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Home » शब्द बचे रहेंगे: युद्ध और कविता : विजय कुमार

शब्द बचे रहेंगे: युद्ध और कविता : विजय कुमार

कविता युद्ध के औचित्य और न्याय का प्रतिप्रश्न है. वह पीड़ित और पराजित की आवाज़ है. करुणा का आश्रय है. विनाश की स्मृति और बर्बरता की शर्म है. वरिष्ठ कवि-लेखक विजय कुमार का यह आलेख इस उजाड़ में लिखी जा रही कविताओं के बहाने शब्दों की भूमिका को रेखांकित करता है. प्रस्तुत है.

by arun dev
April 5, 2026
in आलेख
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शब्द बचे रहेंगे: युद्ध और कविता : विजय कुमार
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शब्द बचे रहेंगे
युद्ध और कविता 

विजय कुमार

 

यह हमारा समय है जब ध्वंस और विनाश के दृश्य दिन-प्रतिदिन का एक सामान्य सच बनते जा रहे हैं. दुनिया के वे तमाम अशांत इलाके जहाँ आधी रात आसमान में सितारों की झिलमिल रोशनी नहीं, मिसाइलों के विस्फोट के धमाके हैं, उनसे जन्मा हाहाकार है, बम गिर रहे हैं, इमारतें ध्वस्त हो रही हैं, बस्तियाँ मिट रही हैं, रह-रह कर आग और धुएँ के गुबार से सारा दृश्य पट जाता है, हज़ारों बेकसूर लोगों की हत्या हो रही है, मासूम बच्चे यतीम हो रहे हैं, चारों ओर क्षत-विक्षत देहें और लाशें हैं, इमारतों के भग्नावेशों के बीच स्त्रियाँ विलाप कर रही हैं, चीख -पुकार, भगदड़, भूख और लाचारी के मंजर हैं, लाखों अभिश्प्त ज़िन्दगियाँ बेदखल हो कंटीले तारों के पार दूसरे मुल्कों में शरणार्थी बन रही हैं, प्राकृतिक संसाधन और समूचा पर्यावरण नष्ट हो रहा है. और दूसरी ओर मुल्कों के बीच कूटनीतियों, तिकड़मों और रणनीतियों की बिसात बिछी हुई है. सारे वैश्विक संगठन और मंच अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं. और ताकत में मदमत्त राष्ट्राध्यक्ष प्रतिदिन टेलीविजन स्क्रीन पर दहाड़ रहे हैं, धमकियाँ दे रहे हैं, ललकार रहे हैं. घृणा, विभेद, वर्चस्व, आधिपत्य, नियंत्रण, टूटन, विस्फोट और अभाव के ये दृश्य 21वीं सदी की “जियो पॉलिटिक्स” का अब एक “न्यू नॉर्मल” हैं. घटित से जुड़ी खबरों और सूचनाओं का एक घटाटोप है और प्रतिदिन सनसनी से लबालब जानकारियों का एक विशाल कूड़ा जमा हो जाता है. और बदलता कुछ नहीं.

आम नागरिक जीवन में अस्थिरता, अपघात, भय, अनिश्चितता, बेबसी और विस्थापन सब कुछ यथावत. यह सच जो भाषा और बखान के बाहर होता जाता है. एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि क्या ऐसे समय में भी सृजन संभव है? क्या वर्चस्व, प्रोपेगेंडा, गढ़े गए झूठ, ध्वंस और तबाही के बीच कला और साहित्य की कोई भूमिका अब प्रासंगिक रह गई है? क्या कविताएँ अभी लिखी जा रही हैं? और यदि इन अशांत इलाकों में कविता लिखी जा रही है तो वह कैसी कविता हो सकती है? घृणा, हिंसा, नरसंहार, उथल-पुथल, शोर, सनसनी और विस्मृति से जो ताकत की दुनिया बुनी गई है, क्या उसके सामने कोई ऐसा ‘स्पेस’ अभी बचा हुआ है जो केवल कविता में उभरता है? आज इस दौर में समय और कविता का वह परस्पर संबंध किस तरह का बन रहा है? कविता यदि गवाही है तो यह गवाही आज किस तरह की है ? किसे ज़रूरत है उसकी ?

हम थोड़ा सा पीछे चलें. लगभग 8 दशक पूर्व दूसरे महायुद्ध के दौरान हुई भीषण तबाही और 60 लाख यहूदियों के नरसंहार की स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में प्रख्यात जर्मन यहूदी विचारक थियोडोर एडर्नो का यह कथन सामने आया था कि

“आउशवित्ज के यातना शिविरों के बाद कविता लिखना एक नृशंस कार्य होगा.”

उसे कई बार एक रचना विरोधी बयान समझा गया. लेकिन वह रचनाशीलता के विरोध में नहीं था. बाद में एडर्नो ने अपने इस कथन में यह भी जोड़ा कि जैसे यातना शाश्वत है, उसी तरह उस उत्पीड़ित का चीत्कार भी तो शाश्वत है. एडोर्नो के उस कथन में जीने, अनुभव करने और रचने के दुनिया में आयी किसी बुनियादी क्रमभंगता की शिनाख्त थी. जीने के परिवर्तित अनुभवों और इस संक्रमण को रचने वाली भाषा में उन अनुभवों के प्रतिनिधित्व का सवाल उन्होंने उठाया था. उनके कहने का आशय था कि संस्कृति के पुराने रूपों में इस संक्रमण को व्यक्त नहीं किया जा सकता. मनुष्य का अवचेतन इस बाहर से आरोपित एकीकरण और उत्पीड़न के प्रतिरोध में एक भूमिगत इलाका बन गया है. वह एक फांक है. कला में अवचेतन का यह ‘स्पेस’ उस नियंत्रणकारी सर्व सत्तावाद के एकीकृत बोध विखंडित कर देना चाहता है. एडर्नो के उस कथन को इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए कि दूसरे महायुद्ध की उस भीषण त्रासदी के बाद सामूहिक अनुभव को शब्द देने, उस आघात से जन्मी निस्तब्धता को तोड़ने, एक अभूतपूर्व क्षरण की गवाही को रचने, स्मृति को बचाने और साधारण मनुष्य के भीतर पसर गए उस निर्वात को शब्द देने वाली एक नई कविता का जन्म हुआ. एक भयानक समय में कविता ने जो कहा उससे अधिक जो अनकहा था वह उसमें गूंजता था. वह गवाही की कविता थी. एक ऐसी कविता जिसमें अतिवादी स्थितियों, हिंसा, राजनीतिक दमन, जेलखाने, निर्वासन और नरसंहार के संदर्भों में वैयक्तिक और सामुदायिक के बीच का फ़र्क मिट गया था. एक व्यक्ति के भाव संसार में पूरी कौम का उत्पीड़न अपने अर्थ को पाता था.

बर्बरता की स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में कविता का रूप किस तरह से बदला इसका एक उदाहरण जर्मन भाषा में कविता लिखने वाले रोमानिया के यहूदी कवि पॉल सेलान की कविताएँ हैं. पॉल सेलान जब 22 वर्ष के थे तब उनके माता-पिता को रोमानिया के एक यहूदी बाड़े में भेज दिया गया था और वहाँ उनको मार डाला गया. पॉल सेलान किसी तरह से बच गए थे. नाजियों ने समूची यहूदी कौम के नर संहार के लिए किसी औद्योगिक परियोजना की तरह जो कार्यक्रम गढ़ा था और जिसे ‘फाइनल सोल्युशन‘ का नाम दिया गया था, वह जागरण काल के मूल्यों के खत्म हो जाने का बीसवीं सदी का सबसे लोमहर्षक अध्याय है. उस आघात से पॉल सेलान जैसा कवि कभी उबर नहीं पाया. व्यक्ति और सामूहिक वेदना से उठकर किसी उदात्त या sublime की ओर जाने का कोई रास्ता उनकी इस कला के पास नहीं था. पॉल सेलान की काव्यभाषा में बाह्य चीत्कार नहीं, एक असहनीय खामोशी में पसरा हुआ गहन आर्तनाद है. उसमें नियति और वजूद की एक गहरी शर्म बसी हुई थी. यद्यपि युद्ध के बाद के वर्षों में वे कविताएँ लिखते रहे लेकिन अंततः 1970 में पचास वर्ष की आयु में सीन नदी में कूदकर उन्होंने अपने जीवन का अंत कर लिया. वे यहूदी थे और जर्मन भाषा में उन्होंने कविता लिखी जो अत्याचारियों की भाषा थी. लेकिन इसी भाषा में यह कवि अपने एक “प्रति संसार” को रचता है.

कविता एक खामोश चीत्कार को मूर्त करने का माध्यम बन जाती है. शब्द वहाँ एक असहनीय मौन को रचते हैं. यह कवि भाषा में उन दरारों को दिखाता है जिन्हें बाहर से लादी गई अवधारणाओं से कभी भरा नहीं जा सकता. आघात, निर्वात, खाली छूटी हुई जगहों, स्थगनों, अंतरालों में थोड़ा सा व्यक्त और बहुत सारा अव्यक्त रह जाने वाला वह कोई विषाद था. पढ़ने वाले के लिए वहाँ संप्रेषण के सारे पुराने पुल टूट चुके हैं. पॉल सेलान जिस कविता को लेकर आए वह उस मार्मिक लेकिन अकथनीय कथ्य की कविता है, जिसे भाषा कहना चाहती है लेकिन जितना कहा गया उससे बहुत अधिक वहाँ शब्दों के बीच की खामोशियों में छितराया हुआ है.यानी भाषा में खामोशी को रचने का एक असम्भव सा कार्य.

20वीं सदी के प्रख्यात आलोचक, निबंधकार और दार्शनिक जॉर्ज स्टेनर जिन्होंने भाषा और साहित्य पर दूसरे महायुद्ध के प्रभावों का मूलगामी अध्ययन किया है, पॉल सेलान के बारे में कहते हैं कि यह कवि कहन के जिस जटिल आंतरिक संसार को रचता है उस संसार में प्रवेश ही सबके लिए संभव नहीं है. इस कवि ने जानबूझकर अत्याचारियों की भाषा में लिखा और उस भाषा को अपनी अन्तश्चेतना की गहनता दी. यह एक दी हुई भाषा के आरोपित ढांचे को तोड़ने की कविता थी. यह कविता जिसमें त्रासद रूप में कवि द्वारा अपने आत्म के विध्वंस की ज़िद है और अपने माध्यम को लेकर बुनियादी संशय भी. इसके कारक तत्व जितने निजी हैं उतने ही उस समय विशेष के इतिहास से जुड़े हुए हैं.

एक दूसरा उदाहरण पोलिश कवि तोदयूष रोज़ेविच का दिया जा सकता है. उन्होंने अपनी कविता में महायुद्ध की त्रासदी की गवाही को रचा. नरसंहार के बाद शेष रह गए नैतिक और भाषाई भग्नावेशों के बीच से उनकी कविता उठती है. यह एक निरावृत और न्यूनतम बखान की भाषा है. कविता ने सारे परंपरागत काव्य अलंकारों को उतार फेंका है. एक ऐसी भाषा जिसमें विडम्बनाओं की ज़मीन पर क्लेश अपने अस्थि पंजर के साथ झांक रहा है. एक वैयक्तिक शोक, क्षरण और मर्मांतक विकलता में एक पूरी कौम के आहत अवचेतन का साक्ष्य. मित कथन में उभरा गहन विषाद, अपने बचे रह जाने की ग्लानि और उस नई भाषा की तलाश जो सारे विचारधारात्मक सरलीकरणों और शोर के पार चली गयी है. ख़ामोशी में विजड़ित एक शून्य वहाँ पसरा हुआ है. इस काव्यात्मक उद्यम में वजूद की किसी अंदरूनी अर्थवत्ता, एक भग्न संसार में किसी शोकाकुल असमाप्त जिजीविषा का अंकन है. यहाँ भी जितना कहा गया है उससे अधिक अव्यक्त रह गया है. इसी तरह दूसरे महायुद्ध के प्रत्यक्ष अनुभव से गुजरे दर्जनों अन्य यूरोपीय कवियों के उदाहरण दिए जा सकते हैं जिन्होंने भाषा में ध्वंस और विदग्ध अनश्वरता के किसी मार्मिक द्वंद्व को रचा है. वही जीने और रचने की पक्षधरता बन गयी.

21वीं सदी का यह पूर्वार्ध पिछली सदी की त्रासदियों से कहाँ अलग है. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में युद्ध की विनाश लीला अबाध गति से ज़ारी है. एक तरफ गति की विकराल तीव्रता, टेक्नोलॉजी के नए नए रूप, सूचनाओं के अंबार, त्वरित का आग्रह, गढ़े गए सचों और संचार माध्यमों का जाल, विज्ञापनों की संस्कृति, विनाश की खबरों के बीच मनोरंजन और बाजार की रौनक है तो दूसरी ओर युद्ध की बर्बरता, निरंकुशताएँ, वर्चस्व, आधिपत्य, घेराबंदी, पाशविकता, विशाल जन समूहों के विस्थापन, पर्यावरण के विनाश और पाशविकता व दमन के नए रूप हैं. 4 वर्ष हो गए रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है. अपने-अपने न्यस्त स्वार्थों में डूबी सत्ता संरचनाओं ने उसे एक दैनिक सच में तब्दील कर दिया है. इसराइल और फिलिस्तीन के बीच संघर्ष छिड़े कई दशक हो चुके हैं. अक्तूबर 2023 में इज़रायल द्वारा आरम्भ किये नर संहार में सत्तर हज़ार से अधिक नागरिकों की अब तक मृत्यु हो चुकी है. पन्द्रह लाख फिलीस्तीनी शरणार्थी जोर्डन, लेबनान और आसपास के देशों में शरणार्थी शिविरों में रहने को विवश हैं. सूडान के आन्तरिक क्लेश में वहाँ का सामुदायिक जीवन लगभग समूल नष्ट हो चुका है. और अब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के साथ एक की भीषण युद्ध छेड़ दिया है जिसके विश्व स्तर पर दूरगामी प्रभाव हैं. इस पूरे दृश्य जगत में जो मानवीय पीड़ा के जो अव्यक्त रूप हैं, उनका समावेश कविता की भाषा के आंतरिक इलाकों में करने की चुनौतियाँ आज पहले से कहीं अधिक हैं और विकट हैं. कवि जिस भाषा को अपना माध्यम बनकर किसी “प्रति संसार” को रचना चाहता है उसकी भाषा पर सूचना माध्यमों और जानकारियों के त्वरित संसार का इस तरह से कब्जा हुआ है कि वैयक्तिकता,अस्मिता की पहचान आत्म जगत के क्लेश और विषाद के स्पेस भाषा से बाहर खदेड़ दिए जा रहे हैं. मनुष्य की उस मूलभूत ‘सब्जेक्टिविटी ‘ के लिये आज कौन सा स्थान रह गया है !

काटेरीना कालिट्को

 

हमारे समय में विनाश, आधिपत्य, अतिक्रमण और नश्वरताओं के बीच कविता की प्रासंगिकता और एकात्मकता पर अभी कुछ समय पहले दिल्ली में रज़ा फाउंडेशन ने “संसार” नामक एक तीन दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था. संसार के अनेक अशांत इलाकों के कवियों की इसमें हिस्सेदारी थी. यूक्रेन से आई चर्चित कवयित्री काटेरीना कालिट्को ने एक निजी अनौपचारिक बातचीत में कहा कि जीवन और मरण के बीच जब बहुत कम फासला रह गया हो तो विपदा के अर्थों में निजी और सामूहिक का फर्क मिट जाता है. ऐसे में एक कविता निजी और सामूहिक स्मृतियों के किसी सम्मिलन को खोजती है. 4 वर्षों से जारी युद्ध में यूक्रेन के एक करोड़ लोग विस्थापित हो चुके हैं, हजारों निर्दोष नागरिक मारे जा चुके हैं, आसन्न संकट के सर्वाग्रही रूप के समक्ष एक रचनाकार के भीतर बचे रहने की कोई ज़िद और उम्मीद ही उसकी बची हुई अंतिम जमीन है. भाषा यहाँ आत्म और अपनी अस्मिता को संजोये रखने का अंतिम आश्रय स्थल है.

कवयित्री ने कहा कि ऐसे संकट में आज एक रचनाकार की भाषा के लिए कई स्तरों पर चुनौतियाँ पेश हैं. इस भाषा को अपने समय की गवाही को रचना है, उसे चेतना पर लगे घावों को भरना है, विखंडित जीवन के बिखरे हुए टुकड़ों को बटोरना है, आघात से उबरना है और युद्ध जो मनुष्य को एक नामहीन संज्ञा में बदल देता है उस जीवन की गरिमा और स्मृति को पुनर्प्राप्त करना है.

यूक्रेन के इसी त्रासद विखंडित वर्तमान की एक अन्य महत्वपूर्ण कवयित्री ईया किवा जिनका रूस के हमले में डोनेट्स्क स्थित घर पूरी तरह से नष्ट हो गया, अपने एक इंटरव्यू में कहती हैं, घर का खो जाना और एक आरोपित विस्थापन अब मेरी पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. आज यूक्रेन में जो हालात हैं, उनमें कविता ने हमें हमारे जिंदा रहने के एहसास को दोबारा लौटाया है. हम अनुभव करने की अपनी उस क्षमता फिर से प्राप्त कर सके हैं, जिसे आघात और उससे जन्मी स्तब्धता ने बाधित कर दिया था.यह एक पुनर्जीवन है. इन अर्थों में कविता हमारे लिए एक श्वसन यंत्र है. कविता इस क्षत विक्षत देह के भीतर स्पंदित नाड़ी है.

ईया किवा

ईया किवा का कविता संग्रह “साइलेंस ड्रेस्ड इन क्रिलिक लेटर्स” काफी चर्चित रहा है जिसमें एक देश के अपने अस्तित्व को बचाने के संघर्ष के समानांतर कविता में युद्ध से उपजे विखंडन का एक गहरा आघात उभरा है. कविता प्रेम और उम्मीद की किसी खोज की विकलता को रच रही है. वे कहती हैं,

“मेरे लिए यूक्रेन में लिखी जा रही कविता उस दर्पण की तरह है जिसमें कोई अपने घायल शरीर, रक्त, टूटे हुए अवयवों और रिसते हुए ज़ख्मों को देख सकता है और साथ ही अपने चेहरे की जगह एक पूरी तरह से अनपहचाना चेहरा जिससे कम से कम हम यह समझ पाते हैं कि हम अब इस तरह से दिखाई दे रहे हैं. हमें अपने इस अपने इस बदले हुए चेहरे को हर रोज आईने में देखना होगा.”

यह हमारे समय की कविता का वह अंतरंग संसार है जो शक्ति संरचनाओं के वहशीपन के समक्ष खड़ा है. यह सर्जनात्मकता इतिहास के तूफान को रोक नहीं सकती पर वह तूफान की प्रचंडता को दर्ज़ करने वाला एक मापक यंत्र बन जाती है. देश और भूभाग भले ही अलग-अलग हों, स्थितियाँ और कारक तत्व एक दूसरे से भिन्न हों पर दुनिया भर में लिखी जा रही ऐसी कविताओं की एक एकात्मकता है. वह संहार के विरुद्ध मनुष्यत्व के अनश्वर होने की गवाही है. एक ऐसा संसार जो जानकारी और विशेषज्ञताओं की बर्बरता के बाहर पड़ता है. वह दृश्य और अदृश्य संघातों के बीच बचे रहने की कोई कातर पुकार है. रचयिता मिट जाता है पर उसका समय और उसकी नियति के बाहर उसके शब्द जीने की गरिमा को आने वाले समय के लिए बचाए रखते हैं.

रिफात अलअरीर

 

फिलीस्तीन के उस असाधारण कवि रिफात अलअरीर की एक कविता में अंत और अनश्वरता का यही युग्म उभरता है. रिफात अलअरीर अंग्रेज़ी साहित्य के प्रोफेसर थे. इजरायल द्वारा किए गए हमले के बावजूद उन्होंने गाज़ा पट्टी के उत्तरी हिस्से से पलायन नहीं किया. और अन्तत: 6 दिसम्बर 2023 को वे इजरायल के हमले में अपनी ही ज़मीन पर काल कवलित हो गये. ‘’अगर मुझे मरना ही है‘’ उनकी बहुचर्चित कविता है-

अगर मुझे मरना ही है,
तो तुम्हें ज़रूर जीना होगा,
मेरी कहानी बताने के लिए.
मेरी चीज़ें बेचकर,
कपड़े का एक टुकड़ा और कुछ धागे खरीदना,
(वह सफेद होना चाहिए, और उसकी एक लंबी पूंछ होनी चाहिए)
ताकि, गाज़ा में कहीं कोई बच्चा,
आसमान की ओर आँखें लगाए,
आग का शिकार हुए अपने पिता का इंतज़ार करते हुए—
जिन्होंने किसी को अलविदा नहीं कहा,
अपने शरीर को भी नहीं, ख़ुद को भी नहीं—
वह पतंग देखे, मेरी पतंग, जो तुमने बनाई है,
आसमान में ऊपर उड़ते हुए,
और एक पल के लिए सोचे कि वहाँ कोई फ़रिश्ता है,
जो प्यार वापस ला रहा है.
अगर मुझे मरना ही है,
तो उससे उम्मीद पैदा होने दो,
उसे एक कहानी बनने दो.

 

विजय कुमार
11 नवंबर 1948, मुंबई

‘अदृश्य हो जाएँगी सूखी पत्तियाँ’ (1981), ‘चाहे जिस शक्ल से’ (1995), ‘रात-पाली’ (2006) कविता संग्रह. ‘साठोत्तरी हिंदी कविता की परिवर्तित दिशाएँ’ (1986), ‘कविता की संगत’ (1996), कवि-आलोचक मलयज के कृतित्व पर साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ़ (2006), ‘कविता के पते-ठिकाने’ (2014) आलोचना पुस्तकें तथा ‘अँधेरे समय में विचार’ (2006) बीसवीं सदी के युद्धोत्तर यूरोपीय विचारकों पर पुस्तक ‘खिड़की के पास कवि’ (2012) वैचारिक निबंधों के संग्रह प्रकाशित.

 कविता के लिए ‘शमशेर सम्मान’ (1996), आलोचना के लिए ‘कविता की संगत’ पुस्तक पर देवीशंकर अवस्थी सम्मान (1997), समग्र लेखन पर ‘प्रियदर्शिनी अकादेमी सम्मान’ (2008), ‘महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादेमी सम्मान’ (2012) से सम्मानित

 

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Comments 7

  1. अशोक अग्रवाल says:
    1 week ago

    वर्तमान समय में जब चारों और युद्ध का शोर गूंज रहा हो, विजय कुमार का अत्यंत महत्वपूर्ण आलेख।

    Reply
    • Nawal Sharma says:
      1 week ago

      महत्वपूर्ण लेख : तारीफ़ …..

      Reply
  2. अनुराधा सिंह says:
    1 week ago

    यह आलेख युद्ध की विभीषिका के भीतर कविता की मानवीय आहट को अत्यंत मार्मिक ढंग से दर्ज करता है।
    कविता, इतिहास और मनुष्यत्व के इस त्रिकोण को आपने जिस गहराई से देखा है, वह देर तक साथ रहने वाला अनुभव है।
    संवेदना और विचार का अत्यंत संतुलित और प्रभावी पाठ।

    Reply
  3. सविता सिंह says:
    1 week ago

    बहुत ही जरूरी लेख. पॉल सैलान मेरे प्रिय कवि रहे हैं. उनका जिक्र यहां गहरे अर्थ लिए हुए है. जैसे वह इस दुनिया से गए, उन्हें शब्द और कविता नहीं बचा सके. युद्ध की क्रूरता उसके समाप्त होने बाद भी दिलों दिमाग में जारी रहती है. अभी कोई सोचे कि खाड़ी के युद्ध के बाद यह और कितना वीभत्स हो जाएगा, कि आत्म हत्याएं घटित होनी तो अभी बाकी ही हैं . जिस तरह उन्होने फ़िलीस्तीनी कवि को याद किया है, विजय जी की संवेदनशीलता यहां और गहरी हो जाती हैं. उन्हें मेरी शुभकामनायें .

    Reply
  4. शरद कोकास says:
    7 days ago

    विजय कुमार जी ने युद्ध के दौर में कविता पर आए इस संकट पर एक बहुत गहन चिंतन प्रस्तुत किया है। जब चारों ओर आग बरस रही हो जान पर खतरा हर समय मंडरा रहा हो निरपराध मासूम लोग मारे जा रहे हों बच्चों तक को बख्शा नहीं जा रहा हो , ऐसे समय कौन सी कविता जन्म लेगी? फिर भी एक कवि अपना सशक्त विरोध तो दर्ज कर ही सकता है। आज के समय पर एक बहुत महत्वपूर्ण आलेख के लिए विजय जी को बधाई।

    Reply
  5. प्रिया वर्मा says:
    6 days ago

    अत्यंत श्रमसाध्य रहा होगा इस लेख को तैयार करना। लगभग सारे कोनों की तफ़्तीश करता हुआ, द्वितीय विश्व युद्ध के आघातों और प्रभावों को वर्तमान के हालातों से जोड़ता हुआ, भरपूर मन से गूंथा गया लेख है यह। आज के हालातों में जबकि सब कुछ लिखकर दर्ज़ किए जाने की बेहद दरकार है, तब यह लेख नए लिखने वालों के लिए एक मशाल की तरह रास्ता दिखाने का काम करेगा। पॉल सेलान का मार्मिक ज़िक्र पढ़ने वाले के मन को भीतर तक भेदता मथता है। विजय कुमार जी की,इस लेख के लिए, भूरि भूरि प्रशंसा।

    Reply
  6. दिनेश शाकुल says:
    6 days ago

    एक सृजनशील लेखक की दृष्टि से विजय कुमार जी ने युद्धकाल में कविता पर आए इस गहरे अवसाद और द्वंद्व को अत्यंत संवेदनशीलता और वैचारिक गहराई के साथ उकेरा है। यह लेख अकल्पनीय हिंसा और हर क्षण पसरी असुरक्षा के बीच मचे बेवजह मौत के तांडव का विचलित विवेचन है। कवि की असली पहचान यही है कि वह इन विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी असहमति और प्रतिरोध को शब्द देता है। यह लेख उसी जिजीविषा को टटोलते हुए, युद्ध की त्रासदी को बारीकी से उजागर करते हुए रचा गया है।
    तोदयूष रोज़ेविच, पॉल सैलान, रिफात अलअरीर और ईया किवा जैसे रचनाकारों के संदर्भ इस विमर्श को और अधिक व्यापक और जीवंत बना देते हैं।
    वर्तमान की जटिलताओं को समझने और उन्हें साहित्यिक संवेदना में रूपांतरित करने वाला यह आलेख निस्संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। इस गंभीर और प्रभावशाली प्रस्तुति के लिए विजय जी प्रशंसा के पात्र हैं।

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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