नाटक

ऐसे भी तो सम्भव है रंगकर्म: संगीता गुन्देचा

ऐसे भी तो सम्भव है रंगकर्म: संगीता गुन्देचा

आश्रम प्राचीन भारतीय अवधारणा है, महात्मा गाँधी ने इसकी सक्रियता का विस्तार करते हुए इसे राजनीति से भी जोड़ा. कलाकारों ने भी इनका रचनात्मक इस्तेमाल किया है. रंगकर्मी राजेन्द्र पांचाल...

विश्व रंगमंच दिवस: के. मंजरी श्रीवास्तव

विश्व रंगमंच दिवस: के. मंजरी श्रीवास्तव

आज विश्व रंगमंच दिवस है (२७ मार्च). खड़ी बोली हिंदी साहित्य की शुरुआत में नाटकों की बड़ी भूमिका थी, इसके प्रस्तोता भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने ख़ुद रंगमंच में अभिनय किया था....

हबीब तनवीर: रंगकर्म और स्मृति: सत्यदेव त्रिपाठी

हबीब तनवीर: रंगकर्म और स्मृति: सत्यदेव त्रिपाठी

कला और साहित्य का असर राजनीति की तरह तत्काल नहीं दिखता पर होता गहरा है. सहृदय, विवेकवान और उदार मनुष्यता की निर्मिति में इसका महत्व असंदिग्ध है. इस तरह की...

रतन थियाम: रंगकर्म और सौन्दर्यबोध:  के. मंजरी श्रीवास्तव

रतन थियाम: रंगकर्म और सौन्दर्यबोध: के. मंजरी श्रीवास्तव

नाटककार और वरिष्ठ रंगकर्मी रतन थियाम (जन्म: 20 जनवरी 1948, मणिपुर) से रंगमंच और कलाओं में सौन्दर्यबोध की अवधारणा को लेकर यह बातचीत के. मंजरी श्रीवास्तव ने की है. रतन...

बंसी कौल: रंग ‘विदूषक’ यायावर निकल गया अपनी अंतिम यात्रा पर: सत्यदेव त्रिपाठी

थियेटर के लिए पद्मश्री से सम्मानित वंशी कौल (23 August 1949 – 6 February 2021) की संस्था ‘रंग विदूषक’ (भोपाल) नाटकों में अपने नवाचार के लिए विश्व विख्यात थी. कैंसर...

मति का धीर : गिरीश कारनाड : रंजना मिश्रा

शब्द की अपनी स्वायत्त सत्ता है और ये दीगर सत्ता केन्द्रों के समक्ष अक्सर प्रतिपक्ष में रहते हैं. शब्दों ने बद्धमूल नैतिकता पर चोट की है उसे खोला है, धर्म...

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