नैना से पिशाच तक: भगवानदास मोरवाल
उपन्यास सामाजिक अध्ययन की दृष्टि से बड़े काम के होते हैं, यहाँ तक कि जिन्हें हम ‘लोकप्रिय साहित्य’ कहते हैं उनकी भी गम्भीर विवेचनाएँ हुईं हैं. समाज के अंदर पसर...
उपन्यास सामाजिक अध्ययन की दृष्टि से बड़े काम के होते हैं, यहाँ तक कि जिन्हें हम ‘लोकप्रिय साहित्य’ कहते हैं उनकी भी गम्भीर विवेचनाएँ हुईं हैं. समाज के अंदर पसर...
अपने पहले ही उपन्यास- ‘कलि-कथा: वाया बाइपास’ (1998) से चर्चित अलका सरावगी महत्वपूर्ण उपन्यासकार हैं, इधर उनका नया उपन्यास ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है...
‘स्मृति एक दूसरा समय है’ मंगलेश डबराल का अंतिम कविता संग्रह है, सत्ता (ओं) से लड़ते हुए उनकी कविताएँ यहाँ अधिक मूर्त हुईं हैं. इस संग्रह की चर्चा कर रहें...
वरिष्ठ विज्ञान-लेखक देवेंद्र मेवाड़ी साहित्य के भी लेखक हैं, इसे साबित करने के लिए उनकी यह पुस्तक- ‘कथा कहो यायावर’ पर्याप्त है. हिन्दी में विज्ञान और विज्ञान-गल्प लेखन की अपार...
कृष्णा सोबती का लेखन बहुआयामी है, उनका जीवन आवरण से ढंका हुआ उन्हीं की तरह. उनके सार्वजनिक निर्णय उसे और जटिल बनाते रहे हैं. गिरधर राठी ने रज़ा फाउण्डेशन की...
हिंदी की बीसवीं शताब्दी के कुछ सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक जयशंकर प्रसाद हैं. कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, और आलेख इन सभी विधाओं में उनका कार्य आज भी प्रासंगिक...
ब्रजेश कृष्ण प्राचीन इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व के अध्येता, विद्वान हैं और हिंदी के कवि भी. अपने इस आलेख को उन्होंने प्रकाश मनु की किताब ‘एक दुर्जेय मेधा: विष्णु खरे’...
विनोद शाही की ख्याति आलोचक-विचारक की है. इधर किसान आन्दोलन की वैचारिकी से सम्बन्धित उनके कई आलेख प्रकाशित हुए हैं. ‘ईश्वर के बीज’ उनका उपन्यास है जिसे इसी वर्ष (२०२१)...
कवि, कथाकार, संपादक, अनुवादक तथा पेशे से चिकित्सक और अध्यापक उदयन वाजपेयी का उपन्यास ‘क़यास’ २०१९ में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. इस उपन्यास पर उर्दू के इस समय...
किसी ऐतिहासिक औपन्यासिक कृति पर समीक्षात्मक आलेख दो स्तरों पर उस कृति को देखता है, उसमें कहाँ तक इतिहास है और वह उपन्यास की अपनी प्रविधि में क्या सफलतापूर्वक ढल...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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