| यूनुस एमरे की कविताएँ सरिता शर्मा |
यूनुस एमरे प्रसिद्ध तुर्की कवि और सूफी संत थे. उनका जन्म 1238 में हुआ और मृत्यु 1320 में हुई थी. उनके जीवन के विषय में बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. यूनुस एमरे ने अनातोलिया की संस्कृति और तुर्की साहित्य पर गहरा प्रभाव डाला है. उन्होंने सूफी संत ताप्तुक एमरे के पास 40 वर्ष तक रह कर कड़ी मेहनत करते हुए ज्ञान प्राप्त किया था. यूनुस एमरे ने फ़ारसी या अरबी के बजाय अपने समय और क्षेत्र की बोलचाल वाली तुर्की भाषा में लिखा, इसलिए उनकी भाषा-शैली मध्य और पश्चिमी अनातोलिया में उनके समकालीनों की आम बोलचाल के बहुत करीब है. यह कई गुमनाम लोक-कवियों, लोक-गीतों, परियों की कहानियों, पहेलियों और कहावतों की भाषा भी है. यूनुस एमरे की कविताएं सरल प्रतीत होने के बावजूद जटिल आध्यात्मिक अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती हैं. वे मुख्य रूप से ईश्वरीय प्रेम के साथ-साथ इंसानी किस्मत से जुड़ी हुई हैं.
यूनुस एमरे की मुलाकात रूमी से भी हुई थी. रूमी ने उनसे कहा,
“हर उस दिव्य पड़ाव पर, जहाँ मैं पहुंचा, मैंने अपने आगे एक महान तुर्की व्यक्ति के पदचिह्न देखे.”
यूनुस एमरे ने कहा,
“मैंने स्वयं को हाड़-मांस के रूप में छिपाया और यूनुस बन कर सामने आया.”
यह सुन कर रूमी मुस्कुराए
“हमने इसे (मसनवी में) बहुत सारे शब्दों में समझाया. यूनुस ने इसे एक वाक्य में बयान कर दिया है.”
यूनेस्को की जनरल कॉन्फ्रेंस ने एकमत से प्रस्ताव पास किया, जिसमें 1991 में कवि के जन्म की 750वीं सालगिरह को “इंटरनेशनल यूनुस एमरे ईयर” घोषित किया गया. यूनुस एमरे के जीवन पर मेहमत बाजदेग ने तुर्की ऐतिहासिक ड्रामा टीवी सीरीज़ ‘यूनुस एमरे: जर्नी ऑफ़ लव’ बनाया है जिसमें यूसुफ़ गोखान अताले ने मुख्य भूमिका निभाई है. यूनुस एमरे के जीवन पर फिल्म भी बन चुकी है.
आज के उथल पुथल भरे समय में यूनुस एमरे की प्रेम और आपसी सौहार्द की कविताएं दिलों को सुकून देती हैं.
सरिता शर्मा

1
ईश्वर इस पूरे विशाल संसार में समाया हुआ है.
फिर भी, उसका सत्य किसी पर प्रकट नहीं हुआ है.
बेहतर होगा कि तुम उसे अपने भीतर ही खोजो.
तुम और वह अलग नहीं हो—तुम दोनों एक ही हो.
दूसरा संसार हमारी दृष्टि से परे है.
नश्वर शरीर की कामनाओं से मुक्त आत्मा;
मुझे अपने दोनों हाथों में अपना सिर छिपा लेने दो,
एकत्व का मार्ग अपना कर आगे बढ़ने दो.
ईश्वर का शुक्र है, मैंने प्रिय का सुंदर मुख देखा
और प्रेमियों के आलिंगन की मदिरा का पान किया.
यह मुझे तुमसे अलग करता है—यह शर्म की बात है;
मैं इस नगर को त्याग कर आगे बढ़ जाऊंगा.
यूनुस प्रेम की पीड़ा की कसक में बह रहा है:
समस्त दुखों में से, उसका दुख सहना सबसे कठिन है.
मेरी व्यथा का उपचार केवल तुम्हारे पास है,
मैं उस औषधि की याचना करूंगा और आगे बढ़ जाऊंगा.
2
हे ईश्वर, यदि तुम कभी मुझसे कोई प्रश्न पूछोगे,
तो मेरा तुम्हें सीधा सा उत्तर यही होगा:
यह सच है, मैंने पाप किया—अपने ही अस्तित्व को कलंकित किया,
किंतु हे मेरे स्वामी, तुम्हारे विरुद्ध मैंने ऐसा क्या किया है?
क्या मैंने स्वयं को बनाया? मैं तो तुम्हारी ही रचना हूँ.
फिर हे कृपालु, मुझे पाप में क्यों डुबो दिया?
जब मैंने अपनी आँखें खोलीं, तो मुझे केवल कारागार दिखाई दिए—
शैतानों, प्रलोभनों और झूठ से भरे हुए.
भूख से होने वाली मृत्यु से बचने के लिए, कई बार,
उस कारागार में, मुझे धूल और गंदगी भी खानी पड़ी.
क्या तुम्हारे साम्राज्य में कोई कमी आ गई?
क्या मैंने तुम्हारी किसी भी शक्ति को हड़प लिया?
क्या तुम्हें भूख लगी है? क्या मैंने तुम्हारा भोजन खा लिया?
क्या मैंने तुम्हें वंचित किया, या तुम्हें भूखा रखा?
क्या तुम अब भी बदला लेना चाहते हो, जबकि तुमने मुझे मार ही डाला है?
क्योंकि मैं सड़-गल गया हूँ, क्योंकि मैं अंधकारमय मिट्टी में समा गया हूँ.
तुमने मेरे पार उतरने के लिए एक पुल बनाया है—जो बाल से भी अधिक महीन है;
तुम्हारे ही बिछाए हुए जालों में से, मुझे अपना फंदा स्वयं चुनना है.
कोई मनुष्य भला बाल-जितने महीन पुल को कैसे पार कर सकता है?
वह या तो नीचे गिर जाता है, या उससे लिपटा रहता है, अथवा उस कगार से उड़ कर दूर चला जाता है.
तुम्हारे सेवक जन-कल्याण के लिए पुलों का निर्माण करते हैं,
और जो उन पुलों को पार कर लेते हैं, वे ईश्वरत्व की ओर अग्रसर हो जाते हैं.
मेरी कामना है कि उस पुल की नींव इतनी सुदृढ़ हो कि वह अडिग रहे,
ताकि जो लोग उसे पार करें, वे जान सकें कि यही एकमात्र सच्चा मार्ग है.
तुमने कर्मों को तौलने के लिए एक तराजू बनाया है, क्योंकि तुम्हारा उद्देश्य
मुझे नरक की दहकती हुई ज्वालाओं में झोंक देना है.
तराजू तो किसी पंसारी के लिए उपयुक्त होता है,
किसी छोटे व्यापारी अथवा किसी जौहरी के लिए.
हालांकि पाप सबसे घृणित और खराब बुराई है,
यह उन लोगों की प्राप्ति है, जो ईश्वर की कृपा के अयोग्य हैं.
तुम सब कुछ देख सकते हो, तुम मुझे भली-भांति जानते हो;
फिर, मेरे इन समस्त कर्मों को तौलने की तुम्हें क्या आवश्यकता है?
यूनुस की ओर से तुम्हें कभी कोई हानि नहीं पहुंची;
चाहे कोई बात प्रत्यक्ष हो या गुप्त—सब कुछ तुम्हारी ही दृष्टि में है.
हे सर्वशक्तिमान ईश्वर, ये सारी व्यर्थ की बातें क्यों?
हम मुट्ठी भर धूल के बारे में इतनी बातें क्यों करें?
3
मैं पहले भी था, मैं बाद में भी रहूंगा
सभी आत्माओं के लिए, हर पल, मैं ही आत्मा हूँ.
मैं ही हूँ वह, जिसका हाथ मदद के लिए उठता है
जो राह से भटक गए हैं, बेकाबू हो गए हैं, मैं उनके लिए तत्पर हूँ.
मैंने ही इस धरती को समतल बनाया है, जहाँ यह फैली हुई है,
इसी पर मैंने ऊँचे पहाड़ बनाए,
मैंने ही इस विशाल आसमान की छत बनाई,
क्योंकि हर चीज़ पर मेरा नियंत्रण है.
असंख्य प्रेमियों के लिए मैं ही रहा हूँ
उनके विश्वास और धर्म का मार्गदर्शक.
मनुष्यों के हृदय में मैं ही वह पाप भी हूँ
और मैं ही सच्चा विश्वास और इस्लाम का मार्ग भी हूँ.
मैं ही मनुष्यों को शांति से प्रेम करना और एकजुट होना सिखाता हूँ;
सफेद पन्नों पर काले अक्षरों को उकेरते हुए,
मैंने ही उन चारों पवित्र ग्रंथों को लिखा है
जो लोग प्रार्थना करते हैं, उनके लिए मैं ही कुरान हूँ.
यह सब कहने वाला यूनुस नहीं है:
बल्कि यह तो स्वयं अपनी सच्चाइयों को व्यक्त कर रहा है:
इस बात पर संदेह करना ईश्वर-निंदा के समान होगा:
“मैं पहले भी था—मैं बाद में भी रहूंगा,” मैं यही कहता हूँ.
4
ज्ञान का अर्थ होना चाहिए ज्ञान की पूर्ण समझ:
ज्ञान का अर्थ है स्वयं को जानना—अपने हृदय और आत्मा को.
यदि तुम स्वयं को न समझ सके,
तो तुम्हारा सारा पढ़ना-लिखना व्यर्थ गया.
उन किताबों को पढ़ने का क्या उद्देश्य है?
ताकि मनुष्य सर्वशक्तिमान को जान सके.
यदि तुमने पढ़ा, पर समझ न पाए,
तो तुम्हारे सारे प्रयास केवल निष्फल श्रम हैं.
पढ़ने-लिखने या विज्ञान में महारत होने का घमंड मत करो,
न ही अपनी सारी प्रार्थनाओं और नमन का.
यदि तुम मनुष्य में ईश्वर को नहीं पहचानते,
तो तुम्हारी सारी विद्या बिल्कुल बेकार है.
चार पवित्र ग्रंथों का सच्चा अर्थ,
वर्णमाला के पहले अक्षर में ही निहित है.
हे उपदेशक, तुम उस पहले अक्षर की बात तो करते हो;
पर क्या तुम मुझे बता सकते हो कि उसका अर्थ क्या है?
यूनुस एमरे तुमसे कहता है, हे धर्म का दिखावा करने वाले,
यदि आवश्यक हो तो पवित्र तीर्थयात्रा करो—
चाहे सौ बार ही क्यों न करनी पड़े—पर यदि तुम मुझसे पूछो,
तो किसी के हृदय की यात्रा करना ही सबसे उत्तम है.
5
तुम्हारे प्रेम ने मुझे मुझसे ही छीन लिया है,
तुम्हीं हो जिसकी मुझे ज़रूरत है, तुम्हीं हो जिसकी मुझे चाह है.
दिन-रात मैं जलता हूँ, पीड़ा की गिरफ़्त में,
तुम्हीं हो जिसकी मुझे ज़रूरत है, तुम्हीं हो जिसकी मुझे चाह है.
जीवित रहने में मुझे कोई बड़ा आनंद नहीं मिलता,
यदि मेरा अस्तित्व समाप्त भी हो जाए, तो मुझे कोई शोक न होगा,
मेरी एकमात्र सांत्वना तुम्हारा प्रेम ही है,
तुम्हीं हो जिसकी मुझे ज़रूरत है, तुम्हीं हो जिसकी मुझे चाह है.
प्रेमी तुम्हारी चाह करते हैं, पर तुम्हारा प्रेम उन्हें मार डालता है,
समुद्र की गहराइयों में उन्हें सुला देता है,
इसमें ईश्वर की छवियाँ हैं—यह उन्हें प्रदर्शित करता है;
तुम्हीं हो जिसकी मुझे ज़रूरत है, तुम्हीं हो जिसकी मुझे चाह है.
मुझे प्रेम की मदिरा घूँट-घूँट पीने दो,
मजनूँ की तरह, मैं पहाड़ों में कठिनाइयों से रहता हूँ,
दिन-रात, तुम्हारी फ़िक्र मुझे अपनी गिरफ़्त में रखती है,
तुम्हीं हो जिसकी मुझे ज़रूरत है, तुम्हीं हो जिसकी मुझे चाह है.
भले ही, अंत में, वे मुझे मृत्यु दे दें
और मेरी राख को आकाश में बिखेर दें,
मेरी समाधि से भी यही पुकार उठेगी:
तुम्हीं हो जिसकी मुझे ज़रूरत है, तुम्हीं हो जिसकी मुझे चाह है.
“यूनुस एमरे—रहस्यवादी” मेरा नाम है,
हर गुज़रता दिन मेरी लौ को और भड़काता और जगाता है,
दोनों लोकों में मेरी इच्छा एक ही है:
तुम्हीं हो जिसकी मुझे ज़रूरत है, तुम्हीं हो जिसकी मुझे चाह है.

6
अगर मेरा मित्र मेरे पास लौट कर नहीं आता,
तो मुझे ही मित्र के आलिंगन में लौट जाने दो;
मैं हर तरह का दर्द और यातना सहने को तैयार हूँ,
अगर ऐसा करके मैं मित्र का चेहरा देख सकूं.
मुट्ठी भर धूल ही मेरी जमा-पूंजी थी,
और प्रेम ने वह भी मुझसे छीन ली:
अब न मेरे पास कोई पूंजी बची है, न कोई दुकान.
फिर बाज़ार जाने का क्या फ़ायदा?
मित्र की अपनी एक सुंदर दुकान है, जो बड़े सलीके से सजी है;
वह बड़े हर्ष के साथ उस दुकान में घूमता है.
लेकिन मेरा हृदय सिकुड़ जाता है, मेरे पाप अनगिनत हैं;
अत्यंत विनम्रता के साथ मुझे जाकर मित्र की कृपा की याचना करनी होगी.
मेरा दिल कहता है: ‘मित्र मेरा है.’
मेरी आँख कहती है: ‘मित्र मेरा है.’
मेरा दिल मेरी आँखों को धैर्य रखने को कहता है,
वह मित्र का कोई समाचार पाने को, और उसके साथ चलने को आतुर है.
हमें उन लोगों को स्वीकार करना चाहिए, जिन्होंने
ईश्वर को—ईश्वर के जीवन में साझीदार के रूप में—एक ही सत्ता के रूप में देखा है.
यदि किसी व्यक्ति को
ईश्वर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो गया, तो वह हर अपमान से परे है.
7
हमें कुछ पता नहीं कि किसकी बारी आ गई है,
जबकि मृत्यु हमारे बीच आज़ादी से घूम रही है:
इंसानों की ज़िंदगी में ऐसे घुसती है जैसे अपना ही बाग़ हो,
और जिसे चाहे, उसे खींच कर, छीन कर ले जाती है.
वह लोगों को कुचल देती है, उनकी कमर झुका देती है,
और अनगिनत लोगों को विलाप के आँसू बहाने पर मजबूर कर देती है.
वह अपनी मर्ज़ी से धन-दौलत लूट लेती है,
और अपनी पूरी ताक़त से इंसानों को तब तक हराती है, जब तक कि जीवन खत्म न हो जाए.
इससे पहले कि नायक बूढ़े और कमज़ोर पड़ें,
मृत्यु वार करती है और उन्हें कब्र में उतार देती है,
बिना किसी पहले से दी गई चेतावनी के.
चमकती आँखों के साथ, मृत्यु अपनी चालों का आनंद लेती है.
8
जब मैं इस विशाल दुनिया में घूम रहा था
तो मुझे कब्रों में दफ़न राष्ट्र मिले:
वहाँ ताकतवर और विनम्र, दोनों लेटे थे
और उनके बीच थे, विस्मयकारी वीर.
कुछ बूढ़े थे, कुछ जवान नायक:
वज़ीर, शिक्षक—हर किसी को जाना है;
उनके दिन अब रात के आगोश में समा गए हैं,
यहाँ वे मृत्यु के अन्य गुलामों के साथ लेटे हैं.
उन्होंने जो राह चुनी, वह हमेशा सीधी थी;
हाथ में कलम लिए, वे लिखना जानते थे;
उनकी ज़बानें, बुलबुलों की तरह, मधुर गीत गाती थीं;
वे दफ़न हैं— संत और वीर.
शक्तिशाली और दीन-हीन, हर कोई रोया
जब ये वीर अधिनायक चल बसे;
हर कब्र के सिरहाने एक टूटा हुआ धनुष पड़ा था
बहादुर लोग, भटके हुए तीरों की तरह, गिर पड़े थे.
उनके घोड़ों ने धूल का बादल उठा दिया था,
ढोल बजाते हुए ढोलची उनके साथ चलते थे,
उनकी शक्ति ने ज़मीन और समुद्र, दोनों को गौरवान्वित किया था;
वे कुलीन स्वामी अब मृत्यु की गुफाओं में लेटे हैं.
9
मेरी बात सुनो, मेरे प्यारे दोस्तो,
प्रेम सूरज जैसा होता है.
जिस दिल में प्रेम नहीं होता,
वह पत्थर के सिवा कुछ नहीं.
पत्थर जैसे दिलों पर क्या उग सकता है?
भले ही ज़बान शुरू में नरमी से बोले,
शब्द ज़हर बन कर निकलते हैं, गुस्सा और नफ़रत फैलाते हैं,
और जल्द ही लड़ाई का रूप ले लेते हैं.
जब प्रेम होता है, तो आत्मा जल उठती है,
मोम की तरह पिघल जाती है, भीतर ही भीतर मथती है.
पत्थर जैसे दिल सर्दियों की तरह होते हैं
अंधेरे, कठोर, और सारी गरमाहट से खाली.
ईश्वर के सत्य को जानने वाले लोग सागर के समान हैं,
प्रेमियों को उस सागर में गोता लगाना चाहिए;
संतों को भी उसमें डुबकी लगानी चाहिए,
ताकि वे सबसे अनमोल रत्न बाहर ला सकें.
हम उन ज्ञानी पुरुषों में बदल गए हैं,
जो गहराई में जाकर फिर से मोती खोजते हैं;
केवल जौहरी ही जान सकता है,
कि वे मोती कितने कीमती हो सकते हैं.
मोहम्मद ईश्वर को जानने के लिए आए,
और उन्होंने ईश्वर के सत्य को अपने ही अस्तित्व में देखा.
ईश्वरीय कृपा हर जगह मौजूद है,
बस देखने वाली आँखें होनी चाहिए.
किताबें संतों द्वारा लिखी जाती हैं,
जो सफ़ेद पन्नों पर काले शब्द उकेरते हैं;
मेरी पवित्र किताब के सारे अध्याय,
उन दिलों में लिखे हैं जो सच्चा प्रेम करते हैं.
10
अगर मैं अपना चेहरा ज़मीन पर रगडूं,
तो मेरा नया चाँद आसमान में उग आएगा,
सर्दी और गर्मी, दोनों ही बसंत बन जाएंगे.
मेरे लिए तो हर दिन उत्सव का दिन है.
कोई भी बादल, मेरे चाँद की चमकती रोशनी पर
अपनी लंबी परछाई न डाले
उसकी पूर्णता कभी भी धुंधली नहीं पड़नी चाहिए:
ज़मीन से लेकर आसमान तक, उसकी जगमगाहट फैलती है.
दिल की एकांत कोठरी से,
उसकी चमक सारे अंधेरे को बाहर भगा देती है.
भला वह उदासी कैसे समा सकती है,
उस कोठरी में, जहाँ ये तीखी किरणें मौजूद हैं?
मैं अपने चाँद को यहीं, इसी धरती पर देखता हूँ,
मुझे सारे आसमानों की क्या ज़रूरत?
मुझ पर तो दयालुता की बारिश बरसती है,
ठीक इसी ज़मीन से, जहाँ मेरी नज़रें टिकी हैं.
क्या हुआ अगर यूनुस एक प्रेमी है?
ईश्वर के तो अनगिनत प्रेमी हैं.
यूनुस भी अपना सिर झुकाता है, क्योंकि
ईश्वर के प्रेमी तो सदा प्रदीप्त रहते हैं.

11
प्रिय मित्र, मुझे प्रेम के सागर में डूब जाने दो,
मुझे उस सागर में समा जाने दो और आगे बढ़ने दो.
दोनों लोक मेरा क्षेत्र बन जाएं, जहाँ मैं
रहस्यमयी आनंद में मग्न हो कर आगे बढ़ सकूं.
मुझे वह बुलबुल बन जाने दो जो गाती है
नश्वर शरीर की कामनाओं से मुक्त आत्मा;
मुझे अपने दोनों हाथों में अपना सिर छिपा लेने दो,
एकत्व का मार्ग अपना कर आगे बढ़ने दो.
ईश्वर का शुक्र है, मैंने प्रिय का सुंदर मुख देखा
और प्रेमियों के आलिंगन की मदिरा का पान किया.
यह मुझे तुमसे अलग करता है—यह शर्म की बात है;
मैं इस नगर को त्याग कर आगे बढ़ जाऊंगा.
यूनुस प्रेम की पीड़ा की कसक में बह रहा है:
समस्त दुखों में से, उसका दुख सहना सबसे कठिन है.
मेरी व्यथा का उपचार केवल तुम्हारे पास है,
मैं उस औषधि की याचना करूंगा और आगे बढ़ जाऊंगा.
12
मैं ईश्वर के लिए तरसता था;
अगर मैंने उसे पा लिया, तो क्या?
दिन-रात मैं आँसू बहाता था;
अगर अब मैं हँसता हूँ, तो क्या?
मैं उस गेंद के समान था जो लुढ़क रही थी
धर्मगुरुओं के मैदान में;
अब मैं एक बल्ला हूँ
सुल्तान के मैदान में, तो क्या?
लाल गुलाबों का एक गुच्छा था मैं
संतों की सभा में,
मैं खिला, पका और बड़ा हुआ;
अगर मैं मुरझा गया, तो क्या?
विद्वानों और ज्ञानी पुरुषों ने
इसे पावन पाठशालाओं में पाया;
मैंने उस परम सत्य को पाया
सराय में, तो क्या?
13
सच्चा इंसान वही है जो रहस्यमय जीवन जीता है
जो भी इंसान है, जो हिम्मत रखता है.
जो लोग ऊँचे खड़े होकर नीचे वालों को तिरस्कार से देखते हैं
वे सीढ़ियों की ऊँचाई से गिरने के लिए ही बने हैं.
भले ही सफ़ेद दाढ़ी वाला कोई बूढ़ा इंसान कितना भी भव्य दिखे,
ऐसी बहुत सी बातें हैं जो वह नहीं समझता,
उसे पवित्र स्थान पर जाने का संघर्ष नहीं करना चाहिए
अगर वह किसी एक दिल को आँसुओं की आग में जलाता है.
बहरा इंसान वह नहीं सुन सकता जो लोग कहते हैं,
वह सोचता है कि रात है, जबकि सबसे चमकदार दिन होता है,
नास्तिक की आँखें ईश्वर के मार्ग के प्रति अंधी होती हैं
भले ही पूरी दुनिया चमक और दमक रही हो.
प्रेमी का हृदय ही सृष्टिकर्ता का सिंहासन है.
ईश्वर इसकी सराहना करता है और इसे अपना मानता है,
जो इंसान किसी का दिल तोड़ता है, वह कराहेगा और विलाप करेगा
दोनों लोकों में, दुखों और चिंताओं को झेलता हुआ.
तुम्हारी अपनी नज़रों में तुम्हारी अपनी एक छवि है,
यह निश्चय करो कि तुम दूसरों को भी उसी रूप में देखो.
सभी चारों पवित्र पुस्तकें इस बात को स्पष्ट करती हैं
यह सत्य इंसान के मामलों पर भी लागू होता है.
हमने यह सब देखा है: जो आए, वे चले गए.
जो लोग कभी यहाँ रुके थे, वे एक-एक करके वापस चले गए;
उसने ज़रूर प्रेम की मदिरा पी होगी, अगर कोई भी
उस यथार्थ को महसूस करता है जिसे ईश्वर का सत्य उजागर करता है.
14
इस पूरी विशाल दुनिया के सभी लोग उसी की आराधना करते हैं, जिसकी हम करते हैं;
हम किसी को प्रवेश से कैसे रोक सकते हैं, यह तो एक राह है, या फिर खुला दरवाज़ा?
हम जो कुछ भी, या जिसे भी प्रेम करते हैं, हमारा प्रिय भी उसी से प्रेम करता है;
क्या हमारे मित्र के मित्र के मन में कोई संदेह या घृणा का भाव हो सकता है?
यदि तुम सच्चे प्रेमी हो, तो मित्र के मित्र से मित्रता करो;
यदि तुम वैसे ही बने रहते हो जैसे तुम हो, तो तुम अपने मित्र के प्रति अन्याय करोगे.
यदि तुम सचमुच प्रेम करते हो, तो समस्त राष्ट्रों के लिए स्वयं को समर्पित कर दो;
ताकि प्रेमियों के समूह में तुम्हें एक निष्ठावान प्रेमी के रूप में देखा जाए.
यदि तुम ईश्वर के सच्चे प्रेमी हो, तो वह तुम्हारे लिए द्वार खोल देगा;
अपने अहंकार का त्याग करो, और अपने स्थूल अहम् को जड़ से उखाड़ फेंको.
नेता और अनुयायी, विनम्र और विद्रोही—ये सभी ईश्वर के दास हैं;
तुम किसी मनुष्य से यह कैसे कह सकते हो: “अपना घर छोड़ो, वहाँ से बाहर निकलो.”
जो सत्य यूनुस जानता है, वह छिपे हुए खजाने से मिला शब्द है:
मित्र के प्रेमी इस लोक या परलोक—किसी की भी परवाह नहीं करते.
15
मेरा क्षणभंगुर जीवन आया और चला गया,
एक हवा की तरह जो बहती है और गुज़र जाती है.
मुझे लगता है कि यह बहुत ही छोटा रहा,
पलक झपकने जितना.
इस सच्ची बात की गवाही ईश्वर देगा:
आत्मा शरीर की मेहमान है,
किसी दिन यह सीने को खाली कर देगी,
जैसे पिंजरों से आज़ाद होकर पंछी उड़ जाते हैं.
मेरे प्यारे दोस्त, जीवन की तुलना,
उस ज़मीन से की जा सकती है जिसे किसान जोतता है:
मिट्टी पर चारों ओर बिखरे हुए,
कुछ बीज अंकुरित होते हैं, पर कुछ मर जाते हैं.
यदि तुम किसी बीमार व्यक्ति से मिलने जाते हो
जिसे देखभाल की ज़रूरत है और उसे पानी देते हो,
तो ईश्वर की मदिरा के साथ, वह वहाँ तुम्हारा स्वागत करेगा,
किसी दिन, जब तुम आसमान की ओर उड़ान भरोगे.
16
मेरे दिल को चीर डालो, हाँ, चीर डालो;
और देखो इसके भीतर क्या-क्या है.
इस भीड़ वाली दुनिया में
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हमारा मज़ाक़ उड़ाते हैं.
यह रास्ता छल से भरा है:
यह बहुत लंबा है, और इसके पड़ाव भी बहुत बड़े हैं;
इस पर रुकावटें इतनी हैं कि कहीं कोई जगह नहीं बचती;
और यह गहरे पानी की ओर ले जाता है.
हम इस रास्ते पर निकल पड़े हैं
हर दिल में सच्चा प्यार लिए हुए,
लेकिन उन्होंने हमें अलग-थलग कर दिया है;
और अब हमारा यह निर्वासन तड़पा रहा है.
जिनमें सचमुच हिम्मत हो,
वे उस अखाड़े में कदम रखें,
जहाँ विजेताओं को इस बात की कोई परवाह नहीं होती
कि उनकी ज़िंदगी खत्म हो जाए या बनी रहे.
यूनुस के मन में उस अखाड़े में उतरने की
कोई चाहत नहीं है,
जहाँ असली नायक
हमारे सामने अपनी पूरी ताकत के साथ आते हैं.

17
मैं सोचता हूँ—क्या यहाँ कोई है
जो मेरी तरह ही अकेला और बेसहारा अजनबी हो?
जिसका दिल ज़ख्मी हो, जिसकी आँखें आँसुओं से भरी हों
ऐसा अजनबी, जो मेरी तरह ही अकेला हो?
काश, कोई भी मेरी तरह अकेला न हो
या निर्वासन की पीड़ा में न तड़पे.
गुरुवर, मैं आशा करता हूँ कि कोई भी न हो
मेरी तरह ही अकेला अजनबी.
वे कहेंगे, “वह मर गया. वह उदास अजनबी.”
तीन दिन बाद यह ख़बर सुन कर,
वे मेरे शव को ठंडे पानी से नहलाएंगे
उस अजनबी को, जो मेरी तरह ही अकेला था.
यूनुस को न कोई मदद मिलती है, न कोई दया.
उसकी विपत्ति का कोई इलाज नहीं,
वह एक शहर से दूसरे शहर भटकता फिरता है
वह अजनबी, जो मेरी तरह ही अकेला और बेसहारा है.
18
अगर तुम किसी सच्चे आस्तिक का दिल एक बार तोड़ते हो,
तो यह नमन ईश्वर के लिए कोई प्रार्थना नहीं,
दुनिया के बहत्तर के बहत्तर राष्ट्र भी मिल कर,
तुम्हारे हाथों और चेहरे से वह दाग नहीं धो सकते.
यहाँ कई संत-महात्मा हुए हैं—वे आए और चले गए.
अपनी दुनिया को पीछे छोड़ कर, वे आगे बढ़ गए.
उन्होंने अपने पंख फड़फड़ाए और उस सच्चे ईश्वर की ओर उड़ चले,
हंसों की तरह नहीं, बल्कि स्वर्ग के पक्षियों की तरह.
सच्चा मार्ग कभी भटकता नहीं,
असली नायक ऊँचाइयों पर चढ़ने की परवाह नहीं करता,
जो आँख ईश्वर को देख सके, वही सच्ची आँख है,
न कि वह आँख जो किसी ऊँचे स्थान से नीचे घूरती हो.
अगर तुमने कभी न भटकने वाले मार्ग का अनुसरण किया हो,
अगर तुमने किसी नायक का हाथ थामा हो, जब वह तेजी से आगे बढ़ रहा हो,
अगर अच्छे कर्म करना ही तुम्हारा नैतिक सिद्धांत रहा हो,
तो तुम्हें अनेक मिलेंगे—कम नहीं.
ये वे मार्मिक सत्य हैं जिन्हें यूनुस बतलाता है,
जहाँ मक्खन और शहद का मिश्रण घुल-मिल जाता है,
वह नमक नहीं, बल्कि आभूषण बेचता है
और यही वस्तुएं वह लोगों में बांटता है.
19
जाओ और सभी प्रेमियों को यह बता दो:
मैं वह इंसान हूँ जिसने अपना दिल प्रेम को सौंप दिया.
मैं जुनून की जंगली बत्तख बन जाता हूँ,
मैं ही वह हूँ जो सबसे तेज़ गोता लगाता है.
समुद्र की लहरों से मैं जल लेता हूँ
और उसे आसमानों तक पहुंचाता हूँ.
आराधना में, मैं बादल की तरह, ऊपर उठता हूँ;
मैं ही वह हूँ जो स्वर्ग की ऊँचाइयों तक उड़ता है.
जो कहता है कि वह देखता है, वह नहीं देखता, भले ही वह कसम खाए;
वह इंसान नहीं जानता, भले ही वह जानने का दावा करे.
केवल वही एक ईश्वर है जो जानता भी है और दिखाता भी है.
मैं वह इंसान हूँ जो प्रेम का दास बन गया है.
सच्चे प्रेमियों के लिए, यह धरती ही स्वर्ग है;
जो जानते हैं, उन्हें यहाँ आलीशान महल और हवेलियां मिलती हैं;
मूसा की तरह, विस्मय और आराधना से भरा हुआ,
मैं सिनाई पर्वत पर रहता हूँ, जहाँ मैं फलता-फूलता हूँ.
मेरा नाम यूनुस है, मैं अपने होश-हवास खो चुका हूँ.
प्रेम ही अंत तक मेरा मार्गदर्शक बना रहता है.
बिल्कुल अकेला, उस महान मित्र की ओर,
मैं ज़मीन को चूमते हुए चलता हूँ—और अंततः पहुंच जाता हूँ.
20
जिसे भी दरवेश का मार्ग मिला हो,
उसका दिखावा समाप्त हो जाए और वह दमक उठे.
उसकी साँस कस्तूरी और कहरुवा बन जाए.
समूचे शहर और वतन
उसकी डालियों से फल प्राप्त करें.
उसके पत्ते बीमारों के लिए औषधीय जड़ी-बूटियां बन जाएं.
उसकी छाया में अनेक शुभ कार्य संपन्न हों.
उसके आँसू निर्मल झील बन जाएं.
उसके पैरों की उंगलियों के बीच पत्तियां उग जाएं.
और मित्र के उपवन में,
समस्त कवियों और बुलबुलों के बीच,
यूनुस एक तीतर की भाँति उछलता फिरे.
21
अगर मैं तुम्हें प्रेम की भूमि के बारे में बताऊं,
मित्र, क्या तुम मेरे पीछे-पीछे आओगे?
उस भूमि में अंगूर के बाग हैं
जिनसे जानलेवा मदिरा बनती है
कोई भी प्याला उसे थाम नहीं सकता.
क्या तुम उसे औषधि की तरह पी लोगे?
वहाँ लोगों को कष्ट सहना पड़ता है.
क्या तुम दूसरों को सबसे मीठा पेय परोसोगे
और स्वयं कड़वा पेय पी लोगे?
वहाँ न कोई चाँद है, न सूरज.
कुछ भी न घटता है, न बढ़ता है.
क्या तुम अपनी योजनाएं त्याग दोगे
और प्रलोभनों को भूल जाओगे?
यहाँ हम जल, पृथ्वी, अग्नि और वायु से बने हैं.
यूनुस, हमें बताओ—क्या तुम भी इन्हीं से बने हो?
22
उनसे पूछो जो जानते हैं,
कि इस शरीर के भीतर यह आत्मा क्या है?
स्वयं परम-सत्य की शक्ति.
इन नसों में कौन-सा रक्त बहता है?
विचार संदेशवाहक है,
और भय चिंताओं की खान.
ये आहें प्रेम का परिधान हैं.
इस सिंहासन पर विराजमान वह सम्राट कौन है?
उस ईश्वर की एकता के लिए धन्यवाद दो.
उसने तब सृष्टि रची, जब कुछ भी अस्तित्व में न था.
और चूंकि हम वास्तव में कुछ भी नहीं हैं,
तो सुलेमान का सारा वैभव क्या मायने रखता है?
यूनुस और ताप्तुक से पूछो,
कि उनके लिए इस संसार का क्या अर्थ है…
यह संसार तो टिकने वाला नहीं.
तुम कौन हो? मैं कौन हूँ?

23
हम बोध के घर में प्रविष्ट हुए,
हमने शरीर को साक्षात् देखा.
घूमते हुए आकाश, अनेक परतों वाली पृथ्वी,
सत्तर हज़ार आवरण,
हमने शरीर के भीतर पाए.
रात और दिन, ग्रह-नक्षत्र,
पवित्र पट्टिकाओं पर अंकित शब्द,
वह पहाड़ी जिस पर मूसा चढ़े थे, वह मंदिर,
और इसराफ़ील का तुरही-नाद—हमने यह सब शरीर में ही देखा.
तौरात, स्तुति, इंजील, क़ुरान
इन पुस्तकों में जो कुछ भी कहा गया है,
हमने उसे शरीर के भीतर ही पाया.
हर कोई कहता है कि यूनुस के ये शब्द
सत्य हैं. सत्य वहीं है जहाँ तुम उसे चाहो.
हमने वह सब कुछ शरीर के भीतर ही पा लिया.
24
सत्य की ओर से जो पेय भेजा गया,
हमने उसे पिया, ईश्वर की महिमा हो.
और हम शक्ति के महासागर पर तैरते हुए निकले,
ईश्वर की महिमा हो.
उन पहाड़ियों और बलूत के जंगलों के पार,
उन अंगूर के बागों और बगीचों के पार,
हम स्वस्थ और आनंदित होकर गुज़रे, ईश्वर की महिमा हो.
हम सूखे थे, पर हम तर हो गए.
हमारे पंख निकल आए और हम पक्षी बन गए,
हमने एक-दूसरे से मिलन किया और उड़ चले,
ईश्वर की महिमा हो.
जिन भी भूमियों पर हम पहुंचे,
जिन भी हृदयों में, पूरी मानवता में,
हमने उन अर्थों के बीज बोए जो ताप्तुक* ने हमें सिखाए थे,
ईश्वर की महिमा हो.
यहाँ आओ, चलो हम शांति स्थापित करें,
चलो हम एक-दूसरे के लिए अजनबी न बनें.
हमने घोड़े पर काठी कस दी है
और उसे प्रशिक्षित कर लिया है, ईश्वर की महिमा हो.
हम एक छोटी-सी जलधारा बने जो बढ़ कर नदी बन गई.
हमने उड़ान भरी और समुद्र में समा गए,
और फिर हम छलक उठे, ईश्वर की महिमा हो.
हम ताप्तुक के द्वार पर सेवक बन गए.
बेचारा यूनुस, जो कच्चा और बेस्वाद था,
अंततः पक कर तैयार हो गया, ईश्वर की महिमा हो.
*ताप्तुक एमरे: यूनुस एमरे के गुरु
25
चलो, हर पल अल्लाह का नाम लें.
चलो देखें, मेरा मालिक क्या करता है.
चलो, हमेशा उस राह पर चलें.
चलो देखें, मेरा मालिक क्या करता है.
ठीक उस पल, जब तुम्हें सबसे कम उम्मीद हो,
अचानक पर्दा उठ जाता है.
इलाज ठीक समय पर आ पहुंचता है.
चलो देखें, मेरा मालिक क्या करता है.
यूनुस ने क्या किया?
उसने क्या किया?
उसे एक सीधी राह मिल गई,
उसने मार्गदर्शक का हाथ थाम लिया.
चलो देखें, मेरा मालिक क्या करता है.
26
समझदार लोग एक सागर की तरह होते हैं.
उसमें गोता लगाने के लिए प्रेमी की ज़रूरत होती है,
और मोती बाहर निकालने के लिए गोताखोर की.
जब तुम
मोती को सतह पर ले आओ,
तो उसकी कीमत पहचानने के लिए जौहरी की ज़रूरत होती है.
जब तक तुम मंज़िल तक न पहुँच जाओ, तब तक उसी रास्ते पर चलते रहो.
खामोश रहो. सौदागर मत बनो.
पीछे चलने के लिए किसी भले व्यक्ति को ढूंढो.
मुहम्मद ने सत्य को अपने भीतर ही जान लिया था.
सत्य हर जगह मौजूद है.
उसे देखने के लिए तुम्हें बस आँखों की ज़रूरत है.
अपनी रोज़ी-रोटी सत्य से ही मांगो,
वही एकमात्र देने वाला है. किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढो
जो अपने अहंकार का स्वामी हो.
प्रेमियों ने मुझसे गाने को कहा.
जो काम शुरू किया गया है, उसे पूरा करने के लिए
किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत है जिसमें कोई लालच न हो.
ऐ सूफी, तुम किसे धोखा दे रहे हो?
क्या सत्य के अलावा कोई और चीज़
इंसान की ज़रूरत को पूरा कर सकती है?
सत्य का स्थान हृदय में होता है.
कुरान में एक आयत है—आत्मा में
प्रेम का ऐसा बुर्ज है जो सृष्टि के सिंहासन से भी ऊँचा है.
मैं इस राह पर चलते-चलते पागल हो गया हूँ.
मुझे दिन और रात का कोई होश नहीं रहा.
प्रेम के तीर ने मेरे हृदय को भेद दिया है.
आओ, बेचारे यूनुस, आओ,
समझदार लोगों का हाथ थाम लो.
उनकी विनम्रता में ही हर मर्ज़ का इलाज छिपा है.
27
हमारे नियम दूसरे नियमों से अलग हैं.
हमारा धर्म किसी और जैसा नहीं है.
यह बहत्तर संप्रदायों से अलग है.
हमें अलग संकेतों से मार्गदर्शन मिलता है,
इस दुनिया में और परलोक में.
बिना किसी दिखाई देने वाले जल से शुद्धिकरण के,
बिना हाथों, पैरों या सिर की किसी भी हरकत के
हम उपासना करते हैं.
चाहे काबा में हों, मस्जिद में, या किसी अनुष्ठानिक प्रार्थना में,
हर कोई अपनी-अपनी बीमारी साथ लिए फिरता है.
कौन-सी पहचान किसके लिए है, यह कोई सचमुच नहीं जानता.
कल यह साफ़ हो जाएगा कि किसने धर्म का त्याग किया.
यूनुस, अपनी आत्मा को नया जीवन दो, एक मित्र के रूप में याद किए जाओ,
इस शक्ति को पहचानो. प्रेम के कानों से सुनो.
28
बहरों को गूंगों की बात सुनने दो.
उन दोनों को समझने के लिए आत्मा की ज़रूरत होती है.
बिना सुने ही हम समझ गए.
बिना समझे ही हमने उसे कर दिखाया.
इस राह पर, साधक की दौलत उसकी गरीबी ही है.
हमने प्यार किया, हम प्रेमी बन गए.
हमें प्यार मिला, हम प्रिय बन गए.
जब सब कुछ पल-पल मिट रहा हो,
तो ऊबने का समय किसके पास है?
ईश्वर ने अपने लोगों को बहत्तर भाषाओं में बांट दिया, और फिर सीमाएं खड़ी हो गईं.
लेकिन बेचारा यूनुस तो ज़मीन और आसमान, दोनों में समाया हुआ है,
और हर पत्थर के नीचे मूसा छिपा बैठा है.
यूनुस एमरे की कविताओं के अंग्रेजी अनुवादों पर आधारित
|
संपर्क: मकान नंबर 137, सेक्टर- 1, आई एम टी मानेसर, गुरुग्राम, हरियाणा- 122051. |

सरिता शर्मा (जन्म- 12 अगस्त 1964) ने अंग्रेजी और हिंदी भाषा में स्नातकोत्तर तथा अनुवाद, पत्रकारिता, फ्रेंच, क्रिएटिव राइटिंग और फिक्शन राइटिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया. पांच वर्ष तक नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया में सम्पादकीय सहायक के पद पर कार्य किया. बीस वर्ष तक राज्य सभा सचिवालय में कार्य करने के बाद नवम्बर 2014 में सहायक निदेशक के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृति. कविता संकलन ‘सूनेपन से संघर्ष, कहानी संकलन ‘वैक्यूम’, आत्मकथात्मक उपन्यास ‘जीने के लिए’,पिताजी की जीवनी ‘जीवन जो जिया’ प्रकाशित. रस्किन बांड की दो पुस्तकों ‘स्ट्रेंज पीपल, स्ट्रेंज प्लेसिज’ और ‘क्राइम स्टोरीज’, ‘लिटल प्रिंस’, ‘विश्व की श्रेष्ठ कविताएं’, ‘महान लेखकों के दुर्लभ विचार’, ‘विश्वविख्यात लेखकों की 11 कहानियां’ का हिंदी अनुवाद और रूमी : प्रेम की राह में प्रकाशित. फिल्म ‘याद के बेनिशां ज़जीरों से’ का लेखन. अनेक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में कहानियां, कविताएं, समीक्षाएं, यात्रा वृत्तान्त तथा विश्व साहित्य से कहानियों, कविताओं और साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेताओं के साक्षात्कारों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित. कहानी ‘वैक्यूम’ पर रेडियो नाटक प्रसारित किया गया और एफ. एम. गोल्ड के ‘तस्वीर’ कार्यक्रम के लिए दस स्क्रिप्ट्स तैयार की.


शानदार प्रयास। सरिता शर्मा को धन्यवाद।
अंग्रेजी अनुवादकों का नामोल्लेख भी हो सकता था।
देश के कई विश्वविद्यालयों में फ़ारसी विभाग हैं। वे यह काम कर सकते थे।
अठारहवीं कविता में ‘राष्ट्र’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है। मूल कविता में कौन-सा शब्द रहा होगा? राष्ट्र तो आधुनिक संकल्पना है।
बजरंग बिहारी जी शुक्रिया । ये अनुवाद https://www.best-poems.net/yunus-emre/poems.html#google_vignette से किए गए हैं ।
अठारहवीं कविता में nations शब्द है । लेखन हो या अनुवाद , सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है और हमारा ज्ञान सीमित है ।
अच्छे अनुवाद हैं। भाषा सरल और पठनीय है। इन कविताओं से ज़ाहिर है कि यूनुस इमरे अद्वैतवादी कवि थे। गुरु नानक और वास्तव में पूरे श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में भी अद्वैतवाद का गहरा प्रभाव है। वहाँ वह प्रभाव उपनिषदों से आया लगता है। कबीर इनसे और गुरु नानक से इस प्रकार अलग थे कि उनके यहाँ तीखी आलोचनात्मक दृष्टि है।
बहुत ठहर कर पढ़ने वाली कविताएं हैं।
कबीर, बुद्ध, मसीह, पैग़म्बर,सूफ़ीज़्म का चरमोत्कर्ष है इसमें।
सरिता शर्मा जी का भावानुवाद उल्लेखनीय है।
इन कविताओं को व्याख्यायित करने के लिए पूरे मनोयोग की आवश्यकता है।
ये बाहरी जगत से परे अन्तर्जगत की यात्रा कराती हैं।