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समालोचन

Home » कला की जगहें : सीरज सक्सेना

कला की जगहें : सीरज सक्सेना

by arun dev
July 7, 2020
in शिल्प, समीक्षा
Reading Time: 16 mins read
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कलाकार, कवि, गद्यकार सीरज सक्सेना (३० जनवरी १९७४, मध्य-प्रदेश) सिरेमिक, वस्त्र, पेंटिंग, लकड़ी और ग्राफिक कला जैसे विभिन्न माध्यमों में २२ वर्षों से सक्रिय हैं. उन्होंने इंदौर स्कूल ऑफ आर्ट्स से कला की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की है. अभी तक उन्होंने भारत और विदेशों में 26 एकल प्रदर्शनियों और 180 से अधिक समूह प्रदर्शनियों में भाग लिया है. उन्होंने देश विदेश में कई स्थानों पर आर्ट इंस्टालेशन किये हैं इनमें साई, पीटीआई, राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय नई दिल्ली और अर्बोटेम बॉटनिकल गार्डन पोलैंड शामिल हैं. पिछले सात सालों से वन वेलनेस रिट्रीट, देहरादून से एक कलाकार के रूप में जुड़े हुए हैं. उन्होंने वन के लिए 300 से अधिक कलाकृतियां बनायी हैं. ‘आकाश एक ताल है’, ‘सिमट सिमट जल’ और ‘कला की जगहें’ उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं.

कला की जगहें’ हिंदी में कला पर पुस्तकों की कमी को पूरा करती है. इस पर वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया की टिप्पणी और इस पुस्तक की सीरज द्वारा लिखी भूमिका आपके लिए.  
_________________

‘मुझे लाके कोई दे
एक छुट्टी वाला दिन
एक अच्छी सी किताब’
ये  पंक्तियाँ जो मन में अक्सर घूमती रहती हैं, उस दिन सार्थक हो गईं जब कलाकार सीरज सक्सेना पहली बार मिलने आए और उन्होंने अपनी नई किताब ‘कला की जगह’ मेरे हाथों में रखी. मैं इससे अनजान नहीं थी. ‘कला की जगहें’ पर बहुत  समृद्ध समीक्षा और पोस्ट पढ़ चुकी थी. तब यही सोचा था कि एक चित्रकार है जो कविता लिखता है जैसे और भी अनके चित्रकार कविता करते हैं. मन में यह सवाल उठना लाज़िमी था कि क्या रंग अपनी बात बताने में नाकाफी होते हैं.

बहत अलग किस्म की क़िताब है, यह इसकी प्रस्तावना में ही आभास मिल गया. एक ख़ास तापमान पर सिरजी यह कृति मात्र यात्रा वर्णन नहीं है जो 8 वर्षों में  12 देश नाप रही है. सीरज सक्सेना के लिए यात्राएँ भूगोल नहीं अपितु भीतरी  विस्तार, समृद्धि व  दृश्य परिपक्वता का एक सुंदर बहाना है. कोई आश्चर्य नहीं कि पुस्तक की इतनी कलात्मक प्रस्तुति रजा पुस्तक माला के सौजन्य से हम तक पहुंची है. संभावना प्रकाशन की कोई पुस्तक बहुत दिनों बाद देखने को मिली है. सीरज की ये यात्राएँ सिरेमिक शिल्प कला के खूबसूरत नमूने पेश करती हैं और कलाकार की जिज्ञासा, जिजीविषा और जीवट को तराश कर एक वृहत्तर कलाकार को जन्म देती हैं.

हर देश में सीरज का उद्यम और संघर्ष, अध्ययन और आत्मबोध, सौन्दर्य-साधना और सृजन उपक्रम देखते ही बनता है. पढ़ते हुए यह बोध होता रहा कि हम कहानीकार कितना कम जानते हैं  और अपने आप को कितनी बड़ी तोप मानते हैं. सीरज  छोटे से छोटे देश में शिल्पकारों की परिश्रमशीलता, प्रयोगधर्मिता और कर्मठता  के नया पाठ सीखते हैं. उनके पास  एक साइकिल हो थोड़ी सी पावरोटी और जैम, वे  कितने  भी दिन यायावरी कर सकते हैं.

छोटी सी उम्र में उनकी अभिव्यक्ति की परिपक्वता मुझे विस्मित करती है. जब वे अपने देश में  कला की स्थिति देखते हुए कहते हैं-

‘कुम्हार कुम्हला चुके हैं. ठठेरा अपना ठिया उठा चुका है. हाथ का हुनर उड़न-छू हो रहा है .’


सीरज के लिये हर देश एक शिक्षा और दीक्षा है. अनुभव और अनुभूति सीखने की उनकी ललक उन्हें कभी ताओती (एक सिरेमिक वाद्य) कलाकार के पास ले जाती है कभी ओरिगेमी (कागज़ की हस्तकला) कलाकार के पास.
सीरज के बनाए रेखांकनों ने पुस्तक को ऐसी आभा शोभा प्रदान की है कि इस पर  विस्तार से लिखने की वाक् विदग्धता मुझे अलग से विकसित करनी होगी. अब कुलजमा इतनी सारी विशेषताएं, सब इंदौर के हवा पानी के नाम कर देना ज़्यादती होगी. अभी लाइव शो में सीरज  सक्सेना को गाते हुए, सुर साधते हुए देखा. वे वाकई लय में थे. उन्होंने जीवन की लय पकड़ रखी है. जियो सीरज.   
______________
ममता कालिया



प्रस्तावना

लिखना पहले शुरू हुआ या देखना? अगर यह मैं स्वयं से पूछूँ तो इसका उत्तर है- देखना. देखना यात्राओं से शुरू हुआ. पिता मध्य प्रदेश राज्य परिवहन में कार्यरत थे. अतः बचपन से ही बस में सुदूर यात्रायें शुरू हुई. मेरे देखने को विस्तार इन्हीं यात्राओं से मिला है. घूमने का यह सिलसिला पढ़ाई के साथ-साथ बढ़ता रहा और कब आदत में शामिल हो गया पता ही नहीं चला. कला अध्ययन पूरा होते ही १९९७ में जापान के अन्तरराष्ट्रीय सिरेमिक कला समागम में चयन हुआ. 

दो महीने जापान के टोकोनामे, क्योतो में रहकर, ओसाका कला संग्रहालय, शिगाराकी सिरेमिक पार्क, हौण्डा सिटी नागोया और टोक्यो देखा. वरिष्ठ कलाकार व गुरु तुल्य श्री शोईची ईदा के साथ रहकर विभिन्न माध्यमों में उनके कलाकर्म व कला-दृष्टि व परिपक्व सौन्दर्य बोध को नज़दीक से देखा. यह यात्रा कई मायने में मेरे लिये बहुत बड़ी सीख की तरह है. उस वक़्त कम ही लिखना हुआ पर श्री ईदा के साथ उनके स्टूडियो में काग़ज़, रंग व मिट्टी के प्रति उनके लगाव व कला माध्यम की तरह बर्ताव को देखना मेरे लिये उच्च कला अध्ययन की तरह ही रहा.

जापानी कला की सरलता में बसे घने सौन्दर्य की सादगी के महत्त्व व उसमें छिपी अध्यात्म की ख़ुशबू को महसूस करना एक दिव्य अनुभव है और जहाँ भी जाता हूँ इस सौन्दर्य के अन्तरराष्ट्रीय स्वीकार्य को महसूस करता हूँ. महीन हस्तनिर्मित काग़ज़ की परतों पर उन्हें कई तरह के औज़ारों के साथ काम करते हुए देखना काग़ज़ की एक नयी कलात्मक परिभाषा को देखने की तरह रहा. काग़ज़ मानो हमारी मानवीय संवेदना को समेटे हुए इस संसार व इस पृथ्वी का एक पतला, महीन व नज़रअंदाज़ न किये जा सकने वाला एक छिलका हो.


श्रीलंका में ‘पराक्रम समुद्र’ नामक एक बड़े तालाब के किनारे देर तक ठहरना व जंगल में से होकर गुज़री सड़क के किनारे घनी झाड़ियों में हाथी के एक झुण्ड को देखना एक प्राकृतिक अनुभव रहा है.
अपनी प्रथम लम्बी साइकिल यात्रा के दौरान मध्य प्रदेश के लोक व आदिवासी क्षेत्रों का दौरा करते समय भी डायरी में तमाम मानुषिक व प्राकृतिक व रोमांचक अनुभव क़ैद किये हैं, पर वह डायरी अब न जाने कहाँ गुम हो गयी है.

कलाकार मित्रों को आज भी जब पत्रा लिखता हूँ तो वह भी हृदय की ही डायरी की तरह है जिसे मैं सांझा करता हूँ, कैनवास पर रंग लगाता हूँ वह भी एक तरह का लिखना ही है.

अपने आलसी स्वभाव के कारण मैं कई महत्त्वपूर्ण यात्राओं के बारे में अब भी नहीं लिख पाया हूँ पर पोलैण्ड में देखें ‘मृत्यु शिविर’ के बारे में चाहते हुए भी नहीं लिख पा रहा हूँ. ओश्वित्सि (ओशविण्च) में पारदर्शी शीशे के बॉक्स में रखे इतने बालों को मैंने एक साथ कभी नहीं देखा था. अनगिनत छोटे-बड़े चश्मों को भी और छोटे-बड़े जूते-चप्पलों का भी इतना बड़ा ढेर पहले कभी नहीं देखा था. यहाँ यह सब देखकर अवसाद की जो सिरहन पूरी देह में बही उसका प्रभाव अब तक बना है और इस अनुभव के बारे में सोच कर ही अवसाद गहरा जाता है. इतना मायूस कर देने वाला दृश्य पहले कभी नहीं देखा. कितने हज़ारों-लाखों लोगों को, एक ज़िद के आक्रोश ने, मृत्यु-द्वार तक अमानवीय ढंग से पहुँचाया इसका हिसाब कोई गणितज्ञ ही लगा सकता है. तकनीक का प्रयोग भी इस नृशंस हत्या में किया गया है. डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों ने भी इस काम में अपने-अपने हुनर का इस्तेमाल किया है जबकि काम यह है कि तकनीक, विज्ञान और विद्या मानव की भलाई के लिये हैं पर विज्ञान ही है जो बन्दूक, तोप और मिसाइलें भी बनाता है. आत्म-सुरक्षा से हटकर यह असला, बारूद, दम्भ या खिलौना बन जाते हैं और पूरी मानव-जाति को शर्मसार करते हैं.

ताइवान में अपने सिरेमिक रेज़िडेंसी प्रवास के दौरान लिखना, साइकिल चलाना व ताओती सीखना नियमित जारी रख सका और आज जब वह वर्णन पढ़ता हूँ तब आश्चर्य होता है कि मैं इतना कुछ कैसे लिख सका. इतने देशों की यात्रा करने के बाद यह लगता है कि हमें अपने आकार पर अब ध्यान देने व अपने देश के बड़े भूगोल का गुणगान करने के बजाय समाजशास्त्रा व ज़रूरी सेवाओं के बेहतर उपयोग के बारे में कुछ प्रचार-प्रसार के अलावा गम्भीर काम भी करना चाहिये. दूसरे देशों की नगर पालिकायें भी अपने बजट में अन्तरराष्ट्रीय स्तर के महत्त्वपूर्ण कला आयोजन करती हैं. उनके महापौर व अधिकारी यूँ सहज आम नागरिक की तरह सत्ता के आडम्बर से दूर रहते हुए अपना काम करते हैं. यह बात हमें अपनानी चाहिये. छोटे देशों में क़ानून, सुरक्षा व स्वास्थ्य सेवाएँ कैसे अच्छे से काम कर पाती हैं. अपने लालच व भ्रष्ट व्यवस्था से मुक्ति पानी चाहिये. 

श्रीलंका, नेपाल, थाईलैण्ड, लातविया, इण्डोनेशिया व भूटान आदि हमारे पड़ोसी देशों से हमें सीखना चाहिये. इन देशों में स्कूली शिक्षा के स्तर बेहतर और सस्ते हैं. हमारे देश में शिक्षा व चिकित्सा व्यवस्था नागरिक को स्वयं अपनी जेब के मुताबिक ख़रीदनी पड़ रही है. शासन की न दूरसंचार सेवा में लोगों का विश्वास रह गया है न ही सरकारी स्कूलों और अस्पतालों पर यक़ीन है. शायद जब तक सरकारी अधिकारी व नेता स्वयं शासकीय स्कूलों में अपने बच्चों को नहीं पढ़ायेंगे तथा ख़ुद का इलाज सरकारी अस्पतालों में नहीं करायेंगे या जब तक वह तथा अन्य सेलिब्रिटी पब्लिक यातायात साधनों का इस्तेमाल नहीं करेंगे तब तक परिवर्तन नहीं आ सकेगा.

आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी हमारा देश प्रगतिशील है जबकि कई छोटे देश बर्बाद होने के बावजूद भी अपने पैरों पर स्वयं खड़े हुए हैं और अब विकसित देशों की सूची में सम्माननीय जगह ले चुके हैं पर हमारे यहाँ अब भी शौचालय, सड़कें व बिजली ही अभी घर-घर तक पहुँचायी जा रही है.

कुम्हार कुम्हला चुके हैं. ठठेरा अपना ठिया उठा चुका है. हाथ का हुनर उड़न-छू हो रहा है और इनको पोसने व बढ़ाने वाली संस्थाओं की संख्या व उनके बजट बढ़ रहे हैं. कभी मौक़ा नहीं आया पर मैं परिवार नियोजन मन्त्रालय से यह पूछना चाहूँगा कि जब से यह विभाग जनकल्याण के लिये बना है तब से जनसंख्या वृद्धि की दर कम हुई है या अधिक? जैसा अभी हुआ इस तरह का विषयान्तर भी होता रहता है.

अपनी दूसरी काठमाण्डू और पोखरा यात्रा के बारे में भी नहीं लिख पाया हूँ. पोखरा में हिमालय की ‘फिश टेल’ माउण्टेन पोखरा प्रवास के समय लगभग हर दिन देखी. पहले दिन बादलों के पीछे छिपी इस पहाड़ी को हम अपने चित्राकला शिविर के आकाश में नहीं देख सके पर ज्यूँ ही बादल छटे और ‘फिश टेल’ माउण्टेन की बर्फ़ीली चोटियाँ देखीं तो मन रोमांच से भर गया था.

काठमाण्डू में भागमती नदी के तट पर पशुपतिनाथ मन्दिर के प्रांगण में सुबह पूजा-अर्चना व भक्ति भरे माहौल में रहस्य भी महसूस होता रहा. महादेव का महाकाल रूप व पशुपतिनाथ का यह चहुँमुखी दर्शन रहस्यमयी है; यहाँ पुनः आने का मन है. पोखरा में अपने इण्डोनेशियाई कलाकार हादी के साथ गोलगप्पे खाना भी मैं कभी नहीं भूलता हूँ. पोखरा वादियों की नगरी है. यहाँ युवा कहानीकार व कवियों के साथ दो यादगार शामें बीतीं. तीर्थ श्रेष्ठ यहाँ के वरिष्ठ और प्रसिद्ध कवि हैं. उनसे कविता और चित्रा के सम्बन्ध में कुछ रोचक बातें हुईं. युवा कवि दीपक समीप, सरस्वती प्रतीक्षा के साथ देर रात तक बैठकें हुईं. नेपाली भाषा में भी नया लिखने वाले हैं और पढ़ने वाले भी. 

भाषा का यह प्रभाव शुभ है. यहाँ के मन्दिरों को भूकम्प ने बहुत बड़ा झटका दिया है पर उसका पुनरुद्धार देख यहाँ के काम की प्रशंसा करना लाज़मी है. लकड़ी पर यहाँ की महीन कारीगरी शिल्प में एक नयी आत्मा व ऊर्जा भरती है. हर शाम भोजन के वक़्त नेपाली लोक नृत्य का भी अनुभव आनन्ददायी रहा है. नेपाल में पारम्परिक नेवारी भोजन का ज़मीन पर बैठकर आनन्द भी अद्भुत रहा. कलाकार मित्रा एरिना के पिता की बर्तनों की दुकान पर हम कलाकारों का समूह देर तक ठहरा रहा. वहाँ से सभी ने ख़ूब ख़रीदारी की. पीतल, ताम्बे और कांसे के बर्तन यहाँ सुन्दर हैं. लोटे और घड़ों की लम्बी गर्दननुमा डिज़ाइन आकर्षक है.

भागमती नदी के किनारे हिन्दू रीति-रिवाज़ से मृत देह का अन्तिम संस्कार देखना बनारस के मणिकर्णिका घाट के दृश्य-अनुभव के समान है. नेपाली कलाकार मित्रों की मित्राता भी अब गहरी और पुरानी हो चली है. नेपाली कलाकार मित्रों के बीच आपस में भी घनिष्ठता, पारदर्शिता व मित्राता देख बहुत कुछ सीखा जा सकता है.

श्रीलंका के शान्तिप्रिय समाज को देख मैं लगभग दंग ही रह गया. वहाँ बसों के कण्डक्टर यात्रियों को बड़ी शालीनता व बिना शोर किये या चिल्लाये बुलाते हैं. न ही बसों में सीमा से अधिक यात्रा बैठाये जाते हैं. जीवन स्तर भी यहाँ से बेहतर है.

जीवन एक सुन्दर भेंट है और हमें हक़ है कि हम सभी अच्छे से जियें व अपने पर्यावरण व प्रकृति का भी ध्यान रखें. हमारी बढ़ती आबादी व गिरती शिक्षा-प्रणाली ही हमें बेहतर जीवन-शैली जीने का सपना देखने में बनाया गया एक रोड़ा है. सिर्फ़ टाई और कोट पहनने से हमारी जीवन-शैली नहीं सुधरने वाली इसके लिये हमें अन्य समाजों के भी क़रीब से दर्शन करने चाहिये.

ताइवान, जर्मनी, पोलैण्ड, सरबिया, थाईलैण्ड, नेपाल, श्रीलंका, लिथुआनिया, लातविया और चीन आदि की अपनी कला-यात्राओं में मैंने वहाँ गाँधी जी के विचारों की साक्षात् उपस्थिति देखी है. इन देशों में नागरिक सुरक्षित हैं. अपनी सुरक्षा के प्रति उन्हें अपनी इतनी ऊर्जा व समय नहीं लगाना पड़ता है जितना कि हम लगाते हैं. सहजता, सरलता व सादगी पसन्द समाजों में गाँधी दर्शन सुखद अनुभव है. वहाँ समाज में अनावश्यक आडम्बर व झूठ का बोलबाला नहीं है. हमारे समाज में जात-पात व दिखावा मानो एक अहम् गुण है.

अब सोचता हूँ तो गाँधीजी की दूरदर्शिता पर आश्चर्य होता है. शायद गाँधीजी जानते थे कि आज़ादी के बाद भारतीय समाज में हिंसा, असत्य, घृणा व गन्दगी का परचम लहरायेगा. अतः अपने पूरे जीवन में वे प्रेम, अहिंसा और सत्य को हम भारतीयों के लिये दुहराते रहे. हमने उन्हें बापू और महात्मा तो बना दिया पर उनकी बातें स्वीकार नहीं की. अब तो युवा पीढ़ी उन पर चुटकुले गढ़ती है और शिक्षाविदों ने उन्हें महज़ एक खानापूर्ति बतौर किताबों में शामिल किया है. गाँधी और टैगोर अपनी हर विदेश यात्रा में भारत के सुपरमैन की तरह मैंने देखे हैं. टैगोर की कविता भारत को सम्मान दिलाती है तथा गाँधी की सादगी विदेशियों को चौंकाती है. हमारे पाखण्ड पर कभी मुझे हैरानी होती है. रक्षाबन्धन जैसा अनूठा व महत्त्वपूर्ण त्यौहार हमारे यहाँ है. शक्ति, धन, कला, प्रकृति, बल, विद्या आदि सभी महत्त्वपूर्ण स्त्रोत देवी या माँ के रूप में हम मानते हैं फिर भी स्त्रियों के प्रति सम्मानीय दृष्टिकोण का हमारे समाज में गहरा लोप है. मेरी यात्राएँ सिर्फ़ बाहरी भूगोल की नहीं हैं अपितु भीतरी विस्तार, समृद्धि व दृश्य परिपक्वता का एक सुन्दर बहाना है. मेरे कवि-मित्रा व पड़ोसी पीयूष दईया ने जब मेरी ये हस्तलिखित डायरियाँ देखीं तो वे इसे किताब का रूप देने में तल्लीन हो गये. उन्होंने ही ख़ुद कला व साहित्य जगत् के महत्त्वपूर्ण रज़ा न्यास के अन्तर्गत ‘‘रज़ा पुस्तक माला’’ के लिए इस पुस्तक का छपना तय किया है. इस पुस्तक के प्रकाशन का श्रेय उन्हीं को जाता है. मेरे लेखन के नैरन्तर्य में वे एक अच्छे पड़ोसी की तरह उत्साहवर्धन करते व ढाढस बाँधते रहते हैं. उम्मीद करता हूँ कि मेरा लिखा युवा कलाकारों व पाठकों को और बेहतर लिखने के लिये उकसायेगा. 

_____________________________

कला की जगहें 
सीरज सक्सेना 
रज़ा पुस्तक माला

प्रकाशक 
संभवना प्रकाशन 
रेवती कुञ्ज, हापुड़- २४५१०१ 
संस्करण : २०१९
मूल्य : ३७५ 
Tags: आलेखपुस्तकसमीक्षा
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