| और यूक्रेनी भाषा में चुप रहते हुए भी आप बोल रहे होते हैं काटेरीना कालिट्को की कविताएँ |
काटेरीना कालिट्को (Kateryna Kalytko; जन्म 1982) समकालीन यूक्रेनी साहित्य की एक प्रमुख और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित लेखिका हैं. वे एक अनुभवी अनुवादक, PEN यूक्रेन की सक्रिय सदस्य और नागरिक अधिकारों की सजग पैरोकार हैं. उन्हें आज समकालीन यूक्रेन की सबसे सशक्त साहित्यिक आवाज़ों में गिना जाता है.
काटेरीना ने अब तक ग्यारह काव्य-संग्रह, दो गद्य पुस्तकें तथा यूक्रेनी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए अनेक निबंध लिखे हैं. उनकी रचनाओं का बीस से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. उनकी चर्चित काव्य पुस्तक People with Verbs यूक्रेन में भीषण युद्ध आरंभ होने के बाद प्रकाशित होने वाली प्रारंभिक काव्य पुस्तकों में से एक थी.
साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है. 2023 में उन्हें यूक्रेन का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान तारास शेवचेंको राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार तथा अमेरिका का पुशकार्ट काव्य पुरस्कार प्रदान किया गया. वे BBC Book of the Year प्रतियोगिता की विजेता भी रह चुकी हैं और उन्हें जोसेफ़ कॉनराड पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनकी उस लेखन शैली के लिए दिया गया है—“जो वास्तविक समस्याओं को उठाती है, पाठक को सोचने के लिए विवश करती है और अन्य संस्कृतियों के ज्ञान का विस्तार करती है.”
2019 में, संयुक्त राष्ट्र महिला यूक्रेन ने उन्हें उनके साहित्यिक अवदान के लिए महिला कला पुरस्कार से सम्मानित किया. 2024 में उनका नाम यूक्रेनी संस्कृति की प्रमुख महिला हस्तियों की ‘महिला शक्ति’ सूची में शामिल किया गया तथा 2025 में उन्हें ‘समकालीन यूक्रेनी संस्कृति के 100 सबसे महत्वपूर्ण नामों’ में स्थान मिला.
PEN यूक्रेन की सदस्य और एक प्रतिबद्ध नागरिक कार्यकर्ता के रूप में काटेरीना मानवाधिकारों के प्रश्नों—विशेष रूप से राजनीतिक कैदियों के अधिकारों—पर लगातार काम करती रही हैं. रूसी आक्रमण के पूरे दौर में वे यूक्रेन में ही रहीं और अग्रिम मोर्चों तथा मुक्त क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सहायता में सक्रिय रूप से संलग्न रहीं.
अपने लेखन में काटेरीना कालिट्को सामूहिक स्मृति, मनुष्य और धरती के अटूट संबंध, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, नारीवाद और संक्रमणकालीन संस्कृति जैसे जटिल और समकालीन विषयों को गहराई और संवेदनशीलता के साथ उद्घाटित करती हैं.
तेजी ग्रोवर
कवि क्यों
हम यहाँ रहे, हमने लिखा, हम मारे गये.
और अगर हम बच भी गये तो शर्म असहनीय थी.
हे ईश्वर, हम तुम्हें ब्रेल लिपि में लिखेंगे
मिट्टी की इस धड़कन और विद्रोह को
वह सब कुछ जो मनुष्य के लिए कभी नहीं बना था
फिर भी वह सब कुछ जो हमने महसूस किया और सहा है.
गर्मी का मौसम था. पोडिलियन सागर में
राई किसी उष्ण द्वीप की तरह फिर से पक रही थी.
सूरज तोप की नली सा चमक रहा था
देर जुलाई की उस साँझ की बाट जोहना भारी था.
गर्मी के मौसम में ही मैंने फिर सोचा
कि एक साथ बने रहना कितना ज़रूरी है.
इस समय में जो कुछ लिखा और सोचा गया है,
वह हमारे सामने आख़िरी छोटे दर्पण की तरह खड़ा रहेगा.
(यहाँ वह मेरी कविता को एक घेरे में, बहुत छोटे बच्चों के बीच पढ़ रहा है,
और मैं इसे महसूस करती हूँ, गुदगुदी और कड़वाहट एक साथ.)
और जंग हम पर लहर की तरह उमड़ती है, उमड़ती है
हमारे नाज़ुक गले को नमक से भरती हुई.
याद रखने की ख़्वाहिश किसी भी सनक से ज़्यादा शदीद है.
आहत करती है इंसानी तौर पर, ख़ूब गहराई और ग़ुरूर से.
आप कहना चाहते हैं: मैं प्रेम करता हूँ लेकिन आपके होंठ सुन्न पड़ जाते हैं
विलाप अब कोई आवाज़ नहीं है; हत्या अब कोई महामारी नहीं.
हे ईश्वर, हम यहाँ अपने मृतकों को लोरी सुना रहे हैं.
उन्हें देखो, देखो वे क्या हैं.
ऐसे बुरे समय में कवि क्यों अस्तित्व में हैं?
यूक्रेनी कड़वाहट से गालों की हड्डियाँ फड़क उठीं.
हम तुम्हें लिखेंगे, हे ईश्वर, ईश्वर के रूप में नहीं.
हम तुम्हें लिखेंगे, ईश्वर, मानो तुम जीते-जागते ईश्वर हो.
6 अप्रैल
तुम सिर्फ़ इस एक आदमी के साथ नहीं बल्कि उसके पूरे जीवन के साथ सो रही हो
और कभी-कभी यह बात तुम्हें जगा देती है और उसे तुम्हारी बाँहों से छीन लेती है.
क्योंकि, देखो, जंग अक्सर आकर तुम्हारे बीच ऐसे लेट जाती है जैसे कोई बच्चा अँधेरे में अकेला रहने से डरता हो.
वह कहता है, युद्ध में कई संख्याएँ शामिल होती हैं, चलो देखें
दो रिश्तेदार हड्डियों के एक थैले के बराबर होते हैं
एक हज़ार तीन सौ पचानवे दिन की घेराबंदी, सहायता के तीन पैकेट: मक्खन, डिब्बाबन्द सामान, पाउडर दूध, साबुन की तीन टिकिया.
चार हथियारबन्द आदमी तुम्हारे पास आते हैं,
आदेश दिखाते हैं और फिर रात के अंधेरे में तुम्हें बाहर ले जाते हैं.
शहर पार करते समय तुम्हें
अपने सिर के ऊपर से मिसाइलें उड़ने की आवाज सुनाई देती है दो बार.
पांच बार वे आपको बैरक से बाहर
एक खाई में ले जाते हैं जहाँ तैंतालीस लाशें सड़ रही होती हैं
और हर बार आप सोचते हैं: मैं आखिरकार मर जाऊँगा
और ईश्वर से कहूँगा कि यह एक घटिया मज़ाक था.
लेकिन वे आपको मुँह के बल मिट्टी में पटक देते हैं
और बड़ी देर तक आपके सिर पर बंदूक ताने रहते हैं.
तब से, वह कहता है, मुझे सपने देखना पसंद नहीं है
इस तरह की यादें, ये किसी के लिए ठीक नहीं हैं.
तुम जंगल में भागते हो, वे तुम्हारी पीठ पर गोली दागते हैं,
एक गोली तुम्हारी जांघ में लगती है, लेकिन तुम्हें बस अपने चेहरे पर मिट्टी का आभास होता है.
तभी तुम्हारे सीने में
दर्द का एक सूखा पेड़ उगता है, धड़कता हुआ.
और मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं देती क्योंकि इसके जवाब में कोई क्या ही कहे? मैं बस उसके चेहरे से धूल पोंछती रहती हूँ, बार-बार
यहाँ तक कि जब वह सो रहा होता है, यहाँ तक कि जब वह कहीं बहुत दूर होता है.
(ओलेना जेनिंग्स और ओक्साना लुट्सिशिना के अंग्रजी अनुवाद पर आधारित)

१.
युद्ध के बीच प्यार करना है
हर चीज़ के बावजूद कान की बालियाँ पहनना,
कि छेद बन्द न हो जाएँ,
जो तुमने दादी के साथ
पुराने ब्यूटी पार्लर में छिदवाए थे.
रफ़ू की सुई चुभती है
गुलाबी शिशु की त्वचा में, जो अभी तक
आघात से अछूती है.
जिस शब्द के साथ सुई धीरे-धीरे
अन्दर जाती है,
वह इतना धीमा है कि उसे
छेदना या चटकना नहीं कहा जा सकता,
लेकिन तब भी वह शब्द है.
वो रो क्यों नहीं रही? हेयरड्रेसर
दादी की ओर देखती है.
वो रोने वाली नहीं है
दादी जवाब देती हैं.
२.
बाद में हमें शब्दों को नए सिरे से गढ़ना होगा.
अभी तक मेरे सीने में गड़ा यह खूँटा अनाम है
लेकिन जब तक मैं जीवित हूँ,
अँधेरी ताक़त को सीधे मुझसे खींच लो.
शहरों के पत्थर. मिसाइलों के रात्रिकालीन पिण्ड.
और इस फैलारे के बीच हड्डियों में अदम्य क्रोध की गर्जना गूंजती है
और पानी का स्वाद है. और प्रकाश अब भी वही है
जिसमें हम गले मिले और मुसकुराये थे.
और प्रतिशोध का बीज पक भी चुका है बोनी के लिए
ख़ुदा घर से दो सूटकेस लेकर गया है
प्यार करने के लिए, जीने के लिए, जीवित रहने के लिए, मारने के लिए.
हम कुछ हद तक खेत के समान हैं. कुछ हद तक पास के जंगल के समान.
और इस धरती के समान जिससे सब कुछ फलता-फूलता है.
वह जिद्दी ख़ून जो घाव से पट्टी को फाड़ देगा
और मैदानों से नदी की तरह बहकर
समुद्र में मिल जायेगा.
हम स्मृति हैं.
परन्तु जहाँ हम खड़े हैं
हमारे पीछे कुछ भी नहीं बचता.
देखो यह प्रेम है. मैं अब भी जीवित हूँ.
यही वह समय है जब हर चीज़ को एक नाम मिलता है.
भाषा के हृदय में ही वह पनाहगार है
जिसमें तुम प्रवेश करोगे.
(ओलेना जेनिंग्स और ओक्साना लुट्सिशिना के अङ्ग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)
३.
एक माँ राख में तब्दील हो रही है, अपने दो बच्चों को गले लगाए हुए.
एक माँ अपने बच्चे को गिरते मलबे से बचाने, कंक्रीट के तख्ते को थामे हुए है.
एक माँ अपनी नस काटकर अपने एक बच्चे को ख़ून पिला रही है, क्योंकि अब और कुछ नहीं बचा है,
क्योंकि अब कोई और बचा ही नहीं है.
एक माँ ख़ुद को संगीन पर फेंक देती है ताकि उसकी बेटी को जर्मन सैनिक न ले जा सकें
फिर उस चोट पर शर्मिंदा होती है.
एक माँ पाले में इंतज़ार कर रही है
पल-भर के लिए,
दूर से अपने बेटे को यातना शिविर से आते हुए देखने
अपने पैरों पर झूलती, न सोने की कोशिश करती हुई
कई दिनों के सफ़र के बाद.
एक माँ अपनी पीठ पर मार्कर से बच्चे का नाम लिख रही है.
एक माँ ताबूत को कसकर पकड़े हुए है, बिना रोये, चर्च में मौजूद सैकड़ों लोगों की परवाह किये बिना.
एक माँ गुहार लगा रही है कि कम से कम उसका एक अंग वापस मिल जाये- वह उसे पहचान लेगी.
एक माँ त्यौहार के लिए अपनी बेटी का गाउन सिल रही है, अपने गाउन से, जो उसका इकलौता गाउन है.
एक माँ जंगल में लड़खड़ाती हुई जा रही है,
अपने नवजात शिशु के साथ, पोशाक का किनारा ख़ून से सना
क्योंकि उसने मिट्टी के एक गड्ढे में जन्म दिया था.
एक माँ जो जन्म के समय,
टाइल वाले फ़र्श के ऊपर खड़े-खड़े आपका सहारा लेती है
जबकि दाइयाँ बगल के कमरे में दारू पी रही हैं.
एक माँ जो रात में अपने हाथों में आग को मिट्टी की तरह थामे रहती है,
ताकि बच्चे को कल स्कूल के लिए एक सही दुनिया मिल सके.
एक माँ जिसने हमें भागने और ख़ुद को बचाने मनाया नहीं.
इवान्को, मारुस्या, एंड्रीको, ओक्सांको, तुम क्या बना रहे हो?
मैं लाल रंग बना रहा हूँ मैं ख़ून बना रहा हूँ.
मैं काला रंग बना रहा हूँ मैं धरती बना रहा हूँ.
मैं युद्ध को इसी तरह चित्रित करता हूँ. लेकिन यहाँ, बीच में,
एक सफ़ेद वृत्त है, और उसके अन्दर एक लिली का फूल है.
मैं अपनी माँ को इसी तरह चित्रित करता हूँ.
४.
और यूक्रेनी भाषा में चुप रहते हुए भी आप बोल रहे होते हैं.
और घास का मैदान दूर तक फैला है, चिनार के पेड़ ऊपर उठते हैं.
यह युग इतने सारे नायकों को ले जाता है
कि कोई सुकूनदेह पुराकथा बचती नहीं
केवल उसका हालिया अंश
घनी धूल जिसमें जोब∗ अपने घावों को कुरेदता है.
दाँत पीसता है अब चुप रहने की कोशिश करो.
ज़हर पीछा करता है जिस्म में गहरी उदासी का
ग़ुस्से में ढल जाता है और क्या तुम हमें दोष देने की हिम्मत करोगे?
पुख़्ता साज़िशें अपने ग्रन्थों से बाहर निकल आयी हैं
तलवारों और धनुषों के साथ खड़ी, पानी की ओर उतर रही हैं
लीथी∗ की तलाश में लम्बे समय से अभ्यस्त
केवल इतिहास एक चुनाव है, एक विस्थापन है, एक विस्फोट है.
यह नदी ड्नीप्रो है. और इसके दोनों किनारे ज़िन्दा हैं
(मात्वी स्मिरनोव के अङ्ग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)
५.
लेकिन हद कहाँ है?
वह पूरी तरह से जागा नहीं है, पूछता है. हद कहाँ है?
मैं घबराकर
हल्का सा जवाब देती हूँ.
गली की रोशनियाँ
धारासार बारिश में काँप रही हैं.
मौत की उँगलियाँ दिन-ब-दिन
ठंडी और लम्बी होती जा रही हैं.
बारिश में जनाज़े को निकालने से
कम ही चीज़ें बुरी होती हैं.
पैरों के नीचे, फिसलन भरी मिट्टी
पर तख्ते डाल दिये गये हैं
ऊपर आसमान में झंडे ही झंडे हैं
और झंडे ही झंडे
पूरे कब्रिस्तान में
शक्तिशाली पक्षियों का झुंड
अपने रंग-बिरंगे पंख फड़फड़ाता.
हम चेहरों को पहचानते हैं.
कब्रों पर खिंची तस्वीरों में. रुकिए.
ज़रा गपशप कीजिए.
हम होते कौन हैं जो ज़िन्दा बचे रहें
सुरक्षित घर पहुँचें?
वह थका हुआ लेट जाता है
और मेरे माथे को चूमता है.
नैराश्य में और लगातार:
ऐसी गर्मी पहले कभी नहीं आयी.
लेकिन हद कहाँ है- ये घाटियाँ
तालाब और मैदान
ये पकी हुई फ़सलें, ये खारे पानी के फूल
दीपक की रोशनी का घेरा
सोता हुआ घायल आदमी.
जब मैं उसके पैर को हल्के से छूती हूँ:
मुझे पढ़कर सुनाओ
गहराइयों को महसूस होने दो.
इन पिछले अर्थों में
हमारा कोई तो अंश होगा.
कोई हद नहीं है, बस
एक हद और एक लक्ष्य है
जो मायावी रूप से निकट और
उत्कट, इतना उद्दात और
स्पष्ट है.
मुझे पढ़कर सुनाओ
बोलना बन्द मत करो. पढ़ती रहो.
(डोमिनिक हॉफमैन के अङ्ग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)
६.
उन्होंने बगीचे के फाटक पर पैसिफ़्लोरा∗ से उसका पासपोर्ट माँगा
लेकिन उसके पास पासपोर्ट नहीं था.
उसके पास था दुख का एक काँटेदार और गुड़मुड़ा डंठल
और एक ऐसा फूल जिसमें भावनाओं का बाहुल्य था, वर्तिकाग में कीलें
काँटों का ताज, लेकिन पासपोर्ट नहीं.
तुम यह सारा दर्द कहाँ ले जा रही हो, यह कोई तस्करी का सामान तो नहीं है
वे उपहास भरी मुस्कान के साथ पूछते हैं;
वे शायद मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं, वह मन ही मन सोचती है.
नदी के किनारे से कोहरा छंट जाता है, जिससे वह बिल्कुल बेघर सा लगता है.
बगीचे में मज़बूत सेब के पेड़ झुके हुए हैं, अपनी शाखाओं को ज़मीन पर टिकाए हुए
जैसे धावक शुरुआती लाइन पर खड़े हों.
आप नाज़ुक पेओनी के फूल को धीरे-धीरे घास पर गिरते हुए सुन सकते हैं.
थोड़ा आगे, किशमिश और रसभरी की एक निडर सेना,
और एक भटकती हुई आइवी बेल, जो पिछले दरवाजे से अन्दर घुस आयी है, उन्हें दीवार से दूर धकेल रही है.
लेकिन वह एक ऐसे द्वार की तलाश में थी जो केवल उसे ही प्रवेश करने से रोकता हो.
वह कहती है, मैं क्या करूँ? मुझे खेद है, मैं यहीं प्रतीक्षा करूँगी.
उसने एक पत्थर को थाम रखा है और पाँच वर्षों से उसे थामे हुए है.
उसकी नीली आँखें खिल उठी हैं, जिनमें हृदय के आकार के फल लगे हैं.
(एमिलिया ग्लासेर और यूलिया इल्चुक के अङ्ग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)
७.
जब वे उसे स्कूल के मैदान से घसीटकर बाहर ले गये,
तो उनमें से चार ने उसके हाथ पकड़कर उसे खींचा, सभी महिलाएँ विलाप करने लगीं
बच्चे रोने लगे, मोहल्ले के कुत्ते भौंकने लगे.
और जब उन्होंने उसकी ग्रीवा को दबाकर
उसे पुलिस की गाड़ी में धकेल दिया,
तो उसने ख़ुद को छुड़ाने की कोशिश की
और आश्चर्यजनक शांत स्वर में बोला:
रोओ मत, बच्चों.
दुनिया और रोशनी अजीब शब्द हैं और उनकी गूँज भी.
स्कूल के बॉयलर रूम में, जहाँ अँधेरा है और कोयले की गन्ध आती है
मानो वह दुनिया का ही एक बिलकुल अलग हिस्सा है, तो यही बेहतर है.
मैं दुनिया और रोशनी से अपनी भाषा में बात करना चाहता था
मैं पवित्र ग्रन्थ के प्रकाश में पढ़ना चाहता था
और अगर दुनिया, जिसकी सीमाएँ केवल बस नमक और लोहे की हैं
जो माता-पिता से विरासत में मिली हैं, उसमें इसके लिए कोई जगह नहीं है
तो छिपने का भी कोई मतलब नहीं
और उसने स्त्रियों को चुप रहने को कहा, याद रखने को कहा
कि जिनकी आँतें निकाल दी गयी थीं अपने झंडे की रक्षा में
उन्हें उसकी बात समझनी चाहिए, उसे सुनना चाहिए.
और इससे ठीक पहले कि गन्दे नाखूनों वाला हाथ उसके सिर पर दबने लगता
उसे ऊपर देखने का समय मिला.
गाड़ी चल पड़ी, धूल आसमान छू रही थी.
नन्ही मीनार, जिसने सूरज की रोशनी को अपने दुबले शिखर में सहेज लिया था
उसे डूबने नहीं दे रही थी
और बहुत देर तक मोमबत्ती की तरह पिघलती रही.
(ओलेना जेनिंग्स और ओक्साना लुट्सिशिना के अङ्ग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)
८.
वे एक लोकगीत गा रहे थे.
भाषा बख़ियों से उधड़ रही थी
और उसके टुकड़े कोयले से चमक रहे थे. गला चुभ रहा था
मानो लोग किसी ऐसे व्यक्ति को पुकार रहे हों जो कभी नहीं आएगा
जो कभी आया ही नहीं.
और मैं रोना चाहती थी और उनके साथ शामिल होना चाहती थी
ताकि मेरे फेफड़े मेरे सीने से बाहर निकल आयें : दो कश्तियाँ – या यूँ कहें
जैसे कोमलता और चाहना, बन्दरगाह के पास जम गयीं हों पाले में .
वे रवाना नहीं हो सकीं, इस सर्द हवा में
कण्ठ और श्वासनली से बँधी हुईं.
मैं रोना चाहती थी और भाग जाना चाहती थी,
समय बर्बाद किये बिना, दूर, कभी न लौटने के लिए,
और जब सीमा पर वे पूछते हैं, तुम्हारे सामान में क्या है?
मैं खनखनाते हुए टुकड़ों से भरा थैला खोलती हूँ
और समझा नहीं सकती कि क्या टूटा.
सारे शब्द बह निकले हैं
एक चिरस्थायी शीतकालीन गीत में .
(ओलेना जेनिंग्स और ओक्साना लुट्सिशिना के अङ्ग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)
संदर्भ
∗ जोब: बाइबल की ओल्ड टेस्टमेंट में जोब की आस्था की परीक्षा लेने उस पर एक के बाद आपदाएँ आती हैं, लेकिन वह अस्थावान बना रहता है.
∗ लीथी : यूनानी मिथक में विस्मृति की नदी जिसमें मृतक अपना अतीत भूल जाते हैं.
∗ पैसिफ्लोरा एक फूल का नाम है जिसे हिन्दी में राखी बेल या कृष्ण कमल कहते हैं. होमियोपैथी में इससे नींद और मानसिक शान्ति की दवा बनती है.
दिल्ली में आयोजित हो रहे विश्व कविता समारोह में काटेरीना कालिट्को के शरीक होने की उम्मीद है.
काटेरीना कालिट्को
प्रकाशन Shoes for Oscar Night (Folio, 2013) |
तेजी ग्रोवर, जन्म 1955, पठानकोट, पंजाब. कवि, कथाकार, चित्रकार, अनुवादक. छह कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह, एक उपन्यास. आधुनिक नॉर्वीजी, स्वीडी, फ़्रांसीसी, लात्वी साहित्य से तेजी के बीस पुस्तकाकार अनुवाद प्रकाशित हैं. प्राथमिक शिक्षा और बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण हस्तक्षेप और योगदान रहा है. तेजी की कृतियाँ देश-विदेश की तेरह भाषाओँ में अनूदित हैं; स्वीडी, नॉर्वीजी, अंग्रेजी और पोलिश में पुस्तकाकार अनुवाद प्रकाशित. 2020 में उनकी सभी कहानियों और उपन्यास (नीला) का एक ही जिल्द में अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुआ है. भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार और रज़ा अवार्ड से सम्मानित तेजी 1995-97 के दौरान वरिष्ठ कलाकारों हेतु राष्ट्रीय सांस्कृतिक फ़ेलो चयनित होने के साथ-साथ प्रेमचंद सृजनपीठ, उज्जैन, की अध्यक्ष भी रहीं. 2016-17 के दौरान नान्त, फ्रांस में स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी में फ़ेलो रहीं.
2019 में उन्हें वाणी फ़ाउंडेशन का विशिष्ट अनुवादक सम्मान, और स्वीडन के शाही दम्पति द्वारा रॉयल आर्डर ऑफ़ पोलर स्टार (Knight/ Member First Class) की उपाधि प्रदान की गयी. |

काटेरीना कालिट्को
तेजी ग्रोवर, जन्म 1955, पठानकोट, पंजाब. कवि, कथाकार, चित्रकार, अनुवादक. छह कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह, एक उपन्यास. आधुनिक नॉर्वीजी, स्वीडी, फ़्रांसीसी, लात्वी साहित्य से तेजी के बीस पुस्तकाकार अनुवाद प्रकाशित हैं. प्राथमिक शिक्षा और बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण हस्तक्षेप और योगदान रहा है. तेजी की कृतियाँ देश-विदेश की तेरह भाषाओँ में अनूदित हैं; स्वीडी, नॉर्वीजी, अंग्रेजी और पोलिश में पुस्तकाकार अनुवाद प्रकाशित. 2020 में उनकी सभी कहानियों और उपन्यास (नीला) का एक ही जिल्द में अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुआ है. भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार और रज़ा अवार्ड से सम्मानित तेजी 1995-97 के दौरान वरिष्ठ कलाकारों हेतु राष्ट्रीय सांस्कृतिक फ़ेलो चयनित होने के साथ-साथ प्रेमचंद सृजनपीठ, उज्जैन, की अध्यक्ष भी रहीं. 2016-17 के दौरान नान्त, फ्रांस में स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी में फ़ेलो रहीं.



इन कविताओं को पढ़ते समय मन कलप उठा। दुनिया के तमाम तानाशाहों इन कविताओं को पढ़ो। कहीं ऐसा ना हो कि जिस मिट्टी के अंदर तुम्हें दफ़न किया जाएगा वो मिट्टी तुम्हें समेटने से इंकार कर दे। शुक्रिया समालोचन शुक्रिया तेजी जी
‘मार्मिक’ छोटा शब्द है…हृदय-दग्ध कर देने वाली ये कविताएँ बहुत genuine लगीं….पीड़ा को आक्रोश में बदलकर भी ये कविताएँ सीमित देश काल की नहीं रह गईं हैं वे इतिहास और भविष्य -बोध से संपन्न हैं. शुक्रिया Teji Grover मै’म.
नयी यातनाओं की ये नयी कविताएँ हैं। नृशंसताओं को भी करुणा और संवेदना के साथ देखती हुईं। अधिक वेधक। तकलीफ़ जैसे कोई पारदर्शी अनुभव है।
ठोस और तरल।
तेजी ग्रोवर जी को इन अनुवादों को पेश करने के लिए, अरुण-समालोचन सहित, बधाई।
हृदय विदारक अत्यंत संवेदनशील कविताएं और उतना ही सुंदर तेजी का अनुवाद। आशा करता हूं कि यह कविताएं किताब रूप में जल्दी ही पढ़ने को उपलब्ध होंगी।
ऐसी सुंदर कविताएं प्रकाशित करने के लिए आपको भी बधाई अरुण देव जी।
इस भयानक समय में जब बड़ी हस्तियाँ मौन की चादर ओढ़ कर सो गयीन्हें,वह कवि ही है जो पूरी निर्भीकता से सच बोल सकता है. ह्रदय को मथने वाली ये दस्तावेजी कविताएँ हमेशा याद राखी जायेंगी.
इन कविताओं में, कवियत्री का दर्द, बैचेनी और प्रतिरोध जिन शब्दों के साथ ध्वनित होता है वह पाठक को भीतर तक हिला देता है, कुछ पंक्तियाँ तो बहुत करुणादायी लगती हैं, यथा –
“एक माँ ताबूत को कसकर पकड़े बैठी बिना रोए चर्च में लोगों की परवाह के बिना “!
एक माँ अपनी बेटी का गाउन सिल रही है त्यौहार के लिये “!
इन कविताओं में उपमाएं युद्ध स्थिति और विकराल समय के साथ कितनी कुशलता से संगति के साथ रची गई हैं —
“राई किसी उषण दीप की तरह पक रही है ”
सूरज तोप की नली सा चमक रहा है “!
निश्चित ही इसमें तेजीजी के अनुवाद की कुशल संजीदगी भी सन्नीहित है !
बहुत अच्छा चयन, सम्पादन की दृष्टि और बैचैन करती कविताएं!
इन पर वाह और बेहतरीन लिखना बेमानी है, बल्कि हमें गहरी सोच और संवेदना के डूब ले जाने वाली कविताएं कहना ठीक होगा !
उफ़.. कितनी बेदर्दी से छील रही हैं यह कविताएं . कैसी पीड़ा से गुज़रे होंगे कवि और कविताएं पन्ने पर फैल जाते वक़्त. खून से सने शब्द अभी तक चू रहे .और तेजी जी का क्या हाल हुआ होगा अनुवाद करते वक़्त. जैसे खुद पर झेला हो सब, ऐसा अनुवाद है यह.
ये कविताएं भोगी गई हृदय विदारक सच्चाइयों का मर्मबेधी बयान हैं। इन्हें दर्ज करने के लिए कवि को सलाम है और इनका ऐसा सुन्दर अनुवाद सम्भव करने के लिए Teji Grover जी को बहुत बधाई।