समीक्षा

नवजागरण के परिसर में बग़ावत और वफ़ादारी : सुरेश कुमार

नवजागरण के परिसर में बग़ावत और वफ़ादारी : सुरेश कुमार

समकालीन सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों की जड़ें औपनिवेशिक काल में फैली मिलेंगी. आज को समझने के लिए ‘नवजागरण काल’ को गहराई से देखना समझना चाहिए. वरिष्ठ आलोचक और अध्येता वीर भारत तलवार...

अपने वतन, वजूद और भाषा की खोज करती कविताएँ: वैभव सिंह

अपने वतन, वजूद और भाषा की खोज करती कविताएँ: वैभव सिंह

सविता सिंह का नया कविता संग्रह इसी वर्ष वाणी से प्रकाशित हुआ है. शीर्षक है- ‘वासना एक नदी का नाम है’. यह संग्रह सविता सिंह की काव्य-यात्रा में बड़े बदलाव...

राम को फिर ‘लौटा लाने’ के राजनीतिक निहितार्थ:  राजेश जोशी

राम को फिर ‘लौटा लाने’ के राजनीतिक निहितार्थ: राजेश जोशी

वरिष्ठ लेखक-पत्रकार हेमंत शर्मा की पुस्तक ‘राम फिर लौटे’ पिछले वर्ष प्रकाशित होकर चर्चा में है. उन्होंने ‘भारतेंदु समग्र’ का भी संपादन किया है. बरसों तक बीबीसी हिन्दी सेवा में...

व्यक्ति और समय से आत्मीय साक्षात्कार: अरुण जी

व्यक्ति और समय से आत्मीय साक्षात्कार: अरुण जी

लेखक प्रेमकुमार मणि का राजनीतिक जीवन भी रहा है. उनकी आत्मकथा ‘अकथ कहानी’ आज़ाद भारत में किसान परिवार के युवक की भी कथा है. उतार-चढ़ाव से भरी. पटना में लेखकों...

साइकिल से दुनिया : भास्कर उप्रेती

साइकिल से दुनिया : भास्कर उप्रेती

पर्यावरण-मित्र यंत्रों में साइकिल का स्थान विशिष्ट है. साइकिल सामूहिक आविष्कार है. आगे पीछे अलग-अलग जगहों पर किसी ने पहिये, किसी ने पैडल तो किसी ने चेन बनाए. आज भी...

संयोगवश: विनय कुमार

संयोगवश: विनय कुमार

‘संयोगवश’ आशुतोष दुबे का छठा कविता संग्रह है जिसे राजकमल ने प्रकाशित किया है. उनकी कुछ कविताओं के भारतीय और विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुए हैं. कविता के लिए...

ज़ीरो माइल अयोध्या: फ़रीद ख़ाँ

ज़ीरो माइल अयोध्या: फ़रीद ख़ाँ

कृष्ण प्रताप सिंह (फ़ैज़ाबाद) वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं. अवध के इतिहास पर लिखते रहें हैं. ‘ज़ीरो माइल अयोध्या’ में उन्होंने अयोध्या के इतिहास को वर्तमान से जोड़ कर देखा...

एच-पॉप: उषा वैरागकर आठले

एच-पॉप: उषा वैरागकर आठले

देश की आज़ादी का आन्दोलन केवल राजनीतिक नहीं था. समृद्ध, उदार और प्रगतिशील समाज की रचना इसका लक्ष्य था जो न्याय, स्वतंत्रता और समानता पर आधारित हो. आज़ादी के कुछ...

मीडिया का लोकतंत्र : अरविंद दास

मीडिया का लोकतंत्र : अरविंद दास

आलोचनात्मक विवेक के प्रसार की अपनी ज़िम्मेदारी से आज हिंदी मीडिया दूर जा चुकी है. वह अधिकांशतः कारोबारी है. जिस देश की आज़ादी की लड़ाई में समाचारपत्रों, पत्रकारों और संपादकों...

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