्री भीमेश्वरस्य पूरे चउलादेवी नाम्नी परायाँगना…तामंतःपुरेण्यधात्.’
(उद्धरण केएम मुंशी का ही.)

वाक्य का हिंदी अर्थ (मेरी तरफ से) इस प्रकार है-

‘महान अणहिलपुरपत्तन (शहर) में जब श्री भीमदेव साम्राज्य का पालन कर रहे थे, तब श्री भीमेश्वर के नगर में चउलादेवी नाम की एक परायाँगना (किसी अन्य पुरुष की ब्याहता अथवा उससे संबंधित स्त्री) थी. राजा उसको अंतःपुर में ले गए.’

यह काम भीमदेव ने चउला से विवाह करके किया, या किसी और तरीके से, ऐसा कोई तथ्य इस वाक्य में तो क्या, पूरे पाठ में ही मौजूद नहीं है. जो भी हो, यहाँ मौजूद धुंधलके का मुंशी जी ने कैसा रचनात्मक उपयोग किया है, यह जानने के लिए इतिहास से सीधे उपन्यास में चलते हैं.

 

एक स्त्री और चार पुरुष

‘जय सोमनाथ’ की शुरुआत सोमनाथ मंदिर के सौंदर्य वर्णन के साथ ही उसकी पौराणिक महत्ता और समाज में उसकी जगह बताने से होती है. पाटण नाम के दो शहर हैं. अनहिलवाड़-पाटण चालुक्य सोलंकी राजा भीमदेव की राजधानी है जबकि प्रभास-पाटण उससे ठीक-ठाक दूरी पर स्थित एक छोटा गढ़ है, जहाँ सोमनाथ मंदिर है और उसी के इर्दगिर्द यह शहर बसा है. मंदिर के बारे में बताया गया है कि यह शैवधर्म के पाशुपत मत का केंद्र है और इसके परिसर में देवी त्रिपुरसुंदरी का एक मंदिर भी बना हुआ है. त्रिपुरसुंदरी को पार्वती का एक नाम समझा जाता है, हालांकि ये शाक्त परंपरा की देवी हैं. शैव और शाक्त परंपराओं में टकराव का जिक्र मुंशी जी के उपन्यास में भी आता है, हालांकि इसकी व्याख्या वे विचारों और प्रथाओं से ज्यादा व्यक्तिगत प्रवृत्तियों के द्वंद्व की तरह करते हैं.

तो उपन्यास का पहला दिन ही सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग के सामने देवदासी चौला के प्रथम नृत्य प्रदर्शन का है. मंदिर में हर दिन होने वाला नृत्य देवता की उपासना का ही एक हिस्सा है, लेकिन चौदह-पंद्रह साल की लड़की चौला के लिए यह एक सपना पूरा होने जैसा है. उसकी माँ मंदिर की प्रधान देवदासी है और सोमनाथ के मुख्य पुजारी, पाशुपत पंथ के प्रधान ‘गंग सर्वज्ञ’ के साथ उसका रिश्ता अघोषित पति-पत्नी जैसा है. देवदासियों का घोषित पति मंदिर का देवता ही हुआ करता है, यह बात ऊपर कही जा चुकी है. लड़की चौला प्रधान पुजारी और प्रधान देवदासी के रिश्ते से ही उपजी है, लेकिन उसकी उम्र ऐसी है कि अपना पिता, प्रेमी, पति और सर्वस्व शिव को ही मानने में उसे कोई समस्या नहीं होती. न जाने कब से वह खुद को मंदिर में अधिष्ठित शिवलिंग के ही प्रति समर्पित मानती आ रही है, जिसके सामने उसका पहला नृत्य जीवन के अकेले इम्तहान का पर्चा लिखने जितना मुश्किल है.

इस इम्तहान में तो वह अव्वल दर्जे से पास हो जाती है, लेकिन वहीं चार बिल्कुल अलग मिज़ाज के पुरुषों की नजर में वह चढ़ भी जाती है. नतीजा यह कि अगले कुछ घंटे ही उसकी छोटी-सी जिंदगी का रास्ता तैयार कर देते हैं. इन पुरुषों में एक हैं मंदिर में नंबर 2 पोजिशन संभालने वाले आचार्य शिवराशि, जो गंग सर्वज्ञ के पट्टशिष्य और उत्तराधिकारी भी हैं. उन्हें लगता है, गुरु की जगह उन्हें बाद में मिलेगी लेकिन उनकी इस अघोषित बेटी पर अपना दावा अभी से उन्हें पक्का कर लेना चाहिए. दूसरे हैं पाटण के राजा भीमदेव, जो आगे एक विचित्र से घटनाक्रम में उसे अपनी दूसरी या तीसरी रानी बनाने की दिशा में बढ़ते हैं. तीसरा 20 साल का एक लड़का, सुदूर रेगिस्तान की घोघागढ़ रियासत का राजकुमार सामंत चौहान, जो कभी न कभी इस लड़की का प्रेम प्राप्त करने का सपना देखता है, लेकिन एक सुबह उसको किसी और पुरुष की अंकशायिनी पाकर बेझिझक अपनी बहन घोषित कर देता है.

इस सूची में चौथा व्यक्ति है कंक नाम का एक कालमुखपंथी साधू, जिसने 108 अनिंद्य सुंदरियों का गला काटकर त्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न करने का प्रण ले रखा है. चौला में अपना संकल्प पूरा होने की संभावना उसे बिल्कुल साफ दिख रही है. यहाँ अपना एक ऐतराज जताना मुझे जरूरी लगता है. इतिहास में मुंशी जी की गति बहुत अच्छी थी, लेकिन भयंकर से लगते शब्द ‘कालमुख’ ने उन्हें भरमा लिया. ‘जय सोमनाथ’ में इस चरित्र का उन्होंने भयावह चित्र खींचा है. मुंह पर काला रंग पोते ऐसा व्यक्ति, जिसका ऊपरी होंठ कटा हुआ है और दांतों के ऊपर सीधे नाक के छेद नजर आ रहे हैं! एक सुंदर लड़की देखकर जो केवल देवी को उसकी बलि चढ़ा देने के बारे में ही सोच पाता है!

 

लुप्त पंथों का खलनायकीकरण

कुछ-कुछ इसी तरह का चित्रण शिवप्रसाद सिंह ने ‘नीला चाँद’ में एक वज्रयानी का किया है. चुराए हुए घोड़े पर एक राजकुमारी को उसके घर से उठाकर ले जाता हुआ एक अधनंगा मुस्टंडा, जो दूर से ही शराब, पसीने और न जाने किन-किन अग्राह्य चीजों की बास मार रहा है! जो अपना दायाँ कंधा साफ काट दिए जाने के बावजूद लड़की को किसी भी हाल में अपनी वज्रयोगिनी बनाने पर अड़ा हुआ है! दोनों मामलों में एक ही बात साझा है कि शैव कालमुख और बौद्ध वज्रयानी, दोनों समुदाय भारत से बहुत पहले मिट चुके हैं. उनके बारे में कोई कुछ भी कहे, किसी की आस्था आहत नहीं होने वाली. वरना ऐसे वर्णनों को वाजिब बताने वाला कोई तथ्य दोनों ही लेखकों के पास नहीं है.

वज्रयानियों के बारे में आगे अलग से बात होगी. फिलहाल तो इतना ही कि दलाई लामा और भारत में रह रहे लगभग सारे ही तिब्बती वज्रयानी हैं. रही बात कालमुख संप्रदाय की तो नाम के अलावा उन्हें बुरा मानने की अकेली वजह रामानुजाचार्य के कुछ वाक्य हैं, जहाँ उन्होंने नवीं से 14वीं सदी ईसवी तक मौजूद इस शैव संप्रदाय को खोपड़ियों में डालकर भक्ष्य-अभक्ष्य कुछ भी खा लेने वाला, सुरा-सुंदरी का सेवन करने वाला, भय पैदा करने वाला बताया है.

इस वर्णन से ऐसा लगता है कि ईसा की 11वीं-12वीं सदी में हुए विशिष्टाद्वैतवादी वैष्णव आचार्य रामानुज ने कालमुख और कापालिक मतों में घालमेल कर दिया है. शैव आस्था को छोड़कर इन दोनों समुदायों में कुछ भी साझा नहीं था, यह बात पुराने शोधों से भी स्पष्ट थी लेकिन ब्रिटिश-अमेरिकी इतिहासकार डेविड नील लॉरेंजेन ने अपने लंबे शोध से इसमें कुछनए पहलू जोड़े हैं. 1991 में प्रकाशित अपनी किताब ‘द कापालिकाज ऐंड कालामुखाज : द लॉस्ट शैवाइट सेक्ट्स’ में कालमुखों का सही नाम उन्होंने काल + आमुख = कालामुख बताया है. समय का या मृत्यु कासामना करने वाला, उसके सामने खड़ा रहने वाला संप्रदाय. कर्नाटक में इस पंथ की स्पष्ट पहचान वाले मठ और मंदिर इतने ज्यादा मिले हैं और लिंगायतों में उनकी निरंतरता इतनी स्पष्ट है कि लॉरेंजेन बेहिचक इस नतीजे पर पहुंचते हैं- ‘इस संप्रदाय का खलनायकीकरण रामानुजाचार्य ने शायद वैष्णवों की खुन्नस निकालने के लिए किया है.’

खैर, चौला की कहानी पर लौटते हैं. जिस दिन इन चारों पुरुषों द्वारा और अपने सौभाग्य से भी सुख और दुख देने वाली बहुत सारी घटनाएँ चौला के साथ घटित होती हैं, वही दिन पाटण साम्राज्य में यह सूचना पहुंचने का भी है कि ग़ज़नी का अमीर यामीनुद्दौला महमूद सोमनाथ विजय का इरादा बांधकर बहुत बड़ी फौज के साथ मुल्तान पहुंच चुका है, अगले एक, या ज्यादा से ज्यादा दो महीने में वह सिर पर होगा. ध्यान रहे, महमूद का भारत पर यह लगभग आखिरी बड़ा धावा है. किसी स्थायी महामारी की तरह पिछले पचीस से ज्यादा वर्षों से वह कभी सिंध, कभी कन्नौज तो कभी कहीं और के धावे मारता आ रहा है. चौंकाने वाली कोई बात इस हमले से नहीं जुड़ी है और मौत जैसी यह निश्चितता इसमें शामिल है कि अकेले दम पर या कई देसी राज्यों को मिलाकर भी उसे परास्त नहीं किया जा सकता.

 

आमने-सामने

आगे रेगिस्तान की कुछ रोंगटे खड़े कर देने वाली यात्राओं और अलग-अलग तरह के कुछ युद्धों के वर्णन आते हैं. यात्रा वर्णनों की प्रशंसा ऊपर की जा चुकी है, युद्धों को पास से देखने के लिए आपको किताब पढ़नी पड़ेगी. ग़ज़नवी को रोकने और भटकाने की जितनी कोशिशें की जा सकती थीं, की जा चुकी हैं. भीमदेव की राजधानी अनहिलवाड़ पाटण है, लेकिन समुद्र को अपने लिए मददगार मानते हुए हमलावर का सामना अंतिम रूप से प्रभास पाटण में ही करने का फैसला वे करते हैं. ग़ज़नवी की सेना बहुत बड़ी है और उसका सैन्य कौशल भी बेहतर है. लड़ाई का उद्देश्य भी उसे पराजित करने से ज्यादा अधिक से अधिक समय तक गढ़ के सामने उसे रोके रखने और अपने समर्थकों द्वारा पीछे से उसे परेशान करने का ही है. हालांकि उपन्यास में इसपर अलग से कोई बात नहीं की गई है.

आम नागरिकों को नुक़्सान से बचाने के लिए प्रभास पाटण में रहने वालों को समुद्र के रास्ते किसी और शहर भेजा जा चुका है लेकिन सोमनाथ के पुजारियों का दल, बाकी सारे साधू और बिल्कुल अड़ जाने के बाद चौला और उसकी माँ नगर में ही रह जाते हैं. पीछे के किस्से से सिर्फ इतना कि भीमदेव ने कंक कालमुख से चौला की जान बचाई है.

लड़की की उम्र एक त्राता पुरुष के प्रति मुग्ध हो जाने की हो चुकी है, लेकिन यह मुलाकात घड़ी भर से ज्यादा की नहीं थी. यह आदमी उसके देश का राजा है, यह सूचना उसके आकर्षण को और बढ़ाने वाली सिद्ध हुई. लेकिन जब उसने धनुर्धर भीमदेव को किले की प्राचीर से भीषण युद्ध करते देखा तो उसका मन मिथकों के संसार में चला गया. महमूद ग़ज़नवी उसके लिए त्रिपुर और भीमदेव त्रिपुरारि हो गए. शिव से उसका जनम का रिश्ता संपूर्ण हुआ.

‘जय सोमनाथ’ के कोई तीस बरस बाद हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी बड़ा विद्रोह संगठित करने में जुटे एक पराक्रमी राजा और लंबे सम्मोहन में जा चुकी उसकी सर्वांग सुंदर रानी के इर्दगिर्द ‘चारु चंद्रलेख’ नाम का उपन्यास लिखा, हालांकि इस रचना का कथा-समय ‘जय सोमनाथ’ के दो सौ साल बाद का, मोहम्मद गोरी के हमले के कुछ समय बाद भारत में कायम गुलाम सुल्तान इल्तुतमिश के राज का है. दोनों स्त्री पात्रों के सम्मोहन का स्वरूप जरूर अलग है. द्विवेदी जी के यहाँ ऐसा एक नाथपंथी सिद्ध के प्रभाव में हुआ है, जबकि मुंशी जी के यहाँ भीतर से ही उपजा है.

बहरहाल, प्रभास पाटण के किले पर दोनों पक्षों की लगातार बदलती रणनीतियों के बीच दिन भर युद्ध चलता है और रात में जितना भी समय मिलता है, चौला और भीमदेव का प्रगल्भ प्रेम चलता है. युद्ध और प्रेम, दोनों का अंजाम क्या होगा, इसकी ज्यादा फिक्र करने में किसी को कोई फायदा नहीं दिखता. खैर, इसके जरा पहले ही एक नया सियापा यह देखने में आता है कि गंग सर्वज्ञ का उत्तराधिकारी, सोमनाथ मंदिर का पुजारी नंबर 2, शिवराशि नाम का आचार्य चौला में ही त्रिपुरसुंदरी के दर्शन करने लगता है. त्रिपुरसुंदरी शाक्त तंत्र की देवी हैं और उनकी पूजा में यौन प्रतीकों की बड़ी भूमिका है. कुछ खास तिथियों पर होने वाली उनकी बड़ी अर्चना में जिस स्त्री के सिर वे आ जाती हैं, पूजा के सारे विधि-विधान उसी पर आजमाए जाते हैं. संकेत है कि प्रसादस्वरूप वह पुजारी को मैथुन-संगी भी बनाती है.

 

सोमनाथ और त्रिपुरसुंदरी

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की खासियत है कि अपने जीवन भर के रचनाकर्म और राजनीति के केंद्र में जिस सोमनाथ मंदिर को वे रखते रहे, उसी के परिसर में ऐसे पूजा विधान के वर्णन और उससे जुड़ी मानसिकता के रेखांकन में वे न तो कहीं स्खलित होते हैं, न ही उसके बारे में बताते हुए कोई अतिशय कड़ा रवैया अपनाते हैं. ऐसी शाक्त रीति-नीति का पाशुपत पंथ के साथ जुड़ना अटपटा जरूर है लेकिन दोनों पंथों के बीच सदियों लंबा संश्लेषण जैसे कश्मीर में चला, कुछ हद तक असम और बंगाल में भी दिखाई पड़ा, वैसा ही गुजरात में भी हुआ हो सकता है.

लेकिन पुजारी नं. 2 शिवराशि के मिज़ाज में हो रहे रासायनिक परिवर्तन में आस्थाओं के विमर्श, टकराव या उनमें मौजूद किसी किस्म के दोहरेपन की कोई भूमिका नहीं है. उनकी आस्था चाहे जैसी भी हो, एक खोट उसकी जड़ में ही डेरा जमा चुकी है. इसमें वासना का घालमेल हो चुका है लेकिन इस बात को अंत-अंत तक वे स्वीकारते नहीं हैं.

ग़ज़नवी की फौजों के प्रभास गढ़ पर घेरा डालने से थोड़ा ही पहले देवी महोत्सव की सुबह-सुबह आचार्य शिवराशि को पता चलता है कि चौला कुछ सरशामी की हालत में है. खुद पर त्रिपुरसुंदरी की सवारी आने की बात वयस्क आयुवर्ग की एक देवदासी भी लगातार कह रही है और इसे साबित करने में वह जी-जान से जुटी है. लेकिन उसे पाखंडी घोषित करते हुए शिवराशि हैं शाक्त रुझान वाले बाकी पुजारियों के सामने न केवल इस बात पर अड़ जाते हैं कि देवी तो केवल चौला पर आई हुई हैं, बल्कि अपने समर्थकों को लेकर चौला के घर में घुस जाते हैं और उसकी माँ के विरोध को पैरों तले रौंदते हुए उसको उसी के घर में बंद करके चौला को देवी के पूजास्थल पर उठा लाते हैं.

अजीब बात है कि चौला किसी मजबूरी में नहीं, बड़े उत्साह से उनके साथ जाती है. यह प्रकरण देखने लायक है.

‘मंदिर के वृद्ध पुजारी ने हर तीन महीने के बाद भिन्न-भिन्न स्त्रियों में त्रिपुरसुंदरी को उतरते देखा था. उसके लिए यह नया अनुभव नहीं था. परंतु आज उसके भी होश-हवास जाते रहे.… चौला आई मंदिर में- दौड़ती. अधीर नयनों से उसने शिवराशि को बीच में खड़ा देखा, ‘शिवराशि, मेरे नाथ कहाँ हैं!’ ‘ये रहे’, शिवराशि ने दोनों भुजाएँ फैलाकर बताया. परंतु चौला में इस संकेत को समझने की शक्ति न थी. उसने शिवराशि को दूर हटाया और दौड़ती हुई गर्भद्वार में पहुंची, ‘मेरे नाथ, मैं आ गई. यह आई! यह आई!’ और वह मंदिर के शिवलिंग से लिपट गई तथा मनमाने ढंग से प्यार करने लगी. पीछे खड़े नर-नारी गर्भद्वार में से इस अद्भुत प्रणय को अत्यंत आदर से देख रहे थे.’

 

ग़द्दारी की दलील

किसी संयोगवश गंग सर्वज्ञ का चौला के घर पहुंचना, वहाँ बंद दरवाजे के भीतर से चीखती-चिल्लाती उसकी माँ से शिवराशि द्वारा चौला को उठा लिए जाने की सूचना प्राप्त होना और हर तरफ से बंद मंदिर में चल रहे त्रिपुरसुंदरी के गुप्त पूजा अनुष्ठान में ऐन मौके पर उनका प्रवेश पा लेना. उनके मानसिक द्वंद्व का चित्र मुंशी जी इन शब्दों में खींचते हैं-

‘गंग सर्वज्ञ की स्वस्थता क्षण भर को जाती रही. उनकी दृष्टि अनेक वर्षों के तप से विशुद्ध हो गई थी. जब वह छोटे थे तभी से उनको विश्वास हो गया था कि त्रिपुरसुंदरी की वाममार्गीय विधियों में अत्याचार और अधमता का अंश है. … पूर्ण इच्छा के बिना कोई इसमें दीक्षा न ले, दीक्षित हुए बिना इसे कोई देख न सके, स्वयं उनके या शिवराशि के बिना कोई इसका उत्सव न मना सके- इन नियमों को उन्होंने पहले ही से लागू कर दिया था. … चौला के विषय में उन्होंने यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि वे इस निर्दोष बालिका को वाममार्गीय दीक्षा नहीं दिलाएँगे.’

इस प्रकरण का अंत गंग सर्वज्ञ द्वारा चौला को मुक्त कराने, अपने साथ हिंसा पर उतारू और शिवराशि और अन्य साधुओं को फटकार कर पूजा बंद कराने और त्रिपुरसुंदरी के मंदिर को भी अस्थायी रूप में बंद करा देने में होता है, लेकिन यह सब करके वे अपने लिए शत्रुओं का एक जमावड़ा खड़ा कर लेते हैं. यह गुट उन्हें अपनी आस्था के विरोधी एक दुष्चरित्र निरंकुश व्यक्ति की तरह देखने लगता है और यह राय बना लेता है कि इस पाप की सजा गंग सर्वज्ञ के साथ-साथ प्रभास पाटण को भी मिलेगी. ग़ज़नवी का घेरा जब गढ़ पर पड़ता है तो शिवराशि के पीछे-पीछे इस साधू-गिरोह को भी लगता है कि उनकी बात सच होने जा रही है. तभी एक रात शिवराशि चौला को भीमदेव के साथ प्रणय में देखता है और ‘त्रिपुरसुंदरी को दूषित करने वाले’ राजा के विनाश को अपना परम कर्तव्य मान लेता है.

किस्से में एक छोटा सा मोड़ घोघागढ़ के राजकुमार सामंत चौहान द्वारा अपना कुल-खानदान गंवाकर किसी प्रेत की तरह पाटण वापस लौटने, लड़ाई के बड़े दायरे को भांपकर उसमें रणनीतिक लोच के साथ शामिल होने और चौला को एक बार देख लेने की लालसा लिए प्रभास गढ़ लौटने के रूप में आता है. एक सुबह वह भीमसेन से कुछ मंत्रणा करने उनके डेरे पर जाता है और वहाँ चौला को उनके साथ देख लेता है. उसके लिए यह दो महीने के अंदर दूसरी बार दुनिया बदल जाने जैसा है. एक बार अपने परिवार और राज्य का विनाश, दूसरी बार रोमाँस का. लेकिन इस उथल-पुथल ने उसे भीतर से इतना पका दिया है कि वह किसी धक्के वाली प्रतिक्रिया नहीं देता. चौला को अपनी बहन बताता है और राजा को पाँच प्रतिष्ठित लोगों के सामने तुरंत उससे विवाह कर लेने के लिए विवश कर देता है.

 

हार्ड लैंडिंग

उपन्यास में शिवराशि और उसके गिरोह की ग़द्दारी से ही प्रभास गढ़ में ग़ज़नवी की फौजों का प्रवेश और पाटण को पराजित होते दिखाया गया है. राजा खुद किले के भीतर चल रही लड़ाई में घायल होकर मृतप्राय पड़ा है. गंग सर्वज्ञ महज दो-चार दिनों की विवाहिता चौला को राजा के साथ सती करने के लिए चिता भी चुनवा चुके हैं. लेकिन तभी उन्हें गढ़ से निकलने का एक गुप्त रास्ता मिल जाता है और राजा को उठाकर चार-पाँच लोगों के साथ वे किसी सुरक्षित जगह निकल जाते हैं. वहाँ राजा भीमदेव को किसी तरह बचा लिया जाता है. ग़ज़नवी ने पाटण को जीत तो लिया है, लेकिन वहाँ ठहरना उसके लिए घाटे का सौदा बन जाता है. पीछे से गुजरातियों के हमले झेलता हुआ एक मुश्किल रास्ते से वह वापस लौट जाता है और उसकी अजेय फौजों को भगा देने का श्रेय भीमदेव के हिस्से आता है.

यहाँ से आगे का उपन्यास चौला के लिए एक किस्म की हार्ड-लैंडिंग का है. छुटपन से ही वह खुद को शिव की प्रेमिका मानती आई थी. भीमदेव पर उसने शिव की युद्धरत छवि को ही आरोपित कर रखा था और मानने लगी थी कि उनकी पत्नी बन जाने के बाद उसका प्रेम, उसकी भक्ति और उसका सारा कला-कौशल अपनी मंजिल हासिल कर चुका है. लेकिन यह बमुश्किल पंद्रह-सोलह की एक ऐसी लड़की की सोच थी, जो कुछ समय के लिए भीतर ही नहीं, बाहर से भी त्रिपुरसुंदरी बन गई थी. यहाँ से आगे एक गर्भवती स्त्री के रूप में वह अपने शरीर में हो रहे परिवर्तन देखती है और भीमदेव को कूटनीतिक स्थिरता वाले एक राजनीतिज्ञ के रूप में परिपक्व होता हुआ पाती है.

यह सब उसकी नजर में एक किस्म का प्रदूषण है. जिस दुनिया में वह जी रही थी, वह सदा के लिए उजड़ चुकी है. दुनियादारी उसके लिए दुःस्वप्न सरीखी है, जिसका अंत नवनिर्मित प्रभास गढ़ में राजाओं की सभा के बीच नए सिरे से बनाए गए शिवलिंग के सामने उसके उन्मादी नृत्य के बाद लिंग पर ही सिर पटक कर हुई उसकी मृत्यु में होता है.

 

मुंशी जी की विचारयात्रा

इस सार-संक्षेप से एक बात तो जाहिर है कि कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की रचना दृष्टि में ‘विदेशी आक्रमणों का शिकार हिंदू भारत’ की विचारधारा भले ही एक केंद्रीय तत्व की तरह मौजूद हो, लेकिन अपने लेखन में वे आत्मा के अन्वेषण वाली शर्त की कहीं से भी अनदेखी नहीं करते. वे अरविंद घोष (श्री अरविंदो) के शिष्य थे. एक समय सशस्त्र क्रांति से भी उनका कुछ जुड़ाव हुआ करता था. उनकी राजनीतिक विचारधारा हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता के बीच आवाजाही करती रही, लेकिन इसकी उपस्थिति को उनके लेखन में सरलीकृत करके नहीं देखा जा सकता.

वे जवाहरलाल नेहरू से दो साल बड़े और डॉ. राधाकृष्णन से एक साल छोटे थे, लेकिन अपनी साहित्यिक कृतियों और ‘सोमनाथ उद्धार’ को लेकर चलाए गए धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन के बल पर तत्कालीन भारतीय मध्यवर्ग के मन में उनका मुकाम एक लेखक से ऊंचा हो गया था. 1920 के दशक में उनकी राजनीति चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू की स्वराज पार्टी से शुरू हुई थी. नमक सत्याग्रह और दांडी यात्रा के वक्त वे गांधी के अनुयायी बनकर कांग्रेस में आए. लेकिन तीस दशक के अंत में मुस्लिम लीग जब पाकिस्तान की माँग को लेकर डट गई तो जवाब में उन्होंने अहिंसा का दामन छोड़कर ‘अखंड हिंदुस्थान’ के लिए गृहयुद्ध की हद तक जाने की बात भी कही.

नतीजा यह हुआ कि गांधीजी ने उन्हें कांग्रेस पार्टी छोड़ देने की सलाह दी, जो उन्होंने तुरंत मान ली. फिर 1946 में भारत का स्वतंत्र होना तय जानकर गांधी के ही बुलावे पर वे कांग्रेस में लौटे, संविधान सभा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उत्तर प्रदेश के पहले राज्यपाल बने, लेकिन अपना यह कार्यकाल समाप्त होते ही दोबारा अखंड हिंदुस्थान आंदोलन की शुरुआत कर दी. उनकी इस टेढ़ी-मेढ़ी राजनीतिक-वैचारिक यात्रा का समापन विश्व हिंदू परिषद की स्थापना करने और फिर बीजेपी के पूर्ववर्ती दल जनसंघ की सदस्यता ग्रहण करने में हुआ. अभी, मोदी युग में हिंदुत्व विचारधारा की जो शक्ल हमारे सामने है, उसमें केएम मुंशी जैसे रचनाकारों के लिए भला क्या जगह हो सकती है?

 

 

2.

भर्तृहरि : काया के वन में

दो समयों में फंसा एक युग-चरित्र

जन्म-मृत्यु जैसी जरूरी जानकारियाँ न तो हम अबतक गुरु गोरखनाथ के बारे में जुटा पाए हैं, न राजा भरथरी के. गाथाओं में भरथरी गोरख के शिष्य कहलाते हैं. जोगियों के गायन में बहुत प्रिय चरित्र की तरह आने वाले राजा गोपीचंद की माँ मयनावती (मैनामती) इन्हीं भरथरी की बहन बताई जाती हैं. लेकिन किस्सों वाले भरथरी के साथ एक मुश्किल यह है कि वे संस्कृत के एक चिंतक कवि भी हैं और उनके ग्रंथ छूते ही किस्सों का रंग उड़ने लगता है.

महेश कटारे

तह में जाने पर देश के आधे से ज्यादा भूगोल में और समाज के सभी स्तरों तक लोकप्रिय इन दोनों चरित्रों के बारे में जितना पता चल सका है, उसके मुताबिक भरथरी (भर्तृहरि) का समय गोरख से पाँच-छह सौ साल पहले का है. यानी परंपरा चाहे जो भी कहे, गोरख का चेला भरथरी को दो ही सूरतों में साबित किया जा सकता है. एक तब, जब ईसा की पहली सहस्राब्दी के मध्य में और दूसरी की शुरुआत में भरथरी नाम के दो अति प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हों. और दूसरी तब, जब लोकप्रिय गाथाओं में इतिहास के कार्य-कारण संबंधों की परवाह करना हम बिल्कुल बंद ही कर दें.

अभी के दौर के एक बड़े कहानीकार महेश कटारे का उपन्यास ‘भर्तृहरि : काया के वन में’ अपने नायक को देश-काल में पसरे बौद्धिक की तरह देखता है और भर्तृहरि-गोरख के साझा किस्सों में आए ऐतिहासिक विरोधाभास को साफ छोड़ देता है. 2012 में ‘कामिनी काय कांतारे’ नाम से आई इस किताब के पहले संस्करण की भूमिका में कटारे ने असल भरथरी के फेरे में पड़ने के बजाय अपना भर्तृहरि खोजने की बात कही है, और ऐसा ही किया भी है.

रही बात भरथरी के गोरख का चेला होने की तो किस्सों में आई इस गुत्थी का समाधान लेखक ने अपनी किताब के लगभग आधे हिस्से में गोरख का कोई जिक्र ही न करते हुए किया है. नाथपंथी दंतकथाओं में सुनाई पड़ने वाले चमत्कार हमें किताब की शुरुआत से ही दिखाई देते हैं लेकिन गोरख का नाम पहली बार पृष्ठ 132 पर आता है- ‘‘अलख-अलख-अलख! गोरख-गोरख-गोरख!’ वैखानस एक चिंघाड़ के साथ उठ खड़े हुए और जोर-जोर से श्रृंगी फूंकने लगे.’ इस तकनीक से वे गोरख को वैराग्य की एक विशिष्ट शैव परंपरा के कहीं बीच में अवस्थित करते हैं.

 

भरथरी और गोरख का समय

आगे बढ़ने से पहले एक बात साफ कर लें कि भरथरी के समय से जुड़ी स्पष्टता कहीं पीछे की नहीं, बीसवीं सदी की ही उपलब्धि है. पहले उन्हें गोरख का समकालीन और आयु में संंभवतः थोड़ा छोटा माना जाता था तो इसकी वजह यही थी कि दोनों के समय को जानने का कोई तरीका ही नहीं था. गोरखनाथ को लेकर कुछ धुंधलका आज भी बना हुआ है, लेकिन धुंध का दायरा बमुश्किल सौ-पचास वर्षों का ही है, भरथरी की तरह पाँच-छह सौ वर्षों का नहीं.

धुंध की इस याँत्रिकी को समझने के लिए हम कुछेक हालिया खोजों पर एक नजर डालते हैं. प्रमाणवादी बौद्ध दार्शनिक दिङ्नाग की ग्रंथ-सूची विशाल है लेकिन हम उन्हें उनके मूल रूप में नहीं, तिब्बती से अंग्रेजी या जर्मन में किए गए अनुवाद के जरिये, या जहाँ-तहाँ संस्कृत में की गई पुनर्प्राप्ति के जरिये ही पढ़ सकते हैं.

जापानी मूल के प्रसिद्ध भाषा-दार्शनिक (लिंग्विस्टिक फिलॉस्फर) मसाकी हटोरी ने तिब्बती पाठ के कुछ जरूरी अंशों को संस्कृत में पुनर्प्राप्त करने संबंधी जर्मन विद्वानों के प्रयास का उपयोग करते हुए 1968 में एक अद्भुत काम किया. बाकायदा हिस्से उद्धृत करके उन्होंने बताया कि दिङ्नाग ने अपने प्रमुख ग्रंथ ‘प्रमाणसमुच्चय’ में भर्तृहरि की किताब ‘वाक्पदीय’ के श्लोक उद्धृत किए हैं. इससे भर्तृहरि के समय को लेकर उन्होंने एक बड़ा निष्कर्ष निकाला. दिङ्नाग की मृत्यु 530 से 540 ई. के बीच होना सिद्ध है, यानी भर्तृहरि का जीवन 540 ई. से पहले ही बीत चुका होगा. दोनों का समय एक रहा हो तो भी उनकी ऊपरी रेखा सन 540 से बहुत आगे नहीं खिंच सकती.

ध्यान रहे, दिङ्नाग के लिए भर्तृहरि एक प्रतिपक्षी लेखक हैं. उनके नाम और ग्रंथ का उल्लेख न करते हुए उनके उद्धरण सिर्फ इसलिए दिए गए हैं ताकि उन्हें सामने रखकर उनमें आई शब्द और अर्थ संबंधी प्रस्थापनाओं का खंडन किया जा सके. ऐसे जो चार श्लोक शब्दशः पहचाने जा सके हैं, वे हैं- वाक्पदीय कांड 1 का 18वां, 44वां और 123वां तथा कांड 2 का 31वां. ऐसा ही कांड 1 के पहले, 106वें और 140वें श्लोक के साथ भी किया गया है लेकिन उन्हें उद्धृत करने के बजाय उनका भावार्थ बताते हुए. भाषाशास्त्र में भर्तृहरि अपने ‘स्फोट सिद्धांत’ के लिए जाने जाते हैं, यानी ‘शब्द अपना अर्थ लिए हुए आते हैं, वाक्य में यह संपूर्ण होता है’. दिङ्नाग का मानना है कि शब्दों के अर्थ संदर्भ के अनुसार, तुलना के जरिये ही स्पष्ट होते हैं. बुद्ध की स्थापना- ‘भाषा व्यवहार की उपज है’ का विस्तार.

दूसरी तरफ, लिखित रूप में गोरख का पहला जिक्र चटगांव (बांग्लादेश) के एक शिलालेख में मिलता है, जिसका लेखन-समय सन 1091 ई. दर्ज है. इसके पहले कहीं उनका कोई हवाला नहीं मिलता. शिलालेख लिखवाने वाले राजा के लिए पूज्य होने में लंबा समय लगा होगा, लेकिन इस योगी का वक्त बहुत पीछे भी नहीं खींचा जा सकता. गोरख को एक आम इंसान की तरह ही देखना हो तो हम मान सकते हैं कि उनके योगी बनने का समय 1030 ई. के आसपास का ही होगा, जब भारत में महमूद ग़ज़नवी की फौजों का आना-जाना लगा हुआ था. उनकी उक्तियों में हिंदू और मुसलमान का एक-सा जिक्र, इन दोनों ही उभरती पहचानों से एक-सी बहस भी ऐसा ही संकेत देती है. ‘हिंदू मंदिर में और मुसलमान मस्ज़िद में ध्यान लगाता है, जोगी परम पद को ध्याता है जहाँ न मंदिर है न मस्ज़िद.’

हिंदू ध्यावे देहुरा, मुसलमान मसीत I
जोगी ध्यावे परम पद, जहं देहुरा न मसीत II

 

दो तरह के द्वंद्व

भरथरी और गोरख, दोनों किस्सों के धनी हैं. भारत में शायद ही कोई इलाक़ा हो, जहाँ के लोग गुरु गोरखनाथ और राजा भरथरी के बारे में कुछ न जानते हों. दोनों का लिखा और कहा हुआ लंबे अर्से से लोगों की जुबान पर है तो लोगों ने भी इनके बारे में काफी कुछ कह रखा है. ऐसे में, तथ्यों की चिंता किए बिना भी कोई इनपर अलग-अलग या दोनों को मिलाकर उपन्यास लिखने का मन बना सकता है. कुछ लिखे जा चुके हैं, कुछ आगे भी लिखे जाएँगे. ऐसी रचनाओं को इतिहास की तरह पढ़ने की जरूरत नहीं है. हाँ, लेखक अच्छा हुआ तो अपनी कल्पनाशक्ति से उनके माहौल में जाने की कोशिश करेगा और पढ़ने वालों को इसमें अपना ही कोई अलग आयाम खुलता दिखेगा.

भर्तृहरि पर लौटते हैं- राजा, कवि और वैयाकरण. इंद्रियों के अनुभव में लिपटा हुआ, साथ में वैराग्य और भाषाशास्त्र को साधने का प्रयास भी करता हुआ. महेश कटारे ने अपनी भूमिका में ह्वेनसांग के एक पीढ़ी बाद भारत आए चीनी यात्री ईत्सिंग (यीछिंग) को उद्धृत किया है- ‘भरथरी सात बार योगी बना और सात बार गृहस्थी में आया.’ संभव है, ईसा की सातवीं सदी में इस चरित्र को लेकर ऐसी चर्चा रही हो लेकिन भागता रहने वाला राजा राज क्या चलाएगा?

‘भर्तृहरि : काया के वन में’ भरथरी के जीवन में ज्यादा नहीं, कुल चार औरतों के लिए जगह बनाता है.

एक उनकी रानी.
एक दासी, जिसे रानी ने ही वक्त जरूरत राजा के साथ सो जाने की इजाज़त दे रखी है और जो उपन्यास के बीच में उनकी एकमात्र संतान को भी जन्म देती है.
एक जंगल में रहने वाले उनके प्रजावर्ग की लड़की.
और एक प्रसिद्ध वेश्या जिसके संक्षिप्त सान्निध्य के लिए राजाओं और सेठों की कतारें लगी रहती हैं.

भरथरी का राज्य छोड़कर भागना भी यहाँ कुल दो बार ही होता है. गोरखनाथ कहानी के अंत में सिर्फ दर्शन देने आते हैं लेकिन उनका एक चेला ‘रिलीफ मटीरियल’ की तरह किताब में दिखता रहता है और माहौल बनाने में बड़ी मदद करता है.

 

पुख्ता कहानी फिर से सुनाना

आगे हम कहानी में थोड़ा भीतर भी जाएँगे, लेकिन पहले ही बता दूं कि लेखक ने भर्तृहरि की पड़ताल ‘संसार के भीतर रहें या बाहर’ वाले द्वंद्व में फंसे व्यक्ति की तरह नहीं की है. उनकी बेचैनी किसी लेखक, कलाकार या चिंतक जैसी लगती है. पहली बार उनके घर से निकलने का मुख्य कारण अपनी पत्नी की बेवफाई है-

वही किस्सा कि किसी योगी से मिला अमरफल राजा ने अपनी रानी को दिया, रानी ने अपने प्रेमी को, प्रेमी ने वेश्या को और वेश्या ने वापस राजा को.

किताब की तेज शुरुआत के लिए महेश कटारे इस किस्से को पीछे रखकर घोड़े पर सवार राजा पर अपनी नजरें टिकाते हैं, जो राज्य और रिश्तों को निराधार मानकर एक बरसाती अंधेरी रात में कहीं चला जा रहा है.

जिन भी लोगों को राह चलते जोगियों का सारंगी पर गाया हुआ राजा भरथरी का गीत जीवन में कभी सुनने को मिला है, वे अच्छी तरह जानते होंगे कि इस किस्से के नोडल पॉइंट पथरीली जमीन पर लोहे के खूंटों की तरह सदियों से ठुंके हुए हैं. ढांचागत कल्पना की कोई गुंजाइश इस किस्से में नहीं है. कहानी का अंत राजा भरथरी द्वारा अपने महल में लौटकर रानी पिंगला को माता कहकर उनसे भिक्षा माँगने में होता है. ऐसा ही अंत राजा गोपीचंद के किस्से का भी होता है- कुछ साल गुरु के पीछे भटक लेने के बाद महल जाना, पत्नी पाटन को माँ कहकर भिक्षा माँगना.

शिवप्रसाद सिंह अपने उपन्यास ‘नीला चाँद’ में राजा भरथरी को उस समय प्रवेश दिलाते हैं, जब उन्हें वैराग्य लिए, संन्यासी हुए लंबा वक्त गुजर चुका है. वहाँ वे भरथरी को राजा भोज का वारिस दिखाते हैं. रानी पिंगला की दुष्चरित्रता के किस्से को उनका नायक कीर्तिसिंह चंदेल विरोधी राजाओं- भीमदेव चालुक्य (के.एम. मुंशी के उपन्यास ‘जय सोमनाथ’ का नायक) और लक्ष्मीकर्ण कलचुरी- का षड्यंत्र बताते हुए भरथरी की लानत-मलामत करता है. एक स्थापित कहानी में बाहर से की गई इस गैरजरूरी छेड़छाड़ से इसका कोई अलग अर्थ नहीं खुलता.

रही बात महेश कटारे के उपन्यास की तो इसके दृश्य जगह-जगह बांधते हैं लेकिन कथ्य में मौजूद बुनियादी दुविधा किनारे के किस्सों पर किताब की निर्भरता कुछ ज्यादा ही बढ़ा देती है. नई स्त्रियों का जीवन में आना जिस पुरुष के लिए इतना सहज हो, वह अपनी पत्नी का संबंध किसी अन्य पुरुष से होने की सूचना मिलते ही बिना उससे कुछ पूछे सर्वस्व त्यागने पर उतारू हो जाए, यह बात बहुत अटपटी लगती है. थोड़ा समय इधर-उधर बिताकर वह लौटता है और उपन्यास के पचास पन्ने पार होते ही दोबारा निकल लेता है. इस बार पूरी तरह जोगी बन जाने के लिए! अभी तो उसके पास बेवफाई जैसी कोई दलील भी नहीं है. लगता है, कोई नई किताब लिखने के लिए घर से निकल रहा है!

 

लोकेशन की समस्या

समस्या इस चरित्र की लोकेशन में लगती है. ‘नीति शतक’, ‘श्रृंगार शतक’ और ‘वैराग्य शतक’ जैसी अंतर्दृष्टिपूर्ण किताबें लिखने वाला रचनाशील व्यावहारिक चिंतक, ‘वाक्पदीय’ लिखने वाला भाषाशास्त्री अपने निजी जीवन में संलिप्तता और निर्लिप्तता के बीच झूलता रह सकता है. ‘काम’ उसके लिए एक दार्शनिक समस्या हो सकता है. स्त्री-पुरुष संबंध के मामले में अपने से थोड़ा पहले हुए कालिदास जैसे कवियों वाला भरोसा वह खुद में नहीं पाता. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि उसके समय में पुरुष पर स्त्री की निर्भरता भी पहले जैसी नहीं रह गई है.

रिश्तों का यह अलग मिज़ाज, जो विष्णु प्रभाकर जैसे आधुनिक रचनाकार को भी चारित्रिक अधोगति का चरम बिंदु लगता है, कवि भर्तृहरि के युग की विशिष्टता है. यह ‘बृहत्कथा’ (इसकी बहुत बाद की कहन अभी ‘कथासरित्सागर’ के रूप में मौजूद है) और ‘कादंबरी’ जैसे उस दौर में लिखे गए ग्रंथों में भी नजर आती है. लेकिन पीछे बुद्ध और आगे गोरख की तरह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाना भी भर्तृहरि के एजेंडे पर रहा हो, ऐसा कोई सुराग उनकी रचनाओं से नहीं मिलता. तात्पर्य यह कि पत्नी को माँ कहकर भिक्षा माँगने वाले योगी भरथरी को कवि (शायद राजा भी) भर्तृहरि के साथ जोड़कर देखने से लिखाई के लिहाज से इस चरित्र में एक बुनियादी असंगति पैदा हो जाती है.

महेश कटारे को कुछ हद तक इस समस्या का अंदाजा है, लिहाजा वे किनारे की कहानियों के जरिये पाठक को इंगेज किए रहते हैं. ऐसी कहानियाँ कई सारी हैं लेकिन इनमें सबसे ज्यादा देर तक घात-प्रतिघात उन चरित्रों के ही चलते हैं, जो राजधानी अवंति के कुछ प्रतिष्ठित नागरिकों और वहाँ से ठीक-ठाक दूरी पर स्थित एक चिकित्सा-आश्रम के अधिवासियों के बीच चलते हैं. वर्तमान समय से हजार-डेढ़ हजार साल पहले के महानगरीय जीवन का यह झरोखा दर्शन मशहूर फ्रांसीसी कॉमिक श्रृंखला ‘एस्ट्रिक्स एँड ओबेलिक्स’ की याद दिलाता है, जहाँ ग्रामीण समाज गॉल (फ्रांस) के दो जन प्राचीन रोम के महानगरीय परिवेश में अपने लिए कुछ रास्ते निकालते हैं. पुराने समाज के दोहरे रिश्तों को देखकर कथावस्तु और लेखन, दोनों की व्यंजना पर मुस्कराते रह सकें, लेखक की शक्ति का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है. जादू-मंतर के चित्र भी बांधने वाले हैं लेकिन भय व्यंग्य जितना सघन नहीं है.

एक अंतिम बात किताब की भाषा पर कहना जरूरी है. रचना की भाषा वही होनी चाहिए जो आपको उसकी दुनिया में तो ले जाए, लेकिन आपकी अपनी दुनिया से इतनी दूर भी न चली जाए कि पढ़ते हुए हर वाक्य में अटकना पड़े. महेश कटारे की भाषा काफी कुछ अपना संतुलन साध ले जाती है लेकिन जंगल में रहने वाले लोग भालू को भल्लुक, चीते को चित्तक, नदी या झील को पयस्विनी कहें, इसका क्या औचित्य हो सकता है?

कोई कहेगा, भर्तृहरि पर लिखी किताब की भाषा उनकी अपनी संस्कृत के करीब ही होनी चाहिए. लेकिन किताब आधी गुजर जाने पर जब माहौल सिद्धों-नाथों वाला हो जाता है तब? वह दौर तो संस्कृत से दूर जाने का है. लेकिन उपन्यास यह हो, या शिवप्रसाद सिंह का ‘नीला चाँद’, या हजारीप्रसाद द्विवेदी का ‘चारु चंद्रलेख’, हर जगह पुराने का मतलब संस्कृत ही दिखता है!

 

३.
‘नीला चाँद’

हजार साल पहले का बनारस

शिवप्रसाद सिंह

कवि शमशेर बहादुर सिंह की जयंती मनाने के लिए हम सहारनपुर स्थित उनके गांव एलम गए थे. यह शायद 2023 के बीतते नवंबर की बात है. वहाँ एक कॉलेज में हुए इस आयोजन में वक्तव्यों का दौर समाप्त होने और कवि सम्मेलन शुरू होने के बीच नाश्ते-पानी के दौरान मित्रों में भारत से बौद्ध धर्म की विदाई वाले दौर को लेकर कुछ चर्चा शुरू हो गई.

इसमें वज्रयान का जिक्र उठना लाजमी था. मेरे पुराने साथी, प्रसिद्ध कहानीकार अनिल यादव ने इसी क्रम में कहा कि कभी वज्रयानियों की भारत में इतनी हनक थी कि वे महल में घुसकर राजकुमारियों तक को उठा ले जाते थे. मैंने उनसे पूछा कि यह विवरण उन्हें कहाँ से प्राप्त हुआ तो उन्होंने शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास ‘नीला चाँद’ का हवाला दिया.

मैं उसी समय इस किताब को पढ़ने के लिए व्याकुल हो उठा, लेकिन मेरे हाथ यह एक महीने बाद ही लग पाई. हम किताब पर आएँ, उससे पहले कुछ बातें अपन व्याकुलता के कारण पर.

कई सौ साल भारत में बौद्ध धर्म की मुख्यधारा जैसी भूमिका निभाने वाले वज्रयान पंथ को लेकर ठोस ऐतिहासिक जानकारियाँ हमारे पास दुर्भाग्यवश, आज भी इतनी नहीं जमा हो पाई हैं कि इसके बारे में कोई तथ्य-आधारित राय बनाई जा सके. पड़ोस के तिब्बत क्षेत्र में बौद्ध धर्म की चारों प्रमुख शाखाएँ चिंतन में महायानी और कर्मकांड में वज्रयानी हैं. वहाँ तो वज्रयान के बारे में कहीं कुछ भी बुरा सुनने को नहीं मिलता. यही हाल नेपाल का भी है, जहाँ नेवार बुधिज्म और तामाँग बुधिज्म, दोनों ही में वज्रयान की केंद्रीय भूमिका है. उस दिन एलम में अनिल की बात सुनकर पहले तो मुझे यही लगा कि ‘नीला चाँद’ लिखते हुए शिवप्रसाद सिंह शायद भारत में बौद्ध धर्म की वापसी के साथ ही जड़ें जमा चुके वज्रयान-विरोधी दुराग्रहों से प्रभावित रहे हों. फिर भी एक खटका मन में जमा रह गया.

मंत्र-तंत्र और टोने-टोटके वज्रयान में रहे ही हैं. साधना में कुछ ऐसी चीजों का उपयोग भी वहाँ होता रहा है, जिनका त्रिपिटक में दिखने वाली तार्किकता और दृढ़ नैतिकता से कोई मेल नहीं बनता. पालवंश का राजधर्म बन जाने के बाद इस पंथ में राजकाज से जुड़ी कुछ विकृतियाँ भी आई होंगी, जो अन्यथा इसका हिस्सा शायद न बनतीं. ये सारी बातें भारत के किसी एक धर्म तक सीमित नहीं हैं, लेकिन इस देश में जिस धर्म के आखिरी दौर की पहचान ऐसे वितंडा के साथ जुड़ जाए कि उसके लोग महल में घुसकर राजकुमारी तक को उठा ले जाते थे, उसके बारे में अपनी समझ स्पष्ट किए बिना ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’ जैसी किताब लिखना मुझे अपनी ही नजर में नीचे गिरा देगा.

इस अपराधबोध के साथ मैंने ‘नीला चाँद’ ठीक से पढ़ी और पढ़कर हल्का महसूस किया. उपन्यासकार की इतिहास संबंधी गंभीरता दर्शनीय है, लेकिन वज्रयान के मामले में यह कमोबेश किसी मुंबइया स्क्रिप्ट राइटर के काम जैसा ही है. अनिल यादव को एक वज्रयानी खलनायक के इर्दगिर्द बुना गया यह प्रकरण किताब पढ़ने के सालों बाद भी याद था, इससे यह नतीजा निकलता है कि तथ्यों को लेकर एक बड़े साहित्यकार की असावधानी, या उसका किसी रौ में बह जाना समाज की किसी धारा से जुड़ी नकारात्मक पूर्वधारणाओं को स्थायी बना देने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है. (यह बात यहाँ लेखक शिवप्रसाद सिंह को ध्यान में रखते हुए कही जा रही है, पाठक अनिल को नहीं.)

वज्रयानी साधकों की महामुद्रा-साधना को उनकी दुष्चरित्रता के प्रमाण की तरह प्रस्तुत करने वाले भारत तक ही सीमित नहीं हैं. चीन और तिब्बत में भी कभी न कभी उनकी उपस्थिति हुआ करती थी और वहाँ भी इसे बौद्धों के दमन का आधार बनाया गया. भारत में इसके लिए मध्यकालीन खंडित मूर्तियों और तिब्बती मठों में मिली गोपन थंका पेंटिंगों को नजीर बनाया जाता रहा है लेकिन यह निंदक दलील भी यहीं तक जाती है कि वज्रयानी साधक कमजोर वर्ग की लड़कियों को बहला-फुसला कर उन्हें अपनी महामुद्रा (जोड़ा साधना की सहायिका) बना लेते थे.

लेकिन वज्रयानी इतने दुष्ट और शक्तिशाली थे कि घोड़े पर चढ़कर महल में घुस जाते थे और महामुद्रा बनाने के लिए राजकुमारियों का अपहरण कर लेते थे, ऐसा पिछले दसेक साल की खोजबीन में मुझे सिर्फ और सिर्फ एक जगह- यहीं ‘नीला चाँद’ उपन्यास में पढ़ने को मिला. किताब के अंत में शिवप्रसाद सिंह जी ने एक लंबी संदर्भ सूची भी दे रखी है, लेकिन इस विवादित प्रसंग को स्वयंसिद्ध मानकर इसके लिए कोई स्रोत देना उन्होंने जरूरी नहीं समझा है.

 

हजार साल पहले की राजनीति

उपन्यास के बारे में और कुछ भी कहने से पहले इसकी शक्ति के बारे में चर्चा करनाो मुझे जरूरी लगता हूँ. अब से एक हजार साल पहले के भारत में इतने सारे ऐतिहासिक और अर्ध-ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का कोलाज ‘नीला चाँद’ के अलावा अब तक अपनी पढ़ी हुई और किसी भी रचना में मैंने नहीं पाया. उपन्यास का समय 1060 ई. से शुरू होता है और अगले कुछ सालों तक चलता रहता है. किताब की ताकत यह है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों की लगभग संपूर्ण अनुपस्थिति वाले उस समय के राजाओं और बौद्धिकों का बाकायदा एक बाइस्कोप यहाँ देखने को मिलता है.

महमूद ग़ज़नवी के हमलों के समय सत्ता में मौजूद दो राजाओं- जेजाकभुक्ति (बुंदेलखंड) के राजा विद्याधर चंदेल और पश्चिमी मध्य प्रदेश से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक राज करने वाले गांगेयदेव कलचुरी के बारे में ठीकठाक सामग्री इसमें है और सोमनाथ आक्रमण के समय दक्षिणी-पूर्वी गुजरात में ग़ज़नवी का सामना करने वाले चालुक्य भीमदेव सोलंकी का जिक्र भी इसमें आया है. 11वीं सदी में उत्तर भारत के चार प्रतापी राजवंशों- प्रतिहार, चंदेल, कलचुरी और गाहड़वाल के कुछ प्रतिनिधि इस कहानी के केंद्र में ही हैं, साथ में बंगाल के पालवंश, असम के बर्मन वंश और कश्मीर के लोहारा वंश (नाम में कुछ झोल है) के प्रतिनिधि भी उपन्यास के आखिरी अध्यायों में मौजूद हैं.

भारतीय इतिहास में इन राजवंशों की भूमिका याद करनी हो तो गुर्जर-प्रतिहार वंश का उदय आठवीं सदी ईसवी के तीसरे दशक में अरब हमलावरों की राह रोकने के क्रम में हुआ था और अगले तीन सौ साल तक यह भारत का सबसे शक्तिशाली राजवंश रहा. बीच में कन्नौज पर कब्जे को लेकर कर्नाटक से आए राष्ट्रकूटों और बंगाल से आए पालों के साथ उसने दो सौ साल लंबा त्रिपक्षीय युद्ध लड़ा और अंततः उसका विजेता भी सिद्ध हुआ. लेकिन 11वीं सदी की शुरुआत में ग़ज़नवी का सामना उससे नहीं करते बना और लड़ाई लगने से पहले ही पीछे हट गए राज्यपाल नाम के उसके आखिरी शासक को एक समय उसके सामंत रहे चंदेल वंश के राजा विद्याधर ने ही मार डाला.

इस संबंध में महोबा शिलालेख का एक श्लोक शिवप्रसाद सिंह ने अपने परिशिष्ट में भी उद्धृत किया है, जिसका शाब्दिक अर्थ इस प्रकार है-

‘भगवान के काम में लगे हुए श्रीविद्याधरदेव ने एक महायुद्ध में अचानक (या संकल्प बांधकर) अनेक बाणों से श्रीराज्यपाल की गले की हड्डी काटकर उन्हें मार दिया.’

श्रीविद्याधरदेवकार्यनिरतः श्रीराज्यपालं हठात्‌ I
कण्ठास्थिच्छिदनेकबाणनिवहैर्हत्वा महत्याहवे II

‘नीला चाँद’ विद्याधर की तीसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि कीर्तिसिंह चंदेल की कीर्तिगाथा है, लिहाजा इस श्लोक का बिल्कुल सीधा अर्थ लेते हुए लेखक ने विद्याधर को सचमुच भगवान के काम में लगा हुआ (देवकार्यनिरतः) मान लिया गया है. किताब के परिशिष्ट में यह भी बताया गया है कि कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और अन्य विद्वान लेखकों ने भी विद्याधर को मुसलमानों का मुकाबला करने वाला, उन्हें दक्षिण और मध्य भारत में बढ़ने से रोक देने वाला एक धर्मसम्राट कहा है. लेकिन विद्याधर और ग़ज़नवी की सेनाएँ आमने-सामने होने का जिक्र इतिहास में सिर्फ एक बार आता है, उसमें भी लड़ाई होने और किसी की जीत, किसी की हार होने जैसे ब्यौरे नहीं आते.

महमूद ग़ज़नवी और उसके वंश का यश गाने वाले इतिहासकारों अल उतबी और बैहाकी ने विद्याधर को अपने सुल्तान का मित्र कहा है और इतिहासकार आरसी मजूमदार के यहाँ इस आशय के उद्धरण भी मिलते हैं. विद्याधर द्वारा अपनी शरण में आए एक सेलजुक तुर्क शहजादे को महमूद के कहने पर बंदी बना लेने की प्रशंसा करते हुए महमूद का एक धन्यवाद-ज्ञापन पत्र खुद में एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह आज भी संरक्षित है. इसके आधार पर संभावना यही दिखती है कि ग़ज़नवी को गंगा घाटी में चढ़ता देख विद्याधर ने गुर्जर-प्रतिहार वंश का किस्सा खत्म कर दिया और हमलावर से दोस्ती बनाकर खुद को ‘देवकार्यनिरतः’ भी घोषित कर दिया. राष्ट्रवादी नजरिये से देखने पर यह एक धूर्ततापूर्ण देशद्रोही कृत्य ही लगेगा, लेकिन शिवप्रसाद जी ने इसे ‘विवादास्पद’ शब्द से निपटा दिया है.

कलचुरी वंश को भारत के कई इलाकों में अलग-अलग वंश परंपराओं के जरिये राज करने वाला कुल माना जाता रहा है. इतिहास में इसका वर्णन कहीं हैहयवंशी तो कहीं यदुवंशी शासकों के रूप में आता है लेकिन इसका उदय प्राचीन चेदिगण से हुआ है, यह बात निर्विवाद है. (जातियों के उदय से पहले ‘गण’ शब्द भारत की पुरानी, कबीला नुमा सामाजिक संरचनाओं के लिए आता था.) कलचुरियों की कुल पाँच-छह शाखाओं के नाम इतिहास में मिलते हैं और उनका विस्तार हिमालय की तराई से लेकर कर्नाटक तक और छत्तीसगढ़ से गुजरात तक दिखाई पड़ता है.

यहाँ 11वीं सदी ईसवी में बनारस से राज करने वाले जिस कलचुरी वंश का जिक्र है, उसका उभार मौजूदा जबलपुर के पास त्रिपुरी नाम की जगह से हुआ था. कभी वे त्रिपक्षीय युद्ध के तीन पक्षों में एक, कर्नाटक से आए राष्ट्रकूटों के सामंत हुआ करते थे. अपने दौर के अबौद्ध राजवंशों में बौद्ध पाल शासकों से वैवाहिक रिश्ते जोड़ने वाला यह शायद अकेला ही था. प्रतिष्ठित बौद्ध आचार्य, विक्रमशिला महाविहार के प्रमुख दीपंकर श्रीज्ञान 1041 ई. में अंतिम रूप से तिब्बत रवाना होने से पहले पालवंश और कलश के बीच स्थायी सुलह कराकर गए थे और रिश्तों की पुख्तगी के लिए कलचुरी राजकुमार यशःकर्ण का विवाह एक पालवंशी राजकुमारी से कराया था. यह तभी संभव हुआ होगा, जब अपने समय के प्रायः सारे राजवंशों की तरह खुद को राजपूत मनवाने का आग्रह इसमें अपेक्षाकृत कम रहा हो.

रही बात गाहड़वालों की तो इस उपन्यास में उनकी भूमिका सत्ता से वंचित एक ऐसे राजवंश की है, जिसका ठिकाना बनारस के पास ही कहीं है. वे गुप्तवास में रह रहे चंदेलों को अपने यहाँ अड्डा बनाकर काम करने की इजाज़त देते हैं, और कलचुरियों से लड़ाई में चंदेलों की सहायता करते हैं. इस उपन्यास में गाहड़वालों की जड़ें भर जमती दिखाई गई हैं, लेकिन बाद में यह वंश शक्तिशाली होता गया. शासन का केंद्र बनारस में ही होने के बावजूद इतिहास में इसकी प्रसिद्धि कन्नौज के शासक की बनी रही. बाद में, इस उपन्यास के घटनाक्रम के तकरीबन डेढ़ सौ साल बाद गंगा घाटी में मोहम्मद गोरी की आखिरी बड़ी लड़ाई इस वंश के शासक जयचंद्र से ही हुई. आल्हा में उसका जिक्र बड़ी इज्जत से आता है लेकिन इतिहास की किसी पेचीदगी से इस राजा का नाम अभी ग़द्दारी का पर्याय हो गया है.

इतने राजवंशों से जुड़े लोगों का एक ही समय बनारस शहर में या इसके आसपास होना समझ से परे है और ‘नीला चाँद’ में इसकी ज्यादा व्याख्या भी नहीं की गई है. किताब से ऐसा लगता है कि कन्नौज में अपने प्रमुख के मार दिए जाने से लुटा-पिटा गुर्जर प्रतिहार वंश जहाँ-तहाँ बिखर गया. उसके कुछ लोग अपनी पहचान छिपाकर बनारस के पास ही गाहड़वालों के साथ रह रहे थे, जिसमें इस उपन्यास की नायिका भी शामिल है. खुद गाहड़वालों के अतीत के बारे में इतिहास खामोश ही है लेकिन ‘नीला चाँद’ से ऐसा लगता है कि कलचुरियों का दबदबा कायम होने से पहले ये लोग बनारस के शासक थे, गद्दी हाथ से निकल जाने के बाद अधीनता स्वीकार करके वे बनारस के पास ही कहीं रहने लगे. कहानी से लगता है, चंदेलों ने कलचुरियों को भगाकर गाहड़वालों को बनारस का राज लौटा दिया.

 

विचार और पंथ

चिंतकों, बुद्धिजीवियों पर आएँ तो ग्यारहवीं सदी ईसवी में लिखी हुई कुछ गिनी-चुनी सुरक्षित रचनाओं में एक, संस्कृत नाटक ‘प्रबोधचंद्रोदय’ के लेखक कृष्ण मिश्र इस उपन्यास में शुरू से आखिर तक मौजूद हैं, हालांकि एक कन्फ्यूज्ड, अविश्वसनीय पात्र के रूप में. खजुराहो मंदिर परिसर एक जगह किसी जीवंत सांस्कृतिक केंद्र जैसा दिखता है. चंदेल सम्राट विद्याधर के समय इसकी भव्य स्थिति का जिक्र भी आता है. योगी भरथरी इस किताब में गोरखनाथ का चेला बनकर आते हैं. उनकी प्रस्तुति ब्रजभाषा का एक पद गाते हुए जोगी की तरह की जाती है, फिर वे कलचुरी राजा लक्ष्मीकर्ण के दरबार में अपनी तीखी दलीलों से राजा के ही खिलाफ एक मुकदमा सा चला देते हैं.

इस प्रकरण में भरथरी अपनी, यानी परमार राजवंश की राजधानी धारानगरी और खजुराहो जैसे महान सांस्कृतिक नगरों के विध्वंस का दोषी लक्ष्मीकर्ण को ठहराते हैं. किस्सों और इतिहास का घालमेल भरथरी के चरित्र की पुरानी समस्या है, लेकिन इतिहास के फेरे में न पड़ते हुए यहाँ जोगियों के गाए किस्सों की तर्ज पर ही भरथरी के पिता, धारानगरी के विद्वान राजा भोज परमार का जिक्र आता है और भरथरी की कलंकिनी रानी पिंगला को लक्ष्मीकर्ण कलचुरी और चालुक्य भीमदेव सोलंकी के षड्यंत्रों की शिकार महिला बताया जाता है.

स्वयं गुरु गोरखनाथ इस उपन्यास में सशरीर नहीं आते लेकिन उनका उल्लेख भरथरी प्रसंग के अलावा एक जगह उपन्यास के मुख्य खलनायक, कलचुरी राजा लक्ष्मीकर्ण की सिद्धयोगिनी माँ के गुरु के रूप में भी होता है. यहाँ भोज परमार के खिलाफ षड्यंत्र रचने वाले एक राजा के रूप में गुजरात के शासक भीमदेव का किस्सा थोड़ा अटपटा लगता है, क्योंकि कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अपने उपन्यास ‘जय सोमनाथ’ में महमूद ग़ज़नवी से मुकाबले का मुख्य नायक उसे ही बना रखा है.

शिवप्रसाद जी की ख्याति एक कहानीकार के अलावा अपभ्रंश के विद्वान के रूप में भी रही है. कथा प्रसंगों को प्रामाणिक बनाने के लिए उन्होंने मध्यकालीन इतिहास के प्रमुख स्रोत समझे जाने वाले दो जैन आचार्यों हेमचंद्र और मेरुतुंग के चर्चित ग्रंथों ‘सिद्धहेमशब्दानुशासन’ और ‘प्रबंधचिंतामणि’ का प्रचुर उपयोग किया है. नतीजा यह कि ‘नीला चाँद’ से गुजरना 11वीं सदी का इतिहास दोहराने जैसा हो जाता है.

इस भावना के अनुरूप ही उस सदी की कुछ प्रमुख वैचारिक, आस्थागत और युद्ध-तकनीकी से जुड़ी प्रवृत्तियों से भी हमारा परिचय होता है. घुड़सवारी और तलवारबाजी को लेकर कुछ महीन बातें बताई गई हैं. शैव और शाक्त पंथों की नजदीकी से बनी तांत्रिक धारा, त्रिपुरसुंदरी की उपासना पर आधारित श्रीविद्या की दोनों शाखाओं हादि और कादि को लेकर कुछ रोचक जानकारियाँ भी इसमें मिलती है. याद रहे, पीछे ‘जय सोमनाथ’ पर चर्चा में त्रिपुरसुंदरी के जिस रूप के दर्शन हमें हुए हैं, वह पूरी तरह अराजनीतिक है. बंगाल से आकर विंध्यवासिनी देवी के मंदिर में रह रही एक साधिका ‘शीला माँ’ की भी किस्से में बड़ी भूमिका है, जिनकी साधना का स्वरूप किसी कहानी जैसा ही है.

काशी में पाशुपत मत का जोर दिखाया गया है, हालांकि पाशुपत दर्शन और उसके संकल्पों का कोई जिक्र यहाँ नहीं मिलता. कृष्ण मिश्र के नाटक ‘प्रबोधचंद्रोदय’ में बौद्धों को आडंबरवादी कहकर उन्हें खलनायकों की पांत में रहा गया है. शिवप्रसाद जी का परिचय इस नाटक से रहा हो तो उनका सामना इस सवाल से भी हुआ होगा कि ऐसा कौन सा आडंबर था, जो बौद्धों में तो दिखता था लेकिन पाशुपतों में नहीं दिखता था. रही बात बनारस की तो जीवन व्यवहार में यह शहर हजार साल पहले भी आज के जैसा ही लगता है- आस्था को धंधे-पानी से जोड़कर देखने वाला.

बहरहाल, विचारों के इस मोर्चे पर कुछ खामियाँ भी रह गई हैं, जिनमें एक ने इस काफी लंबी किताब को ठीक से पढ़ना मेरे लिए जरूरी बना दिया. बौद्ध धर्म की एक धारा को लेकर लेखकीय दुराग्रह का जिक्र ऊपर आ चुका है, लेकिन यह पूरी तरह एकतऱफा नहीं है. किताब में एक बौद्ध आचार्य को शिष्ट साधक के रूप में भी प्रदर्शित किया गया है, हालांकि उनका संबंध वज्रयान से बिल्कुल नहीं है. कापालिकों के एक समागम का जिक्र भी आया है लेकिन वह विराग के चरम बिंदु पर पहुंचे लोगों के जमावड़े के बजाय शराब और बलि के उन्मादी उत्सव जैसा है. इसमें शामिल कुछ लोगों का उद्देश्य मुफ्त की शराब पीना भर है. अपभ्रंश की बड़ी रचना, हिंदी के आदिकाव्य के रूप में चर्चित अद्दहमाण की किताब ‘संदेशरासक’ की उक्ति- ‘कावालिनि किय कावालिय तुय विरहेण’ (कापालिक, तेरे विरह ने मुझे कापालिनी बना दिया) में आया कापालिकों का रूमानी मुकाम यहाँ दूर-दूर तक भी नहीं झलकता.

 

वज्रयानियों से खुन्नस

इतना कह लेने के बाद किताब के उन हिस्सों का उल्लेख कर देना जरूरी है, जिनसे किसी के भी मन में वज्रयानियों को लेकर ताजिंदगी बहुत खराब राय बनी रह सकती है. भारत से बौद्ध धर्म की विदाई को लेकर अभी तक हम इतिहास की किताबों में इतना ही पढ़ते आए हैं कि 12वीं सदी ईसवी के अंत में मोहम्मद गोरी के एक सरदार बख्तियार खिलजी ने अपने पूर्वी अभियान के तहत मगध और बंगाल के बौद्ध महाविहारों/ विश्वविद्यालयों को जलाकर खाक कर दिया और यह पुराना धर्म इस हमले का झटका नहीं झेल पाया. लेकिन आचार्य रामचंद्र शुक्ल भारत में बुद्ध के धर्म के आखिरी अनुयायियों और उपासकों को इतनी भी सहानुभूति देने के लिए तैयार नहीं दिखते.

हिंदी साहित्यालोचना के शीर्ष पुरुष अपने चर्चित ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के आदिकाल प्रकरण-2 के पहले ही पृष्ठ पर ताबूत की आखिरी कील सी ठोंकते हैं-

‘बौद्ध धर्म विकृत होकर वज्रयान संप्रदाय के रूप में देश के पूरबी भागों में बहुत दिनों से चला आ रहा था. इन बौद्ध तांत्रिकों के बीच वामाचार अपनी चरम सीमा को पहुंचा. ये बिहार से लेकर आसाम तक फैले थे और सिद्ध कहलाते थे.… बिहार के नालंदा और विक्रमशिला नामक प्रसिद्ध विद्यापीठ इनके अड्डे थे.’

शिवप्रसाद सिंह ‘नीला चाँद’ की प्रस्तावना में खुद को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का शिष्य बताते हैं, लेकिन उपन्यास के दूसरे अध्याय में ही सारनाथ (ऋषिपत्तन) में वज्रयानियों का चित्र खींचते हुए उनमें शुक्ल जी की आत्मा उतर आती है. इन वर्णनों को पढ़कर कोई यही नतीजा निकालेगा कि खिलजी ने जो किया, ठीक ही किया!

‘सामने से तीन-चार अश्वारोही निकले. घुटने तक लटकने वाला गेरु रंग का कंचुक, नीले रंग का अधोवस्त्र, खल्वाट शिर- लटकती हुई तलवारें- यह सब क्या है?

‘बौद्ध भिक्षुओं की यह गतिविधि देखकर वे द्विविधा की स्थिति मे खड़े रहे तभी अत्यंत मूल्यवान श्वेतवर्णी अश्व पर आरूढ़ एक व्यक्ति अंधेरे के भीतर से निकलने वाले पिशाच की तरह प्रकट हुआ. उसका संपूर्ण शरीर तेलपुते म्लेच्छ की तरह बदबू से भरा था. दोनों गालों पर माँस के पिंड झूल रहे थे. उसके शरीर से सटी एक युवती रस्सियों से बंधी छटपटा रही थी. उसके बाल खुले हुए थे और वे कंधों पर लहरा रहे थे.’

(पृ. 49)

यहाँ छटपटा रही लड़की ग़ज़नवी से हारकर बेचारगी की स्थिति में पहुंच गए गुर्जर-प्रतिहार वंश की राजकुमारी गोमती है. जल्द ही वह उपन्यास की मुख्य नायिका बनती है. आगे नायक द्वारा अपने रणकौशल से इस राजकुमारी को छुड़ाने का अतिरेकपूर्ण वर्णन है. नायक की तलवार से अपना कंधा कटकर अलग हो जाने और मुंह पर दो घूंसे पड़ जाने से कुछ दांत बाहर निकल आने के बाद भी वज्रयानी खलनायक उद्धत स्वर और संस्कृतनिष्ठ भाषा में बहुत लंबा संवाद नायक से करता है और कहता है कि बत्तीस लक्षणों वाली इस महामुद्रा को तो वह किसी हाल में अपने हाथ से निकलने नहीं देगा. प्रकरण का अंत यूं होता है कि वज्रयानियों की ओर से आए घुड़सवार डरकर भागने लगे- ‘रज्जुक के अश्वारोहियों ने उनका पीछा किया और वे ऋषिपत्तन के जंगलों में खो गए.’ ऋषिपत्तन यानी सारनाथ.

आगे पृष्ठ 57-58 पर वज्रयानियों को लेकर एक राजनीतिक विमर्श भी है.

‘… अब तक ये लोग पैदल आकर यह सब किया करते थे, अब घुड़सवार बनकर आते हैं. इनकी संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है. ये साधक नहीं, कामुक और उग्रवादी हैं.’

‘इनके पास मदिरा, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन के लिए धन कहाँ से आता है?’ कीरत ने पूछा.

‘यह सब रहस्य जैसा है राजन्’, सुबोध ने कहा, मुझे तो लगता है कि पूर्वांचल पर अधिकार जमाने की यह कोई छिपी हुई दुरभिसंधि है. मुझे कुछ समाचार ऐसे भी मिले हैं कि काशी के कुछ गण्यमान् लोग भी इसमें सम्मिलित हैं.’

‘यानी ऋषिपत्तन का अभूतपूर्व साधना-स्थल अब नागर जनों के लिए वैशिक भोग-विलास का केंद्र बन गया है?’

किताब जब अपने मध्य के करीब पहुंच रही होती है, यही ऋषिपत्तन यानी सारनाथ एक बार फिर वज्रयानियों से जुड़कर बड़ी भयंकर भूमिका में दिखाई पड़ता है (पृ. 164-168). राजा लक्ष्मीकर्ण के बलाधिकृत, यानी सेनाओं के सुप्रीम कमाँडर अश्वगंध के बारे में उसकी बेटी शिंजिनी कह रही है-

‘ऋषिपत्तन में वज्रयानियों के चक्रपूजन में यह सर्वदा भाग लेता है. इसकी तारा या महामुद्रा कह लो, नैगमिक श्रेष्ठि शौर्याढ्य की पुत्री कंचना है. कर्णदेव के तुषार पर आरूढ़ होकर मेरा पिता ऋषिपत्तन गया था. वहाँ वह मदिरा पीकर इस तरह बेसुध हो गया कि कंचना ने इसकी उंगली से अंगूठी निकाल ली. दो दिन के भीतर गंगा से ताम्रपर्णी को जाने वाले पचासों जलपोतों को सेनापति अश्वगंध की मुद्रांकित आज्ञा मिली कि वे अपने पण्य के साथ जहाँ भी यात्रा कर रहे हों, जाने के लिए स्वतंत्र हैं.’

थोड़ा आगे यही बलाधिकृत अश्वगंध अपनी बेटी से मिलने आता है और उसके इलाज के लिए एक वज्रयानी को भी अपने साथ लाता है, जिसकी बदबू एक बार फिर से लेखक में घृणा और उबकाई पैदा कर रही है. इस वज्रयानी की धज में दो चीजें किसी भी सामान्य बौद्ध भिक्षु जैसी हैं. उसका सिर मुंड़ा हुआ है और उसने काषाय चीवर पहन रखा है. लेकिन दो चीजें उसके पहनावे में बिल्कुल अलग हैं- एक नीला अधोवस्त्र (सामान्य स्थिति में चीवर के नीचे किसी का अधोवस्त्र कैसे दिखाई पड़ सकता है?) और गले में कौड़ियों की माला. आगे की बातचीत इस प्रकार है.

‘यही है न तेरी बेटी शिंजिनी?’ उसने रहस्यात्मक ध्वनि में कहा, ‘क्या यह किसी ब्राह्मण से प्रेम करती थी?’
अश्वगंध की भृकुटी खिंच गई, ‘हाँ, वह एक ब्राह्मण युवक से प्रेम करती थी.’
‘क्या वह ब्राह्मण मर गया?’
‘हाँ’, अश्वगंध बोला.

‘तो सुन, तेरी बेटी पर ब्रह्मपिशाच का अभिचार चल रहा है. यह किसी भी प्रकार बच नहीं सकती. इसकी मृत्यु इसके सिर पर नाच रही है. कोई बात नहीं, तू ठीक समय पर मेरे पास पहुंचा. अपना भिक्षापात्र, बुद्ध कपाल, नरास्थि माला, ज्ञानांजन सब कुछ मैं अपनी साधना-कुटी में छोड़ आया हूँ. इस कन्या को मेरी कुटी में ले आ. यह सामने कौन युवती है?’
‘यह मेरे सेनापति अंतू सिंह की पत्नी है- चंपक.’

‘इसे भी ले आना. इसे तू साधारण नारी न समझ. यह साक्षात् वज्र कन्या है. यह सुखावह मुद्रा है. यह स्वाद, गंध, रसादि से सहजानंद प्रदान करने वाली है. यह न कृष्णा है न गौरी. यह पद्मपत्र के समान वर्ण वाली है. यह सुगंधमयी है. इसका प्रस्वेद भी कस्तूरी गंध से भरा होता है. यह धीरा, अचंचला, प्रियवादिनी, मनोरमा, सुकेशी, त्रिवलीमध्या होती है. मुझे इसकी आवश्यकता है. समुचित मुद्रा के अभाव में मेरी चरमोत्कर्ष तक पहुंची हुई साधना निष्फल हो रही है. अगर तू इसे नहीं लाएगा तो अपनी पुत्री को भी बचा नहीं सकता. तुझे आज मध्यरात्रि तक दोनों को चक्रपूजा में उपस्थित करना है.’

 

कॉमिक्स जैसी कहानी

रही बात ‘नीला चाँद’ की मुख्य कथा की तो यह सीधी-सपाट, ‘चंदामामा’ की कहानी या बच्चों की कॉमिक्स जैसी जान पड़ती है. जेजाकभुक्ति (बुंदेलखंड) का चंदेलवंशी राजकुमार कीर्तिवर्मा (कीर्तिसिंह चंदेल) साधु-वृत्ति वाले अपने बड़े भाई देववर्मा को राजकाज संभालता देख, उसमें अपनी कोई भूमिका न पाकर देश-भ्रमण पर निकल जाता है और दसेक सालों में कश्मीर से लेकर असम तक विभिन्न विद्याएँ सीखता हुआ पूरा उत्तर भारत छान मारता है. एक दिन उसको पता चलता है कि उसके राज्य पर हमला हो गया है. लौटता है तो पाता है कि पड़ोस के कलचुरी राजा लक्ष्मीकर्ण ने जेजाकभुक्ति पर कब्जा कर लिया है, राजधानी खजुराहो लूटपाट के बाद जला दी गई है, भाई देववर्मा रणभूमि में पराजित होने के बजाय महल में ही बैठा-बैठा निहत्थी दशा में मारा जा चुका है और घर के जिस अकेले सदस्य से कीर्ति का संवाद था, वह भाभी पति का सिर गोदी में लिए चिता पर बैठकर सती हो रही है.

सर्वनाश के अंतिम दृश्यों को एक पहाड़ से देखते हुए उपन्यास शुरू होता है. प्रस्तावना में शिवप्रसाद जी कहते हैं कि वे मध्यकालीन इतिहास के उस मोड़ की खोज में थे, जहाँ से बनारस की केंद्रीयता को खोला जा सके. काफी खोजबीन के बाद यह उन्हें सन 1060 ई. में मिला, जब काशी के राजा कलचुरी लक्ष्मीकर्ण ने खजुराहो पर हमला करके देववर्मा चंदेल की हत्या की थी. पूरा किस्सा कीर्ति चंदेल द्वारा इस शत्रु की राजधानी बनारस में अपने कुछ भरोसेमंद लोगों के साथ गुप्त ढंग से रहने, वहाँ विद्रोह भड़काने और चंदेल प्रजा की बगावत शांत करने के भुलावे में विरोधी फौजों को एक बार फिर से अपने राज्य पर हमले के लिए उकसाकर उन्हें तहस-नहस कर देने का है.

किताब चूंकि बनारस को लेकर लिखे गए शिवप्रसाद सिंह के तीन उपन्यासों की ‘काशी-त्रयी’ श्रृंखला के बीच में पड़ती है (शहर के अलावा तीनों की कथा में न तो कुछ साझा है, न ही कोई निरंतरता है), लिहाजा इस नगरी के पुरातन ब्यौरे यहाँ ज्यादा हैं. साथ में एक प्रेमकथा या ‘वीर-दांपत्य’ जैसा भी कुछ बुनने का प्रयास किया गया है, जिसमें कोई उतार-चढ़ाव नहीं है और नायक की व्यस्तता के बीच नायिका के लिए कोई अलग भूमिका भी नहीं है.

खलपात्र बहुत हैं- कलचुरी राजवंश और उसका अमला- लेकिन वे काठ के खिलौनों जैसे हैं. न उनमें अक्ल दिखती है, न सैन्य कौशल, न ही राजकाज का सक्षम ढांचा. उपकथाएँ, यानी किनारे की कहानियाँ उपन्यास के क्राफ्ट में जरूरी चीज समझी जाती हैं, मगर ऐसी कथा यहाँ एक ही है- कीर्तिसिंह के दादा विद्याधर चंदेल की, जिनकी ‘विवादास्पद’ राजनीति पर थोड़ी बातचीत हम ऊपर कर चुके हैं. विद्याधर से जुड़े लंबे प्रसंग ‘नीला चाँद’ में आते हैं लेकिन उनका राजनीतिक जीवन यहाँ नदारद है. किस्सा चलता है गृहस्थ जीवन के अलावा कुछ समय तक चले उनके अधूरे प्रेम का. दादा-दादी की जगह वाले दो चरित्रों के मर्यादित प्यार जैसे इस किस्से की छाया बंगाली साधिका ‘शीला माँ’ की शक्ल में पूरी किताब पर छाई रहती है और जब-तब रहस्य-रोमाँच भी उपलब्ध कराती है.

बनारस शहर काफी लंबे अर्से से ऐसे पहलवाननुमा लंठ व्यक्तित्वों का प्रशंसक रहा है जो भांग खाकर आधी सोई, आधी जागी दशा में सड़कों पर कहीं भी गदर काटते दिख जाते हैं और सत्ता चाहे कैसी भी हो, उसको कोई भाव नहीं देते. मजाक में उन्हें ‘शिश्नोदर (शिश्न+उदर) संप्रदाय’ कहने का चलन भी चल पड़ा है. यह संदर्भ जोड़ते हुए कि इस धर्मनगरी में ऐसा कोई संप्रदाय कभी सचमुच हुआ करता था, जो अपनी सोच-समझ और आस्था को इन दो अंगों तक ही सीमित रखने में विश्वास करता था.

शिवप्रसाद सिंह इसपर मोहर-सी लगाते हुए जुझारू भंगेड़ियों का एक दल जुटाकर उसे ‘शिष्टोद्धत’ का नाम देते हैं. ये लोग नायक कीर्ति चंदेल के समर्थक और लक्ष्मीकर्ण कलचुरी के विरोधी हैं. कथा को जनवादी शक्ल देने के लिए नायक के पक्ष में कुछ जगहें केवटों, नटों, आदिवासियों, गणिकाओं और डोम समुदाय के लिए भी खोजी गई हैं. ग्वाला जाति भी किताब में शक्तिशाली है लेकिन दो तरफ बंटी हुई है.

हजार साल पुराने बनारस का चित्र खींचने के प्रयास में ये सारे पहलू विविध प्रसंगों के साथ जुड़ते जाते हैं लेकिन जैसा ऊपर कहा जा चुका है, ‘नीला चाँद’ की मूलकथा ही कॉमिक्सनुमा है. इसकी बानगी इस बात में देखी जा सकती है कि नायक कीर्ति चंदेल के पास असाधारण क्षमताओं वाला ऊंची नस्ल का एक घोड़ा ‘प्रचंड’ और अमोघ अस्त्र जैसी एक करामाती तलवार ‘करालेंद्र’ भी है. लगभग हर दसवें पृष्ठ पर इन दोनों चीजों का चमत्कार नायक को अंग्रेजी के कॉमिक कैरेक्टर ‘फैंटम’ के करीब पहुंचा देता है. कहानी के बारे में इससे ज्यादा कहने को मेरे पास कुछ नहीं है.

बहुत पुराने दो राजाओं की लड़ाई में लेखक ने एक पक्ष चुन लिया है लेकिन असल कहानियाँ दोनों की ही लापता हैं. ऐसे में एक से ज्यादा लगाव दिखाएँगे तो उसी दौर को दूसरी नजर से देखने वालों के लिए हास्यास्पद होते जाएँगे. यहीं देखें तो चंदेल वंश और कलचुरी वंश, दोनों की राजनीति लगभग एक सी उथल-पुथल की पैदाइश है. कन्नौज को लेकर दो सौ साल चले त्रिपक्षीय युद्धों में गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पालवंश, तीनों तबाह हो गए तो उनके पीछे चलने वाले छोटे-छोटे सामंतों की आपसी मारकाट में चंदेलों और कलचुरियों की ताकत बढ़ गई. फिर महमूद ग़ज़नवी के हमलों में पश्चिमी और मध्य भारत की उभरती शक्तियों की कमर टूट गई तो इन दोनों वंशों की लॉटरी निकल आई. लाहौर को राजधानी बनाकर पौने दो सौ साल राज करने वाले ग़ज़नवी के वंशजों से इनका कैसा संबंध था, इसपर अभी तक ठीक से काम भी नहीं हो पाया है. जब तक तथ्य सामने नहीं आते, तब तक किसी भी वंश को अधिक और किसी को कम राष्ट्रवादी कहा जाता रहेगा. रही बात आपसी लड़ाई में किए गए अमानवीय कृत्यों की, तो यह दांव लगने की बात है. वह समय जघन्य कृत्यों का ही था. विजेता पराजित के साथ कुछ भी कर सकता था.

भाषा को लेकर थोड़ी बातचीत यहाँ भी हो सकती है, जिसके बारे में लेखक ने काफी आत्मप्रशंसा किताब के शुरू में ही कर रखी है. मुझे तो यह बात बुरी तरह खटकती रही कि ग्यारहवीं सदी ईसवी के मध्य में स्थित कथा-समय को देखते हुए इसकी भाषा पता नहीं क्यों जबर्दस्ती संस्कृतनिष्ठ बना दी गई है. हेमचंद्र और मेरुतुंग उस दौर में इतनी सारी अपभ्रंश लिखाई का हवाला देते हैं लेकिन अपभ्रंश का इतना बड़ा विद्वान और भाषा की बहुलता को लेकर स्वघोषित रूप से बहुत सचेत लेखक उपन्यास में ‘दुग्ध’ और ‘शर्करा’ से नीचे ही नहीं उतरता. पूड़ी को जगह-जगह ‘शष्कुलिका’, साड़ी को ‘शाटिका’, चाबुक को ‘प्रतोद’, हिजड़े को ‘षंड, कहना और छह सौ साल बाद लैटिन अमेरिका से पुर्तगालियों की लाई आलू जैसी सब्जी को ‘आलुक’ कहकर देसी चीज बना देना अटपटी बात लगती है.

 

इतिहास और उपन्यास

जिस समय को लेकर यह उपन्यास लिखा गया है- ग्यारहवीं सदी ईसवी के बीचोबीच पड़ने वाले उस दौर तक अगर धर्मग्रंथों के जरिये पहुंचने की कोशिश की जाए तो श्रीमद्भागवत के प्रचार-प्रसार के क्रम में यह शैव, शाक्त और वैष्णव पंथों के मेल से संश्लिष्ट हिंदू धर्म के उदय और पहली बार बहुत बड़े सामाजिक दायरे में संस्कृत भाषा में कराए जाने वाले धार्मिक कर्मकांड के उभार का है. भाषाशास्त्रीय खोजबीन से पता चलता है कि सोलह संस्कारों में होने वाले पूजा-पाठ से जुड़ी ज्यादातर पोथियाँ 12वीं-13वीं सदी की ही लिखी हुई हैं. इन पोथियों का नाता उस दौर की चर्चित ऐतिहासिक घटनाओं से जोड़ना कठिन है लेकिन डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ (पृ. 22-23) में इस संस्कार-बहुलता को बौद्ध मतानुयायियों के बड़े पैमाने पर हिंदू धर्म में आने से जोड़कर देखा है.

भारत में बौद्ध धर्म के खात्मे की एक सरल व्याख्या मगध और बंगाल के महाविहारों के विध्वंस से जोड़कर की जाती रही है लेकिन महमूद ग़ज़नवी और मोहम्मद गोरी के हमलों के बीच पड़ने वाले पौने दो सौ सालों में ही नहीं, ग़ज़नवी से थोड़ा पहले भी भारत में इस धर्म के साथ क्या हो रहा था, इसपर कोई गहरी पुरातात्विक खोजबीन आज भी नहीं हो पाई है. ओडिशा, बंगाल, असम, बिहार और झारखंड जैसे पूर्वी इलाकों में बौद्ध राजवंशों के प्रभाव से यह धर्म इस समय भी बचा हुआ था, लेकिन शेष भारत में उसके स्थलों पर धार्मिक कब्जे के सबूत इसी समय से जुड़ते हैं.

सबसे बड़ी बात यह कि ईसा की 11वीं सदी में भारत की मुख्यधारा पर नजर डालें तो उसकी आस्था में सिद्धों-नाथों का और भाषा में अपभ्रंश का गहरा प्रभाव दिखता है. लेकिन अगले 250 वर्षों में ही अपभ्रंश और नाथपंथ, दोनों का किनारे हो जाना या जब-तब सिर के बल खड़े नजर आना तभी समझा जा सकता है, जब ज्यादा ब्यौरे हमारे पास हों.

अपने समाज की बनावट को उसके सभी आयामों में देखने के लिए ग़ज़नवी और गोरी के हमलों के बीच की अवधि में भारतीय समाज की हलचलों को, उस दौर की सारी धाराओं-उपधाराओं को, उनके घात-प्रतिघात को समझना बहुत जरूरी है. लेकिन दुर्भाग्यवश, जवाब मिलना तो दूर, इस बारे में सवाल भी साफ ढंग से नहीं पूछे जा सके हैं.

साहित्य का काम पुरातात्विक खोजें करना नहीं है. अक्सर पूर्वधारणाएँ ही उसके क्राफ्ट के लिए कच्चे माल का काम करती हैं. महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण के इर्दगिर्द कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के उपन्यास ‘जय सोमनाथ’ पर चर्चा के दौरान उसकी शक्ति और सीमाओं पर हमने बात की थी, लेकिन इसी विषय पर कुछ लोकप्रिय उपन्यास आचार्य चतुरसेन ने भी लिख रखे हैं. इनमें ‘सोमनाथ’ का ऑडियो वर्जन मैंने सुनना शुरू किया तो दूसरे-तीसरे अध्याय में ही ग़ज़नी का सुल्तान महमूद साधू के वेश में सोमनाथ मंदिर में ढुका नजर आया. एक तत्वदर्शी महात्मा ने उसकी पहचान उजागर करते हुए आशीर्वाद भी दिया लेकिन वह उद्दंडता दिखाते हुए उन्हें अनसुना कर गया और एक स्त्री को घूरता रहा. लेखक का इतना कहना महमूद को खलनायक साबित करने के लिए काफी रहा होगा, लेकिन भाषा-संस्कृति से लेकर इतिहास तक पर रोडरोलर चलाती इस चीज को यहाँ से आगे मैं सुन ही नहीं पाया.

कम से कम अपने मुख्य पात्रों को उनके इंसानी पूरेपन में देखने की कोशिश किए बिना कोई गंभीर लेखक अपनी रचना के साथ न्याय नहीं कर सकता. ध्यान रहे, इतिहास की पृष्ठभूमि पर लिखने वाले बड़े लेखक अपनी लिखाई से जो खाका खींचते हैं वह कभी-कभी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए भी बड़े काम का होता है. इतिहास अंततः एक तरह का आख्यान ही है. सवालों का जवाब दे सकने वाली एक कहानी, जिसे पुरातात्विक वस्तुओं और पुरानी लिखाइयों की व्याख्या के क्रम में इतिहासकार रचते हैं. यह काम हमेशा दोतरफा ढंग से आगे बढ़ता है.

इतिहास कहलाने वाली कहानी पुरातात्विक वस्तुओं को सामने रखकर गढ़ी जाती है, लेकिन कभी-कभी खुद कोई कहानी भी पुरातत्व की खोज में मददगार बन जाती है. 19वीं सदी के पूर्वार्ध में भारत के बौद्ध स्थलों की खोजबीन फाह्यान और ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों के फ्रेंच अनुवाद से शुरू हुई, जिन्हें चीन की पचास पीढ़ियाँ किस्सा भर मानती आई थीं. अपने यहाँ ऐतिहासिक सामग्री और समर्थ कल्पना पर समान रूप से आधारित एक पठनीय उपन्यास का उदाहरण देना हो तो आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के ‘चारु चंद्रलेख’ का नाम लिया जा सकता है, जिसका कथा-समय मोहम्मद गोरी के हमले के कुछ समय बाद का, मोटे तौर पर ईसा की तेरहवीं सदी के पहले तीन दशकों का है.

यहाँ ‘मैं’ शैली में कहानी सुना रहा नायक मालवा का ही राजा है और उसकी राजधानी उज्जैन को भरथरी की अवंती का विस्तार माना जा सकता है. किसी और ही दुनिया में जीने वाली रूमानी मिज़ाज की, अर्ध-मिथकीय स्वरूप वाली उसकी रानी परस्पर टकराती हुई एकाधिक पहचानों के साथ इस किताब में उभरती है. बहरहाल, जिस दौर की खोजबीन में हम अभी उतरे हुए हैं, उसके एक चर्चित व्यक्तित्व, रसायनज्ञ नागार्जुन किस्से के भीतर मौजूद एक और किस्से की छाया की तरह किताब की भूमिका में ही दिखाई पड़ जाते हैं. माहौल ऐसा है कि भारत पर मोहम्मद गोरी और उसके गुलाम सेनापतियों का कब्जा हो जाने के बाद यहाँ की दुनिया बिल्कुल बदल चुकी है. अतीत के बहुत सारे प्रतापी राजवंशों के बिखरे हुए किस्से भी जहाँ-तहाँ से उठकर कहानी में आते रहते हैं. बड़ी बात यह कि भारत के पूर्व-मध्यकाल के मन-मिज़ाज की जैसीसमझ द्विवेदी जी के पास है, यह उपन्यास उसको देखने की श्रेष्ठ जगह है.

द्विवेदी जी के इस उपन्यास का माहौल पूरी तरह सिद्धों और नाथों वाला है, हालांकि इसके लिए जो कथा-समय उन्होंने चुना है, उसके आने तक सिद्धों का दौर बहुत पीछे छूट चुका था. ज्यादातर संस्कृत के लेकिन साथ में कुछेक अपभ्रंश के पद्य भी इसमें आते रहते हैं. एक भी पात्र भुस-भरा, एक भी घटनाक्रम जबर्दस्ती का गढ़ा हुआ नहीं लगता. उनके प्रतापी शिष्यों में गिने जाने वाले शिवप्रसाद सिंह द्वारा बनारस को केंद्रित करके लिखे गए उपन्यास ‘नीला चाँद’ का मामला इससे बहुत अलग है. 1980 के दशक में आई इस किताब को शानदार कामयाबी मिली और साहित्य से जुड़े पुरस्कार तो लगभग सारे ही मिल गए. (इसका प्रथम प्रकाशन वर्ष प्रकाशक की मेहरबानी से अज्ञात है. दशक का जिक्र भी यहाँ 1987 की किसी तारीख के साथ किताब में लगे ‘आमुख’ पर आधारित है.)

‘चारु चंद्रलेख’ के कोई दो दशक बाद लिखे गए ‘नीला चाँद’ का कथा-समय उससे डेढ़ सौ साल पहले का है. माहौल के लिहाज से दोनों में तुलना की गुंजाइश भी बनती है लेकिन पुरातात्विक सामग्री की जांच-परख और उसके ‘क्रिएटिव ट्रीटमेंट’ को लेकर दोनों लेखकों के नजरिये में कोई खास साझेदारी नहीं दिखती. बनारस पिछले हजार वर्षों से गंगाघाटी और हिंदीभाषी इलाकों का मिज़ाज बनाने में मुख्य भूमिका निभाता आ रहा है. इस खास देश-काल पर केंद्रित यह उपन्यास हमें खुद को समझने में कितनी मदद पहुंचाता है या नहीं पहुंचाता, यही असल बात है.

हिंदी दायरे के बौद्धिक परिवेश में वज्रयान की छवि इधर लगभग एक सदी से टोने-टोटके वाली एक घोर नकारात्मक, जादू-मंतर वाली उपासना पद्धति जैसी ही बनी हुई है. हिंदी क्षेत्र के कुछेक नामी बुद्धिजीवी इस बौद्ध पंथ को हिंदू धर्म की विकृतियों के लिए भी जिम्मेदार ठहराते रहे हैं. इसको दो प्रतिद्वंद्वी धर्मों के आरोप-प्रत्यारोप वाली बात मानकर छोड़ा जा सकता था. समस्या यह है कि बौद्ध दायरे के कुछ महत्वपूर्ण लोग भी भारत से अपने धर्म के विलोप के लिए ब्राह्मणवाद के बाद सबसे ज्यादा जिम्मेदार भीतरी कारक वज्रयान को ही मानते आए हैं.

नाम लेना हो तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल की महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ और रामधारी सिंह दिनकर के ग्रंथ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में व्यक्त की गई इस तरह की राय अपने स्रोत के रूप में ‘त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायन’ की किताब ‘बुद्धचर्या’ को ही उद्धृत करती रही है. हिंदी से बाहर झांकना हो तो डीपी चट्टोपाध्याय, धर्मानंद कोसांबी और बीआर आंबेडकर के यहाँ भी जहाँ-तहाँ यही समझ दिखती है, लेकिन इसके लिए उन्होंने वज्रयानी साधना ग्रंथों में आई विधियों के अलावा और किस स्रोत का उपयोग किया है, यह साफ नहीं होता.

शुक्ल जी और दिनकर ने राहुल जी की जो बात दोहराई है, और ‘नीला चाँद’ में क्रिएटिव लाइसेंस के साथ शिवप्रसाद सिंह ने जिसका परिपाक किया है, वह ‘बुद्धचर्या’ की प्रस्तावना में मिलती है. राहुल वहाँ लिखते हैं-

‘मंजुश्री-मूलकल्प ने तंत्रों के लिए रास्ता खोल दिया. गुह्य समाज ने अपने भैरवी चक्र, शराब, स्त्री संभोग तथा मंत्रोच्चारण से उसे और भी आसान बना दिया. आठवीं शताब्दी में एक प्रकार से भारत के सभी बौद्ध संप्रदाय वज्रयान गर्भित महायान के अनुयायी हो गए थे.…बड़े-बड़े विद्वान और प्रतिभाशाली कवि आधे पागल हो चौरासी सिद्धों में दाखिल हो संध्या भाषा में निर्गुण गान करते थे. आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक का बौद्ध धर्म वस्तुतः वज्रयान या भैरवी चक्र का धर्म था. इन पाँच शताब्दियों में धीरे-धीरे एक तरह से सारी भारतीय जनता इनके चक्कर में पड़कर कामव्यसनी, मद्यप और मूढ़विश्वासी बन गई थी.….लाभ-सत्कार का द्वार उन्मुक्त होने से ब्राह्मणों और दूसरे धर्मानुयायियों ने भी बहुत अंश में इनका अनुसरण किया.’

भारत में बुद्ध के धर्म के पुनरुज्जीवन के लिए जिम्मेदार कुछ गिने-चुने लोगों में से एक अगर यहाँ इस धर्म के आखिरी रूप के बारे में ऐसी राय रखता हो तो किसी हमलावर के हाथों उसका विध्वंस एक तरह का पुण्यकर्म ही कहलाएगा!

 

चंद्रभूषण
(
जन्म: 18 मई 1964)

‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’ (यात्रा-राजनय-इतिहास) और ‘पच्छूं का घर’ (संस्मरणात्मक उपन्यास) से पहले दो कविता संग्रह ‘इतनी रात गए’ और ‘आता रहूँगा तुम्हारे पास’ प्रकाशित. इक्कीसवीं सदी में विज्ञान का ढांचा निर्धारित करने वाली खोजों पर केंद्रित किताब ‘नई सदी में विज्ञान : भविष्य की खिड़कियाँ’, पर्यावरण चिंताओं को संबोधित किताब ‘कैसे जाएगा धरती का बुखार’, भारत से बौद्ध धर्म की विदाई से जुड़ी ऐतिहासिक जटिलताओं को लेकर ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’, ‘बुद्धचरित और महाकवि अश्वघोष’आदि  पुस्तकें प्रकाशित.

patrakarcb@gmail.com

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Comments 1

  1. विनय कुमार says:
    3 weeks ago

    बेहतरीन. विचारणीय आलेख !

    Reply

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