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Home » उर्मिला शिरीष की पच्चीस कहानियाँ : प्रकाश कान्त

उर्मिला शिरीष की पच्चीस कहानियाँ : प्रकाश कान्त

by arun dev
May 16, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 3 mins read
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उर्मिला शिरीष की पच्चीस कहानियाँ : प्रकाश कान्त
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उर्मिला शिरीष की पच्चीस कहानियाँ
प्रकाश कान्त

 

‘मेरे लिए कहानियों का मतलब ही है जीवन को लिखना.’ – यह उर्मिला शिरीष के पिछले दिनों आये कथा-संग्रह ‘पच्चीस कहनियाँ’ की भूमिका में दिया गया वक्तव्य है. संग्रह की  कहानियों को लेकर उनका अलग से कोई बड़ा दावा नहीं है. यूँ भी वह दावा, घोषणा और युद्धघोष वगैरह करते रहनेवाली लेखिका नहीं रहीं. उन्हें जो कुछ भी कहना ज़रूरी लगा वह सामान्यत: उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से ही कहा है. विमर्श और आंदोलनों की हलचलों के बीच भी! अपनी सही जगह उन्होंने लेखन को माना और इसी जगह जो कुछ कह सकती थीं, कहा. एक बात और जैसा कि उन्होंने इसी संग्रह की भूमिका में भी कहा है, वे लैंगिक आधार पर लेखन को अलग-अलग खानों में बाँटकर देखने-समझने की पक्षधर नहीं रहीं. इस तरह का कोई विभाजन उन्होंने स्वीकार नहीं किया. उनके लिए लेखन सिर्फ़ लेखन रहा. जिसकी पहली और ज़रूरी शर्त रही उसका मनुष्यता की पैरवी में खड़ा होना! वैसे, लैंगिक आधार पर विभाजन के मुद्दे पर बहस भी रही जिसके साथ कई सवाल भी जुड़े रहे. संवेदना का सवाल, भौतिक संरचना का सवाल इत्यादि.

इस संग्रह की अधिसंख्य कहानियों में से कुछ उनके इससे पहले आये चयनित कहानियों के संग्रह में भी शामिल रही हैं. सिगरेट, चीख, उसका अपना रास्ता, पत्ते झड़ रहे हैं, दीवार के पीछे और यात्रा! सम्भव है वे उन्हें प्रिय होने के साथ-साथ अपनी  प्रतिनिधि कहानियाँ भी लगती  हों! और उनमें वह सब ज़्यादा अच्छी तरह से व्यक्त कर पायी हों जो वह चाहती थीं. ख़ासकर सिगरेट, चीख, पत्ते झड़ रहे हैं और यात्रा जैसी कहानियों में! यूँ भी इन कहानियों के केंद्र में स्त्री और स्त्री से जुड़े प्रश्न रहे हैं. हालाँकि ऐसा किसी विशेष नारे या पूर्व घोषणा के कारण नहीं है. वे इन प्रश्नों से काफ़ी भीतर तक जाकर जूझती हैं. वैसे उनकी कहानियों का फलक मात्र स्त्री तक सीमित नहीं रहा है. उनके अभी तक की सुदीर्घ लेखन यात्रा में उनके यहाँ अन्य स्त्री इतर क मुद्दों पर केन्द्रित कहानियाँ भी रही हैं. निश्चय ही जिनसे संगुम्फित स्त्री के मुद्दे भी रहे .

भारत जैसी एक बहुस्तरीय, प्राचीन और लम्बे समय तक सामन्ती जकड़बंदी का शिकार रही समाज-रचना को कई विधियाँ और कोणों से देखा-समझा जा सकता है. स्त्री के कोण से भी! क्यों कि वह अंतत; आधी दुनिया होती है. इस संग्रह की कहानियों में यही ‘आधी दुनिया’ है और उसी की जगह से पूरी सामजिक संरचना और उसके अन्तर्विरोधों को देखने-समझने का प्रयास भी! वैसे, अकेले भारतीय ही नहीं बल्कि दीगर कई दक्षिण एशियाई समाजों के भी! उनकी  दशा भी भीतरी तौर पर इससे बहुत ज़्यादा इतर नहीं है!

यहीं यह भी याद रखा जाना चाहिए कि सारे स्त्री विमर्श में जिस ‘आधी दुनिया’ की  अक्सर चर्चा की जाती है वह दुनिया भी एक तरह से पूरी ‘आधी दुनिया’ नहीं होती, सीमित ही होती है है. भारतीय समाज का आज भी आधे से अधिक लगभग दो-तिहाई हिस्सा सुदूर गाँवों तक फैला हुआ है. वनांचल भी उसी में है. और इस पूरे हिस्से की स्त्री की साहित्य में पूरी-पूरी आमद और बहाली होना अभी काफ़ी बाक़ी है. कथा साहित्य में भी! वहीं के हवा-पानी और गंध में से उभरा-निकला वहीं का स्त्री-केन्द्रित लेखन! विशेष रूप से स्त्री की दृष्टि से किया गया लेखन! यूँ भी, वर्गीय और स्थान विशेष पर विकसित हुई रचना दृष्टि सामान्यत: इन्हीं चीज़ों से परोक्ष-अपरोक्ष रूप से नियंत्रित एवं संचालित होती है.

संग्रह की चीख, उसका अपना रास्ता, एक और प्रतिमा, लकीर, चपेट, यात्रा, स्पेस जैसी कहानियों में सामान्यत: शहरी समाज के बिचले तबके की स्त्री है. एकाकी नहीं घर-परिवार में रहती स्त्री. सिर्फ़ जीवन शैली ही नहीं बल्कि जीवन, समाज इत्यादि को लेकर उसका सारा सोच इसी के द्वारा निर्धारित, नियंत्रित और निर्देशत है. जिसे उसने अपने जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मान लिया गया है. यह सब अचानक नहीं बल्कि पिछले लम्बे समय में हुआ है. धर्म सहित अलग-अलग माध्यमों के द्वारा. धीमे-धीमे! इतने कि उस सब में कब घर-परिवार और समाज की संरचना में उसकी स्थिति ही खिसककर दोयम दर्जे की हो गयी, उसे ही पता नहीं चला. यह वर्चस्ववादी सामाजिक शक्तियों की अपनी तरह की सफलता थी. जिसके जरिये उन्होंने समाज में शासितों और अनुगामियों के अलग-अलग समूह विकसित कर लिए. एक समूह स्त्री का भी रहा. इस संग्रह सहित अन्य सारी जगहों पर आनेवाली स्त्री अमूमन वही स्त्री है. संग्रह की अधिसंख्य कहानियाँ उसी स्त्री और उससे जुड़े कुछ बुनियादी सवालों की हैं. ये सवाल अलग-अलग हैं. उनके शेड अलग-अलग हैं. कुछ सामान्य लगने वाले भी हैं. लेकिन, वे नये ढंग से आये हैं. कुछ सीधे-सीधे स्त्री-अस्मिता से जुड़े हैं. पिछले कुछ सालों से स्त्री अस्मिता का प्रश्न दलित अस्मिता की ही तरह चर्चा में रहा है. हालाँकि इधर अस्मितावादी विमर्श की आवाजें थोड़ी धीमी हो गयी हैं.

इन कहानियों की स्त्रियाँ किसी विमर्श से या किसी नारे की शक्ल में आयी हुई नहीं  बल्कि, अपने सवालों के साथ आयी हुई हैं. वे सवाल किसी काल्पनिक दुनिया के नहीं, जीवन से निकले और साफ़ तौर पर दिखाई देने वाले हैं. बेशक, इनमें से कई आज के महानगरीय जीवन से बाहर हो चुके लग सकते हैं और महानगरीय स्त्री उनसे आगे जा चुकी दिख सकती है. लेकिन छोटे शहर-क़स्बों के आम मध्यवर्गीय जीवन में वे अभी प्रमुखता से बने हुए हैं. बलात्कार या दुर्व्यवहार स्त्री-जीवन से जुड़ी सबसे बड़ी दुर्घटना है. युद्धों में पूरे संसार की स्त्रियाँ सदियों से इस यातना को भुगतती चली आ रही हैं. तमाम सख़्त कानूनों और संरक्षण के दावों के बावजूद यह अत्याचार रुक नहीं रहा. बल्कि बढ़ा ही है. ‘चीख’ कहानी इसी को बयान करती है. हालाँकि, समग्रता में वह इस घृणित अत्याचार के अलावा उस पीड़िता की कहानी भी है जो अपने साथ हुए इस दुर्व्यवहार को अपना अंत समझकर रुक नहीं जाती बल्कि उसके पार जाकर अपने अस्तित्व का सम्मान करते हुए पूरी दृढ़ता के साथ फिर से खड़े होने का निर्णय लेती है. लेकिन, यह एक तरह की स्त्री है जिसमें संघर्ष चेतना का विकास हो रहा है. यह बिचले तबके की स्त्री है. लेकिन इसी तबके से कुछ वे युवतियाँ आ रही हैं जो अपने पर पारम्परिक प्रतिबन्ध पसंद नहीं करतीं. वर्जना और नियन्त्रण मुक्त जीवन-पद्धति को अपना आदर्श मानती हैं. तयशुदा केरियर अपनाना नहीं चाहतीं.

महानगरों में इस प्रकार की स्त्री का होना लगभग सामान्य  माना जाने लगा है. लेकिन छोटे शहरों में भी इनका होना-दिखना अब आश्चर्य जैसा नहीं रह गया है.  ‘उसका अपना रास्ता’ और ‘एक और प्रतिज्ञा’ जैसी कहानियों में यही स्त्री है. घर-परिवार की पारम्परिक अवधारणा को वह घोषित रूप से अपने लिए बंधनकारी नहीं होने देना चाहती हैं. स्त्री की प्रचलित और रवायती अवधारणा से भी उसका विरोध है. वह मुक्त जीवन-पद्धति अपनाने और रूढ़ केरियर को ठुकरा कर अपने ढंग से जीने का रास्ता चुनने वाली है. वह अपने बारे में निर्णय का अधिकार किसी और को देना नहीं चाहती. गलत साबित हुए निर्णयों-भूलों को स्वीकार करने को भी तैयार है (उसका अपना रास्ता)  यही स्त्री आत्मनिर्णय के प्रति सजग एक मजबूत स्त्री की तरह ‘नाच गाना’ में है. अपने पक्ष को लेकर गम्भीर और प्रतिबद्ध!

उसका अपना रास्ता और एक और प्रतिज्ञा का घटनाक्रम बहुत तेज़ है. उनकी नायिकाएँ मनोनुकूल मुक्त जीवन जीना चाहती हैं. उन्हें माता-पिता सहित किसी भी रिश्ते की परवाह नहीं.  ये युवतियाँ तेजी से बदलते या बदले जाते स्त्री-समाज की प्रतिनिधि बनकर सामने आती हैं. सर्वथा वर्जनाहीन और मनचाहा जीवन! जिसके लिए वे लड़ती भी हैं. ‘कन्या’ की शिवा भी लड़ती है. लेकिन उसका संघर्ष पुरुष की लोलुपता के विरुद्ध है.

इनके बरअक्स ‘सिगरेट’ और ‘कोशिश’ कहानियों की स्त्रियाँ गृहस्थी एवं मातृत्व के प्रश्नों में उलझी हुई मिलती हैं. उन्हें अपने पतियों से निजी तौर पर शिकायत नहीं है. बल्कि उनके प्रति वे प्रेम तथा आदर भाव से भरी हुई हैं . शिकायतें उन्हें पति के अन्य तौर-तरीक़ों से है.  पति प्रतिपक्ष जैसे नहीं बल्कि उनमें से कुछ में चिढ़ पैदा करने वाली सरलता है.

‘कन्या’ और ‘लकीर’ की युवतियों के दो तरह के रंग हैं. हालाँकि, दोनों में ही वे मौन रहकर सिर्फ़ सहन करनेवाली युवतियाँ नहीं हैं. बल्कि अपने साथ किये गये व्यवहार का प्रतिकार करती  हैं. ‘कन्या’ में यह प्रतिकार इकहरा है जब कि ‘लकीर’ की ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकली युवतियों में एक प्रकार की रणनीति के तहत सामूहिकता के साथ प्रतिशोध लेने की कोशिश ! मोर्चाबंदी भी! वे छुई-मुई नहीं हैं. ‘कन्या’ की शिवा का लोलुप कथावाचक प. रामाधार की हरकतों का खुला विरोध है. ‘लकीर’ की तीनों युवतियाँ स्वयं के लिए लड़ना जानती हैं- हर सही-ग़लत माध्यम का उपयोग करते हुए!

‘अंगारों की हँसी’ और ‘नाच-गाना’ का केंद्र में हिंदू-मुस्लिम विवाह है. दोनों की युवतियाँ अपने निर्णय एवं समर्पण में स्पष्ट और दृढ़ हैं. यह बात अलग है कि ‘नाच-गाना’ की लीना अपनी सारी पूर्व घोषणाओं, दृढ़ताओं के बावजूद ‘अंगारो की हँसी’ की गरिमा के समान अपने उद्देश्य में सफल नहीं होती! ‘दीवार के पीछे’ में भी इसी प्रकार की युवती है. इस मामले में सीमा (पत्ते झड़ रहे हैं) चालाक और बिंदास नहीं है, सरल है. वह अपनी सहेली के भाई से किये जाने वाले प्रेम में ठगी जाती है.

ये युवतियाँ तो अपेक्षाकृत शहरों की हैं. लेकिन, ‘चपेटे’ की रामवत्ती, और ‘एम. एल. सी.’ की खेरून अलग-अलग स्तर पर संघर्ष करती मिलती हैं. वे शहरी नहीं हैं. तंत्र के सामने वे अपनी मौजूदगी दयनीय भाव से नहीं दर्ज करती. उनमें ग्रामीण और निचली ज़मीन से आने के बावजूद एक खास तरह की मज़बूती है.

ये कुछ आज की युवतियाँ हैं. लेकिन, संग्रह की अन्य कहानियों में इनके ठीक पीछे- पिछली पीढ़ी की स्त्रियाँ भी हैं. पारंपरिक स्त्री के अंतिम छोरवाली! मिसेज पिल्लई (स्पेस) अमेरिका में बेटे-बहू के पास रहते हुए जहाँ बहू द्वारा निरंतर प्रताड़ित-अपमानित की जाती रही है वहीं ‘यात्रा’ की माँ अपना सारी रचनात्मक संक्रियताएँ बंदकर लगभग अवसाद की स्थिति में पहुँच रही है. जिसमें से बेटी उसे निकालती और फ़िर से सक्रिय करती है. जबकि, मिसेज पिल्लई बिल्डिंग की दूसरी स्त्री की सहायता से फ़िर से अपना जीवन शुरू करने का संकल्प ले भारत लौटती है. उन्हें अपने व्यक्तित्व की भी तलाश है, जीवन में आ रहे ठहराव के विरुद्ध!

इस तरह देखें तो संग्रह की अधिसंख्य कहानियाँ स्त्री के सवालों की कहानियाँ हैं. अपने स्पष्ट दायरे में! हालाँकि कुछ अन्य कहानियाँ अलग मुद्दों पर भी बात करती हैं . ‘धरोहर’ में शहीद बेटे के परिवार को शासन की ओर से मिलने वाली सहायता को बेटे की विधवा और उसका मायके का परिवार हासिल कर लेता है. शहीद बेटे के पिता को अपने गुज़र-बसर के लिए फ़िर से नौकरी तलाश करने का निर्णय करना पड़ता है. ‘निर्वासन’ में कर्ज में फँसे गृहत्यागी बूढ़े दादा की भीख तक माँगने के लिए विवश होने, बेटों द्वारा खोज-खबर न लेने की पीड़ा है. ‘दहलीज’ में विधवा का पुनर्विवाह और उसके बेटे की मासूम असहायता है. ‘बाँधों न नाव इस ठाँव बंधु’ मरणासन्न पिता की अपने पुत्र के सामने अपनी आश्रिता को लेकर चिंता व्यक्त करना और आश्रिता का पिता द्वारा रहने को दिये मकान की चाबियाँ सौंप जाना बेनाम रिश्तों के भी पीछे मौजूद रहने वाले मूल्यों की कहानी है.

‘चरवाहा’ संग्रह की एकमात्र ग्रामीण परिवेश की कहानी है. जिसमें केशव चरवाह नकली गोरक्षकों के झूठे आरोपों का शिकार होता है. ग्रामीण संदर्भ ‘बिवाइयाँ’ में भी है जिसमें अपना कर्ज पाटने के उद्देश्य से गहने गिरवे रख साहूकार से कर्ज लेने आये किसान हैं जिनकी पत्नियों की एड़ियों में बिवइयाँ पड़ी हैं. कर्ज के मारे आत्महत्या करने वाले किसानों का संदर्भ भी वहाँ है. हालाँकि कहानी किसान के विरुद्ध काम कर रहे दुश्चक्र तक नहीं जाती. इन दोनों कहानियों का मुख्य स्वर अन्य कहानियों से भिन्न है.’पत्ते’ में अगर घर-भर को अपनी कथित बीमारी से परेशान करने वाला बूढ़ा पिता है- तो ‘रंगमंच’ में दो पत्नियों को मार कर भी सज़ा से बच जाने की कोशिश करनेवाला पत्नीद्रोही शातिर पति! जिसकी नकली विनम्रता और गैरइंसानी धूर्तता आक्रोश पैदा करती है.

चूँकि, लगभग सभी कहानियाँ नागर जीवन बोध की हैं इसके चलते उनकी भाषा में भी इस जीवन का आस्वाद मौजूद है. आत्मकथनात्मक कहानियों में तो है ही! उत्तम या प्रथम  पुरुष में मौजूद उनके कथा-पात्र कथा के हिस्से होने के साथ-साथ नेरेटर भी हैं. सामान्यतः शिक्षित (उच्च शिक्षित) होने से उनकी भाषिक संवेदना भी उसी दर्जे की है! और स्थितियों, रिश्तों, परिस्थितियों, मानसिक समस्याओं का विश्लेषण भी उसी भाषा में है. अन्य पुरुष में लिखी गयी कहानियों के नैरेशन में भी भाषा का यही आस्वाद अनुभव किया जा सकता है. कथा-कथन की सहज भाषा!

उनके यहाँ कथा-रचनाओं के ढाँचे में सामान्यत: बहुत ज़्यादा तोड़फोड़ नहीं मिलती. कथा-कथन की विविधता के अलावा! इस संग्रह की कहानियों के ढाँचे में भी तोड़फोड़ नहीं है. उनमें इस बहुप्रचलित ढाँचे की अधिकतम सम्भावना और सुविधाओं का सफल एवं समुचित इस्तेमाल हुआ है. ढाँचे की सीमाओं का ध्यान रखते हुए. हर कहानी खुली और अपने कहन में स्पष्ट है. अपने समय के सवालों से जूझती हुई भी !

 

यह संग्रह यहाँ से प्राप्त करें 

प्रकाश कान्त
वरिष्ठ लेखक
चार उपन्यास और
तीन कहानी संग्रह : ‘शहर की आखिरी चिड़िया’, ‘टोकनी भर दुनिया’,  ‘अपने हिस्से का आकाश’आदि प्रकाशित 

155 – एल. आई. जी,
मुखर्जी नगर, देवास, म.प्र., 455001

Tags: 20262026 समीक्षाउर्मिला शिरीषउर्मिला शिरीष की पच्चीस कहानियाँप्रकाश कान्त
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Comments 1

  1. Manish Vaidya says:
    1 month ago

    कहानियों का गहन विश्लेषण करता प्रकाश कान्त जी का यह लेख उर्मिला जी की कथा प्रवृत्तियों को डिकोड करता है। उर्मिला जी और प्रकाश जी को बधाई।

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