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Home » विकल्प : अखिलेश सिंह

विकल्प : अखिलेश सिंह

अखिलेश सिंह के गद्य से आप सुपरिचित हैं. उनकी यह कहानी देखिए जहाँ आदमी अपनी भूख से ज़्यादा अपने भीतर की आवाज़ों से लड़ता है. एक मामूली-सी चोरी मनुष्यता की जटिल परतों को धीरे-धीरे खोलना शुरू कर देती है. अपराध-बोध के तनाव का निर्वाह अंत तक हुआ है.

by arun dev
November 19, 2025
in कथा
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विकल्प : अखिलेश सिंह
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विकल्प
अखिलेश सिंह

 

ट्रेन छूटने को थी और उसने  दौड़कर कम्पार्टमेंट के गेट का हत्था पकड़ लिया. एक झटके में वहाँ गलियारे में खड़े यात्रियों को धकियाते हुए अंदर आ गया. दिन-भर की भाग-दौड़ के बाद अब जाकर उसे चूतड़ टिकाने की मोहलत मिली थी. वह किस लिए इतनी भाग-दौड़ कर रहा था यह कोई ज़रूरी तफतीश का हिस्सा नहीं है. उसकी कोई एक शक्ल नहीं है. दिन-रात की भागमभाग में गुम्फित दृश्यों और गड्डमड आवाज़ों के बीच फलती-फूलती मानव-सभ्यता का वह भी कोई एक है.

ट्रेन में अपनी सीट पर पहुँचकर वह निढाल हो गया. उसे नींद आ गई. भूख और नींद के कारण ही मनुष्य पुनर्नवा होता रहता है और उसकी दिनचर्या भागती रहती है. कुछेक घंटे सोने के बाद जब उसकी आँख खुली, वह थोड़ा ताज़ा तो हुआ था लेकिन भूख से निचुड़ा हुआ महसूस कर रहा था. उधर से एक हॉकर गुज़रा.

“नहीं, यह ग़लत है. दस रुपये का गुड-डे बिस्किट पंद्रह का दे रहा है. अरे यार! यह कैसी लूट!”

वह युवक रेलवे की अन्य असुविधाओं को लेकर पहले ही परेशान था, अब तो बिलबिला ही उठा.

रेलवे का हॉकर झुँझलाकर बोला, “ट्रेन के अंदर इतने का ही है. सस्ता लेना है तो लेकर ही चढ़ा करो”

“यह क्या बात हुई भला ! हम स्लीपर में बैठे हैं, सेकेंड एसी में नहीं” दस-बीस रुपये फालतू देते-देते सफ़र भर में सौ-दो सौ ऐसे ही लुटा दें ! गज़ब है !

हॉकर, “मत लो, दिमाग न खाओ.”

यात्री की आँखें उस रात बारह बजकर बीस मिनट पर भूख के पिचके–पिटे कटोरों जैसी दिख रही हैं. बेबसी, याचना, विरोध, खीझ, चुचकार― इन सभी बातों के रंग एक हो जाएं तो उस रात उस यात्री की आँखें हो जायें. उसने चेकदार बुशर्ट को कुहनी तक मोड़ रक्खा था. अपनी कालिख जमी हुई रुमाल से माथे से पसीना पोंछ रहा था. उसकी काली डेनिम जींस में जाने कितनी जगहों से किन–किन अवशेषों के दाग चिपके हुए थे!

 

लेकिन उसके हुलिए के संबंध में इतने तमाम विवरण की कोई ज़रूरत नहीं है. क्या इतना काफ़ी नहीं कि यह सन दो हज़ार पच्चीस है और वह किसी दलाल को कुछ सौ रुपये ज्यादा देकर जैसे-तैसे स्लीपर में यात्रा कर रहा है और रात के बारह बजे हताशा और अस्थिरता में उसका भूखा चेहरा किसी गले बासी अखबार या किसी टीवी के झिलमिलाते पिक्चर ट्यूब जैसा हो गया है.

बहरहाल, वह हॉकर जाने को हुआ ही कि उस यात्री की आँखों में बेबसी का रंग गहराने लगा. उसने उसे धीमी घुरघुराती आवाज़ दी और वह हॉकर रुक गया. यात्री ने अब उससे लाइट मिक्चर नमकीन, पानी और केक माँग लिया वह भी बिना मोल-तोल के. हॉकर ने उसे केक, पानी और नमकीन देने के लिए वहीं टोकरा झम्म से रख दिया.

पाँच-सौ का नोट देखकर हॉकर कुछ कहता इससे पहले यात्री ख़ुद ही बोल पड़ा : “मेरे पास छुट्टा नहीं है, इतना महँगा सब लगा रहे हो,  छुट्टा भी नहीं दे सकते!”

“अरे ठीक है! रुको अभी पैंट्री से लाता हूँ. वह सामानों का टोकरा वहीं छोड़कर चला गया.”

यात्री उस हॉकर के बारे में सोचता रहा: यह आदमी कितना घिनौना है! इसे किसी की हालत का अंदाज़ा ही नहीं है. यह चलता है तो फ़र्श पर बैठे लोगों को रगड़ता चलता है. बात करने की तमीज़ नहीं है, लूट ऊपर से रहा है. गरज क्या न कराये! गधों से भी बात करनी पड़ती है.

हॉकर चला गया. यात्री ने पानी-बोतल का ढक्कन तोड़ा. तब तक उसे ख़याल आया, ‘हो न हो, यह हॉकर हर सामान के दस-पाँच ज़्यादा ही ले!’

इस बारे में ही थोड़ी देर सोचते-सोचते सहसा उसे लगा  कि उसकी हथेलियों में खून की रफ्तार बढ़ने लगी है. देह झुनझुनाने लगी. नसों में सरसराहट बढ़ने लगी. उसे अपर सीट मिली थी.  लगभग लटका हुआ वह अन्य यात्रियों की तजवीजने लगा. उसका हाथ कई बार नीचे जाकर दूसरी दिशाओं में मुड़ जाता. उस पर किसी की निगाहें नहीं थी. रात के बारह बजे ट्रेन में खर्राटे थे, सन्नाटा था.

यह क्या! उसका हाथ अब उस टोकरे की तरफ बढ़ चुका था. उसे गुड-डे बिस्कुट दिख रहा था और उसने कुछ ऊहापोह के बाद झट से नीचे उतरकर उसे उठा लिया.

अभी तक हॉकर आया नहीं था. उसे दस-पाँच मिनट तो लग ही जाने थे. इस फ़ैज़ाबाद-दिल्ली एक्सप्रेस में कुछ भी सही नहीं है. टिकट मिलने में मुश्किल से लेकर सुविधाओं के हरेक विभाग में मुश्किल ही मुश्किल.

कई बार मुश्किलें ही जीवन संधियों को दीप्ति प्रदान करती हैं. हॉकर आया तबतक उस यात्री को भरोसा नहीं हो रहा था कि उसने क्या कर डाला है. बिस्कुट और ऐसी ही तमाम चीजें ट्रेन में महँगी ही होती हैं. यह ग़लत था. लेकिन इसके लिए चोरी!

नैतिक छायाएँ उसके आस-पास मँडराने लगीं.

 

ग़लत कामों के विषय में सबसे मजबूत तर्क विकल्पों के ढब में ही आते हैं. लेकिन विकल्पों की छाया कितनी गहरी है यह आसानी से नहीं समझा जा सकता है. मसलन, उसके पास चोरी न करने का विकल्प तो था. वह चोरी न करता.  लेकिन आहत न होने का विकल्प! अन्याय सहन न कर पाने का विकल्प! वह अपने आसपास घूम रही नैतिक छायाओं के उत्तर तलाशने लगा, ‘मैं भूखा था, इतना भूखा कि सूखे बिस्कुट से ही आधी रात में अपनी जठरा मिटाने को विवश. मेरे पास अपनी भूख मिटाते हुए आहत न होने का विकल्प नहीं था. अब मैंने बदला ले लिया है. मेरा आहत-भाव  मिट गया है, किन्तु, यह किस तरह के पश्चाताप में मैं हूँ. शायद मुझे वह नहीं करना था, या शायद करना था. चोरी सिर्फ मैंने उतनी ही की है जिससे बढ़े हुए दाम की भरपाई हो, बस. हर चीज में डिग्री होती है तो इसमें क्यों नहीं! अपराधबोध में भी कई डिग्रियाँ होती हैं, जैसे कि अपराधों में. कुछ भी निरपेक्ष कहाँ है !’

अजीब स्थिति है! क्या इसका कोई सीधा-सरल जवाब हो सकता है कि उसे क्या करना था ! शायद कोई कथा-श्रोता यह कहे कि चोरी किसी भी कीमत पर न करो या फिर कोई यह कहे कि इस तरह बदला लेना ठीक था, क्योंकि बढ़े दामों पर उन लोगों को सामान बेचना जोकि उसे खरीदने की लिए हर हाल में मजबूर ही है,  डकैती है. लेकिन यह तर्क-शृंखला बढ़ती ही रह सकती है, इसका कोई अंत नहीं है.

जैसे अच्छी पटकथाएँ सटीक मोड़ों पर ही पात्रों का आगमन-प्रस्थान निश्चित करती हैं वैसे ही कई बार जीवन में भी होता है.

वह हॉकर छुट्टे पैसे लेकर आ गया.

अब वह  युवक को अप्रिय नहीं लग रहा था.

“बड़ी देर लगी”,  पूरी रात जगते हो क्या भाई!”

हॉकर ने हुंकारती हुई एक झीनी प्रतिक्रिया दी और कहा कुछ नहीं.

उसका मन तो हुआ कि उससे नाम पता परिवार आदि भी पूछ ले, लेकिन हॉकर के हाव-भाव देखकर चुप ही रहा.  युवक हॉकर के सामने अपने को छोटा पा रहा था. गिरा और लिथड़ा हुआ.

हॉकर ने पैसे पकड़ाकर अपना टोकरा उठाया और चलता बना. युवक ने पैसे गिने. यह क्या ! यह तो पहले से दिए हुए रुपयों से भी दो- ढाई सौ अधिक थे जबकि उसने सौ रुपये से ऊपर के तो सामान ही लिए थे. युवक ने दो बार उन रुपयों को गिना.  उसने  हॉकर को आवाज़ भी लगा दी.

“ओ भाई ! ज्यादा पैसे दे दिए हो ! देखो.”

“अरे ! अभी तो बड़ा डांड़ हो जाता! दिमाग फेल हो जाता है मालिक! दिन भर दौड़ते रहते हैं,  यह सब कोई ज़िंदगी है!”

“कंपनी का ठेका होता है बाबू! ऊपर से नीचे तक कई लम्मरदार होते हैं. जो रेट बताते हैं बेचने में, हम बेंच देते हैं. बढ़े दाम में बेचने में कुछ हमें भी मिल जाता है, लेकिन सब नहीं.”

जाते-जाते हॉकर इतना और भी बोला— “कुछ और चाहिए हो तो बता दो, अब सुबह चार बजे तक कोई हॉकर नहीं आएगा पैंट्री से.”

 

यात्री कुछ न बोल सका. उसके गले में हल्की भभकी आई. वह राहत में था.  पिछले कुछ मिनट के सघन मुक़दमे के बाद अब जाकर चोरी के आरोप से बरी हो पाया था. अब उसे इस बात का भान भी नहीं था कि उसने कोई चोरी भी की है. जैसे बहुत देर से गला सूखने के बाद पानी पीकर तर हुआ आदमी प्यास को बहुत ध्यान में नहीं रखता. हालाँकि, उसने जो अतिरिक्त पैसे लौटाए वह मानव-व्यवहार की अतिरिक्तता नहीं है. वह तो स्वाभाविक है. लेकिन अब जब हर ओर विकृतियाँ ही स्वाभाविक रूप से दिखती हैं वहाँ उसे अपने उस जेस्चर से ख़ुशी हुई. वह जीता हुआ महसूस कर रहा था. उसके आसपास से अब वे नैतिक छायाएँ  हट गई थीं.  उसे उसकी चोरी के लिए माफ़ कर दिया गया था बल्कि किसी ज़िरह से ही उसे खारिज़ कर दिया गया था.

उसने पहले केक खाया, फिर पानी पिया, फिर थोड़ी नमकीन खाई और फिर पानी पिया. गुड-डे बिस्कुट उसने नहीं खाया. मन ही मन सोचा कि कल किसी बच्चे को दे देगा.

सुबह ठीक साढ़े छह बजे उसकी आँख खुली, ट्रेन पहुँचने को थी.

कुछ लोकल सवारियों से वह स्लीपर डिब्बा पूरा भर गया था. सवारियों की खचाखच के बीच से घिसटता और जगह बनाता हुआ वही पैंट्री का हॉकर आवाज़ लगाते निकल रहा था. वह युवक आँख मलते हुए उसे गौर से देखता रहा. ट्रेन रुकने से ऐन पहले उसने रात का बचा हुआ दो घूँट पानी फिर पिया और सीट से उतरकर जाने के लिए खड़ा हो गया.

 

अखिलेश सिंह (जन्म 1990, फैज़ाबाद) कवि, गद्यकार और अनुवादक हैं. उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अध्ययन किया  है और वर्तमान में दिल्ली स्थित कृषि-मंत्रालय में कार्यरत हैं.   
akhianarchist22@gmail.com
Tags: 20252025 कथाअखिलेश सिंहविकल्प
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Comments 2

  1. तेजी ग्रोवर says:
    3 months ago

    अच्छी कहानी है। कहीं कहीं हल्का सा फाइन tune करने की ज़रूरत लगी मुझे।

    Reply
  2. Dr. Jitendra says:
    3 months ago

    ‘समालोचन’ पर आज प्रकाशित कवि अखिलेश की पहली कहानी ‘विकल्प’, दरअसल मनुष्य में जिंदा विवेक की कहानी है। वह विवेक जो हममें उचित-अनुचित का भान कराता है। जो अपराध होने पर हमें अपराधबोध से भर देता है।

    यह विवेक किसी सहृदय में तब तक बना रहता है, जब तक कि वह उसका कोई उचित उपचार नहीं खोज लेता। यह एक ऐसा घाव है, जिसके निशान हमारी देह से अधिक, मन-मस्तिष्क पर ज़्यादा अंकित रहते हैं। जिसका समाहार अपराध के बदले अपराध ना होकर, अपराध के बदले भलाई में विन्यस्त है।

    यह संयोग ही कि बीते रोज़ मैंने यश चोपड़ा निर्देशित और अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, रेखा, संजीव कुमार और शशि कपूर अभिनीत, ‘सिलसिला’ मूवी देखी। उस फ़िल्म में विवाहेत्तर प्रेम से उपजा अपराधबोध है, तो उसके बदले अंत में नायक (अमिताभ बच्चन) द्वारा, नायिका (रेखा) के पति (संजीव कुमार) को अपनी जान ज़ोख़िम में डालकर, बचा ले आने का भलाई पूर्ण प्रायश्चित्य भी।

    यूँ अखिलेश की ‘विकल्प’ कहानी का पात्र, कोई महानायक ना होकर एक आम इंसान है। ऐसा इंसान, जो बेरोज़गारी, परेशानियों और भूख से घिरकर चिड़चिड़ा है। वह अपनी एक ट्रेन यात्रा के दौरान, बहुत ही मामूली सा एक अपराध कर बैठता है। यद्धपि वह व्यक्ति व्यवस्था और शोषण से परेशान है, किंतु बेईमान बिल्कुल भी नहीं।

    वह आवेश में आकर अपराध तो कर बैठता है, लेकिन वह ऐसा करने के बाद व्यथित है। उसे राहत तब महसूस होती है, जब वह अपने सामने वाले को, बदले में एक विकल्प (भलाई) उपलब्ध करवा देता है। अपराध के बदले पीड़ित का हित।

    कभी कभी ये विकल्प, औषधि का कार्य कर जाते हैं। तब उस अवस्था में वह इंसान, अपने वर्तमान अपराध का ताप भूल जाता है। अखिलेश सिंह की ‘विकल्प’ कहानी, उसी ताप विस्मरण की कहानी है। साथ ही यह कहानी बैर के बीच, अबैर के कुछ सुखद क्षण उपस्थिति की कहानी है। अच्छाई-बुराई के बीच झूलते मनुष्य के, अपने विवेक के साथ खड़े होने की कहानी है।

    ‘विकल्प’ कवि हृदय की भी कहानी है, जिसका गद्य भाव और विचार समरूप में उपजाता है। कथाकार रूप में कवि अखिलेश सिंह की इस कहानी का पाठ, एक बार अवश्य होना चाहिए।

    -जितेन्द्र विसारिया

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