• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » युद्ध-नायक:श्रीकांत वर्मा

युद्ध-नायक:श्रीकांत वर्मा

by arun dev
May 25, 2026
in कविता
Reading Time: 3 mins read
A A
युद्ध-नायक:श्रीकांत वर्मा
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
युद्ध-नायक
श्रीकांत वर्मा

 

ज़रूरी नहीं था युद्ध में मारा जाना
मगर मैं मारा गया युद्ध में
युद्ध से मतलब युद्ध-भूमि नहीं
बल्कि युद्ध से बच कर
सड़क पर चलते
सैकड़ों सूर्यों के प्रकाश की तरह
एक बम के फटने से
मारा गया मैं.

इसके पहले
कि मैं चीख कर कहता
‘हिरोशिमा अमर है’
मैं मारा जा चुका था.
दबी की दबी रह गयी
चीख.

पीछे कुछ नहीं
केवल स्मृतियाँ हैं
मूर्ति से मूर्ति
मनुष्य से मनुष्य
कविता से कविता
मोहनजोदड़ो से अब तक का
सिलसिला है.
युद्ध की भी एक अटूट श्रृंखला है.

अभी,
कल ही की तो बात है,
ढाका
एक मांस के लोथड़े की तरह
फेंक दिया गया था
दस हज़ार कुत्तों के बीच.

युद्ध कब शुरू हुआ था हिंदचीन में?
हृदय में
दो करोड़ साठ लाख घाव लिये
वियतनाम
बीसवीं शताब्दी के बीच से
गुज़रता है.

अभी,
कल ही की तो बात है
यूरोप
एक युद्ध से निकल कर
दूसरे युद्ध की ओर
इस तरह चला गया था
जैसे कोई नींद में चलता हुआ व्यक्ति.

कुछ भी नहीं होते कुछ हज़ार वर्ष.
कुछ हज़ार वर्षों में
कुछ भी नहीं बना
और कुछ भी नहीं बिगड़ा है, बहुत कुछ बना
और बहुत कुछ बिगड़ा है.

अभी,
कल ही की तो बात है
यहीं,
ठीक इसी जगह,
अंधी आँखों से आँसू बहाते हुए
यही
कहा था धृतराष्ट्र ने,
कि किसी ने नहीं कहा,
‘व्यर्थ है युद्ध’
संजय की बाँह पकड़
हस्तिनापुर की विधवाओं का
विलाप सुन
यही कहा था कौरव-सम्राट ने.

मैं ही हूँ अश्वत्थामा, जिसे नर या कुंजर

मारा जाना है
हर युद्ध में.

मैं ही हूँ ट्रेजेडी का देवता,
दियोनिसस
मैं ही अपोलो.
सीनेट के द्वार खटखटाता हुआ
चीखता हूँ मैं—
सँभलो ! अभी भी समय है !
सीनेट बेख़बर है
सीनेट के सामने समस्या है
एक अरब डालर
हथियारों के लिए कम है या ज़्यादा है?

हूवर से पूछने के बदले
क्यों नहीं पूछते स्वयं स्वतंत्रता की मूर्ति से

क्यों चीखती है वह हर आधी रात को,
‘वियतनाम ! वियतनाम!’

शांति का अर्थ किस भाषा में शांति नहीं?
युद्ध का अर्थ किस भाषा में युद्ध नहीं?
इतना ही है
कि शांति याददाश्त के लिए
मोरपंख की तरह किताबों के बीच रखी हुई है.

युद्ध दस्तक दे रहा है
पृथ्वी की एक-एक सड़क पर
क्या भाग रहा है
मनुष्य
युद्ध पीछा कर रहा है.
बनी है देखने को ताजमहल के बाद
दूसरी इमारत
संयुक्त राष्ट्र संघ—
ऊपरी मंजिल से दीखते हैं
जलते हुए शहर अफ्रीका के, एशिया के,
जैसे
अब भी जल रहा हो पर्सिपोलिस का पुस्तकालय,

चल रहा हो
बाबेरिया में पैदा हुए नात्शियों का दस्ता

सब कुछ उजाड़ता
सब कुछ पर रखता हुआ पैर—

यूरोप,
बड़बड़ा रहा है बुखार में
अमेरिका,
पूरी तरह भटक चुका है अंधकार में
एशिया पर
बोझ है गोरे इंसान का,
संभव नहीं है
कविता में वह सब कह पाना
जो घटा है
बीसवीं शताब्दी में मनुष्य के साथ
कांपते हैं हाथ.

मैं इतना ही कहना चाहता हूँ,
यह दुनिया
यहिया खान के लिए नहीं बनी है.

(धर्मयुग के ३ सितम्बर, १९७२ अंक से आभार सहित)

 

श्रीकान्त वर्मा
जन्म : 18 सितम्बर, 1931; बिलासपुर (म.प्र.)

1955-56 में बिलासपुर से ‘नई दिशा’ का सम्पादन. कुछ दिनों ‘भारतीय श्रमिक’ में उप-सम्पादक. 1958 से 62 तक दिल्ली की विशिष्ट पत्रिका ‘कृति’ का नरेश मेहता के साथ सम्पादन. 1964 से साप्ताहिक ‘दिनमान’ से सम्बद्ध हुए. सन् 1977 में दिनमान से त्यागपत्र.

साहित्य के अलावा राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप. साठ के दशक में डॉ. राममनोहर लोहिया के सम्पर्क में आए. उनके विचार और कर्म से गहरे स्तर पर प्रभावित. डॉ. लोहिया के असामयिक निधन और समाजवादी आन्दोलन के बिखराव के बाद सन् 1969 में श्रीमती इंदिरा गांधी से परिचय और कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय भागीदारी. सन् 1976 में म.प्र. से राज्यसभा के सदस्य. सन् 1980 में कांग्रेस (ई.) के चुनाव अभियान का संचालन. सन् 1985 में कांग्रेस पार्टी के प्रमुख महासचिव और प्रवक्ता.

प्रकाशित प्रमुख कृतियाँ : ‘भटका मेघ’, ‘माया दर्पण’, ‘दिनारम्भ’, ‘जलसाघर’, ‘मगध’, ‘गरुड़ किसने देखा है’, ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ (कविता-संग्रह); ‘झाड़’, ‘संवाद’ (कहानी-संग्रह); ‘दूसरी बार’ (उपन्यास); ‘जिरह’ (आलोचना); ‘अपोलो का रथ’ (यात्रावृत्त); ‘फ़ैसले का दिन’ (आन्द्रेई वोज्नेसेंस्की की कविताएँ) (अनुवाद); ‘बीसवीं शताब्दी के अँधेरे में’ (साक्षात्कार और वार्तालाप); ‘श्रीकान्त वर्मा रचनावली’ में आपकी सम्पूर्ण रचनाएँ शामिल हैं.

सम्मान : म.प्र. शासन द्वारा ‘उत्सव-73’ में विशिष्ट लेखन के लिए सम्मानित. ‘जलसाघर’ के लिए ‘तुलसी सम्मान’, म.प्र. शासन का प्रथम ‘शिखर सम्मान’, ‘कुमार आशान’, ‘यूनाइटेड नेशंस इंडियन काउंसिल ऑफ़ यूथ अवार्ड’, ‘नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार’, ‘इंदिरा प्रियदर्शिनी सम्मान’, ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ आदि से सम्मानित.

फ़रवरी 86 में अस्वस्थ. कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका गए. 25 मई, 1986 को अमेरिका के स्लोन केटरिंग मेमोरियल अस्पताल में निधन.

मनोज मोहन

 

 

 

 

 

मनोज मोहन वरिष्ठ पत्रकार व लेखक. वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति के सहायक संपादक. इन दिनों सीएसडीएस की आर्काइव परियोजना के अंतर्गत आज़ादी से दशक भर पहले से लेकर सातवें-आठवें दशक की हिंदी पत्रिकाओं के आलेखों, कविताओं और कहानियों के दस्तावेज़ीकरण जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं.

manojmohan2828@gmail.com

Tags: 20262026 कवितामनोज मोहनयुद्ध-नायकश्रीकांत वर्मा
ShareTweetSend
Previous Post

एक ख़ुशबू वहाँ फैली थी : निशांत उपाध्याय

Next Post

जब जवाहरलाल नेहरू ने संभाली इलाहाबाद की कमान : शुभनीत कौशिक

Related Posts

डेटा नॉट फाउंड : विजयशंकर चतुर्वेदी
कथा

डेटा नॉट फाउंड : विजयशंकर चतुर्वेदी

शिंजिनी की कविताएँ
कविता

शिंजिनी की कविताएँ

ताइवान ट्रैवलॉग:2026 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार:सरिता शर्मा
आलेख

ताइवान ट्रैवलॉग:2026 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार:सरिता शर्मा

Comments 2

  1. पीयूष कुमार says:
    3 weeks ago

    दुनिया कुल मिलाकर हमेशा ही ऐसे ही रही है… संत्रासपूर्ण. सोलंकी कभी-कभी वह सभ्य बन सका. युद्ध का फैसला कोई व्यक्ति करता है, उसकी लड़ाई अब आम आदमी लड़ने लगा है. ग्लोबलाइजेशन का यह फायदा मिला. युद्ध का विकेंद्रीकरण हुआ.
    श्रीकांत वर्मा ने उसे समय तत्कालीन संदर्भों और इतिहास को लेकर हमारे आज को रख दिया है. यह विडंबना ही है कि उनका पुत्र हथियारों का बड़ा सौदागर है.

    Reply
  2. शैफाली चौबे says:
    3 weeks ago

    इन्हीं कविताओं को आज भी जी रहा है समाज। मजबूर है युद्ध की पताका को फहराने की होड़ में।

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक