कथा

कथा – गाथा : राकेश बिहारी

कला कृति Abdullah M. I. Syedराकेश बिहारी कथा–आलोचना में सक्रिय हैं. वह खुद कथाकार भी हैं. उनका कहानी संग्रह ‘वह सपने बेचता था’ प्रकाशित है. प्रतीक्षा कहानी फाइनान्स में कार्यरत एक...

भूमंडलोत्तर कहानी (४) : अंगुरी में डँसले बिया नगिनिया (अनुज) : राकेश बिहारी

कथादेश के नवम्बर २०१२ में युवा कथाकार अनुज की  कहानी \'अंगुरी में डँसले बिया नगिनिया\' प्रकाशित हुई और परिकथा के मई–जून २०१३ से लेकर जुलाई–अगस्त २०१४ तक  इस पर लम्बी...

नाकोहस जिस परिदृश्य का दिल दहलाने वाला रूप प्रस्तुत करती है, वह अब मात्र भयावह सम्भावना या भावी आतंक नहीं रहा. हमारे समकाल का रोज़ाना घटने वाला यथार्थ बन चुका...

प्रभात रंजन : पत्र लेखक, साहित्य और खिड़की          

प्रभात रंजन : पत्र लेखक, साहित्य और खिड़की          

युवा चर्चित कहानीकार प्रभात रंजन की नई कहानी ‘पत्र लेखक, साहित्य और खिड़की’. इस कहानी को पढ़ते हुए आप अपने  युवावस्था की बिसरी स्मृतियों में चले जाएँ तो कुछ आश्चर्य...

दादी, मुल्तान और टच एण्ड गो: तरुण भटनागर

दादी, मुल्तान और टच एण्ड गो: तरुण भटनागर

हिंदी कथा जगत में भारत और पाकिस्तान के बटवारे को केंद्र में रखकर बमुश्किल कुछ कहानियाँ हैं. बड़ी मानवीय त्रासदियाँ साहित्य में देर से आती हैं. तरुण भटनागर युवा कथाकार...

कथा – गाथा : अपर्णा मनोज

पेटिंग : Saqiba Haq                       परम्पराएँ जब धर्म का आवरण ओढ़ लेती हैं तब उनका शिकंजा और सख्त हो जाता है. अगर...

चन्दन पाण्डेय: लक्ष्य शतक का नारा       

चन्दन पाण्डेय: लक्ष्य शतक का नारा       

हिंदी कहानी में युवा रचनाशीलता के प्रतिनिधि के रूप में चंदन पाण्डेय समादृत हैं. समय और समाज को देखने का उनका अपना नज़रिया है और उसे प्रस्तुत करने के लिए...

बाहरी दुनिया का फालतू: तरुण भटनागर

बाहरी दुनिया का फालतू: तरुण भटनागर

युवा चर्चित कथाकार तरुण भटनागर की कहानिओं में आदिम सभ्यता में आधुनिक कही जाती संस्कृति की घुसपैठ की कथा मिलती है. और एक बड़ा सवाल भी कि आख़िरकार ‘मार्डन’ होना...

कथा – गाथा : अपर्णा मनोज

अपर्णा मनोज की कहानिओं ने इधर अपनी पहचान बनाई है. प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में वह लगातार छप रही हैं. ‘ख़ामोशियों का मुल्क’ में एक ही शहर में, एक ही नदी के...

ढिबरियों की कब्रगाह: तरुण भटनागर

ढिबरियों की कब्रगाह: तरुण भटनागर

युवा कथाकार तरुण भटनागर की यह कहानी विस्मित करती है. आदिवासी समाज की संवेदना और यथार्थ  के कई  आयाम यहाँ सामने आ रहें हैं.  तरुण के पास संवेदनशील भाषा है.

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