समालोचन
(समालोचन का यह लोगो प्रसिद्ध चित्रकार, शिल्पकार और लेखक सीरज सक्सेना ने तैयार किया है.)

“समालोचन को इस दशक के सबसे महत्वपूर्ण हिंदी उद्यमों में शुमार होना चाहिये.”

Ashutosh Bhardwaj


संस्थापक और संपादक
अरुण देव

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है.
डिजिटल माध्यम में हिंदी में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ‘समालोचन’ का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है.
यह पत्रिका लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रगतिशील चेतना के प्रति प्रतिबद्ध है.

इसे व्यक्तिगत संसाधनों से पिछले दस वर्षों से अनथक प्रकाशित किया जा रहा है.

अब तक इसके १८०० से भी अधिक एकल अंक प्रकाशित हो चुके हैं.
इसकी चर्चा हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही ‘द हिन्दू’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसे अंग्रेजी के अखबारों में भी हुई है. ‘NDTV’ के प्राइम टाईम पर भी इसकी चर्चा हुई है.
कई विश्वविद्यालयों द्वारा इसे अनुशंसित किया गया है. मुंबई विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में यह शामिल है.

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    • समालोचन में प्रकाशित रचनाओं में प्रस्तुत विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है. किसी लेख या तस्वीर से आपत्ति हो तो कृपया सूचित करें.
    • प्रूफ़ आदि में त्रुटियाँ संभव हैं. अगर आप मेल से सूचित करते हैं तो हम आपके आभारी रहेंगे.

      samalochan10@gmail.com

      समालोचन के नियमित प्रकाशन के एक दशक पूरे होने पर

कुछ टिप्पणियाँ

अशोक वाजपेयी

सम्प्रेषण की नयी तकनालजी का साहित्य, कलाओं और आलोचना की अभिव्यक्ति और रसिकता के विस्तार के लिए बेहद उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण कार्य ‘समालोचन’ पत्रिका ने समझ, संवेदना, खुलेपन और बिना थके किया है। हिन्दी का यह सौभाग्य है कि उसमें एक ऐसी वेब पत्रिका अपने अस्तित्व और सक्रियता का एक दशक पूरा कर रही है : यह प्रयत्न हिन्दी में तो अभूतपूर्व है ही, किसी और भारतीय भाषा में भी शायद ही ऐसा कोई प्रयत्न हुआ है।

सामग्री की विपुलता, व्यापक पठनीयता, स्तर, सुरुचि, दृष्टियों की बहुलता का जो जतन अरुण देव अपने सम्पादन में करते रहे हैं उसका महत्व इसलिए भी है कि जब समवर्ती राजनीति में आक्रामक ध्रुवीकरण होता रहा है तब उन्होंने निर्भीकता से अपने सम्पादकीय अन्वेषण में अपने को, अपने चयन को ऐसी संकीर्णता से सावधानीपूर्वक बचाये रखा है और विभिन्न पीढ़ियों की जो सृजन-विचार-आलोचना आदि में बहुलता, उदग्रता है उसे लगातार रोशनी में लाने की कोशिश की है। ‘समालोचन’ ने एक नये माध्यम की बेहद कल्पनाशील सम्भावनाएँ खोजी हैं। अब हम हर रोज़ बुरी ख़बरों और झूठों के घटाटोप से आक्रान्त हुए बिना भाषा-स्मृति-कल्पना-कला आदि में हमारे समय में चरितार्थ हो रही जटिल सचाई का साक्षात् कर सकते हैं।

अशोक वाजपेयी
१२ नवम्बर २०२०


मैनेजर पाण्डेय

“हिंदी में समालोचन नाम की डिजिटल मैगजीन लगभग एक दशक से निकल रही है हिंदी की वह एकमात्र वेब पत्रिका है जिसमें एक ओर समकालीन रचना और आलोचना के लिए पर्याप्त जगह है दूसरी ओर हिंदी साहित्य के विभिन्न पक्षों खासतौर से रचना और आलोचना की परम्परा की पहचान का प्रयत्न भी दिखाई देता है. यह एक तरह से पत्रिका की समग्रता का द्योतक है. दूसरी बात यह है कि यह पत्रिका केवल साहित्यिक रचना और आलोचना की पत्रिका नहीं है, एक सांस्कृतिक पत्रिका भी है जिसमें साहित्य के साथ संगीत, पेंटिंग आदि दूसरों कलाओं के विशिष्ट व्यक्तियों की सृजनशीलता का मूल्यांकन भी दर्ज होता रहता है. यह हिंदी के लिए तरह गर्व और गौरव का विषय है कि ऐसी पत्रिका निकल रही है, मेरी जानकारी में किसी और भारतीय भाषा में ऐसी पत्रिका शायद ही हो.

पत्रिका और उसके संपादक अरुण देव के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ. समकालीनता और परम्परा बोध को संभाले हुए यह पत्रिका आगे बढ़ती रहे ऐसी कामना करता हूँ.”


कुमार अम्बुज

निश्चित ही अरुण देव ने एक सजग और श्रेष्ठ पत्रिका की तरह इसे संभव किया है। अन्य के लिए ‘समालोचन’ अब चुनौती, उदाहरण और मानदंड की तरह है।
बधाइयाँ। शुभकामनाएँ।

यादवेन्द्र

जो काम समालोचन ने किया है वह द्विवेदी जी की “सरस्वती” के समकक्ष है – विषयों की विविधता और प्रामाणिकता का कायल हूं।सौ साल जिए समालोचन और इसके इंजन अरुण देव जी।