आलोचना

पाण्डुलिपि के पृष्ठों पर बहस: पंकज कुमार बोस

पाण्डुलिपि के पृष्ठों पर बहस: पंकज कुमार बोस

कथाकार प्रवीण कुमार की कहानी ‘रामलाल फ़रार है’ पर आधारित पंकज कुमार बोस का यह आलेख दिलचस्प और विचारोत्तेजक है. लेखक और उसके कल्पित पात्रों के बीच के सृजनात्मक तनाव...

मुख्य धारा बनाम हाशिये की कविता:  दया शंकर शरण

मुख्य धारा बनाम हाशिये की कविता: दया शंकर शरण

हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय आगामी २३ सितम्बर को अस्सी वर्ष के हो रहें हैं. इसे ध्यान में रखते हए पिछले कई महीनों से समालोचन उनपर केन्द्रित आलेख प्रकाशित...

प्रतिरोध के अभिप्राय और तुलसीदास का महत्त्व: माधव हाड़ा

प्रतिरोध के अभिप्राय और तुलसीदास का महत्त्व: माधव हाड़ा

किसी कवि की इससे बड़ी सफलता क्या होगी कि उसका काव्य इतना लोकप्रिय हो जाए कि घर में किसी मांगलिक आयोजन से पहले उसका सामूहिक पाठ किया जाए, और विडंबना...

टोकरी में दिगंत: शहर एक विस्मृत गंध का नाम है: गीताश्री

टोकरी में दिगंत: शहर एक विस्मृत गंध का नाम है: गीताश्री

कथाकार, पत्रकार और स्त्रीवादी लेखिका गीताश्री ने यह आलेख हिंदी की महत्वपूर्ण कवयित्री अनामिका की कविताओं में शहर- ख़ासकर मुज़फ़्फ़रपुर की उपस्थिति के विविध आयामों को ध्यान में रख कर...

आख्यान-प्रतिआख्यान (3)

आख्यान-प्रतिआख्यान (3): सहेला रे (मृणाल पाण्डे): राकेश बिहारी   

कथाकार-आलोचक राकेश बिहारी की इस सदी की कहानियों की विवेचना की श्रृंखला ‘भूमंडलोत्तर कहानी’ समालोचन पर छपी और यह क़िताब के रूप में आधार प्रकाशन से प्रकाशित हुई है. इधर...

मीरां: विमर्श के नए दौर में: रेणु व्यास

आलोचक-अध्येता माधव हाड़ा की चर्चित कृति ‘मीरां का जीवन और समाज’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘Meera vs Meera’ शीर्षक से प्रदीप त्रिखा ने किया है जिसे वाणी ने प्रकाशित किया है. इसकी...

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