बहसतलब

परिप्रेक्ष्य : विष्णु खरे (२)

\'देखियो ग़ालिब से उलझे न कोई, है वली पोशीदा और काफ़िर खुला.\'मिथिलेश श्रीवास्तव के कविता संग्रह ‘पुतले पर गुस्सा’ के उमेश चौहान द्वारा लिखित ब्लर्ब पर विष्णु खरे की टिप्पणी पर...

परिप्रेक्ष्य : विष्णु खरे

लोग थर्रा गए जिस वक़्त मुनादी आयीआज पैग़ाम नया ज़िल्ले इलाही देंगे.परवीन शाकिर का यह शेर इधर मुझे बार – बार याद आता है, ख़ासकर जब  विष्णु खरे कुछ कहते...

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