न तो मैं कुछ कह रहा था : रुस्तम की कविताएँ.
आधुनिक हिंदी कविता में प्रकृति, पर्यावरण और मनुष्यइतर जीवन आते रहे हैं, पूरी कविता के रूप में भी. रुस्तम सिंह के के यहाँ ये संग्रह की शक्ल में आयें हैं....
आधुनिक हिंदी कविता में प्रकृति, पर्यावरण और मनुष्यइतर जीवन आते रहे हैं, पूरी कविता के रूप में भी. रुस्तम सिंह के के यहाँ ये संग्रह की शक्ल में आयें हैं....
जिन्हें हम विकसित सभ्यताएं कहते हैं, वहाँ चमक, दमक, तेज़ी और तुर्शी के बावजूद बहुत कुछ फीका, उदास, थका और अँधेरा है. इसे न कोई देखना चाहता है न दीखाना....
आशीष बिहानी 'कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र', हैदराबाद में शोधार्थी हैं. प्रस्तुत है उनकी लम्बी कविता भीष्म.
युवा चंद्रकांता की कविताएँ हैरत में डालती हैं, बहुत जल्दी ही उन्होंने शिल्पगत प्रौढ़ता और विविधता हासिल कर ली है. वे हिंदी कविता का नया चेहरा हैं. कविताएँ वाक्यों की...
मेरा चेहरा किसी फूल-सा हो सकता थाखिली धूप में चमकता हुआ !वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह की कविताएँ भारतीय स्त्री की कविताएँ हैं, उनमें नारीवादी वैचारिकी का ठोस आधार है. उनका...
मंगलेश डबराल की १५ नई कविताएँ समालोचन प्रकाशित करते हुए कवि असद ज़ैदी के शब्दों में इन कविताओं के लिए यही कह सकता है कि “और इससे ज़्यादा आश्वस्ति क्या हो...
कवियों पर कविताएँ कवि लिखते रहें हैं. ‘पुरस्कारों की घोषणा’ में रंजना मिश्रा ने कवियों पर जो मीठी चुटकी ली वह कमाल की ही. एक कविता अभिनेता संजीव कुमार पर...
अंकिता आनंद ‘आतिश’नाट्य समिति और \"पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स’की सदस्य हैं. इससे पहले उनका जुड़ाव सूचना के अधिकार के राष्ट्रीय अभियान, पेंगुइन बुक्स और समन्वय: भारतीय भाषा महोत्सव’से था....
कोई तो रंग है’ और ‘अगन जल’ संग्रहों के कवि विनोद पदरज (13 फरवरी 1960-सवाई माधोपुर) का तीसरा संग्रह ‘देस’ बोधि प्रकाशन से इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है. स्थानीयता को...
अदनान कफ़ील दरवेश की कविता ‘क़िबला’ को २०१८ के ‘भारत भूषण अग्रवाल’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, आलोचक ‘पुरुषोत्तम अग्रवाल’ के निर्णय का स्वागत करते हुए ‘विष्णु खरे’ ने...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum