महाभारत : महाकाव्य एवं राष्ट्र : अजय कुमार यादव
जी. एन. देवी की ‘Mahabharata: The Epic and the Nation’ का हिंदी अनुवाद ‘महाभारत : महाकाव्य एवं राष्ट्र’ इसी वर्ष ‘राजकमल प्रकाशन’ से प्रकाशित हुआ है. इसका अनुवाद डॉ. हरि...
जी. एन. देवी की ‘Mahabharata: The Epic and the Nation’ का हिंदी अनुवाद ‘महाभारत : महाकाव्य एवं राष्ट्र’ इसी वर्ष ‘राजकमल प्रकाशन’ से प्रकाशित हुआ है. इसका अनुवाद डॉ. हरि...
सजग सामाजिक कार्यकर्ता गिरीश कारनाड भारत में आधुनिक नाटक और रंगमंच के अग्रदूतों में रहे हैं. इसके साथ ही वे समानांतर सिनेमा के भी एक मजबूत स्तंभ थे. उनके द्वारा...
इसी वर्ष लोकभारती से प्रकाशित पुस्तक ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: हाशिये का समाज और हिंदी उपन्यास’ न केवल रोहिणी अग्रवाल के आलोचना-कर्म का एक महत्त्वपूर्ण अग्रिम पड़ाव है, बल्कि हिंदी आलोचना में...
बतौर कवि आमिर हमज़ा वर्षों से पढ़े और सराहे जा रहे हैं. उनके संग्रह ने उन्हें एक साथ पढ़ने की सुविधा भी दे दी है. उनका पहला संग्रह ‘कुन फ़यकुन’...
इतिहास विभाजन, विस्थापन और निर्वासन के घावों से भरा पड़ा है. इनकी गुम चोटों की शिनाख्त की कोशिशें इसलिए ज़रूरी हैं कि इन्हें फिर से दोहराया न जाए. बलवंत कौर...
मृत्यु और अस्तित्व के इर्दगिर्द घूमते ख़ालिद जावेद के उपन्यास ‘इक्कीस एक सौ बाईस’ का प्रकाशन रेख़्ता ने किया है. यह उनका पाँचवाँ उपन्यास है. उनके उपन्यास नेमत ख़ाना के...
भारतीय अंग्रेज़ी लेखन में रस्किन बॉन्ड सुपरिचित नाम हैं. पीढ़ियाँ उन्हें पढ़ते हुए बड़ी हुई हैं. 92 वर्षीय इस लेखक की अंग्रेज़ी में लिखी आत्मकथा ‘Lone Fox Dancing’ का हिंदी...
अनीता नायर की लेडीज़ कूपे, एक ऐसी स्त्री की यात्रा-कथा है जो ख़ुद की तलाश में निकली है और ट्रेन के लेडीज़ कूपे में पाँच अलग-अलग महिलाओं से मिलती है...
सत्यदेव त्रिपाठी की संस्मरणात्मक पुस्तक 'रंग यात्रियों के राहे गुज़र' में डॉ. श्रीराम लागू, ए. के. हंगल, हबीब तनवीर, सत्यदेव दुबे, बंसी कौल, दिनेश ठाकुर, अरुण पांडेय और विजय कुमार...
हिंदी में मौलिक सामाजिक‑राजनीतिक विषयों पर स्तरीय पुस्तकें लगातार प्रकाशित हो रही हैं. साथ ही महत्वपूर्ण अनूदित कृतियाँ भी सामने आ रही हैं. हिंदी समाज के बौद्धिक विकास के लिए...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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