लोमहर्षण सूत और पुराण-वाचन का अधिकार : कुशाग्र अनिकेत
पुराणों की कथा कहने का अधिकार किसके पास है, यह विषय हाल के दिनों में चर्चा में था. क्या इस प्रकार का प्रश्न पहले भी कभी उठ चुका है? तब...
पुराणों की कथा कहने का अधिकार किसके पास है, यह विषय हाल के दिनों में चर्चा में था. क्या इस प्रकार का प्रश्न पहले भी कभी उठ चुका है? तब...
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित कुशाग्र अनिकेत न्यू यॉर्क में अर्थशास्त्र और प्रबंधन के विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं. संस्कृत में उनकी विशेष गति...
चित्तधर ‘हृदय’ (1906-1982) को ‘नेपाल भाषा’ में लिखने के लिए सात साल की क़ैद की सजा मिली थी, आज वह बीसवीं शताब्दी के महान लेखकों में शामिल हैं. उनका जीवन...
पठन के चंचल और गतिशील माध्यमों के इस दौर में अगर कोई युवा लेखक कहता है कि उसने पूरी महाभारत पढ़ ली है और वह भी इसी माध्यम पर तो...
कार्ल मार्क्स मूलतः दार्शनिक थे, जिनकी चिंता समाज को समझने के साथ उसे बदलने की थी. धर्मों के उदय, प्रभाव और प्रभुत्व के बाद मार्क्स की सोच ही वह संगठित...
जर्मन-अमेरिकी दार्शनिक, समाजशास्त्री और राजनीतिक चिंतक हर्बर्ट मार्क्युज़ (Herbert Marcuse, July 19, 1898 – July 29, 1979)फ्रैंकफर्ट स्कूल के सिद्धांतकार माने जाते हैं. मार्क्सवाद से उनका लम्बा सार्थक संवाद चला...
एडोर्नो (Theodor W. Adorno, September 11, 1903 – August 6, 1969) बीसवीं सदी के प्रसिद्ध दार्शनिक, समाज-वैज्ञानिक और संस्कृति- आलोचक हैं. वे ऐसे शायद पहले विचारक हैं जिन्होंने दर्शन और संगीत...
Ward, 1970-71 : George TookerAlienation(अलगाव,विलगाव, अपरिचय, अजनबीपन आदि) का सिद्धांत न केवल समाज विज्ञान में बल्कि सहित्य में भी महत्वपूर्ण माना जाता है. सामाजिक प्राणी से एक अकेले असहाय इकाई में...
विश्व के प्रमुख बुद्धिजीवियों में शुमार जर्मन समाजशास्त्री और दार्शनिक Jürgen Habermas (8 जून 1929) अपनी ‘लोकवृत्त’ (Public Sphere) की अवधारणा के कारण विशेष रूप से जाने जाते हैं। इसके...
उत्तर आधुनिक दार्शनिक माइकल फूको (Michel Foucault) का जन्म १९२६ में फ्रांस में हुआ था. ज्ञान और ताकत के बीच के सम्बन्धों पर उनका दार्शनिक विवेचन बहुत प्रसिद्ध है. अच्युतानंद...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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