| आज क्या कर रही हैं गोदान की संतानें गोदान की उत्तर कथा
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पूस की हाड़ कंपाने वाली रात में सेमरी गाँव के मुहाने पर प्लास्टिक की बोरियों, थर्माकोल की प्लेटों और फटे टायरों से उठता ज़हरीला काला धुआँ अलाव बनकर सुलग रहा है. इस दमघोंटू धुएँ के पीछे फटी चादर लपेटे बैठा इंसान कोई अचरज भरा काल्पनिक पात्र नहीं है. नब्बे साल पहले 1936 में जो होरी पचास की उम्र में दम तोड़ गया था, यह उसका परपोता है, साठ साल का होरी महतो. विरासत में इसे न तो राय साहब की तरह रियासत मिली, न खन्ना की तरह शेयर, इसके हिस्से में बस परदादा का नाम आया और उनका कभी न चुकने वाला कर्ज़.
सुबह के सात बज चुके हैं और यह साठ बरस का होरी महतो सेमरी के ‘जन सेवा केंद्र’ के बाहर कतार में खड़ा पाँव पटक रहा है. उसकी आँखें पूस के कोहरे से नहीं, बल्कि चार हज़ार रुपये वाले एक सेकेंड-हैंड स्मार्टफोन की तेज़ नीली रोशनी से पथरा गई हैं. उसके हाथ में नया प्लास्टिक का डिजिटल राशन कार्ड है, लेकिन पीडीएस केंद्र की पुरानी टेबल पर बैठा लड़का, जो गाँव के पुश्तैनी साहूकार मंगरू साह का परपोता है, बार-बार उस छोटी-सी बायोमेट्रिक मशीन की काँच की पट्टी को अपनी कमीज़ की आस्तीन से पोंछता है और झुँझलाकर चिल्लाता है,
“अरे होरी बाबा, अंगूठा ज़रा दबा के टिकाओ! मशीन तुम्हारी पहचान ही नहीं पकड़ रही.”
होरी अपनी घिसी हुई, बदरंग उँगली को उस शीशे की लाल बत्ती पर पटकता है. मशीन से एक ठंडी, बेमुरव्वत इलेक्ट्रॉनिक आवाज़ निकलती है, ‘प्रमाणीकरण असफल’.
जीवन भर हल की मूठ दबाकर, कुदाल चलाकर, कंकड़ तोड़कर और ज़मीन की छाती से अन्न खींचकर होरी की उँगलियों के निशान घिस चुके हैं. जिस शारीरिक श्रम से इस परिवार ने नब्बे सालों तक इस देश के अन्न भंडार भरे, उसी श्रम ने उसकी उँगलियों की त्वचा को छीलकर उसकी नागरिक पहचान का जैविक सबूत मिटा दिया है. जिस राज्य का वह नागरिक है, उसका डिजिटल तंत्र अब होरी के मुँह पर कह देता है कि तुम नागरिक नहीं, केवल एक ‘डेटा एरर’ हो. लोकतंत्र ने होरी से उसका अधिकार छीनकर उसे एक ‘लाभार्थी’ में बदल दिया है, एक ऐसा याचक, जिसे हर महीने पाँच किलो मुफ़्त अनाज का उपकार देकर यह अहसास कराया जाता है कि उसकी साँसें राज्य की कृपा पर चल रही हैं. और मंगरू साह का परपोता हर बार बायोमेट्रिक स्लॉट री-बुक करने और ई-केवाईसी के नाम पर होरी की फटी धोती की खूंट से पचास-पचास रुपये का नोट ऐंठ लेता है.
2.
सेमरी की शक्ल पहली नज़र में बदल गई लगती है. मिट्टी के कच्चे छप्परों पर नीली प्लास्टिक की तिरपालें कस दी गई हैं, कुछ लोगों के पीएम आवास योजना के तहत कच्चे-पक्के घर बन गए हैं, उन घरों की छतों पर ज़ंग खाए पुराने डिश-एंटीना और लहलहाते 5-जी टावरों के साथ सोलर पैनलों की परछाइयाँ हैं, और खंभों पर लटकती फाइबर-ऑप्टिकल केबलें हर मोड़ पर आसमान में साँपों के गुच्छों जैसी उलझी मालूम होती हैं. यह सब डिजिटल झाड़-झंखाड़ पूरे गाँव को अचरज भरा डिजिटल जाल जैसा सौंदर्य प्रदान करता है. लेकिन इस तकनीकी मुलम्मे के नीचे शोषण का पुराना सामंती और जातिगत ढाँचा और अधिक हिंसक, वैश्विक, राजनीतिक तथा संस्थागत हो चुका है.
राय साहब अमरपाल सिंह का कुनबा अब केवल सेमरी की ज़मींदारी तक सीमित नहीं रहा है, उसका दायरा लखनऊ से लेकर न्यूयॉर्क तक फैल चुका है. राय साहब का एक परपोता क्षेत्रीय सांसद और सत्तारूढ़ दल का प्रांतीय कोषाध्यक्ष है. उसने कॉरपोरेट इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिये अपनी राजनीतिक स्थिति इतनी अभेद्य बना ली है कि अब उसे गाँव-गाँव जाकर वोट माँगने की ज़रूरत नहीं पड़ती. वह हाईवे के किनारे किसानों की अधिग्रहित ज़मीनों पर ‘ग्रीन एनर्जी’ और ‘सोलर पार्क’ के नाम पर कॉरपोरेट कंपनियों को ज़मीनें दिलवाता है और खुद कुछ कंपनियों में शेयरधारक है. वह खादी का महँगा कुर्ता पहनकर टी.वी. कैमरों के सामने ‘विकसित भारत’, ‘जीडीपी ग्रोथ’ और ‘कॉरपोरेट एग्रो-इकोनॉमी’ पर भाषण देने के लिए प्राइम टाइम टी. वी. डिबेट में बहैसियत पैनेलिस्ट बुलाया जाता है.
लेकिन राय साहब का दूसरा परपोता देश छोड़ चुका है. वह अमेरिका के एक आइवी लीग विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र का प्रोफ़ेसर बन चुका है. वह न्यूयॉर्क के वातानुकूलित कमरों में साउथ एशिया पर कई अंडरग्रेजुएट और ग्रेजुएट कोर्स पढ़ाता है. उसके मार्गदर्शन में पीएच. डी. करने वाले 7 शोधार्थी हैं जिनमें से 3 बंगाली भद्रलोक हैं और 4 उत्तर भारत के अलग-अलग शहरों से हैं, सब के सब अपर कास्ट हैं. उनमें एक समानता है, अमेरिका आने से पहले सबकी पढ़ाई दिल्ली स्थित जे.एन.यू. से हुई थी, जहाँ से प्रोफ़ेसर-पोता खुद पढ़ा था और उसे उस संस्थान और वहाँ से आने वाले छात्रों से विशेष स्नेह था.
उसने एक बहुत ही बहुप्रशंसित पुस्तक किताब लिखी है जिसे ऑक्सफोर्ड प्रेस ने छापी थी और जिसे कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं, जिसका नाम है, ‘भारतीय ग्रामीण संरचना में सबअल्टर्न प्रतिरोध और जातिगत आधिपत्य‘. वह अपने फ्री-टाइम में कविताएँ और काव्यात्मक निबंध भी प्रकाशित कराता है. पिछले साल उसे एक अंतरराष्ट्रीय फाउंडेशन से 3 लाख डॉलर की ‘क्लाइमेट जस्टिस’ फ़ेलोशिप मिली थी. वह अमेरिका, यूरोप, लैटिन अमेरिका, साउथ ईस्ट एशिया और पता नहीं कहाँ-कहाँ सेमिनार में भाग लेने जाता रहता है. उसकी एक ख़ास बात यह है कि वह अपने अकादमिक पेपर को एक बहुत ही भावुक कविता पर ख़त्म करता है, जिसका विषय लगभग हमेशा गाँव-देहात के किसान और दलित होते हैं. मगर भारत में बैठा उसका सांसद भाई सेमरी में किसानों के खेत की नाप-जोख करवाकर उसे ‘ग्रीन-कॉरिडोर’ परियोजना में कौड़ियों के भाव नीलाम करवाता है.
प्रोफ़ेसर मेहता और मिस मालती की मृत्यु हो चुकी है, मगर उनके पोते-पोतियाँ फल-फूल रहे हैं. मेहता जी का एक पोता भी अमेरिका के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के साउथ एशियन डिपार्टमेंट में एम.ए. की डिग्री पूरी कर रहा है और एक बेहद लोकप्रिय ‘डिजिटल मीडिया पोर्टल’ तथा प्रगतिशील थिंक-टैंक चलाता है. यह पोर्टल इंटरनेट पर वंचितों, दलितों और किसानों के अधिकारों पर तीखे संपादकीय छापता है और बहुराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों से मिलने वाले ‘सीएसआर फंड’ पर फलता-फूलता है.
मिस मालती की परपोती, जिसने दिल्ली स्थित आंबेडकर यूनिवर्सिटी से लिबरल आर्ट्स में डिप्लोमा किया है, एक फेमिनिस्ट पॉडकास्ट चलाती है. इनके बाप-दादा कैसे भी रहे हों, मगर कम से कम ये प्रगतिशील हैं और होरी और सिलिया जैसे लोगों से कम से कम बौद्धिक सहानुभूति रखते हैं. इनके डिजिटल पोर्टल के दफ़्तर में दो महिलाएँ काम करने आती हैं, एक का काम है सुबह-शाम झाड़ू-पोंछा करना और दूसरी का काम है दिन में मेहमानों के लिए चाय-पानी बनाना. दोनों दलित हैं, झाड़ू-पोंछा करने वाली को 3 हज़ार महीना और चाय बनाने वाली को 4 हज़ार महीना सैलरी मिलती है. इसके पोर्टल को मेंटेन करने का काम करने वालों में दो इंटर्न्स हैं, जिसमें एक राजस्थान से है और उसका एडमिशन कोटे से आईआईटी मंडी के डेवलपमेंट स्टडीज प्रोग्राम में हो गया था, दूसरा हरियाणा के अटेली से है जिसने जर्नलिज्म में डिग्री ख़त्म की है, दोनों इंटर्न्स को कोई सैलरी नहीं दी जाती है, मगर वो एक प्रतिष्ठित संस्थान में ‘अनुभव ही तुम्हारा वेतन है’ के सहारे गुज़र-बसर कर रहे हैं.
उसी पोर्टल के लिए भारी विज्ञापनों का इंतज़ाम शहर के पुराने मिल-मालिक सेठ खन्ना का परपोता करता है, जो अब एक बहुराष्ट्रीय एग्री-बिजनेस और क्विक-कॉमर्स कॉन्ग्लोमरेट का मुख्य कार्यकारी अधिकारी है. सेठ खन्ना का यह परपोता जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों, कॉरपोरेट कीटनाशकों और ’10-मिनट ग्रॉसरी सप्लाई’ का एकाधिकार रखता है.
राजनीतिक सत्ता, बौद्धिक आवरण और कॉरपोरेट पूंजी का यह ऐसा नया त्रिकोण है, जहाँ राय साहब का सांसद परपोता संसद में किसान-विरोधी नीतियाँ पास करवाता है, प्रोफ़ेसर मेहता का परपोता उन नीतियों को ‘आधुनिक सुधार’ बताकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेचता है, और सेठ खन्ना का कॉरपोरेट परपोता उस आवरण के पीछे पूरे देहात को अपनी जेब में डाले घूमता है.
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जब होरी जैसे किसान अपनी ज़मीन बचाने या न्यूनतम समर्थन मूल्य का कानूनी अधिकार माँगने के लिए ज़िला मुख्यालय की ओर मार्च करने का प्रयास करते हैं, तो राज्य की पूरी दमनकारी मशीनरी सक्रिय हो जाती है. सड़क पर कीलें ठोक दी जाती हैं, वॉटर कैनन चलाए जाते हैं और इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी जाती हैं. और उसी शाम, पंडित ओंकारनाथ का परपोता, जो अब एक बड़े राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल का मुख्य प्राइम-टाइम एंकर और डिजिटल मीडिया नेटवर्क का मालिक है, टी.वी. स्टूडियो की लाल-नीली बत्तियों के बीच चिल्ला रहा होता है. वह अब ‘फ़्लैश’ जैसा छोटा अख़बार नहीं चलाता, वह शाम आठ बजे स्क्रीन पर मुक्के पटककर, छाती पीटकर देश की जनता को बताता है कि अपनी फसल का वाजिब दाम माँगने वाले ये किसान वास्तव में ‘विदेशी साजिश के मोहरे’, ‘टूलकिट गैंग’ और ‘देशविरोधी अराजक तत्व’ हैं. वह राय साहब के सांसद परपोते की राजनीतिक उपलब्धियों का महिमा मंडन करता है और सेठ खन्ना के परपोते की कंपनियों के विज्ञापनों से अपने चैनल की टीआरपी और राजस्व बढ़ाता है.
राजनीति की इस बिसात पर जाति का पुराना समीकरण भी एक नए और अधिक घातक रूप में ढल गया है. पंडित मातादीन का परपोता, ‘पंडित मयंक शर्मा’ गाँव में किसी सीधे संघर्ष से बचता है. वह सत्तारूढ़ दल की क्षेत्रीय ‘आईटी सेल’ का प्रमुख है और यूट्यूब पर ‘सनातन क्रान्ति’ नाम का एक डिजिटल पोर्टल और चैनल चलाता है, उसके चैनल पर 10 लाख सब्सक्राइबर हैं. जब भी कृषि संकट, बेरोज़गारी या ज़मीन के अधिग्रहण को लेकर किसानों और मज़दूरों में एकजुटता बनने लगती है, मयंक अपने वॉट्सऐप ग्रुप के ज़रिये एक नया सांस्कृतिक या जातिगत विवाद खड़ा कर देता है. वह अत्यंत सूक्ष्मता से जातियों के भीतर उप-जातियों की प्रतिस्पर्धी महत्वाकांक्षाओं को हवा देता है.
मयंक ने सिलिया के परपोते और उसके बेरोज़गार दोस्तों को 100 रुपये रोज़, एक टाइम का समोसा-चाय और 2-जीबी रोज़ाना वाले डेटा पैक के एवज में अपना ‘डिजिटल सिपाही’ और स्थानीय ‘गौ-रक्षक दल’ का लठैत बना रखा है. सिलिया के परपोते और उसके दोस्तों की सेकंड-हैंड साइलेंसर-कटी मोटरसाइकिलों के पीछे, नंबर प्लेटों पर और उनके वॉट्सऐप डीपी पर ‘हिंदू’, ‘कट्टर हिंदू’ और ‘गौ-रक्षक’ के जलते हुए अक्षरों वाले बड़े-बड़े स्टीकर चस्पां रहते हैं. मयंक ने उन्हें ‘गौ-रक्षा सेल’ का ‘ज़िला अध्यक्ष’ और ‘सोशल मीडिया प्रभारी’ जैसे कागज़ी पद बाँटकर उनकी कुंठित युवा महत्वाकांक्षा को संतुष्ट कर दिया है.
सिलिया का परपोता, जिसके पूर्वजों के मुँह में कभी धर्म के ठेकेदारों ने छुआछूत और पवित्रता की आड़ में हड्डी ठूँस दी थी, आज मयंक के इशारे पर और अपने इन्हीं ‘कट्टर हिंदू’ दोस्तों के साथ मिलकर अपनी उसी ऐतिहासिक पीड़ा को भूलकर अपने ही पड़ोसी पिछड़ी जातियों के किसानों के खिलाफ सोशल मीडिया पर ज़हर उगलता है और सड़कों पर हुड़दंग मचाता है. उसे लगता है कि गले में भगवा और हाथ में लाठी लेकर वह सत्ता के करीब पहुँच गया है. बदले में मयंक का सांसद आका चुनाव से ठीक पहले सिलिया के परपोते की बिरादरी के नाम पर एक ‘सांस्कृतिक कल्याण बोर्ड’ के गठन की घोषणा कर देता है और चौराहे पर उनके एक पूर्वज की आदमकद कांस्य मूर्ति स्थापित करवा देता है.
सिलिया का परपोता उस आदमकद मूर्ति पर ढोल-नगाड़ों के बीच फूल चढ़ाकर और ज़ोर-ज़ोर से जयकारे लगाकर गदगद हो जाता है, जबकि उसकी अपनी ज़मीन, मुफ़्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और पक्के रोज़गार का हक़ उसी भव्य मूर्ति की छाँव में बिना कोई शोर किए चुपचाप बलि चढ़ जाता है.
पुराने ज़माने में राय साहब का कारिंदा नोखेराम गाँव वालों से गाली-गलौज करके बेगार करवाता था. आज नोखेराम का परपोता गाँव का ‘पंचायत सचिव’ और ‘डिजिटल गेटकीपर’ है. वह स्थानीय ‘प्रधान-पति’ और भू-माफिया के साथ मिलकर एक समानांतर सत्ता चलाता है. वह हाथ में बायोमेट्रिक टैबलेट लिए घूमता है. प्रधानमंत्री आवास योजना की किश्त जारी करनी हो, शौचालय का फंड पास कराना हो या बाढ़-सूखे का सरकारी मुआवजा दर्ज करना हो, लोगों को नोखेराम के पास ही जाना होता है. अब ‘नज़राना’ लेने का दौर ख़त्म हो गया है, हाँ, अब हिसाब-किताब हाथ में नकदी के रूप में हो जाता है. कुछ साल पहले तक वह मनरेगा में काम करने वाले मज़दूरों के बैंक खाते मैनेज करता था. जैसे ही मनरेगा का पैसा मज़दूर के खाते में आता, वह लोगों से कहता कि यह सरकारी पैसा है और तुम्हें एक दिन की दिहाड़ी दी जाएगी, मेरे साथ मेरी मोटर साइकिल पर बैठकर चलो और यह पैसा निकालकर मुझे दे दो. मज़दूर लोग उसकी आज्ञा का किसी आकाशवाणी जैसा पालन करते थे. जो उसकी आज्ञा नहीं मानता, उसका नाम बीपीएल की सूची से रातों-रात हटा दिया जाता है.
अंगूठे की छाप न मिलने के कारण जब होरी हताश होकर जन सेवा केंद्र से बाहर निकलता है, तो उसका सामना गाँव के मोड़ पर चाय की दुकान के पास बैठे भोला अहीर के परपोते से होता है. भोला का परपोता अब कोई दूध की बाल्टियाँ लेकर शहर जाने वाला पारंपरिक ग्वाला नहीं है. कॉरपोरेट डेयरी कंपनियों के ऑटोमेटेड फैट-मापने वाले यंत्रों और दूध संग्रह केंद्रों ने दूध का भाव इतना गिरा दिया कि उसका पारिवारिक धंधा पूरी तरह चौपट हो गया. ऊपर से मवेशी-बाज़ारों पर लगे कड़े कानूनी प्रतिबंधों और गिरोहबंद निगरानी के कारण बूढ़े या अनुत्पादक पशुओं को बेचने के सारे रास्ते बंद हो गए हैं. भोला का परपोता अपनी बची-खुची नस्ली गायों को सड़क पर आवारा छोड़ चुका है और अब एक प्राइवेट सिक्योरिटी कंपनी की नीली वर्दी पहने राय साहब के परपोते वाले नए एक्सप्रेस-वे के टोल-प्लाज़ा पर लाठी लेकर मुस्तैद रहता है.
विडंबना यह है कि जिस ‘गोदान’ की इच्छा में होरी के पूर्वज जीवन भर घिसते रहे, वही गाय आज होरी के तीन बीघे खेत के विनाश का मुख्य कारण बन गई है. पूस की हाड़ कंपाने वाली रातों में होरी अपनी पकी फसल को जाड़े की मार से बचाने के लिए नहीं जागता है. वह गाँव भर की आवारा गायों और सांडों के झुंड से अपनी खेती बचाने के लिए हाथ में लाठी लिए, कंटीले तारों की बाड़ के पीछे थरथराता रहता है. यदि वह अपनी फसल चर रही किसी गाय को भगाने के लिए डंडा उठा लेता है, तो गाँव के चौराहे पर मयंक शर्मा अपने समर्थकों के साथ उस पर ‘धर्म-द्रोही’ होने का ठप्पा लगाने की धमकी देने लगता है.
4.
भोला की बेटी झूनिया, जो कभी समाज के नैतिक ढोंग को चुनौती देकर गोबर के साथ भाग गई थी, उसकी परपोती, जिसका नाम रबीना है, ने नज़दीकी कसबाई इंटर कॉलेज से बी.ए. की पढ़ाई पूरी की थी. उसकी शादी हो चुकी है और दो बच्चे हैं. उसका पति पड़ोस के जापानी ज़ोन में कोई फ़ैक्टरी है, वहाँ काम करता है और उसको 15 हज़ार महीने की तनख़्वाह मिलती है. रबीना गाँव में सरकारी ‘महिला स्वयं सहायता समूह‘ की सदस्य भी है. कागज़ों और सरकारी विज्ञापनों में यह स्वयं सहायता समूह ‘महिला वित्तीय सशक्तिकरण’ की मिसाल बनाकर पेश किया जाता है, लेकिन कड़वी वास्तविकता यह है कि रबीना ने अपनी बेटी की बीमारी और एक साहूकार का दो रुपया सैकड़ा का कर्ज़ चुकाने के लिए 4 अलग-अलग माइक्रो-फाइनेंस ऐप और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों से डिजिटल कर्ज़ ले रखा है. एक ऐप का कर्ज़ चुकाने और उसकी दैनिक किश्त भरने के लिए वह दूसरे ऐप से नए ब्याज पर लोन उठाती है.
पुराने ज़माने में मंगरू साह या दातादीन पचास रुपये के कर्ज़ पर ईख नीलाम करवा लेते थे, लेकिन उनके दरवाज़े पर जाकर पैर पकड़े जा सकते थे, रोया-गिड़गिड़ाया जा सकता था. आज जब रबीना, झूनिया या होरी की किश्त एक दिन के लिए चूक जाती है, तो इन फिनटेक कंपनियों का स्वचालित एल्गोरिदम उनके स्मार्टफोन की पूरी कांटेक्ट-लिस्ट, फोटो गैलरी और लोकेशन को अपने कब्ज़े में ले लेता है. अगले ही मिनट गाँव के हर वॉट्सऐप ग्रुप पर एक ऑटोमेटेड मैसेज चमकने लगता है, ‘होरी महतो और उसका परिवार बकायेदार और धोखेबाज़ है’. बेइज़्ज़ती करने के लिए अब किसी साहूकार के कारिंदे को गाँव नहीं आना पड़ता, सामाजिक बेइज़्ज़ती सीधे डिजिटल नेटवर्क पर एक साथ ब्रॉडकास्ट कर दी जाती है.
होरी का अपना बेटा गोबर गाँव के सामंती दमन से तंग आकर कभी शहर की मिलों में मज़दूरी करने भागा था. आज गोबर का बेटा, जिसे शहर में सब ‘गोबी’ कहते हैं, नोएडा के एक डार्क स्टोर के बाहर लाल-पीली टी-शर्ट पहने, सिर पर हेलमेट लगाए अपनी सेकेंड-हैंड इलेक्ट्रिक बाइक पर बैठा रहता है. वह सेठ खन्ना के परपोते वाली कंपनी के ‘दस-मिनट डिलीवरी ऐप’ का ‘फ़ास्ट-डिलीवरी पार्टनर’ है. आधुनिक पूंजीवाद ने कितनी सफ़ाई से ‘मज़दूर’ और ‘दास’ जैसे शब्दों को मिटाकर उसे ‘उद्यमी’ और ‘पार्टनर’ बना दिया है! उसके पास न न्यूनतम वेतन की गारंटी है, न स्वास्थ्य बीमा, न दुर्घटना मुआवजा, न काम के निश्चित घंटे, और न ही अपनी बात कहने के लिए कोई यूनियन. उसका मालिक कोई इंसान या सेठ नहीं, बल्कि उसके फोन में बैठा एक ‘एल्गोरिदम’ है.
यदि वह नौ मिनट पचपन सेकंड में किसी गेटेड सोसाइटी की बहुमंजिला इमारत की पच्चीसवीं मंजिल पर प्रोफ़ेसर मेहता के पोते के लिए आर्गेनिक अवोकाडो और सलाद का पैकेट नहीं पहुँचाता, तो ऐप उसकी रेटिंग गिरा देता है और उसकी दिहाड़ी से जुर्माना काट लेता है. सड़क पर दौड़ते हुए जब कभी उसकी बाइक किसी गड्ढे में गिर जाए या वह किसी अन्य वजह से देर हो जाए, तो उसकी स्क्रीन पर एक लाल अलर्ट चमकता है, ‘ऑर्डर में देरी हो रही है, कृपया गति बढ़ाएँ.’
5.
मौसम का चक्र भी अब जलवायु परिवर्तन के नए दौर में होरी का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है. मार्च के शुरुआती हफ़्तों में जब गेहूँ की बालियों में दाना भर रहा होता है, तब अचानक बेमौसम की भीषण गर्मी पड़ती है और दाना सूखकर आधा रह जाता है. जब कटाई का समय आता है, तो मूसलाधार बारिश और ओलावृष्टि बची-खुची उम्मीदों पर पानी फेर देती है. जब होरी अपनी भीगी हुई फसल को लेकर सरकारी मंडी पहुँचता है, तो वहाँ खड़ा सेठ खन्ना की कंपनी का एजेंट अपनी नमी मापने वाली डिजिटल मशीन फसल में घुसेड़ता है. मशीन की स्क्रीन पर रेड लाइट जलती है, ‘गुणवत्ता मानक से कम’.
सरकारी खरीद का दरवाज़ा बंद हो जाता है और बाहर खड़ा व्यापारी होरी से कहता है कि सरकारी दर से चालीस प्रतिशत कम पर बेचना हो तो बोलो, वरना इसे यहीं छोड़कर चले जाओ. होरी को खाद का पुराना कर्ज़ चुकाना है, बिजली का ‘स्मार्ट-मीटर’ रिचार्ज कराना है और पोती की ऑनलाइन कक्षाओं के लिए मोबाइल का डेटा-पैक भरवाना है. वह अपनी मेहनत को उसी कौड़ी के भाव में नीलाम कर देता है.
पूस की रात अपनी चरम बर्फीली ठंड पर पहुँच चुकी है. होरी के कच्चे घर के कोने में उसकी जर्जर काया खाँस रही है. उसके पास जाने के लिए कोई डॉक्टर नहीं है, क्योंकि गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर हमेशा ताला लटका रहता है. शहर में कुकुरमुत्ते की तरह प्राइवेट हॉस्पिटल हैं जहाँ जाने की हैसियत होरी की नहीं है. सरकार ने उनके आयुष्मान कार्ड बनाकर दिए थे, मगर वे लगभग प्राइवेट हॉस्पिटल वाले स्वीकार नहीं करते हैं. उसकी पत्नी धनिया, अस्सी बरस की झुर्रियों से भरी काया वाली धनिया, होरी के माथे पर फटे कपड़े की पट्टी भिगोकर रखती है.
अचानक होरी के पसीने से चिपचिपे फोन की नीली स्क्रीन जगमगाती है. बैंक का एक ऑटो-जनरेटेड मैसेज आया है,
‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की दो हज़ार रुपये की किश्त आपके खाते में जमा की गई है.’
अगले ही क्षण एक दूसरा मैसेज चमकता है,
‘फ़िनटेक माइक्रो-फाइनेंस कंपनी द्वारा बकाये ब्याज के मद में दो हज़ार रुपये की स्वतः कटौती. शेष उपलब्ध राशि: शून्य.’
होरी की पथराई आँखें उस नीली स्क्रीन पर लिखे शब्द ‘शून्य’ पर जाकर टिक जाती हैं. उसने अस्सी सालों तक दिन-रात पसीना बहाया, हल चलाया, मिट्टी फाड़ी, लेकिन उसकी ज़िंदगी का अंतिम लेखा-जोखा हमेशा की तरह केवल ‘शून्य’ ही निकला. गहन सन्नाटे में होरी का दम उखड़ने लगता है. उसके हाथ-पाँव ठंडे पड़ने लगते हैं. धनिया चीखती है और बदहवास होकर गाँव के किसी झोला छाप डॉक्टर को बुलाने के लिए बाहर भागती है.
होरी के मुँह से हवा का अंतिम घूँट निकलता है. उसकी मृत आँखों की पुतलियों में उसके फोन की स्क्रीन का नीला प्रकाश अब भी परावर्तित हो रहा है, जिस पर प्रोफ़ेसर मेहता के परपोते के डिजिटल पोर्टल से एक नया नोटिफिकेशन बज रहा है, ‘भारत में ग्रामीण निर्धनता, चुनावी राजनीति और सबअल्टर्न प्रतिरोध: एक विश्लेषण.’
होरी के पास अंतिम समय में गोदान करने के लिए न कोई गाय है, न ही हाथ में रखने के लिए बीस आने पैसे. उसके काँपते, बेजान अंगूठे पर गाँव की सूखी मिट्टी लगी है, वही मिट्टी जिसकी रेखाओं को राज्य का आधुनिक डिजिटल तंत्र पहचानने से साफ़ इनकार कर चुका है.
सेमरी गाँव की रात सो रही है. राय साहब के सांसद परपोते का फार्महाउस जगमगा रहा है, सेठ खन्ना के ट्रक गाँव का अनाज लादकर बड़े शहरों की ओर बढ़ रहे हैं, प्रोफ़ेसर मेहता का परपोता न्यू यॉर्क की फ़्लाइट पकड़ने के लिए इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की ओर निकल रहा है, उसका दो दिन बाद विस्कॉन्सिन में एक सेमिनार है जिसका विषय है ‘समकालीन भारत में प्रेमचंद की प्रासंगिकता’, और होरी महतो की जीवन-लीला राज्य के विशाल डेटाबेस में केवल एक ‘निष्क्रिय बायोमेट्रिक आईडी’ बनकर विलीन हो जाती है.
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विन्द्र कुमार ओरेगन विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के आधुनिक दक्षिण एशियाई इतिहास पर शोध कार्य कर रहे हैं.


आँखें खोल देने वाला लेख.
सही नब्ज़ पर उंगली रखी गई है.
लेखक को बहुत -बहुत बधाई. 💐
बहुत अच्छा लिखा है रवि ने। लंबे लेख कम पढ़ता हूँ लेकिन यह पूरा पढ़ गया एक साँस में। बढिया रवि भाई।
इतना महत्वपूर्ण और प्रासंगिक लिखा है ,एक एक शब्द ,एक एक वाक्य । वर्तमान का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख देने वाला लेख । बधाई रवि
उफ्फ्फ! ये दुख खतम क्यों नहीं होता। अनवरत त्रासद स्थितियों के सघन चित्र। बहुत सामयिक और गहरी अन्तर्दृष्टि से लिखा गया
स्मरण: प्रेमचंद
प्रेमचंद मेरे लिए केवल हिंदी कथा-साहित्य के शिखर लेखक नहीं हैं; वे भारतीय साहित्य की उस नैतिक चेतना के प्रतिनिधि हैं, जिसने लेखन को मनुष्य के पक्ष में खड़े होने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी के रूप में परिभाषित किया। उनसे जो सीखा, वह किसी शिल्पगत अनुकरण या कथाविधान की नकल का परिणाम नहीं है; वह एक ऐसी दृष्टि का अर्जन है जो साहित्य को जीवन से पृथक नहीं मानती। यदि मेरे लेखन में मनुष्य, समाज, सत्ता, अन्याय, प्रतिरोध और नैतिक प्रश्न बार-बार लौटते हैं, तो उसके पीछे प्रेमचंद की वही दीर्घजीवी परंपरा काम करती है जिसने साहित्य को केवल रसास्वादन का विषय न मानकर सामाजिक विवेक का माध्यम बनाया।
प्रेमचंद ने सिखाया कि साहित्य का पहला सरोकार मनुष्य है—वह मनुष्य जो इतिहास के विजेताओं की नहीं, पराजितों की पंक्ति में खड़ा दिखाई देता है। किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, वंचित, विस्थापित और संघर्षरत सामान्य जन—ये केवल कथानक के पात्र नहीं, बल्कि समाज की नैतिक संरचना की कसौटी हैं। किसी भी सभ्यता का वास्तविक मूल्यांकन उसके महलों से नहीं, उसके हाशियों से किया जाना चाहिए। यह बोध मेरे लेखन की मूल प्रेरणाओं में रहा है।
उनसे यह भी सीखा कि यथार्थ केवल दृश्य संसार नहीं होता। प्रत्येक घटना के पीछे एक संरचना होती है; प्रत्येक अन्याय के पीछे कोई न कोई सत्ता-संबंध सक्रिय होता है। साहित्य यदि केवल घटनाओं का विवरण बनकर रह जाए तो वह पत्रकारिता का विस्तार भर होगा; साहित्य की भूमिका उन अदृश्य तंतुओं को उद्घाटित करना है जिनसे शोषण, असमानता और वर्चस्व की संरचनाएँ निर्मित होती हैं। इसलिए लेखन का अर्थ केवल कहना नहीं, देखना भी है—और उससे भी अधिक, दूसरों को देखने की दृष्टि देना है।
प्रेमचंद का सबसे बड़ा पाठ नैतिक साहस का पाठ है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि लेखक की तटस्थता प्रायः शक्तिशाली के पक्ष में चली जाती है। इसलिए साहित्यिक निष्पक्षता का अर्थ संवेदनहीनता नहीं, बल्कि न्याय के प्रति प्रतिबद्ध विवेक है। यह प्रतिबद्धता किसी राजनीतिक निष्ठा से पहले मनुष्य के प्रति उत्तरदायित्व है। मेरे लेखन में यदि अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध दिखाई देता है, तो उसका आधार वैचारिक आग्रह से अधिक यही नैतिक आग्रह है।
भाषा के स्तर पर प्रेमचंद ने मुझे लोकतांत्रिकता का अर्थ समझाया। भाषा का वैभव उसकी दुर्बोधता में नहीं, उसकी संप्रेषणीयता में निहित है। सरलता कभी भी सरलीकरण नहीं होती। जो भाषा अपने समय के अधिकाधिक लोगों तक पहुँच सके, जो विचार को स्पष्ट और संवेदना को जीवित रखे, वही साहित्य की वास्तविक भाषा है। यह समझ मेरे लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रही है, क्योंकि कविता और आलोचना दोनों में मैं भाषा को संवाद का माध्यम मानता हूँ, प्रदर्शन का नहीं।
प्रेमचंद से यह भी सीखा कि साहित्य का उद्देश्य तत्काल समाधान प्रस्तुत करना नहीं है। वह प्रश्नों को इस प्रकार उपस्थित करता है कि पाठक अपने भीतर एक नैतिक बेचैनी अनुभव करे। अच्छी रचना उत्तरों से अधिक प्रश्न छोड़ती है; वह पाठक के विवेक को सक्रिय करती है। यही कारण है कि प्रेमचंद आज भी पढ़े जाते हैं; वे अपने समय का दस्तावेज़ भर नहीं, प्रत्येक समय की नैतिक परीक्षा हैं।
एक लेखक के रूप में मेरे लिए यह शिक्षा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं रही कि साहित्य करुणा को भावुकता में रूपांतरित नहीं करता। करुणा का अर्थ दया नहीं, बल्कि दूसरे के दुःख को अपनी नैतिक चिंता में बदल लेना है। प्रेमचंद के यहाँ करुणा निष्क्रिय नहीं है; वह मनुष्य की गरिमा की पुनर्स्थापना का आग्रह बन जाती है। यही आग्रह मेरे लेखन में सामाजिक असमानताओं, सांप्रदायिक विभाजनों, युद्ध, बाज़ारवाद और सांस्कृतिक वर्चस्व की आलोचना के रूप में व्यक्त होता है।
समकालीन समय में जब सूचना का प्रवाह तीव्र है, किंतु संवेदना का क्षरण भी उतना ही तीव्र है, तब प्रेमचंद का स्मरण केवल एक साहित्यिक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि बौद्धिक अनुशासन का विषय है। उन्होंने सिखाया कि लेखक को अपने समय की लोकप्रियताओं से अधिक उसके अंतर्विरोधों पर दृष्टि रखनी चाहिए। साहित्य का मूल्य उसकी तात्कालिक प्रशंसा से नहीं, उसके दीर्घकालिक नैतिक प्रभाव से निर्धारित होता है।
मेरे लेखन में कविता हो, आलोचना हो या सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी—एक प्रश्न निरंतर सक्रिय रहता है कि क्या यह रचना मनुष्य की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा के पक्ष में कुछ जोड़ती है? यदि नहीं, तो उसका समूचा भाषिक कौशल भी अधूरा है। यह प्रश्न मैंने प्रेमचंद से ही सीखा है। उन्होंने साहित्य को जीवन के नैतिक विस्तार के रूप में देखा; उसी कारण उनकी रचनाएँ समय की सीमाओं को पार कर सकीं।
प्रेमचंद की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने साहित्य को मनुष्य के पक्ष में खड़े होने की सार्वजनिक जिम्मेदारी प्रदान की। उनसे मिली सीख किसी शैलीगत अनुकरण की नहीं, बल्कि एक सतत आत्मपरीक्षण की सीख है। हर नई रचना के पहले और बाद में भीतर से यही आवाज़ उठती है—क्या यह लेखन अपने समय के सत्य के प्रति ईमानदार है? क्या इसमें मनुष्य की गरिमा के लिए पर्याप्त स्थान है? क्या इसमें भाषा केवल अलंकरण नहीं, बल्कि नैतिक हस्तक्षेप बन सकी है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयास मेरे लेखन में दिखाई देता है, तो यह मेरे लिए प्रेमचंद से प्राप्त सबसे बड़ी साहित्यिक विरासत है। प्रेमचंद मेरे लिए अतीत के महापुरुष नहीं, वर्तमान की एक जीवित कसौटी हैं—ऐसी कसौटी, जिस पर प्रत्येक रचना को बार-बार परखा जाना चाहिए। साहित्य की वास्तविक प्रासंगिकता इसी परीक्षा में निहित है।
सामाजिक परतों को खोलता बहुत ही शानदार लेख।
यह सुंदर आलेख, रचनाशील सर्जनात्मकता (क्रिएटिविटी) से प्रसूत है। इसे एक कथा-रचना और समकालीनता में विन्यस्त पुनर्कथा की तरह ही पढ़ा जा सकता है। इस नवाचार के लिए बधाई।
न इसे कहानी कहा जा सकता है, और न ही इसे औपचारिक लेख या निबंध की श्रेणी में रखा जा सकता है। स्वीकृत संज्ञाओं और रूढ़ वर्गीकरण के आर-पार आवाजाही करती यह विवेचना शायद एक निपट सृजनात्मक संवेग है। शायद इसे इसी तरह— कथा और यथार्थ की मुठभेड़ के रूप में ही दर्ज किया जा सकता था।
रविन्द्र कुमार की ‘आज क्या कर रही हैं गोदान की संतानें’ पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि लेखक प्रेमचंद के गोदान का दूसरा भाग नहीं लिख रहे, बल्कि उसके भीतर छिपे प्रश्नों को नब्बे वर्ष आगे लाकर हमारे सामने खड़ा कर रहे हैं। यह रचना स्मृति का विस्तार नहीं, समय का अभियोग है।
इस रचना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने होरी को संग्रहालय का पात्र नहीं रहने दिया। वह आज भी जीवित है—लेकिन अब उसके हाथ में हल नहीं, बायोमेट्रिक मशीन के सामने असफल होता अंगूठा है; उसके सामने जमींदार नहीं, एल्गोरिद्म है; साहूकार नहीं, फिनटेक ऐप है; और बेगार नहीं, गिग इकॉनमी का ‘पार्टनर’ मॉडल है। यह रूपांतरण अत्यंत प्रभावशाली है।
रचना का सबसे मार्मिक प्रतीक है—“अंगूठा पहचानने से इंकार करती मशीन।” प्रेमचंद के यहाँ किसान की पहचान उसका श्रम था; यहाँ वही श्रम उसकी पहचान मिटा देता है। यह दृश्य पूरे लेख का सबसे यादगार बिंब बन जाता है।
लेखक की दूसरी बड़ी शक्ति उसकी संरचनात्मक कल्पना है। राय साहब का वंश सत्ता में, खन्ना का वंश कॉरपोरेट में, मेहता का वंश अकादमिक संस्थानों में, ओंकारनाथ का वंश मीडिया में और मातादीन का वंश डिजिटल प्रचारतंत्र में—यह केवल पात्रों का विस्तार नहीं, आधुनिक सत्ता-संरचना का रूपक है। इस दृष्टि से यह लेख साहित्य और समाजशास्त्र के बीच एक नई संवाद-भूमि निर्मित करता है।
फिर भी, यहीं से कुछ गंभीर प्रश्न भी उठते हैं।
रचना का सबसे बड़ा गुण—उसकी वैचारिक तीक्ष्णता—कई स्थानों पर उसकी सीमा भी बन जाती है। लगभग हर संस्था—राज्य, मीडिया, विश्वविद्यालय, कॉरपोरेट, डिजिटल तकनीक, एनजीओ—एक ही दिशा में खड़ी दिखाई देती है। परिणामतः कथा का बहुस्तरीय यथार्थ कहीं-कहीं घोषणापत्र में बदलने लगता है। प्रेमचंद का संसार इसलिए महान था कि वहाँ शोषक भी मनुष्य थे और पीड़ित भी अपनी कमजोरियों से मुक्त नहीं थे। यहाँ पात्रों का नैतिक विभाजन अपेक्षाकृत कठोर है।
दूसरा प्रश्न तथ्य और कल्पना के संतुलन का है। लेख में समकालीन भारतीय राजनीति, विश्वविद्यालयों, मीडिया और वैचारिक समूहों के बारे में अनेक संकेत हैं। साहित्य में संकेत वैध हैं, लेकिन जब वे अत्यधिक प्रत्यक्ष हो जाते हैं, तो कथा का सौंदर्य कम होकर राजनीतिक टिप्पणी अधिक प्रतीत होने लगता है। कुछ पाठकों को यह साहस लगेगा, कुछ को वैचारिक एकरेखीयता।
तीसरी बात यह कि लेखक ने तकनीक को लगभग हमेशा दमनकारी शक्ति के रूप में चित्रित किया है। जबकि वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। यही डिजिटल तकनीक अनेक किसानों तक सरकारी सहायता भी पहुँचाती है, शिक्षा और स्वास्थ्य की नई संभावनाएँ भी खोलती है। यदि इस द्वंद्व का थोड़ा-सा भी समावेश होता, तो कथा का यथार्थ और अधिक विश्वसनीय बन सकता था।
इसके बावजूद, लेख का अंतिम दृश्य लंबे समय तक स्मृति में बना रहता है—मृत होरी की आँखों में मोबाइल स्क्रीन की नीली रोशनी और उस पर ग्रामीण निर्धनता पर प्रकाशित एक अकादमिक लेख का नोटिफिकेशन। यह दृश्य हमारी पूरी बौद्धिक संस्कृति पर एक गहरा व्यंग्य है। शोध जारी है, सेमिनार जारी हैं, विमर्श जारी है—लेकिन होरी मर चुका है।
यह रचना प्रेमचंद की भाषा में नहीं लिखी गई है; यह हमारे समय की भाषा में प्रेमचंद की बेचैनी को पुनर्जीवित करती है। इसलिए इसकी तुलना गोदान से नहीं, गोदान के साथ एक समकालीन संवाद के रूप में की जानी चाहिए।
अंततः यही कहा जा सकता है कि रविन्द्र कुमार ने प्रेमचंद को दोहराया नहीं, उनसे बहस की है। यह बहस पूरी तरह निष्पक्ष हो या न हो, परंतु निश्चय ही विचारोत्तेजक है। यह लेख पाठक को सहमत या असहमत होने के लिए विवश करता है—और यही किसी गंभीर साहित्यिक हस्तक्षेप की पहली पहचान है।
समग्र मूल्यांकन: यदि गोदान भारतीय किसान-जीवन का नैतिक महाकाव्य है, तो ‘आज क्या कर रही हैं गोदान की संतानें’ डिजिटल युग के ग्रामीण भारत का राजनीतिक उपसंहार है—तीखा, बेचैन करने वाला, वैचारिक रूप से साहसी और बहस को आमंत्रित करने वाला।
बाप रे! क्या ग़ज़ब का तसव्वुर! दो समयों के बीच जैसे तार जोड़ दिया हो! लेखक को सलाम!
भारत सरकार द्वारा आधुनिक झूरी की पहचान को नकारना और modernization के नाम पर उसे कर्ज के जाल में फसाने के तोर तरीकों को भली भाती स्पष्ट किया गया है।