| मानववाद क्या है, क्या नहीं है? आलोक टंडन |
मानववाद एक दार्शनिक विचार है किन्तु आज यह कई तरह की आलोचनाओं का शिकार है. इसलिये उस पर विचार करना आवश्यक है. इससे पहले कि आलोचनाओं पर हम विचार करें यह समझना भी जरूरी है कि आखिर मानववाद का तात्पर्य क्या है?
मानववाद और मानवतावाद में क्या अंतर है?
मानववाद के मुख्य तत्व क्या हैं?
मानववाद की तत्वमीमांसा, ज्ञानमीमांसा और नीतिमीमांसा का स्वरूप क्या है?
धर्म और मानववाद का क्या संबंध है?
क्या सभी निरीश्वरवादी दृष्टिकोणों जैसे- सेकुलर मानववाद, अस्तित्ववादी मानववाद, मार्क्सवादी मानववाद, समाजवादी मानववाद, उदारवादी मानववाद आदि को मानववाद की एक ही श्रेणी में रखा जा सकता है?
मानववादी राजनीतिक दर्शन का स्वरूप क्या होगा? जीवन को अर्थ प्रदान करने में मानववाद की भूमिका क्या है? मानववाद की आलोचना से भी कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आये हैं. क्या मानववाद एक यूरोसेन्ट्रिक अवधारणा है? क्या मानववाद में दर्शन की अवधारणा तर्कनिष्ठता को अधिक महत्व देने और संवेदना तथा संबंधों को कम करके आंकने पर टिकी है?
क्या मानववाद व्यक्तिगत एजेन्सी को अत्यधिक महत्व नहीं देता और इसी कारण संरचनात्मक तत्वों का महत्व कम करके आंकता है? क्या इसका उपयोग औपनिवेशिक ताकतों द्वारा दमन और शोषण के लिये नहीं किया गया है?
क्या पर्यावरण संकट और अन्य जीवों के प्रति निर्दयता के व्यवहार के पीछे मानववाद की एकतरफा मानव-केन्द्रित विचारधारा नहीं है?
क्या मानववाद के विचार को अपनाने से प्रकृति से हमारा संबंध एकतरफा दोहन का नहीं हो गया है जो वर्तमान वैश्विक संकट के लिये उत्तरदायी है?
उपरोक्त सारे सवालों का समुचित उत्तर दे पाना इस छोटे से लेख में सम्भव नहीं है किंतु फिर भी वैचारिक संवाद की खातिर यह जोखिम उठाना जरूरी है. इस वास्ते इस लेख में तीन भाग हैं. पहले में यह समझने का प्रयास किया गया है कि मानववाद से क्या तात्पर्य है, दूसरे में उन आलोचनाओं पर विचार किया गया है जो मानववाद को प्रश्नांकित करती हैं और तीसरे भाग में मानववाद का मूल्यांकन और वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता पर विचार किया गया है.
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मानववादी दृष्टिकोण लगभग (2500 वर्ष) उतना ही पुराना है जितनी मानव सभ्यता. इसके तत्व भारत, चीन, यूरोप के इतिहास में पाये जाते हैं. किन्तु हमारा उद्देश्य यहाँ शब्द के इतिहास का वर्णन नहीं है क्योंकि मानववाद एक आधुनिक वैचारिक संरचना भी है जिसे समझने के लिए इतिहास का समर्थन जरूरी नहीं है. बस इतना समझना काफी होगा कि मानववादी दृष्टिकोण, धर्मों से भिन्न है, और कई अर्थों में उनका विरोधी भी है. इसलिये विभिन्न धर्मों के बाद मानववादी विशेषण लगाने जैसे ईसाई मानववाद, इस्लामी मानववाद का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि ऐसा करने से धर्म की प्राथमिकता बनी रहती है, मानववाद की नहीं.
इसी तरह मानववाद और मानवतावाद के बीच अंतर को भी समझने की जरूरत है. यद्यपि दोनों ही मानव केन्द्रित दृष्टिकोण हैं किंतु मानववाद जहाँ ईश्वर के बजाय तर्क, विज्ञान और मानव क्षमताओं पर जोर देती है, वही मानवतावादी दृष्टिकोण नैतिक कर्म और परोपकार द्वारा मनुष्यों के दुख दूर करने का प्रयास करता है. मानववाद के केन्द्र में जहाँ तर्कसंगत दृष्टिकोण है वही मानवतावाद के लिये करूणा, सहानुभूति का केन्द्रीय महत्व है.
मानववाद जहाँ एक विश्वदृष्टि है वही मानवतावाद परोपकारी कार्य व्यवहार है. सामान्यता मानववादी ईश्वर में विश्वास नहीं करता वहीं एक ईश्वर में विश्वास रखने वाला भी मानवतावादी हो सकता है लेकिन उसे मानववादी कहना उचित नहीं है. यद्यपि मानववाद की तार्किक परिणति मानवतावाद ही है किन्तु यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक मानवतावादी का विश्वास मानववाद में हो. अतः हम सक सकते हैं कि मानववाद एक निश्चित विचार है जबकि मानवतावाद एक भावना है जो किसी भी विचार के साथ जोड़ी जा सकती है. मानववाद सिद्धान्त के केंद्र में मनुष्य है और वही हर चीज का मानक है. यह विश्वास है कि मनुष्य अपनी नियति का निर्माण स्वयं कर सकता है. यह किसी अतींद्रिय सत्ता और मृत्युपार जीवन में विश्वास नहीं करता. उसके अनुसार मनुष्य की नियति की परिणति यहीं धरती के जीवन में है.
मानववाद को समझने के लिये यद्यपि थोड़े विस्तार से चर्चा अपेक्षित है किंतु प्रारम्भ करने के लिये International Humanist and Ethical Union द्वारा दी गई निम्न परिभाषा को ले सकते हैं-
‘‘मानववाद एक लोकतांत्रिक और नैतिक जीवन का नजरिया है, जो इस बात पर जोर देता है कि दर्शन अपने जीवन को अर्थ और आकार देने का अधिकार और जिम्मेदारी रखता है. यह मानवीय क्षमताओं के द्वारा तर्क और मुक्त जिज्ञासा से मानवीय और अन्य प्राकृतिक मूल्यों से युक्त एक अधिक मानवीय समाज के निर्माण करने की बात करता है. यह ईश्वरवादी नहीं है, और यथार्थ के बारे में अलौकिक विचारों को नहीं मानता.’’1
मानववाद की प्रमुख स्थापनाएँ
चूंकि उपरोक्त परिभाषा मानववाद को समझने के लिये नाकाफी है, इसलिये मानववाद को समझने के लिये उसकी केन्द्रीय स्थापनाओं की चर्चा जरूरी है.
प्रकृतिवाद– ब्रह्मांड एक प्राकृतिक परिघटना है, किसी अलौकिक सत्ता से इसका कोई संबंध नहीं है. यह प्राकृतिक सिद्धान्तों के आधार पर कार्य करता है, जिन्हें वैज्ञानिक विधि द्वारा जाना, समझा जा सकता है.
वैज्ञानिक विधि– ज्ञान प्राप्ति के लिये मानववादी वैज्ञानिक विधि का उपयोग करता है जिसके अन्तर्गत परिकल्पना का निर्माण और प्रेक्षण, प्रयोग द्वारा उसका सत्यापन किया जाता है.
तर्क और संशय -किसी भी निर्णय पर पहुंचने के लिये मानववादी आलोचनात्मक तर्क का सहारा लेता है. वैज्ञानिक विधि द्वारा प्राप्त ज्ञान भी अंतिम सत्य नहीं माना जाता, नये तथ्यों की खोज के साथ इसमें परिवर्तन की गुन्जाइश बनी रहती है. नया ज्ञान, पुराने ज्ञान का स्थान ले लेता है.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और एजेन्सी – मानववाद दर्शन केन्द्रित दर्शन है. इसमें व्यक्ति की स्वायत्तता, गरिमा और आत्म-उत्कर्ष का विशेष महत्व है. व्यक्ति अपने निर्णयों के लिये स्वतंत्र और उत्तरदायी है.
दर्शन की अवधारणा और विकासवाद का सिद्धान्त -मानववादी दृष्टिकोण से दर्शन प्रकृति का अंग है, उससे अलग नहीं है. दर्शन करोड़ों वर्षों के विकास का परिणाम है. किन्तु दर्शन विषय और विषयी दोनों है. उसमें प्राकृतिक जैविक नियमों की सीमाओं के परे जाने की भी क्षमता है क्योंकि वह एक चेतनशील प्राणी है जो एक एजेन्ट की तरह अपना लक्ष्य निर्धारित करने की क्षमता भी रखता है. इसीलिये एक मानववादी की दृष्टि में –
“The core of our humanity is our reflexiveness, our ability and need to take ourselves as the objects of our own inquiry.”2
इस तरह दर्शन प्रकृति से उद्भूत और उसका मास्टर, दोनों बन जाता है.
मृत्यु, श्रेष्ठ जीवन और सुख की खोज– मानववादी दृष्टिकोण में मानव चेतना, शरीर का अविभाज्य अंग है. आत्मचेतना भी चेतना के समान ही हमारी जैविकता का ही प्रोडक्ट है. यह मानने का कोई कारण नहीं है कि मृत्यु के बाद आत्मा जैसा कोई स्वतंत्र तत्व बचा रह जाता है. शारीरिक मृत्यु के साथ ही सम्पूर्ण व्यक्तित्व का अंत हो जाता है. चूंकि कोई दिव्य योजना नहीं है इसलिये यह सोचना कि सब ठीक हो जायेगा, उचित नहीं जान पड़ता. साथ ही मानवीय स्थिति में दुखों की भरमार है और इस बात की कोई गारन्टी नहीं है कि दर्शन कभी एक पूर्ण समाज का निर्माण कर सकेगा क्योंकि दर्शन द्वारा दर्शन के प्रति अमानवीय व्यवहार की भी कोई सीमा नहीं है. उपरोक्त कटु सत्यों को स्वीकार करते हुये भी मानववाद दर्शन के भविष्य में सुख और श्रेष्ठ जीवन की सम्भावना देखता है.
एपिक्यूरस की तरह मानववाद भी मानव जीवन में सुख की खोज को अंगीकार करता है. शरीर के सुखों-भोजन, वस्त्र, काम, मनोरंजन आदि से उसे बैर नहीं है और न उनका विश्वास उनके दमन में है. किन्तु अधिक उत्तम प्रकार के सुखों-जो सृजनशीलता, मानवीय संबंधों, बौद्धिक उपलब्धियों से प्राप्त होता है, को और भी महत्व प्रदान करता है और दोनों प्रकार के सुखों के बीच एक प्रकार का सन्तुलन बना कर चलने को महत्व प्रदान करता है. यह मानते हुए कि मानवीय जीवन का कोई एक अर्थ सम्भव नहीं है, मानववादी यह स्वीकारते हैं कि सुख और संतुष्टि हर व्यक्ति के लिये भिन्न-भिन्न होते हैं, जो उचित ही है. इस तरह मानववाद, विविधतापूर्ण, सृजनशील और साहसी जीवन का उत्सव मनाता है क्योंकि उससे समस्त मानवता का भला होता है. मानववादी दृष्टि में एक श्रेष्ठ जीवन, पूर्ण मनुष्यता को प्राप्त करना है-
“Achieving one’s full potential in skills, abilities, moral development and psychological well being is to become whole person. Finding ways to encourage this fullness of being is an important part of humanist agenda.”3
मानववाद के अन्तर्गत पूर्ण दर्शन का अर्थ दूसरों से अलग, कटा हुआ दर्शन नहीं है बल्कि मानववादी चिन्तकों ने बार-बार दूसरे मनुष्यों से और दर्शन से इतर प्राणियों से जुड़ाव पर बराबर जोर दिया है. मित्रता उनके लिये एक मूल्य की तरह है लेकिन दूसरों के मित्र बनने से पहले अपने आप से भी मित्रता जरूरी है जो आपको दूसरे की मित्रता के भोग्य बनाती है. एक श्रेष्ठ जीवन के लिये दूसरों के साथ सकारात्मक सम्बंध कितने जरूरी है कि बट्रेन्ड रसेल जैसा दार्शनिक भी कह उठता है कि प्रेम ही श्रेष्ठ जीवन का नियामक हो सकता है.-
“Remember your humanity and forget the rest”4
मानववादी के अनुसार अपनी और दूसरों की सृजनशील कल्पना से सर्जित कला का आस्वादन भी एक श्रेष्ठ जीवन का परिचायक है. कला उनके लिये कोई अतिरिक्त नहीं है अपितु मानवीय जीवन का आवश्यक अंग है. दर्शन होना उसके लिये कोई न बदलने वाला सनातन सत्य नहीं है बल्कि ऐतिहासिक अनुभवों के कारण परिवर्तित होने की प्रक्रिया है. अतः दर्शन वह नहीं है जो वह है बल्कि वह है जो उसे होना है. यह मानवीय जीवन के बारे में एक आशावादी नजरिया है. हम वही है जो हम अपने को बनाते हैं. उसके लिये साहस, लगन, प्रेरणा की जरूरत होती है. हम अपनी क्षमताओं का पूर्ण विकास, चरित्र का उन्नयन और खुशी को अपने जीवन को नयी दिशा देकर प्राप्त कर सकते हैं. यह रास्ता आत्म परिवर्तन और विकास का है. लेकिन मानववाद को अति आशावादी कहना भी उचित नहीं होगा क्योंकि हर मानववादी अच्छी तरह यह जानता है कि चाहे जो भी हम करें या सृजित करें, अंत में शून्यता को प्राप्त हो सकता है. लेकिन फिर भी जब तक जीवन है, उसके पुनर्निमाण में उसकी आस्था कम नहीं होती.
मानववादी नैतिकता– मानववादकी दृष्टि में नैतिकता का स्रोत दर्शन के अंदर ही है, किसी बाहरी सत्ता में नहीं. नैतिकता की जड़ें दर्शन की सामाजिक मूलप्रवृत्ति में ही है जो उसकी बौद्धिक क्षमताओं और आदतों के साथ मिलकर उसके नैतिक व्यक्तित्व को निर्मित करती है. इसी के द्वारा दर्शन नैतिकता के स्वर्णिम सिद्धांत कि ‘दूसरे के साथ तुम वैसा व्यवहार न करो, जैसा तुम अपने साथ नहीं चाहते’ तक पहुंचता है. अतः मानववादियों के अनुसार हमारी नैतिकता का आधार जैविक है किंतु उसका विकास सांस्कृतिक समूहों में साथ-साथ रहने के द्वारा होता है. कुछ मानवीय मूल्य सार्वभौमिक होते हैं क्योंकि वे हमारी समान जरूरतों- स्वतंत्रता, सुख, प्रेम, सम्मान, न्याय, ईमानदारी पर आधारित होते हैं. इस तरह नैतिक निर्णयों में सापेक्षता से बचा जा सकता है हालांकि नैतिक निर्णय संदर्भ आश्रित होते हैं और उन्हें किसी कठोर वैचारिक ढांचे में नहीं साँचा जा सकता. इसीलिये नैतिक सिद्धांतों के स्थान पर मानववादी यह मानते हैं कि नैतिकता का उद्देश्य सभी मनुष्यों का कल्याण होना चाहिए.
मानववादियों के अनुसार दर्शन चूंकि अपने नैतिक निर्णयों के लिये स्वतंत्र है, इसलिये वह अपने निर्णयों के परिणामों की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता. मानववादी दृष्टिकोण के दो आवश्यक परिणाम सामने आते हैं. पहला तो यह है कि हमारी सहानुभूति केवल दूसरे मनुष्यों तक सीमित नहीं रह सकती बल्कि उसके दायरे में अन्य जीव भी आ जाते हैं. इसमें समानुभूति की भूमिका बड़ी होती है. दूसरा परिणाम यह होता है कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी का दायरा व्यापक होकर समस्त मानवों के प्रति हो जाता है. इससे सामाजिक नैतिकता का उदय होता है जो मानवीय समाज के सामान्य जीवन को निर्धारित करने का कार्य करती है. यही लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, कानून द्वारा शासन और मानवीय अधिकार के लिये आधार प्रदान करती है.
राजनीतिक कर्म/दर्शन – मानववाद की उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि मानववाद का राजनीतिक प्रतिफलन एक सेकुलर, नैतिक और लोकतंत्रात्मक सिद्धांत के रूप में होता है. यह व्यक्ति की स्वतंत्रता को बहुत महत्व प्रदान करता है और तानाशाही का विरोध करता है. यह सामाजिक न्याय, बराबरी और करुणा के आधार पर एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिये कटिबद्ध है. यह समस्त मानव कल्याण को धर्म या विचारधारा के स्थान पर राजनीतिक कर्म का आधार सुनिश्चित करता है. इसलिये एक मानववादी का कर्तव्य है कि वह ऐसी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के निर्माण में सहयोग दे जिससे अधिकांश मनुष्यों को अपना जीवन संतोष के साथ गुजारने का अवसर मिल सके. एक मानववादी की यह चिंता समस्त मानवता के लिये होनी चाहिए न कि केवल अपने समूह के लिये. उसके कर्म उसी दिशा में अग्रसर होने चाहिये.
मानववाद और धर्म- मानववादी दृष्टिकोण में ईश्वर का जिक्र के लिये जगह नहीं है क्योंकि उसकी जरूरत ही नहीं है. भौतिक विज्ञान ने ब्रह्मांड का जो सत्य उजागर किया है उसमें ईश्वर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है. एक मानववादी के लिये सभी धर्म और उनके ईश्वर ब्रह्मांड को समझने और दर्शन जीवन के उद्देश्य को जानने के अप्रासंगिक तरीके मात्र हैं. ईश्वर और धर्म दर्शन के ही आविष्कार हैं जिनका ऐतिहासिक, मानवशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय महत्व तो हो सकता है लेकिन वे बाह्य जगत और दर्शन के बारे में उनकी जानकारी ऋुटिपूर्ण है और दर्शन जीवन को अर्थ प्रदान करने के लिए मौलिक आधार प्रदान करने के बारे में अविश्वसनीय जान पड़ते हैं. अतः हम साफ तौर पर कह सकते हैं कि इस्लाम और ईसाई जैसे ईश्वरवादी धर्म मानववाद के साथ असंगत हैं क्योंकि इनमें ईश्वर द्वारा प्रकृति में दखलंदाजी करने की क्षमता, प्रकृतिवादी सिद्धान्त के विरूद्ध है. हालांकि ऐतिहासिक रूप से कुछ मानववादी विचारकों ने आस्तिकता को स्थान दिया है. उनका ईश्वर अस्तित्ववान तो है किन्तु वह ब्रह्मांड की रचना करके उससे दूर चला जाता है और ब्रह्मांड की गतिविधियों और मनुष्यों के जीवन में कोई दखलंदाजी नहीं करता. ऐसा दृष्टिकोण दर्शनिकों के बीच चर्चा का विषय तो हो सकता है किन्तु उसका कोई व्यावहारिक महत्व नहीं दीखता. वैसे भी विकासवाद के सिद्धान्त और आधुनिक खगोलशास्त्र के विकास के बाद ऐसी बातों पर विश्वास उचित नहीं जान पड़ता. अतः यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि बदलते समय के साथ मानववादियों की आगे आने वाली पीढ़ियाँ धर्म से और दूरी बना लेंगी और उससे कोई मतलब नहीं रखेंगी.
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चूंकि मानववाद का दर्शन आज कई तरह की आलोचनाओं के घेरे में है, इसलिये यह समझने के लिये कि क्या मानववाद इनका समुचित उत्तर दे सकने में समर्थ है या नहीं, हमें उन आलोचनाओं को जानना जरूरी है. हम संक्षेप में उनकी चर्चा यहाँ करेंगे. ये निम्न हैं-
अतिशय मानव केन्द्रीयता– आरोप है कि मानववाद अपनी मानव केन्द्रीयता के चलते दर्शन को अतिशय वरीयता देता है और अन्य जीवों और प्रकृति की अवहेलना करता है, उन्हें उपभोग के साधन के रूप में देखता हूँ जिससे विश्व में पर्यावरण संकट पैदा हुआ है.
यूरोप-केन्द्रीयता– उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धान्तकारों का आरोप है कि मानववाद एक यूरोपीय अवधारणा है जो अपने आदर्शों को सार्वभौमिक मानवीय मूल्य बताकर उनको अन्य पिछड़े विकासशील देशों के सांस्कृतिक समूहों पर थोपता है. इस तरह यह उपनिवेशवाद का ही विस्तार है.
आध्यात्मिक शून्यता – यह एक पुराना आरोप है कि सेकुलरवाद के प्रति पक्षपात पूर्ण होने के कारण मानववाद किसी प्रकार के आध्यात्मिक आयाम की अवहेलना करता है. जिससे मानव जीवन में आध्यात्मिक शून्य पैदा होता है.
नैतिक सापेक्षवाद -किसी अतीन्द्रिय सत्ता में विश्वास न करने के कारण नैतिक मानदण्डों के लिये कोई ठोस आधार नहीं रहता जिस कारण मानववादी नैतिक सापेक्षवाद का शिकार हो जाता है.
दर्शन की अवधारणा -उत्तर-संरचनावादियों, उत्तर-आधुनिक चिन्तकों की दृष्टि में मानव की किसी स्थिर, तार्किक, सार्वभौमिक अवधारणा मान्य नहीं हो सकती क्योंकि दर्शन समाज की निर्मित है. यह मानववाद की अवधारणा के विपरीत है.
अतिशय तार्किकता– मानववादियों द्वारा अपनी दर्शन की अवधारणा में तार्किकता को केन्द्रीय महत्व प्रदान करने के कारण मानव जीवन के भावनात्मक पक्ष की अवहेलना हो जाती है और उसकी अवचेतन से भी संगति नहीं रह जाती.
अस्पष्टता– कई तरह की मानववादी विचारधारायें होने के कारण एक अस्पष्टता का बौद्धिक वातावरण है. यदि हम धार्मिक मानवतावादियों को अलग कर दें तो भी उदारवादी, अस्तित्ववादी, मार्क्सवादी, सर्जनात्मक, रेडिकल मानववादियों में समानता और भेद के तत्वों की पहचान करना जरूरी है.
अराजनीतिक, सभ्रान्तवर्गी और दिशाहीन – मानववादियों पर नारीवादियों, संरचनावादियों द्वारा यह आरोप भी लगाया जाता है कि वे मानवीय मूल्यों और मानवीय अधिकारों की बात तो करते हैं किंतु उन सामाजिक संरचनाओं के विश्लेषण में रुचि नहीं रखते जो मानवीय अधिकारों के दमन के पीछे काम करती हैं जैसे पुरुष-सत्ता और पूंजीवाद. इस कारण उनका राजनीतिक दृष्टिकोण दिशाहीन, निष्प्रभावी ही रहता है. किसी ताकतवर सामूहिक-राजनीतिक कर्म की सम्भावना नहीं बनती. केवल मौखिक-व्यक्तिगत विरोध तक ही बात सीमित रह जाती है.
उपरोक्त आरोपों के मद्देनजर आज अनेक लोग मानववाद के स्थान पर उत्तर-मानववाद की वकालत करने लगे हैं. हमें देखना यह है कि मानववाद इस वैचारिक चुनौती का सामना कितनी सफलतापूर्वक कर पाता है. यही अगले अनुभाग का विषय है.
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आइये सिलसिलेवार ढंग से उपरोक्त आरोपों पर विचार करते हैं-
मानववाद को पश्चिमी आधुनिकता की विरासत मानने वाले यह भूल जाते हैं कि अलग-अलग समय में विश्व के अलग-अलग भागों में मानववाद की विचारधारा का उद्गम पाया जा सकता है. उदाहरण के लिये भारत में चार्वाक-लोकायत दर्शन इसका प्रमाण है. भले ही वैज्ञानिक विकास की कमी के कारण उसका पूर्ण विकास न हो सका हो, किसी अतीन्द्रिय सत्ता को चुनौती देने में वह पूरी तरह सक्षम था. वह धारा मन्द भले ही हो गई हो, किन्तु आज भी कायम है और भारतीय षडदर्शन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है. उसके केन्द्र में दर्शन ही है, धर्म नहीं बल्कि उसमें धर्मावलम्बियों के पाखंड की जबरदस्त आलोचना भी है. उसमें जीवन को सुखपूर्वक जीने की वकालत किसी ईसाई धर्म से नहीं आयी है. यदि उनके विरोधियों द्वारा उनकी पुस्तकों को जला न दिया गया होता तो शायद वह धारा हमारे सामने आज अधिक विकसित और सपुष्ट रूप में सामने आती.
मानववाद में वैज्ञानिक तर्क की प्रधानता है, यह बात एकदम सच है, किन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि यह वैज्ञानिक तर्क उपभोक्तावाद के लिये जिम्मेदार है जो आज के पर्यावरण संकट के पीछे है. यह भ्रम मूलभूत विज्ञान, प्रौद्योगिकी और पूंजीवाद के संबंधों को ठीक से न समझ पाने के कारण पैदा हुआ है. मूलभूत भौतिक विज्ञान में हम वैज्ञानिक विधि के माध्यम से वस्तुजगत में कार्य करने वाले प्राकृतिक नियमों की खोज करते हैं जिनकी सहायता से हम प्रकृति को अपने उद्देश्यों के लिये प्रयोग कर पाते हैं. इनके पता लगने के बाद से ही हम अनेक प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं-बाढ़, सूखा, अकाल, भूकंप और बीमारियों के ऊपर काबू पा सके हैं. हम वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग कैसे और किस उद्देश्य के लिये करेंगे यह हम पर निर्भर है. हम उसके आधार पर विनाश की प्रौद्योगिकी का भी निर्माण कर सकते हैं. इस कार्य को अपने लाभ के लिये, अंजाम देने के वास्ते राजसत्ता और अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद जिम्मेदार हैं, वैज्ञानिक तर्क नहीं. इस मानवविरोधी कार्य के लिए मानववाद का दर्शन कतई जिम्मेदार नहीं है. एक सुशिक्षित मानववादी अच्छी तरह जानता है कि हमारी धरती के भौतिक स्रोत सीमित हैं और भविष्य की पीढ़ियों के लिये भी एक अच्छा जीवनस्तर बनाये सकने के लिये अन्धाधुन्ध विकास पर रोक लगानी ही होगी और विकास के संपोष्य माडल को अपनाना होगा.
आध्यात्मिक शून्यता की बात भी बेमानी है. जब मानववाद किसी अतीन्द्रिय सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करता तो फिर सुरक्षा के लिये उसकी शरण में जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. दरअसल मानववाद का तो उससे विरोध है क्योंकि उस पर विश्वास के चलते दर्शन अपनी एजेन्सी भूल जाता है और अपने जीवन को अर्थ दे सकने की क्षमता और मौका खो देता है. आध्यात्मिक गुरूओं के चक्कर में फंसकर अपने जीवन को नष्ट कर लेता है. वर्तमान भारत में ऐसी अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं.
इसी तरह मानववाद पर नैतिक सापेक्षवाद का आरोप भी उचित नहीं जान पड़ता. यह सही है कि मानववादी नैतिकता किसी दिव्य, अतीन्द्रिय सत्ता में अविश्वास के कारण धार्मिक नैतिकता के समान निरपेक्ष नहीं होती लेकिन यह ‘सब कुछ चलता है’ की तर्ज पर सापेक्षिक भी नहीं होती. मानववादी नैतिकता दर्शन की जरूरतों, उनका साझा अनुभव और तर्क, साझा मानवीय मूल्य और मानवता के हित पर आधारित होती है. यद्यपि यह नैतिक निर्णयों की सांस्कृतिक सापेक्षता से इनकार नहीं करती लेकिन कुछ सार्वभौमिक मूल्यों को भी स्वीकार करती है. यह वर्तुनिष्ठ ही होती है, विषयनिष्ठ नहीं. इसमें दर्शन को नैतिक निर्णय की स्वतंत्रता और उनकी जिम्मेदारी उठानी होती है.
मानववाद को सबसे कठिन चुनौती उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-औपनिवेशिकता की ओर से आयी है. वे मानववाद के अर्न्तगत मानव की अवधारणा को ही प्रश्नांकित करते हैं. उनके अनुसार दर्शन का आत्म स्वायत्त नहीं अपितु समाजिक सांस्कृतिक निर्मित ही है. सत्य की वस्तुनिष्ठता और वैज्ञानिक तर्क द्वारा उसकी खोज भी सच नहीं है. सत्य भी सत्ता-संरचनाओं की निर्मित है. इस कारण किसी प्रकार के स्वतंत्र, सर्जनात्मक, उद्देश्यपूर्ण मानवीय कर्म और महाआख्यान की बात बेमानी है. यह औपनिवेशिक सत्ताओं द्वारा शोषण के लिये रची गई साजिश मात्र है. यह सही है कि कुछ अर्थों में आधुनिकता से जुड़ी ‘स्व’ की अवधारणा में संशोधन की जरूरत है, तर्कबुद्धि के अलावा भी मानवीय आयाम हैं जिनकी अवहेलना उचित नहीं है किंतु दर्शन सत्ता/समाज/संस्कृति से पूरी तरह निर्धारित भी नहीं है. बिना तर्क आधारित आलोचनात्मक विवेक के हम किसी प्रकार के स्वतंत्र नैतिक/ राजनीतिक कर्म को आधार प्रदान नहीं कर सकते. दर्शन मरा नहीं है, वह बेहतर भविष्य के निर्माण में स्वायत कर्ता के रूप में अभी भी सक्रिय है.
वैज्ञानिक विधि द्वारा प्राप्त ज्ञान और उसके प्रयोग से मानव कल्याण और विकास मानववाद के मजबूत पक्ष स्तम्भ हैं. वैज्ञानिक ज्ञान की सार्वभौमिकता को चुनौती देने वाली उत्तर आधुनिक आलोचना को स्वीकार नहीं किया जा सकता. यह विज्ञान की गलत समझ पर आधारित है. वैज्ञानिक सत्य कोई निरपेक्ष सत्य नहीं होता, नये तथ्यों के आधार पर उसमें संशोधन हमेशा सम्भव होता है. किन्तु वह काल-स्थान सापेक्ष भी नहीं होता. यदि न्यूटन का गति-नियम लन्दन में सच है तो दिल्ली में भी है. करोना का टीका सभी जगह उपयोगी है. किसी तरह के भारतीय विज्ञान और पश्चिमी विज्ञान की अवधारणा बेमानी है. इसीलिये मानववाद की यह मान्यता कि अभी तक वैज्ञानिक विधि से प्राप्त ज्ञान दर्शन समाज के लिये व्यावहारिक रूप से, बहुत लाभप्रद साबित हुआ है और अर्न्तज्ञान से प्राप्त धार्मिक ज्ञान इसका मुकाबला नहीं कर सकता, उचित प्रतीत होती है.
विज्ञान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल प्रौद्योगिकी का भी है. हाइडेगर से प्रभावित कुछ विचारक प्रौद्योगिकी के अंध विरोध में लगे हुये हैं. एक मानववादी के लिये भी मानव-विरोधी प्रौद्योगिकी आलोचना के परे नहीं हो सकती लेकिन हाइडेगर की तरह समस्त प्रौद्योगिकी का विरोध भी उचित नहीं जान पड़ता. दरअसल, असली समस्या नैतिक/राजनीतिक है जिसका हल आज किसी को सूझ नहीं रहा.
मानववाद पर राजनैतिक विचाराधारा और कर्म को लेकर अस्पष्टता का आरोप भी लगता रहा है. इसका कारण यह है कि व्यापक मानववादी वैचारिक ढ़ांचे से प्रेरित कई तरह की राजनीतिक विचारधारायें सक्रिय हैं जिनमें आपस में तालमेल नहीं है. अस्तित्ववादी, उदारवादी, समाजवादी, मार्क्सवादी विचारधारायें अपने-अपने ढ़ंग से मानववादी कही जा सकती हैं किन्तु उनके द्वारा प्रेरित राजनीतिक कर्म में पर्याप्त भिन्नता है. इसी के साथ कई अन्य तरह के धार्मिक मानवतावादी विचार/संगठनों की लोकवृत्त में सक्रियता भ्रम को और बढ़ाने में सहायक है क्योंकि सभी अपना लक्ष्य मानव कल्याण ही बताते हैं. तो क्या हम मान लें कि मानववाद की अपनी कोई विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा नहीं है, यह केवल साझा मानवीय मूल्यों और मानवीय अधिकारों के लिये संघर्ष करने का आवाहन भर है? यद्यपि हम आधुनिक मानववाद को धार्मिक विश्वास से अलग करके देख रहे हैं फिर भी उसके भी विभिन्न प्रकारों की अनदेखी नहीं कर सकते. यह अन्तर उनके द्वारा अलग-अलग मूल्यों को अपनी विचारधारा में केन्द्रीय स्थान प्रदान करने के कारण जान पड़ता है. जैसे- उदारवादियों के लिये व्यक्तिगत स्वातन्त्र का महत्व सबसे अधिक है तो समाजवादियों के लिये समता का केन्द्रीय महत्व है. युवा हरारी ने तीसरे प्रकार के मानववाद – विकासशील मानववाद, जो दर्शन जाति को अनुवांशिक रूप से श्रेष्ठ बनाना चाहती है और फासीवाद को उसके उदाहरण के रूप में इंगित किया है. इन सभी उपप्रकारों में मानववाद की आधारभूत केन्द्रीय मान्यतायें समान हैं जिनका जिक्र हम ऊपर कर चुके हैं.
मानववाद के उपरोक्त विवेचन से लेख के प्रारम्भ में उठाये गये कुछ प्रश्नों के उत्तर पाये जा सकते हैं. हमने विरोधियों द्वारा मानववाद की तीखी आलोचना का प्रत्युत्तर देने का भी प्रयत्न किया है किन्तु उसे आलोचना से परे किसी तरह का निरपेक्ष धार्मिक सत्य नहीं माना है. मानववाद का एक नकार पक्ष है जिसके अन्तर्गत – किसी अलौकिक सत्ता और धर्म आधारित नैतिकता से इनकार मुख्य है, किन्तु उनका एक सकारात्मक पक्ष भी है जिसके अन्तर्गत आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रदत्त ज्ञान को जीवन के विभिन्न आयामों के पुनर्निमाण के लिये उचित ठहराया गया है. किन्तु क्या मानववाद इसमें पूरी तरह सफल हो सका है? इसी प्रश्न के उत्तर में मानववाद की वर्तमान प्रासंगिकता और भविष्य छिपा हुआ है.
मानववाद एक विचार ही नहीं, आन्दोलन भी है. वैज्ञानिक रूप से संपुष्ट होने के बावजूद, एक आन्दोलन के रूप में समाज में अनेक प्रकार के धर्म आधारित, ताकतवर, न्यस्त स्वार्थों से टकराना उसकी नियति है. आज विश्व में जिस तरह धार्मिक पहचानों को लेकर हिंसक टकराव सामने आ रहा है, उसके सामने मानववाद की शक्ति कमजोर है. ऐसे में मानववाद के लिये सांस्कृतिक पहचान के सवाल को समझना अनिवार्य है. केवल मानवीय मूल्यों की दुहाई देने और मानवीय अधिकारों के लिये आवाज उठाने से काम चलने वाला नहीं है. मानववादियों को उन सामाजिक संरचनाओं के विरुद्ध भी संघर्ष करना होगा जो सामाजिक अन्याय को कायम रखने में दोषी है. इस कार्य में सफलता के लिये एक व्यापक मोर्चा भी बनाना होगा, जिसमें सभी मानववादी परम्पराओं को साथ लेना होगा.5
संदर्भ
- Byelaw – 5.1 of the International Humanist and Ethical Union, Quoted by Andrew Copson in ‘What is Humanism’, in The Wily Blackwell Handbook of Humanism, Ed. By Andrew Copson and A.C. Grayling, 2015, p.20.
- Norman Levitt, ‘The Proper Study of Mankind’ in Gilland (Ed.), What is it to be Human? p.41.
- Fowler, Humanism, 1999, Brighton (England), p.178.
- In the Russell-Einstein Manifesto, issued in London on 9th July 1955.
- Slavica Jakelic, ‘Humanism and its Critics’ in The Oxford Handbook of Humanism, 2021, Ed. by Anthony Pinn, Oxford University Press, p.281.
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आलोक टंडन स्वतन्त्र शोधकर्ता. तीन विषयों में परास्नातक और दर्शनशास्त्र में पी एच.डी.. प्रोजेक्ट’ धर्म और हिंसा’ के लिए आई.सी.एस.एस.आर. जनरल फेलोशिप और आई.सी.पी. आर. रेजिडेण्ट तथा प्रोजेक्ट फेलोशिप प्राप्त. शताधिक सेमिनारों/सम्मेलनों में भागीदारी और पचास से अधिक शोधपत्र प्रकाशित. दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में योगदान के लिए अखिल भारतीय दर्शन परिषद् द्वारा ‘नागर पुरस्कार’ से सम्मानित. ‘लिविंग टुगेदर रिथिकिग आइडेण्टिटी एण्ड डिफरेंस इन मॉडर्न कांटेक्स्ट’ को इण्डियन फिलोसोफिकल काँग्रेस 2023 द्वारा सर्वश्रेष्ठ पुस्तक के लिए ‘प्रणवानन्द पुरस्कार’. लेखक की अन्य पुस्तकें ‘मैन एण्ड हिज डेस्टिनी’ (अँग्रेजी में) और शेष तीन हिन्दी में हैं- ‘विकल्प और विमर्श’, ‘समय से संवाद’ एवं अस्मिता और अन्यता’. |




संक्षेप में अनेक बिंदु स्पष्टता से समाहित हो गए हैं। कुछ विशद होकर बेहतर ही होता। ख़ासतौर पर मार्क्सवादी, समाजवादी, उदारवादी मानववाद के संदर्भ में, उनकी राजनीतिक दृष्टियों, आकांक्षाओं और भिन्नताओं को लेकर। और इनके बरअक्स फासीवादी, दक्षिणपंथी, सर्वसत्तावादी चुनौतियों के बीच। फिर भी इस महत्वपूर्ण विषय पर यह दुर्लभ विमर्श संभव हुआ, स्वागत है।
एक सुचिंतित हस्तक्षेप।
आलोक जी ने यह लेख लिखकर एक व्यापक भ्रम दूर किया है। सच यह है कि रोज़मर्रा की बात बातचीत में ही नहीं, बौद्धिक चर्चाओं में भी लोगबाग मानववाद तथा मानवतावाद को एक-दूसरे का समानार्थी मानकर इस्तेमाल करते रहते हैं। इस नाते यह लेख एक महत्त्वपूर्ण संशोधन करता है।
लेकिन, मानववाद की अंतर्दृष्टि और मान्यताओं के इस प्रखर विवेचन से गुज़रते हुए यह सवाल भी कई बार मन में आया— कहीं इस स्वतंत्र दार्शनिक अवधारणा का मानवतावाद जैसे भावनात्मक पद में इसलिए तो रिडक्शन /अपघटन नहीं हुआ कि समय के साथ इस अवधारणा की अधिकांश अंतर्वस्तु समाजवाद और साम्यवाद जैसी विचारधाराओं में ज़्यादा स्पष्टता और क्रियात्मक बारीकी के साथ स्थानांतरित हो गई?
Naresh Goswami मेरे विचार से इसके लिए समाजवाद और सम्यवाद जैसी विचारधाराओं की असफलता ज्यादा जिम्मेदार है, जिसने मानववाद के कोर दर्शन को भी अपने साथ बदनाम कर दिया.
Alok Tandon जी, आंदोलन तो सफल या विफल होते रहते हैं— इतिहास की दीर्घावधि (Long Duree) में शायद कोई भी आंदोलन अनंत रूप से एक करवट नहीं रह जाता। इसलिए, इससे दर्शन की बदनामी का कोई सीधा संबंध नहीं दिख रहा। आख़िर कोई भी दर्शन /विचार जब मानसिक धरातल से उतरकर व्यावहारिक धरातल पर आएगा तो वह पूर्ववत् नहीं रह सकता। मानसिक से व्यावहारिक की यह क्रिया उस दर्शन की अनजांची आश्वस्तियों को पहले जैसा नहीं रहने देती।
इसलिए, यह कहना कि समाजवाद और साम्यवाद की विफलताओं ने मानववाद के मूल दर्शन को बदनाम कर दिया, बहुत मानीख़ेज़ नहीं है।
अंततः चिंतन की मानववाद जैसी निरीश्वरवादी, ग़ैर-धार्मिक/ग़ैर- आध्यात्मिक धारा को एक वाहक की ज़रूरत तो पड़नी ही थी।
यदि मानववाद तर्क पर आधारित है और यदि उदाहरण के लिए, उदारवाद और साम्यवाद दोनों मानववाद के उप-प्रकार हैं, तो फिर मानववाद क्या है? क्योंकि उदारवाद तथा साम्यवाद दोनों हमें भिन्न, लगभग उल्टी दिशाओं में ले जाते हैं— एक पूँजीवाद और असमानता की ओर तथा दूसरा साम्यवाद और समानता की ओर। वे दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हैं और एक-दूसरे को ख़त्म करना चाहते हैं। साम्यवाद की जगह हम मार्क्सवाद को भी रख सकते हैं जो अपने-आपको वैज्ञानिक दर्शन कहता है।
दूसरा, मानववाद एक पुराना पड़ चुका दर्शन है, यानी वह dated दर्शन है। चाहे वह दूसरे प्राणियों के साथ सहानुभूति रखता है, तब भी उसके केन्द्र में मनुष्य ही है: यह दर्शन अपने अधिकाँश हिस्से में मनुष्य की, मनुष्य के बारे में ही बात करता है, अधिकतर उसी की चिन्ता करता है। जबकि हम जानते हैं कि मनुष्य (यहाँ Homo sapiens) समेत पृथ्वी पर जीवों की लाखों प्रजातियां हैं और इसलिए पृथ्वी के संसाधनों पर उन सब का समान अधिकार है। यदि यह बात सही है तो इस समय एक ऐसा दर्शन ज़्यादा प्रासंगिक है जो सिर्फ़ मनुष्य को केन्द्र में न रखे, बल्कि सभी प्राणियों को समान मानते हुए, सभी को एक-समान अपने केन्द्र में रखे।
मानववाद में उदारवाद और इस तरह पूँजीवाद की कितनी भागीदारी है, यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। वहीं मानववाद व मानव-केंद्रिकतावाद कहाँ एक हैं और कहाँ अलग हैं, यह भी महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।
मानववाद की सुंदर व्याख्या
यह लेख बहुत चीजों को एक साथ रखने के चक्कर में सूचनात्मक ज्यादा बन गया है। मानववाद की आलोचनाओं को तो ठीक से संकलित किया गया है। मगर उनका जवाब कई जगह सपाट तरीके से दिया गया है। फिर भी यह लेख बहुत से प्रश्नों को उठाता है, भले ही उनका निराकरण जल्दबाजी में करने की कोशिश करता हो। ‘बस इतना समझना काफी होगा’ जैसे वाक्य जल्दबाजी में लगते हैं।
आलोक टंडन महत्त्वपूर्ण चिंतक हैं। उनसे सहज ही अपेक्षा की जा सकती है कि वे मानववाद की आलोचनाओं में से किसी एक या दो को लेकर युक्तिपरक जवाब दें तो वह मूल्यवान होगा। जैसा कि उन्होंने स्वयं जिक्र किया है मानववाद दर्शन के अलावा एक विचारधारा के रूप में भी सक्रिय है और अमेरिका व यूरोप में इसके प्रचार-प्रसार के लिए काफी संगठन व मुहिम हैं। मगर दार्शनिक स्तर पर इसका आकलन ज्यादा रोचक होगा।
बहुत सी चीजों को एक साथ समेटना कई बार सरलीकरणों को भी जन्म देता है। भाववाद और भौतिकवाद की बहस दर्शन की एक बड़ी धुरी है। कांट व हेगेल भाववादी कहे जाते हैं, वहीं फायरबाख भौतिकवादी। मगर आधुनिक मानववाद सुविधानुसार दोनों से तत्त्व ग्रहण करता है। मार्क्स ज्ञानोदयी मानववाद की बहुत सी बातों से सहमत नहीं थे- जैसे कि मनुष्य का स्थायी सारतत्व। बाद में अल्थुसे, बालिबार और पौलंजा जैसे मार्क्सवादी मानववाद की कठोर आलोचना करते हैं। वहीं फ्रैंकफुर्ट स्कूल, खास तौर पर अडूर्नू व होरखाइमर ने भी होलोकास्ट के हवाले से ज्ञानोदय की परंपरा की और मानववाद की गहरी आलोचना की है। हैबरमास ने आधुनिकता व ज्ञानोदय का बचाव करने के बावजूद अडूर्नू की उपकरणवादी तार्किकता की आलोचना को स्वीकार किया है। हैबरमास सहित फ्रैंकफुर्ट स्कूल ने टेक्नोलॉजी ही नहीं बल्कि विज्ञान की पद्धति की गहरी आलोचना की है, और उसके बरक्स संवादपरक तार्किकता व मुक्तिकामी तार्किकता को पेश किया है।
मानववाद व मानवतावाद का अंतर अच्छे से आया है। मगर यह बड़ा प्रश्न है। मानवतावाद मानववाद से और मानववाद मानवतावाद से कितना और क्या सीख सकता है, यह समकालीन प्रश्न है। इसी तरह बरास्ते उदारवाद (जो पूँजीवाद व कई बार साम्राज्यवाद का भी वैधीकरण है) मानववाद में क्या-क्या गया है और इस तरह मानव-केंद्रिकता (anthropo-centrism) व मानववाद के बीच पर्दे के पीछे क्या कुछ पका है, यह प्रकृति व मनुष्य के द्वैत से उबरने के लिए हमारे सामने बड़े सवाल हैं। अडूर्नु के मुताबिक जर्मनी में होलोकास्ट इतिहास की कोई दुर्घटना नहीं थी, बल्कि ज्ञानोदय और मानववादी संस्कृति की परियोजना की विफलता थी। आज जब ज्ञान व तर्क के सबसे बड़े केंद्र यूरोप और अमेरिका नैतिक रूप से फिर संकटग्रस्त हैं, इतिहास को कठोर आत्मालोचनाएं चाहिए।
यह एक अत्यंत प्रभावशाली लेख है, जिसमें सैद्धांतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य का जो समन्वित विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, वही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। लेखक ने विचारों के स्तर पर गहन अंतर्दृष्टि के साथ विषय की जटिलताओं को उभारते हुए उसे बौद्धिक रूप से समृद्ध बना दिया है।