| कौन है भारतीय? राजीव वोरा की पुस्तक ‘भारतीयता का प्रश्न और व्याख्या’ के बहाने _______________________________________ गगन गिल |
राजीव वोरा मेरे गुरु भाई हैं. हम दोनों के एक ही गुरु हैं- समदोंग रिनपोछे. आज जिस पुस्तक पर चर्चा है, वह उन्हें ही समर्पित है.
मुश्किल यह है कि हम दोनों अपने गुरु की बात अलग-अलग तरह से समझते हैं. राजीव जी आस्थावान हैं, समाज में कुछ अच्छा करना चाहते हैं, जल्दी-जल्दी शंका नहीं करते. पहुँचने की इच्छा में तेज चलते हैं. इन्हें लगता है, इनके पीछे चलने वाले भी सब पहुँच जाएँगे.
रिनपोछे इनका उत्साह समझते हैं, और मेरा संशय. वह हम दोनों को अपने-अपने रास्ते तय करने देते हैं.
बरसों से इन्हें देख रही हूँ. ऐसे ही कर्मठ. आशावान. जब यह दादाजी पांडुरंग अठावले से जुड़े हुए थे, उनके विराट स्वाध्याय के कार्यक्रमों में रिनपोछे और निर्मल को क्रांति दिखाने ले जाते थे, गुजरात में.
तब रिनपोछे ने ही अठावले जी को चेताया था, (उनके साथ बीस पच्चीस लोगों की एक आत्मीय भेंट राजीव ने रखी थी, सूरजकुंड के एक होटल में)
“आप भीड़ जुटा रहे हैं, भीड़ को बदल देने का दावा कर रहे हैं. इस आंदोलन से भीड़ का स्वभाव बदल गया, यह मान लेना ग़लत है. व्यक्ति बदलता है, भीड़ नहीं. व्यक्ति अपने भीतर से कैसे बदले, इसके लिए आपको यत्न करना होगा.”
मनुष्य का बदलना कितना मुश्किल है, यह गाँधी जी जानते थे या रिनपोछे जैसे महापुरुष जिन्होंने अपना सारा जीवन समाज को दिया है.
दो)
मेरे साथ दिक्कत है कि संशय आत्मा हूँ. जल्दी-जल्दी चल नहीं पाती. किताब हो या विचार, मेरे लिए कुछ भी अंतिम नहीं बनता. न मैं गांधीवादी हो पाई हूँ, न हिन्द स्वराज मेरे लिए कोई अंतिम सत्य. मेरी चेतना पर आधुनिक शिक्षा की काफ़ी धूल पड़ चुकी है, मगर मेरे अवचेतन को कुछ याद है, कोई जीवन बोध, जीवन मूल्य. वही मेरे दैनंदिन का नैतिक आचरण सुनिश्चित करता है.
राजनीति मेरा विषय नहीं, न इतिहास. कवियों के पास निर्णय नहीं होते, न मंज़िलें. जाने कैसे लोग वे कवि रहे होंगे, जिन्होंने लिखा- आमार सोनार बांग्ला या हमी अस्त हमी अस्त हमी अस्त. मुझसे तो यह कहते भी नहीं बनता- सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा. सबसे अच्छा न भी हो, है तो यह मेरा ही हिन्दोस्ताँ.
इतिहास के जख्म मुझे याद नहीं रहते, हालाँकि उन्नीस सौ चौरासी के वीभत्स दंगे अपनी आँखों से देखे थे. जले ट्रकों की स्टीयरिंग पर बैठे हुए शव.
कुल मिलाकर अपनी आत्मा साफ़ महसूस होती है. ऐसा कैसे हो सकता है?
शायद वहाँ संत कवियों की छवियाँ हैं, सनातन में गहरी आस्था. कई बार क्षोभ होता है, लेकिन दूसरे पर नहीं, अपने पर. क्या हम कुछ भी नहीं बदल सकते थे?

तीन)
राजीव भाई में एक भोलापन है. उन्हें लगता है, वह संवाद से किसी के भीतर कुछ बदल देंगे. मुझे यह विस्मित करता है. रिनपोछे को आश्वस्त.
इधर कई वर्षों से वह हिन्द स्वराज पर विमर्श करते रहे हैं. इस पुस्तक में उन कार्यशालाओं के ब्योरे हैं, कश्मीर के मुसलमानों के साथ, नक्सलियों के साथ बातचीत. राजीव भाई को लगता है, लोग उनकी बात समझ रहे हैं. समझ रहे हैं तो एक दिन बदल भी जाएँगे ज़रूर.
उनके कई हिन्द स्वराज शिविरों को रिनपोछे का आशीर्वाद मिला है.
“बीज बो देना चाहिए भले वह अंकुरित होने में कितना ही समय ले.”
उनके इस कथन को राजीव भाई ने अक्षरशः शिरोधार्य किया है.
अब इसका मैं क्या करूँ कि मुझे बीज से ज़्यादा बीज बोने वाले पर आस्था है. मेरा मानना है, विचार का कठोर बीज कथनी-करनी में मूर्त हो कर ही अंकुरित होता है. जनता किसी विचार के पीछे नहीं, महापुरुष के पीछे जाती है. महान विचार में से महान विचार भले जन्म न निकले, महापुरुष की छाया हमेशा फलीभूत होती है. उसी को परम्परा मानते हैं.
इस बात का मर्म राजीव भी समझते हैं. तभी वह एक जगह कहते हैं-
‘सेकुलर दृष्टि वाले लोग यीशु, मुहम्मद, बुद्ध और गाँधी को तो मान सकते हैं, उनके इंद्रियातीत ज्ञान को नहीं.’
व्यक्ति और उसके इंद्रियातीत ज्ञान को अलग करने की और उसे अभिन्न देखने की बारीक नज़र उनके पास है.
बीज अच्छा हो, तब भी ज़मीन की तैयारी करनी पड़ेगी, उसकी गुड़ाई करके उसे नरम करना पड़ेगा. यहीं कुछ चूक हो जाती है. कई बरस पहले रिनपोछे ने तिब्बत सत्याग्रह के लिए एक पुस्तिका लिखी थी. इसमें उन्होंने सत्याग्रहियों से कम से कम तीन माह के नैतिक आचार की अर्हता रखी थी. यह बीज के लिए ज़मीन तैयार करने जैसा था.
हमारे समय की विडम्बना ही है कि अब तीन माह की परीक्षा देने को कोई तैयार नहीं. राजीव भाई को कठोर ज़मीन में ही बीज डालने पड़ते हैं. कुछ दिनों के संवाद शिविर से उन्हें लगता है, बात आगे बढ़ रही है.
काश, मनुष्यों का दिल भेदना इतना आसान होता.
अन्ना हजारे के आंदोलन में मैंने भी उपवास रखे थे. आज लगता है, सब छलावा था.
यह कौन हमें छल जाता है? इसकी पहचान तो होनी चाहिए.

चार)
अपनी किताब में राजीव भाई कहते हैं, वह कौन है भारतीय प्रश्न को अमूर्त नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि अमूर्तन में ही सब घाल-मेल है. रेशा-रेशा इसे अलग करेंगे, वह करते भी हैं, लगभग शास्त्रार्थ की परंपरा में.
अधिकांश पुस्तक गहरे विचार-मंथन और प्रश्नाकुलता में चलती है. मगर एक जगह मैं उनकी प्रस्तावना से लगभग सहमत होते हुए भी रुक जाती हूँ, जब वह बाबरी मस्जिद के विध्वंस की बात करते हैं-
“पराजय बोध से मुक्ति के बिना कोई प्रजा अपने स्वास्थ्य को वापस नहीं पा सकती.”
यह बात विध्वंस से पहले कितनी सच थी, और अब कितनी झूठ.
मस्जिद तोड़ कर स्वस्थ होने की इच्छा रखना और तोड़ने के बाद स्वस्थ हो ही जाना, ये दो अलग स्थितियां हैं. अगर मस्जिद विध्वंस ने हमारे समाज को स्वस्थ किया होता तो दूसरी, तीसरी, चौथी मस्जिदों को तोड़ देने की इच्छा क्यों रहती?
बाबरी विध्वंस के समय गाँधी जी रहे होते, तो वह क्या करते? नरसिम्हा राव की तरह सो जाते या कि आमरण अनशन पर बैठ जाते?
बोधगया मंदिर पर ब्राह्मणों का अधिकार अभी तक क्यों है? हिंदुओं-बौद्धों को अलग करने के लिए एक लोहे की रेलिंग लग गई है जबकि बुद्ध यहीं के हैं, उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं. क्या बौद्धों को भी मंदिर मुक्ति के लिए कुछ करना चाहिए?
मैं यही सब उधेड़ती-बुनती हूँ.
पाँच)
राजीव अपने विचार मंथन में कभी त्रिभुज बनाते हैं, कभी binaries, द्विआधार. इससे सफेद को स्याह से अलग करने की सहूलियत हो जाती है. ज़्यादातर बहस में वह तीन पक्ष आमने-सामने रखते हैं- सनातन, मुस्लिम, सेकुलरिस्ट. गाँधी, नेहरू, कम्युनिस्ट.
वह समस्या को इसी तरह समझते हैं. सरल. मगर जटिल समस्याओं के हल सरल और सरल समस्याओं के हल जटिल होते हैं. प्राय: हमेशा.
गांधी को अवतार मानने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं. मुझे है.
राजीव भाई भारत के आक्रमणकारियों पर तो विचार करते हैं, मगर हिंदू समाज के अंतर्विरोधों पर नहीं. उनके लिए मुसलमान एक इकाई हैं जो बाहर से आई है, जिसकी पुण्य भूमि विदेश में है, इसलिए उसकी देश निष्ठा संदिग्ध हो तो कोई अचरज नहीं. यह वह इकाई है जिसने शायद सत्ता मोह और स्वार्थ के चलते इस्लाम अपनाया था.
मगर उनके मुसलमानों में भारतीयों की वे पीढ़ियाँ नहीं, जो अपने घरों में देव मूर्तियां छिपा कर रखती थीं, जिनके लिए धर्म परिवर्तन मर्मान्तक रहा था. वे पंडित भी नहीं जिन्होंने अभी कुछ वर्ष पहले ही भारतीय मुसलमानों की घर वापसी करने से मना कर दिया था.
न वे उन अछूत हिंदुओं की कोई गिनती करते हैं जो अपनी अमानवीय स्थिति से तंग आकर मुसलमान बने थे. लौट रहे हत्यारे तैमूरलंग के पीछे-पीछे सैंकड़ों अछूत गये थे, मुसलमान बनने के लिए. ऐसी विदारक घटना उनके संज्ञान में आने से रह जाती है.
हम जिस दुश्मन को बाहर ढूँढ रहे हैं, वह हमारे बीच बैठा है. हम कब तक उसे नहीं चीन्हेंगे?
एक जगह राजीव भाई गाँधी जी की सभा का ज़िक्र करते हैं. एक शूद्र उनसे पूछता है, “स्वराज आने पर आप हमें किस जाति में रखोगे?” गाँधी जी कहते हैं, “स्वराज में कोई जाति नहीं होगी, सब शूद्र होंगे.”
राजीव भाई को यह उत्तर मार्मिक लगता है, मुझे यह जुमला.
इतनी कठोर वर्ण व्यवस्था क्या कहने भर से टूट जाएगी? आठ सौ साल चला हमारा भक्ति आंदोलन कुछ नहीं कर पाया. रैदासिये बन गए, कबीरपंथी, लिंगायत. जाति वहीं की वहीं.
मुझे यू. आर. अनंतमूर्ति का लेख याद आता है जिसमें वह एक बी.ए. पास शूद्र की कल्पना करते हैं जो अपने सिर पर मैला ढो कर ले जा रहा है. अनंतमूर्ति पूछते हैं, उस बी.ए. पास शूद्र को यह संसार कैसा दिखता होगा?
आज भी सीवर में उतरने वालों के लिए कोई सेफ़्टी गियर नहीं, कोई क़ानूनी सुरक्षा नहीं, किसी की जवाबदेही नहीं.
ऐसे कितने ही धुंधले इलाकों से हम घिरे हुए हैं. ऐसा तो नहीं कि इस देश में शासन नहीं हो रहा. नेहरू आये, मोदी आये. प्रचंड बहुमत से आये. शिक्षा नीतियाँ बदलीं. बात वहीं की वहीं.
कुछ महीने पहले एक साफ़ सुथरे बी.टेक. विद्यार्थी ने रेलवे स्टेशन पर मेरा बैग उठाया, कुली बन कर. ये हालात हैं.
क्या ये सब मेरे- आपके भारतीय होने को परेशान नहीं करते?
पश्चिम सभ्यता सदा शैतान नहीं रही, न हमारी सभ्यता ऐसी उजली. थोड़ा-बहुत वास्ता तो मेरा भी उनसे पड़ा है, राजीव का भी पड़ा होगा.
यह विडम्बना ही है कि जिस अमेरिका में अधिकांश बच्चे स्कूल से आगे नहीं पढ़ते, उसके विश्वविद्यालयों ने संसार की क्लासिकल स्टडीज़ को बचा कर रखा हुआ है. स्वयं मैंने हमारे शास्त्रीय ग्रंथ अमेरिकी आचार्यों से पढ़े, एक साल के हार्वर्ड प्रवास में. आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली में इन ग्रंथों को पढ़ाने की कोई व्यवस्था नहीं थी. कम से कम मेरी पीढ़ी के पास. आज भी अमेरिकी विद्यार्थी यहाँ आकर शास्त्रीय विद्वानों से पढ़ते हैं और विश्वविद्यालय उसे मान्यता देते हैं. हमारे यहाँ आधुनिक और शास्त्रीय शिक्षा में पुल बनाने की कोई परिकल्पना कब बनेगी?
जब हम पैदा ही आधुनिक समय में हुए हैं, तो इससे पार कैसे पायें? इसकी दलदल में उतरे बग़ैर उस पार या इस पार कैसे पहुँचें?
यूरोप में धर्माचार्यों की अति के कारण ही सेकुलर व्यवस्था बनी थी. वह न्यायसंगत क्यों नहीं हो सकती? दलाई लामा को तो मार्क्सवादी व्यवस्था इसीलिए अच्छी लगी थी कि वहाँ साधारण के लिए न्याय था. नैतिक जीवन के लिए धर्म का आलम्बन ज़रूरी नहीं, हम सब जानते हैं.
समस्या यहीं है- मनुष्य के दिल की कालिख में. उसके स्वार्थ, उसके लोभ में.
छह)
पुस्तक में ऐसे अनेक बिंदु हैं जहाँ मैं राजीव भाई से सहमत नहीं हो पाती. इस सुचिंतित, प्रमाण संपन्न पुस्तक में प्राय: वह हर निदान सही कर लेते हैं, ऐसी अंतर्दृष्टि उनके पास है. मगर जो इलाज वह सुझाते हैं, उन पर मेरा भरोसा नहीं होता. मेरे लिए जहाँ रास्ता खुलने वाला होता है, वहीं जाकर बंद हो जाता है. शुरू में ही वह कहते हैं-
“जो हमारे पुरखों से प्राप्त न हो, जो हमारी अपनी ज्ञान परंपरा की पैदाइश न हो, जो हमारी खोज न हो, वह तात्कालिक उपभोग की वस्तु हो सकती है, हमारी पहचान उससे नहीं हो सकती.”
अगर मेरी जगह यह वचन कोई चीनी, जापानी, तिब्बती, दक्षिण एशियाई पढ़ रहा हो, तब? जिसकी मूल अस्मिता ही बौद्ध धर्म से बनती है मगर उसकी स्थानीय सभ्यता में ढल कर. आज से नहीं, गत दो हज़ार सालों से. उसके बाशिंदों को हम कहाँ रखेंगे?
उपरोक्त उद्धरण से पहले एक और उद्गार पर मेरा ध्यान जाता है-
“जिसकी वसीयत में हमारा नाम ही न हो, वह हमारा नहीं हो सकता!”
गो कि उनके लिए यह स्व, यह सेल्फ़, यह अहं ब्रह्मस्मि नहीं, कोई विनिमय है, कानूनी सौदा है!
सबसे ज़्यादा परेशानी होती है इस वाक्य पर-
“जो हमारी खोज न हो, उससे हमारी पहचान नहीं हो सकती.”
ज्ञान पर कॉपीराइट तो आधुनिक समय की घटना है. सोचिए अगर हम सब को अपना-अपना शून्य खोजना पड़ता, अपना-अपना न्यूटन का सिद्धांत. क्या आर्यभट्ट शून्य खोज कर उसे छिपा सकते थे कि अब कोई और इस शून्य का उपयोग नहीं करेगा?
मनुष्य जाति अपने आविष्कार, वे भौतिक हों या आध्यात्मिक, एकान्तिक हों या सामाजिक, एक दूसरे से बाँट कर संपन्न हुई है कि विपन्न?
अहिंसा जैसे एक विचार ने साउथ अफ़्रीका को मुक्त करा दिया, अमेरिका के काले-गोरे भेद को कानूनन ख़त्म करा दिया.
सात)
यह विडम्बनाओं का युग है और यह इस युग की पुस्तक. अपने युग की ही तरह अंतर्विरोधों से भरी, मगर सदाशयी पुस्तक. अंधेरे में अपना रास्ता तलाशती. राजीव भाई के लंबे समर्पित गाँधीवादी जीवन का सुफल. उन्होंने हमारे समय को बदलते देखा है. गाँधीवादी संस्थाओं को बाज़ार से हारते हुए भी. मगर उनकी आशा वैसी ही बनी हुई है. इसी में कितनी उम्मीद है.
मैं इस महत्वपूर्ण पुस्तक को समझने में कितनी अल्प-बुद्धि रही हूँ, यह अब आपके सामने है.
भारतीयता का प्रश्न और व्याख्या: कौन है भारतीय?
लेखक: राजीव वोरा
प्रकाशक: इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली
मूल्य: 500 रु
| गगन गिल
एक दिन लौटेगी लड़की (1989), अँधेरे में बुद्ध (1996), यह आकांक्षा समय नहीं (1998), थपक थपक दिल थपक (2003), मैं जब तक आयी बाहर (२०१८). कविता संग्रह तथा अवाक् (2008), देह की मुँडेर पर (2018) और इत्यादि (2018) आदि गद्य-कृतियाँ प्रकाशित. भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार (1984), संस्कृति पुरस्कार (1989), केदार सम्मान (2000), आयोवा इंटरनेशनल राइटिंग प्रोग्राम द्वारा आमंत्रित (1990), हारवर्ड यूनिवर्सिटी की नीमेन पत्रकार फैलो (1992-93), संस्कृति विभाग की सीनियर फैलो (1994-96), साहित्यकार सम्मान (हिंदी अकादमी – 2009), द्विजदेव सम्मान (2010). 2024 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार आदि से सम्मानित. ई-मेल : gagangill791@hotmail.com |




अच्छी समीक्षा …..
चुभती प्रश्नाकुलता भरा सही विवेचन है।
गगन गिल जी का लेख (समालोचन में राजीव बोरा जी की पुस्तक का रिव्यू) मैं पढ़ गया। पुस्तक नहीं पढ़ी। बिना पुस्तक पढ़े कुछ कहना ढीढ़ता है, मगर गगन जी का रिव्यू पढ़कर कुछ कहने का मन हो उठा। गगन जी के लेख से स्पष्ट है कि – पृत्रभूमि-पुण्यभूमि के सिद्धांत पर – राजीव बोरा के विचार सावरकर की थीसिस के ठीक अनुरूप हैं। (ये उनका लेख पढ़कर मेरा कथन है।) गगन जी ने उसकी ठीक ही बौद्धिक आलोचना पेश की है। किंतु जो बात मुझे असहज करती है कि भारतीयता की पहचान करने के बौद्धिक उपक्रम में जो व्यक्ति मूल सावरकरवादी थीसिस पेश कर रहा है उसे गगन गिल गांधीवादी कैसे कह सकती हैं!
राजीव बोरा की बौद्धिक राजनीति तो मैं जानता हूँ गगन गिल जी की नहीं। सावरकरवादी थीसिस देने वाले लेखक को गांधीवादी सिद्धांत का अनुगामी कैसे बताया जा सकता है। (यहाँ मैं गांधी की हत्या में सावरकर की भूमिका आदि की तरफ जा ही नहीं रहा)।
जीवन भर मुस्लिम समाज और उसकी राजनीति से उलझे रहे इंद्रेश कुमार को क्या मध्यमार्गी, समतावादी, सेकुलर या मुस्लिमपरस्त ऐसा कुछ भी कहा जा सकता है, चूँकि वे मुस्लिमों के बीच उनके लिए काम काम करते रहे हैं? गगन गिल की दृष्टि और तर्क तीक्ष्ण लगे मुझे, किंतु बौद्धिक समाज में जो बात इंद्रेश कुमार जैसे लोगों के बारे में दिन के उजाले की तरह स्पष्ट है वह राजीव बोरा जैसे लेखकों को सदाशयता के आवरण में इतनी अधिक बौद्धिक छूट कैसे दे देती है? पृत्रभूमि-पुण्यभूमि की सावरकरी थीसिस को मानने वाला व्यक्ति भला किस तर्क/दृष्टि से गांधीवादी हो सकता है चाहे वह ज़िन्दगी भर हिन्द स्वराज के सिरहाने रखकर सोता रहा हो!
गगन जी, इस सुचिंतित विमर्श के लिए आभार।
कल शाम से इंतज़ार था :-)।
आपकी यह समीक्षा पुस्तक की पड़ताल से कहीं आगे बढ़कर स्वयं में एक मौलिक स्थापना जैसी है। विशेषकर ‘ज्ञान की वसीयत’ और ‘शून्य के कॉपीराइट’ पर आपके प्रश्न अस्मिता के संकुचित भूगोल को चुनौती देते प्रतीत होते हैं। एक वरिष्ठ लेखक के प्रति अटूट गरिमा बनाए रखते हुए भी, जिस वैचारिक प्रखरता से आपने अपनी असहमति दर्ज की है, वह विरल है। विधा नई है, पर आपकी लेखनी का वह चिर-परिचित दार्शनिक ठहराव यहाँ भी स्पष्ट झलकता है।
मन को गहराई तक उद्वेलित कर देने वाला विवरण !
बहुत अच्छा लिखा है। मुझे गगनजी का गद्य उनकी कविताओं से अधिक प्रिय है। राजीवजी की चिंतनधारा दिलचस्प है। उसकी ओर संक्षेप में इशारा किया गया है। असहमतियाँ बहुत तार्किक हैं। मुझे एक किताब और मँगानी होगी।
यह किताब तो अभी मैंने नहीं देखी। पर गगन गिल ने इसके लोकार्पण के अवसर पर जो प्रश्न उठाये हैं उनसे बचकर निकलने की हमारे बौद्धिकों की आदत अब तक छूटी नहीं है। देखते हैं वोरा जी क्या कहते हैं? — बापू ने ‘हिन्द स्वराज्य’ केवल जप के लिए नहीं, तप के लिए रची है।
इस आलेख में से एक ही वाक्य कोड करना चाहूंगा जो गगन गिल ने इस पुस्तक के बारे में कही है “अपने युग की ही तरह अंतर्विरोधों से भरी” । मैं उसको इस तरह कहूंगा कि राजीव बोरा जी का पूरा चिंतन अंतर्विरोधों से भरा हुआ है । वह न गांधीवादी बन पाए और न सच्चे सनातनी। वे गांधी विचारों को रूढ़िंदिवादी नजरिए से देखना, समझना और परोसना चाहते है, जो एक प्रकार वैचारिक फ्रॉड है। इससे कहीं नहीं पहुंचा जा सकता ।
बहरहाल गगन गिल को साधुवाद की उन्होंने पुस्तक के अंतर्विरोधों को न सिर्फ पहचाना अपितु उसे बहुत ही सुंदर और शालीन ढंग से प्रस्तुत किया ।
स्थिर ठहराव के साथ गद्द को लिखना मानो धूप से छन छन कर आती छायाओं से शीतलता प्रदान कर रही हों। गद्द का बेबाकपन सबके बस का नहीं।
राजीव बोरा से सहमत होना कई बार मुश्किल होता है…कई बार लगता है कि एक दीप प्रज्वलित होता हुआ अपने अंत में स्याह धुएं तक पहुंचता है, वहाँ रोशनी नहीं है…. यहाँ गगन गिल अपने संशय मन से निकले जो प्रश्न रखती हैं, वह खोज की प्रक्रिया में बने रहने का आग्रह है, शायद वहीं कहीं कोई सत्य है.…
लेखकीय संशय कितना स्पष्ट हो सकता है यह गगन जी के इस विचारशील लेख से जाना जा सकता है।
मित्र की किताब पर यूँ बोलना ही सच्ची आलोचना है। कई संशय और सब अर्थपूर्ण और सब संकेत देते हुए कि एक दिशा इधर भी।
बहुत सुंदर लिखा है गगन जी ने।
Suchintit sameeksha jo lalit gadya me likhi gayee hai.Spushta asahmatiyan jo tuthyon aur turkon ke saath udhayi gayin hain. Bahut pathneeya,bahut vicharneeya
धन्यवाद अरुण जी! आपको भेजने के पहले गगन जी ने यह लेख मुझे भेजा था देखने के लिए , जो उनका स्नेह और बड़प्पन है । मैने उनको यही लिखा कि विमोचन के लिए आपको बुलाने का मेरा सुझाव कितना योग्य है यह इस कथन से स्पष्ट है । मुझे अत्यंत खुशी है कि आपने इतना अद्भुत , चेतना के दूसरे धरातल से यह लिखा है । प्रो अवध किशोर शरण जी की इस बात को कितने लोग कितना और कैसे समझते है उस पर आधार है पुस्तक के विषय को समझने का : ” संपूर्ण सिस्टम की व्याख्या करने में अंतर्विरोध रहेंगे क्यों कि जो संपूर्ण सिस्टम होती है, जिसे की हिंदू धर्म , उसमें व्यावहारिक और विशेष कर मनुष्य सत्ताक दृष्टि से ये अंतर्विरोध कॉन्फिक्ट मॉडल के अनुसार दी दिखेंगे । आधुनिकता के सेक्युलर जीवन दृढ़ता कॉन्फ्लिक्ट मॉडल की बंदी है । जिसका सम्पूर्ण विकास मार्क्सवाद में हुआ। जब कि हिंदू तत्व दर्शन भी डायलेक्टिक है, लेकिन अंतर्विरोधों में निर्द्वंद्वता स्थापित हो इस दृष्टि से आधार फर्स्ट प्रिंसिपल्स का है: रुत, सत्य और अहिंसा । गांधी जी के यह तीन नाप दंड है: उनका उपयोग अपने समय को समझने में करना जरूरी समझ कर भारतीयता के प्रश्न पर विचार किया है । गलती न होने का मेरा कोई दावा हो ही नहीं सकता । जिन्हें स्वराज स्वीकार्य नहीं , उन्हें इस पुस्तक से परेशानी होगी । स्वतंत्रता बनान स्वराज के एक तरफा संघर्ष में कौन कहां खड़े है इसकी पड़ताल, पहचान करना जरूरी हो गया है। अन्यथा अन्याय की समाज और राज्य व्यवस्था को आधुनिकता के ,” डेमोक्रेसी, सेक्युलरिज्म, लिबर्टी जैसे लुभावने करोड़ों में लपेटते रहेंगे और अंदर आग सुलगती रहेगी, एक दिन विस्फोट जरूर होगा। इस पुस्तक में हिंदू मुस्लिम एकता के आधार को बासी जुमलों से मुक्त कर सार्वभौम सनातन जीवन सिद्धांत की आधार भूमि पर खड़ा किया है। सनातन सनातन की खोखली रट से हट कर । क्या उस विडंबना को खोल कर देखने का प्रयास गांधी विरोधी है कि जिस आधुनिकता के यूरोपीय इंलाइटनमेंट मूल्यों के खिलाफ गांधी जी ने लोक जागृति कर भारत का आजादी का युद्ध लड़ा, आजादी आते ही उन्हीं मूल्यों की साधना में राष्ट्र को लगा दिया! अंतर्विरोध यहां है। और इसकी स्पष्ट पड़ताल आज तक हुई है क्या ? ( सेक्युलर , जिसके तीन अर्थ में होती ग़लमेल को मैने स्पष्ट किया है। गगन जी ने उनका दृष्टिकोण आधुनिकता की शिक्षा का होनी की बात शुरू में ही कर दी है )
जब राजीव बोरा का पक्ष इतना स्पष्ट है तब उनकी किताब पर लिखते हुए समीक्षक को अपने संशयात्मा होने की (इतनी मुखर, बारंबार और अपोलोजेटिक होने की घोषणा करने की) ज़रूरत नहीं।
हिन्द स्वराज पर एक सेमिनार में राजीव वोरा ने मेरी प्रस्तुति की प्रशंसा की थी। तब मुझे लगा था कि वे साम्य विचार के प्रति सहृदय हैं। अवश्य ही वह मेरा भोलापन था। एक महाविद्यालय की संगोष्ठी में जब मैंने गगन गिल को यह आग्रह करते सुना कि मंगलाचरण के तौर पर सरस्वती वन्दना के साथ गायत्री मंत्र का पाठ भी होना चाहिए तब मेरा मन उनके प्रति कुछ ज़्यादा ‘शंकालु’ हो उठा था!
अद्भुत गद्य ! इसे पढ़कर तर्क पद्धति से लेकर दुनियादारी तक में शिक्षित महसूस कर रही हूँ. यह बात भी याद रह जाती है कि किस तरह शुरू से ही अपनी असहमतियों के साथ मुखरता के खड़े होने के बावजूद गगन जी लेखक और उनके टेक्स्ट के प्रति एक सदाशयता, मित्रवत करुणा और kindness से भरी हैं. हमारे समय के लगातार असक्षम होते जा रहे साहित्यिक परिवेश की तरह उन्हें अपनी बात रखने के लिए लेखक और उनकी किताब को अपमानित करने की ज़रूरत नहीं पड़ती. इस लेख युवा पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है. मैंने तो सीखा ही है 🙏🙏
भारतीय कौन है? भारतीयता क्या है? ऐसे प्रश्न उठाने में क्या तुक है? बड़े चिन्तक, दार्शनिक पूरी मानव जाति को, बल्कि उससे भी आगे मानवेतर प्राणियों को ध्यान में रखकर सोचते, बोलते, लिखते हैं। ऐसे प्रश्न और उनके उत्तर अंततः लोगों को बाँटते हैं, उनके बीच बैर पैदा करते हैं।
टिप्पणियां देख रहा हूं, अधिकतर में गगन जी की भाषा की सराहना है। लेकिन मुझे वह बात महत्वपूर्ण लगी है जो संपादकीय टिप्पणी में कही गयी है। गगन जी ने अपने वक्तव्य को महज अनुष्ठान का अंग बनने से बचाया है। उन्होंने संयत तरीके से अपनी असहमतियां प्रस्तुत की हैं और सच में राजीव जी के सोच का एक प्रतिपाठ सामने रख दिया है। गगन जी का पाठ भारतीयता को बहुलता और अन्य सभ्यताओं की सापेक्षता में देखता है। उन्होंने भारतीयता के आंतरिक अन्तर्विरोधों की ओर सही संकेत किया है। वे बेबाकी से गांधी के इस कथन को जुमला कहती हैं कि आजादी के बाद जातिवाद नहीं रहेगा, सब शूद्र होंगे। गगन जी का संशय गहरा है और यह उतना ही वास्तविक है। उसके सरलीकृत उत्तर नहीं हैं। मुझे इस वक्तव्य से उन्हें और जानने का अवसर मिला। इसके लिए समालोचन का आभार !
लेख इस बात का ख़ुद बयान करता है कि इसे एक अंतर्दृष्टि संपन्न व्यक्ति ने लिखा है। गांधी को अवतार मान लेना दरअसल उस पूरी साधना से पीठ फेर लेना है, जो गांधी ने एक सामान्य किंतु अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित व्यक्ति के रूप में की। यह दरअसल गांधी विचार से पीठ फेर लेना है। गांधी को समझने के लिए उनके अध्यात्म को समझना जरूरी है, जो हिंदुत्व के वर्तमान उभार से बहुत अलग है। और उसे समझे बिना भारतीयता को समझना मुश्किल है। किताब पढ़ी नहीं, इसलिए उस पर टिप्पणी मुश्किल है मगर गांधीवादी बन पाने असमर्थता व्यक्त करती गगन जी शायद गांधी के ज़्यादा क़रीब हैं।
आज समालोचन पर जब यह आलेख पढ़ा,तो इस पर अपनी बात कहने से स्वयं को रोक नहीं पाया। इसे पढ़ते हुए मन में जो विचार उठे ,वे आप के साथ साझा कर रहा हूँ।
कईं दफा ‘भारतीयता’ का प्रश्न केवल सांस्कृतिक पहचान नहीं, बल्कि एक दार्शनिक समस्या भी बन जाता है, जो विश्व-चिन्तन की कई परंपराओं से संवाद करता है।
‘भारतीयता’ और सेल्फहुड का प्रश्न
गगन गिल के इस आलेख से गुजरते हुए ‘कौन है भारतीय?’ अंततः “मैं कौन हूँ?” के दार्शनिक प्रश्न में बदल जाता है। यह वही प्रश्न है जिसे पश्चिम में रेने देकार्त “मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ” के रूप में उठाया, और भारत में उपनिषदों ने “अहं ब्रह्मास्मि” के रूप में।
लेकिन यहाँ एक दिलचस्प फर्क है।अंतर यह है कि देकार्त के यहाँ सेल्फ एक निजी, स्वायत्त चेतना है और भारतीय परंपरा में यही सेल्फ एक संबंधात्मक और व्यापक अस्तित्व है।
गगन गिल इस द्वंद्व के बीच खड़ी हैं। वे न पूरी तरह आधुनिक आत्म हैं, न पारंपरिक। उनका “संशय” दरअसल इसी टूटे हुए सेल्फ की अभिव्यक्ति है जिसे प्रख्यात विचारक चार्ल्स टेलर आधुनिक पहचान संकट कहते हैं।
परंपरा बनाम आधुनिकता: अलेस्डेयर मैकिंटायर की रोशनी में
राजीव वोरा का आग्रह है कि पहचान वही हो सकती है जो “हमारी अपनी परंपरा” से निकली हो। यह विचार बहुत हद तक अलेस्डेयर मैकिंटायर के उस सिद्धांत से मिलता है जिसमें वे कहते हैं कि नैतिकता हमेशा परंपरा आधारित होती है।
लेकिन गगन गिल इस पर एक महत्त्वपूर्ण आपत्ति रखती हैं कि
अगर ज्ञान केवल “अपनी परंपरा” तक सीमित हो, तो फिर मानव सभ्यता का साझा बौद्धिक विकास कैसे संभव हुआ?
यहाँ वे अलेस्डेयर मैकिंटायर से आगे जाकर एक ब्रह्मांडीय ज्ञान मीमांसा की ओर इशारा करती हैं,जहाँ ज्ञान सीमाओं को पार करता है।
ज्ञान का स्वामित्व: मिशेल फूको और शक्ति-संबंध
गगन गिल का यह प्रश्न कि “ज्ञान पर कॉपीराइट कैसे हो सकता है?”इसे अगर फूको की दृष्टि से देखें, तो ज्ञान हमेशा सत्ता-संबंधों से जुड़ा होता है।
राजीव वोरा का कथन “जो हमारी खोज न हो, वह हमारी पहचान नहीं”
दरअसल एक प्रकार का ज्ञानमीमांसीय राष्ट्रवाद है।
गगन गिल इसे तोड़ती हैं और दिखाती हैं कि ज्ञान अपने उत्स और स्वभाव में साझा है।उसका प्रवाह ऐतिहासिक और अंतर-सांस्कृतिक है।
यह दृष्टि फूको के ज्ञान/शक्ति के ढाँचे को चुनौती देती है और उसे मानवीय साझेदारी की दिशा में मोड़ती है।
‘दूसरा’ (Other) और पहचान
लेख में मुसलमानों, दलितों और ‘दूसरे’ समुदायों के प्रति जो संवेदनशीलता है, वह लेविनास की नैतिकता से मेल खाती है।इमैनुएल लेविनास कहते हैं कि दूसरे का चेहरा ही नैतिकता की शुरुआत है।
गगन गिल भी यही कहती दिखती हैं:
“दुश्मन बाहर नहीं, हमारे भीतर है”
मुसलमानों को एक इकाई मानना गलत है। यह दृष्टि पहचान को “हम बनाम वे” के द्वैत से निकालकर एक नैतिक मुठभेड़ में बदल देती है।
इतिहास, स्मृति और पीड़ा: पॉल रिकोअर के बहाने से
गगन गिल 1984 के दंगों, बाबरी मस्जिद, जाति-व्यवस्था को जिस तरह याद करती हैं, वह केवल ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि नैतिक स्मृति है।
रिकोअर के अनुसार,स्मृति केवल याद रखना नहीं, बल्कि नैतिक पुनर्व्याख्या है। गगन गिल का लेख इसी पुनर्व्याख्या की प्रक्रिया है।
जहाँ इतिहास को राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि आत्म-परीक्षण का साधन बनाया गया है।
नैतिकता और साधना
राजीव वोरा संवाद और विचार के माध्यम से परिवर्तन में विश्वास रखते हैं।
गगन गिल इस पर संदेह करती हैं और “नैतिक साधना” की कमी की ओर इशारा करती हैं।
यहाँ एक गहरा दार्शनिक फर्क है। यहाँ आधुनिकता यानी परिवर्तन विचार और संवाद के योग का परिणाम है।वहीं
गांधी के यहाँ परिवर्तन आत्म-परिवर्तन और साधना के योग का परिणाम है।
इस संदर्भ में गगन गिल का झुकाव गांधी की ओर है, लेकिन बिना अंध-स्वीकृति के। वे गांधी को भी प्रश्नांकित करती हैं। यही उनकी आलोचनात्मक ईमानदारी है।
उत्तर-औपनिवेशिक संदर्भ: होमी के भाभा और हाइब्रिडिटी
गगन गिल का सबसे आधुनिक पक्ष यह है कि वे भारतीयता को पूर्णतः “शुद्ध” नहीं मानतीं।यह दृष्टि भाभा के हाइब्रिडिटी सिद्धांत से मेल खाती है।जहाँ पहचान हमेशा मिश्रित, अधूरी और बनने की प्रक्रिया में होती है।इसलिए भारतीयता कोई निश्चित या स्थिर साथ नहीं है बल्कि एक समझौतावादी/वार्तालापशील, विकसित होती पहचान है ।
सार्वभौमिकता बनाम स्थानीयता :
क्वामे एंथनी एपिया का विश्ववाद
गगन गिल जब शून्य, न्यूटन, अहिंसा की बात करती हैं, तो वे एक तरह का रूटेड कॉस्मोपोलिटन यानी जड़ से जुड़े विश्ववाद को प्रस्तावित करती हैं।
एपिया के अनुसार हम अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी वैश्विक हो सकते हैं
गगन गिल इसी संतुलन की तलाश में है
न अंध-राष्ट्रवाद, न अंध-वैश्वीकरण।
अस्तु, अगर पूरे लेख को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समेटें, तो यह तीन बड़े प्रश्न उठाता है। जो क्रमशः इस प्रकार हैं
क्या पहचान विरासत से तय होती है या अनुभव से?
क्या ज्ञान का कोई सांस्कृतिक स्वामित्व हो सकता है?
क्या नैतिक परिवर्तन बिना आत्म-परिवर्तन के संभव है?
स्मरण रहे गगन गिल के इस आलेख की खूबसूरती यह है कि वे इनका अंतिम उत्तर नहीं देतीं,लेकिन उनका आग्रह साफ़ है कि पहचान को सरल मत बनाइए, क्योंकि मनुष्य स्वयं सरल नहीं है।
इसलिए यह आलेख किसी एक परंपरा में फिट नहीं बैठता। यह न पूरी तरह भारतीय है, न पश्चिमी बल्कि दोनों के बीच एक जीवित संवाद है।और शायद यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
यह हमें तैयार उत्तर नहीं देता, बल्कि उस बेचैनी में डाल देता है जहाँ से असली सोच शुरू होती है।
इत्यलम्
श्री राजीव वोरा फ़ेसबुक पर दोस्त थे । कई पहलुओं पर लिखते । दोस्त वैचारिक मतभेद प्रकट करते । तिब्बत पर लिखी इनकी किताब पढ़ी थी । गगन जी की कविताओं का एक संग्रह भी पढ़ा ।
चर्चा में कुछ सवाल उठाए गए ।
मनुष्य अपने तईं कथनी और करनी में अंतर समाप्त कर ले । मुश्किल हैं मगर नामुमकिन नहीं ।
बहुत सुविचारित, तर्कयुक्त और सुगठित अंतरदृष्टि सम्पन्न प्रतिक्रिया.
गगन जी को साधुवाद।
बहुत ही तार्किक और विवेक सम्मत टिप्पणी।गगन जी की ये स्थापनाएँ सर्वथा मौलिक और सोचने को बाध्य करने वाली है।भारतीयता हो या कोई और प्रश्न इन पर गंभीरता से चिंतन मनन करने से ही कुछ आगे बढ़ा जा सकता है।निरे भोले विश्वासों से कुछ होने-हवाना नहीं है।