| भक्ति अगाध अनंत भारतीय भक्ति परंपरा की समग्र पहचान एकता मंडल |

‘भक्ति अगाध अनंत’ का संपादन मध्यकालीन साहित्य और इतिहास के प्रतिष्ठित आलोचक माधव हाड़ा ने किया है, जिनकी बौद्धिक दिलचस्पी भारतीय संत-भक्ति परंपरा के ऐतिहासिक और सामाजिक आयामों के गहन अध्ययन में रही है. ‘पचरंग चोला पहर सखी री’ जैसी कृतियों में मीरां के जीवन और समाज का सूक्ष्म विश्लेषण तथा ‘पद्मिनी : इतिहास और कथा-काव्य की जुगलबंदी’ जैसे शोध-ग्रंथ उनके इतिहासबोध और साहित्यिक विवेक को रेखांकित करते हैं. माधव हाड़ा का आलोचक-मन केवल काव्य-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह रचना को उसके सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों में देखने की दृष्टि प्रदान करता है. हाल के वर्षों में ‘कालजयी कवि और उनका काव्य’ जैसी विस्तृत पुस्तक-शृंखला का संपादन उनकी परंपरा-बोध और संपादकीय क्षमता का प्रमाण है. इसी अनुभव और दृष्टि का विस्तार ‘भक्ति अगाध अनंत’ में दिखाई देता है, जहाँ छठी सदी से लेकर बीसवीं सदी तक की भक्ति कविता को व्यापक, समावेशी और संतुलित रूप में प्रस्तुत किया गया है.
इस पुस्तक के विषय में प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल का कहना है कि
“‘भक्ति अगाध अनंत’ हिंदी में अपने ढंग का पहला महत्वपूर्ण कार्य है, जिसमें भारतीय भाषाओं के अधिकांश महत्वपूर्ण संत-भक्त सम्मिलित हैं. भारतीय कवियों के सामने पहले से दिया कोई आदर्श नहीं रहा और उन्होंने नए ढंग से भक्ति काव्य की रचना और पुनर्रचना की. “
भारतीय साहित्य परंपरा में भक्ति कविता एक ऐसी सशक्त धारा है, जिसने सदियों से जनमानस को आध्यात्मिक, नैतिक और मानवीय मूल्यों से संस्कारित किया है. भारतीय भक्ति कविता संकलन पर आधारित यह पुस्तक भक्ति की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा का सार्थक प्रतिनिधित्व करती है. इसमें देश के विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक क्षेत्रों से उपजी भक्ति-वाणी (क्षेत्रों के संत-भक्तों की वाणी, कविता को) को हिंदी में संचयन करने का कार्य सराहनीय है.
“प्रस्तुत संचयन में पहली बार छठी से लगाकर उन्नीसवीं-बीसवीं सदी तक के, देश के सभी क्षेत्रों के संत-भक्तों की रचनाएँ संकलित की गई हैं. ”(ब्लर्ब)
इसमें दक्षिण से उत्तर और पूर्व से पश्चिम तक फैली भक्ति चेतना- अप्पर, संबंदर, सरहपाद, परकाल, सुंदरमूर्ति, आंडाल, माणिक्कवाचकर, शठकोप, गोरखनाथ, बसवण्णा, अल्लमप्रभुदेव, अक्क महादेवी, शेख़ फ़रीद, नामदेव ज्ञानदेव, मुक्ताबाई, ललद्यद, मुल्ला दाऊद, विद्यापति, पीपा, कबीर, रैदास, नरसी मेहता, शंकरदेव, गुरु नानक, बलराम दास, चैतन्य, मीरां, सूरदास, कुतबन, जायसी, तुलसीदास, रसखान, नंददास, दादू दयाल, रहीम, गुरु अर्जुनदेव, रज्जब, मलूकदास, सुंदरदास, तुकाराम, दरिया साहिब, बुल्लेशाह, चरणदास, पलटू साहिब, सहजोबाई, दयाबाई, लालन शाह फ़कीर, रवींद्रनाथ ठाकुर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की वाणी-भक्ति के विविध रूपों को उजागर करती है.
संचयन में माधव हाड़ा का ‘भारतीय भक्ति-चेतना : पहचान, व्याप्ति और वर्गीकरण का पुनरावलोकन’ पर विस्तृत, गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेख भी संकलित है, जिसमें भारतीय भक्ति–चेतना की पहचान, व्याप्ति और स्वरूप को नए वैचारिक संदर्भ में समझने का सार्थक प्रयास है. भक्ति को किसी एक काल, आंदोलन या ऐतिहासिक घटना तक सीमित न मानकर भारतीय सांस्कृतिक जीवन की निरंतर और व्यापक चेतना के रूप में यहाँ प्रस्तुत किया गया है. भारतीय भक्ति–चेतना को यूरोपीय ऐतिहासिक अवधारणाओं (क्रांति, पुनर्जागरण, सुधार, आंदोलन) से अलग करके उसकी स्वदेशी, निरंतर और अहिंसक प्रकृति को रेखांकित करना लेखक का मुख्य ध्येय है. लेखक यह स्पष्ट करता है कि भारतीय भक्ति को पश्चिमी सैद्धांतिक ढाँचों में फिट करना न केवल भ्रामक है, बल्कि उसकी मूल आत्मा के साथ अन्याय भी है. भक्ति–चेतना को किसी एक कालखंड, आंदोलन या उद्देश्य से जोड़ने के बजाय उसे भारतीय सांस्कृतिक जीवन की निरंतर प्रवाहमान चेतना के रूप में देखा गया है—यह लेख की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि है. वे लिखते हैं
“भक्ति-चेतना को केवल पूर्वमध्यकाल तक सीमित करना ग़लत है. भक्ति-चेतना मध्यकाल से पहले भी निरंतर और व्यापक है. यह मध्यकाल से पहले वैदिक, पौराणिक, बौद्धधार्मिक भक्ति और इस दौरान इनमें परस्पर होने वाली अंत: क्रियाओं से पैदा होने वाले नये मत-मतांतरों के रूप में निरंतर मौजूद है. ” (पृ. 28)
लेखक सबसे पहले औपनिवेशिक और मिशनरी ज्ञानपरंपरा द्वारा निर्मित उन धारणाओं का खंडन करते हैं, जिनके कारण भारतीय भक्ति चेतना को यूरोपीय ऐतिहासिक शब्दावली के समानार्थी शब्द—जैसे आंदोलन, क्रांति, पुनर्जागरण, लोकजागरण, सुधार आदि —के सहारे समझा गया. जबकि भारतीय भक्ति न तो यूरोपीय अर्थों में ‘आंदोलन’ है, न ‘क्रांति’, न ‘पुनर्जागरण’, बल्कि यह भारतीय चित्त में सहस्राब्दियों से प्रवाहित एक अखंड आध्यात्मिक चेतना है. वे लिखते हैं
“भारतीय भक्ति-चेतना का प्रसार क्रांति या आंदोलन की तरह न तो कभी हिंसक रहा, न इसका स्पष्ट प्रतिपक्ष था और न ही यह पूरी तरह प्रतिरोधात्मक. अहिंसा इसके विचार और आचरण में बुनियाद की तरह रही है. . . . भक्ति-चेतना का प्रसार भारत में किसी आकस्मिक घटना-परिघटना की तरह नहीं हुआ. . . . . . भक्ति-चेतना की व्याप्ति का दायरा भी बहुत विस्तृत है. यह भारतीय चित्त और साहित्य में, ज्ञात रूप में, आठ-दस शताब्दियों के समय विस्तार में, संपूर्ण देश में मौजूद रही है. ” ( पृ. 18)
लेखक यह रेखांकित करते हैं कि भक्ति का उदय किसी ऐतिहासिक संकट या आकस्मिक घटना-परिघटना का परिणाम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आंतरिक आध्यात्मिक आवश्यकता से उपजा हुआ प्रवाह है. इसलिए इसकी तुलना क्रांति या आंदोलन से करना न केवल अनुचित है, बल्कि भारतीय चित्त की ऐतिहासिक समझ को सरलीकृत करना भी है.
भारतीय भक्ति और साहित्य की समझ और पहचान में इसकी अपनी शब्दावली इस्तेमाल नहीं हुई. यदि हुई भी तो धर्म और भक्ति के यूरोपीय सादृश्यों और उदाहरणों के कारण इसका अर्थ और संदर्भ बदल गया. यह दृष्टि भक्ति की प्रकृति को विकृत करती है, क्योंकि भारतीय भक्ति सत्ता-विरोध, संस्थागत विद्रोह या सामाजिक क्रांति की आकांक्षा से नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति प्रेम, समर्पण, निष्ठा, शरणागति, अपने कल्याण या मुक्ति की कामना आदि बोध से संचालित रही है. भक्ति यहाँ साधन नहीं, स्वयं साध्य है—यहाँ लेखक की वैचारिक स्पष्टता सबसे सशक्त रूप में सामने आती है.
लेख का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है—उत्तर भारत केंद्रित भक्ति-दृष्टि की आलोचना. लेखक स्पष्ट करते हैं कि हिंदी क्षेत्र में भक्ति को केवल कबीर, तुलसी, सूर, मीरा आदि तक सीमित कर देना एक बौद्धिक संकुचन है. वास्तविकता यह है कि भक्ति का व्यापक और गहन विकास दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल, ओडिशा, कश्मीर और उत्तर-पूर्व तक समान रूप से हुआ. विशेषतः भक्ति की सैद्धांतिक, दार्शनिक और भावात्मक परिपक्वता में दक्षिण भारत की भूमिका को लेखक महत्त्वपूर्ण मानते हैं.
रामानुजाचार्य, आलवार परंपरा और रामानंद से जुड़े कालक्रम और वैचारिक संबंधों पर चर्चा करते हुए लेखक उस लोकप्रिय धारणा का खंडन करते हैं कि
“भक्ति द्रविड़ में ऊपजी, लाये रामानंद. ” लेखक दिखाते हैं कि यह कथन ऐतिहासिक रूप से सरलीकृत है. वे बताते हैं कि उत्तर भारत में भक्ति दक्षिण की देन नहीं कहा जा सकता क्योंकि “उत्तरभारत में भक्ति पौराणिक धर्म और अवतारवाद के रूप में पहले से मौजूद थी, लेकिन दक्षिण में भक्ति को रामानुजाचार्य आदि ने जो शास्त्रीय आधार दिया, उससे उत्तरभारत में भक्ति की चेतना का तेजी से विस्तार हुआ. ” ( पृ. 22)
दूसरी ओर रामानंद का समय तेरहवीं सदी रहा है, जबकि आलवारों की भक्ति छठी-सातवीं के समय उत्कर्ष पर थी. तो इतने लंबे अंतराल में रामनंद से पहले उत्तर भारतीय भक्ति-चेतना दक्षिण के संपर्क में न आये यह असंभव बात है. लेकिन रामानंद ने उत्तर भारत की भक्ति को समृद्ध किया. रामानंद केवल परंपरा-वाहक नहीं थे, बल्कि एक स्वतंत्र चिंतक थे, जिन्होंने अपने शिष्यों को वैचारिक स्वतंत्रता दी. यही कारण है कि उनके शिष्य अलग-अलग भक्ति धाराओं के प्रवर्तक बने. यानी लेख से यह स्पष्ट होता है कि भक्ति की चेतना किसी एक व्यक्ति, काल या भूगोल की देन नहीं है, बल्कि विभिन्न परंपराओं, दर्शनिक धाराओं और सांस्कृतिक अनुभवों का समन्वित परिणाम है. लेखक भक्ति को किसी एक दर्शन, संप्रदाय या कालखंड तक सीमित न मानकर उसकी प्रवाहशील, समन्वयकारी और लोकधर्मी प्रकृति को केंद्र में रखता है.
लेख में भक्ति-साहित्य के ‘वर्गीकरण और विभाजन’ की समस्या को उठाया गया है. वे लिखते हैं—
“भारतीय जनसाधारण में भक्ति-चेतना की व्याप्ति बहुत व्यापक और निरंतर है और क्षेत्रीय सांस्कृतिक ज़रूरतों के अनुसार यह बहुवचन है, इसलिए इसको वर्गीकरण और विभाजन में देखना समझना संभव नहीं है. ” (पृ. 25)
निर्गुण–सगुण, राम–कृष्ण तथा संप्रदायगत विभाजनों को वे अध्ययन की सुविधा के रूप में देखते हैं, न कि भक्ति-चेतना के स्वाभाविक स्वरूप में. वे स्पष्ट करते हैं कि संतों और भक्त कवियों की रचनाओं में ये विभाजन कठोर नहीं, बल्कि परस्पर संवादशील हैं. लोकभक्ति में निर्गुण और सगुण की आवाजाही सदियों से थी. लोक में राम और कृष्ण दोनों ही पूज्य और मान्य रहे हैं. संत-भक्तों ने दोनों को कमोबेश एक ही आराध्य का दर्जा दिया है. रामानंद परंपरा और संत परंपरा के संदर्भ यह स्थापित करते हैं कि भक्ति का सार विभाजन नहीं, बल्कि सामाजिक समता और आध्यात्मिक एकता है.
साथ ही वे औपनिवेशिक ज्ञान-परंपरा से प्रभावित काल-विभाजन और प्रवृत्तिपरक वर्गीकरण की सीमाओं को रेखांकित करते हैं, जो भक्ति की अविच्छिन्न धाराओं और सांस्कृतिक निरंतरता को समझने में बाधक रहे हैं. लेखक के अनुसार भारतीय भक्ति परंपरा रैखिक नहीं, बल्कि समानांतर और संवादशील रूप में विकसित हुई है; इसलिए उसे यूरोपीय इतिहास-दृष्टि के ढाँचों में बाँधना उसके स्वरूप के साथ अन्याय है.
भक्ति रचनाओं की प्रचुरता और उनकी लोक प्रसिद्धि के आधार पर भक्तिकाल को सीमित कर देने को वे सही नहीं मानते क्योंकि भक्ति-चेतना मध्यकाल से पहले यानी वैदिक, पौराणिक, बौद्धधार्मिक भक्ति और अंत:क्रियाओं से उत्पन्न नये मत-मतांतरों में निरंतर मौजूद रही है और सत्रहवीं सदी के बाद भी भक्ति के विभिन्न रूप निरंतर जारी ही नहीं बल्कि ज्यादा सघन और मुखर हुए है.
यहाँ भक्ति को एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना के रूप में स्थापित किया गया है. आलोचक के अनुसार भक्ति केवल अतीत की धार्मिक अनुभूति नहीं, बल्कि लोकाचार, सामाजिक नैतिकता और मानवीय मूल्यों की निरंतर सक्रिय शक्ति के रूप में सामने आती है. लेखक यह स्पष्ट करता है कि भक्ति की ‘अगाध’ और ‘अनंत’ प्रकृति इसी में निहित है कि वह समय, स्थान और विचारधाराओं की सीमाओं को पार करते हुए निरंतर नए अर्थ ग्रहण करती रहती है.
लेखक यह दिखाता है कि यूरोपीय और मिशनरी पृष्ठभूमि से आए विद्वानों ने भारतीय भक्ति परंपरा की व्याख्या अपने धार्मिक और सांस्कृतिक आग्रहों के आधार पर की, जिससे भक्ति की स्वदेशी वैचारिक जटिलता और अंतर्संबंध पूरी तरह उजागर नहीं हो सके. लेख में निर्गुण-सगुण, रामभक्ति-कृष्णभक्ति और ज्ञान-प्रेम जैसे वर्गीकरणों पर भी आलोचनात्मक दृष्टि डाली गई है. लेखक का मत है कि ये विभाजन अध्ययन की सुविधा तो देते हैं, पर लोकभक्ति की जीवंत परंपरा में इनकी कठोर सीमाएँ नहीं मिलतीं. लोकजीवन में भक्ति एक समग्र, मिश्रित और प्रवाही अनुभव के रूप में उपस्थित रहती है, जिसे संकीर्ण अकादमिक खाँचों में बाँधना उसके मूल स्वरूप को सीमित कर देता है. लेखक ने भक्ति को एक जीवंत, व्यापक और मानवीय परंपरा के रूप में रेखांकित किया है. हाड़ा जी इस बात पर जोर देते हैं कि भारतीय भक्ति-चेतना की धारा आरंभ से अपने उत्कर्ष तक कभी एकरेखीय नहीं रही.
“अंत:क्रियाओं के कारण इसमें प्रतिरोध, समाहार, आत्मसातीकरण, समंवय, एकीकरण जैसी प्रक्रियाएँ चलती रहीं. ”( पृ. 38)
लेखक दिखाता है कि भक्ति परंपराएँ न तो स्थिर रहीं, न ही शुद्ध रूप में अलग–थलग; वे निरंतर अन्य परंपराओं से प्रभावित होती रहीं और स्वयं भी प्रभाव डालती रहीं. उदाहरण के लिए, बौद्ध धर्म की करुणा, सूफी परंपरा की प्रेम–प्रधानता तथा शैव–वैष्णव मतों के दार्शनिक आग्रह—इन सबका समन्वय भक्ति को और व्यापक बनाया. इस कारण भक्ति की प्रकृति सरल, लोकधर्मी तथा आम लोगों के जीवन से जुड़ी हुई बनती गई. भक्ति ने लोगों को जाति, वर्ग और संकीर्ण धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठा कर एक-दूसरे से जोड़ने का काम किया. उत्तर और दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, बंगाल, ओड़िशा, असम आदि क्षेत्रों में भक्ति के रूप अलग दिखाई देते हैं, लेकिन सबका मूल भाव लगभग एक ही है. कहीं राम और कृष्ण की भक्ति प्रमुख हुई, तो कहीं आलवार-नयनार, तो कहीं वीरशैव परंपरा सामने आई. यानी भारतीय भक्ति परंपराएँ कभी स्थिर नहीं रहीं. वे समय के साथ रहीं और दूसरी परंपराओं से सीखती रहीं.
लेखक भारतीय भक्ति की पहचाना एकवचन की बजाय बहुवचन में करने के हिमायती(पक्षधर) हैं. जो कि ख़ास प्रकार के भारतीय सांस्कृतिक बोध के कारण है. इस संबंध में उन्होंने ए. के. रामानुजन की टिप्पणी उद्धृत किया है
“भक्ति कई प्रकार की होती है, यद्यपि हम इसे एकवचन कहते हैं. विविधता अपार है और हमें इसकी पहचान करनी चाहिए. भक्ति शिव, विष्णु या देवी पर एकाग्र है. पुरुषों और महिलाओं द्वारा भक्ति, बंगाल में भक्ति और कर्नाटक में भक्ति, प्रारंभिक भक्ति और बाद में भक्ति—ये सभी एक-दूसरे से अलग हैं. हमें विभिन्न रूपों के नए अध्ययन की जरूरत है. ” (वही, पृ. सं. – 43)
जैसा कि यूरोपीय सांस्कृतिक बोध के विकास का केंद्र चर्च रहा है, जहाँ धर्म, दर्शन, शिक्षा, नैतिकता, कला ज्ञान के अधिकांश रूप चर्च के अनुशासन और नियंत्रण में विकसित हुए. स्वीकार्य और अस्वीकार्य को तय चर्च करता है. यही कारण है कि यूरोपीय भक्ति में एकरूपता, एकवचन की प्रवृत्ति दिखाई देती है परंतु भारत की स्थिति इसके विपरीत है. यहाँ कुछ भी एक नहीं है. यहाँ बहुदेववाद है. प्रतिरोध, समाहार, पृथक्करण, विस्तार आदि के कारण भारतीय भक्ति-चेतना में अनेक मत-मतांतर हुए, पंथ-संप्रदाय हुए यहाँ तक कि काव्यरूप छंद का व्यवहार भी बहुवचन हैं.
लेखक ने भक्ति-चेतना और उसके साहित्य को पारलौकिक दायरे में सीमित न रखकर उसे लोक, समाज और मनुष्य के जीवन-संघर्ष तक उसकी व्याप्ति को दिखाया है. लेखक सटीक रूप से रेखांकित करते हैं कि भारत में ‘धर्म’ का अर्थ केवल मत या आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक-नैतिक जीवन-व्यवस्था रहा है. इसी कारण भक्ति-चेतना केवल ईश्वर-केन्द्रित नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय, सत्ता-उत्पीड़न और मानवीय पीड़ा के विरुद्ध प्रतिरोध का माध्यम बनी. संत-भक्तों की भूमिका राजसत्ता, वर्ण-व्यवस्था और सामाजिक शोषण आदि के प्रतिरोध की रही है.
लेखक यह स्थापित करते हैं कि भारतीय भक्ति चेतना और साहित्य का सरोकार लोकोत्तर चिंता से ही नहीं बल्कि जीवन के सौंदर्य, प्रेम, देह, श्रम और संबंधों से भी है. विद्यापति, रामानंद, कबीर, वल्लभाचार्य जैसे उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि भक्ति में ईश्वर कोई लोकोत्तर सत्ता नहीं, बल्कि मनुष्य के अनुभवों का विस्तार है. कृष्ण को ‘मित्र’ और ‘सखा’ के रूप में देखने की परंपरा को वे लोक-जीवन की आकांक्षाओं और जरूरतों से जोड़ते हैं. रास, लीलाओं और संवादों के उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि भक्ति यहाँ भय या दंड पर नहीं, बल्कि सहज प्रेम और आत्मीयता पर आधारित है. यहाँ तक कि भक्ति-परंपरा में गुरु केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि ईश्वर से भी बड़ा सत्य बन जाता है.
भक्ति-साहित्य हमारे समाज की स्मृति और अनुभवों को सँजोने का माध्यम रहा है—यह बात लेख में स्पष्ट रूप से सामने आती है. इसमें बताया गया है कि भारतीय भक्ति-परंपरा को समझने के लिए भक्तमाल, परची, बीतक, विनोद, सागर, बोध, वार्ता, चरित, नामावली, जन्मसाखियाँ आदि जैसे देशज स्रोत बहुत महत्वपूर्ण हैं. इन रचनाओं में संत-भक्तों के जीवन की जानकारी मिलती है, भले ही वह आज के अर्थ में पूरी तरह ऐतिहासिक न हो. लेखक यह भी समझाता है कि संतों के जीवन में चमत्कार और अलौकिक घटनाओं का वर्णन उस समय की सामाजिक आस्था और विश्वास का हिस्सा है, इसलिए उन्हें केवल तर्क या आधुनिक इतिहास की कसौटी पर खारिज नहीं किया जा सकता.
२.
माधव हाड़ा औपनिवेशिक और आधुनिक विद्वानों की उस सोच की आलोचना करते हैं, जिसमें इन देशज परंपराओं को अविश्वसनीय मान लिया गया. उनका मानना है कि भक्ति-चेतना को सही ढंग से समझने के लिए उसके अपने सांस्कृतिक संदर्भ को समझना जरूरी है. भक्ति-साहित्य में संतों का जीवन-वृत्त उनके विचारों, आचरण और समाज पर उनके प्रभाव को दिखाने के लिए लिखा गया है. एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भक्ति का प्रसार देशभाषाओं में हुआ. कबीर, नामदेव, विद्यापति जैसे संत-कवियों ने आम लोगों की भाषा में भक्ति को व्यक्त किया, जिससे भक्ति जन-जन तक पहुँची. इससे यह स्पष्ट होता है कि भक्ति भारतीय संस्कृति में लोक और शास्त्र को जोड़ने का काम करती है.
वे बताते हैं कि भक्ति और उसके साहित्य को पहचान दिलाने में पश्चिमी विद्वानों का योगदान रहा है, लेकिन उनकी दृष्टि कई बार भारतीय समाज की विविधता और लोकपरंपरा को पूरी तरह नहीं समझ पाती. लेखक स्पष्ट करते हैं कि भारत की संस्कृति यूरोप जैसी नहीं है. यूरोप में धर्म और ज्ञान का विकास एक केंद्र (चर्च) के अनुशासन में हुआ, जबकि भारत में भक्ति अलग-अलग क्षेत्रों, भाषाओं और समाजों में अपने-अपने रूप में विकसित हुई. जैसा कि कबीर की भक्ति निर्गुण है, मीराँ की भक्ति सगुण और प्रेमप्रधान है, और सूरदास की भक्ति कृष्ण-लीला से जुड़ी है. इन्हें किसी एक ही ढाँचे में रखकर नहीं समझा जा सकता.
माधव हाड़ा यह भी बताते हैं कि पश्चिमी विद्वत्ता लिखित प्रमाणों पर ज़्यादा ज़ोर देती है, जबकि भारतीय भक्ति-परंपरा लोक, श्रुति और स्मृति में जीवित रही है. जैसे, कबीर के पद लंबे समय तक लोगों की ज़ुबान पर रहे, गाए जाते रहे, बाद में लिखित रूप में आए. केवल लिखित प्रमाण खोजने से उनकी भक्ति को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता. भारतीय भक्ति को समझने के लिए भारतीय संदर्भ, लोकसंस्कृति और बहुलता को ध्यान में रखना ज़रूरी है, तभी उसका सही और सार्थक मूल्यांकन हो सकता है.
यह लेख भारतीय भक्ति-साहित्य के अध्ययन में औपनिवेशिक और पश्चिमी ज्ञान-मानकों पर निर्भरता से सावधान करता है और भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से पुनर्विचार की आवश्यकता को रेखांकित करता है. माधव हाड़ा का यह लेख न तो पश्चिमी विद्वत्ता को एकतरफ़ा खारिज करता है और न ही उसे अंतिम सत्य मानता है; बल्कि वह एक संतुलित, विवेकपूर्ण और भारतीय संदर्भों से जुड़ा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है. उन्होंने सुप्रसिद्ध आलोचक पल्लव को दिये गये अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि
“हमारे साहित्य और इतिहास की पहचान समझ के अधिकांश प्रस्थान औपनिवेशिक ज्ञान मीमांसा में है. अब उसका पुनरावलोकन ज़रूरी है. आदर्श अवलोकन में यह तो तय होता है कि जिस ज़मीन पर खड़े हैं उसका स्वामित्व आपका है, लेकिन पुनरावलोकन में हमेशा ऐसा नहीं होता. ……. मेरी कोशिश तो यह है कि खड़ा अपनी ज़मीन पर रहा जाए. आग्रहपूर्वक की गई इस कोशिश में कुछ लोगों को पुनरुत्थान की गंध आएगी, लेकिन इसे ‘सुनियोजित झूठ’ का शिकार बनने के विरुद्ध जद्दोजहद समझी जाए, तो अच्छा लगेगा. ”( वेब पत्रिका ‘सम्मुख’ में प्रकाशित साक्षात्कार)
संपादक ने इसमें उन संत-भक्तों को शामिल किया है जो पूरी भक्ति परंपरा की रीढ़ हैं. यह संकलन भक्ति को किसी एक संप्रदाय, भाषा या भूगोल तक सीमित नहीं करता, बल्कि उसे भारतीय सांस्कृतिक चेतना की साझा विरासत के रूप में प्रस्तुत करता है. इस संग्रह में पहले भक्त कवि के रूप में अप्पर का परिचय तथा काव्य आता है. अप्पर छठी सदी के विख्यात नायनार शैव संत-भक्त तथा तमिल कवि थे जो दक्षिण के चार प्रमुख शैव आचार्यों में से एक हैं. इनका यह नाम उनको प्रमुख नायनार संत संबंदर ने दिया था. ‘अप्पर’ शब्द का अर्थ ‘पिता’ बताया गया है, जो उनके वात्सल्यपूर्ण आध्यात्मिक व्यक्तित्व को रेखांकित करता है. उनके द्वारा भगवान शिव के लिए रचित हजारों भक्ति पदों, तिरुमुरई में संकलन, जैन धर्म से शैव धर्म की ओर उनका आध्यात्मिक रूपांतरण—इन सबका संक्षिप्त किंतु तथ्यपूर्ण विवरण दिया गया है. इनकी रचनाओं की प्रकृति के विषय में लेखक लिखते हैं-
“अप्पर की रचनाएँ शिव के प्रति अंतरंग प्रेम और भक्ति से संबंधित हैं, लेकिन उनमें ऐसे छंद भी शामिल हैं, जहाँ वे अपने जीवन के जैनकाल पर पश्चताप करते हैं. ” (पृ. 72)
इसमें उनके चयनित रचनाएँ विनय, आत्मस्वीकृति और ईश्वर-समर्पण की भावना को उजागर करती हैं. अप्पर की रचनाएँ तमिल भाषा के काव्यरूप ‘तेवरम’ में है. अप्पर के ही समकालीन (7वीं सदी के) दक्षिण भारत के प्रख्यात नायनार युवा शैव संत तथा कवि संबंदर का जीवन-वृत्त, उनकी भक्ति-चेतना, वैचारिक संघर्ष और काव्यात्मक अनुभूति को समग्रता में प्रस्तुत किया गया है. इनकी रचनाएँ तिरुमरई के प्रथम भाग में संकलित हैं जो कि नालियार शैव सिद्धांत की आधार हैं. संबंदर जैन और बौद्ध मत के विरोधी थे.
आठवीं शताब्दी के महत्त्वपूर्ण सिद्ध कवि सरहपाद के जीवन, विचार और काव्य-वैचारिक योगदान का सुसंगठित एवं संतुलित परिचय प्रस्तुत किया गया है. लेखक ने सरहपाद को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि भक्ति, सहजयान और लोकचेतना के सेतु के रूप में रेखांकित किया है. इसमें सरहपाद को द्वितीय बुद्ध, प्रथम सहज सिद्ध और हिंदी-ओड़िया-बांग्ला की काव्य-परंपरा के आदि कवियों में से एक मानने की परंपरा को ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भों के साथ स्पष्ट किया गया है. तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक उथल-पुथल की पृष्ठभूमि में उनके विचारों को रखकर लेखक ने यह दिखाया है कि कैसे सरहपाद की वाणी सामाजिक आलोचना की नई भाषा गढ़ती है. सरहपाद की सहज साधना, बाह्याचार-विरोध, योग, ध्यान और जीवनानुभव-आधारित दर्शन पर सटीक प्रकाश डाला गया है. उनकी भाषा की लोकधर्मी प्रकृति, प्रतीकात्मकता और काव्य-संरचना को रेखांकित करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि उनका प्रभाव बाद की संत-भक्ति परंपरा तक विस्तृत है.
नौवीं सदी के वैष्णव आलवार संत-भक्तों में बारहवाँ संत-भक्त परकाल के जीवन यात्रा, उनसे संबंधित जनश्रुतियों तथा उनकी रचनागत विशेषाताओं पर प्रकाश डाला गया है. इनके विषय में लोक में कई जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं जिसका इसमें उल्लेख मिलता है. उनके साहित्यिक परिचय में वे लिखते हैं कि “परकाल की भक्ति दास्यभक्ति है, लेकिन इसमें प्रेम, निष्ठा, वियोग, नाराज़गी, रोष आदि सब है. परकाल के अनुसार, जीवात्मा का स्वरूप परमात्मा के अधीन इतना परतंत्र है, जितना पतिव्रता स्त्री अपने पति के अधीन परतंत्र है. संत परकाल अपनी रचनाओं में अपने पति श्रीमन्नारायण की नायिका हैं—वे नायिका, नायिका की माँ और नायिका की सखी होकर ईश्वर से अपने संबंध को व्यक्त करते हैं. इस तरह संत परकाल के यहाँ नायिका भाव के तीन प्रकार हैं—
(1) नायिक जो भगवान की प्रिया है,
(2) नायिका की माँ जो भगवान् से अपनी विरहणी पुत्री की दशा का वर्णन कर रही है और
(3) नायिका की सखी, जो उसको प्रियतम के आगमन की आशा बँधाकर धैर्य रखने का आग्रह कर रही है.
परकाल कभी गोपी बनकर बोलते हैं, कभी माँ यशोदा बनकर कृष्ण को दूध पीने बुलाते हैं और कभी राम के शत्रुओं का योद्धा की तरह विनाश करने के लिए संकल्पित लगते हैं. ”(वही, पृ. सं. -103) संपादक ने महान आलवार संत परकाल के विलक्षण भक्ति और कव्य-प्रतिभा तथा भगवान विष्णु के प्रति उनकी अनूठी प्रेम-भक्ति को रेखांकित किया है. परकाल की कविताओं में उनकी भक्ति कथात्मक, भावप्रवन और आत्मसमर्पण की चरम अवस्था को प्राप्त करती दिखाई देती है. कवि विष्णु के विविध अवतारों के लोकोद्धारक रूप का वर्णन करते हुए विष्णु को लोकरक्षक, करूणामयी तथा सर्वव्यापी बताया है. उदाहरण के रूप में उनकी एक कविता देखिये-
मेरे हाथों में
उनके कारण नहीं टिकते हैं कंगन
सोचती हूँ तो मन हो जाता है उन्हीं का
देखा तो कटि में बल पड़ गया
लता की तरह
कहा कुछ बहुत धीरे से
बहुत तीखी हैं निगाहें
मुझे नहीं आता समझ में
लगता है भय
“न जाने वे हैं कौन ?”
तो वे बोले, “मै अष्टभुजाधारी!”
(पृ. 107)
अथवा
“हे छींके में रखे घी को
अमृत मानकर खाने वाले!
हे वामन बनकर पृथ्वी को
दो पगों में नाप लेने वाले !
हे गगनचुंबी शिखरवाले
श्रीवेंकट पर्वत पर विराजित देव !
मुझ सेवक पर करों कृपा . . . ”
जैसे पदों में भक्त की आत्मिक व्याकुलता, प्रेमजन्य पीड़ा का अत्यंत मार्मिक रूप चित्रित हुआ है.
8वीं शताब्दी की प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय तमिल संत और एकमात्र महिला आलवार आंडाल के जीवन, व्यक्तित्व, कृष्ण के प्रति अनुराग तथा उसके कृतित्व आदि तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है. दक्षिण भारत में आंडाल साक्षात् लक्ष्मी और भूमिपुत्री के रूप में विख्यात हैं. उनकी लोकप्रियता इस कदर है कि मार्गशीर्ष माह में उनकी रचनाएँ घर-घर गाई जाती है. विशिष्टाद्वैतवाद के विख्यात मनीषी आचार्य वेदांत दीक्षित उनसे इतने प्रभावित थे कि आंडाल की स्तुति में उन्होंने गोदा स्तुति नामक कृति की रचना की. आंडाल के बारे में यह मान्यता है कि स्वयं भगवान आंडाल के अधीन थे और वे उनकी पसंद-नापसंद का सम्मान करते थे. इसी क्रम में गोरखनाथ का समावेश अत्यंत महत्वपूर्ण है. गोरखनाथ केवल नाथपंथ के योगी या सिद्ध नहीं हैं, बल्कि वे भक्ति चेतना के प्रारंभिक और वैचारिक स्रोत हैं. उनका प्रभाव धार्मिक साधना तक सीमित न होकर सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक जीवन तक फैला हुआ है. उनकी साधना ब्रह्मचर्य, योग और संयम पर आधारित होते हुए भी जीवन-विमुख नहीं है. वे गृहस्थ और साधु—दोनों के लिए एक समान जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करते हैं.
गोरखनाथ के लिए धर्म का अर्थ बाहरी आडंबर या कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और अनुभवजन्य सत्य है. लेखक गोरखनाथ की वाणी में निहित पाखंड-विरोधी और समाज-समीक्षात्मक स्वर को भी स्पष्ट करता है. वे जाति, संप्रदाय और रूढ़ मान्यताओं के बंधनों को अस्वीकार करते हैं. यही तत्व उन्हें आगे चलकर कबीर जैसे निर्गुण संतों का वैचारिक पूर्वज बनाता है. पुस्तक का यह पक्ष विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है कि वह गोरखनाथ को भक्ति आंदोलन की मुख्यधारा से अलग नहीं करती, बल्कि उसकी जड़ में स्थापित करती है.
संकलन में शामिल गोरखनाथ की कविताएँ उनकी साधनात्मक चेतना और जीवन-दर्शन का सशक्त उदाहरण हैं. इनमें—मन की अस्थिरता पर नियंत्रण, माया और मोह से मुक्ति, गुरु की अनिवार्यता, आत्मज्ञान और अनुभव की प्रधानता जैसे विषय प्रमुख हैं. इस संकलन से ही उदाहरण प्रस्तुत है—
“अवधू मन चंगा तो कठौती गंगा, बांध्या मेल्हा तौ जगत चेला.
बदंत गोरख सत सरूप, तत विचारै तै रेख न रूप॥”
हे अवधू! यदि मन शुद्ध है तो कठौती का जल भी गंगाजल के समान पवित्र है. मन को बाँध कर रखने से संसार शिष्य बन जाता है. गोरख सत्य स्वरूप ब्रह्म के विषय में कहता है—यदि तत्त्व विचार करें तो ज्ञात होता है कि मन की कोई रूपरेखा नहीं, वह निराकार है. कविता यहाँ सौंदर्य-प्रदर्शन का साधन नहीं, बल्कि साधना और आत्मबोध का माध्यम है. यही कारण है कि उनकी वाणी आज भी प्रासंगिक और प्रभावशाली प्रतीत होती है.
इसमें संकलित दक्षिण भारत की प्रसिद्ध शिवभक्त कवयित्री अक्क महादेवी के जीवन यात्रा, जनशुतियों और काथाओं से बुना-गढ़ा प्रसंग अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं प्रासंगिक है. इनकी गणना ‘परमशिव के पंचमुख’ में होती है. अक्क मादेवी का नाम महादेवी है. नाम में प्रयुक्त ‘अक्क’ का अर्थ बड़ी बहन है. अक्क संबोधन उन्हें अल्लमप्रभु ने दिया. अक्क महादेवी की भक्ति द्वैत से परे एकात्मक अनुभव है. साधक और साध्य के बीच कोई वास्तविक भेद नहीं है. उदाहरण के लिए —
“हे चेन्नमल्लिकार्जुन!
मैं हूँ आप में विलीन
आप क्यों छोड़ते हैं मुझे?”
(पृ. 190)
यह पंक्ति भक्ति की उस चरम अवस्था को व्यक्त करती है जहाँ ‘मैं’ का अस्तित्व लुप्त हो जाता है. वे ईश्वर से कुछ माँगती नहीं, बल्कि अपने समर्पण को ही भक्ति का चरम मानती हैं.
“तुम दोगे जितना कष्ट
उतना बढ़ेगा मेरा समर्पण
हे देव चेन्नमल्लिकार्जुन!” (पृ. 191)
यहाँ पीड़ा ही साधना का साधन बन जाती है. अक्क महादेवी की कविताओं का स्वर निर्भीक, स्वतंत्र और आत्मनिर्णय से भरा है. वे सामाजिक बंधनों, देह-बोध और बाह्य आडंबरों को अस्वीकार करती हैं. उनकी भक्ति नारी आत्मस्वातंत्र्य की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति बन जाती है.
प्रस्तुत पुस्तक में बाबा फ़रीद (शेख़ फ़रीदुद्दीन मसउद ‘गंज-ए-शकर’) को सूफ़ी भक्ति के मानवीय और नैतिक स्वर के रूप में प्रस्तुत किया गया है. शेख़ फ़रीद ने आध्यात्मिक ऊँचाई अर्जित करने के साथ आजीवन मनुष्यता की सेवा की. क्षमा, दया, करुणा, धैर्य आदि नैतिक मूल्य उनके आचरण में थे. पुस्तक फ़रीद की वाणी की उस विशेषता को रेखांकित करती है जो उन्हें अन्य सूफ़ी संतों से अलग करती है—उनकी कविता में जीवन-अनुभव की गहराई और नैतिक चेतावनी का प्रखर स्वर विद्यमान है. उसमें परमात्मा का स्वरूप और उसकी महिमा, उसका विरह, संसार की नश्वरता, आचरण की निर्मलता के साथ चेतावनी का स्वर बहुत प्रबल है. संकलन की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण है कि फ़रीद की भक्ति किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान में सीमित नहीं रहती, बल्कि वह भेदभाव से ऊपर उठकर सद्भाव और प्रेम का स्वर ग्रहण करती है. संकलन में यह भी रेखांकित किया गया है कि मुलतान का लोक और वहाँ की भाषा शेख़ फ़रीद की वाणी को असाधारण शक्ति प्रदान करती है. यही कारण है कि उनकी 130 रचनाओं का गुरु ग्रंथ साहिब में समावेश हुआ—जो सूफ़ी और सिख परंपराओं के ऐतिहासिक संवाद का प्रमाण है. इनके संबंध में मुईनुद्दीन चिश्ती ने बख़्तियार काकी को कहा था—
“बख़्तियार तूने ऐसा शाहबाज़ पकड़ा है, जो अपना घोंसला सातवें आसमान से नीचे नहीं बनाएगा. फ़रीद ऐसा चिराग़ है, जो दरवेशों के सारे सिलसिले को रोशन करेगा. ”( पृ. 199)
पुस्तक का उद्देश्य भक्ति को किसी एक मत, संप्रदाय या काव्य धारा में सीमित न करके उसकी वैचारिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक बहुलता को सामने लाना है. इस दृष्टि से संकलन में शामिल कबीर, पीपा, रैदास जैसे निर्गुण संत न केवल भारतीय भक्ति-चेतना की वैचारि रीढ़ हैं, बल्कि सामाजिक चेतना के प्रमुख स्वर हैं. हिंदी साहित्य में कबीर निर्गुण भक्ति परंपरा का सर्वाधिक प्रभावशाली संत हैं. संपादक ने यह स्पष्ट किया है कि कबीर की मान्यता और प्रभाव केवल उनके समय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बाद के लगभग सभी संत-भक्त कवियों ने किसी न किसी रूप में उनका स्मरण किया है. उनके समकालीन और गुरुभाई संत पीपा ने उनके संबंध में लिखा कि
“जो कलिकाल कबीर ने होते.
तौ लोक बेद अरु कलिजुग मिलि भगति रसातल देते. . ”
( पृ. 297)
संत पीपा द्वारा किया गया कबीर का मूल्यांकन उनके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्त्व को रेखांकित करता है. कबीर अपने समय के प्रचलित धर्मों और बाह्याचारों के बहुत मुखर आलोचक और विरोधी थे. बाह्याचारों के प्रति वे बहुत निर्मम हैं. कबीर का अध्यात्म किसी एक परंपरा से लिया हुआ नहीं, बल्कि सत्संग और साधना से अर्जित उनका निजी अनुभव है, जिसमें औपनिषदिक, सूफ़ी और वैष्णव तत्व स्वाभाविक रूप से समाहित हो गए हैं. संकलन यह भी रेखांकित करता है कि कबीर के लिए ससीम-असीम, जीव-ब्रह्म का भेद कृत्रिम है; उनके यहाँ द्वैत और अद्वैत का सहज समन्वय दिखाई देता है.
कबीर ने ‘माया’ को आत्मा और परमात्मा के मिलन में बाधा माना है.
“कबीर माया मोहनी, मोहे जाँण सुजाँण.
भागाँ ही छूटे नहीं, भरि भरि मारै बाँण ॥” (पृ. 303)
इस प्रकार, यह संकलन कबीर की आध्यात्मिक गहराई, सामाजिक चेतना और काव्यात्मक शक्ति—तीनों को संतुलित रूप में सामने लाता है. साथ ही, विद्वानों के मतों के माध्यम से कबीर को केवल समाज सुधारक या साधु नहीं, बल्कि एक सशक्त कवि के रूप में स्थापित किया गया है.
३.
संकलन में पीपा को कबीर परंपरा के समकालीन और वैचारिक रूप से निकट संत के रूप में रखा गया है. कबीर की ही भाँति संत पीपा की भी वाणी में निर्गुण ब्रह्म, आत्मा-परमात्मा की एकता और बाह्य आडंबर का विरोध प्रमुख स्वर बनकर उभरता है. उनका चिंतन निर्गुण ब्रह्म, आत्मा-परमात्मा की एकता, माया की असारता और गुरु की अनिवार्यता पर केंद्रित है. वे ब्रह्म को निर्गुण-निराकार मानते हुए भी साधना के स्तर पर सगुण का आलंबन स्वीकार करते हैं. आलोचक माधव हाड़ा लिखते हैं
“पीपा ने भी कबीर आदि की तरह ब्रह्म को निर्गुण, निराकार, अगम, अगोचर और इंद्रियातीत कहा है. पीपा ब्रह्म के सगुण रूप के भी उपासक थे. उनके अनुसार जीव के लिए निर्गुण होते हुए भी सगुण का आलंबन ज़रूरी है. ”( पृ. 288)
यह संत परंपरा का संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण है.
पीपा के यहाँ ‘माया का खेल’ है, किंतु यह निषेधात्मक नहीं बल्कि विवेकजन्य है. वे पलायन नहीं, बोध चाहते हैं. उनकी भक्ति में वैराग्य के साथ करुणा और लोकमंगल का भाव मौजूद है. इस संकलन में उपस्थित पीपा की साखियाँ और पद उनके वैचारिक मर्म को तीक्ष्ण एवं प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती हैं. मध्यकालीन संत भक्ति साहित्य के सबसे असाधारण व्यक्तित्व गुरु नानक की संकलन में उपस्थिति भारतीय भक्ति परंपरा को एक व्यापक, मानवीय और समन्वयी दृष्टि प्रदान करती है. लेखक के शब्दों में
“उन्होंने एक नये, समावेशी और उदार धर्म की बुनियाद रखी, जो उनके समय में तो लोकप्रिय हुआ ही और बाद में भी इसका पल्लवन और विस्तार हुआ. उन्हें ‘पवित्रात्माओं का राजा’, ‘हिंदुओं का गुरु’ और ‘मुसलमानों का पीर’ कहा जाता है. ” (पृ. 354)
‘भक्ति अगाध अनंत’ में गुरु नानक की प्रस्तुति उन्हें ऐसे संत के रूप में स्थापित करती है, जो हिंदू और इस्लामी—दोनों परंपराओं से संवाद करते हुए अपने आत्मानुभव के आधार पर एक नई भक्ति-दृष्टि का निर्माण करते हैं. संकलन में यह स्पष्ट किया गया है कि गुरु नानक के यहाँ परमात्मा की एकता का विचार सर्वोपरि है, और इस संदर्भ में वे किसी भी प्रकार के वैकल्पिक आग्रह या संप्रदायगत संकीर्णता को स्वीकार नहीं करते. गुरु नानक के बाह्याचार-विरोधी दृष्टिकोण को विशेष रूप से माधव हाड़ा रेखांकित करते हैं.
हिंदू और मुस्लिम, दोनों प्रकार के धार्मिक बाह्याचारों की गुरु नानक ने निंदा की है. उनके लिए भक्ति का अर्थ कर्मकांड नहीं, बल्कि परमात्मा से आंतरिक संयोग है. इस संदर्भ में नामस्मरण की महिमा उनकी वाणी का केंद्रीय तत्त्व बनकर सामने आती है. जपुजी सहित उनकी अधिकांश रचनाएँ नाम को साधना, चेतना और जीवन-मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं.
संकलन गुरु नानक को केवल धर्म-प्रवर्तक या दार्शनिक के रूप में नहीं, बल्कि उच्च कोटि के कवि के रूप में भी प्रस्तुत करता है. उनकी कविता की सहजता, संगीतात्मकता और लोक-संवेदना उनकी व्यापक लोकप्रियता का आधार रही है—जैसा कि खुशवंत सिंह का यह कथन सार्थक रूप में उद्धृत किया गया है कि
“नानक की कविता उनकी अपार लोकप्रियता का मुख्य कारण है. ”(पृ. 357)
गुरु नानक की वाणी में पंजाब की मिट्टी, भाषा और जीवन-दृष्टि इस तरह रची-बसी है कि वह ‘पंजाबियत’ की सशक्त अभिव्यक्ति बन जाती है. संकलन में गुरु नानक और उनकी कविताओं की प्रस्तुति भक्ति को एक समन्वयी, नैतिक और लोकजीवन से जुड़ी चेतना के रूप में स्थापित करती है.
संकलन में अष्टछाप के प्रमुख कवि सूरदास और नंददास का समावेश सगुण वैष्णव विशेषत: विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित अष्टछप को सुदृढ़ संदर्भ प्रदान करता है. इस संकलन में सूरदास केवल एक प्रसिद्ध भक्त कवि के रूप में नहीं, बल्कि भक्ति आंदोलन की रसात्मक और लोकजीवन से जुड़ी चेतना के प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं. इसमें शामिल उनकी प्रतिनिधि कविताएँ यशोदा-कृष्ण के वात्सल्य संबंध, बाल-लीलओं की चंचलता और गोपियों के माधुर्य भाव को अत्यंत सजीव और मार्मिक रूप में अभिव्यक्त करती हैं.
नंददास के जीवन, व्यक्तित्व, कृतित्व और ऐतिहासिक संदर्भ का सुसंगत एवं सारगर्भित चित्र प्रस्तुत किया गया है. संकलन में संकलित नंददास से संबंधित सामग्री यह स्पष्ट करती है कि उनकी अधिक कृतियां श्रीमद्भागवतपुराण के प्रसंगों पर आधारित हैं. उन्होंने गोवर्धनलीला, भँवरगीत, रासपंचाध्यायी और भाषा दशमस्कंध में श्रीमद्भागवतपुराण के दशम स्कंध के प्रकरणों को अपनी रचना की कथा या विषय-वस्तु के लिए चुना है. उनका उद्देश्य श्रीमद्भागवतपुराण के प्रकरणों को भाषा में प्रस्तुत करना है. नंददास की सभी रचनाएँ कृष्ण और उनकी लीला भूमि वृंदावन की महिमा पर एकाग्र हैं. नंददास की कविताएँ उनके कृष्ण-भक्ति काव्य की रसात्मक, सौम्य और लोकानुभूति से जुड़ी हुई प्रकृति को अत्यंत स्पष्ट रूप से उद्घाटित करती है, उदाहरण के लिए—
“यहि बिधि प्रेम-सुधानिधि में अति बढ़ी कलोलै.
है गईं बिह्वल बाल लाल सों अलबल बोलें॥”
अथवा
“इक दिन राधे कुंवरि, स्याम-घर खेलनि आई;
चंचल और विचित्र देखि, जसुमति मन भाई.
नंद-महरि ने तब कह्यो, देखि रूप की रास ;
इहि कन्या मैं स्याम को गोविंद पुजवैं आस.
कि जोरी सोहती. ”
प्रस्तुत पुस्तक में संकलित लालन शाह फ़कीर की रचनाएं इस संचयन की वैचारिक और सौंदर्यात्मक व्यापकता को विशेष रूप से रेखांकित करती है. उन्नीसवीं सदी के बंगाल के संत-कवि लालन शाह फ़कीर को प्रस्तुत करते हुए संपादक माधव हाड़ा ने भक्ति की उस लोकधार्मिक धारा को सामने रखा है, जो जाति, धर्म, संप्रदाय और शास्त्रीय आग्रहों से मुक्त होकर मनुष्य और मनुष्यता को केंद्र में रखती है. लालन की भक्ति न तो वैष्णव है, न शैव, न ही इस्लामी—वह मूलतः मानव-केंद्रित निर्गुण साधना है.
लालन शाह फ़कीर की कविताओं में देह, मन और आत्मा के संबंधों की गहन पड़ताल मिलती है. ‘अनजाना पक्षी’, ‘पिंजरा’, ‘दर्पण-नगर’, ‘नदिया’ जैसे प्रतीक उनके काव्य में बार-बार आते हैं, जो मनुष्य देह की नश्वरता और आत्मतत्त्व की खोज को रूपायित करते हैं. आलोचक हाड़ा जी के शब्दों में
“लालन फ़कीर के यहाँ परमतत्त्व या ईश्वर की सत्ता मनुष्य से अलग नहीं है, यह उसमें अंतर्निहित है, इसलिए उन्होंने मनुष्य देह और मनुष्य जन्म को बहुत महत्त्व दिया. लालन फ़कीर ने मनुष्य में ही अंतर्निहित ईश्वर को ‘अचिन पाखी’ कहा है. . . . . उनके लिए साधना का अर्थ परमसत्ता की ‘मन के मनुष्य’ रूप में खोज और पहचान है, जो उनके अनुसार केवल प्रेम से संभव है. ” (पृ. 694)
उनकी साधना में देह-साधना कोई भोगवादी आग्रह नहीं, बल्कि आत्मबोध का माध्यम है. इसीलिए वे बाह्य आचार, कर्मकांड और शास्त्रीय पांडित्य को अस्वीकार करते हुए सत्य की पहचान प्रेम और अनुभव से ही संभव बताते है.
संकलन में प्रस्तुत लालन की रचनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि उनकी भक्ति सामाजिक विद्रोह भी है. वे जाति-व्यवस्था, धार्मिक कट्टरता और पाखंड पर तीखा प्रहार करते हैं.
“आते समय किस जाति के थे ?
किस जाति हुए तुम आकर?
जाते समय होओगे किस जाति में
यह बात सोचकर बताओ” (पृ. 702)
यही प्रश्न उनकी कविताओं को कबीर और रैदास की परंपरा से जोड़ता है, तो वहीं बाउल साधना की लोकधर्मी चेतना से भी. सं पादन ने लालन शाह फ़कीर को केवल एक संत या साधक के रूप में नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के कवि के रूप में प्रस्तुत किया है. उनकी भाषा में लोकबंगला की सहजता, गीतात्मकता और सांकेतिक गहराई है. यही कारण है कि रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे कवि भी लालन की वाणी से प्रभावित हुए.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का समावेश इस संकलन की दृष्टि को मध्यकालीन भक्ति तक सीमित न रखकर आधुनिक युग तक विस्तारित करता है. यह चयन दिखाता है कि भक्ति केवल किसी एक काल, भाषा या संप्रदाय की देन नहीं, बल्कि भारतीय चेतना की निरंतर प्रवाहमान धारा है—जो आधुनिक समय में भी नए रूपों में प्रकट होती रही है. इस संकलन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर को एक ऐसे कवि के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिनकी चेतना भारतीय परंपरा में गहरे पैठी हुई है, लेकिन जिनका अनुभव-लोक वैश्विक है. हिमालय की यात्रा, पिता से मिली संस्कृत, अंग्रेजी, गणित, ज्योतिष के साथ-साथ उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण की शिक्षा, बंगाल की सांस्कृतिक भूमि, ब्रह्मसमाज की वैचारिक पृष्ठभूमि, पश्चिमी शिक्षा और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा—इन सबका समन्वय उनके व्यक्तित्व में दिखाई देता है. यही कारण है कि
“अमर्त्य सेन ने उनको ‘निरंतर कम परंपरावादी और अधिक तर्क आधारित’ दृष्टिकोण वाला व्यक्ति कहा है. ” (पृ. 704)
वे भक्ति को संकीर्ण धार्मिकता से निकालकर सार्वभौमिक मानवीय अनुभव में रूपांतरित करते हैं. माधव हाड़ा का मनना है कि “रवींद्रनाथ ग़ैर सांप्रदायिक थे, लेकिन गहरे अर्थों में धार्मिक और आध्यात्मिक थे. ईश्वर से प्रत्यक्ष, आनंदपूर्ण और निर्भय संबंध का भाव उनकी कई रचनाओं में है और गीतांजली तो इसी अनुभव और भाव का जीवंत दस्तावेज़ है. ” (पृ. 704)
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताएँ भले ही परंपरागत भक्ति-काव्य से अलग हैं लेकिन उसके मूल भाव—ईश्वर से आत्मीय संवाद हैं. संकलन से उनकी कविताओं के अंश देखिए—
“हे महाराज !
जब संसार में नही रहेगा मेरा काम
तब एकांत और नीरव में
क्या मैं खड़ा रहूँगा
तुम्हारे सम्मुख ?”
“आकारों के समुद्र में
मैं लगाता हूँ डुबकियाँ
निराकार कोई पूर्ण मोती आ जाए हाथ
मैं अब नहीं फिरूँगा घाट-घाट
इस टूटी-फूटी
समय की मार खाई नौका में”
यहाँ ईश्वर किसी मूर्ति या सीमित रूप में नहीं, बल्कि अनंत, सर्वव्यापी और मानवीय संवेदना से जुड़ा हुआ है. उनकी कविताओं में भक्तिआत्मसमर्पण है, ईश्वर से संवाद है, जो जीवन, प्रकृति और मानवता के माध्यम से होता है. ‘गीतांजलि’ की कविताओं में यह स्वर विशेष रूप से उभरता है, जहाँ कवि ईश्वर को जीवन की यात्रा का सहचर मानता है.
संकलन में आधुनिककाल के कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के भक्त कवि का रूप इस संकलन में उद्घाटित किया गया है. पुस्तक यह स्पष्ट करती है कि यद्यपि निराला की पहचान जनधर्मिता और पुनरुत्थान के कवि के रूप में है, लेकिन आरंभ से ही उनकी कविता में भक्ति की चेतना रही है. जीवन के अंतिम चरण में यह भक्ति-चेतना उनकी कविता का केंद्रीय स्वर हो गई थी. संकलन में यह रेखंकित किया गया है कि निराला की भक्ति और प्रार्थना संबंधी रचनाएँ लंबे समय तक आलोचना की दृष्टि से उपेक्षित है. माधव हाड़ा जी लिखते हैं कि
“निराला की पहचान उनकी जनधर्मिता के कारण ऐसी बनी कि उनकी भक्ति और प्रार्थना संबंधी रचनाएँ अनदेखी रह गयीं. निराला बड़े कवि थे—उनके सरोकार बहुत व्यापक और विविध प्रकार के थे. दूसरे सरोकारों के साथ भक्ति भी उनके सरोकारों में शुरुआत से ही थी. ” (पृ. 721)
निराला की भक्ति भावनात्मक और आत्मानुभूति प्रधान है. उनकी कविताओं में ईश्वर केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि शक्ति, करुणा और जीवन-संघर्ष से उबरने का आधार बनकर उभरता है.
‘क्या गाऊँ?’ माँ ! क्या गाऊँ ?
गूँज रही हैं जहाँ राग-रागिनियाँ,
गाती हैं किन्नरियाँ कितनी परियाँ
कितनी पंचदशी कामिनियाँ,
रुद्ध कंठ का राग अधूरा कैसे तुझे सुनाऊँ ?—”
यह कविता निराला की भक्ति और आत्मसंघर्ष की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है. इसमें कवि अपने भीतर की असमर्थता और भावनात्मक द्वंद्व को व्यक्त करता है. कवि माँ के समक्ष स्वयं को अयोग्य मानते हुए पूछता है कि वह किस प्रकार स्तुति करे. सच्ची भक्ति बाहरी वैभव नहीं बल्कि अंतःकरण की शुद्धता पर आधारित होती है.
इस पुस्तक में संकलित एक अन्य कविता के अंश देखिए—
“माँ अपने आलोक निखारो,
नर को नरक-त्रस से वारो. ”
यह कविता शक्ति और मातृभाव की उपासना का सशक्त उदाहरण है. इसमें कवि अपने जीवन के संघर्षों से मुक्ति और शक्ति प्राप्ति के लिए माँ के चरणों में समर्पण करता है. यह कविता निराला के उस आध्यात्मिक दृष्टिकोण को सामने लाती है जिसमें भक्ति व्यक्ति को मानसिक दृढ़ता और जीवन-साहस प्रदान करती है. निराला भक्ति परंपरा को आधुनिक जीवन के अनुभवों से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण कवि सिद्ध होते हैं. उनकी कविताएँ भक्ति की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत करती हैं. इन कवियों के अलावे इसमें सम्मिलित तमाम संत-भक्त कवियों की वाणी भक्ति की विविध धाराओं—ज्ञान, प्रेम, वैराग्य, करुणा और लोक चेतना—को समृद्ध करती है. इन कवियों की रचनाएँ न केवल भक्ति आंदोलन की ऐतिहासिक निरंतरता को स्पष्ट करती हैं, बल्कि यह भी दिखाती हैं कि भक्ति किसी एक मत, भाषा या भूगोल तक सीमित नहीं रही. इस प्रकार भक्ति अगाध अनंत भारतीय भक्ति-परंपरा के बहुवचन, लोकमुखी और संवादधर्मी स्वरूप को समग्रता में सामने लाने वाला एक दुर्लभ और महत्त्वपूर्ण संचयन सिद्ध होता है.
पुस्तक की विशेषता इसका व्यापक भौगोलिक विस्तार और समावेशी दृष्टि है, जिसमें दक्षिण, उत्तर, पूर्व, पश्चिम और उत्तर-पूर्व—सभी क्षेत्रों के संत-भक्त कवियों की रचनाएँ सम्मिलित हैं. इस पुस्तक के आमुख में अशोक वाजपेयी लिखते हैं
“भक्ति काव्य ने एक ऐसा विशद-विपुल-बहुल काव्यशास्त्र रचा कि सौंदर्य और संघर्ष, समर्पण और प्रश्नवाचकता, आस्था और संदेह के बीच जो पारंपरिक दूरी और द्वैत थे, वे ध्वस्त हो गये. ” (पृ. 6)
अशोक वाजपेयी इसके आमुख में भक्ति काव्य की जनतांत्रिक, प्रश्नवाचक और प्रतिरोधी प्रकृति को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया है. अत: ‘भक्ति अगाध अनंत’ केवल भक्ति काव्य-संकलन नहीं, बल्कि भारतीय भक्ति परंपरा की समग्र पहचान निर्मित करने वाली एक ऐतिहासिक महत्त्व की पुस्तक है.
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एकता मंडल
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मैंने इस पुस्तक को पूरा पढ़ा और इस पर चर्चा में शामिल भी हुई, पर इसकी समीक्षा लिखने का दुरुह कार्य मुझसे नहीं सधा। समीक्षा लिखने के लिए एकता जी को बहुत बधाई।
भक्ति का ऐसा महिमामंडन कभी मेरी समझ में नहीं आया, और यहां तो हद ही कर दी गई है। सरहपा और गोरख तक को भक्त बना दिया गया है। फिर बुद्ध ने क्या अपराध किया है? उन्हें भी खींच खांच कर भक्त बना दें! द्रविड़ देस से भगति ऊपजी … क्या पश्चिमी पद्धति से उपजी हुई धारणा है? मुझे तो यही समझ में आता है कि उत्तर में सिद्धों और नाथों का काया केंद्रित वैरागी अध्यात्म छाया हुआ था, जिसे दक्षिण की भक्ति और पश्चिम के सूफीमत ने दो तीन सौ साल में चलन से बाहर कर दिया। और बातों के अलावा शायद इसलिए भी कि समर्पण की ये विचारधाराएं नए शासकवर्ग के लिए कहीं ज्यादा मुफीद थीं।
आलोचक को सबसे पहले अपनी प्रस्थापनाओं में स्पष्ट होना चाहिए। बहुअर्थी प्रस्थापना हो तो उसके सारे अर्थ स्पष्ट किए जाने चाहिए। झोल बतियाना हो तो कविता लिखें, आलोचना या इसके आसपास पड़ने वाले तार्किक दायरे को बख्श दें। खैर, भक्ति पर आएं तो इस शब्द का अर्थ भारत में एक समय के बाद इस हद तक ईश्वर भक्ति हो गया कि उसके दो स्वरूपों को अलगाने के लिए स्वामिभक्ति एक अलग शब्द बनाना पड़ा। अश्वघोष के बुद्धचरित में सिद्धार्थ गौतम से सारथी छंदक के लगाव के लिए केवल भक्ति शब्द का उपयोग किया गया है, जिसका कोई आध्यात्मिक आयाम नहीं है।
भक्ति यानी समर्पण। इस भाव का एक समय में प्राध्यान्य हो गया था, यह बात समझ में आती है, लेकिन इसे सदा के लिए स्तुत्य मानकर सार्वभौम बना देने का क्या औचित्य है? भारतीय संस्कृति की धुरी यह वैसे ही नहीं है, जैसे वेद भारतीय संस्कृति की धुरी नहीं हैं (हाल में भक्ति को वैदिक संस्कृति का ही विस्तार बताते मैंने एक संघी विचारक- शायद चंपतराय- को सुना!)। यह लेख पढ़कर नहीं, यूं भी मुझे यह तर्कपद्धति माधव हाड़ा जी के लिए बड़ी पराई सी लगी। शायद कवियों पर नोट्स उन्होंने पहले से ले रखे थे, उन्हें जोड़ने के लिए भक्ति का इतना बड़ा वितान तान देना उन्हें जरूरी लगा हो।