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Home » विजय उत्सव : नेहा नरूका की कविताएँ

विजय उत्सव : नेहा नरूका की कविताएँ

by arun dev
December 18, 2025
in कविता
Reading Time: 2 mins read
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विजय उत्सव : नेहा नरूका की कविताएँ
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विजय उत्सव
नेहा नरूका की कविताएँ

 

विजय उत्सव -1

मैं भारतीय टॉयलेट की सीट पर थी
तब तक मोहल्ले के एक सिरफिरे आदमी ने सुतली बम फोड़ दिए
मुझे लगा सीट सहित मैं कचरे के घूरे पर गिरने वाली हूँ
मगर मैं अकेली नहीं थी मेरे जैसे कई और भयभीत नागरिक अपने-अपने दड़बों से निकल आए
आग, धुआँ और आवाज़ आसमान की ओर बढ़े जा रहे थे
कुछ ऐसे जैसे बढ़ रहा हो विजय रथ
एक औरत, जो एक छोटी-सी लड़की की दादी भी हैं और जिनके सीने पर पिछले दिनों एक मरखनी गाय चढ़ गई थी
उदास होकर बोलीं,
“कोई त्योहार भी नहीं, फिर क्यों फोड़ दिए एक साथ इतने पटाख़े ?”

सिरफिरा आदमी तबाही मचाकर घर में घुस गया
जैसे मोहल्ले का प्रधानमंत्री हो
एक दूसरी औरत ने बताया
सिरफिरे आदमी ने दिनभर शराब पी है
उसका प्रमाण भी रात में मिल गया
जब उसने रातभर अपनी माँ को गंदी-गंदी गालियाँ बकीं
मोहल्ले भर की नींद ख़राब की

सिरफिरे आदमी को उसकी बीवी कुछ साल पहले छोड़कर चली गई है
अब उसका नाता केवल सिगरेट, शराब और जिम से है
वह जानबूझकर सबकी नाक में जलती तीली घुसेड़ता है
एक दिन उसने एक गाड़ी का शीशा तोड़ दिया
एक दिन प्रेस वाले से लड़ गया
अपनी कमाऊ विधवा माँ से तो वह रोज़ लड़ता है
रोज़ आती हैं उसके घर से चीखनें-नोचनें की आवाज़ें
सुना है सब्ज़ीवाले से सब्ज़ी लेते हुए एक दिन उसकी माँ ने नीले निशान छिपाए हैं

जब कारवाले आदमी ने सिरफिरे आदमी से कहा,
“इतने बम क्यों फोड़ दिए?
मेरी गाड़ी फट जाती ! ”
जवाब में उसने कहा,
“बिहार में हम जीत गए!!!
और आप गाड़ी की नहीं राष्ट्र की चिंता किया कीजिए सर.”

 

 

विजय उत्सव- 2
(मैथिली ठाकुर की विजयी मुद्रा देखने के बाद)

जब तुम अपने मधुर स्वर में गाती थीं-
‘राम को देखकर श्री जनक नंदनी बाग़ में जा खड़ी की खड़ी रह गईं…’
तब तुम्हारी आवाज़ चुम्बक की तरह न चाहते हुए भी अपनी ओर खींच लेती थी मुझे
घण्टों कान में नन्हे पर घातक स्पीकर घुसाए मैं सुनती रहती थी तुम्हें
तुम्हें सुनकर लगता था जैसे श्री जनकनंदनी की जगह मैं ही खड़ी हूँ कई बरस से
मिथिला के किसी प्राचीन बाग़ में
अपने पुरुष की ओर निहारती
सोचती कि कितनी सुघर है मेरी और उसकी जोड़ी
और नितदिन इस चिंता में घुलती कि कैसे तोड़ेगा वह इस प्रचंड धनुष को
अपने नाज़ुक हाथों से ?
कैसे डालेगा वह भरी सभा के विरुद्ध जाकर मेरे गले में सुगंधित पुष्पों की माला?
कैसे होगा वह जो दो प्रेम करने वालों के मध्य इतिहास में, पुराण में,
कपोल कल्पित कथा में अनेक बार हुआ है?
तुम्हारी आवाज़ मुझे कितनी सम्भावित शंकाओं से भर देती थी !

जब तुम गाती थीं तो लगता था तुम नहीं गा रही हो किसी धर्म विशेष और उसके प्रतीक ईश्वर के लिए
तुम गा रही हो केवल मेरे लिए
तुम गा रही हो हम दोनों के लिए
तुम गा रही हो करोड़ों मामूली लोगों के लिए

तुम गाती रहीं मेरे कान में
नहीं टूटा कोई धनुष
न मैं बन सकी किसी की परम प्रिया
यूँ बनती भी कैसे ?
तुम्हारे गीत में चाहे मैं ख़ुद को कुछ देर के लिए श्री जनक नन्दनी समझ बैठूँ पर वास्तव में मैं थी
ताड़का राक्षसी

जिसे तुम्हारे राम ने एक ही बाण से चित कर पटक दिया था धरती पर…
फिर भी मैं सुनती रही तुम्हारा गीत
क्योंकि हर गीत अर्थ बाद में होता है संगीत पहले
मैं रचती रही अपने भीतर संगीत, शब्दों और भावनाओं का एक स्वप्न लोक
पहले वह स्वप्न लोक केवल व्यंजना में टूटता था
अब वह अभिधा में भी टूट गया है

अब तुम गायक की जगह विधायक बन हो गई हो
अब तुम्हारे कंठ से स्वर नहीं घृणा, द्वेष और हिंसा निकलती है
तुम जब कहती हो अलीनगर को बनाओगी सीतानगर
तो जानती हो तुम्हारे गीत के साथ बजने वाले यंत्रों से ध्वनि नहीं किसी निर्दोष का ख़ून निकलता है

अभी जब तुम लोकतंत्र की लाश पर सवार होकर अपनी जीत का जश्न मना रही हो
और मैं सिर धुन रही हूँ कि क्या मैं इतनी भोली थी जो नहीं पहचान पाई गायिका के भेष में छिपी एक अवसरवादी औरत को
ठीक तभी तुम्हारा यह गीत तीर की तरह आकर मेरी छाती में धँस गया है.

 

 

विजय उत्सव- 3

हर विजय के बाद कुछ चीज़ें विलुप्त हो रही थीं
जैसे विलुप्त हो रहा था साहस
विलुप्त हो रहा था विवेक
विलुप्त हो रहे थे विचार
और नागरिकों के मन से विलुप्त हो रही थी
सत्य के साथ खड़े रहने की इच्छा भी

हर विजय उत्सव केवल विजय उत्सव नहीं था
झूठ, हिंसा, अन्याय और क्रूरता का
एक बढ़ता हुआ रथ भी था
रथ के पहियों से जुते थे बहुत से नेता, बड़े-बड़े अभिनेता, प्रसिद्ध खिलाड़ी और जाने माने लेखक भी

हर विजय के बाद विलुप्त हो रही थी मनुष्य की मनुष्य के प्रति करुणा
पनप रहा था मनुष्य और मनुष्य के मध्य अपमान, उपेक्षा, अधैर्य, आहत का रिश्ता
विलुप्ति के बारे में कहा जाता है
कि जो चीजें विकास के क्रम में अनुपयोगी हो जाती हैं वे विलुप्त हो जाती हैं
मगर यह पहली बार हो रहा था
पूरे मानव इतिहास में
कि जो चीज़ें सबसे महत्वपूर्ण थीं वे भी विलुप्त हो रही थीं लगातार
जैसे पूँछ आवश्यकता न होने पर विलुप्त हुई थी
पर वैसी स्थिति दिमाग़ के साथ न थी
उसकी बहुत ज़रूरत थी पर वह विलुप्त होने पर आमादा था

हर विजय के बाद लोकतंत्र में से लोक विलुप्त हो रहा था
बचे रह गए थे केवल उसके अवशेष
इन्हीं पर खड़ी थीं संस्थाएँ और सबसे ताकतवर लोग
जैसे डायनासोर की अपनी बड़ी आकृति ही उसकी विलुप्ति का कारण बनी
उसी तरह लोकतंत्र की विलुप्ति का कारण बनी उसी के ज्ञान से उपजी बड़ी तकनीकी
कुछ चीज़ें जो पहले आधुनिकता के क्रम में विलुप्त हो ग थीं, उनका इस तकनीकी की मदद से पुनर्निर्माण किया जा था
उन्हीं में से एक थी देवताओं की भाषा
इस भाषा में रचे ग्रंथ फिर से पूजे जा रहे थे

हर विजय के बाद आम लोगों की भाषा से अर्थ विलुप्त हो जाता था
और देवताओं की भाषा में अतिशयोक्ति की दर और बढ़ जाती थी

हर विजय के बाद अगर कुछ विलुप्त नहीं हुआ था तो वह थी बेशर्म पूँजी
जो अपने सफल होने का एक सुंदर भ्रम रचकर और अधिक विकराल होती जा रही थी
विजय रथ के सिंहासन के नीचे यही विकराल पूँजी लगी थी.

 

 

विजय उत्सव- 4

ट्रेन पौने एक बजे स्टेशन पर रुकी
मैंने उसे न पाकर फ़ोन मिलाया
घण्टी बज-बजकर रुक रही थी
और उसके मुँह से हैलो सुनने की उम्मीद भी
जैसे घट रही थी
बहुत देर बाद एक औरत की आवाज़ आई
वह औरत शायद उसकी बीवी थी,
“वो निकल गए हैं।”
मेरी जैसे जान में जान लौट आई
कुछ देर बाद उसके ऑटो की रोशनी मुझे अपनी तरफ़ आती हुई दिखी
पास आकर फटाफट वह ऑटो रोककर बोला, “…नींद लग गई थी।”
मैं उसे कैसे बताती जितनी देर उसे नींद लग गई थी,
उतनी देर में मैंने कर ली है पूरे भारतीय मीडिया की सैर
और न जाने क्या-क्या घट चुका है मेरे साथ
मैं कितने कल्पित हादसों की शिकार हूँ
मैं उसे कैसे बताती !
अगर बताती तो क्या सोचता वह मेरे बारे में

उसका नाम मैं जानबूझकर छिपा रही हूँ
केवल इतना बताती हूँ, उससे मेरी मुलाक़ात 2017 में हुई
तब वह जींस-टीशर्ट पहनने वाला एक जवान लड़का हुआ करता था
हमेशा स्टेशन पर खड़ा मिलता, उसका हरे रंग का ऑटो
सुबह-सुबह ट्रेन से उतरकर मैं सीधे उसके ऑटो में बैठ जाती
उसने कभी पैसे नहीं बताए
कभी नहीं बताया कि कितने में जाएगा कहाँ तक
वह बस चल देता
मगर इन वर्षों में उसका हुलिया बदल गया है
उसकी दाढ़ी लंबी हो गई है
उसके हाथ में आ गया है एंड्रॉयड फ़ोन
जींस न के बराबर पहनने लगा है
और पक्का नमाज़ी हो गया है
कल सुबह जब पाँच बजे वह मुझे छोड़ने आया था
तब उसने एक हिन्दू दुकानदार से राम राम भी की थी
और यह काम उसने नमाज़ पढ़ने के ठीक बाद किया था
उस वक़्त मैंने सोचा था क्या उसने विजय उत्सव को दिल से स्वीकार कर लिया है ?
जैसे इन दिनों कर रहे हैं सब
सबकुछ चुपचाप स्वीकार
‘भाई इस देश में रहना है तो राम राम कहना पड़ेगा’
या फिर वह ऐसा ही था हमेशा से
सबके उत्सवों में शामिल
एक मामूली आदमी

उसने मुझे घर तक छोड़ा
मेरे हाथ में पाँच सौ का नोट था
“खुल्ले नहीं हैं; फिर ले लूँगा।”
कहकर चला गया वह

बहुत दिनों से हम दोनों मिले नहीं हैं,
उसके सौ रुपए अब भी मुझ पर उधार हैं
सोचती हूँ क्या उस दिन वह सौ रुपए के लिए आया था?
या आया था वह मेरे लिए?
या फिर आया था उस अकेली औरत के लिए जो रात के डेढ़ बजे प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी
जो आसमान के तारे गिन रही थी
और फ़ासिस्टों के चमचों की टोक याद कर-कर के फ़िजूल में ही डर रही थी, “मुसलमान के ऑटो में घूमो एक दिन बुरी फँसोगी।”
उस दिन जैसे भागता हुआ वह आया,
मोबाइल और पर्स घर पर ही भूलकर
उससे तो यही लगा था जैसे वह पिछले आठ सालों का रिश्ता निभाने आया है
वह रिश्ता जो बना था दो इंसानों के आपसी विश्वास से
आपसी संवाद से
क्या विजय रथ इस रिश्ते को कुचल सकता है?

 

 

विजय उत्सव- 5

मेरे क़स्बे के सबसे ऊँचे मकान पर वही झंडा लहरा रहा है
जो विजय रथ के सिंहासन पर लगा है
जिसे विजय उत्सव के दौरान अधिकतर नागरिकों ने अपने हाथों में धारण कर रखा था
जिसे बिलकिस बानो के जेल से छूटे बलात्कारियों ने भी बेशर्मी से पकड़ रखा था
वही झंडा जो एक गुजराती औरत को सालों-साल हत्या की धमकियाँ देता रहा
वही झंडा जिसके डर से उसे बार-बार घर बदलने पड़े
वही झंडा जो इतना लंबा है कि न्याय के लिए उसने कौन से न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया
हवा में ही देख लेता था
वही झंडा जिसके सामने गाँव की एक साधारण औरत एक योद्धा की तरह लड़ते गुजरात के नक्शे से बाहर दिखने लगी
वही झंडा जिसकी लाठी बनाकर मार डाला गया था उसके पूरे परिवार को
वही झंडा जिस पर मेरे जैसे इक्का-दुक्का लोग तब शर्मिंदा हो रहे थे
और अब भी शर्मिंदा ही हो रहे हैं
वही झंडा जो हत्यारों, लुटेरों और बलात्कारियों को  समाज में सम्मान का अधिकारी बना देता है, माला पहना देता है, जल चढ़वा देता है, चरण छुवा देता है
विजय रथ के सिंहासन पर लगा यह झंडा अब जान चुका है कि मज़लूमों पर हुई हिंसा किसी सम्पन्न को विचलित नहीं करती
वह जान चुका है कि तकनीकी और छवि निर्माण के इस युग में बिलकिस बानो औरत नहीं एक नफ़रत का सामान भर है
उसके ख़ून को इस झंडे में लगाकर इसके रंग को और गहरा किया जा सकता है
विजय उत्सव का रथ जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है वह झंडा झोपड़ियों के छप्परों पर भी घोंस दिया जा रहा है
यदि यूँही बढ़ता रहा विजय रथ तो यह हर जगह होगा
हर जगह शायद मेरे छज्जे पर भी
मेरे शरीर पर भी…
पर क्या यह मेरी आत्मा पर भी गाड़ा जा सकता है ?
अगर वह गाड़ गए मेरी आत्मा पर इसे
तो मुझे भी कायरों की सूची में जगह देना
थूकना मुझ पर भी.

 

नेहा नरूका
भिंड, मध्यप्रदेश

 ‘फटी हथेलियाँ’ कविता संग्रह प्रकाशित.

सम्प्रति: शासकीय श्रीमंत महाराज माधवराव सिंधिया महाविद्यालय कोलारस में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर
nehadora72@gmail.com

Tags: 20252025 कविताएँनेहा नरूकाविजय उत्सव
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Comments 11

  1. पायल भारद्वाज says:
    5 months ago

    पायल भारद्वाज
    नेहा नरूका की चिर परिचित सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि और वैचारिक प्रतिबद्धता से लैस यथार्थ का उद्घाटन करतीं सघन कविताएँ
    बहुत बधाई नेहा

    Reply
  2. Anonymous says:
    5 months ago

    बेहद अच्छी श्रृंखला____मित्र नेहा को बधाई 🌻

    Reply
  3. अरुण कमल says:
    5 months ago

    नेहा नरूका की कविताएँ बिल्कुल ताज़ा,मार्मिक एवं अपूर्व है—निर्भीक,साहसी—गहरे राजनैतिक बोध से संपन्न।एक नयी प्रतिरोधक कविता।

    Reply
  4. अर्चना लार्क says:
    5 months ago

    नेहा विचारवान कवि हैं, जिनमें हर तबके को लेकर छटपटाहट है, जो रचना के रूप में पाठक के मन में भी वही बेचैनी पैदा करने में सफल है। किसी बड़े कवि जिन्हें आप वरिष्ठ भी कह सकते हैं, इतना अच्छा लिखते फिलहाल मैंने नहीं पढ़ा। कह सकती हूं ये रचनाएं अपने शिल्प अपने कथ्य में निरंतर बेहतर होने का प्रमाण हैं। बधाई।

    Reply
  5. कुमार अम्बुज says:
    5 months ago

    नेहा की कविताएँ पिछले एक दशक से ध्यानाकर्षण कर रही हैं। ये कविताएँ भी उसी क्रम में देखी जा सकती हैं। विचार और बोध का समन्वय। अपने समकाल से प्रसूत और मुखातिब। निज और समाज की जीवनचर्या के अनुभवों से प्रमाणित। बधाई।

    Reply
  6. विजय कुमार says:
    5 months ago

    वर्चस्व और दमन की विभिन्न शक्लों को नेहा नेरुका ने जिस प्रकार से अपनी कविताओं में उजागर किया है, वे सारे संदर्भ हमारी समकालीन कविता में इससे पहले कभी नहीं आए थे।

    Reply
  7. Puspendra Madrecha says:
    5 months ago

    विजय उत्सव श्रृंखला की पांचों कविताएं समकालीन यथार्थ के पांच चेहरों की विद्रूपता को दर्शाती झकझोर देने वाली रचनाएं है। प्रत्येक मोहल्ले के सिरफिरे प्रधानमंत्रियों की सुतली बम फोड़ने की हरकतों सी आतंक फैलाने की घटनाएं आम हो चुकी हैं, उस जमात का नेतृत्व करती मैथिली हुड़दंग गान प्रस्तुत करने को तत्पर है। एक रंग के झंडों का उत्पादन औद्योगिक घरानों से दनादन हो रहा है और ऊंची इमारतों से लेकर जुग्गी झोंपड़ियों तक पहुंचा देने का तंत्र का षडयंत्र है। लोक के गले में झंडे का फंदा कसता चला जा रहा है और कोरस में वंदे मातरम गूंज रहा है कर्कश शोर शराबे के साथ। पूड़ी सब्जी की प्रतीक्षा करती थकी हुई भीड़ जय कारे लगा रही है। अनेक रंगों के सुप्रसिद्ध लोग एक रंग से बदरंग हुए जा रहे हैं, उनके मुखौटे के नीचे भी भय व्याप्त है।

    Reply
  8. Alok Mishra says:
    5 months ago

    कितनी गहराई तो सोचने पर मजबूर कर रही हैं ये कविताएं l शुक्रिया कवि, इन्हें पढ़वाने के लिए।

    Reply
  9. Harpreet Kaur says:
    5 months ago

    हमेशा की तरह बहुत ही विचारवान और गंभीर कविताएं । बधाई नेहा

    Reply
  10. कुमार मुकुल says:
    5 months ago

    इस दौर को प्रश्नांकित करती जरूरी कविताएं…

    Reply
  11. पवन करण says:
    5 months ago

    हम बिहार का चुनाव जीत गये हैं….

    बढ़िया कविताएं हैं। पाठक को अपने कहने और अपनी विषयवस्तु में शामिल करती हैं।

    Reply

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