| चार नृत्यकार अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की बातचीत |
यामिनी कृष्णमूर्ति
लय-लालित्य-लावण्य की त्रिमूर्ति

सीखना
पहले शास्त्रीय नृत्य और संगीत की परंपरा में एक गुरु पर एकाग्र रहना और एक ही घराने के प्रति पूरी निष्ठा रखना आदर्श माना जाता था. यह केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यवहार में भी निभाया जाता था. बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में यह अनुशासन धीरे-धीरे शिथिल होने लगा और चयन का एक पल्लवग्राही रवैया उभर आया, अलग-अलग शैलियों और घरानों से जो अच्छा लगे, उसे ग्रहण करने की प्रवृत्ति. ऐसा प्रतीत होता है कि यह परिवर्तन शास्त्रीय संगीत और शास्त्रीय नृत्य, दोनों में लगभग एक साथ ही हुआ.
शास्त्रीय नृत्य के संदर्भ में इस बदलाव के दो अर्थ सामने आए. एक अर्थ यह था कि किसी एक ही शैली के भीतर दो-तीन गुरुओं से शिक्षा ली जाए; हालांकि यह चलन बहुत व्यापक नहीं हुआ. दूसरा और अधिक प्रचलित अर्थ यह रहा कि एक से अधिक शास्त्रीय नृत्य-शैलियाँ सीखी जाएँ. विशेषकर दक्षिण भारत में यह प्रवृत्ति अधिक दिखी, जहाँ शैलियों की विविधता पहले से मौजूद थी. कथक में ऐसा बहुत कम देखने को मिला कि कोई कथक नर्तक या नृत्यांगना ओडिसी भी सीखे और दोनों शैलियों का समान रूप से अभ्यास करे; ऐसे उदाहरण अपवाद ही रहे.
इसके विपरीत, ओडिसी का संबंध भरतनाट्यम्, कुचिपुड़ी और मोहिनीअट्टम से अधिक निकट रहा, मानो इन शैलियों का एक परिवार-सा बन गया हो. मुझे लगता है कि कहीं न कहीं यामिनी कृष्णमूर्ति को यह अहसास रहा होगा कि जिस प्रकार का भरतनाट्यम् उन्होंने सीखा था, उसमें अभिनय की वह गहरी ऐन्द्रियता कम होती चली गई थी, जो संभवतः उन्हें कुचिपुड़ी से प्राप्त हुई.
ऐन्द्रियता और अभिनय
शायद कुचिपुड़ी में देवदासियों के योगदान के प्रति अधिक खुलापन था. बाद में मैंने स्वप्न सुन्दरी को एक नया ही प्रकार प्रस्तावित करने की ओर जाते देखा, जो कुचिपुड़ी से हटकर विलासिनीनाट्यम् था. ‘विलासिनीनाट्यम्’ अधिक सीधे तरह से देवदासियों की ही शैली और अभिनय का प्रस्ताव करता था. वह उन्होंने ख़ुद देवदासियों से ही सीखा था.
श्रेय
यामिनी कृष्णमूर्ति को ऐसा श्रेय दिया जाता है कि ओडिसी की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा बनने में उनका भी योगदान है. उन दिनों इन्द्राणी रहमान का भी योगदान माना जाता था, पर उन्होंने ओडिसी जल्दी ही छोड़ दिया. ओडिसी में निष्णात होने, उसके भव्य प्रदर्शन और प्रस्तुतियाँ करने के बावजूद. उनके नृत्य की सम्पदा में, मुख्य रूप से, भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी रह गयीं. अगर यामिनी ने भरतनाट्यम को नयी ऊँचाई दी, उसकी अन्तर्भूत ऐन्द्रियता को किसी भक्ति या अध्यात्म में विलीन होने बचाया, तो कुचिपुड़ी जैसी उस समय अल्पज्ञात शैली को उन्होंने लगभग राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया, हालाँकि, उस समय प्रकाश-व्यवस्था आज जैसी सूक्ष्म और सक्षम नहीं थी, पर मैंने कभी यामिनी के चेहरे पर या मंच पर कोई छाया देखी हो ऐसा याद नहीं आता. वे निश्छाय उज्ज्वलता थीं.
एक देह, अनेक शैलियाँ
यामिनी कृष्णमूर्ति के यहाँ तीन शैलियों की इयत्ता को बनाये रखने का जतन है. लेकिन आख़िर नृत्यकार एक ही है, देह एक ही है, वही उन सब शैलियों को अलग-अलग ढंग से सही व्यक्त कर रही है. ऐसा मानना चाहिए कि उनमें नृत्य शैलियों के साथ गहरा संवाद और साहचर्य सम्भव हुआ : उसको प्रभाव या तादात्म्य की पदावली में सोचना ज़रूरी नहीं है. एक ही नृत्यकार में भरतनाट्यम् और कुचिपुड़ी, दोनों, शैलियाँ व्यक्त हो रही हैं. इन दो शैलियों के पड़ोस में होने का, दोनों के लिए, कोई न कोई अर्थ होगा. वे उस नृत्य-देह में एक दूसरे से उदासीन नहीं रह सकतीं.
भेद-विलोप
मैंने उनको इन दोनों नृत्य शैलियों में नृत्यरत रहते हुए देखा है, हालाँकि, मैं एक ग़ैर विशेषज्ञ की दृष्टि से ही देख पाता था, क्योंकि मेरे पास वही दृष्टि थी. मैं विशेषज्ञ नहीं था. मुझे मोटे तौर पर यह पता था कि यह भरतनाट्यम् है और यह कुचिपुड़ी है. यह घोषित भी होता था. लेकिन देखते समय या उसका रसास्वादन करते समय यह पहचान मिट-सी जाती थी, कि यह भरतनाट्यम् है कि कुचिपुड़ी है. यह एक पारंगत नृत्यांगना का कौशल भी है. शैली का महत्त्व तभी तक है जब तक वह नृत्य की अभिव्यक्ति और सम्भावना को स्पष्ट व सघन करे, पर, ऐसा करते हुए उसका एक ज़रूरी काम अपना विलोप करना भी है. दर्शक के मन में यह भेद या यह पहचान भी न रह जाये कि यह भरतनाट्यम् है और यह कुचिपुड़ी है. जो देख रहे हैं वह नृत्य है, वह कुचिपुड़ी है या कि भरतनाट्यम् है या इन दोनों के बीच कोई अन्तर है, इसकी कोई भूमिका रसास्वादन में नहीं होती है.
दो सम्भावनाएँ
सम्भवतः मेरी अपनी स्मृति में कोई और ऐसी नृत्यांगना नहीं हुई, जिसकी देहयष्टि इतनी सुगठित हो जितनी यामिनी की थी. उस सुगठन में अद्भुत आनुपातिकता थी. वे लगभग एक मन्दिर की शिल्पित प्राचीन मूर्ति की तरह लगती थीं. अक्सर ये मूर्तियाँ थोड़े अतिशय से बनी हैं. उनमें देह को सुन्दर बनाने के लिए अंगों में थोड़ी अतिशयता भरी गयी है. पर यामिनी के मामले में वह अतिशयता उनके लिए स्वाभाविक थी, इसलिए, नृत्याभिव्यक्ति करते उनके अंग-प्रत्यंग में एक तरह की स्वाभाविक स्पर्धा का भाव होता ही होगा. उनकी वस्त्र-भूषा में पैरों पर बँधे घुँघरू और जहाँ तक वस्त्र जाता था, उसके छोर और पैर में बँधे घुँघरू के बीच थोड़ा-सा ख़ाली और दीख सकने वाला शरीर का एक गोरा-सा अंश होता था. वह अपने आप में कुछ भूमिका निभाता लगता था, यद्यपि उसकी कोई भूमिका नहीं होती थी. लेकिन वे अपने शरीर से जो ऐन्द्रियता बनाती थीं उस ऐन्द्रियता में वह छोटा-सा खुला हुआ पिंडली का हिस्सा भी भूमिका निभाता था.
यामिनी कृष्णमूर्ति के मामले में, जैसा कि औरों के बारे में भी, नृत्य के सन्दर्भ में, यह सही होगा कि नृत्य जितना अपने आप में सुन्दर है वह देह से उतनी ही सुन्दरता की अपेक्षा करता है और (एक तरह से) इधर आकर मामले दो धाराओं में बँट जाते हैं. एक देह सुन्दर नृत्य करती है. एक अर्थ में उसका सौन्दर्य दुगुना हो जाता है. दूसरी तरफ़, शायद देह इतनी सुन्दर न हो, फिर भी वह सुन्दर नृत्य करती है. इससे देह में सुन्दरता की कमी या अल्पता को नृत्य का सौन्दर्य ढँक देता है. दोनों सम्भावनाएँ होती हैं.
यामिनी बहुत सुन्दर थीं, एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी भी. कर्नाटक संगीत की कुछ दूसरी गायिकाएँ देखने में वैसी सुन्दर नहीं थीं जैसी कि एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी थीं. देह की सुन्दरता और संगीत से पैदा हो रही सुन्दरता, दोनों मिलकर समूचे सौन्दर्य को दुगुना कर देते हैं.
देह और नृत्य का एकाकार
नृत्य और नृत्यांगना या नृत्य और नर्तक के शरीर का तादात्म्य यों समझें, जैसे रंगमंच में भी अभिनेता या अभिनेत्री का शरीर ही माध्यम है, लेकिन वहाँ शरीर का रंग-कर्म से वैसा तादात्म्य अभीष्ट नहीं है जैसा नृत्य में है. नृत्य शरीर से ही सम्भव होगा, उसके होने का कोई और माध्यम नहीं है, जबकि रंगमंच में और भी तत्त्व हो सकते हैं जिनसे रंगमंच सम्भव हो, रंग-कर्म सम्भव हो.
नृत्य में शरीर की केन्द्रीय भूमिका है, उस शरीर से ही सब करना होता है. इस बात की थोड़ी समानता खेलकूद से है. वहाँ भी शरीर केन्द्र में है, कि शरीर से क्या किया जा सकता है, कितना ऊँचा कूदा जा सकता है या कितना दौड़ा जा सकता है आदि. वहाँ भी शरीर ही एक माध्यम है. नृत्य में नृत्यकार का शरीर से सम्बन्ध किसी हद तक उस पर पूरा नियन्त्रण रखने और उसी हद तक उसको स्वतन्त्र करने. दोनों से एक साथ जुड़ा है. नृत्यकारों से बातचीत करते हुए पता चलेगा कि थोड़ी देर तो वे अपने शरीर को संयमित करते हैं, फिर खुला छोड़ देते हैं. शरीर अपने आप ही कुछ करने लग जाता है और उनको शरीर पर नियन्त्रण करने की कोई ज़रूरत नहीं रह जाती. यह वह क्षण होगा जहाँ नृत्य और शरीर दोनों ही ऐसी स्वतन्त्रता पा लें, कि दोनों एकाकार हो जाएँ.
सम्भवतः येट्स ने इसी का उल्लेख किया है : हाऊ कैन वी नो द डांसर फ्रॉम द डांस?’ जिस तरह से येट्स लिख रहे हैं, उससे लगता है कि वह दर्शक को सम्बोधित है. तुम कैसे फ़र्क़ कर सकते हो, तुम नृत्य और नृत्यकार को कैसे अलग कर सकते हो. यह दर्शक को ही सम्बोधित है. उसका मूल आशय यह है कि दोनों एक दूसरे के बिना सम्भव नहीं है, कम से कम उस सर्जनात्मक क्षण में जिसमें दोनों एकाकार हैं, दोनों तदात्म हैं. यह तादात्म्य एक तरह की स्वतन्त्रता से ही सम्भव है, और वह स्वतन्त्रता जब दोनों एक दूसरे को देंगे तभी तादात्म्य आयेगा.
त्रिमूर्ति
1960-61 में कभी दिल्ली के सप्रू हाउस के सभागार में मैंने यामिनी कृष्णमूर्ति को पहली बार नाचते देखा था. उनकी उपस्थिति अदम्य थी, लगभग दबंग. जैसे कि वह दृश्य पर सब कुछ को रौंद देंगीं, सिर्फ़ वही रहेंगी. अद्वितीय, अकेली, लय-लालित्य-लावण्य की त्रिमूर्ति.
यामिनी की ऊर्जा और स्फूर्ति असाधारण और असमाप्य थी : वह उनकी किसी भी प्रस्तुति में, भले उसकी अवधि दो घण्टे से भी अधिक की क्यों न हो, सारे समय सक्रिय रहती थीं. ऊर्जा और उनका प्रभाव अजस्र होता था. वे पृथ्वी के जिस टुकड़े पर नाचती थीं वह मानो सारी पृथ्वी को आयत्त करने जैसा हो जाता था.
नृत्य से तदात्म नर्तकी
यामिनी अपनी देह और नृत्य की ज्यामिति को बहुत सन्तुलित ढंग और अचूक संयम से व्यक्त व अन्वेषित करती थीं; उसमें शृंगार का निष्कलंक सौन्दर्य प्रगट होता था. उसकी शक्ति और व्याप्ति भी. नर्तकी और नृत्य इस क़दर तदात्म हो जाते थे कि उनको अलगाकर देखना या सराहना सम्भव नहीं होता था. यामिनी नृत्य के वैभव और ऐन्द्रियता का लगभग पर्याय बन जाती थीं. उनकी नाचती देह मुक्त भी लगती थी, संयमित भी. उसमें ऐश्वर्य था, उत्कट विपुलता थी पर कोई अतिरेक नहीं, कोई फ़ुज़ूलख़र्ची नहीं. कुछ कहो, बहुत-सा उकसाओ. कुछ याद करो, बहुत सारे को याद करने की उत्कंठा जगाओ.
मध्य प्रदेश में
बाद में, विशेषतः मध्यप्रदेश में, अपने लम्बे सांस्कृतिक प्रयत्न के दौरान, उन्हें कई बार भोपाल और अन्य शहरों में आमन्त्रित करने का सुयोग हुआ. मैं तब कहा करता था कि अगर दिल्ली-चेन्नई-भोपाल के रसिकों को अधिकार है कि वे श्रेष्ठ नर्तकी यामिनी कृष्णर्मूति का नृत्य देखें, तो बैतूल या शहडोल के नागरिकों को यह अधिकार क्यों नहीं है? वे ऐसे अनेक स्थलों पर सहर्ष गयीं और वहाँ जो असुविधाएँ हुई होंगी उनकी शिकायत तो दूर, कभी भूले से ज़िक्र तक नहीं किया.
1976 में जब हमने उत्तर भारत में मन्दिर और शास्त्रीय नृत्य को कम से कम एक सप्ताह के लिए साथ होने के उद्देश्य से खजुराहो नृत्य समारोह शुरू किया तो पहले ही समारोह में यामिनी थीं. 1982 में भारत भवन के पहले न्यास में कुमार गन्धर्व, हबीब तनवीर, मणि कौल के साथ वे भी न्यासी थीं. आयु के कारण देह शिथिल पड़ते ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से नाचना बन्द करने की समझदारी बरती, जबकि इन दिनों अनेक शिथिल गात नृत्यांगनाएँ अपना ही विद्रूप नाचकर बनाने में संकोच नहीं करतीं.
देह की कल्पना
यामिनी कृष्णमूर्ति ने कहीं कहा है कि वे बचपन में मूर्तिशिल्पों को देखकर उन्हें अपनाने का प्रयास करती थीं. चिदम्बरम् मन्दिर में. यामिनी की भंगिमाएँ, मुद्राएँ मूर्तिशिल्पों से एकमेक हो जाती लगती हैं. भरतनाट्यम् पर विचार करने का अर्थ काव्य, संगीत, नाट्य व ललित कला से सन्दर्भित होना भी है. भारतीय शास्त्रीय नृत्यों का यह वैशिष्ट्य भारत की अपनी निजी पहचान है. पश्चिम की नृत्य शैलियाँ बैले इत्यादि ज़्यादातर समूह नृत्य है. उनका किसी स्थापत्य या किसी मूर्तिशिल्प से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है. अव्वल तो वहाँ ऐसी मूर्तियाँ ही नहीं हैं. ख़ासकर ईसाई पश्चिम में अधिक से अधिक ईसा मसीह की मूर्ति है या उनकी माता मेरी की है और कुछ सन्तों की हैं. वे सभी ऐसे रूपाकार हैं जिनसे नृत्य निकलना लगभग असम्भव है, हालाँकि, संगीत शायद हो सकता है. यह बुनियादी फ़र्क़ है.
हमारे यहाँ कलाओं की अन्तनिर्भरता की बात की जाती है, जिसका एक बड़ा उदाहरण ‘विष्णुधर्मोत्तर पुराण’ से दिया जाता है. राजा चाहता है कि वह मूर्ति बनाये. गुरु राजा से कहता है, अगर मूर्ति बनाना चाहते हो तो पहले तुमको नृत्य सीखना होगा. नृत्य सीखना चाहते हो तो तुम्हें फिर संगीत सीखना होगा. संगीत सीखना चाहते हो तो काव्य पढ़ना होगा. सभी कलाओं को जब तक नहीं जानोगे तब तक ठीक-ठीक मूर्तिकार नहीं हो सकोगे. अन्ततः यह बात सबसे ज़्यादा सही नृत्य के बारे में हुई.
जहाँ तक मैं जानता हूँ और कोई परम्परा ऐसी नहीं है. सम्भवतः एशिया में कहीं होगी, और वह, एक तरह से, भारतीय परम्परा का ही विस्तार होगी. यह पौर्वात्य परिसर की विशेषता है. एक अर्थ में यह सम्बन्ध सबसे प्रबल रूप से भरतनाट्यम् और ओडिसी में व्यक्त होता है और सबसे शिथिल रूप में कथक में. मुझे नहीं लगता कि कथक में कोई यामिनी कृष्णमूर्ति जैसी नर्तकी हुई. उतनी लहीम-शहीम और बिल्कुल मूर्ति लगने वाली. यह यामिनी कृष्णमूर्ति का निजी गुण तो था ही, लेकिन उनकी शैली का भी यह एक गुण है, कि उसमें देह की कल्पना एक मूर्तिशिल्प की तरह ही की गयी है. यामिनी कृष्णमूर्ति जैसी देह की ज्यामिति का प्रयोग शायद सबसे सशक्त रूप से मालविका सरूकाई ने किया है. उन्होंने शास्त्रीय परम्परा से बाहर जाकर भी कविता पर, दूसरे क़िस्म की कविताओं पर, कोरियोग्राफ़ी की है
केलुचरण महापात्र
ओडिसी के शिखर-पुरुष

गुरु और प्रस्तोता
हमारे यहाँ शास्त्रीय नृत्यों के बारे में यह एक अपेक्षाकृत अलक्षित तथ्य है कि सभी के गुरु और प्रस्तोता पुरुष रहे. गुरुओं में जिनकी याद भी की जा सकती है, वे अधिकांशतः पुरुष रहे. बहुत कम स्त्रियाँ गुरु-स्थानीय हो पायीं. ओडिसी में हुई, लेकिन वह बहुत बाद की घटना है. ओडिसी में केलु बाबू के अलावा कई लोग थे. देवप्रसाद दास, हरेकृष्ण पहरा आदि. सबसे ज़्यादा प्रभावशाली, कल्पनाशील, नवाचारी और समझदार केलु बाबू ही सिद्ध हुए. वे गोटीपुआ परम्परा से आये थे. उनका संस्कृत और शास्त्र का ज्ञान अच्छा था. वे विद्वान नहीं थे, ऐसी विद्वत्ता का कोई दावा भी उन्होंने कभी नहीं किया, लेकिन उनका शास्त्र ज्ञान प्रबल था; दूसरी तरफ़, ‘गीत गोविन्द’ की विशेषज्ञता भी थी.
मूर्तिशिल्प और अष्टपदी
ओडिसी को यह सौभाग्य मिला कि वह महान् कविता के इर्द-गिर्द विकसित हो सकी. एक दूसरा पक्ष था, मूर्ति स्थापत्य से उसका सम्बन्ध. सारी नृत्य शैलियों में ओडिसी का सम्बन्ध मूर्तिशिल्प से शायद सबसे अधिक है. उसकी बहुत सारी मुद्राएँ, भंगिमाएँ और देहयष्टि के बहुत सारे प्रत्ययात्मक रूप मूर्तिशिल्प से प्रभावित लगते हैं, जैसे, संयुक्ता पाणिग्रही का नृत्य. संयुक्त पाणिग्रही की मुद्राएँ या जब थोड़ा-बहुत यामिनी कृष्णमूर्ति या सोनल मानसिंह ने भी ओडिसी किया, उसमें भी यह था कि नृत्य प्रस्तुति के विगलित क्षण बिल्कुल मूर्तिवत हैं. यह बात ओडिसी में हुई और केलु बाबू ने इसको कलात्मक परिष्कार और सौष्ठव दिया.
‘अष्टपदियों’ में से कई ऐसी हैं जिन्हें हमारे मध्यवर्ग में अभी भी जो विक्टोरियन मानसिकता व्याप्त है, उसके तहत उनको घोर ऐन्द्रिय या अश्लील तक कहा जा सकता है. लेकिन केलु बाबू का यह कमाल था कि उन्होंने ऐसी शैली को तराशा है कि वह सम्प्रेषित भी होती है और तथाकथित नैतिकता की किसी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती. उन्होंने बहुत ही कुशल, संवेदनशील और बहुत नाज़ुक सन्तुलन साधा है. जहाँ उनको लगता है कि शृंगार अतिशयता की ओर जा रहा है, तो वह शृंगार को बहुत कुशलता से भक्ति की ओर मोड़ देते हैं, ताकि सहज ही ग्राहय हो जाये. यह उनका कमाल होता था. ‘कुरु यदुनन्दन’ आदि में. ‘कुरु यदुनन्दन’ में कृष्ण से राधा कह रही है कि तुम मेरे स्तनों पर चन्दन लेप करो. पूरी ‘अष्टपदी’ इसी के बारे में है. उन्होंने उसकी कोरियोग्राफ़ी की है, जिसमें स्तनों को ऐसे दिखाया जाता है कि अगर दर्शक बहुत सतर्क न हों तो शायद नज़र ही नहीं आये कि यह क्या है. उसमें दूसरा लाभ यह है कि कोई संस्कृत ज़्यादा समझता नहीं. दर्शकों में से बहुत कम संस्कृत जानते हैं. वे ‘कुरु यदुनन्दन’ को समझते नहीं हैं कि क्या कहा जा रहा है, तो वह अलक्षित रह जाता है. इन सबका केलु बाबू ने बड़ी होशियारी से इस्तेमाल किया.
दिल्ली और भोपाल
केलु बाबू के साथ मेरा कोई व्यक्तिगत सम्बन्ध नहीं बना.
मैंने उन्हें पहली बार दिल्ली में देखा था. तब वह, एक तरह से, उभर रहे थे. मैंने तब तक उनको नाचते नहीं देखा था. वे ऐसे गुरु थे जो अपने शिष्यों की प्रस्तुतियों में पखावज भी बजाते थे. मुझे ठीक से याद नहीं है कि मैंने उन्हें किस भूमिका में देखा था. उन दिनों जब मैं पहली बार दिल्ली में था, ओडिसी का नया-नया उन्मेष हुआ था और तब तक वह शास्त्रीय नृत्य की मान्य शैलियों में दाख़िल नहीं हुई थी, हालाँकि, उसकी प्रक्रिया ज़बरदस्त ढंग से शुरू हो गयी थी.
भोपाल-समय के दौरान कई बार केलु बाबू से मुलाक़ात हुई. हम उनको अक्सर, किसी न किसी कार्यक्रम में, बुलाते थे. वे कुछ लोगों के साथ आते थे. तब तक भी मुझे यह पता नहीं था कि वे ख़ुद कितना अच्छा नाचते हैं, क्योंकि उनका एकल प्रदर्शन बहुत कम होता था. अक्सर उनकी शिष्याएँ आती थीं, उनके साथ बहुत बार केलु बाबू भी आ जाते थे. वे बहुत विनम्र थे. उनके पास सारे कारण थे कि वे अपने को थोड़ा तीसमारख़ाँ मानें, क्योंकि नृत्य के क्षेत्र में किसी और गुरु ने इतने श्रेष्ठ शिष्य पैदा नहीं किये जितना अकेले उन्होंने किये—इसमें भारत की सभी नृत्य शैलियाँ शामिल थीं. उनमें यह समझ थी कि वे अपने शिष्य या शिष्या की देह की स्वाभाविक लय को शिल्पित कर सकते थे—वही पद माधवी मुद्गल या कुमकुम मोहन्ती या शर्मिला विश्वास कर रही हैं, तो वही पद उनकी देहयष्टि से अलग-अलग रूपों में दिखायी देता था और यह उनकी गुरु-शिक्षा का कमाल था.
युगल नृत्य
केलु बाबू बातचीत में बहुत ही सामान्य थे. उनको मैंने पहली बार बेंगलुरु में नाचते हुए देखा था. प्रतिमा बेदी ‘वसन्त हब्बा’ नाम से वसन्त उत्सव करती थीं. बेंगलुरु के पास उनका नृत्यग्राम था. बेंगलुरु से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर एक गाँव में. मुझे आमन्त्रण मिला तो गया था. वहाँ पहली बार केलु बाबू और बिरजू महाराज का युगल नृत्य हुआ. बहुत बड़ी संख्या में लोग देख रहे थे. इसके पहले उनका युगल नृत्य कभी हुआ नहीं था. उन्होंने आपस में बातचीत करके कि क्या करना है यह तय किया होगा, ऐसा भी मुझे नहीं पता. बहरहाल! मैंने वह प्रस्तुति ही देखी. उस समय बिरजू महाराज अपनी फुर्ती और लय पर अधिकार के उरूज़ पर थे. केलु बाबू कृशकाय, दुबले-पतले, क़रीब-क़रीब सिर गंजा. उस प्रस्तुति में बिरजू महाराज कृष्ण का अभिनय कर रहे थे, केलु बाबू राधा का. एक व्यक्ति जिसका शरीर वैसे नृत्यकार का शरीर लगता ही नहीं था, उसमें वे कितनी सूक्ष्मताएँ, बारीकियाँ, जटिलताएँ और कितनी सुन्दरता लिए नृत्यरत थे, (अपने वय के बावजूद) यह देखना लगभग जादू जैसा था. मुझे केलु बाबू के अभिनय की तुलना में बिरजू महाराज का अभिनय काफ़ी सतही, सपाट और किसी हद तक फूहड़ लगा. एक तरफ़, केलु बाबू का नृत्य, उनका अभिनय जैसे उनके पूरे शरीर और आत्मा से उपजता हुआ था और, दूसरी तरफ़, बिरजू महाराज का नृत्य एक तरह का व्यायाम लग रहा था. अच्छा व्यायाम, कभी-कभी मोहक भी. लेकिन उसमें वह गहराई और सुन्दरता नहीं थी जो कि केलु बाबू में थी. इसके बाद मैंने उनका नृत्य भारत भवन में और अन्यत्र भी दो-तीन बार देखा. हर बार केलु बाबू का नृत्य बहुत ही उच्चकोटि का था, इसमें कोई शक ही नहीं.
सहकार
केलु बाबू के नृत्य की अद्भुत विशेषताएँ थीं. उनकी सारी मुद्राओं आदि को देखकर यह बिल्कुल स्पष्ट समझा जा सकता था कि भारतीय परम्परा में शिल्प, स्थापत्य, नृत्य, संगीत और कविता के बीच सहकार की अवधारणा कैसे किसी एक व्यक्ति में मूर्त होती है. उनकी समझ सिर्फ़ बौद्धिक समझ नहीं थी, वह गहरी संवेदनात्मक समझ भी थी. वह जयदेव की कविता और उस कविता को प्रतिबिम्बित करने की कोशिश करने वाली समझ नहीं थी. वह समझ उस कविता की इबारत के बरक्स शरीर की नृत्य द्वारा रची गयी समान्तर/समानान्तर इबारत गढ़ने की चेष्टा थी. वह अनुसरण या अनुगमन नहीं था. ऐसा करते हुए उनका शरीर मन्दिर स्थापत्य, मूर्तिशिल्प आदि सबको जैसे आत्मसात् करके रूपायित होता था. यह कह सकते हैं कि जब केलु बाबू नाचते थे तब ओडिसी तो नाचती ही थी, जयदेव भी नाचते थे, मन्दिर की मूर्तियाँ और स्थापत्य भी नाचता था. ये सब मिलकर एक ही व्यक्ति में नाचते थे जो कि कमाल की बात है. केलु बाबू का नृत्य ‘विष्णधर्मोत्तर पुराण’ के सूत्र का जीवन्त उदाहरण है.
अन्तर्निर्भरता
विभिन्न कलाओं की अन्तनिर्भरता उनकी अपनी स्वायत्तता, अपनी इयत्ता, अपनी स्वतन्त्रता के शिथिल करने की या शिथिल होने की अभिव्यक्ति नहीं है. यह माना जाता था कि नृत्य अपने आप में स्वतन्त्र अभिव्यक्ति है, पर उस स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का दूसरी स्वतन्त्र अभिव्यक्तियों से सहकार और संवाद हो सकता है, होना चाहिए और होता आया है. यह किसी का ऐसा करने का निजी निर्णय लेना नहीं है, यह नृत्य की सामूहिकता का हिस्सा है. होता ही था. उस समय के कलाकारों को जो शास्त्रीय प्रशिक्षण मिलता होगा, उसमें शास्त्र का अर्थ सिर्फ़ उनके अपने अनुशासन का शास्त्र नहीं रहा होगा, बल्कि उसमें दूसरे अनुशासनों/ शास्त्रों का भी कुछ न कुछ अवगाहन अन्तर्भूत व अन्तर्गुम्फित रहा होगा. बाद में धीरे-धीरे कई कारणों से यह अन्तर्सम्बन्ध छूटता गया. आधुनिकता के हस्तक्षेप ने बहुत सारे नये वर्गीकरण पैदा कर दिये. शायद कलाओं को अपनी स्वतन्त्रता ज़्यादा प्यारी और न्यारी लगने लगी होगी—उन्होंने दूसरी कलाओं को सीखना ज़रूरी और कष्टसाध्य मानकर छोड़ा होगा. कई कारण हो सकते हैं. जब किसी नये कलाकार को, कुछ नये क़िस्म का काम करना होता है, तो वह अक्सर कलाओं की अन्तर्निर्भरता का सहारा लेता है. अपनी कला से बाहर दूसरी किसी कला से सम्बन्ध बनाने की चेष्टा करता है. अन्तर्निर्भरता के सम्बन्ध में भी केलु बाबू का नृत्य उज्ज्वल उदाहरण है.
मुक़ाम
सम्भवतः कलाओं की इस तरह की अन्तर्निर्भरता कभी सर्वमान्य थी. कालान्तर में जब कलाओं की अपनी स्वायत्तता का कुछ दबाव उन पर बढ़ा होगा तो बहुत सारी चीज़ें अनावश्यक लगने लगी होंगी, जैसे, चित्रकार नृत्य क्यों सीखे. पर दूसरी तरफ़, माध्यम की सम्भावना को कम से कम दो तरह से बढ़ा सकते हैं. एक यह कि उसी माध्यम में कुछ और खँगालें, कुछ और डालें, सामग्री बदल दें, विधि बदल दें, विषय बदल दें. एक नयी सम्भावना का प्रसंग उसी कला में, उसी माध्यम में करें. दूसरी तरफ़, यह सम्भावना है कि अपने माध्यम से बाहर जाकर कुछ और इस माध्यम में लाने की कोशिश करें. कलाओं की अन्तर्निर्भरता उस समय काम की होगी. जैसे, हुसेन की रेखाओं के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि वे मूर्तिशिल्पों से प्रेरित थीं. यह मान सकते हैं कि कलाओं के बीच संवाद और सहकार इन सभी कलाओं को समृद्ध कर सकता है. कई बार कलाकार उनमें ऐसे तत्त्व शामिल कर सकता है जो बिना इस सहकार या संवाद के सम्भव नहीं हो पाते. दूसरी तरफ़, यह भी मानना चाहिए कि हर कला में उत्कृष्ट मुक़ाम पर पहुँचने की क्षमता और सम्भावना है. उसके लिए यह ज़रूरी या अनिवार्य नहीं है कि वह कहीं और से भी मदद ले.
सौन्दर्य-बोध
केलु बाबू का सौन्दर्य-बोध ऐसा है जिसने अपने को आधुनिकता से दूषित नहीं होने दिया. वह आधुनिकता को स्वीकार करता है, क्योंकि वह आधुनिक बन रहे समाज में उपस्थित नृत्य है. जैसे, आधुनिकता की बहुत सारी उपकरणात्मकता भी है. प्रकाश व्यवस्था, मंच, रंगबन्ध आदि : ये सब केलु बाबू ने स्वीकार किये और इनके अनुरूप अपने नृत्य को सजाया-सँवारा, लेकिन उन्होंने बुनियादी सौन्दर्य को आधुनिकता से बाधित नहीं होने दिया, इसलिए, उनके यहाँ सौन्दर्य-बोध बचा रहा. कुछ और लोगों के यहाँ भी बचा होगा, लेकिन ज़्यादातर के यहाँ आधुनिकता की झोंक में जाता रहा.
अभाव से उत्कृष्टता
ऐसा कई कलाकारों के सन्दर्भ में पाया जा सकता है जहाँ किसी ने किसी अभाव में (तरह-तरह के अभाव हो सकते हैं)—चाहे वह अवसर, प्रशिक्षण, संरक्षण या साधनों का अभाव हो. इन अभावों के बावजूद ऐसे कलाकारों-लेखकों की बड़ी संख्या है जो उत्कृष्टता अर्जित कर सके. यह सिर्फ़ केलु बाबू के मामले में या गोटीपुआ वालों के मामले में ही नहीं है. जो लांछन महरियों पर लगा, वही लांछन ठुमरी और ग़ज़ल गायिकाओं पर बनारस और उत्तर भारत में लगा. वही लांछन देवदासियों पर लगा. ये पहले से चली आ रही मान्य कला परम्पराओं के लोग थे. इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी थी, और कम से कम, लांछन नहीं था. बहुत सारी लोक कलाओं में भी बाद में ऐसे लांछन लगना शुरू हुए. बुन्देलखण्ड में राई बेड़नी नाचती थी. बेड़नी का नाचने का मतलब यह होता था कि रात को ज़मींदार के साथ अपनी रात बितायेगी—इस तरह की धारणा थी. वह कितनी सही थी, पता नहीं. राई के प्रकरण में यह है कि हमने राई को उबार कर प्रस्तुत करना शुरू किया था. जब यकायक ऐसा लगने लगा कि इसको सामाजिक मान्यता मिली है, तो बुन्देलखण्ड में राई के बहुत सारे कलाकार और बेड़नियाँ पैदा हुए.
अभाव से उत्कृष्टता के अपार उदाहरण हैं. परम्परा में भी हैं, आधुनिक समय में भी हैं और सभी कलाओं में होंगे. पण्डित भीमसेन जोशी संगीत सीखने की लत में घर से भाग गये और कहाँ-कहाँ कुछ करते ग्वालियर पहुँचे, जलन्धर तक गये. मल्लिकार्जुन मंसूर के पास सोने की जगह नहीं होती थी. ये सब अभाव से उत्कृष्टता के उदाहरण हैं. दूसरा, सामाजिक मान्यता मिलने, न मिलने का जो प्रभाव या दुष्प्रभाव पड़ता है, वह अनेक कलाओं पर पड़ता रहा है.
परस्पर
समय के साथ कलाएँ जिस तरह से बदलती चलती हैं, उसकी समझ के कुछ पहलू भी सम्भवतः इससे खुलते हैं कि किस तरह से नैरन्तर्य में परिवर्तन भी आते चलते हैं. अगर कुछ कलाकार जात्रा और थिएटर की ओर नहीं आये होते, तो ये दोनों कलारूप दूसरा रूप धारण नहीं कर पाते. इनसे फिर केलु बाबू ने अपनी नृत्य शैली के लिए सीखा और उससे उन्हें अपनी नृत्य-दृष्टि को व्यापक बनाने में मदद मिली. जैसे, जात्रा में बंगाली रंगकर्मी उत्पल दत्त हैं. उत्पल दत्त जात्रा की ओर गये और वे जात्रा के कुछ तत्त्वों को अपने रंगमंच में ले आये. जात्रा में केलु बाबू जैसे लोग थोड़े वक्त के लिए भी रहे होंगे, तब भी जात्रा के रूप में कुछ फ़र्क़ ज़रूर आया होगा.
प्रकृति की उपस्थिति
केलु बाबू के बारे में जो पक्ष अलक्षित नहीं जाना चाहिए, वह है—प्रकृति से कलाओं का तादात्म्य. इसकी भी एक बड़ी परम्परा रही है जिसको आधुनिकता ने बाधित या दूषित किया है. केलु बाबू के नृत्य में और उन पर कुमार शहानी द्वारा बनायी फ़िल्म ‘भावन्तरण’ से भी यह प्रकट होता है. केलु बाबू का नृत्य सिर्फ़ दर्शकों के सामने सुन्दर नहीं था. वह दर्शकहीन, सर्वथा प्राकृतिक दृश्य में भी उतना ही सुन्दर था. प्रकृति के साथ और प्रकृति के विभिन्न प्राकृतिक उपादानों का कविता, चित्रकला और अन्य में बहुत उपयोग होता रहा है. ‘गीत गोविन्द’ में भी तरह-तरह के प्राकृतिक उपादानों का बहुत विस्तार है. केलु बाबू के नृत्य में प्रकृति की अर्थगर्भी उपस्थिति है और उससे उन्होंने अपने लिए बहुत कुछ हासिल किया है. विभिन्न कारणों से आधुनिक शास्त्रीय कलाकारों की प्रकृति से बहुत कम निकटता हो पायी है. जब प्राकृतिक तत्त्वों का अपनी प्रस्तुति में निरूपण करते हैं, लेकिन वास्तविक प्रकृति से कोई सम्बन्ध नहीं होता तब यह सिर्फ़ एक शैलीगत रूढ़ि रह जाती है. केलु बाबू के यहाँ ऐसा नहीं है. “भावान्तरण” फ़िल्म देखने से यह स्पष्ट ही समझ में आ सकता है—पहले मुझे ख़ुद इसका इतना अन्दाज़ नहीं था.
सहचारिता
ओडिसी के संगीत की मोहक ध्वनियाँ भी दर्शकों को लुभा लेती हैं, हालाँकि, नृत्य-संगीत स्वतन्त्र संगीत नहीं है. वह नृत्य की आवश्यकताओं, अपेक्षाओं, उसके अर्थ सन्दर्भ को ध्यान में रखकर विकसित होता है. केलु बाबू ने भुवनेश्वर मिश्र के साथ मिलकर जो पल्लवी की है वह, एक तरह से, ओडिसी का सबसे निर्णायक और शायद सबसे लम्बी अवधि का अंश है और वह नृत्य है, भले उसमें बहुत सारे अभिनय के तत्त्व भी समाहित हो जाते हैं : ‘पल्लवी’ अपने आप में देह का नृत्य है. जिसमें देह ही पल्लवित हो रही है. नृत्य के माध्यम से देह का पल्लवन संगीत के साथ-साथ होता है. उसमें संगीत और नृत्य दोनों की सहचारिता है. वह सहचारिता इतनी प्रबल व सशक्त होती है कि अलग से सुनायी या दिखायी देती है. वैसे संगीत चलता ही रहता है. जब नृत्य हो रहा है तब उसके साथ संगीत होगा ही. वह उस अर्थ में साथ नहीं है. वह ज़्यादा गहरे और ज़्यादा सशक्त रूप में संगत है, इसलिए, उसमें जिन बोलों के आधार पर पल्लवन दिखाते हैं, वे बोल अक्सर संगीत के हैं, वे मूलतः नृत्य के बोल नहीं हैं. उससे जो बात बनती है, वह बिल्कुल अलग अनुभव है. एक तरफ़ अभिनय पर केन्द्रित ‘अष्टपदी’ है, फिर अभिनय से मुक्त अमूर्तन पर केन्द्रित ‘पल्लवी’ है. इन दोनों को जिस तरह से केलु बाबू ने अपनी प्रस्तुतियों में गूँथा उससे उनका बड़ा गहरा प्रभाव पड़ना शुरू हुआ. उनकी अभिव्यक्ति की सौन्दर्य-दृष्टि भी ज़्यादा स्पष्ट नज़र आयी.
कविता और नृत्य
एक कल्पनाहीन प्रस्तुति ऐसी होगी, जिसमें कविता में जो कहा गया है, उसको नर्तक नृत्य में लगभग वैसा का वैसा ही नाच से दिखा दे. कविता में ‘वृक्ष’ कहा गया है, तो वह वृक्ष दिखा दे; ‘फूल’ कहा गया है, तो वह फूल खिला दे. कविता में वर्षा है, तो वह नृत्य में वर्षा दिखा दे. इसमें कोई विशेष उन्मेष नहीं है. यह सिर्फ़ हुनर का मामला है कि कितना अच्छा कर सकता है. ज़्यादातर कविता के साथ नृत्य का यही व्यवहार होता है. कथक में अपेक्षाकृत कमज़ोर कविताएँ लेने का एक कारण शायद यह भी है कि फिर वे कविता की अपनी इबारत से बहुत ज़्यादा बँधे नहीं होते, उनको उसमें बढ़त करने की, उपज की सम्भावना नज़र आती है. अगर सुगठित कविता हो, अच्छी कविता हो, तो शायद उसमें कम नज़र आयेगी, क्योंकि कविता का अपना अस्तित्व, अपनी इबारत अपना इसरार करेगी. दूसरा उपाय या विकल्प यह है कि कविता के समानान्तर एक नृत्य-पाठ विकसित करें, जो कविता से जुड़ा तो लगे, पर, कविता का नृत्य में अनुवाद न लगे. ऐसा करने के लिए बहुत ही कल्पनाशील, सृजनशील नृत्य-बुद्धि चाहिए जो अक्सर होती नहीं. यह कठिन रास्ता है. कविता के पड़ोस में होने का एहतराम तो हो, लेकिन आप कविता के घर के बरक्स नृत्य का एक घर बना रहे हों, उसी के पड़ोस में, उससे बतियाते हुए, अपना दरवाज़ा और उसके दरवाजे़ को साथ लाते हुए, उसकी खिड़की से झाँकते हुए और अपनी खिड़की को ढाँपते हुए. ऐसा करने में कल्पनाशीलता, परिश्रम चाहिए और अपने नृत्य की अन्तर्भूत सम्भावनाओं की अधिक गहरी समझ, संवेदना चाहिए, उसकी सम्भावनाओं पर विश्वास चाहिए. यह केलु बाबू के यहाँ है. जैसे ही शृंगार हावी होने लगता है तो वे उसको भक्ति की तरफ़ बरका देते हैं. ऐसी सूझबूझ और कविता की शाब्दिक समझ से अलग समझ होनी चाहिए. कविता शब्दों में लिखी जाती है पर वह शब्द तक सीमित नहीं होती.
ओडिसी में छऊ नृत्य
केलु बाबू ने कभी-कभी ओडिसी की शैली से हटकर जटायु जैसे ग़ैर मानवीय चरित्रों को चित्रित करते हुए ‘छाऊ शैली’ को अपनाया है. उनकी बाद की कुछ रचनाओं में छाऊ के कुछ तत्त्व स्पष्ट रूप से दिखायी देते हैं. असल में, कभी-कभार विषयगत अभिनय के दौरान अपनी शैली का पालन करना सम्भव नहीं होता और विषय निर्माण के हित में कुछ हद तक कलात्मक स्वतन्त्रता की दरकार होती है. दोनों बातें हैं. अनेक शास्त्रीय परम्पराओं में ऐसा करने की स्वतन्त्रता या छूट रही है. कई बार शास्त्रीय गायक चैती, झूला और इस तरह के लोक संगीत के रूपों को अपनाते रहे हैं. उसमें शायद यह वृत्ति काम करती है कि उसको शास्त्रीय परिधि में ले लेंगे, तो शास्त्रीय परिधि का विस्तार होगा और उसको एक तरह की गरिमा मिल जायेगी. शायद एक कारण यह भी है कि अगर वह स्वाभाविक रूप से शास्त्रीय शैली में नहीं आ सकता, तो उसको लेकर उसमें कुछ शास्त्रीयता की खोज करने की चेष्टा होती है. शायद कुछ ऐसा ही केलु बाबू ने किया होगा. ‘छाऊ’ ओडिशा-बिहार की सीमाओं पर विकसित हुआ एक नृत्य-प्रकार है, उसमें कुछ-कुछ गुण शास्त्रीयता के भी रहे हैं, भले उसको अभी तक शास्त्रीय नृत्य के रूप में मान्यता नहीं मिली है. उसको ग्रहण करना या ओडिसी के किसी पक्ष को सशक्त या सबल करने के लिए उसका उपयोग करना उचित ही रहा होगा.
केलु बाबू ने अपनी नृत्य संरचनाओं में यह पक्ष ज़रूर जोड़ा, पर, बहुत व्यापक ढंग से इसका इस्तेमाल नहीं हुआ है. कभी-कभार किन्हीं चरित्रों को, ख़ासकर ऐसे पौराणिक चरित्रों को जो मनुष्येतर हैं, लिया गया है. इसमें थोड़ी-सी सीमा ओडिसी की भी है कि वह एक तरह का लालित्य-शृंगार का नृत्य है. ओडिसी की अपनी व्याकरण में आसानी से कोई युद्ध का दृश्य या ‘जटायु’ जैसे चरित्र को निभा पाना थोड़ा कठिन है. ओडिसी में छाऊ नृत्य को लेकर दो बातें हो रही हैं. पहला यह कि उनको अपनी अभिव्यक्ति के लिए उचित शैली मिल रही है और दूसरा यह कि अपनी शैली में रहते हुए भी, दूसरी शैली के किसी तत्त्व को स्वीकार करने में एक तरह की कलात्मक उदारता भी व्यक्त हो रही है. व्याकरण की जकड़बन्दी से एक तरह का हल्का-सा लचीलापन भी आया है.
घरानेदारी
घरानेदारी हमारी शास्त्रीय कलाओं का स्वभाव जैसा है. एक व्यापक शैली में अलग-अलग घराने, थोड़े-थोड़े अन्तर से घराने बनाने की कोशिश. सामान्य रसिकों के सामने इन घरानों की एक दूसरे से जो भिन्नता है वह बहुत जाहिर नहीं है. विशेषज्ञों के सामने होगी. ओडिसी में बनी शैलियाँ भी इसका उदाहरण हैं. ओडिसी में हुआ विकास और विस्तार ज़्यादातर दूसरी नृत्य शैलियों के मुक़ाबले ज़्यादा तेज है. कम अरसे में बहुत सारा विस्तार और बहुत सारे परिवर्तन, ये उसकी अपनी गतिशील ऊर्जा का भी प्रभाव है. इसे विधायक ढंग से ही लेना चाहिए. यह ओडिसी की गतिशीलता का ही साक्ष्य है कि वह सिर्फ़ एक ही तरह की, एकरूप, एकतान शैली के रूप में विकसित होने के बजाय इन विविध रूपों में विकसित हुई.
संगुम्फन
हर शैली में धुंधलका पैदा होता है. जब एक बड़ा प्रभावशाली व्यक्तित्व उभरता है तब वह अपनी नृत्य शैली में जिन तत्त्वों का संगठन करता है और जिनसे उसका नर्तकत्व तदाकार कर दिया जाता है तब यह होना अवश्यंभावी है कि उसके बाद उन्हीं तत्त्वों को प्रतिमान बनाकर, उन्हीं तत्त्वों को लगभग अभिज्ञान बनाकर लोग देखने लगें कि अगर ये तत्त्व इसमें नहीं हैं, तो यह कमी है. ज़रूरी तौर पर ऐसा हो, यह नहीं लगता. एक बड़ा कलाकार बहुत सारे तत्त्वों को संगठित व संगुम्फित कर सकता है और उसी शैली में रहते हुए कोई दूसरे युवा कलाकार उनमें से कुछ चुन सकते हैं, कुछ को छोड़ सकते हैं. इसलिए इसको ज़रूरी तौर पर केलु बाबू का सरलीकरण या केलु बाबू के रास्ते से विचलन मानना ठीक नहीं होगा.
किसी भी नृत्य शैली में यह हमेशा कठिन होगा, यह ठीक-ठीक बता सकना कि वह क्या है जो उसे वही शैली बनाता है. ओडिसी में ऐसा क्या है जो उसको ‘ओडिसी’ बनाता है? यह हर नृत्य शैली के बारे में कहा जा सकता है, मोटे-मोटे तौर पर कुछ चीज़ें बतायी जा सकती हैं, लेकिन अन्ततः उसका शिल्प, तकनीक, उसकी शैली सब मिलकर संगुंफन तैयार करता है, उससे पहचाना जा सकता है कि यह ‘ओडिसी’ है. ओडिसी में दूसरी शैलियों का भी प्रभाव है. कथक की क्षिप्रता का प्रभाव ओडिसी में हुआ है. दूसरी तरफ़ वह परिधान, वस्त्रभूषा और संगीत के कुछ पक्षों में भरतनाट्यम् से प्रभावित लगती है. स्वयं ओडिशा की कुछ लोक शैलियों का भी प्रभाव है. ये सब प्रभाव मिलकर ओडिसी बनाते हैं. इनमें से इन सबको अलग कर कोई शुद्ध ओडिसी की तलाश करना व्यर्थ होगा.
अनुचित अधीरता
केलु बाबू की शैली को अतीत की शैली की तरह देखना अनुचित अधीरता दिखाना है. मुझे नहीं लगता कि केलु बाबू की शैली का इतनी जल्दी विघटन हो गया है. उस शैली के मूल्यवान तत्त्वों का अभी भी कमोबेश अनुशासन व पालन क़ायम है. दूसरा यह कि अन्ततः किसी शैली का उसके प्रवर्तक के बाद क्या हश्र होगा, वह आगे कैसे चलेगी, यह बहुत कुछ कई तरह के संयोगों पर निर्भर करता है, जिनमें से एक संयोग यह है कि कितनी प्रतिभा उसमें फिर से सक्रिय हो रही है. दूसरा, वह प्रतिभा उस शैली से संयुक्त होने के बावजूद किस तरह की परिवर्तनशीलता को आत्मसात् करने की कोशिश कर रही है. यह कहना थोड़ी उलझी हुई-सी बात हो जाती है कि यह तो केलु बाबू की शैली से अपसरण है या विपथगामिता है, क्योंकि शैलियों में विस्तार और विचलन में ऐसे शास्त्रीय नृत्य में दूरी बहुत कम होती है. इसलिए यह कहना अनुचित अधीरता है कि कोई शैली में स्खलन हो गया है. अब प्रतिभा का और उस प्रतिभा को जो संस्कार केलु बाबू एक गुरु के रूप में दे सकते थे, वैसा संस्कार देने वाला कोई दूसरा नहीं है. तो उसके कुछ न कुछ तो अनपेक्षित दुष्परिणाम होंगे.
प्रतिमान
किसी भी एक नृत्य-प्रकार के सन्दर्भ में या उसके प्रवर्तक या उसकी शैली के सन्दर्भ में ‘प्रतिमानीकरण’ जैसे पद को कैसे देखा-समझा जाये, इसमें एक बड़ी समस्या है. वह समस्या यह है कि एक प्रवर्तक अपनी प्रतिभा, अपने कौशल और अपनी उपस्थिति से स्वयं ‘प्रतिमान’ बन जाता है—केलु बाबू या बिरजू महाराज स्वयं प्रतिमान हैं. अब इसके अलावा जो प्रतिमान बनते हैं, उनमें वह क्या है जो वैसा ही गम्भीर, ललित, सुचिन्तित, सुकल्पित हो? और ऐसा क्या है जो हल्का लगे, जल्दबाज़ी में किया लगे, अचिन्तित लगे? एक तरह का यह प्रतिमान बनना शुरू होता है कि जो कुछ हो रहा है, उसके पीछे किस तरह की कल्पना, किस तरह की दृष्टि और किस तरह का कौशल शामिल है. अगर उसमें कोई असन्तुलन या हल्कापन या इनको संगुम्फित करके कुछ प्रस्तुति बनाने की पर्याप्त चेष्टा का अभाव है, तब लगेगा कि यह प्रतिमान पर खरी नहीं उतरती. आमतौर पर प्रतिमान बहुत कम नये हो पाते हैं. साहित्य में इसको लेकर खामख्वाह ज़रूरत से ज़्यादा उत्साह नज़र आता है सिवाय इसके कि इसका औचित्य यह है कि समय बदलता है, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती हैं, समाज बदलते हैं तो उनमें प्रतिमानों का रूप भी बदलता है. लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि जो पहले प्रतिमान माना जाता था, वह अब यकायक प्रतिमान मानना बन्द हो जाये. ऐसा बहुत कम होता है.
हो सकता है कि ऐसे कुछ पक्ष और ऐसे आग्रह प्रतिमानों में जुड़ जाएँ जो पहले इतने महत्त्वपूर्ण न रहे हों. यह उस प्रतिमान को विस्तार देने जैसा होगा बजाय उसको खण्डित करने या उसको अतिक्रमित करने के. शास्त्रीय कलाओं के सन्दर्भ में एक तरह की निरन्तरता, अवधारणा के स्तर पर भी एक तरह की निरन्तरता अवश्यम्भावी है, अनिवार्य है. शास्त्रीय कलाओं के बारे में ऐसा नहीं सोच सकते कि प्रतिमान बहुत जल्दी-जल्दी और कई अर्थों में बदलेंगे. नाट्यशास्त्र द्वारा प्रस्तावित प्रतिमान लें, हालाँकि, वे हज़ार बरस पहले प्रस्तावित और विन्यस्त किये गये हैं, अभी भी मौजूं हैं, उनका अभी भी प्रासंगिकता के साथ उपयोग किया जा सकता है. प्रतिमानों के बारे में शास्त्रीय कलाओं में गति थोड़ी कम होती है. परिवर्तन ज़रूर होते हैं, पर, वे उतनी तेजी से नहीं होते, जितना ग़ैर शास्त्रीय कलाओं में सम्भव हो पाता है.
परिवर्तन
शास्त्रीय कलाओं का आग्रह स्थायी भावों की ओर अधिक होता है; उनमें परिवर्तन का स्वीकार है, लेकिन परिवर्तन की तानाशाही नहीं है. एक तरह से वह परिवर्तन को संयमित करने की विधा भी बन जाती है. बहुत तेज़ परिवर्तन या बहुत तेज़ गतिशीलता या बहुत तेज़ बहाव को, एक तरह से, शास्त्रीय रूप छेंकते हैं. इस कारण जब परिवर्तन को शास्त्रीय परिसर में अपेक्षाकृत अधिक जगह मिलने लगे तब वह उसको विशृंखल ही करेगी, लेकिन उचित परिवर्तन जो भी शास्त्रीय औचित्य का रूप है, उस रूप में अगर आयें या आने दिये जायें, तो फिर विशृंखलता नहीं लगेगी. इसलिए मुझे यह कहने में संकोच होगा कि ओडिसी में स्थिति विशृंखल हो गयी है. मुझे यह कहने में कम संकोच है कि प्रतिभा के स्तर और चरित्र में, (आमतौर पर पूरे देश में ही) शास्त्रीय कलाओं में आयी गिरावट और एक तरह की मीडियोक्रिटी के वितान के चलते ओडिसी में जो हो रहा है वह सिर्फ़ वहीं नहीं हो रहा है, वह कथक, भरतनाट्यम् और अन्य रूपाकारों में भी हो रहा है. यह एक रसिक का आकलन भर है.
कला का जादू
केलु बाबू के यहाँ जो देहभाषा है और जो देह की सम्भावना प्रकट होती है, उसकी किन्हीं और कलाकारों से तुुलना नहीं की जा सकती. उनकी शिष्या माधवी मुद्गल वह नहीं कर पातीं जो केलु बाबू कर पाते थे.
देह नृत्य का मुख्य माध्यम है. एक नाचती हुई देह अपने आप में होते हुए भी, नृत्य के दौरान, कई और देहों में परिवर्तित होती रहती है. केलु बाबू अगर नाच रहे हों, तो वे कृष्ण भी बनेंगे : उनकी देह कृष्ण-देह हो जायेगी, उनकी देह राधा-देह हो जायेगी, उनकी देह सखी-देह हो जायेगी, उनकी देह वृक्ष-देह हो जायेगी, उनकी देह यमुना-देह हो जायेगी. एक ही देह तरह-तरह के देहों में बदल रही है. अपनी एक देह में दूसरी देहों को अपनाने की क्षमता और कल्पनाशीलता दर्शकों को भी उसमें शामिल कर लेती है—वे देख पाते हैं कि ऐसा हो रहा है. ऐसा करते हुए भी यह देह उस दूसरी देह का संक्षेप ही करती है, क्योंकि थोड़े समय के लिए ही है. अगर वह कृष्ण-देह बनती है, तो थोड़े समय के लिए बनती है. हो सकता है एक मिनट के लिए कृष्ण-देह बने, फिर दूसरे मिनट में राधा-देह बन जाये, तीसरे मिनट में यमुना-देह बन जाये. यह अवतरण संक्षेप में ही होगा. समय का संक्षेप, एक तरह से, देह का भी संक्षेप है. समय का संक्षेप तो होगा ही और जल्दी ही समय बदल जायेगा. केलु बाबू को देखते हुए मुझे यह लगता था कि उनके यहाँ देह का समय और समय की देह, एक तरह का युग्म बन जायेगा. वह इतनी तेज़ी से बनता और विलीन होता था कि कई बार उसको ठीक इस तरह से ग्रहण भी नहीं कर पाते थे. बाद में यह ख्याल आता था कि अरे! वह देह और समय, कब देह समय में बदल गयी और कब समय देह में बदल गया, और दोनों एक साथ कैसे बदल गये. विस्मय पैदा होता है, कला का जादू घटित होता है.
संयुक्ता पाणिग्रही
अभिनय की पवित्र गरिमा

दुहरा सौभाग्य
केलु बाबू के साथ संयुक्ता पाणिग्रही वह पहली नर्तकी थीं जिन्होंने बहुत ही प्रभावशाली ढंग से ओडिसी को स्थापित किया. ओडिसी तो और भी नृत्यांगनाएँ नाच चुकी थीं. इन्द्राणी रहमान की वजह से पहली बार ओडिसी राष्ट्रीय मंच पर देखी गयी थीं, लेकिन ओडिसी की सारी क्षमताओं और सम्भावनओं को अगर किसी एक कलाकार ने सबसे समग्र, सबसे ऐन्द्रिक, सबसे शास्त्रीय, सबसे संयमित, सबसे स्वाधीन ढंग से व्यक्त किया तो वह संयुक्ता पाणिग्रही थीं. उन्हें दुहरा सौभाग्य मिला. केलु बाबू जैसे गुरु और रघुनाथ पाणिग्रही जैसे संगीतकार पति. उनके यहाँ मूर्तिशिल्प से ओडिसी का सम्बन्ध सिर्फ़ अनुकरण का सम्बन्ध नहीं है. देह रूप में ऐसी गतियाँ या ऐसी कोई चाल करना जिससे लगे कि ये मूर्तिवत् है. उससे अधिक उस मूर्तिवत्ता से एक तरह का देह का सजीव संवाद, सबसे मुखर ढंग से, संयुक्ता पाणिग्रही के यहाँ होता था.
उन्हें ओडिसी के व्याकरण की गहरी समझ थी, पर, उसके साथ-साथ उनकी नृत्य-कल्पना में जब-तब उड़ान लेने का उत्साह भी था; वह सिर्फ़ व्याकरण पर अधिकार नहीं था, बल्कि उस व्याकरण पर अधिकार को कल्पना के पंख से जोड़ देने की जुगत भी थी. उनकी नृत्य प्रस्तुतियाँ लगभग उस अर्थ में मूर्तिशिल्प की तरह सुगठित थीं, उसमें ऐसा कोई बिन्दु नहीं था जो ढीला या हल्का पड़ता हो : कह सकते हैं कि वह कठोर, लेकिन सौष्ठव भरा संयम था, सख़्त लेकिन प्रभामय. ये बहुत सारी चीज़ें जो कहने में अन्तर्विरोधी लगती हैं, वे उनके नाचने में अन्तर्विरोधी नहीं रह जाती थीं. यह बड़े कलाकार में ही सम्भव होता है कि वह एक साथ वह कर सके जो आमतौर पर एक दूसरे के विलोम में नज़र आता है. इसीलिए उनके अभिनय पक्ष में भी सजीव भाव-सम्पदा नज़र आती है. असल में, ओडिसी में जयदेव की ‘अष्टपदियों’ पर होने वाला अभिनय, अपने सबसे सघन और उत्कृष्ट क्षणों में, एक साथ बहुत कुछ होता है.
उसमें शास्त्रीय गरिमा है, क्योंकि ज़्यादातर अभिनय शृंगार से जुड़ा होता है. दूसरी तरफ़, उसमें बहुत ही सजल-सी ऐन्द्रियता भी है. तीसरी तरफ़, उसमें सजग सीमा-बोध भी है, अपने को किसी अतिशयता या अतिरंजना से बचा सकने की सावधानी भी. ये सब मिलकर उस अभिनय को बिल्कुल अलग कोटि का अभिनय बना देते थे. कुछ और नर्तकों के यहाँ भी यह हुआ है. यह संयुक्ता पाणिग्रही के यहाँ सम्भव हुआ, यद्यपि ‘अष्टपदियाँ’ घोर शृंगार व रति की रचनाएँ हैं— स्वयं संयुक्ता पाणिग्रही में उनकी जो अभिव्यक्ति हो पाती थी, उसमें एक तरह की सूक्ष्मता और किसी हद तक थोड़ा क्रीड़ा-भाव भी था, पर इसकी सर्तकता भी थी कि वह संयम में, सीमाओं में बना रहे.
मन्दिर से बाहर
पहले मन्दिरों में यह काम महरी वगैरह करती रही होंगी. वहाँ से निकाल कर, उसको अलग करके अपेक्षाकृत निरपेक्ष मंच पर प्रस्तुति के लिए जब इन कई नृत्य-शैलियों को प्रेरित और प्रस्तुत किया गया, तो मन्दिरों में कुछ भी कर सकने की स्वच्छन्दता थोड़े संशय में पड़ी होगी, ऐसा लगता है. लेकिन बजाय मंच से गरिमा या पवित्रता उधार लेने के जो कि मन्दिर में सहज सम्भव था, (क्योंकि मन्दिर में सब कुछ पवित्र ही माना जाता है) जब ये प्रस्तुतियाँ मन्दिर से बाहर आयीं तो जो संशय था. उसका हल जिन बड़े कलाकारों ने निकाला, उनमें से संयुक्ता पाणिग्रही भी एक हैं, उन्होंने उस पवित्रता को एक तरह की शास्त्रीय गरिमा में बदल दिया : अभिनय की अपनी गरिमा ही उसकी पवित्रता बनी. अब उसको मंच से, जगह से, स्थान से कोई पवित्रता नहीं मिलती.
शिद्दत से याद
संयुक्ता पाणिग्रही से मेरा निजी परिचय था. वे मेरे अनुरोध पर आती थीं. मध्यप्रदेश के दिनों में मैंने उन्हें कई बार बुलाया था. वे पहले ही ‘खजुराहो नृत्य समारोह’ में थीं. उस समय कन्दरिया महादेव से, लगभग मूर्तियों की तरह निकलकर, नृत्यांगनाएँ मंच पर आती थीं. जादुई-सा दृश्य होता था. उसमें वे भी थीं. वे हमारे घर भी आयी हैं. वे और रघुनाथ पाणिग्रही. आपस में उनकी जुगलबन्दी भी बड़ी दिलचस्प होती थी. अपने पति रघुनाथ के साथ उनका संवाद मज़ेदार होता था. रघुनाथ पाणिग्रही में थोड़ा अपना आतंक जैसा पैदा करने का भाव होता था और उसका बहुत ही विनम्र-सा प्रतिरोध संयुक्ता करती रहती थीं. कई बार किसी टिप्पणी से या कई बार किसी और मुद्रा से. अन्ततः ऐसी परिस्थिति जिसमें आपका पति अपने आप में एक गायक हो, लेकिन आपका सह-गायक हो, तो प्रमुखता आपकी (नृत्यांगना की) होगी. शायद यह बात रघुनाथ के पौरुष को थोड़ा आहत करती होगी. सच तो यह है कि आज संयुक्ता पाणिग्रही जितनी शिद्दत से याद की जाती हैं उतनी शिद्दत से रघुनाथ पाणिग्रही याद नहीं किये जाते.
साहस और स्वाभिमान
अक्सर नृत्य और संगीत के लोग जब अनौपचारिक-सी स्थिति में होते हैं तब किसी न किसी दूसरे की, कुछ न कुछ, निन्दा करते हैं. कई बार इसी बहाने अपनी भड़ास निकालते हैं, उनको लगता है कि निकाल सकते हैं, क्योंकि यहाँ कोई दिक्कत नहीं है, यहाँ से बात आगे नहीं जायेगी, लेकिन संयुक्ता पाणिग्रही ने ऐसा कभी नहीं किया. उनमें स्वाभिमान था, लेकिन दर्प का भाव नहीं था, जहाँ तक मैं समझ पाया.
उनकी परिस्थितियाँ, निश्चय ही, कठिन रही होंगी, क्योंकि तब तक भी नृत्य को बहुत सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं थी. एक ऐसी घटना हुई जब (शायद) पटना में वे नाच रही थीं तब लालू यादव ने, जो मुख्यमंत्री थे, ऊब कर या उकता कर उनको नाच बन्द करने की हिदायत दी थी, जिस पर बवाल भी मचा था.
संयुक्ता पाणिग्रही जैसी कलाकार को इसलिए भी याद करना चाहिए कि इतनी कठिनाइयों में रहते हुए भी, और, इस तरह की सामाजिक व्यवहार की चूकों या लांछनों को सहते हुए उन्होंने अपनी शास्त्रीयता से कभी विरत या विरक्त होने की कोई चेष्टा नहीं की, बल्कि साहस के साथ अपनी शास्त्रीयता को बचाये रखा.
वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा
स्त्री-अभिनय का शिखर

स्त्री रूप में पुरुष
मैंने वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा को पहले-पहल 1960 या ’61 में कभी देखा था. मैं उन दिनों सेंट स्टीफेंस में छात्र था. ‘सप्रू हाउस’ में उनका प्रदर्शन होना था. मैं थोड़ा देर से पहुँचा, तब तक कार्यक्रम शुरू हो गया था. एक बहुत ही सुन्दर, मांसल-सी युवती नाच रही थी. मैंने सोचा कि शायद उनकी कोई शिष्या है. पहले वह नाचती होगी, फिर वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा नाचने आएँगे. क़रीब दो घण्टे तक वह नाचती रही. नृत्य का एक अंश ख़त्म होने के बाद, अंग्रेज़ी में, इस तरह घोषणाएँ होती थीं जिससे यह पता न चले कि जो नाच रहा या नाच रही है उसका जेण्डर (लिंग) क्या है. वह बहुत अच्छा नाच रही थी, प्रभावशाली लग रहा था. लेकिन मेरे मन में यह लगता रहा कि शायद मैंने विज्ञापन में ‘वेदान्तम् सत्यनारायण’ ग़लत पढ़ लिया है, शायद उसमें यह लिखा होगा कि वे अपनी किसी शिष्या को पेश कर रहे हैं.
नृत्य के आख़िरी अंश के पहले यह घोषणा हुई कि वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा अपनी प्रस्तुति का समापन अब इससे करेंगे. तब मैंने जाना कि मैं दो घण्टे से जिस व्यक्ति को देख रहा हूँ, वे वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा हैं, कोई युवती नहीं. यह अद्भुत अनुभव था. उनकी मुद्राओं, उनकी भंगिमाओं, उनके अभिनय, उनके भावाभिनय में कहीं भी शक़ या सन्देह करने का कोई मौक़ा ही नहीं था कि ये पुरुष हैं. उन्होंने अपने उसी नृत्य-प्रदर्शन में ‘भामा कलापम्’ भी किया था.
हमारी शास्त्रीय नृत्य शैलियों में अभिनय का यह बहुत ही दुर्लभ पक्ष शामिल था कि अभिनय करते हुए पुरुष, स्त्री की मुद्राएँ, उनके भाव इत्यादि व्यक्त करते थे. जैसे, कथक में बिरजू महाराज का गोपी बन जाना या केलु बाबू का राधा बन जाना. पर उन सबमें यह ख्याल रहता था कि यह पुरुष है जो अभी स्त्री का अभिनय कर रहा है, उससे एक सर्जनात्मक तनाव-सा पैदा होता था, उसका भी अपना रस था. वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा के मामले में तो एक व्यक्ति पूरे समय स्त्री का अभिनय कर रहा है और आपको रत्तीभर पता नहीं चलता कि वह एक पुरुष है! कहते हैं कि गुजरात के अभिनेता जयशंकर सुन्दरी या मराठी अभिनेता बाल गन्धर्व ऐसा स्त्री-अभिनय करते थे. उनकी वस्त्र-भूषा से महाराष्ट्र की वस्त्र-भूषा तय होती थी. जैसे उन्होंने साड़ी का पल्ला डाला, तो अगले दिन मुम्बई-पुणे की महिलाएँ भी पल्ला वैसे ही लेने लगती थीं. बाल गन्धर्व, ऐसा कहा जाता है, फ़ैशन निर्धारित करते थे कि स्त्रियों की कौन-सी चाल होगी, कैसी भंगिमा होगी, वगैरह. पर उनके बारे में पहले से ये ज्ञात था कि वे पुरुष हैं, लेकिन वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा के बारे में, कम से कम मुझे, यह बिल्कुल ही पता नहीं था
भोपाल में
भोपाल के दिनों में, हमने उनको बुलाया. उनको ‘कालिदास सम्मान’ भी नृत्य के लिए मिला. तब तक वे काफ़ी बुज़ुर्ग हो चुके थे. उन्होंने स्वयं नाचना कम कर दिया था. थोड़ा-बहुत बैठकर भाव आदि दिखाते थे. लेकिन उनकी शिष्य परम्परा थी. तब तक कुचिपुड़ी में स्त्रियों का भी काफ़ी प्रवेश हो गया था—यामिनी कृष्णमूर्ति, स्वप्न सुन्दरी इत्यादि बहुत सारी नृत्यांगनाएँ कुचिपुड़ी करने लगी थीं.
‘विलासिनीनाट्यम्’
एक तरह से कुचिपुड़ी उसी परिवार का है, जो भरतनाट्यम्, ओडिसी, मोहिनीअट्टम इत्यादि बनाते हैं. दक्षिणान्मुख परिवार है, दक्षिण की ही कलाओं का. कई बार इन सबमें कथानकों का साझा है, कई बार कुछ भंगिमाओं, भावाभिनय इत्यादि में भी साझा है. इनमें हर एक का साहित्य काव्यात्मक और कई बार संगीतात्मक है. जो चाक्षुष है, वह अलग-अलग है. मसलन, ‘भामा कलापम्’ कुचिपुड़ी में ज़्यादा प्रसिद्ध है बजाय भरतनाट्यम् के और कुचिपुड़ी में शायद ‘अष्टपदियाँ’ भी नहीं होती हैं. होती हों तो बहुत कम होती होंगी; उनकी ख़ास पैठ वहाँ नहीं है. पर संस्कृत, तेलुगू इत्यादि का उपयोग वहाँ भी है. कुचिपुड़ी तेलुगू अंचल में विकसित हुआ. तेलुगू की विशेषता यह थी कि दक्षिण की दूसरी भाषाओं के मुक़ाबले वह ज़्यादा संगीतात्मक भाषा मानी जाती है, इसलिए कर्नाटक संगीत में बहुत सारी कृतियाँ तेलुगू में हैं. तेलुगू की अपनी जो एक तरह की तुर्शी है वह कुचिपुड़ी में आती है. स्वप्न सुन्दरी ने इसमें कुछ काम किया और एक अलग नृत्य शैली स्थापित करने की कोशिश की, जिसको उन्होंने ‘विलासिनीनाट्यम्’ कहा. उसमें यह प्रधानता थी कि उन्होंने देवदासियों से सीधे लिया.वे ‘विलासिनी’ कहलाती थीं. उसमें कुछ अद्भुत काव्य ग्रन्थ भी उसके पीछे हैं, जैसे ‘राधासात्वनम्’ शायद एक ग्रन्थ है जो राधा की रुक्मिणी (कृष्ण की वैध पत्नी) से मुलाक़ात को लेकर काव्य है. फिर ‘भामा कलापम्’ है.
कुचिपुड़ी की शाब्दिक धरोहर थोड़ी अलग है. मुझे पहले इतना स्पष्ट नहीं पता था, जब ‘विलासिनीनाट्यम्’ का एक कार्यक्रम हुआ तब मालूम चला. दस-पन्द्रह साल पहले स्वप्न सुन्दरी एक वृद्ध विलासिनी नाट्यम् के कलाकार को, जो कि देवदासी रही हैं, लेकर आयीं. उन्होंने विपरीत रति इत्यादि की निर्भीक मुद्राएँ और हस्तक इत्यादि दिखाये कि चकित रह जाना पड़ा. उसको देखकर मुझे ऐसा लगा कि देवदासियों के प्रति जो सामाजिक विरोध का वातावरण बना, उसका एक कारण शायद यह रहा होगा कि देवदासियों ने शृंगार को उसके ध्रुवान्त तक पहुँचाया और भक्ति से जुड़ी तथाकथित नैतिकता को किनारे कर दिया. शायद इसी के कारण उनका सामाजिक विरोध हुआ होगा. या कम से कम एक कारण यह ज़रूर रहा होगा. यह मुझे विलासिनीनाट्यम् याने कुचिपुड़ी का ही एक अनुषंग देखकर पता चला.
रूपक
वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा ने कहीं कहा है,
‘‘जब तक कोई पूरी तरह से पानी में डूब नहीं जाता, तब तक तैर नहीं सकता. इसी तरह एक कलाकार से सर्वश्रेष्ठ तब तक नहीं निकल सकता जब तक वह पूरी तरह से उसमें डूब नहीं जाए.’’
इस उद्धरण का एक तात्पर्य यह है कि कला पर कलाकार का पूरा अधिकार होना चाहिए. इसका अर्थ यह भी हुआ कि कला सब कुछ को व्यक्त करने में समर्थ है, ऐसा आत्मविश्वास होना चाहिए. जब तक कला और कलाकार एकात्म न हो जाएँ, तब तक श्रेष्ठता सम्भव नहीं है. इन बातों का सबसे उजला उदाहरण ख़ुद वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा थे. जहाँ तक मुझे उनकी बातचीत याद है, और ऐसा श्रेष्ठ कलाकारों के साथ भी हुआ है, कि जब वे सामान्य रूप से भी बातचीत करते हैं तब उनका बातचीत का मुहावरा, उसमें आने वाले रूपक या छवियाँ या अन्तर्ध्वनियाँ भी उनकी कला की होती हैं. वे स्वयं अपनी कला का एक रूपक की तरह इस्तेमाल करने लग जाते हैं. चाहे वह बात किसी और प्रसंग की हो रही हो, जिसका नृत्य से कोई सीधा सम्बन्ध न हो. ऐसा वेदान्तम् जी के साथ भी मुझे याद आता है. और यह उन्हीं के बारे में ही नहीं बल्कि औरों के बारे में भी सही है. जैसे, पण्डित मल्लिकार्जुन मंसूर या कुमार गन्धर्व या बिरजू महाराज.
अर्धनारीश्वर
अपने को सिर्फ़ एक मनोहर स्त्री में बदलकर पूरी प्रस्तुति करना, यह भर वेदान्तम् जी की क्षमता नहीं थी. यह बहुत मुखर क्षमता थी, लेकिन इतना भर काफ़ी नहीं था. दूसरा यह कि हमारे पारम्परिक सौन्दर्यशास्त्र में एक तरह की अर्धनारीश्वर की कल्पना पर ध्यान दें. वहाँ अर्ध-नारी और अर्ध-ईश्वर है, ‘पुरुष’ शब्द का इस्तेमाल नहीं है. इसका क्या मतलब निकला? अर्धनारीश्वरता को कला के एक लक्ष्य की तरह देखा गया है. अपने श्रेष्ठ क्षणों में कला अर्धनारीश्वर होती है—वह लिंग-भेद से ऊपर उठ जाती है. वह कलाकार के पुरुष या स्त्री होने से भी ऊपर उठ जाती है; उससे अपने को मुक्त कर लेती है. इसलिए अर्धनारीश्वरता में जो बचा हुआ है वह पौरुष नहीं है या उसमें से जो ग़ायब हो गया है वह पौरुष है, जो बचा हुआ है वह एक तरह का ईश्वरत्व है. यह हमारे सौन्दर्यशास्त्र की बहुत ही सुन्दर और लगभग कालजयी कल्पना है और इस कल्पना ने बहुत सारे रूपों को प्रभावित किया है. कविता में भी. संस्कृत कविता में, भक्ति कविता में, दक्षिण की कविता में—‘सखी भाव’ है. वह कहाँ से आया है? वह सब इसी अर्धनारीश्वरता के सौन्दर्यशास्त्र की विलम्बित अभिव्यक्ति है.
मृत्यु और शक्ति अगल-बग़ल हैं—एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन मेरा ख्याल है कि नृत्य या कलाओं के सन्दर्भ में यह आशय बहुत दूर तक नहीं ले जायेगा. कुचिपुड़ी नृत्य और शास्त्रीय नृत्य की कई शैलियों में ‘अर्धनारीश्वर’, दरअसल, लिंग-भेद का अतिक्रमण है. आवेग, तेज, लालित्य, शक्ति और सौन्दर्य, इन सबका एक मेल है जो अर्धनारीश्वर के दूसरे अभिप्रायों से निकलता है, वहाँ कोई एक ही रूढ़ अभिप्राय नहीं है.
‘भामा कलापम्’
‘भामा कलापम्’ मूलतः एक काव्य ग्रन्थ है, उसको कुचिपुड़ी में अपनाया जाना वैसा ही है जैसा दूसरी नृत्य शैलियों में जयदेव के ‘गीत गोविन्द’ को अपनाया जाना. इस काव्य की कथा में माधवी का चरित्र माया के रूप में है, जो कृष्ण (परमात्मा) और सत्यभामा देवी (जीवात्मा) को जोड़ने के लिए एक सेतु का काम करती है. हमारी परम्परा में ज़्यादातर काव्य— जिनमें रामायण और महाभारत जैसे काव्य भी शामिल हैं, दार्शनिक अभिप्रायों के अनुसरण या अनुगमन में नहीं लिखे गये. इनमें से हर एक काव्य को लेकर यह व्याख्या की जा सकती है कि कैसे उसने किसी चले आ रहे पारम्परिक अभिप्राय को अतिक्रमित कर दिया है या उससे बिल्कुल अलग या उलट कुछ किया है. माया को लेकर भी हमारी दृष्टि में कुछ दार्शनिक उलझनें शुरू से हैं.
कवि के लिए चाहे वह किसी भी परम्परा का क्यों न हो, किसी भी समय का क्यों न हो यह संसार माया तो हो सकता है, लेकिन मिथ्या नहीं हो सकता, क्योंकि कवि संसार को स्वीकार करता है, उसी का उत्सव मनाता है, उसी की अभ्यर्थना करता है. माया की कल्पना को लें. कवि ने कहा है, ‘माया महाठगिनी हम जानिं’, लेकिन दूसरी तरफ़ यह भी है कि माया मिथ्या है. यह संसार असार भी है, असत्य भी. ऐसे कवि हुए हैं. सब कवियों ने न सही जिन्होंने यह नहीं माना और ‘भामा कलापम्’ उसका एक प्रमाण है, जहाँ जीवात्मा और परमात्मा के बीच जो सम्बन्ध बनना है, वह माया बनायेगी. माया के बिना वह सम्बन्ध सम्भव नहीं है.
यह दिलचस्प है. दूसरी तरफ़, यह सम्बन्ध प्रश्नांकित किया जा सकता है; दर्शन में किया गया है. शायद दर्शन में यह भी कहा गया है कि परमात्मा और जीवात्मा के बीच यह ज़रूरी नहीं है कि कोई सम्बन्ध हो ही. इसकी दरकार ही नहीं है कि किसी को सम्बन्ध स्थापित करना पड़े—जीवात्मा स्वयं अपना उन्नयन परमात्मा की ओर कर सकती है. वे सब अलग बातें है. जहाँ तक मुझे याद आता है, जब वेदान्तम् ‘माधवी’ और ‘सत्यभामा’ की अलग-अलग भूमिकाएँ करते थे, तो उसमें बारीकी थी—दोनों स्त्रियाँ हैं, दोनों कृष्णार्पित हैं, तो उनमें कुछ साम्य हो ही जायेगा. वे अपनी (एक ही) देह में कुछ ऐसी भंगिमाएँ, ऐसी मुद्राएँ अपनाते थे जिससे दोनों स्त्री चरित्रों का अन्तर भी प्रकट होता था, उनकी परस्परता भी प्रकट होती थी. वे दो विशिष्ट चरित्र हैं, यह भी व्यक्त होता था.
समृद्ध सम्पदा
शायद कुचिपुड़ी को जितना शास्त्रीय ग्रन्थ समर्थन मिला है उतना किसी और नृत्य शैली को नहीं मिला है. अन्य शैलियों के थोड़े-बहुत कुछ ग्रन्थ होंगे. ये सब, एक तरह की, अलग-अलग प्रकार की संहिताएँ हैं जो ज़्यादातर तेलुगू में लिखी गयी हैं. जो दूसरी जगह, दूसरी शैलियों के हवाले से मिलते हैं, वे ज़्यादातर संस्कृत में हैं, कथक में फ़ारसी या हिन्दी में भी मिल जाएँगे, पर बहुत ही कम हैं—इसके मुक़ाबले तेलुगू , तमिल की बहुत समृद्ध सम्पदा है. अब यह एक अलग प्रश्न है कि अगर वेदान्तम् सत्यनारायण शर्मा जैसे महान् कलाकारों को छोड़ दें, तो बाक़ी में इनका कितना प्रभाव और उपयोग है; मुझे सन्देह है कि कम है.
रुख़
हमारी शास्त्रीय परम्परा में, उसकी सारी बहुलता में, पौरुष प्राधान्य स्पष्ट देखा जा सकता है. अब हम अधिक लोकतान्त्रिक और समताधर्मी समय में हैं, तो यह बात बड़ी अटपटी लगती है—और यह उचित ही है—कि पिछले लगभग पचास वर्षों में, शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में, पुरुषों का एकाधिपत्य तेजी से घटा है, कम हुआ है. इस समय ज़्यादातर नृत्यकार स्त्रियाँ हैं, पुरुष नहीं हैं. पुरुष बहुत कम हैं. दूसरी तरफ़, इस तर्क को लें कि जब कोई स्त्री ‘राधा’ या ‘गोपी’ का अभिनय करती है, और वह, वह सब करती है जो राधा या सखी को करना चाहिए तब उसमें कोई तनाव नहीं है. एक स्त्री राधा का अभिनय कर रही है, इसमें क्या तनाव है? लेकिन जब यही अभिनय एक पुरुष करता है, तो नाटकीय तनाव पैदा होता है और दर्शकों के मन में भी अजब क़िस्म की अपेक्षा पैदा होती है. स्त्री को राधा या गोपी का अभिनय करते हुए देख कर दर्शकों के मन में ऐसी कोई अपेक्षा नहीं जागती कि यह किस तरह राधा बनेगी, क्योंकि एक स्त्री (नृत्यांगना) का राधा या गोपी बनना लगभग स्वाभाविक है. लेकिन जब यही पुरुष करेगा, तो दूसरी अपेक्षा जागती है कि वह कितनी राधा बन सकता है, कितनी गोपी बन सकता है; और ऐसा करना अधिक कठिन है. इस मामले में मुझे लगता है कि वेदान्तम् जैसे लोगों की प्रकृति या रुख़ स्त्री-विरोधी कम, कला की इस जादुई सम्भावनाओं को बचाने का उद्यम अधिक है. इन दोनों चीज़ों में कोई अनिवार्य अन्तर्विरोध नहीं है कि पुरुषों को प्रोत्साहित किया जाता रहे, हालाँकि, स्त्रियों के लिए भी दरवाज़ा खुल जाये. वह खुल ही गया—वेदान्तम् के चाहते, न चाहते. आज कुचिपुड़ी में किसी और पुरुष का नाम ही याद नहीं आयेगा जो इस समय कुचिपुड़ी के प्रसिद्ध कलाकारों में हो.
| अशोक वाजपेयी ने छह दशकों से अधिक कविता, आलोचना, संस्कृतिकर्म, कलाप्रेम और संस्था निर्माण में बिताये हैं. उनकी लगभग 50 पुस्तकें हैं जिनमें 17 कविता-संग्रह, 8 आलोचना पुस्तकें एवं संस्मरण, आत्मवृत्त और ‘कभी कभार’ स्तम्भ से निर्मित अनेक पुस्तकें हैं. उन्होंने विश्व कविता और भारतीय कविता के हिन्दी अनुवाद के और अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, भारत भूषण अग्रवाल की प्रतिनिधि कविताओं के संचयन सम्पादित किये हैं और 5 मूर्धन्य पोलिश कवियों के हिन्दी अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित किये हैं. अशोक वाजपेयी को कविताओं के पुस्तकाकार अनुवाद अनेक भाषाओं में प्रकाशित हैं.
अनेक सम्मानों से विभूषित अशोक वाजपेयी ने भारत भवन भोपाल, महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, रज़ा फ़ाउण्डेशन आदि अनेक संस्थाओं की स्थापना और उनका संचालन किया है. उन्होंने साहित्य के अलावा हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, आधुनिक चित्रकला आदि पर हिन्दी और अंग्रेजी में लिखा है. फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें अपने उच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया है. दिल्ली में रहते हैं. |
पीयूष दईया
जन्म अगस्त 1972, बीकानेर (राज़) तीन कविता-संग्रह और अनुवाद की दो पुस्तकें. चार चित्रकारों के साथ पुस्तकाकार संवाद. और एक लम्बी कहानी ‘कार्तिक की कहानी‘ प्रकाशित. साहित्य, संस्कृति, विचार, रंगमंच, कला और लोक-विद्या पर एकाग्र पच्चीस से अधिक पुस्तकों और पाँच पत्रिकाओं का सम्पादन. |



