समाज

कांवड़-यात्रा: पारम्‍परिक तीर्थों का समकालीन प्रतिस्‍थापन:  नरेश गोस्‍वामी

कांवड़-यात्रा: पारम्‍परिक तीर्थों का समकालीन प्रतिस्‍थापन: नरेश गोस्‍वामी

कावड़-यात्रा इधर सबसे तेजी से उभरता हुआ धार्मिक आयोजन है, देखते-देखते ही इसने ख़ासकर पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में बड़े धार्मिक जुलूस का रूप ले लिया है. समाज विज्ञानी नरेश गोस्वामी इधर...

खिलाड़ियों का अंतर्मन:  यादवेन्द्र

खिलाड़ियों का अंतर्मन: यादवेन्द्र

प्रतियोगिताओं में खिलाड़ी उम्मीदों का पहाड़ ढोते हुए हिस्सा लेते हैं, यह भार दर्शकों को दिखता नहीं है, यह उनके अंतर्मन पर लदा रहता है. खिलाड़ियों की फिटनेस (शारीरिक) की...

कोई समाज जनसंहार को किस तरह याद रखता है?: सुभाष गाताडे

कोई समाज जनसंहार को किस तरह याद रखता है?: सुभाष गाताडे

‘एक व्यक्ति पूरी तरह विस्मृत तभी होता है जब उसका नाम विस्मृत होता है.’ यह कथन कितना कठोर और वास्तविक है. हिटलर ने जर्मनी में यहूदियों के नामों निशाँ मिटाने...

चयन के अधिकार का संघर्ष:  प्रीति चौधरी

चयन के अधिकार का संघर्ष: प्रीति चौधरी

मध्य-पूर्व के देशों में स्त्रियों की बराबरी के लिए संघर्ष में इधर ‘मनाल अल-शरीफ’ की चर्चा होती रही है. स्त्रियाँ खुद कार चलाएं यह कितना बड़ा मुद्दा बन सकता है...

क्या हो बच्चे का धर्म ? सुभाष गाताडे

क्या हो बच्चे का धर्म ? सुभाष गाताडे

बच्चे का जन्म लेना जैविक क्रिया है लेकिन उसका धार्मिक बनना सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें उसका कोई दखल नहीं होता है. अक्सर माँ-पिता के धर्म ही बच्चे के धर्म हो...

किसान आंदोलन: सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयाम : लाल बहादुर वर्मा, विनोद शाही, राकेश गुप्त एवं अक्षत शाही

किसान आंदोलन: सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयाम : लाल बहादुर वर्मा, विनोद शाही, राकेश गुप्त एवं अक्षत शाही

  किसी भी आंदोलन के क्रांतिकारी होने के लिए जरूरी है कि वह आमूल परिवर्तन उपस्थित करे, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव लाये. दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का...

किसान आंदोलन और सांस्कृतिक क्रांति की संभावना: विनोद शाही

किसान आंदोलन और सांस्कृतिक क्रांति की संभावना: विनोद शाही

कृषि कानूनों में बदलाव और सुधार के लिए प्रारम्भ होने वाला किसान आंदोलन धीरे-धीरे अपना अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण करता जा रहा है, इसमें सभी वर्गों और स्त्री-पुरुष दोनों की...

हमारे समय में गांधी: सूरज पालीवाल

हमारे समय में गांधी: सूरज पालीवाल

महात्मा गांधी की १५१ वीं जयंती पर उन्हें स्मरण करते हुए मैं सोच रहा था कि बापू आज जिंदा होते तो क्या कर रहे होते ? अपने आश्रम में क्या...

रजनी कोठारी और भारत में राजनीति : प्रांजल सिंह

सुप्रसिद्ध राजनीति-वैज्ञानिक और विचारक रजनी कोठारी (६ अगस्त १९२८ – १९ जनवरी २०१५) की कालजयी कृति ‘पॉलिटिक्स इन इंडिया’ का प्रकाशन १९७० में हुआ था. यह इसका स्वर्ण जयंती वर्ष है....

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