आदम की जात : योगिता यादव
‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ से सम्मानित योगिता यादव की यह नयी कहानी ‘आदम की जात’ आदम के साथ-साथ व्यवस्था की विरूपताओं को भी बे-पर्दा करती है. प्रस्तुत है.
‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ से सम्मानित योगिता यादव की यह नयी कहानी ‘आदम की जात’ आदम के साथ-साथ व्यवस्था की विरूपताओं को भी बे-पर्दा करती है. प्रस्तुत है.
वरिष्ठ पत्रकार-लेखक त्रिभुवन की यह नई कहानी टोडरमल मार्ग से होती हुई इतिहास में प्रवेश कर जाती है. टोडरमल कौन हैं? समकालीन विडम्बनाओं से गुजरते हुए यह कथा अस्मिता और...
कोई कहानी अपने समय का आईना कब बन जाती है, यह उसके शिल्प और दृष्टि, दोनों से तय होता है. अशअर नज्मी की कहानी ‘मुर्दों का धरना’ इस अर्थ में...
अपमान कोई आकस्मिक या अपने में स्वतंत्र घटना नहीं है. वह विभिन्न रूपों में, विभिन्न स्थलों पर घटित होता रहता है और प्रायः उन्हीं स्वरों पर गिरता है जिन्हें सत्ता...
अंधकार, नियति, छल और परिवर्तन के एज़्टेक देवता तेज़काटलिपोका (Tezcatlipoca) का अंतिम युद्ध सृष्टि-चक्र के आखिरी टकराव का प्रतीक माना जाता है. यह युद्ध प्रकाश और अंधकार के द्वंद्व से...
एजाजुल हक की कहानी ‘बख़्शिश’ उस यथार्थ की परतें उघाड़ती है, जो हमारे सामने होते हुए भी प्रायः अदृश्य बना रहता है और जिस पर अपेक्षाकृत लिखा भी कम ही...
अखिलेश सिंह के गद्य से आप सुपरिचित हैं. उनकी यह कहानी देखिए जहाँ आदमी अपनी भूख से ज़्यादा अपने भीतर की आवाज़ों से लड़ता है. एक मामूली-सी चोरी मनुष्यता की...
वरिष्ठ कथाकार जयशंकर कथा-साहित्य के साथ-साथ कथेतर गद्य में भी अपने आत्मान्वेषी और संवेदनशील लेखन के लिए जाने जाते हैं, जहाँ स्मृति, अवसान और समय का बोध एक-दूसरे में घुलमिल...
दीपपर्व की शुभकामनाओं के साथ वरिष्ठ कथाकार प्रियंवद की नई कहानी, ‘अबू आंद्रे की खुजली’ ख़ास आपके लिए प्रस्तुत है. नगरीय जीवन की तलछट के नीम-उजाले, उघड़े-गोपन और मद्धिम-हलचल के...
वरिष्ठ आलोचक रोहिणी अग्रवाल ने आयशा आरफ़ीन की कहानी ‘स्वाहा’ के संदर्भ में यह सवाल उठाया है कि ‘कहानीपन का निर्धारण करते समय कौतूहल को केंद्रीय स्थान दिया जाए या...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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