कैफ़ी हाशमी की लम्बी कहानी चाबी
युवा कथाकार कैफ़ी हाशमी की नई कहानी ‘चाबी’ 21वीं सदी की बदलती हिंदी कहानी का चेहरा है. यह महानगरों के अस्थिर और भंगुर जीवन-दर्शन की प्रतिनिधि कथा है. अतीत और...
युवा कथाकार कैफ़ी हाशमी की नई कहानी ‘चाबी’ 21वीं सदी की बदलती हिंदी कहानी का चेहरा है. यह महानगरों के अस्थिर और भंगुर जीवन-दर्शन की प्रतिनिधि कथा है. अतीत और...
समाज-विज्ञानी, कथाकार और अनुवादक नरेश गोस्वामी इन दिनों अपनी दो अलग-अलग पुस्तकों के कारण चर्चा में हैं. जहाँ उनकी कृति ‘काँवड़ यात्रा : लोकधार्मिकता का नेपथ्य’ को प्रथम सेतु समाज-विज्ञान...
वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित की नई कहानी ‘गले का पट्टा’ प्रस्तुत है. इसमें एक प्रशासनिक अधिकारी, चुनाव ड्यूटी और एक युवा पशु-चिकित्सक के बीच दाँव-पेंच की महीन कारगुज़ारियों की ख़ोज-ख़बर...
प्रेम पर निगरानी की वर्तमान विडम्बनाओं और विद्रूपताओं को अशअर नज्मी की कहानी ‘कीहोल सर्जरी’ बड़ी ही पुख्तगी से सामने रखती है. ताला और चाभी मानो स्वयं एक किरदार बन...
‘राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान’ से सम्मानित योगिता यादव की यह नयी कहानी ‘आदम की जात’ आदम के साथ-साथ व्यवस्था की विरूपताओं को भी बे-पर्दा करती है. प्रस्तुत है.
वरिष्ठ पत्रकार-लेखक त्रिभुवन की यह नई कहानी टोडरमल मार्ग से होती हुई इतिहास में प्रवेश कर जाती है. टोडरमल कौन हैं? समकालीन विडम्बनाओं से गुजरते हुए यह कथा अस्मिता और...
कोई कहानी अपने समय का आईना कब बन जाती है, यह उसके शिल्प और दृष्टि, दोनों से तय होता है. अशअर नज्मी की कहानी ‘मुर्दों का धरना’ इस अर्थ में...
अपमान कोई आकस्मिक या अपने में स्वतंत्र घटना नहीं है. वह विभिन्न रूपों में, विभिन्न स्थलों पर घटित होता रहता है और प्रायः उन्हीं स्वरों पर गिरता है जिन्हें सत्ता...
अंधकार, नियति, छल और परिवर्तन के एज़्टेक देवता तेज़काटलिपोका (Tezcatlipoca) का अंतिम युद्ध सृष्टि-चक्र के आखिरी टकराव का प्रतीक माना जाता है. यह युद्ध प्रकाश और अंधकार के द्वंद्व से...
एजाजुल हक की कहानी ‘बख़्शिश’ उस यथार्थ की परतें उघाड़ती है, जो हमारे सामने होते हुए भी प्रायः अदृश्य बना रहता है और जिस पर अपेक्षाकृत लिखा भी कम ही...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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