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Home » विनय सौरभ की कुछ कविताएँ

विनय सौरभ की कुछ कविताएँ

by arun dev
June 4, 2026
in कविता
Reading Time: 3 mins read
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विनय सौरभ की  कुछ कविताएँ
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विनय सौरभ की कुछ कविताएँ

 

 

चीनाबाड़ी का शीतला

सब उसे याद करते हैं
जब इलाक़े में कोई गुज़र जाता है
उसे तत्काल ख़बर भिजवाई जाती है
कोई भागता जाता है
उसकी बस्ती चीनाबाड़ी की ओर

घर विलाप में डूबा होता है
मृतक के जीवन प्रसंग चलते रहते हैं
दरवाज़े पर कुर्सियां लगी होती हैं
लोग एक-एक करके घर के भीतर जाते हैं
गेंदे की पंखुरियाँ अर्पित करते हैं
और बाहर आकर आपस में धीरे से पूछते हैं कि
अंतिम यात्रा में और कितनी देर है?

अंतिम दर्शन की गहमागहमी के बीच
चीनाबाड़ी का शीतला आता दिखाई देता है
कंधे पर ताज़ा हरा बांस लिए
झोले में एक दावा, एक कचिया
और एक पतली छूरी के साथ

मृतक के घर के सामने की सड़क पर
अपनी सुविधा से वह कहीं भी बैठ जाता है
माहौल से निरपेक्ष और‌ निस्संग दिखता
बस इतना भर पूछता हुआ कि
सावे की रस्सी आ गई है ?

फुर्ती से चलते हैं शीतला के हाथ
पतली सी दिखने वाली उस छूरी और कचिया से
इतनी ज़ल्दी ही वह टिकटी तैयार कर लेता है कि
नए देखने वाले की आँखें फैल जाती हैं!

ताज़ा हरा बांस घंटे – दो घंटे की उसकी
मिहनत के बाद देखते ही देखते बदल जाता है
मृतक के अंतिम सिंहासन में

जीवन भर का इतना लंबा रास्ता
कहानियों से भरा सफ़र
और आख़िरी यात्रा का सामान
बस छह हाथ का!

टिकटी बनाने‌ के बाद
वह बीड़ी पीता सुस्ता रहा है
मज़दूरी पाकर उसने हाथ जोड़े हैं
और अपना सामान एक प्लास्टिक की
पुरानी थैली में डालकर निकल गया है

उसे जाते हुए देख रहा हूँ
धीरे-धीरे ओझल होते हुए!

साठ- बासठ के हो गये शीतला को
इसके बाद शायद ही कोई याद करता होगा
शायद ही कोई बुलाता है उसे श्राद्ध भोज
या किसी दूसरे जीवन उत्सव में !

सब उसे शीतला ही कहते हैं
किसी ने उसे अंतिम यात्रा का शिल्पी नहीं कहा

वह हंसकर अभी थोड़ी देर पहले ही कह रहा था-
अपनी ज़िन्दगी में चाहे जितने भी सामान बनवा लो
सब देख सकते हो, छू सकते हो
उसमें ख़ामियां निकाल सकते हो
उसे बदल सकते हो,
मना कर सकते हो घर लाने से पहले

पर यह अंतिम आसन
जिस पर तुम्हें आख़िरी बार बिठाया जाना है
इसके बारे में तुम कोई राय नहीं दे सकते
तुम्हारी कोई दख़्ल- अंदाज़ी नहीं चलेगी
तुम्हारे पास अब कोई रास्ता नहीं
चाहे तुम विजेता रहे हो या फ़क़ीर!

बस अब तुम एक ‘मिट्टी’ भर हो
और ‘घाट’ पर तुम्हें जल्दी पहुंचा पाने की
हड़बड़ी में सभी लोग भरे पड़े हैं

 

 

 

जीवन के आखिरी हिस्से में

एक दिन आप पाते हैं
बहुत कम चीजों के सहारे
चल रहा है आपका जीवन

बेकार ही इतना सारा संजाल जमा किया
और नींद खराब की
जब यात्राएं कर सकते थे तब
भविष्य के लिए उन्हें स्थगित किया

जीवन के आखिरी हिस्से में
आता है यह ख्याल!

 

 

कितना संभव हुआ
और कितना छूट गया!

क्या उन चिड़ियों से तुमने आज बातें कीं जो रोज सुबह तुम्हारे कमरे की खिड़कियों पर आती हैं? उनके लिए दाना-पानी रखा? आज कोई नया पौधा रोप आए कहीं?

किसी पुराने दोस्त को खत लिखा ?
उनको याद किया जो तुम्हारी जिंदगी में कभी खुशबू की तरह शामिल थे!

आज तुम्हारा जन्मदिन है!
आज उनके बारे में सोचो, जिन्हें कभी अपना जन्मदिन याद नहीं रहता! जो सुबह काम पर जाते हैं और देर रात घर लौटते हैं. जो राह चलते अकारण प्रणाम करते हैं लोगों को और मुसकुराते रहते हैं.

मुझे तो बस इतना कहना है कि आज संभव हो तो उनमें से दो-चार से मिल लो.
उन्हें उनकी जरूरत की जो चीजें दे सकते हो, दे डालो अगर वे स्वीकार करते हैं! उनके बच्चों को गोद में उठाओ लेकिन कोई तस्वीर मत खिंचवाओ.
उन्हें कहीं किसी सोशल मीडिया के संसार का हिस्सा मत बनाओ.

आज कम से कम उन शहरों के वैसे घरों का शुक्रिया अदा करो, जो तुम पीछे छोड़ आए. भले ही तुम किराएदार थे वहाँ!
वहाँ मिले उन बच्चों के बारे में सोचो जो अब बड़े हो गए होंगे और न जाने कहाँ होंगे जो शाम को तुम्हारे कमरे पर लौटते ही धमक जाते थे और सोख लेते थे तुम्हारी उदासी, तुम्हारा अकेलापन.

उसमें से वह एक बच्चा जो तुम्हें ‘काकू’ बुलाता था और तुतलाती मैथिली में कितनी प्यारी बातें करता था!
कटवारिया सराय के उस जाट के मकान में रहते हुए एक दिन कहाँ सोचा था तुमने, वर्षों तक इधर लौटना मुमकिन नहीं होगा और मधुबनी से दिल्ली आए एक सुंदर परिवार की स्मृति भर रह जाएगी.

किसी इत्मीनान वाले दिन
किसी नदी के पास जाना
किसी बड़े पेड़ के पास बैठना.
आँखें बंद करके देखना अपनी यात्रायें.
कितना कुछ बेहतर हो सकता था.
कितना संभव हुआ और कितना छूट गया!

 

 

बस यही चार दिन!

तुम चले गये!
गुलमोहर के ये फूल
जैसे तुम्हें याद कर रहे हैं
छत भीगी हुई है रात की बारिश से
लेकिन तुम्हारे पैरों की छाप
अभी भी बची हुई है मन में

तुम्हारी रेल अब तुम्हारे शहर
पहुँच रही होगी !
मुझे तुम्हारे शहर का जिक्र भी
अच्छा लगता है अब!

लेकिन तुम शहर के नहीं लगते
पलाशों के जंगल में तुम्हारा
गाँव मुझे बहुत अच्छा लगता है
सोचता हूँ तो लगता है कि
पलाश का फूल ही तो हो तुम !

सुनो !
फिर आना

जैसे अगले बरस गुलमोहर पर
ये फूल फिर आयेंगे
यहाँ कम से कम चार दिन रहना!

बस यही चार दिन ही तो
ज़िन्दगी के मानी हैं !

 

 

जैसे यह जीवन!

तेजपत्ते वाली चाय सामने रखी है
वह माँ के अंतिम दिनों के किस्से सुना रहा है
मैं कहता हूँ हम सब के आख़िरी दिन ऐसे ही होते हैं- बेआवाज़ और चुपचाप झर जाने वाले !

सर्दी तेज़ हो रही है
खिड़कियों के शीशे पर धुंध बढ़ रही है
माँ का चेहरा भी अंतिम दिनों में धुंध से भर गया था
लगातार पुरानी स्मृतियों में लौटने वाली माँ चुप-चुप-सी हो गई थी
फिर एक दिन वैसे ही चुपचाप चली गई !

माँ के कमरे में पुरानी चिट्ठियां रखी हैं मेरी
सालों से उन्हें देखा नहीं है
मेरी गैरहाज़िरी में आई चिट्ठियां वह सहेज कर रख देती थी
जनवरी यातना देती हो जैसे!

जाड़ा उतरता है तो माँ के बचे-खुचे दिन याद आते हैं
वह बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाला घर याद आता है जो बरसों से बंद पड़ा है

पिता, माँ के जाने के बाद पौधों का ख्याल रखते हैं और बोलते तो खैर पहले भी कम थे, अभी बुआ के यहाँ गए है, कब से बुला रही थी
हमेशा अंदेशों से घिरा रहता हूँ उनके स्वास्थ्य को लेकर. बस वे स्वस्थ रहें.

चाचाजी अब शायद ही लौटें गाँव
अब मुलाक़ातें आपस में कितनी कम रह गई हैं!

हमारी बातचीत का तापमान
इस मौसम की तरह ठंढा पड़ा है
माँ की कढ़ाई किए हुए कपड़े हैं अलमारियों में और बहन की कई पेंटिंग दीवारों पर
हाहाकार से भर जाता है हृदय, जब इन्हें देखता हूँ
खिड़की से दिखता है
हरसिंगार का पौधा फूलों से भरा
ओस गिर रही है उस पर
सुबह सब झर जाएंगे
जैसे जीवन!

 

pinterest से आभार सहित

 

बंद पड़े घर

इस दुनिया में
अब सैकड़ों घर बंद पड़े हैं
उनके बाशिंदे अब कहीं और रहते हैं
वे घर जो एक जुनून और
लंबी प्रतीक्षा के बाद बने थे
जिनको देखकर लगा होगा कि
चलो एक सपना पूरा हुआ
कैसी आश्वस्ति से भरा होगा मन !

उन मकानों पर लगे तालों पर
अब धूल बैठी है
उन्हें देखना कलेजा छील देने
वाला अनुभव है.

 

 

 

वे भी हमारे बीच ही रहते हैं
सामाजिक प्राणी की तरह

इस शहर में आने के 6 महीने के बाद मैंने उसे जाना था
उसने अपनी तीन पत्नियों को घरेलू हिंसा में मार डाला था फिर उसने चौथी शादी भी की
उसके चेहरे को देखकर कोई यह कह सकता था
ओह, यह कैसे संभव है !

पुरुष अविवाहित रहते देखे गए हैं कई कारणों से
असमर्थ और विपन्न परिवार की लड़कियों को,
कैसा भी हो, पति मिल ही जाता है !

वह जेल में बहुत कम महीने रहा
जिन स्त्रियों की हत्या में वह शामिल रहा
माना जाता है, बहुत कमजोर रहे होंगे
उसके भाई-बाप !
वे अपनी रोजी-रोटी देखें या कचहरी दौड़ें
संदेह का लाभ पाकर ऐसे लोग छूटते आए हैं,
वह भी छूट गया!

कोई विवाद या शोर उन पत्नियों की मौत के बाद नहीं हुआ जबकि अपने घर की स्त्री पर उसकी क्रूरता जानते थे लोग
पर कभी सिद्ध नहीं हो सका कि
उन तीन स्त्रियों की मृत्यु हत्या ही थी!

सात-आठ सालों से चौथी पत्नी जीवित है
लोग कहते हैं कि एक उम्र के बाद
आदमी थक ही जाता है, उसमें गुस्सा या आवेग पहले की तरह नहीं रह जाता!

मानो उस स्त्री का जीवित रह जाने का मात्र कारण उसके आदमी का उम्र के कारण थक जाना या शिथिल हो जाना था

कल ही वह दिख गया, सरस्वती पूजा के पंडाल में
बच्चों की मदद करता हुआ!
पिछले साल दिखा था शिवरात्रि में
महिलाओं की निकाली गई कलश यात्रा में
शहर के गणमान्य लोगों के साथ
भीड़ को सहयोग करता हुआ
रोज योगाभ्यास के लिए गांधी मैदान में जाता हुआ

मोहल्ले में बिजली खराब हो जाए
बिजली विभाग को फोन करता है
वह मोहल्ले के बड़े बुजुर्गों को राह चलते
अभिवादन करता है
लोगों को ठिठक कर मौन स्मित के बीच
उसका जवाब भी देना ही होता है

कभी-कभी यह लगता है कि
लोग भूल गये हैं कि
तीन स्त्रियों का वह हत्यारा पति भी है
जबकि बस कुछ साल ही बीते हैं!

लोग तो दबे स्वर में यह भी कहते थे कि
सब कुछ जानते-बूझते, देखो कैसे
हत्यारे को भी लोग दे देते हैं बेटियाँ!

इस तरह से एक हत्यारे को हम जानते हैं
वह हमारे बीच रहता है
बहुत से हत्यारों को हम नहीं जानते
और हम उनके बीच रहते आते हैं
जैसे वे सचमुच एक सामाजिक प्राणी हों!

 

 

 

दिसम्बर डायरी

यह अच्छा हुआ कि जाते दिसंबर में तुमसे मिल सका. हमारी बातचीत में शामिल तुम्हारे पिता किसी भूली हुई कहानी के किरदार की तरह आते थे मेरे भीतर. उन्हें पास से देखना अच्छा लगा. मैं अपनी थकान भूल गया था तुमसे मिलने के बाद. तकरीबन बीस सालों के बाद देखा गया तुम्हारा शहर फ्लाइ ओवरों और ऊँची इमारतों से भर गया था.

यह बड़ा हो गया है- यह कहते हुए मैंने तुम्हारे पिता के चेहरे की तरफ देखा, जो पिछले 50 वर्षों से इस शहर के बड़े होते जाने के गवाह थे. मैं चाहता था कि वे कुछ बोलें पर तुमने कहा ही था कि अब जरूरत भर बोलते हैं! पर उनकी सौम्यता भरी खामोशी मुझे अच्छी लगी.

तुम्हारा पुराना घर मेरे ख्यालों में आता था और और उसमें मैंने तुम्हारे साथ रहने की कल्पना की थी. हमने घर को व्यवस्थित किया था. साथ भोजन बनाया था . पिता के गमलों को संवारा था . तुमने रियाज किया था. मैंने कविताएं लिखी थी. हम साथ बाजार हो आए थे.

वे सारे खाली कमरे, पुराने फर्नीचर, बहन की पेंटिंग, माँ की कारीगरी वाले कपड़े, नाना के नाम की पीतल वाली तख्ती, माँ की पुरानी कीमती साड़ियां ! तुम्हारे, बच्चों के, बहन के, पिता के गर्म कपड़े- मैंने उन्हें करीब से देखा और ऐसे देखा जैसे कोई बहुत खोई हुई चीज बरसों के बाद मिल गई हो! मैं उन्हें छूने की इच्छा से भरा था.

खयालों में आने वाले तुम्हारे घर से लौटते हुए मैं आंसुओं से मैं भर गया था. यह वाकया अजीब था! सोचता हूँ इस पर किसी को शायद ही भरोसा हो सकता था तुम्हें छोड़कर!

जब तुमने मुझे अपने पिता से मिलवाया मुझे दोस्त कहकर, उस वक्त मैं उनसे कहना चाहता था कि आपसे मिलने कि मेरी इच्छा बहुत पुरानी थी, लेकिन मैंने उनसे कहा कि आप बहुत हैंडसम थे अपने समय में! आपकी ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें कितनी अच्छी हैं! उसमें तो आप देव आनंद की तरह दिखते हैं.

वे हंसे. उसमें झांकती एक स्निग्धता थी जो एक उम्र पार करने के बाद ही आती है.
मैंने कहा- इन एल्बमों को संभाल कर रखना चाहिए. उन्होंने धीमे से कहा- कभी कभार देख लेता हूँ, जब भी यहाँ आता हूँ. अब तो सब इसे ही संभालना है. मैं तो अब 85 का होने जा रहा हूँ.

विनय सौरभ

22 जुलाई, 1972 (झारखंड)
बख़्तियारपुर संग्रह राजकमल से प्रकाशित

‘कवि कन्हैया स्मृति सम्मान’, ‘सूत्र सम्मान’, ‘बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान’ आदि से सम्मानित
nonihatkakavi@gmail.com

Tags: 2022 कविता2026विनय सौरभ
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Comments 14

  1. अरुण कमल says:
    2 weeks ago

    विनय सौरभ बहुत सजग संवेदनशील और निर्भीक कवि हैं जिनका संग्रह बख्तियारपुर हाल के वर्षों का महत्वपूर्ण काव्य उद्यम है।

    Reply
  2. पुरु मालव says:
    2 weeks ago

    विनय सौरभ की कविताओं की प्रतीक्षा रहती है। वह स्मृति का वृत्तांत कुशलता से रचते हैं। ‘चीनाबाड़ी का शीतला’ कविता बहुत ही अच्छी लगी। बधाई, उन्हें।

    Reply
  3. Swapnil Srivastava says:
    2 weeks ago

    विनय की कविताओं में जीवन के विवरण हैं
    उसे वे जीवंत बना देते हैं. इन कविताओं में लोकरंग भी हैँ जो कविता को मार्मिक बना देते है.

    Reply
  4. सुमंत शरण says:
    2 weeks ago

    विनय सौरभ की कविताओं में वह सब कुछ शिद्दत से दर्ज है जो हमारे जीवन का जरूरी हिस्सा होते हुए भी हमारी सोच से ओझल है।

    Reply
  5. ललन चतुर्वेदी says:
    2 weeks ago

    मैं विनय सौरभ की कविताओं को उनकी अभिधात्मक शैली के कारण पसंद करता हूँ. लगता है कि यह कवि हमारे आसपास का है और हमें चिट्ठियाँ लिख रहा है. कविताएँ तो अनाम पाठकों के नाम चिट्ठियाँ ही हैं.

    Reply
  6. Jaya Ansh says:
    2 weeks ago

    भीतर तक स्पर्श करती कविताएँ ! इन्हें पढ़ने के बाद ऐसा लगता है जैसे हमारा कुछ अंश कविताओं में ही छूट गया है ।

    Reply
  7. Rashmi Kumari says:
    2 weeks ago

    बेहतरीन कविताएं !
    इनकी सभी कविताएं गहरे छूती हैं

    Reply
  8. Anuradha Singh says:
    2 weeks ago

    जीवन कितने अकृत्रिम भाव से आता है इन कविताओं में, जैसे उसे इन्हीं के लिए जिया गया था।

    Reply
  9. Prabhat Milind says:
    2 weeks ago

    विनय सौरभ समकालीन कवियों में मेरे सर्वाधिक प्रिय हैं। उनके पास एक ऐसी नैसर्गिक और मन पर असर डालने वाली भाषा है जिसमें वे हमारे लहज़े में हमारी ही बात करते हैं। वे स्मृतियों के विलक्षण कवि हैं। उनका स्मृति-लोक हम सबका है। सामाजिक रिश्तेदारियों के बहाने वे उन लम्हों को जादुई तरह से पुनर्जीवित कर देते हैं जो कभी हमारे साझा लम्हे थे। उनकी कविताओं में एक क़स्बा धड़कता है, वहाँ का जीवन, लोक, प्रकृति और सामाजिक संबंध एक दृश्य की तरह तरह मन में तैरने लगता है। आख़िरी कविता दिसंबर डायरी मुझे सबसे अच्छी लगी। इसमें अपने रचनात्मक मिज़ाज में बने रहकर अपने शिल्प को अतिक्रमित करने की उत्कटता है। इन कविताओं में जीवन की छोटी-सामान्य ख़ुशियों को जीने के सुखबोध के साथ-साथ वह सब छूट जाने की कसक एक साथ उपस्थित है, जिन्हें समेटा नहीं जा सका। शानदार कविताएँ। बधाई प्रिय कवि को! 🍁🌻

    Reply
  10. नरेन्द्र व्यास says:
    2 weeks ago

    सहज और सरल शब्दों में कितना कुछ कहती हुई, अपनी सी ही, कविताएँ। ख़ूब बधाई उनको।

    Reply
  11. Kallol Chakraborty says:
    2 weeks ago

    विनय सौरभ की कविताएं हमेशा की तरह बेहद मर्मस्पर्शी और संवेदनशील हैं। ‘कितना संभव हुआ और कितना छूट गया’, और ‘वे भी हमारे बीच ही रहते हैं सामाजिक प्राणी की तरह’ कविताएं हमारे समय समाज को प्रतिबिंबित करती हैं। समालोचन का शुक्रिया।

    Reply
  12. Savita Singh says:
    2 weeks ago

    आज मैंने विनय सौरभ की कविताएँ पढ़ीं. मैं भूल गई ये कविताएँ हैं. ये किन्ही ऐसे अहसासों के टुकड़े लगे जिनमें यथार्थ सांसे लेता रहता है. तमाम घर जिनमें अब कोई नहीं रहता इनकी कविता में आकर फिर से जीवंत हो जाते हैं, उनकी रहस्यमयता की अनुगूंजे किस तरह कविता में सुनाई पड़ने लगती हैं, यह कविता में ही ला पाना संभव था, और उन्होंने कविता की शक्ति को यहां दिखा भी दी. किन्ही लोगों के कपड़े, स्वेटर, तस्वीरें..उनको छूने की लालसा, इस संसार से हमारे उचित लगाव का पता देती है. यह संसार अंत तक छूटता नहीं हमसे. और हत्यारे, वह जब से पितृसत्ता है हमारी त्वचा की तरह हमारे साथ रहते हैँ. बहुत अच्छी कविताएँ, विनय सौरभ. आपको बहुत बधाई.

    Reply
  13. Sushma Sinha says:
    2 weeks ago

    विनय सौरभ जी की कविताएँ मुझे हमेशा से प्रिय हैं। साधारण से दिखते विषय की भी उनकी अभिव्यक्ति बड़ी हो कर प्रभावित करती रही है। बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं!

    Reply
  14. shashi khare says:
    1 week ago

    हमारी जिंदगी से कब गुज़रा यह कवि
    इन कविताओं में हमने अपनी जिंदगी के वह सब पल भी देख लिए, महसूस किए जो छूट गए थे।

    Reply

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