जीवित भाषाएँ अपनी शब्द संपदा का निरंतर विकास करती रहती हैं, एक भी शब्द के लुप्त हो जाने का अर्थ...
आशुतोष राना हिंदी सिनेमा के उन कुछ अभिनेताओं में से एक हैं जो हिंदी में लिखते और सोचते हैं, संजीदा...
उपन्यास सामाजिक अध्ययन की दृष्टि से बड़े काम के होते हैं, यहाँ तक कि जिन्हें हम ‘लोकप्रिय साहित्य’ कहते हैं...
अपने पहले ही उपन्यास- ‘कलि-कथा: वाया बाइपास’ (1998) से चर्चित अलका सरावगी महत्वपूर्ण उपन्यासकार हैं, इधर उनका नया उपन्यास ‘कुलभूषण...
अब जब कि अनिल वाजपेयी नहीं हैं, कवि अनिल वाजपेयी, उनकी लगभग अदृश्य रह गयीं इन कविताओं को पढ़ते हुए...
गगन गिल की कविताएँ हों या गद्य वह ख़ुद में उतर कर लिखती हैं, संवेदनशीलता, मार्मिकता और संक्षिप्तता उनके गद्य...
‘स्मृति एक दूसरा समय है’ मंगलेश डबराल का अंतिम कविता संग्रह है, सत्ता (ओं) से लड़ते हुए उनकी कविताएँ यहाँ...
साहित्य का भी तलघर होता है, जहाँ चेहरे नहीं होते, होते भी हैं तो धुंधले और स्मृतियों से कब के...
किसी युवा कवि से जिस रचाव और ताज़गी की आप उम्मीद करते हैं वह सब सुमित त्रिपाठी के पास है,...
“बुरे वक्त की रात में भी/जीता हूँ/सूरज की तरह/सामना करने से/भागकर/डूब नहीं जाता” इस तरह जीने और रचने वाले वरिष्ठ...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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