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Home » भारत : एक विचार परंपरा : कुँवर प्रांजल सिंह

भारत : एक विचार परंपरा : कुँवर प्रांजल सिंह

भक्ति काल की साझी स्मृति, स्वाधीनता संघर्ष और नवजागरण की खुली समझ से निर्मित भारतीयता पर जैसे-जैसे संगठित हमले बढ़ रहे हैं, उसी अनुपात में उसे फिर से सहेजने और समझने के स्वतःस्फूर्त प्रयास भी सामने आ रहे हैं. हिंदी में सामाजिक-वैचारिकी की अनूदित और मौलिक पुस्तकों के प्रकाशन का ऐसा प्रवाह दशकों बाद देखने को मिला है. ठीक सौ वर्ष पहले की तरह जब भारत अपने अतीत और अस्मिता को पहचाने की आकांक्षा से जाग उठा था. अब वर्तमान को समझने और भविष्य को बचाने का प्रश्न सामने खड़ा है. लेखक-राजनीतिज्ञ प्रेमकुमार मणि की पुस्तक ‘भारत एक विचार परम्परा’ को इसी सिलसिले में देखा जाना चाहिए. इसकी सम्यक चर्चा कर रहे हैं, कुँवर प्रांजल सिंह.

by arun dev
February 27, 2026
in समीक्षा
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भारत : एक विचार परंपरा : कुँवर प्रांजल सिंह
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भारत : एक विचार परंपरा
कसौटी और विरोधाभास

कुँवर प्रांजल सिंह

 

प्रेमकुमार मणि

633 पृष्ठों में फैली प्रेमकुमार मणि की आई नई किताब भारत : एक विचार परंपरा   का पहला अध्याय ही “भारत क्या है ? जैसे एक बुनियादी सवाल की असहजता से पाठक का सामना कराता है और अंत में “हम भारत के लोग” पर आकर ठहरता है. यह यात्रा महज़ शब्दों की नहीं, बल्कि अर्थ, सत्ता और स्मृति की राजनीति की यात्रा है. इसके लिए लेखक यह केंद्रीय प्रश्न उठाते हैं कि भारत क्या केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक है या एक सभ्यतागत दावा है, या फिर जनता द्वारा रचा गया एक ऐतिहासिक-राजनीतिक विचार? इस प्रश्न के साथ किताब भारत की उस प्रचलित समझ को चुनौती देती है, जिसमें “भारत” को पहले से तय, पवित्र और निर्विवाद मान लिया गया है. इस क्रम में प्रेमकुमार मणि इतिहास के उन नामचीन ग्रंथों को—वेद, पुराण, मनुस्मृति, कौटिल्य का अर्थशास्त्र; समय-अंतराल और संदर्भ के साथ उद्धृत करते हैं, जिनका आज के दौर में प्रतीकात्मक और राजनीतिक उपयोग बड़े सहज ढंग से किया जा रहा है. लेखक का आग्रह यह नहीं है कि इन ग्रंथों को नकार दिया जाए, बल्कि यह कि इन्हें एक उलझी हुई, बहुस्तरीय और विवादग्रस्त भारतीय परंपरा के भीतर रखकर पढ़ा जाए. लेखक यह दिखाते हैं कि कैसे इन ग्रंथों को अक्सर एक “सतत भारतीय आत्मा” के प्रमाण की तरह पेश किया जाता है, जबकि वास्तव में ये सत्ता, श्रेणी और सामाजिक नियंत्रण की विशिष्ट ऐतिहासिक परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं.

 

वैचारिक धारा का प्रश्न 

यह किताब नेहरू की डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया, अमर्त्य सेन की आर्ग्युमेंटेटिव इंडियंस, खिलनानी की आइडिया ऑफ़ इंडिया  और पारेख की डिबेटिंग इंडिया  की परंपरा से संवाद करते हुए एक निर्णायक मोड़ लेती है. जहाँ पहले के चिंतक भारत की बहुलता, बहस और लोकतांत्रिक कल्पना को रेखांकित करते हैं, वहीं प्रेमकुमार मणि यह सवाल उठाते हैं कि कौन-सी परंपरा, किसके लिए, और किसकी कीमत पर “भारतीय परंपरा” घोषित की गई. वे दिखाते हैं कि वेद-पौराणिक परंपरा को जब बिना आलोचना के “राष्ट्रीय स्मृति” बना दिया जाता है, तब श्रमशील समाज, स्त्रियाँ, दलित-बहुजन और प्रतिरोधी वैचारिक धाराएँ हाशिए पर धकेल दी जाती हैं. इसलिए यह किताब भारत को प्रतीकों के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि विचारों के संघर्ष के रूप में देखती है. “हम भारत के लोग” यहाँ कोई औपचारिक संवैधानिक वाक्य नहीं बल्कि एक चुनौती है कि भारत की परंपरा को तय करने का अधिकार ग्रंथों, सत्ता और पुरोहितवाद के पास नहीं, बल्कि उन लोगों के पास है जिन्होंने इतिहास में बार-बार इन परंपराओं से सवाल पूछे हैं. यही इस किताब की वैचारिक धार और समकालीन प्रासंगिकता है.

किताब की एक बड़ी वैचारिक विशेषता यह भी है कि यह भारतीय परंपरा को किसी समग्र, संगठित और निरंतर धारा के रूप में स्वीकार नहीं करती. यहाँ लेखक की दृष्टि रोमिला थापर, डी.डी. कोसांबी और अंबेडकर की आलोचनात्मक परंपरा से जुड़ती है, लेकिन भाषा और आग्रह में वे अधिक प्रत्यक्ष और राजनीतिक हैं. जहाँ लेखक अमेरिका में दास-प्रथा की समाप्ति, अब्राहम लिंकन की हत्या और अश्वेत मुक्ति संघर्ष का संदर्भ लाते हैं, किताब के अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक क्षितिज को रेखांकित करता है. समीक्षित किताब यह दिखाती हैं कि भारत की सामाजिक गुलामी को केवल भारतीय परंपरा के भीतर समझना अपर्याप्त है. जाति, ब्राह्मणवाद और सामाजिक असमानता को वे वैश्विक दासता और उत्पीड़न के इतिहास के साथ जोड़कर देखते हैं. यह तुलना किसी भावुक समानता के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए है कि मुक्ति का विचार हमेशा संघर्ष से पैदा होता है न की परंपरा से. इस पक्ष पर किताब में 1895 के पुणे कांग्रेस अधिवेशन, सोशल कॉन्फ़्रेंस और बाल गंगाधर तिलक की भूमिका को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा गया है. जहाँ लेखक यह दिखाता है कि किस प्रकार सामाजिक सुधार के प्रश्नों को ‘राष्ट्रीय एकता’ के नाम पर टाल दिया गया.

यहीं से डॉ. अम्बेडकर की प्रसिद्ध कृति ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स’  का संदर्भ उभरता है जो इस बात की गवाही देता है कि सामाजिक न्याय के बिना राष्ट्रवाद एक अधूरी परियोजना है. लेखक कई जगह प्रश्नोत्तर और संवादात्मक ढाँचे का प्रयोग करते हैं. यह शैली स्वयं में एक राजनीतिक वक्तव्य है, क्योंकि यह उस एकालापी इतिहास-लेखन का प्रतिरोध करती है जिसमें लेखक अंतिम सत्य का उद्घोषक बन बैठता है. जबकि समीक्षित किताब में भारत किसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नाम नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिक चेतना में रूपांतरित हो जाता है. लेखक हमें याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता के बाद भारत की पहली चिंता सत्ता-हस्तांतरण नहीं, बल्कि संविधान-निर्माण थी. नेहरू रिपोर्ट (1928), 1930–40 के दशक की बहसें और यह ज़िद कि “पहले संविधान बने, फिर सत्ता” यह सब इस बात का प्रमाण है कि भारतीय राष्ट्र का आधार धार्मिक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और नागरिक था. किताब में शामिल अनेक अध्याय उन सभी विमर्शों को सीधी चुनौती देते हैं, जो भारत को किसी प्राचीन सांस्कृतिक निरंतरता के रूप में प्रस्तुत करते हैं. जहाँ  भारत की संप्रभुता जनता में निहित है; ग्रंथों में नहीं, देवताओं में नहीं, और न ही किसी कथित स्वर्णिम अतीत में.

 

 

उत्तराधिकार का प्रश्न 

लेकिन इस तजवीज़ को पेश करते हुए लेखक का ब्राह्मणवादी परंपरा पर तीखा प्रहार कई बार इतनी तीव्रता ग्रहण कर लेता है कि अन्य सांस्कृतिक धाराएँ जो लोक परंपराओं, भक्ति आंदोलन की आंतरिक विविधताओं या क्षेत्रीय प्रतिरोधों से जुड़ी हुई थीं—वे भारत की विचार-यात्रा के साथ स्पष्ट रूप से जुगलबंदी नहीं कर पाती हैं. यद्यपि यह कमी नहीं, बल्कि लेखक की वैचारिक प्राथमिकता है, फिर भी पाठक को यह महसूस हो सकता है कि आलोचना का फलक और विस्तृत हो सकता था. फिर भी, यह किताब पूछती है; भारत किसका है? किस परंपरा का? किस इतिहास का? और सबसे महत्वपूर्ण किस भविष्य का? प्रेमकुमार मणि का उत्तर स्पष्ट है: भारत किसी एक परंपरा का उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि असहमति, संघर्ष और लोकतांत्रिक आकांक्षा की सतत प्रक्रिया है. लेखक जिस ‘नये भारत के निर्माण’ की परिकल्पना नवजागरण के संदर्भ में प्रस्तुत करता है, वह किसी शून्य में जन्मी अवधारणा नहीं है, बल्कि उन गहरे सामाजिक संघर्षों की ऐतिहासिक भूमि पर खड़ी है, जहाँ भारतीय समाज पहली बार स्वयं को परंपरा के बोझ और आधुनिकता की चुनौती के बीच खड़ा पाता है. और यह एक ऐसा काल जहाँ भारत सामाजिक और राजनीतिक विचारों के आपसी संबंध को समझने, अलगाने और पुनर्संयोजित करने की कोशिश करता है.

 

 

नवजागरण की निर्मितियों और प्रश्नाकुल नागरिकता का प्रश्न

नवजागरण की यह प्रक्रिया उस समाज में आरंभ होती है जो जाति, धर्म, पितृसत्ता और परंपरागत वर्चस्व की मजबूत संरचनाओं से जकड़ा हुआ है. राजा राममोहन राय जैसे विचारक इस समाज को भावावेश से नहीं, बल्कि तर्क और विवेक से देखते हैं. लेखक यहाँ यह रेखांकित करते है कि नवजागरण की पहली शर्त समाज को आलोचना के योग्य मानना था. जहाँ भारतीय समाज की आंतरिक बुराइयों मसलन, सती, जाति-पात, बहुविवाह, अंधविश्वास को पहचानना और उन्हें ऐतिहासिक संदर्भ में समझना, नवजागरण का मूल बौद्धिक आधार था. यह कोई धार्मिक सुधार आंदोलन भर नहीं था बल्कि समाज को उसके ही सामने खड़ा कर देने की एक साहसिक वैचारिक कोशिश थी. लेकिन लेखक नवजागरण को किसी सर्वसमावेशी क्रांति की तरह प्रस्तुत नहीं करते. वह साफ़ तौर पर दिखाते  है कि यह आंदोलन मुख्यतः भद्रलोक-केंद्रित था. ब्रह्मसमाज, हिन्दू कॉलेज और ‘यंग बंगाल’ जैसी पहलकदमियाँ समाज के एक सीमित हिस्से तक ही प्रभावी रहीं. यहाँ लेखक की आलोचनात्मक दृष्टि विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है. नवजागरण ने प्रश्न उठाने की संस्कृति तो विकसित की, लेकिन वह प्रश्न समाज के निचले तबकों तक नहीं पहुँच सका. इस तरह ‘नये  भारत’ की कल्पना आरंभ से ही एक असमान सामाजिक धरातल पर खड़ी दिखाई देती है.

डिरोज़ियो का प्रसंग इस समीक्षा में नवजागरण के सबसे विद्रोही और असहज पक्ष को उजागर करता है. ‘यंग बंगाल’ के माध्यम से युवाओं को संगठित करना, स्थापित नैतिकता पर प्रश्न उठाना और सत्य की खोज को जीवन-मूल्य बनाना यह सब नवजागरण को केवल सुधारवादी नहीं, बल्कि बौद्धिक विद्रोह का स्वर देता है. लेखक द्वारा डिरोज़ियो की तुलना सुकरात से किया जाना आकस्मिक नहीं है. यह तुलना बताती है कि भारतीय नवजागरण में भी सत्य की खोज सत्ता और समाज दोनों के लिए असुविधाजनक बन जाती है. ‘नये भारत’ की परिकल्पना यहाँ आज्ञाकारी नागरिक नहीं, बल्कि प्रश्नाकुल नागरिक की माँग करती है.

परंतु इसी बिंदु पर लेखक 1857 के विद्रोह के बाद औपनिवेशिक नीतियों के एक ऐसे निर्णायक ऐतिहासिक मोड़ की ओर पाठक को ले जाते हैं; जहाँ अंग्रेज़ों ने सामाजिक सुधारों में हस्तक्षेप को विद्रोह का एक बड़ा कारण माना और धीरे-धीरे अपनी तथाकथित प्रगतिशील भूमिका से पीछे हट गए. यहाँ नवजागरण और ‘नये भारत’ की परियोजना का कारवां उलझ जाता है. अंग्रेज़ी सत्ता सामाजिक सुधारों को स्थगित कर देती है और भारतीय समाज के उसी उच्चवर्णीय, संभ्रांत वर्ग की संरक्षक बन जाती है, जिसकी आलोचना नवजागरण ने की थी. यहीं से लेखक की केंद्रीय स्थापना उभरती है जहाँ वह भारत में सामाजिक और राजनीतिक विचारों के पृथक्करण का दावा करता है. राजनीतिक सत्ता स्थिरता चाहती थी और सामाजिक सुधार अस्थिरता पैदा कर रहे थे. इसलिए राजनीति को समाज से अलग कर दिया गया. लेखक इस स्थिति को किसी षड्यंत्र सिद्धांत की तरह नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अनुभव के परिणाम के रूप में प्रस्तुत करता है. अंग्रेज़ों ने सीख लिया कि भारत पर शासन करने के लिए सामाजिक सुधार से दूरी बनाना अधिक सुरक्षित है. दूसरी ओर, भारतीय उच्चवर्ग ने यह समझ लिया कि राजनीतिक सत्ता से समझौता कर सामाजिक वर्चस्व बनाए रखा जा सकता है. इस समझौते ने नवजागरण की क्रांतिकारी संभावना को सीमित कर दिया. अब जब इस किताब पर एकमुश्त विचार-विमर्श कर लिया गया है और लगभग इसकी बनावट को भी समझ लिया गया है, तो इसकी ख़ूबियों और ख़ामियों की ओर बढ़ना लाज़िम है.

 

ख़ूबिया और ख़ामियाँ

प्रेमकुमार मणि “भारतीय परंपरा” को लगभग पूरी तरह ब्राह्मणवादी वर्चस्व की संरचना के रूप में प्रस्तुत करते हैं. यह दृष्टि निस्संदेह आलोचनात्मक है, किंतु कई स्तरों पर अत्यधिक सरलीकृत भी प्रतीत होती है. यह किताब किसी सख़्त अकादमिक अनुशासन में लिखी गई कृति नहीं है, फिर भी इसके अंत में दी गई संदर्भ-सूची से यह स्पष्ट होता है कि लेखक ब्राह्मणवाद-विरोधी साहित्य और उससे जुड़ी बौद्धिक बहसों से भली-भाँति परिचित हैं. ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक हो जाती है कि लेखक यह भी स्पष्ट करते कि ब्राह्मणवाद के विरुद्ध चली ऐतिहासिक और समकालीन बहसें ‘नए भारत’ में किस दिशा में विकसित हुई हैं और उन्होंने किन नए वैचारिक रूपों को ग्रहण किया है. यदि लेखक सामाजिक न्याय आंदोलनों से उपजी वैचारिक भाषा जो केवल प्रतिरोध नहीं बल्कि वैकल्पिक समाज की कल्पना भी करती है, को अपनी अभिव्यक्ति में स्थान देते, तो यह किताब न केवल अधिक जटिल और बहुआयामी बनती बल्कि वैचारिक रूप से कहीं अधिक दिलचस्प और प्रासंगिक भी होती.

लेखक भारतीय विचार-यात्रा की जो तस्वीर किताब के पहले पन्ने से लेकर अंतिम अध्याय तक खींचते हैं, उसका बृहद संदर्भ मुख्यतः वेद-पुराण-मनुस्मृति से होते हुए कौटिल्य के अर्थशास्त्र  तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों से होते हुए संविधान तक फैला हुआ है. किंतु भारतीय परंपरा की वह व्यापक और बहुस्तरीय दुनिया, जो लोक परंपराओं, श्रम-संस्कृति, स्त्री अनुभवों तथा भक्ति और सूफ़ी आंदोलनों की आंतरिक विविधताओं से निर्मित हुई है, उस पर यह किताब लगभग ख़ामोश दिखाई देती है. यह अनुपस्थिति केवल विषय-विस्तार की कमी नहीं है बल्कि भारतीय विचार को एक सीमित, अभिजन और ग्रंथ-केंद्रित ढाँचे में बाँध देने का ज़ोख़िम भी पैदा करती है. सांस्कृतिक निरंतरता और औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध राष्ट्रीय संघर्षों की यह वहीं ज़मीन है जिस पर भारत में दशकों से गहन बहस हो चुकी है; इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों और राजनीतिक चिंतकों द्वारा इस कल्पना को बार-बार खंगाला जा चुका है. ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या आज ज़रूरत फिर से उसी शुरुआती बिंदु पर लौटने की थी, या उस यात्रा का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने की, कि हम उस कल्पना को जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में गढ़ा, जिसे राजा राममोहन राय ने नैतिक–सुधारवादी विवेक दिया, जिसे नेहरू ने ऐतिहासिक बहुलता और आधुनिकता के फ्रेम में रखा, जिसे मौलाना आज़ाद ने साझी विरासत और धार्मिक सहअस्तित्व से जोड़ा, और जिसे गांधी ने नैतिक राजनीति और जनसंघर्ष की भाषा दी—उस भारत का आज के भारत से संवाद इस किताब  में अपेक्षाकृत कमजोर है. लेखक उस ऐतिहासिक कल्पना को खोलते तो हैं, लेकिन यह नहीं दिखाते कि वह कल्पना कहाँ विचलित हुई, कहाँ अपहृत हुई और कहाँ आत्मसमर्पण कर बैठी.

यही कारण है कि किताब का अंतिम अध्याय “हम भारत के लोग”  वैचारिक रूप से जितना सशक्त हो सकता था, उतना हो नहीं पाता. यदि लेखक यह दिखा पाते कि स्वतंत्रता आंदोलन की उस बहुलतावादी, नैतिक और संवैधानिक भारत-कल्पना को हमने समकालीन राजनीति, सामाजिक असमानताओं और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दौर में कहाँ खो दिया तो यह अध्याय केवल निष्कर्ष नहीं, बल्कि आत्मालोचनात्मक हस्तक्षेप बन सकता था. इस किताब को पढ़ते हुए एक गहरा और लगभग हैरान कर देने वाला अनुभव बार-बार सामने आता है. भारत : एक विचार यात्रा भारत की वैचारिक संरचना को प्राचीनता से आधुनिक संविधान तक ले जाने का दावा करती है, लेकिन इस पूरी यात्रा में सामाजिक न्याय के संघर्षों की लगभग पूर्ण अनुपस्थिति चौंकाती है. न तो इस प्रश्न पर कोई गंभीर विमर्श है, न ही इसे लेकर कोई अलग अध्याय या वैचारिक ठहराव. यह अनुपस्थिति आकस्मिक नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से अर्थपूर्ण है और इसी कारण यह आलोचना के योग्य है.

इन तमाम ख़ामियों के बावजूद यह किताब भारतीय विचार पर एक लंबी बहस की संभावना और उसके प्रतीकात्मक स्वरूप की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है. यह हमें विमर्शों के व्यापक क्षितिज से, अधिक बारीकी और गंभीरता के साथ, भारत की विचार यात्रा पर पर पुनर्विचार करने के लिए आग्रह करती है.

 

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें.

कुँवर प्रांजल सिंह
सहायक प्रोफ़ेसर (राजनीति विज्ञान विभाग )
दिल्ली विश्वविद्यालय
पार्थ चटर्जी की अनूदित पुस्तक ‘शासितों की राजनीति’ प्रकाशित.
pranjal695@gmail.com
Tags: कुंवर प्रांजल सिंह
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